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Tuesday, October 16, 2018

ब्रह्मांड : इक तारा भी है आवारा ------ चंद्रशेखर जोशी

...ये ज्ञान के दुश्मन, नियम के दुश्मन-हर सुंदर चीज से चिढ़ते हैं...














Chandrashekhar Joshi

15 -10-2018 
इक तारा भी है आवारा :
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कम बुद्धि के लोग जिस धरती को लूटने पर तुले हैं, उसे करोड़ों बुद्धिमानों ने संवारा है। सौरमंडल को प्रकृति ने गजब कारीगरी से सजाया, लेकिन वहां भी आवारा हैं। घर-परिवार से सौर परिवार तक आवारगी पैदाइशी खोट है। ये विफल जीवन के घुमंतु, कांतिम रोशनी बिखेरते हैं, सबको चौंकाते हैं। गर आवारा को मौका मिला तो जंगल-पर्वत, धरती-अंबर कुछ न बचेगा। 
...ऐसा बताते हैं कि अरबों साल पहले हीलियम, हाइड्रोजन और कुछ अन्य गैसों के विशाल बादल या पिंड में एक महाविस्फोट हुआ। इस सुपरनोवा के बाद कई छोटे टुकड़े बिखर गए। आकाशगंगा के बाहरी इलाके पर हमारा सौरमंडल बना और इस केंद्र की परिक्रमा करने लगा। आकाशगंगा में अरबों तारे बने। हमारे सूरज ने अपना परिवार बनाया। आठ ग्रह, क्षुद्र ग्रह, उपग्रह, उल्का, धूमकेतु सभी एक सुंदर तश्तरी के अंग बन गए। घूर्णन का अक्ष बना, ग्रहों ने अपना घेरा बनाया और एक निश्चित दिशा में चल पड़े। सौरमंडल का सबसे बड़ा गैस दानव बृहस्पति भी गुरुत्वाकर्षण बल से बंध गया। सूर्य के प्लाज्मा से सौर हवाएं निकलीं। इन हवाओं ने तारों के बीच बुलबुलों का हेलिओमंडल बनाया। विविध नियमों के रंगों से तश्तरी सज गई। कई और भी आकाशगंगाएं बनीं, सभी के अपने सूरज बने। मातृ तारे ने सबको कुछ नियमों में बांध लिया।
...खगोल विज्ञानी मानते हैं कि जब यह प्रक्रिया चल रही थी तो कुछ पिंड स्वच्छंद विचरण पर दूर निकल गए। एक मत यह भी है कि इनकी गड़बड़ चाल देख, इन्हें सौरमंडल से बाहर धकेल दिया गया। जब सौर परिवारों की सजावट पूरी हो गई तो आवारा तारे पास आने लगे। सुंदरता में खलल डालना आवारा की फितरत होती है। यह किसी नियम से बंधते नहीं। ये अपनी बेतरतीब चाल से आते-जाते ग्रहों के नियमों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं और तेज रोशनी बिखरते हैं। ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जानने में जुटे विज्ञानियों को जब दूरबीनों में बार-बार दिक्कत महसूस होने लगी तो उनका दिमाग ठनक गया।
...हाल के वर्षों में खगोल शास्त्रियों ने हमारी मंदाकिनी के केन्द्र के पास एक भाग का निरीक्षण किया। करीब 500 लाख तारों का अध्ययन करने में एक चमत्कारिक घटना बार-बार दिखने लगी। इस बीच दूरबीन के लेंस प्रभावित होते रहे। तब समझ आया कि इतना गहरा प्रभाव कोई ग्रह ही डाल सकता है। जब गौर से समझा गया तो पता चला कि ये कोई विशालकाय तारे हैं। इनका द्रव्यमान महाकाय बृहस्पति से भी ज्यादा है। इनका अपने मातृ तारे से भी कोई संबंध नहीं है। ये आवारा ग्रह अंतरिक्ष में स्वतंत्र तैर रहे हैं।
...एक संभावना यह भी है कि ये भारी ग्रह किसी समय अपने मातृ तारे से ज्यादा दूरी पर परिक्रमा करते रहे होंगे। किसी खास समय में यह ग्रह अपने सौरमंडल से दूर फेंक दिए गए होंगे। इनकी संख्या बेतरतीब मानी जा रही है। खगोल विज्ञानियों के अनुसार आवारा ग्रहों की संख्या तारों की संख्या से दोगुनी तक हो सकती है। ध्यान रहे कि हमारी आकाशगंगा में ही सैकड़ों अरब तारे हैं।
...भटकते आवारा ग्रहों की बनावट जरा भिन्न होती है। ये झूठे पिंड, गैसीय गेंद हैं, इनमें बिरादरी के कोई अच्छे गुण नहीं हैं। इन ग्रहों का कोई चंद्रमा भी नहीं है। इनमें जीवन की कोई संभावना नहीं, सुंदरता से इनका दूर तलक नाता नहीं। खगोल विज्ञानी मानते हैं कि ये भीमकाय आवारा इतने खुराफाती होते हैं कि यदि इनको मौका मिल जाए तो कई ग्रहों को एकसाथ तबाह कर सकते हैं। लेकिन सौर परिवार की ताकत इतनी मजबूत है कि आवारा किसी का बाल बांका नहीं कर पाते।
...धरती में आवारा तत्वों की कमी नहीं। यह समाज की हर इकाई में पैदा हो सकते हैं। सदियों बाद भी मानव परिवार की एकता बेहद कमजोर है। यही कारण है कि मौका मिलते ही आवारा तत्व घर से लेकर सत्ता के शीर्ष तक हावी हो जाते हैं। इनकी हरकतें रोकने के बड़े उपाय होते हैं, पर जैसे ही इनका बस चला तो तबाही तय रहती है।

...ये ज्ञान के दुश्मन, नियम के दुश्मन-हर सुंदर चीज से चिढ़ते हैं...

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~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, May 16, 2015

प्रकृति में क्षमा का नहीं कोई स्थान : (भूकंप) है केवल दंड का विधान .............. विजय राजबली माथुर

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22 अप्रैल यानी बुधवार को दुनिया के 192 देश 45वां विश्व पृथ्वी दिवस मना रहे हैं। इस मौके पर आइए देखें कि 1970 से 2015 के बीच पृथ्वी कहां से कहां पहुंची है। वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने, जनसंख्या वृद्धि रोकने, अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने और जीव-जंतुओं, वनों व जलस्रोतों के संरक्षण की दिशा में हमने कितनी सफलता अजिर्त की है।
इन मोर्चो पर कुछ संभले हम
वायु प्रदूषण
विश्व
- हवा में औसतन 60 फीसदी तक घटा छह प्रमुख प्रदूषकों का स्तर
- सीसा 80 फीसदी और कार्बन मोनोऑक्साइड 50 फीसदी कम हुआ
- नाइट्रोजन डाईऑक्साइड 52 फीसदी और सल्फर डाई-ऑक्साइड 40 फीसदी तक घटा
- पीएम 2.5 और पीएम 10 माइक्रोमीटर में क्रमश: 38 फीसदी और 27 फीसदी कमी आई

