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Wednesday, July 15, 2026

क्योंकि वे कर नहीं सकते ------ Pankaj Kumar Singh / Shyam Singh



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मोदी प्रेस से क्यों डरते हैं?
यह ऐसा सवाल है जो पिछले बारह वर्षों से भारतीयों के ज़हन और सार्वजनिक चर्चा में तो प्रायः आता रहता है और अब इस पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी बातें हो रही हैं लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है।
इसी मुद्दे पर Pankaj Kumar Singh की यह पोस्ट कुछ संकेत करती है, पढ़िए—
मोदी जी की चुप्पी के पीछे छिपा सच 
मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस इसलिए नहीं करते क्योंकि उन्हें पैसे देने वाले लोग उन्हें करने नहीं देते। यह सिर्फ़ एक इल्ज़ाम से कहीं ज़्यादा है। यह एक ऐसे 'स्ट्रक्चर' की पुष्टि है जो बहुत पहले से बना हुआ था और ज़्यादातर लोगों की सोच से कहीं ज़्यादा गहरा है।
(1). ACYPL ➤
यह सिर्फ़ 'ट्रेनिंग प्रोग्राम' नहीं, बल्कि 'रिक्रूटमेंट' की दीर्घकालिक योजना भी है।
मोदी ने 1993 में RSS के ग्रासरूट ऑर्गेनाइज़र (प्रचारक) के तौर पर यूनाइटेड स्टेट्स का दौरा किया, जिसे अमेरिकन काउंसिल ऑफ़ यंग पॉलिटिकल लीडर्स (ACYPL) ने होस्ट किया था। हालांकि, ACYPL सिर्फ़ एक एक्सचेंज प्रोग्राम नहीं था; इसे बड़े पैमाने पर CIA द्वारा विदेशी पॉलिटिकल टैलेंट को तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक फ्रंटल ऑर्गेनाइज़ेशन माना जाता था।
एक ज़रूरी बात यह है कि मोदी ने इसी दौरान यूरोप के कई हिस्सों का भी दौरा किया और उनकी यात्रा और रहने का खर्च विदेशी प्राइवेट कंपनियों ने उठाया। इसका मतलब है कि उनका 1993 का ट्रिप कोई इंडिपेंडेंट डिप्लोमैटिक एंगेजमेंट नहीं था, बल्कि एंगेजमेंट और कल्चर का एक स्ट्रक्चर्ड, बाहर से फंडेड प्रोसेस था। 
मोदी का नाम ACYPL की ऑफिशियल एल्युमनाई लिस्ट में है। 
जुलाइ 2026 में पाकिस्तानी मीडिया ने साफ तौर पर बताया कि ACYPL को आम तौर पर CIA का फ्रंट माना जाता है, एक ऐसा ऑर्गनाइज़ेशन जिसका इस्तेमाल CIA दुनिया भर में एसेट्स बनाने और भविष्य के लीडर्स को U.S. एजेंडा के साथ जोड़ने के लिए तैयार करने के लिए करती है।
मोदी सिर्फ CIA प्रोग्राम के एल्युमनाई नहीं थे। उन्होंने 1999 में युवा लीडर्स के लिए U.S. स्टेट डिपार्टमेंट के 'स्टडी ऑफ द U.S. इंस्टिट्यूट्स' (SUSI) प्रोग्राम में भी हिस्सा लिया था। नेशनल पॉलिटिकल स्टेज में आने से पहले उन्होंने कम से कम छह साल तक ट्रेनिंग ली।
 (2). 2014 ➤  CIA और मोसाद ने मोदी की जीत कैसे सुनिश्चित की—
2014 के चुनाव के नतीजे, जिसमें काँग्रेस पार्टी के साँसदों की संख्या 206 से घटकर 44 हो गई थी, वह 'नैचुरल मैंडेट' नहीं था।  काँग्रेस के पूर्व MP कुमार केतकर ने सबके सामने आरोप लगाया कि CIA और मोसाद ने काँग्रेस पार्टी की हार की साज़िश रची थी।
वजह? एक स्थिर, काँग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार भारत के फ़ैसले लेने में किसी भी बाहरी दखल को कम करेगी। इसलिए, उन्होंने एक गैर-कांग्रेसी बहुमत वाली सरकार बनाने का फ़ैसला किया, यह मानते हुए कि ऐसी लीडरशिप उनके फ़ायदे के लिए बेहतर होगी। खबर है कि मोसाद ने भारत के अलग-अलग राज्यों और चुनाव क्षेत्रों को कवर करते हुए डिटेल्ड पॉलिटिकल असेसमेंट डेटा इकट्ठा किया।
(3). ऐपस्टीन नेटवर्क मोसाद की शैडो डिप्लोमेसी ➤
'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट्स ने सबसे गुप्त लेयर का खुलासा किया—
जेफ्री ऐपस्टीन ने भारत-इज़राइल सम्बंधों के स्ट्रेटेजिक मोड़ में एक अहम भूमिका निभाई।
