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Friday, May 10, 2013

गुमराह करने वाले ठगों से सावधान---विजय राजबली माथुर

 अगस्त 2012 अंक ---



उपरोक्त स्कैन उस पत्रिका के एक लेख का है जो लखनऊ में अगस्त 2012 के ब्लागर सम्मेलन में मुफ्त वितरित की गई थीं। लेखक शास्त्री जी ने 'वास्तु शास्त्र' के मान्य नियमों के विपरीत गुमराह करने वाली सलाह पाठकों को दी है जिसे 'लाल रेखांकित' कर दिया गया है। यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि पत्रिका के प्रबन्धक गण IBN 7 के कारिंदा उस ब्लागर के घनिष्ठ हैं जिसने पूना प्रवासी भृष्ट-धृष्ट-निकृष्ट-ठग ब्लागर को खुश करने हेतु-'ज्योतिष एक मीठा जहर' लेख अपने ब्लाग में दिया था। 

जो लोग इस लेख के अनुसार 'दक्षिण-पश्चिम'में 'शौचालय'बनाएँगे उनके परिवार की समृद्धि तो क्या होगी?उल्टे परिवार के मुखिया तथा पुरुष वर्ग के सदस्यों को स्वास्थ्य के लाले पड़ जाएँगे एवं अचल संपत्ति नष्ट होने तथा परिवार के बिखरने के लक्षण शीघ्र ही देखने को मिलेंगे। 

वास्तु शास्त्र क्या कहता है?

'पूर्व' और 'उत्तर' दिशाएँ नीची अथवा ढलान युक्त तथा हल्की होनी चाहिए। 

'पश्चिम' और 'दक्षिण'दिशाएँ  ऊंची तथा भारी होनी चाहिए। 

'उत्तर-पूर्व'=ईशान कोण 'जल' तत्व का होने के कारण कुआं,नल-कूप,बोरिंग आदि के लिए उत्तम है यहीं ध्यान-मेडीटेशन भी कर सकते हैं। पोंगा-पंथी यहीं 'मंदिर' बनवा देते हैं जबकि एक गृहस्थ परिवार में घर के भीतर मंदिर होना प्रबल वास्तु-दोष होता है। 

'दक्षिण-पूर्व'=आग्नेय कोण 'अग्नि'तत्व का होने के कारण 'रसोई घर' के लिए उत्तम है। 

'दक्षिण-पश्चिम'=नैऋत्य कोण 'ठोस' एवं 'भारी' जितना होगा उतना ही घर परिवार समृद्ध होगा। यहाँ स्टोर-गोदाम भी बना सकते हैं। परिवार के मुखिया का शयन कक्ष यहाँ उत्तम होता है। 

'उत्तर-पश्चिम'=वावव्य कोण में 'शौचालय',सेप्टिक टैंक,गंदे पानी की निकासी के लिए उत्तम स्थान है। आने वाले मेहमानों हेतु 'अतिथि कक्ष' यहाँ ठीक रहता है जिससे कि वे ज़्यादा दिन टिकें नहीं शीघ्र प्रस्थान करें। तैयार माल का स्टोरेज भी यहाँ ठीक रहता है जिससे वह स्टाक में सड़े नहीं शीघ्र बिक्री हो जाये। 

प्रस्तुत स्कैन कापी यह गलत सलाह  दिखा रही है कि,दक्षिण-पश्चिम में शौचालय होने से समृद्धि आती है। जो स्थान ऊंचा और भारी होना चाहिए वहाँ शौचालय/सेप्टिक टैंक आदि होने पर गड्ढा खुदने से वह स्थान बेहद नीचा हो जाएगा जो भारी दोष होता है। फिर यह स्थान परिवार के मुखिया का है जिसे वह शास्त्री जी अशुद्ध करवा रहे हैं। 

ईशान कोण = उत्तर पूर्व में शौचालय अथवा रसोई घर बनवाने से परिवार के मुखिया तथा पुरुष वर्ग के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। आगरा में एक शिक्षक महोदय ईशान में शौचालय बनवाने के बाद रुग्ण होते गए -हार्ट अटेक का भी उनको सामना करना पड़ा। ईशान की रसोई वाले एक अधिकारी को पेट में गोली लगने का सामना करना पड़ा और अंततः नौकरी से इस्तीफ़ा भी देना पड़ा।