भारत
- 55 फीसदी से घटकर 25 फीसदी के करीब पहुंचा औद्योगिक प्रदूषण
- घरेलू स्रोतों से उत्पन्न प्रदूषण 21 फीसदी के मुकाबले 8 फीसदी हुआ
- पर पेट्रोल-डीजल वाहनों से होने वाले प्रदूषण में 60 फीसदी वृद्धि हुई
- 1970 में 19 लाख के करीब थी वाहनों की संख्या, अभी 20 करोड़ के पार पहुंची

सुधार की दरकार क्यों
- ग्रीनहाउस गैसों के उत्सजर्न में कमी लाने की जरूरत, ग्लोबल वॉर्मिग बढ़ने से कई द्वीपों के अस्तित्व पर खतरा
- भारत में दिल्ली समेत कई शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर चिंताजनक हुआ, बढ़ रहे फेफड़े की बीमारियों के मामले

जनसंख्या
विश्व
- 3.75 अरब के करीब थी विश्व आबादी साल 1970 में
- 1980 में 18.5 फीसदी की वृद्धि से 4.5 अरब तक पहुंची
- 2012 में जनसंख्या वृद्धि दर घटकर 10.6 हुई, 7 अरब के पार पहुंची आबादी

भारत
- 54 करोड़ के करीब थी भारत की जनसंख्या साल 1970 में
- 1.2 अरब के पार पहुंच चुका है यह आंकड़ा मौजूदा समय में
- पिछले 90 दशक में पहली बार जनसंख्या वृद्धि दर में आई कमी
- 2000 के दशक में 17.6 फीसदी की दर से बढ़ी आबादी, 1990 के दशक में 21.5 फीसदी था यह आंकड़ा

सुधार की दरकार क्यों
- 9.4 अरब के करीब पहुंच सकती है विश्व आबादी साल 2050 में, 3 अरब लोगों को होगा खाने का संकट
- बढ़ती आबादी को छत मुहैया कराने और आद्योगिक विकास के लिए 11.2 करोड़ अरब हेक्टेयर वनों की करनी होगी कटाई

अक्षय ऊर्जा
विश्व
- बिजली उत्पादन के लिए सौर एवं पवन ऊर्जा का इस्तेमाल शुरू हुआ
-2035 तक अक्षय ऊर्जा स्रोतों का प्रयोग तीन गुना तक बढ़ने की उम्मीद

भारत
- 2008 में बिजली उत्पादन में 7.8 फीसदी थी अक्षय ऊर्जा स्नोतों की हिस्सेदारी
- 2013 में बढ़कर 12.3 फीसदी हुई, भारत पवन ऊर्जा से बिजली का पांचवा सबसे बड़ा उत्पादक बना

सुधार की दरकार क्यों
- वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कोयला, पेट्रोल, डीजल व अन्य पारंपरिक ऊर्जा स्नोतों पर निर्भरता घटाई जा सकेगी

यहां बिगड़ रहे हालात
पानी
विश्व
- 20 लाख टन मानव अपशिष्ट और 70 फीसदी कचरा बहाया जाता है जलस्नोतों में रोजाना
- 78.3 करोड़ लोग यानी विश्व में हर नौ में से एक व्यक्ति को स्वच्छ पेयजल मयस्सर नहीं

भारत
- 20 से 50 फीसदी जलस्नोत नाइट्रेट और आर्सेनिक जैसे हानिकारक रसायनों से दूषित
- 04 फीसदी स्वच्छ पेयजल ही उपलब्ध, गंगा-यमुना जैसी नदियों में बढ़ता प्रदूषण बड़ी चिंता

सुधार की दरकार क्यों
- 3 फीसदी पानी ही पीने लायक, जनसंख्या वृद्धि से बढ़ेगा संकट, नदियों की सफाई और वर्षा जल संचयन पर देना होगा जोर

जंगल
विश्व
- 3.9 अरब हेक्टेयर है जंगलों का मौजूदा दायरा
- 45 साल पहले यह 6 अरब हेक्टेयर से ज्यादा था

भारत
- 7.9 करोड़ हेक्टेयर भूमि जंगलों से घिरी है
- 10 करोड़ हेक्टेयर के करीब जंगल थे 45 साल पहले

सुधार की दरकार क्यों
- जहरीली गैसों को सोखने के साथ-साथ प्राणदायिनी ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं वन, वन्यजीवों को भी देते हैं आशियाना

जीव-जंतु आबादी
विश्व
- 52 फीसदी की कमी आई जीव-जंतुओं की संख्या में पिछले चार दशक में
- जल जीवों की तादाद 79 फीसदी और वन्यजीवों की 40 फीसदी तक घटी

भारत
- जीव-जंतुओं की 172 नस्लें विलुप्तिकरण की कगार पर खड़ी हैं
- इनमें 53 स्तनपायी, 69 पक्षी और 26 समुद्री जीवों की नस्लें शामिल

सुधार की दरकार क्यों
- जैविक संतुलन बनाए रखने और बढ़ती आबादी की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए जीव-जंतुओं का सुरक्षित रहना बेहद जरूरी
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 विश्व पृथ्वी दिवस की उपरोक्त रिपोर्ट अखबार में पढ़ कर चले थे और जब  25 अप्रैल 2015 को जब हम पटना जंक्शन पर लखनऊ आने हेतु ट्रेन में बैठ चुके थे अचानक बोगी दोनों ओर तेजी से झुकने डोलने लगी पहले तो इलेक्ट्रिक इंजन लगने का शक हुआ फिर बगल की लाईन पर खड़ी पूरी की पूरी ट्रेन इसी प्रकार हिलती नज़र आई तब लोगों को भूकंप आने का बोध हुआ। फिर तो परिचितों के फोन भी कुशल-क्षेम जानने हेतु आए । भूकंप के बाद वहाँ बारिश भी तेज हुई जबकि तीन दिन पहले ही वहाँ ज़बरदस्त आंधी-तूफान आ चुका था। वैज्ञानिकों/विद्वानों की चेतावनियाँ लोग बाग किस्से-कहानियों की तरह पढ़ कर अनदेखा कर देते हैं सावधानी न तो जनता की ओर से न ही सरकार की ओर से बरती जाती है। पंचांग गणितीय गणना द्वारा पहले ही चेतावनी जारी कर देते हैं लेकिन उन पर गौर करना तो दूर उनका मखौल ही उड़ाया जाता है। :
*April 28 at 3:29pm · Lucknow ·
25 व 26 अप्रैल को आए भूकंप के झटके भी प्राकृतिक प्रकोप की झलकी मात्र हैं।इस समय सूर्य अपनी उच्च राशि 'मेष'में तथा शनि अपनी शत्रु राशि वृश्चिक में थे अर्थात दोनों में परस्पर 6 व 8 के संबंध थे। 
*(05 अप्रैल से 04 मई 2015 तक वैशाख माह में पाँच रविवार पड़ रहे हैं। इनका भी प्रभाव इस भूकंप पर तथा हालिया नक्सल पंथी हमलों में रहा है जिसमें सुरक्षा बलों की क्षति हुई थी।)
03 मई 2015 की रात्रि 11:52 पर मंगल वृष राशि पर आएगा और 15 जून 2015 की रात्रि 01:08 तक रहेगा अर्थात परस्पर शत्रु ग्रह पूर्ण 180 डिग्री के कोण पर रहेंगे।**++**

