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Saturday, July 5, 2014

ब्रह्मांड प्रकृति भगवान और धर्म के नाम पर अधर्म का हैवान ---विजय राजबली माथुर


घूम रहे ब्रह्माण्ड में कितने तारे, ग्रह, नक्षत्र
किंतु प्रकृति ने बस हमको ही दी है
मीठे पानी की नदियाँ, सुंदर झरने और हरे भरे वन.
लेकिन हमने प्रकृति के उपहार का बस उपहास बनाया
जैसे चाहा वैसे इसको रौंदा, कुचला, दास बनाया.
धरती की छाती पर हमने, गाड़ के खूंटे, बाँट ली धरती,
जब कराह से काँपी धरती, हम बोले भूचाल है आया.
नदियों को मैला करके, हालत कर दी नाले से बदतर,
नदियाँ तट को तोड़ चलीं, तो हम बोले कि बाढ़ है आई.
काट दिए सब जंगल, वन और पर्वत को नंगा कर डाला,
बारिश रस्ता भूल गई और हम बोले सूखा है आया.
जाने क्या क्या बहा दिया जब हमने सागर के पानी में,
सागर ने प्रतिकार किया तो हमने कहा सूनामी आई.
.
प्रकृति माँ है, हमने प्रकृति का कितना अपमान किया
माँ के जब आँसू निकले, प्राकृतिक आपदा नाम दिया.
बात याद रखनी थी जो वह भूल गया क्यों अपना मन
प्रकृति ने बस हमको दी है, मीठे पानी की नदियाँ,
सुंदर झरने और हरे भरे वन!!






 (यह चिंता 21 मार्च 2012 को फेस बुक पर बिहारी बाबू -सलिल वर्मा जी ने  व्यक्त की थी। उनकी यह रचना और चिन्ता मुझे सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हुई  इसका समाधान मै नीचे दे रहा हूँ):


                                        यज्ञ  माहात्म्य

लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की।
जो वस्तु अग्नि मे जलाई,हल्की होकर वो ऊपर उड़ाई।
करे वायु से मिलान,जाती है रस्ता गगन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 1 । ।

फिर आकाश मण्डल मे भाई,पानी की होत सफाई।
वृष्टि होय अमृत समान,वृद्धि होय अन्न और धन की।
लिखा वेदों मे विधान,अद्भुत है महिमा हवन की। । 2 । ।

जब अन्न की वृद्धि होती है,सब प्रजा सुखी होती है।
न रहता दु : ख का निशान ,आ जाती है लहर अमन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 3 । ।

जब से यह कर्म छुटा है,भारत का भाग्य लुटा है।
'सुशर्मा'करते बयान सहते हैं मार दु :खन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 4 । ।

जनाब 'हवन' एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। कैसे? Material  Science (पदार्थ विज्ञान ) के अनुसार अग्नि मे जो भी चीजें डाली जाती हैं उन्हे अग्नि परमाणुओ (Atoms) मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओ को बोले गए मंत्रों की शक्ति से संबन्धित ग्रह अथवा देवता तक पहुंचा देती है।

देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-अग्नि,वायु,आकाश,समुद्र,नदी,वृक्ष,पृथ्वी,ग्रह-नक्षत्र आदि।(पत्थर के टुकड़ों तथा कागज पर उत्कीर्ण चित्र वाले नहीं )। 

मंत्र शक्ति=सस्वर मंत्र पाठ करने पर जो तरंगें (Vibrations) उठती हैं वे मंत्र के अनुसार संबन्धित देवता तक डाले गए पदार्थों के परमाणुओ को पहुंचा देती हैं।