अग्निकोण =दक्षिण पूर्व में शौचालय/सेप्टिक टैंक होने पर महिला वर्ग तथा मुख्य गृहिणी  के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। मैनपुरी में मुलायम सिंह जी के साथ शिक्षक रहे एक साहब की पत्नी का स्वास्थ्य आग्नेय के सेप्टिक टैंक के ही कारण खराब चलता रहा है।  
भारत वास्तु-दोष पर आधारित देश है-


समाज में कुछ लोग प्रगतिशीलता/विज्ञान के नाम पर ज्योतिष व वास्तु शास्त्र का विरोध करते हैं तो दूसरी ओर अधिकांश लोग पोंगा-पंथी ढोंग व आडंबर को ही सिरोधार्य करते हैं चाहे वे कितने ही उच्च पदस्थ अधिकारी और शिक्षित हों। आगरा में दैनिक जागरण के एक पत्रकार के घर वास्तु -हवन कराने से मुझे इसीलिए मना करना पड़ा था। उनको किसी पोंगा-पंथी ने मात्र 10 मिनट के अंदर हवन कराने का आश्वासन दिया था लेकिन वह दान-पुण्य के नाम पर पाँच प्रकार की मेवा,पाँच वस्त्र,पाँच बर्तन,पाँच मिठाईया,पाँच फल,और स्वर्ण आभूषण समेत अच्छी रकम दक्षिणा में मांग रहा था। पत्रकार महोदय को वह सब भेंट करना मंजूर था किन्तु समय अधिक लगाना नहीं चाहते थे। 

इसी प्रकार 23 जनवरी 2013 को लखनऊ में एक अधिशासी अभियंता जो आगरा से ही परिचित रहे हैं ने हवन तो मुझसे करा लिया किन्तु वह मुहूर्त किसी और से निकलवाया था जो उनके लिए ठीक न था एवं जो शुभ समय उसमे से चुन कर बताया वह भी उन्होने गुज़ार दिया था। मैंने उनको हवन कराने से इंकार कर दिया था किन्तु वह दोनों पति-पत्नी आगरा से चले आ रहे  संपर्कों के आधार पर मेरे घर आकर निवेदन कर गए थे कि वे सब रिशतेदारों को आमंत्रित कर चुके हैं अतः इस बार उनकी इज्ज़त बचा ली जाये। उनकी इज्ज़त भले ही बच गई हो परंतु हवन का प्रतिफल उनको न मिल सका। 

H2 O=पानी होता है किन्तु H2 O2 होने पर हाईड्रोजन पर आकसाईड बन कर उड़ जाता है तब पानी प्राप्त नहीं होता है। इसी प्रकार नियमानुसार किया गया 'हवन' ही फलप्रद होता है अन्यथा तो आडंबर के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा। हमारा देश प्रकृति की ओर से 'वास्तु-दोष' पर आधारित देश है क्योंकि दक्षिण प्रदेश समुद्र तट के निकट होने के कारण नीचे हैं और उत्तरी प्रदेश 'हिमालय पर्वत' के कारण ऊंचे हैं एवं पूर्व में भी पर्वत श्रंखलाए वास्तु दोष ही निर्मित कर रही हैं। फिर भी हमारा देश तब तक 'सोने की चिड़िया'था जब तक वास्तु-दोष निवारणार्थ सिर्फ अंतिम संस्कार को छोड़ कर शेष 15 संस्कारों से पूर्व वैज्ञानिक-वास्तु-हवन होते रहे। हवन न करने अथवा अशुद्ध तरीकों से करने पर हमारा देश परास्त होते-होते आर्थिक रूप से पिछड़ गया और अभी भी पिछड़ा व कर्जदार ही है। क्या हम अपने अतीत के वैज्ञानिक वास्तु-शास्त्र को अपना कर पुनः समृद्ध हो सकेंगे?

मैंने इसी ब्लाग में पोस्ट्स के माध्यम से समय-समय पर जन-कल्याण हेतु ज्योतिष/वास्तु शास्त्र संबन्धित तथ्यों को दिया है जिसका विरोध लगातार पोंगा-पंथियों द्वारा किया गया है। फिर भी मेरा फर्ज है कि मैं अपनी तरफ से लोगों को आगाह कर दूँ इसी हेतु इस पोस्ट को दिया जा रहा है।

इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Tuesday, January 8, 2013

सोने की चिड़ियाँ कहाँ उड़ गईं?---विजय राजबली माथुर




इस लेख के माध्यम से कुछ पोंगा-पंथी ,शोषक-उत्पीड़क ब्लागर्स की अवैज्ञानिक और धूर्ततापूर्ण टिप्पणियों को आधार बना कर भारत क़े उज्जवल भविष्य हेतु कुछ प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है .