***** *************************************निम्नांकित खबरों से स्पष्ट होगा कि उपरोक्त चेतावनी पर यदि ध्यान दिया जाता तो क्षति को कम किया जा सकता था। परंतु ध्यान कौन  और क्यों दे?:
"लेकिन इसके लिए जिम्मेदार मुख्य रूप से समाज में प्रचलित अवैज्ञानिक मान्यताएं और धर्म के नाम पर फैले अंध-विशवास एवं पाखण्ड ही हैं.विज्ञान के अनुयायी और साम्यवाद के पक्षधर सिरे से ही धर्म को नकार कर अधार्मिकों के लिए मैदान खुला छोड़ देते हैं जिससे उनकी लूट बदस्तूर जारी रहती है और कुल नुक्सान साम्यवादी-विचार धारा तथा वैज्ञानिक सोच को ही होता है".http://krantiswar.blogspot.in/2014/04/blog-post_14.html

" 'धर्म', 'आस्तिक' और 'नास्तिक ' : इन शब्दों को गलत अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है जिस वजह से गलतफहमिया होती हैं व सर्वाधिक नुकसान भी। वस्तुतः ये हैं :
आस्तिक= जिसका अपने ऊपर विश्वास हो।
नास्तिक= जिसको अपने ऊपर विश्वास न हो।
धर्म = जो शरीर व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक हो अर्थात 'सत्य, अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ), अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य'।
उदाहरणार्थ -एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए तो मूली व दही का सेवन करना 'धर्म' है किन्तु वही एक जुकाम-खांसी के रोगी के लिए 'अधर्म' क्योंकि इनके सेवन से उसे निमोनिया हो जाएगा। 'धर्म' व्यक्ति सापेक्ष व समय सापेक्ष होता है न कि चर्च, मंदिर, मज़ार, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि जाना। विभिन्न संप्रदायों के परिप्रेक्ष्य में 'धर्म' शब्द उच्चारण करना ही सभी समस्याओं व झगड़े का मूल है।

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/879535992108378?pnref=story

कुछ लोग आधुनिकता के नाम पर, कुछ लोग वैज्ञानिकता के नाम पर और कुछ लोग 'नास्तिकता' : 'एथीस्ट्वाद ' के नाम पर 'ज्योतिष' व 'वास्तु ' विज्ञान का विरोध, निंदा  व आलोचना  करके जन साधारण को उसका लाभ उठाने से वंचित कर देते हैं। इस कारण शोषकों-लुटेरों के हितैषी पोंगा-पंडित जनता को उल्टे उस्तरे से लूटने में कामयाब हो जाते हैं।
किसी के मानने या न मानने का ग्रह- नक्षत्रों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है बल्कि पृथ्वी वासियों द्वारा किए गए और किए जा रहे कृत्यों का उन पर पूर्ण प्रभाव पड़ता है और उसी प्रभाव के कारण ये प्राकृतिक प्रकोप - भूकंप, तूफान, सुनामी आदि-आदि के रूप में सामने आ रहे हैं।पर्यावरण विद अनिल प्रकाश जोशी जी ने वनों के विनाश को भी भूकंप आने का एक कारण बताया है। खनन एवं विद्युत परियोजनाओं के संबंध में उनका कहना है कि ये परियोजनाएं किसी आपदा की स्थिति में हमारी अवैज्ञानिक अदूरदर्शिता का नमूना भी बन सकती हैं। इसी कड़ी में मेरे विचार से यूरोप में सुरंग के जरिये आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा GOD पार्टकिल का खोज अभियान भी भू-गर्भ में अनावश्यक हलचल मचा कर भूकंप लाने का हेतु हो सकता है।
उदाहरणार्थ :
*यदि हम एक ग्लास या एक बाल्टी पानी में कोई छोटी सी भी गिट्टी डालेंगे तो हमें उसमें 'तरंगे' साफ नज़र आएंगी।
*जब तालाब या नदी गिट्टी डालेंगे तो तरंगे हल्की और क्षणिक नज़र आएंगी।
*लेकिन जब हम समुद्र में उसी गिट्टी को डालेंगे तो तरंगे बिलकुल भी नज़र नहीं आएंगी। लेकिन तरंगे बनेंगी तो ज़रूर ही भले ही हमें दीख न पाएँ।
*इसी प्रकार ग्रह- नक्षत्रों का प्रभाव सभी जीवधारियों एवं वनस्पतियों पर भी पड़ता है और जीवधारियों के कृत्यों का प्रभाव  ग्रह- नक्षत्रों पर भी पड़ता है। 05 अप्रैल से 15 जून 2015की स्थिति का उद्धृण ऊपर दिया गया है जिसकी पुष्टि 15 मई 2015 के इस समाचार से हो रही है कि 25 अप्रैल से 14 मई तक नेपाल में 211 झटके भूकंप के आ चुके हैं। 15 व 16 मई को भी वहाँ भूकंप के झटकों के समाचार हैं।
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उपाय : 

फिलहाल शनि व मंगल मंत्रों का जाप व इनके ही मंत्रों से हवन-यज्ञ द्वारा इन ग्रहों के प्रकोप को थामा जा सकता है। निश्चय ही एथीस्ट, आधुनिक वैज्ञानिक और ढ़ोंगी-पाखंडी सतसंगी गण इसका मखौल उदाएंगे। किन्तु यह विधि है पूर्ण वैज्ञानिक ही। कैसे?
जाप सस्वर करने से बनने वाली तरंगे संबन्धित ग्रहों तक पहुँचती हैं व 'पदार्थ-विज्ञान' : MATERIAL-SCIENCE के अनुसार अग्नि में डाले गए पदार्थों को वह परमाणुओं- ATOMS में विभक्त कर देती है एवं वायु उन सूक्ष्म कणों को उन ग्रहों तक पहुंचा कर उनके प्रकोप शमन में सहायक होती है।  
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  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Tuesday, September 30, 2014

'मंगल ग्रह राख़ एवं चट्टानों का ढेर है। ':कुंभकर्ण --- -- विजय राजबली माथुर

 अब 'मंगल' पर फतह :


तब  समाज-कल्याण में पिछड़े क्यों?:


Yesterday at 12:24pm(27-09-2014 ) ·

जी हाँ अब से नौ लाख वर्ष पूर्व साईबेरिया के शासक व महान वैज्ञानिक 'कुंभकर्ण' ने अपने अन्वेषण के बाद घोषणा कर दी थी कि,'मंगल ग्रह राख़ एवं चट्टानों का ढेर है। '---
भारतीय मंगल यान से प्राप्त मंगल बाबा की उबड़-खाबड़ और बदसूरत तस्वीर देखकर महसूस हुआ कि चांद की तरह वे भी किस्से-कहानियों में ही अच्छे लगते रहे थे। भ्रम टूटा तो अपनी हरी-भरी, सुजला, खूबसूरत पृथ्वी के लिए ह्रदय श्रद्धा से भर आया। अनंत काल से अपनी कोटि-कोटि संतानों को पालने वाली अपनी पृथ्वी का ही कितना दर्द समझ पाए हमलोग ? उलटे अपनी बेमतलब ज़रूरतों के लिए उसका निरंतर दोहन कर उसे नंगा करने की कोशिशों में लगे रहे हैं। मंगल ग्रह पर जाकर हम क्या पा लेंगे ? क्या कहा, ज्ञान ? अपने जीवन में अपने गांव-शहर और उसके लोगों के सुख-दुख के बारे में ही कितना जान पाते हैं आप ?
हमारी स्वार्थपरता के कारण विनाश के कगार पर खड़ी पृथ्वी के बाद अब बर्बाद होने की बारी मंगल की है !