ऐपस्टीन ने मोदी को सलाह दी कि वे इज़राइल से मिलिट्री और इंटेलिजेंस खरीद $2 बिलियन बढ़ा दें। ताकि रिश्ते मज़बूत हों और ह्वाइट हाउस का सपोर्ट मिल सके। मोदी के एक्शन लेने से पहले उन्होंने ट्रंप प्रशासन के कैबिनेट अपॉइंटमेंट और फॉरेन पॉलिसी में बदलाव के बारे में पहले से जानकारी शेयर की थी। ऐपस्टीन ने भारतीय अरबपति अनिल अंबानी को भी गाइड किया कि स्टीव बैनन, टॉम बैरक और जेरेड कुशनर जैसे ट्रंप के करीबी लोगों से कैसे जुड़े थे।
खास बात यह है कि ऐपस्टीन इस्राएली इंटेलिजेंस एजेंसी—मोसाद के लिए एक हाइ-लेवल ऑपरेटिव था। एक FBI मेमो में साफ तौर पर लिखा है, "ऐपस्टीन के इस्राएल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक के साथ करीबी रिश्ते थे और उन्होंने उसकी गाइडेंस में जासूसी की ट्रेनिंग ली थी।" 
बराक 2013 और 2017 के बीच 30 से ज़्यादा बार ऐपस्टीन के न्यूयॉर्क टाउन हाउस गए।
ऐपस्टीन ने मोदी और इस्राएली 'डीप स्टेट' के बीच एक कनेक्शन का काम किया। उसकी भूमिका पर्सनल क्रिमिनैलिटी से कहीं ज़्यादा थी; यह एक जियोपॉलिटिकल ऑपरेशन था।  
(4). मोसाद के तरीके RAW ने दोहराए ➤
दरअसल, इज़राइल ने जो टूल फ़िलिस्तीनियों पर नज़र रखने के लिए बनाए थे, उन्हें भारत ने अपने आलोचकों को टारगेट करने के लिए अपनाया। मोसाद ने दशकों में 'टारगेटेड एलिमिनेशन' का जो तरीका विकसित किया, जिसमें ईरानी न्यूक्लियर साइंटिस्ट की हत्या भी शामिल है, उसे भारत के रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) ने कनाडा के सबअर्ब में सिख एक्टिविस्ट को टारगेट करने के लिए दोहराया।
14 फरवरी, 2026 को, भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता ने मैनहट्टन फ़ेडरल कोर्ट में एक US-कैनेडियन सिख एक्टिविस्ट गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साज़िश में शामिल होने का गुनाह कबूल किया और माना कि उसने एक भारतीय सरकारी कर्मचारी के कहने और कोऑर्डिनेशन पर काम किया। मोसाद के तरीकों को मोदी के ऑफ़िस के साथ भारत में सफ़लतापूर्वक 'एक्सपोर्ट' किया गया था, जो चेन ऑफ़ कमांड में सबसे ऊपर था।
(5). भारत इस्राएल के लिए एक 'प्रॉक्सी स्टेट' बन गया है ➤
मोदी प्रशासन असल में इस्राएल के लिए एक प्रॉक्सी स्टेट बन गया है, जिसमें भारतीय एजेंसियाँ ​​जासूसी के लिए इस्राएली टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही हैं। RAW और मोसाद के बीच जो सहयोग 1980 के दशक में शुरू हुआ था, मोदी के राज में एक फॉर्मल डिफेंस और इंटेलिजेंस अलायंस में बदल गया है।
|• इज़राइली पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल राहुल गाँधी, कम से कम 40 पत्रकारों, सुप्रीम कोर्ट के जजों और चुनाव कमिश्नरों की निगरानी के लिए किया गया था।
|• भारत के सुप्रीम कोर्ट ने जाँचे गए 29 डिवाइस में से 5 में मैलवेयर पाया।
|• मोदी प्रशासन ने जाँच में सहयोग करने से इनकार कर दिया।
|• इस्राएल की डिफेंस एक्सपोर्ट कंट्रोल एजेंसी (DECA) ने पेगासस की बिक्री को मंज़ूरी दी।
सबसे बड़ा सच ➤
मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते क्योंकि वे कर नहीं सकते। वे जब एक बार बोलते हैं, तो ये सवाल उठने ज़रूरी हो जाते हैं—
• 2014 ➤ CIA और मोसाद ने काँग्रेस पार्टी की हार कैसे करवाई?
• ऐपस्टीन ➤ एक सिद्ध-दोषी सेक्स अपराधी और मोसाद के एसेट ने इस्राएल के प्रति भारत की विदेश नीति बनाने में भूमिका क्यों निभाई?
• पेगासस ➤ भारतीय पत्रकारों, जजों और विपक्षी नेताओं पर नज़र रखने के लिए इज़राइली स्पाइवेयर का इस्तेमाल क्यों किया गया?
• हत्याएं ➤ RAW ने विदेशों में हत्याओं के लिए मोसाद के टारगेटेड किलिंग के तरीके को क्यों कॉपी किया?
• प्रॉक्सी स्टेटस ➤ भारत इज़राइल के लिए प्रॉक्सी स्टेट क्यों बन गया है?
मोदी की चुप्पी सिर्फ़ एक कम्युनिकेशन स्टाइल नहीं है, यह उनकी असली पहचान छिपाने के लिए बनाया गया एक शील्डिंग मैकेनिज्म है। बोलना पूरे स्ट्रक्चर को एक्सपोज़ करना होगा और ऐसा वे कभी नहीं होने देंगे।♦️
#एकदा_जंबूद्वीपे 
फोटो—ACYPL की वेबसाइट से See less