 सबसे पहली बात
एक  ब्लागर सा: ने एक  आचार्यजी का उल्लेख करते हुये 'हवन' की आलोचना की  है  लेकिन उन आचार्य जी की उपलब्धि भारत में पाखण्ड और ढोंग की पुनर्स्थापना करना ही है .१८५७ की क्रान्ति में सक्रिय भाग लेने क़े १७ -१८ वर्ष बाद महर्षि दयानंद सरस्वती ने १८७५ ई .में आर्य समाज की स्थापना कर पाखण्ड -खंड्नी पताका फहरा दी थी .लोग जागरूक होने लगे थे और दस वर्ष बाद स्थापित इंडियन नेशनल कांग्रेस क़े इतिहास क़े लेखक डा .पट्टाभीसीतारमैय्या ने लिखा है कि आज़ादी क़े आन्दोलन में भाग लेने वाले कांग्रेसियों में ९० प्रतिशत आर्य समाजी थे .उक्त आचार्यजी ने आर्य समाज की रीढ़ तोड़ दी ,उन्होंने गायत्री मन्त्र को मूर्ती में बदल डाला ;उनके अनुयाइयों  ने वेदों की भी मूर्तियाँ बना डालीं .उन आचार्यजी और उनकी श्रीमतीजी की समाधि पर क़े चढ़ावे को लेकर उनके पुत्र और दामाद में घमासान चल रहा है .उनका संगठन प्रारंभिक हवन समिधाएँ ४ रखता है -धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष  हेतु .जबकि परमात्मा ,आत्मा और प्रकृति क़े निमित्त तीन ही खडी समिधाएँ लगाई जाती हैं और तीन ही समिधाओं की प्रारम्भिक आहुतियाँ दी जाती हैं .जब आप नियमानुसार हवन कर ही नहीं रहे तब परिणाम क़े अनुकूल होने की अपेक्षा  क्यों ?


                         दूसरी बात यह है

योगीराज श्री कृष्ण ने गीता में १६ वें अध्याय क़े १७ वें श्लोक में कहा है -

"आत्मसम्भावितः स्तब्धा धन मान मदान्वितः .
यजन्ते नाम यज्ञेस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम."

अर्थात अपनी स्तुति आप करने वाले ,अकड्बाज़ ,हठी, दुराग्रही ,धन तथा मान क़े मद में मस्त होकर ये पाखण्ड क़े लिए शास्त्र की विधि को छोड़ कर अपने नाम क़े लिए यज्ञ (हवन )किया करते हैं .
स्वभाविक है कि जो हवन अवैज्ञानिक होंगे उनका कोई प्रभाव नहीं हो सकता .अतः आवश्यकता है सही वैज्ञानिक विधि से हवन करने की न कि व्यर्थ भटक कर हवन को कोसने की या मखौल उड़ाने की .

तीसरी बात फिर विदेशियों से


"परोपकारी" पत्रिका क़े अनुसार भोपाल क़े उपनगर (१५ कि .मी .दूर )बेरागढ़ क़े समीप माधव आश्रम में अमेरिकी मनोवैज्ञानिक मिसेज पेट्रिसिया हेमिल्टन ने बताया कि "होम -चिकित्सा " अमेरिका ,चिली ,और पोलैंड में प्रासंगिक हो रही है .राजधानी वाशिंगटन में "अग्निहोत्र -विश्वविद्यालय "की स्थापना हो चुकी है .
बाल्टीमोर में ४ सित .१९७८ से अखंड अग्निहोत्र चल रहा है .जर्मनी की एक कंपनी ने अग्निहोत्र की भस्म से सिर -दर्द ,जुकाम ,दस्त ,पेट की बीमारियाँ ,पुराने ज़ख्म व आँखों की बीमारियाँ दूर करने की दवाईंया बनाना प्रारम्भ कर दिया है .