*****                            *****                                 ***** 
प्रकृति,धर्म और विपत्ति :
पाश्चात्य साम्राज्यवादियो से प्रभावित और उनके समर्थक मानते हैं कि वेद गड़रियों के गीत हैं और उनमें अश्लीलता की भरमार है। ऐसे लोगों ने मूल निवासी आंदोलन के नाम पर साम्राज्यवाद समर्थकों की ऐसी फौज खड़ी कर दी है जो कि मूलतः शोषित-उत्पीड़ित है और उसे साम्राज्यवाद के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए था। परंतु भारतीय राजनीति की यही विडम्बना है कि साम्यवाद समर्थक 'एथीस्टवाद' के नाम पर पोंगापंथी-ढोंग,पाखंड,आडंबर को धर्म की संज्ञा दे कर महिमामंडित कर देते हैं जिसका पूरा-पूरा लाभ सांप्रदायिक शक्तियों (साम्राज्यवाद व सांप्रदायिकता सहोदरी हैं) को मिलता है जिनसे शोषक व उत्पीड़क लाभान्वित होते हैं और इस प्रकार एथीस्ट्वाद सांप्रदायिक शक्तियों के कवच का काम करता है।


धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

भगवान =भ (भूमि-ज़मीन  )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी) ।

और चूंकि भगवान (पांचों तत्व ) खुद ही बने हैं इनको किसी ने बनाया नहीं है इसीलिए ये ही 'खुदा ' हैं । 

इन पांचों तत्वों का कार्य प्राणियों व वनस्पतियों की उत्पत्ति (GENERATE ),पालन (OPERATE ) और संहार (DESTROY ) है इसलिए ये ही GOD हैं। 

लेकिन शोषकों व लुटेरों की सांप्रदायिक शक्तियों के कर्ता-धर्ताओं की भांति ही साम्यवादी भी 'एथीस्ट वाद' की आड़ में वास्तविक धर्म की आलोचना तथा ढोंग-पाखंड-आडंबर को धर्म घोषित करते रह कर  गौरान्वित होते हैं। परिणामतः प्रकृति इस लूट व शोषण का दंड अवश्य ही देती है ,यथा---





यदि अब भी समय रहते 'एथीस्ट वाद ' अथवा 'मूल निवासी आंदोलन ' के नाम पर 'वेदों' का मखौल न उड़ा कर उनमें अंतर्निहित ज्ञान व विज्ञान का भरपूर लाभ उठा लिया जाये तो धन-जन-श्रम का अपव्यय रोका जा सकता है और उसे समस्त मानवता के कल्याण में लगाया जा सकता है क्योंकि वेद सम्पूर्ण पृथिवी के वासियों को आर्य=आर्ष=श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं। पश्चिम द्वारा गलत प्रचारित आर्य कोई जाति नहीं है,न ही तथाकथित सांगठनिक धर्म । वेद प्रकृति के नियमानुसार चलने के दर्शन का उपदेश हैं। 
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  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। 

Saturday, July 5, 2014

ब्रह्मांड प्रकृति भगवान और धर्म के नाम पर अधर्म का हैवान ---विजय राजबली माथुर


घूम रहे ब्रह्माण्ड में कितने तारे, ग्रह, नक्षत्र
किंतु प्रकृति ने बस हमको ही दी है
मीठे पानी की नदियाँ, सुंदर झरने और हरे भरे वन.
लेकिन हमने प्रकृति के उपहार का बस उपहास बनाया
जैसे चाहा वैसे इसको रौंदा, कुचला, दास बनाया.
धरती की छाती पर हमने, गाड़ के खूंटे, बाँट ली धरती,
जब कराह से काँपी धरती, हम बोले भूचाल है आया.
नदियों को मैला करके, हालत कर दी नाले से बदतर,
नदियाँ तट को तोड़ चलीं, तो हम बोले कि बाढ़ है आई.
काट दिए सब जंगल, वन और पर्वत को नंगा कर डाला,
बारिश रस्ता भूल गई और हम बोले सूखा है आया.
जाने क्या क्या बहा दिया जब हमने सागर के पानी में,
सागर ने प्रतिकार किया तो हमने कहा सूनामी आई.
.
प्रकृति माँ है, हमने प्रकृति का कितना अपमान किया
माँ के जब आँसू निकले, प्राकृतिक आपदा नाम दिया.
बात याद रखनी थी जो वह भूल गया क्यों अपना मन
प्रकृति ने बस हमको दी है, मीठे पानी की नदियाँ,
सुंदर झरने और हरे भरे वन!!






 (यह चिंता 21 मार्च 2012 को फेस बुक पर बिहारी बाबू -सलिल वर्मा जी ने  व्यक्त की थी। उनकी यह रचना और चिन्ता मुझे सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हुई  इसका समाधान मै नीचे दे रहा हूँ):


                                        यज्ञ  माहात्म्य

लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की।
जो वस्तु अग्नि मे जलाई,हल्की होकर वो ऊपर उड़ाई।
करे वायु से मिलान,जाती है रस्ता गगन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 1 । ।

फिर आकाश मण्डल मे भाई,पानी की होत सफाई।
वृष्टि होय अमृत समान,वृद्धि होय अन्न और धन की।
लिखा वेदों मे विधान,अद्भुत है महिमा हवन की। । 2 । ।

जब अन्न की वृद्धि होती है,सब प्रजा सुखी होती है।
न रहता दु : ख का निशान ,आ जाती है लहर अमन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 3 । ।

जब से यह कर्म छुटा है,भारत का भाग्य लुटा है।
'सुशर्मा'करते बयान सहते हैं मार दु :खन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 4 । ।

जनाब 'हवन' एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। कैसे? Material  Science (पदार्थ विज्ञान ) के अनुसार अग्नि मे जो भी चीजें डाली जाती हैं उन्हे अग्नि परमाणुओ (Atoms) मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओ को बोले गए मंत्रों की शक्ति से संबन्धित ग्रह अथवा देवता तक पहुंचा देती है।

देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-अग्नि,वायु,आकाश,समुद्र,नदी,वृक्ष,पृथ्वी,ग्रह-नक्षत्र आदि।(पत्थर के टुकड़ों तथा कागज पर उत्कीर्ण चित्र वाले नहीं )। 

मंत्र शक्ति=सस्वर मंत्र पाठ करने पर जो तरंगें (Vibrations) उठती हैं वे मंत्र के अनुसार संबन्धित देवता तक डाले गए पदार्थों के परमाणुओ को पहुंचा देती हैं।