अतः हवन और मात्र हवन (यज्ञ ) ही वह पूजा या उपासना पद्धति है जो कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है। बाकी सभी पुरोहितों द्वारा गढ़ी गई उपासना पद्धतियेँ मात्र छ्ल हैं-ढोंग व पाखंड के सिवा कुछ भी नहीं हैं। चाहे उनकी वकालत प्रो . जैन अर्थात 'ओशो-रजनीश' करें या आशा राम बापू,मुरारी बापू,अन्ना/रामदेव,बाल योगेश्वर,आनंद मूर्ती,रवी शंकर जैसे ढ़ोंगी साधू-सन्यासी। 'राम' और 'कृष्ण' की पूजा करने वाले राम और कृष्ण के शत्रु हैं क्योंकि वे उनके बताए मार्ग का पालन न करके ढ़ोंगी-स्वांग रच रहे हैं। राम को तो विश्वमित्र जी 'हवन'-'यज्ञ 'की रक्षा हेतु बाल काल मे ही ले गए थे। कृष्ण भी महाभारत के युद्ध काल मे भी हवन करना बिलकुल नहीं भूले। जो लोग उनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग -हवन करना छोड़ कर उन्हीं की पूजा कर डालते हैं वे जान बूझ कर उनके कर्मों का उपहास उड़ाते हैं। राम और कृष्ण को 'भगवान' या भगवान का अवतार बताने वाले इस वैज्ञानिक 'सत्य ' को स्वीकार नहीं करते कि 'भगवान' न कभी जन्म लेता है न उसकी मृत्यु होती है। अर्थात भगवान कभी भी 'नस' और 'नाड़ी' के बंधन मे नहीं बंधता है क्योंकि,-

भ=भूमि अर्थात पृथ्वी।
ग=गगन अर्थात आकाश।
व=वायु।
I=अनल अर्थात अग्नि (ऊर्जा )।
न=नीर अर्थात जल।

प्रकृति के ये पाँच तत्व ही 'भगवान' हैं और चूंकि इन्हें किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसी लिए ये 'खुदा' हैं। ये पांचों तत्व ही प्राणियों और वनस्पतियों तथा दूसरे पदार्थों की 'उत्पत्ति'(GENERATE),'स्थिति'(OPERATE),'संहार'(DESTROY) के लिए उत्तरदाई हैं इसलिए ये ही GOD हैं। पुरोहितों ने अपनी-अपनी दुकान चमकाने के लिए इन को तीन अलग-अलग नाम से गढ़ लिया है और जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं। इनकी पूजा का एकमात्र उपाय 'हवन' अर्थात 'यज्ञ' ही है और कुछ भी कोरा पाखंड एवं ढोंग।

                                         यज्ञ महिमा

होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान यज्ञ से। ।

1-ऋषियों ने ऊंचा माना है स्थान यज्ञ का।
करते हैं दुनिया वाले सब सम्मान यज्ञ का।
दर्जा है तीन लोक मे-महान यज्ञ का।
भगवान का है यज्ञ और भगवान यज्ञ का।
जाता है देव लोक मे इंसान यज्ञ से। होता है ...........

2-करना हो यज्ञ प्रकट हो जाते हैं अग्नि देव।
डालो विहित पदार्थ शुद्ध खाते हैं अग्नि देव।
सब को प्रसाद यज्ञ का पहुंचाते हैं अग्नि देव।
बादल बना के भूमि पर बरसाते हैं अग्निदेव।
बदले मे एक के अनेक दे जाते अग्नि देव।
पैदा अनाज होता है-भगवान यज्ञ से।
होता है सार्थक वेद का विज्ञान यज्ञ से। होता है ......

3-शक्ति और तेज यश भरा इस शुद्ध नाम मे ।
 साक्षी यही है विश्व के हर नेक काम मे।
 पूजा है इसको श्री कृष्ण-भगवान राम ने।
होता है कन्या दान भी इसी के सामने।
मिलता है राज्य,कीर्ति,संतान यज्ञ से।
सुख शान्तिदायक मानते हैं सब मुनि इसे। होता है .....

4-वशिष्ठ विश्वमित्र   और नारद मुनि इसे।
इसका पुजारी कोई पराजित नहीं होता।
भय यज्ञ कर्ता को कभी किंचित नहीं होता।
होती हैं सारी मुश्किलें आसान यज्ञ से। होता है ......