चौथी बात यह 

इस ब्लाग में पिछली कई पोस्ट्स क़े माध्यम से वैज्ञानिक हवन पद्धति पर विस्तार से लिख चुका हूँ अतः यहाँ अब और दोहराव नहीं किया जा रहा है .मुख्य प्रश्न यह है कि हमारा देश जब पहले समृद्ध था -सोने की चिड़िया कहलाता था तो फिर क्या हुआ कि आज हम I .M .F  और World Bank क़े कर्जदार हो गए हैं .विकास -दर की ऊंची -ऊंची बातें करने क़े बावजूद अभी यह दावा नहीं किया जा सकता कि हमने अपने पुराने गौरव को पुनः हासिल कर लिया है.
        पांचवीं बात वास्तु की

हमारा भारतवर्ष वास्तु शास्त्र क़े नियमों क़े विपरीत प्राकृतिक संरचना वाला देश है .वास्तु क़े अनुसार पश्चिम और दक्षिण ऊंचा एवं भारी होना चाहिए तथा पूर्व व उत्तर हल्का व नीचा होना चाहिए .हमारे देश क़े उत्तर से पूर्व तक हिमालय पर्वत है तथा दक्षिण एवं पश्चिम में गहरा समुद्र है .लेकिन प्राकृतिक प्रतिकूल परिस्थितियों क़े बावजूद आदि -काल से हमारे यहाँ वैदिक (वैज्ञानिक )पद्धति से हवन होते थे .न तो लोग हवन का मखौल उड़ाते थे न ही ढोंग -पाखण्ड चलता था;जैसा कि आज हवन क़े साथ हो रहा है और यह सब वे कर रहे हैं जो कि स्वयंभू ठेकेदार हैं भारतीय -संस्कृति क़े और जो दूसरों को भारतीय -संस्कृति का पाठ पढ़ा रहे हैं .

प्रत्येक शुभ कार्य से पहले सर्वप्रथम वास्तु -हवन होता था (१५ संस्कारों में ) सिर्फ अंतिम संस्कार को छोड़ कर ;उसके बाद फिर सामान्य -होम होता था .संस्कार विधि में महर्षि  स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी वास्तु- हवन का विस्तृत वर्णन किया है .लेकिन महाभारत -काल क़े बाद जब वैदिक -संस्कृति का पतन हुआ तब हवन पद्धति को विस्मृत किया जाने लगा उसी का यह नतीजा रहा कि हम हज़ार साल से ज्यादा गुलाम रहे और आज 65  वर्ष की आज़ादी क़े बाद भी हमारे बुद्धिजीवी तक गुलामी क़े प्रतीकों से चिपके रहने में खुद को गौरान्वित महसूस करते हैं .यही कारण है कि भारत की भाग्य लक्ष्मी रूठी है और तब तक रूठी ही रहेगी जब तक कि हम भारतवासी पुनः  अपने वैदिक -विज्ञान को अंगीकार नहीं कर लेते .
 
लेकिन एक और दुखद पहलू है कि महर्षि द्वारा स्थापित संगठन "आर्य -समाज " में आज रियुमर स्पिच्युटेड सोसाईटी की घुसपैठ हो गई है और वह इस संगठन को अन्दर से खोखला कर रही है ताकि ढोंग और पाखण्ड का निष्कंटक राज कायम रह सके और इस कार्य मे कारपोरेट चेनल्स आग मे घी का कार्य कर रहे हैं। IBN7 के कारिंदा और पूना प्रवासी भ्रष्ट-धृष्ट ब्लागर के सहयोगी द्वारा 'हवन' का अनर्गल विरोध इस प्रकार किया गया है-

आज हम चारों ओर अति वृष्टि,अनावृष्टि,अति शीत,प्रचंड ग्रीष्म आदि के प्रकोप से पीड़ित होते मानवता को देख रहे हैं। इन सबका मूल कारण अपनी प्राचीन 'हवन पद्धती' को भुला देना ही है। भारतीय संस्कृति जाति,धर्म,नस्ल आदि का विभेद किए बगैर सम्पूर्ण विश्व की मानवता ही नहीं समस्त प्राणी-जगत के कल्याण की कामना करती है। 

एक आर्यसमाजी विद्वान ने 'मानव' की निम्नलिखित पहचान बताई है।----- 

  "त्याग-तपस्या से पवित्र-परिपुष्ट हुआ जिसका 'तन'है,
भद्र भावना -भरा स्नेह-संयुक्त शुद्ध जिसका 'मन' है। 
होता व्यय नित-प्रति पर-हित मे, जिसका शुचि संचित 'धन'है,
वही श्रेष्ठ -सच्चा 'मानव'है,धन्य उसी का 'जीवन' है।"

यदि हम पुनः इन मूल्यों को स्थापित कर सकें तो पाएंगे कि हमारा देश आज भी 'सोने की चिड़िया' हो जाएगा।


इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।