अतः हवन और मात्र हवन (यज्ञ ) ही वह पूजा या उपासना पद्धति है जो कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है। बाकी सभी पुरोहितों द्वारा गढ़ी गई उपासना पद्धतियेँ मात्र छ्ल हैं-ढोंग व पाखंड के सिवा कुछ भी नहीं हैं। चाहे उनकी वकालत प्रो . जैन अर्थात 'ओशो-रजनीश' करें या आशा राम बापू,मुरारी बापू,अन्ना/रामदेव,बाल योगेश्वर,आनंद मूर्ती,रवी शंकर जैसे ढ़ोंगी साधू-सन्यासी। 'राम' और 'कृष्ण' की पूजा करने वाले राम और कृष्ण के शत्रु हैं क्योंकि वे उनके बताए मार्ग का पालन न करके ढ़ोंगी-स्वांग रच रहे हैं। राम को तो विश्वमित्र जी 'हवन'-'यज्ञ 'की रक्षा हेतु बाल काल मे ही ले गए थे। कृष्ण भी महाभारत के युद्ध काल मे भी हवन करना बिलकुल नहीं भूले। जो लोग उनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग -हवन करना छोड़ कर उन्हीं की पूजा कर डालते हैं वे जान बूझ कर उनके कर्मों का उपहास उड़ाते हैं। राम और कृष्ण को 'भगवान' या भगवान का अवतार बताने वाले इस वैज्ञानिक 'सत्य ' को स्वीकार नहीं करते कि 'भगवान' न कभी जन्म लेता है न उसकी मृत्यु होती है। अर्थात भगवान कभी भी 'नस' और 'नाड़ी' के बंधन मे नहीं बंधता है क्योंकि,-

भ=भूमि अर्थात पृथ्वी।
ग=गगन अर्थात आकाश।
व=वायु।
I=अनल अर्थात अग्नि (ऊर्जा )।
न=नीर अर्थात जल।

प्रकृति के ये पाँच तत्व ही 'भगवान' हैं और चूंकि इन्हें किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसी लिए ये 'खुदा' हैं। ये पांचों तत्व ही प्राणियों और वनस्पतियों तथा दूसरे पदार्थों की 'उत्पत्ति'(GENERATE),'स्थिति'(OPERATE),'संहार'(DESTROY) के लिए उत्तरदाई हैं इसलिए ये ही GOD हैं। पुरोहितों ने अपनी-अपनी दुकान चमकाने के लिए इन को तीन अलग-अलग नाम से गढ़ लिया है और जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं। इनकी पूजा का एकमात्र उपाय 'हवन' अर्थात 'यज्ञ' ही है और कुछ भी कोरा पाखंड एवं ढोंग।

                                         यज्ञ महिमा

होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान यज्ञ से। ।

1-ऋषियों ने ऊंचा माना है स्थान यज्ञ का।
करते हैं दुनिया वाले सब सम्मान यज्ञ का।
दर्जा है तीन लोक मे-महान यज्ञ का।
भगवान का है यज्ञ और भगवान यज्ञ का।
जाता है देव लोक मे इंसान यज्ञ से। होता है ...........

2-करना हो यज्ञ प्रकट हो जाते हैं अग्नि देव।
डालो विहित पदार्थ शुद्ध खाते हैं अग्नि देव।
सब को प्रसाद यज्ञ का पहुंचाते हैं अग्नि देव।
बादल बना के भूमि पर बरसाते हैं अग्निदेव।
बदले मे एक के अनेक दे जाते अग्नि देव।
पैदा अनाज होता है-भगवान यज्ञ से।
होता है सार्थक वेद का विज्ञान यज्ञ से। होता है ......

3-शक्ति और तेज यश भरा इस शुद्ध नाम मे ।
 साक्षी यही है विश्व के हर नेक काम मे।
 पूजा है इसको श्री कृष्ण-भगवान राम ने।
होता है कन्या दान भी इसी के सामने।
मिलता है राज्य,कीर्ति,संतान यज्ञ से।
सुख शान्तिदायक मानते हैं सब मुनि इसे। होता है .....

4-वशिष्ठ विश्वमित्र   और नारद मुनि इसे।
इसका पुजारी कोई पराजित नहीं होता।
भय यज्ञ कर्ता को कभी किंचित नहीं होता।
होती हैं सारी मुश्किलें आसान यज्ञ से। होता है ......

5-चाहे अमीर है कोई चाहे गरीब है।
 जो नित्य यज्ञ करता है वह खुश नसीब है।
हम सब मे आए यज्ञ के अर्थों की भावना।
'जख्मी'के सच्चे दिल से है यह श्रेष्ठ कामना।
होती हैं पूर्ण कामना--महान यज्ञ से । होता है ....  



हम जानते हैं कि आपके इर्द-गिर्द छाए   हज़ारे/केजरीवाल  और सुबरमनियम स्वामी के चेले-चपाटे  आपको हकीकत  स्वीकारने नहीं देंगे। नीचे स्कैन मे आप ओज़ोन पर्त की जो समस्या देख रहे हैं वह भी 'हवन'पद्धती को त्यागने का ही परणाम है। -



Hindustan-Lucknow-30/03/2012



भोपाल गैस कांड के बाद यूनियन कारबाईड ने खोज करवाई थी कि तीन परिवार सकुशल कैसे बचे। निष्कर्ष मे ज्ञात हुआ कि वे परिवार घर के भीतर हवन कर रहे थे और दरवाजों व खिड़कियों पर कंबल पानी मे भिगो कर डाले हुये थे। ट्रायल के लिए गुजरात मे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 'प्लेग' के कीटाणु छोड़ दिये। इसका प्रतिकार करने हेतु सरकार ने हवन के पैकेट बँटवाए थे और 'हवन' के माध्यम से उस प्लेग से छुटकारा मिला था। तब से लगातार अमेरिका मे 'अखंड हवन' चल रहा है और जो ओजोन का छिद्र अमेरिका के ऊपर था वह खिसक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। लेकिन भारत के लोग ओशो,मुरारी और आशाराम बापू ,रामदेव,अन्ना हज़ारे,गायत्री परिवार जैसे ढोंगियों के दीवाने बन कर अपना अनिष्ट कर रहे हैं । परिणाम क्या है  एक विद्वान ने यह बताया है-


परम पिता से प्यार नहीं,शुद्ध रहे व्यवहार नहीं। 
इसी लिए तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं। । परम ... । । 
फल और फूल अन्य इत्यादि,समय समय पर देता है। 
लेकिन है अफसोस यही ,बदले मे कुछ नहीं लेता है। । 
करता है इंकार नहीं,भेद -भाव तकरार  नहीं। 
ऐसे दानी का ओ बंदे,करो जरा विचार नहीं। । परम ....। । 1 ।  ।
मानव चोले मे ना जाने कितने यंत्र लगाए हैं। 
कीमत कोई माप सका नहीं,ऐसे अमूल्य बनाए हैं। । 
कोई चीज बेकार नहीं,पा सकता कोई पार नहीं । 
ऐसे कारीगर का बंदे ,माने तू उपकार नहीं। । परम ... । । 2 । । 
जल,वायु और अग्नि का,वो लेता नहीं सहारा है। 
सर्दी,गर्मी,वर्षा का अति सुंदर चक्र चलाया है। । 
लगा कहीं दरबार नहीं ,कोई सिपाह -सलारनहीं। 
कर्मों का फल दे सभी को ,रिश्वत की सरकार नहीं। । परम ... । । 3 । । 
सूर्य,चाँद-सितारों का,जानें कहाँ बिजली घर बना हुआ। 
पल भर को नहीं धोखा देता,कहाँ कनेकशन लगा हुआ। । 
खंभा और कोई तार नहीं,खड़ी कोई दीवार नहीं। 
ऐसे शिल्पकार का करता,जो 'नरदेव'विचार नहीं। । परम .... । । 4 । ।  
आज  इस पाखंडी नारे का परित्याग करने कि-सीता राम,सीता राम कहिए जाहि विधि राखे राम ताही विधि रहिए-और वास्तविकता को स्वीकारते हुये इस तथ्य का पालन करने का संकल्प लेना चाहिए कि,"सीता-राम,सीता-राम कहिए ---जाहि विधि रहे राम ताही विधि रहिए।"
आलसी और अकर्मण्य लोग राम को दोष दे कर बच निकलना चाहते हैं।  राम ने जो त्याग किया  और कष्ट देश तथा देशवासियों के लिए खुद व पत्नी सीता सहित सहा उसका अनुसरण करने -पालन करने की जरूरत है । राम के नाम पर आज देश को तोड़ने और बांटने की साजिशे हो रही हैं जबकि राम ने पूरे 'आर्यावृत ' और 'जंबू द्वीप'को एकता के सूत्र मे आबद्ध किया था और रावण के 'साम्राज्य' का विध्वंस किया था । राम के नाम पर क़त्लो गारत करने वाले राम के पुजारी नहीं राम के दुश्मन हैं जो साम्राज्यवादियो के मंसूबे पूरे करने मे लगे हुये हैं । जिन वेदिक नियमों का राम ने आजीवन पालन किया आज भी उन्हीं को अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है।