5-चाहे अमीर है कोई चाहे गरीब है।
 जो नित्य यज्ञ करता है वह खुश नसीब है।
हम सब मे आए यज्ञ के अर्थों की भावना।
'जख्मी'के सच्चे दिल से है यह श्रेष्ठ कामना।
होती हैं पूर्ण कामना--महान यज्ञ से । होता है ....  



हम जानते हैं कि आपके इर्द-गिर्द छाए   हज़ारे/केजरीवाल  और सुबरमनियम स्वामी के चेले-चपाटे  आपको हकीकत  स्वीकारने नहीं देंगे। नीचे स्कैन मे आप ओज़ोन पर्त की जो समस्या देख रहे हैं वह भी 'हवन'पद्धती को त्यागने का ही परणाम है। -



Hindustan-Lucknow-30/03/2012



भोपाल गैस कांड के बाद यूनियन कारबाईड ने खोज करवाई थी कि तीन परिवार सकुशल कैसे बचे। निष्कर्ष मे ज्ञात हुआ कि वे परिवार घर के भीतर हवन कर रहे थे और दरवाजों व खिड़कियों पर कंबल पानी मे भिगो कर डाले हुये थे। ट्रायल के लिए गुजरात मे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 'प्लेग' के कीटाणु छोड़ दिये। इसका प्रतिकार करने हेतु सरकार ने हवन के पैकेट बँटवाए थे और 'हवन' के माध्यम से उस प्लेग से छुटकारा मिला था। तब से लगातार अमेरिका मे 'अखंड हवन' चल रहा है और जो ओजोन का छिद्र अमेरिका के ऊपर था वह खिसक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। लेकिन भारत के लोग ओशो,मुरारी और आशाराम बापू ,रामदेव,अन्ना हज़ारे,गायत्री परिवार जैसे ढोंगियों के दीवाने बन कर अपना अनिष्ट कर रहे हैं । परिणाम क्या है  एक विद्वान ने यह बताया है-


परम पिता से प्यार नहीं,शुद्ध रहे व्यवहार नहीं। 
इसी लिए तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं। । परम ... । । 
फल और फूल अन्य इत्यादि,समय समय पर देता है। 
लेकिन है अफसोस यही ,बदले मे कुछ नहीं लेता है। । 
करता है इंकार नहीं,भेद -भाव तकरार  नहीं। 
ऐसे दानी का ओ बंदे,करो जरा विचार नहीं। । परम ....। । 1 ।  ।
मानव चोले मे ना जाने कितने यंत्र लगाए हैं। 
कीमत कोई माप सका नहीं,ऐसे अमूल्य बनाए हैं। । 
कोई चीज बेकार नहीं,पा सकता कोई पार नहीं । 
ऐसे कारीगर का बंदे ,माने तू उपकार नहीं। । परम ... । । 2 । । 
जल,वायु और अग्नि का,वो लेता नहीं सहारा है। 
सर्दी,गर्मी,वर्षा का अति सुंदर चक्र चलाया है। । 
लगा कहीं दरबार नहीं ,कोई सिपाह -सलारनहीं। 
कर्मों का फल दे सभी को ,रिश्वत की सरकार नहीं। । परम ... । । 3 । । 
सूर्य,चाँद-सितारों का,जानें कहाँ बिजली घर बना हुआ। 
पल भर को नहीं धोखा देता,कहाँ कनेकशन लगा हुआ। । 
खंभा और कोई तार नहीं,खड़ी कोई दीवार नहीं। 
ऐसे शिल्पकार का करता,जो 'नरदेव'विचार नहीं। । परम .... । । 4 । ।  
आज  इस पाखंडी नारे का परित्याग करने कि-सीता राम,सीता राम कहिए जाहि विधि राखे राम ताही विधि रहिए-और वास्तविकता को स्वीकारते हुये इस तथ्य का पालन करने का संकल्प लेना चाहिए कि,"सीता-राम,सीता-राम कहिए ---जाहि विधि रहे राम ताही विधि रहिए।"
आलसी और अकर्मण्य लोग राम को दोष दे कर बच निकलना चाहते हैं।  राम ने जो त्याग किया  और कष्ट देश तथा देशवासियों के लिए खुद व पत्नी सीता सहित सहा उसका अनुसरण करने -पालन करने की जरूरत है । राम के नाम पर आज देश को तोड़ने और बांटने की साजिशे हो रही हैं जबकि राम ने पूरे 'आर्यावृत ' और 'जंबू द्वीप'को एकता के सूत्र मे आबद्ध किया था और रावण के 'साम्राज्य' का विध्वंस किया था । राम के नाम पर क़त्लो गारत करने वाले राम के पुजारी नहीं राम के दुश्मन हैं जो साम्राज्यवादियो के मंसूबे पूरे करने मे लगे हुये हैं । जिन वेदिक नियमों का राम ने आजीवन पालन किया आज भी उन्हीं को अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है।


  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Monday, April 14, 2014

दीवार पर लिखे को न समझा तो भारत झेलेगा प्रकृति का रौद्र रूप......




एक नज़र पूर्व प्रकाशित इस लेख पर भी डाल लें :


"Friday, July 8, 2011


विकास या विनाश

१९४७ में जब हमारा देश औपनिवेशिक गुलामी से आजाद हुआ था तो हमारे यहाँ सुई तक नहीं बंनती थी और आज हमारे देश में राकेट ,मिसाईलें तक बनने लगी हैं.विकास तो हुआ है जो दीख रहा है उसे झुठलाया नहीं जा सकता.लेकिन यह सारा विकास ,सारी प्रगति,सम्पूर्ण समृद्धि कुछ खास लोगों के लिए है शेष जनता तो आज भी भुखमरी,बेरोजगारी,कुपोषण आदि का शिकार है.गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर हुआ है.आजादी का अर्थ यह नहीं था.इसके लिए सरदार भगत सिंह,चंद्रशेखर आजाद,रामप्रसाद बिस्मिल,अश्फाक उल्लाह खां,रोशन लाल लाहिरी आदि अनेकों क्रांतिकारियों ने कुर्बानी नहीं दी थी.यह मार्ग विकास का नहीं ,विनाश का है.

विकास का लाभ आम जन को मिले इस उद्देश्य से प्रेरित नौजवानों नें नक्सलवाद का मार्ग अपना लिया और छत्तीस गढ की भाजपा सरकार ने इन्हें कुचलने हेतु 'सलवा-जुडूम' तथा एस पी ओ का गठन स्थानीय युवकों को लेकर कर लिया था जिसे भंग करने का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि,"इस सशस्त्र विद्रोह के लिए सामजिक,आर्थिक विषमता,भ्रष्ट शासन तंत्र और 'विकास के आतंकवाद'  हैं".

जस्टिस बी.सुदर्शन रेड्डी का मत है-"मिडिल क्लास की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए हो रहे औद्योगिकीकरण व् अंधाधुंध माइनिंग के कारण किसान जमीन-जंगल से लगातार बेदखल हो रहे हैं.नक्सल आंदोलन के पैदल सिपाही यही किसान और आदिवासी हैं"

(Hindustan-08/07/2011-Lucknow-Page-16)


"कोरिया की पास्को कं.को उड़ीसा में ५० वर्ष तक लौह अयस्क ले जाने हेतु किसानों की उपजाऊ जमीन दे दी गयी है लेकिन किसान कब्ज़ा नहीं छोड़ रहे हैं और ऐसा करना उनका जायज हक है.२४ जून को सारे देश में किसानों के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करने हेतु 'पास्को विरोधी दिवस' मनाया गया था (इस ब्लाग में इस आशय का एक लेख भी दिया था),किन्तु अधिकाँश लोग अपने-अपने में मस्त थे,उन्हें उड़ीसा के गरीब किसानों से कोई मतलब नहीं था .नंदीग्राम और सिंगूर में हल्ला बोलने वाली मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी भी चुप्पी साधे रहीं.