  ~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, April 14, 2014

दीवार पर लिखे को न समझा तो भारत झेलेगा प्रकृति का रौद्र रूप......




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"Friday, July 8, 2011


विकास या विनाश

१९४७ में जब हमारा देश औपनिवेशिक गुलामी से आजाद हुआ था तो हमारे यहाँ सुई तक नहीं बंनती थी और आज हमारे देश में राकेट ,मिसाईलें तक बनने लगी हैं.विकास तो हुआ है जो दीख रहा है उसे झुठलाया नहीं जा सकता.लेकिन यह सारा विकास ,सारी प्रगति,सम्पूर्ण समृद्धि कुछ खास लोगों के लिए है शेष जनता तो आज भी भुखमरी,बेरोजगारी,कुपोषण आदि का शिकार है.गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर हुआ है.आजादी का अर्थ यह नहीं था.इसके लिए सरदार भगत सिंह,चंद्रशेखर आजाद,रामप्रसाद बिस्मिल,अश्फाक उल्लाह खां,रोशन लाल लाहिरी आदि अनेकों क्रांतिकारियों ने कुर्बानी नहीं दी थी.यह मार्ग विकास का नहीं ,विनाश का है.

विकास का लाभ आम जन को मिले इस उद्देश्य से प्रेरित नौजवानों नें नक्सलवाद का मार्ग अपना लिया और छत्तीस गढ की भाजपा सरकार ने इन्हें कुचलने हेतु 'सलवा-जुडूम' तथा एस पी ओ का गठन स्थानीय युवकों को लेकर कर लिया था जिसे भंग करने का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि,"इस सशस्त्र विद्रोह के लिए सामजिक,आर्थिक विषमता,भ्रष्ट शासन तंत्र और 'विकास के आतंकवाद'  हैं".

जस्टिस बी.सुदर्शन रेड्डी का मत है-"मिडिल क्लास की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए हो रहे औद्योगिकीकरण व् अंधाधुंध माइनिंग के कारण किसान जमीन-जंगल से लगातार बेदखल हो रहे हैं.नक्सल आंदोलन के पैदल सिपाही यही किसान और आदिवासी हैं"

(Hindustan-08/07/2011-Lucknow-Page-16)


"कोरिया की पास्को कं.को उड़ीसा में ५० वर्ष तक लौह अयस्क ले जाने हेतु किसानों की उपजाऊ जमीन दे दी गयी है लेकिन किसान कब्ज़ा नहीं छोड़ रहे हैं और ऐसा करना उनका जायज हक है.२४ जून को सारे देश में किसानों के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करने हेतु 'पास्को विरोधी दिवस' मनाया गया था (इस ब्लाग में इस आशय का एक लेख भी दिया था),किन्तु अधिकाँश लोग अपने-अपने में मस्त थे,उन्हें उड़ीसा के गरीब किसानों से कोई मतलब नहीं था .नंदीग्राम और सिंगूर में हल्ला बोलने वाली मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी भी चुप्पी साधे रहीं.

'नया जमाना',सहारनपुर के संस्थापक संपादक स्व.कन्हैया लाल मिश्र'प्रभाकर' ने आर.एस.एस.नेता लिमये जी से एक बार कहा था कि शीघ्र ही दिल्ली की सत्ता के लिए सड़कों पर संघियों-कम्यूनिस्टों के मध्य संघर्ष होगा.दिल्ली नहीं तो छत्तीस गढ़ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पूर्व यह हो ही रहा था.१९२५ में आजादी के आंदोलन को गति प्रदान करने हेतु जब 'भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी' का गठन किया गया तो ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने पृष्ठपोषक बुद्धिजीवियों को बटोर कर आर.एस.एस.का गठन करवा दिया जिसने साम्राज्यवाद की सहोदरी 'साम्प्रदायिकता' को पाला-पोसा और अंततः देश का विभाजन करा दिया.१९४७ में हुआ विभाजन १९७१ में एक और विभाजन लेकर आया जिसने दो राष्ट्रों की थ्योरी को ध्वस्त कर दिया.भारत के ये तीनों हिस्से भीषण असमानता के शिकार हैं.तीनों जगह सत्ताधीशों ने अवैध्य कमाई के जरिये जनता का खून चूसा है.तीनों जगह आम जनता का जीवन यापन करना बेहद मुश्किल हो रहा है.सरकारें साम्राज्यवाद के आधुनिक मसीहा अमेरिका के इशारे पर काम कर रही हैं न कि अपने-अपने देश की जनता के हित में.

तीनों देशों में फिरकापरस्त लोग अफरा-तफरी फैला कर जीवन की मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटा रहे हैं.लोक-लुभावन नारे लगा कर पूंजीपतियों के पिट्ठू ही साधारण जन को ठग कर सत्ता में पहुँच जाते हैं.जाति,धर्म.सम्प्रदाय,गोत्र ,क्षेत्रवाद की आंधी चला कर सर्व-साधारण को गुमराह कर दिया जाता है.जो लोग गरीबों के रहनुमा हैं किसानों और मजदूरों के हक के लड़ाका हैं वे अपने अनुयाइयों के वोट हासिल नहीं कर पते हैं और सत्ता से वंचित रह जाते हैं.नतीजा साफ़ है जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं वे अपने आकाओं को खुश करने की नीतियाँ और क़ानून बनाते हैं ,आम जन तो उनकी वरीयता में होता ही नहीं है.

क्या आम जनता इसके लिए उत्तरदायी है?कुछ हद तक तो है ही क्योंकि वही तो जाति,धर्म ,सप्रदाय के बहकावे में गलत लोगों को वोट देकर भेजती है.लेकिन इसके लिए जिम्मेदार मुख्य रूप से समाज में प्रचलित अवैज्ञानिक मान्यताएं और धर्म के नाम पर फैले अंध-विशवास एवं पाखण्ड ही हैं.विज्ञान के अनुयायी और साम्यवाद के पक्षधर सिरे से ही धर्म को नकार कर अधार्मिकों के लिए मैदान खुला छोड़ देते हैं जिससे उनकी लूट बदस्तूर जारी रहती है और कुल नुक्सान साम्यवादी-विचार धारा तथा वैज्ञानिक सोच को ही होता है.