'नया जमाना',सहारनपुर के संस्थापक संपादक स्व.कन्हैया लाल मिश्र'प्रभाकर' ने आर.एस.एस.नेता लिमये जी से एक बार कहा था कि शीघ्र ही दिल्ली की सत्ता के लिए सड़कों पर संघियों-कम्यूनिस्टों के मध्य संघर्ष होगा.दिल्ली नहीं तो छत्तीस गढ़ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पूर्व यह हो ही रहा था.१९२५ में आजादी के आंदोलन को गति प्रदान करने हेतु जब 'भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी' का गठन किया गया तो ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने पृष्ठपोषक बुद्धिजीवियों को बटोर कर आर.एस.एस.का गठन करवा दिया जिसने साम्राज्यवाद की सहोदरी 'साम्प्रदायिकता' को पाला-पोसा और अंततः देश का विभाजन करा दिया.१९४७ में हुआ विभाजन १९७१ में एक और विभाजन लेकर आया जिसने दो राष्ट्रों की थ्योरी को ध्वस्त कर दिया.भारत के ये तीनों हिस्से भीषण असमानता के शिकार हैं.तीनों जगह सत्ताधीशों ने अवैध्य कमाई के जरिये जनता का खून चूसा है.तीनों जगह आम जनता का जीवन यापन करना बेहद मुश्किल हो रहा है.सरकारें साम्राज्यवाद के आधुनिक मसीहा अमेरिका के इशारे पर काम कर रही हैं न कि अपने-अपने देश की जनता के हित में.

तीनों देशों में फिरकापरस्त लोग अफरा-तफरी फैला कर जीवन की मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटा रहे हैं.लोक-लुभावन नारे लगा कर पूंजीपतियों के पिट्ठू ही साधारण जन को ठग कर सत्ता में पहुँच जाते हैं.जाति,धर्म.सम्प्रदाय,गोत्र ,क्षेत्रवाद की आंधी चला कर सर्व-साधारण को गुमराह कर दिया जाता है.जो लोग गरीबों के रहनुमा हैं किसानों और मजदूरों के हक के लड़ाका हैं वे अपने अनुयाइयों के वोट हासिल नहीं कर पते हैं और सत्ता से वंचित रह जाते हैं.नतीजा साफ़ है जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं वे अपने आकाओं को खुश करने की नीतियाँ और क़ानून बनाते हैं ,आम जन तो उनकी वरीयता में होता ही नहीं है.

क्या आम जनता इसके लिए उत्तरदायी है?कुछ हद तक तो है ही क्योंकि वही तो जाति,धर्म ,सप्रदाय के बहकावे में गलत लोगों को वोट देकर भेजती है.लेकिन इसके लिए जिम्मेदार मुख्य रूप से समाज में प्रचलित अवैज्ञानिक मान्यताएं और धर्म के नाम पर फैले अंध-विशवास एवं पाखण्ड ही हैं.विज्ञान के अनुयायी और साम्यवाद के पक्षधर सिरे से ही धर्म को नकार कर अधार्मिकों के लिए मैदान खुला छोड़ देते हैं जिससे उनकी लूट बदस्तूर जारी रहती है और कुल नुक्सान साम्यवादी-विचार धारा तथा वैज्ञानिक सोच को ही होता है.

धर्म=जो धारण करता है वही धर्म है -यह धारणा कैसे अवैज्ञानिक और मजदूर-किसान विरोधी हो गयी.लेकिन किसान-मजदूर विरोधी लोग जम कर धर्म की गलत व्याख्या प्रस्तुत करके किसान और मजदूर को उलटे उस्तरे से लूट ले जाते हैं क्योंकि हम सच्चाई बताते ही नहीं तो लोग झूठे भ्रम जाल में फंसते चले जाते हैं.