धर्म=जो धारण करता है वही धर्म है -यह धारणा कैसे अवैज्ञानिक और मजदूर-किसान विरोधी हो गयी.लेकिन किसान-मजदूर विरोधी लोग जम कर धर्म की गलत व्याख्या प्रस्तुत करके किसान और मजदूर को उलटे उस्तरे से लूट ले जाते हैं क्योंकि हम सच्चाई बताते ही नहीं तो लोग झूठे भ्रम जाल में फंसते चले जाते हैं.

भगवान=भूमि का 'भ'+गगन का 'ग'+वायु का 'व्'+अनल(अग्नि)का अ ='I'+नीर(जल)का' न ' मिलकर ही भगवान शब्द बना है यह कैसे अवैज्ञानिक धारणा हुयी,किन्तु हम परिभाषित नहीं करते तो ठग तो भगवान के नाम पर ही जनता को लूटते जाते हैं.

(चूंकि प्रकृति के ये पांचों तत्व(भगवान) खुद ही बने हैं इनको किसी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही सम्मिलित रूप से 'खुदा' हैं। इनका कार्य उत्पत्ति (GENERATE),पालन (OPRATE) और संहार (DESTROY)है अर्थात ये ही GOD हैं )
मंदिरों से प्राप्त खजाने इस बात का गवाह हैं कि ये मंदिर बैंकों की भूमिका में थे जहाँ समाज का धन सुरक्षित रखा गया था लेकिन आज इसे 'ट्रस्ट'के हवाले करके समृद्ध लोगों की मौज मस्ती का उपाय मुकम्मिल करने की बातें हो रही हैं.१९६२ में गोला बाजार,बरेली में हम लाला धरम प्रकाश जी के मकान में किराए पर रहते थे.जो दीवार कच्ची अर्थात मिट्टी की बनी थी उसे ढहा कर उन्होंने पक्की ईंटों की दीवार बनवाई .कच्ची दीवार से गडा खजाना निकला तुरंत पुलिस पहुँच गयी क्योंकि कानूनन पुराना खजाना सरकार  या समाज की संपत्ति है.पुलिस को भेंट चढा कर उन्होंने रिपोर्ट लगवा दी खजाने की खबर झूठी थी.लेकिन मंदिरों से प्राप्त खजाने की खबर तो झूठी नहीं है फिर इसे किसी ट्रस्ट को क्यों सौंपने की बातें उठ रही हैं ,यह क्यों नहीं सीधे सरकारी खजाने में जमा किया जा रहा है?यदि यह धन सरकारी खजाने में पहुंचे तो गरीब तबके के विकास और रोजगार की अनेकों योजनाएं परिपूर्ण हो सकती हैं.जो करोड़ों लोग भूख से बेहाल हैं उन्हें दो वक्त का भोजन नसीब हो सकता है.

कहीं भी किसी भी उपासना स्थल से प्राप्त होने वाला खजाना राष्ट्रीय धरोहर घोषित होना चाहिए न कि किसी विशेष हित -साधना का माध्यम बनना चाहिए.चाहे संत कबीर हों ,चाहे स्वामी दयानंद अथवा स्वामी विवेकानंद और चाहे संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन डाक्टर अम्बेडकर सभी ने आम जन के हित पर बल दिया है न कि वर्ग विशेष के हित पर.अतः यदि समय रहते आम जन का समाज ने ख्याल नहीं किया तो आम जन बल प्रयोग द्वारा समाज से अपना हक हासिल कर ही लेगा."

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उपर्युक्त लेख में सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों को ही शामिल किया गया है किन्तु यदि प्रकृति की 'प्रकृति' को न समझा गया तो जैसा  कि वैज्ञानिक खोजें बता रही हैं भारत को उत्तराखंड,कुम्भ,देवघर,आदि सरीखी प्राकृतिक विभीषीकाओं  का निश्चय ही सामना करना पड़ेगा। यदि इनसे बचाव करना है तो इस अवैज्ञानिक विकास (वस्तुतः विनाश ) की प्रक्रिया को पूर्ण विराम देकर मानवोचित समाज-व्यवस्था भी स्थापित करनी होगी,समानता पर आधारित राज-व्यवस्था भी स्थापित करनी होगी और प्रकृति से सामंजस्य वाली प्राचीन भारतीय पद्धती भी पुनर्स्थापित करनी होगी। ऐसी संभावनाएं फिलहाल अभी तो न के बराबर हैं। अतः तैयार रहना होगा प्राकृतिक प्रकोप झेलने को।
  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। 
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28-04-2015 : 

Thursday, October 28, 2010

पूजा क्या ,क्यों और कैसे ? ------ विजय राजबली माथुर

यह धन और धरती बंट क़े रहेगी ,भूखी जनता अब चुप न रहेगी .नारे लगाने वालों क़े मत क़े प्रणेता कार्ल मार्क्स महर्षि चार्वाक से प्रभावित थे . चार्वाक परमात्मा को नहीं मानते थे और उन्होंने कहा था -"जब तक जियो मौज से जियो ;घी पियो चाहे उधार ले क़े पियो ."इसी प्रकार कार्ल मार्क्स ने कहा "man has created the god for his mental security only ."परन्तु विश्व का बहुमत परमात्मा को मानता है चाहे वह खुदा कहता हो अर्थात वह शक्ति जो खुद ही बनी है उसे किसी ने बनाया नहीं है चाहे god कहे जिसका अभिप्राय ही generate ,operate ,destroy से है .हम भारतीय उस शक्ति को परमात्मा कहते हैं जिसने स्वंयअपना नाम ओ३म  बताया है .परमात्मा ने मनुष्य रूपी प्राणी का नाम कृतु रखा है अर्थात कर्म करने वाला .मनुष्य शरीर में आत्मा को कर्म करने की छूट है ,अन्य योनिओं में आत्मा केवल भोग ही भोगता रहता है .मनुष्य कहा ही इसलिए जाता है क्योंकि यह मननशील  प्राणी है जो अपने बुध्दी व विवेक से मनन करता हुआ कर्म करता है .कर्म तीन प्रकार क़े होते हैं ---सद्कर्म ,दुष्कर्म और अकर्म .सद्कर्म का फल अच्छा ,दुष्कर्म का बुरा फल और अकर्म का दण्ड मिलता है .अकर्म का अर्थ है वह ड्यूटी ,दायित्व या फ़र्ज़ जो किया जाना चाहिए था परन्तु किया नहीं गया .हालाँकि यह सद्कर्म या दुष्कर्म तो नहीं है परन्तु इस अकर्म से दूसरे प्राणी का जो अहित हुआ वह परमात्मा की निगाह में दण्ड  का भागीदार बना देता है .जब कर्मों क़े अनुसार फल मिलना ही है तो फिर परमात्मा को याद क्यों किया जाये ?यह प्रश्न स्वभाविक है .हमें यह मनुष्य  शरीर परमात्मा की कृपा से मिला है जिसमे हमें कर्म करने की छूट मिली है ,इसलिए परमात्मा को धन्यवाद देने हेतु हमें उसकी उपासना अथवा उसकी पूजा करनी चाहिए .पूजा वह विधि है जिससे परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त किया जा सकता है .यों तो परमात्मा सर्वत्र है हमारे शरीर में भी है परन्तु उसका ध्यान करना ,उसे याद करना ही पूजा कहलाता है .

वास्तविक पूजा कैसे हो ?                 

पूजा परमात्मा का ध्यान करने की विधि है और परमात्मा को धन्यवाद देने हेतु की जाती है परन्तु इसे कैसे करें -इस विषय में घोर मतभेद ,व्यापक विवाद एवं अनेकों भ्रांतियां हैं .तरह -तरह क़े लोगों ने अपनी सुविधा और इच्छा से तरह -तरह की पूजा विधियाँ गढ़ ली हैं .कोई मानस पाठ करा रहा है ,कोई भागवद पाठ ,कोई गीता पाठ ,कोई देवी जागरण ,कोई सुन्दर काण्ड पाठ ,कोई कुरआन की अज़ान दे रहा है तो कोई बाईबिल से प्रयेर कर रहा है .परन्तु ये सभी पधितियाँ अवैज्ञानिक हैं और उनसे परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त नहीं किया जा सकता है .जिस प्रकार किसी संस्था क़े निर्माण क़े समय पहले उसका विधान तैयार किया जाता है उसी प्रकार सृष्टी निर्माण क़े समय परमात्मा ने भी सृष्टी -संचालन हेतु सृष्टी क़े निर्माण क़े ही साथ विधान प्रस्तुत किया है जिसे हम वैदिक -ज्ञान कहते हैं .पूर्व सृष्टी की प्रलय क़े समय मोक्ष -प्राप्त आत्माओं में से श्रेष्ठ को परमात्मा ने इस सृष्टी का विधान प्रस्तुत करने हेतु इस पृथ्वी पर भेजा जिन्होंने ऋग्वेद ,यजुर्वेद ,सामवेद और अथर्ववेद की रचना की है .इन वेदों में गूढ़ ज्ञान -विज्ञान क़े साथ -साथ परमात्मा से सान्निध्य स्थापित करने का ज्ञान भी बताया गया है .

वेदों में बताया गया है -परमात्मा का मुख अग्नि है .अग्नि में मंत्रोच्चार क़े साथ डाले गए पदार्थ वायु की सहायता से परमात्मा तथा सभी जड़ देवताओं तक पहुंचा दिए जाते हैं .अग्नि का गुण है पदार्थ को सूक्ष्म परमाणुओं (Atoms )में परिवर्तित कर देना और वायु उनको सम्बंधित तक पहुँचाने का कार्य करता है .हवन में डाली गई जडी -बूटियाँ ,बूरा ,गूगल ,घी ,किशमिश तथा आम की समिधा टी .बी .,टायफायड़ आदि विभिन रोगों क़े कीटाणुओं (BACTARIAS )को नष्ट करने का कार्य करते हैं .इससे पर्यावरण शुद्ध होता है और डाले गए पदार्थों का पचास प्रतिशत भाग नासिका क़े माध्यम से धूम्र -चिकित्सा (SMOKE TREATMENT )द्वारा हवन पर बैठे मनुष्यों को तुरन्त मिल जाता है शेष पचास प्रतिशत जन -कल्याण हेतु पुण्य क़े रूप में संचित हो जाता है .हवन करने से पहले परमात्मा से प्रार्थना की जाती है .प्रार्थना क़े वैज्ञानिक महत्त्व को अब   अमेरिकी चिकित्सा वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर लिया है .८ सितम्बर २००३ को दैनिक जागरण ने प्रकाशित किया था कि सन १९६५ ई .में माउन्ट एवरेस्ट फतह करने वाले कैप्टन एम् .एस .कोहली ने अपनी पुस्तक " मिराकल आफ अरदास इनक्रेडिबल सर्वाइवर्स एंड एडवेंचर्स " में रहस्योदघाटन किया है कि अमेरिकी शोधकर्ताओं ने कुछ मरीजों क़े लिए दुआएं (प्रार्थनाएँ )कराईं तो यह सिद्ध हुआ कि जिन मरीजों का आपरेशन हुआ था और उनके लिए दुआ की गई उनके ठीक होने की रफ़्तार पचास से सौ प्रतिशत बढ़ गई .

महाभारत काल क़े बाद हमारी प्राचीन वैज्ञानिक हवन की पूजा पद्धति को छोड़ कर अन्य विकृत और अवैज्ञानिक पूजा पद्धतिओं को विकसित किया गया है और उसी का दुष्परिणाम हम सब भुगत रहे हैं .पोंगापंथी कर्मकांडियो ने हवन को ढकोसला बना कर रख दिया है और उपयुक्त तथा उचित प्रार्थनाओं को महत्त्व न देकर जनता को दिग्भ्रमित करके अपना उल्लू सीधा करते हैं .

यदि हम वैज्ञानिक पूजा (हवन )प्रारम्भ करने से पूर्व वैज्ञानिक विधि से प्रार्थना भी करें तो की गई प्रार्थनाओं क़े आधार पर परमात्मा मनुष्य की बात उसी प्रकार स्वीकार करता है जिस प्रकार माता -पिता अपने बच्चे क़े अनुनय -विनय को स्वीकार कर लेते हैं .यदि हम परमात्मा क़े गणपति रूप से रक्षा ,स्वास्थ्य आदि की प्रार्थना ,विष्णु स्वरूप से कल्याणकारी पालन की प्रार्थना तथा शिव स्वरूप से दीर्घायु और उत्तम जीवन -यापन की प्रार्थना हवन से पूर्व कर लें तो उस हवन द्वारा प्राप्त होने वाला सुफल द्विगुणित  हो सकता है .परन्तु आज क़े आपा -धापी क़े युग में लोग तीन घंटे पिक्चर हाल में बैठ सकते हैं ,सारी -सारी रात डिस्को पार्टी में बैठ सकते हैं ,न तो उनके पास प्रार्थना और हवन में बैठने का समय है न ही पोंगापंथियों  द्वारा अपना दायित्व निर्वहन किया जा रहा है ---परिणाम परिवारों ,समाज और राष्ट्र क़े विघटन क़े रूप में सामने है .हम मनुष्य हैं क्या हम मनन करेंगे कि पुनः अपनी प्राचीन पूजा (हवन )और प्रार्थना को अपना कर जीवन को सुखमय बना सकें ?


(यह आलेख पहली दफा २००३ में कायस्थ -सभा ,आगरा की त्रेमासिक पत्रिका "प्रेरणा "में फिर दूसरी बार  वैश्य -समुदाय की मांग पर उनकी त्रेमासिक पत्रिका "अग्र मन्त्र "क़े मई -जुलाई २००४ अंक में प्रकाशित हो चुका है .ब्लाग -जगत क़े जागरूक साथियों  क़े हितार्थ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है .अगले अंकों में स्तुतियों को देने 
का प्रयास करेंगे )


(डॉ.दाराल की नेक टिप्पणी क़े बाद यह कटिंग लगा दी गयी है.) 



(इस वीडियो में आप विदेशियों को गायत्री मन्त्र का पाठ करते भी देख सकते हैं)
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16-07-2016