भगवान=भूमि का 'भ'+गगन का 'ग'+वायु का 'व्'+अनल(अग्नि)का अ ='I'+नीर(जल)का' न ' मिलकर ही भगवान शब्द बना है यह कैसे अवैज्ञानिक धारणा हुयी,किन्तु हम परिभाषित नहीं करते तो ठग तो भगवान के नाम पर ही जनता को लूटते जाते हैं.

(चूंकि प्रकृति के ये पांचों तत्व(भगवान) खुद ही बने हैं इनको किसी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही सम्मिलित रूप से 'खुदा' हैं। इनका कार्य उत्पत्ति (GENERATE),पालन (OPRATE) और संहार (DESTROY)है अर्थात ये ही GOD हैं )
मंदिरों से प्राप्त खजाने इस बात का गवाह हैं कि ये मंदिर बैंकों की भूमिका में थे जहाँ समाज का धन सुरक्षित रखा गया था लेकिन आज इसे 'ट्रस्ट'के हवाले करके समृद्ध लोगों की मौज मस्ती का उपाय मुकम्मिल करने की बातें हो रही हैं.१९६२ में गोला बाजार,बरेली में हम लाला धरम प्रकाश जी के मकान में किराए पर रहते थे.जो दीवार कच्ची अर्थात मिट्टी की बनी थी उसे ढहा कर उन्होंने पक्की ईंटों की दीवार बनवाई .कच्ची दीवार से गडा खजाना निकला तुरंत पुलिस पहुँच गयी क्योंकि कानूनन पुराना खजाना सरकार  या समाज की संपत्ति है.पुलिस को भेंट चढा कर उन्होंने रिपोर्ट लगवा दी खजाने की खबर झूठी थी.लेकिन मंदिरों से प्राप्त खजाने की खबर तो झूठी नहीं है फिर इसे किसी ट्रस्ट को क्यों सौंपने की बातें उठ रही हैं ,यह क्यों नहीं सीधे सरकारी खजाने में जमा किया जा रहा है?यदि यह धन सरकारी खजाने में पहुंचे तो गरीब तबके के विकास और रोजगार की अनेकों योजनाएं परिपूर्ण हो सकती हैं.जो करोड़ों लोग भूख से बेहाल हैं उन्हें दो वक्त का भोजन नसीब हो सकता है.

कहीं भी किसी भी उपासना स्थल से प्राप्त होने वाला खजाना राष्ट्रीय धरोहर घोषित होना चाहिए न कि किसी विशेष हित -साधना का माध्यम बनना चाहिए.चाहे संत कबीर हों ,चाहे स्वामी दयानंद अथवा स्वामी विवेकानंद और चाहे संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन डाक्टर अम्बेडकर सभी ने आम जन के हित पर बल दिया है न कि वर्ग विशेष के हित पर.अतः यदि समय रहते आम जन का समाज ने ख्याल नहीं किया तो आम जन बल प्रयोग द्वारा समाज से अपना हक हासिल कर ही लेगा."

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उपर्युक्त लेख में सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों को ही शामिल किया गया है किन्तु यदि प्रकृति की 'प्रकृति' को न समझा गया तो जैसा  कि वैज्ञानिक खोजें बता रही हैं भारत को उत्तराखंड,कुम्भ,देवघर,आदि सरीखी प्राकृतिक विभीषीकाओं  का निश्चय ही सामना करना पड़ेगा। यदि इनसे बचाव करना है तो इस अवैज्ञानिक विकास (वस्तुतः विनाश ) की प्रक्रिया को पूर्ण विराम देकर मानवोचित समाज-व्यवस्था भी स्थापित करनी होगी,समानता पर आधारित राज-व्यवस्था भी स्थापित करनी होगी और प्रकृति से सामंजस्य वाली प्राचीन भारतीय पद्धती भी पुनर्स्थापित करनी होगी। ऐसी संभावनाएं फिलहाल अभी तो न के बराबर हैं। अतः तैयार रहना होगा प्राकृतिक प्रकोप झेलने को।
  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। 
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28-04-2015 :