  ~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, November 14, 2019

जब दोनों पावर्स भारत को खुश करने की प्रतियोगिता कर रहे थे ------ मनीष सिंह





Manish Singh
दो ध्रुवीय विश्व हमारी पीढ़ी ने देखा है। हमारी सरकारों को कभी रूस और कभी अमरीका की कृपा के लिए जतन करते देखा है। पर एक वक्त था, जब इनके बीच गुटनिरपेक्ष देश तीसरा ध्रुव थे, भारत इनका अगुआ था, और नेहरू इसका चेहरा।

उस जमाने मे हम न परमाणु ताकत थे, न आर्थिक शक्ति, न विश्वयुद्ध के विजेताओं में शुमार थे। फिर भी नेहरू का स्टेट्स अगर वर्ल्ड लीडर्स के बराबर था, तो इसलिए 120 गुटनिरपेक्ष देश नेहरू की अगुआई में, हर मसले पर दुनिया की बड़ी ताकत को चुनौती देने का माद्दा रखते थे।

अन्तराष्ट्रीय राजनय में पहला विश्वस्तरीय फोरम "लीग ऑफ नेशन्स" था। लीग 1920 में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद बनी थी। थ्योरिटिकली इसमें सारे देश बराबर थे। पर असल मे चलती ब्रिटेन की थी, आधी दुनिया पर उसका राज था। अमरीका उसका साइडकिक था। दूसरे विश्वयुद्ध ने इक्वेशन बदल दिया। अमरीका, रूस ताक़तवर हुए। ब्रिटेन- फ्रांस जीतकर भी इतने कमजोर हो गए थे कि धड़ाधड़ कालोनियों को खाली कर वापस जाने लगे। एक और नया विजेता था- चीन। उसने एशिया की वर्ल्ड वार में जापान को हराया था। वो च्यांग काई शेक का चीन था।

ये 1945 का वर्ल्ड आर्डर था। ये पांच विजेता थे, ये पांच बड़े देश थे। इनकी अगुआई में यूनाइटेड नेशन्स बना। विजेताओं ने ताकत बांट ली। परमानेंट मेम्बर, वीटो, न्यूक्लियर ताकत अपने हाथ में रखा। आपस मे छुपा युद्ध लड़े भी, कैपिटलिस्ट- कम्युनिज्म के नाम पर। दुनिया पश्चिम और पूर्व के दो गुटों में बंट गयी।

चीन का किस्सा गजब हुआ। पश्चिमी प्रभाव वाले च्यांग काई शेक के चीन को 1949 में माओ की कम्युनिस्ट पार्टी ने जीत लिया। च्यांग को ताइवान भागना पड़ा। देश रातोरात कम्युनिस्ट हो गया। अमेरिका सहित पश्चिमी देश, चीन की सीट पर कम्युनिस्ट माओ को देखना नही चाहते थे। लेकिन स्टालिन का कम्युनिस्ट रूस, चीन के पक्ष में था। चीन की सीट होल्ड हो गयी।

कुछ गैरसरकारी पत्राचार में रिकार्ड है, की इस वक्त अमरीका ने नेहरू से पूछा था, की क्या वह भारत को चीन की सीट दिलाने की बात चलाये? नेहरू को पता था कि यह सम्भव नही है। इधर स्टालिन वीटो करके प्रस्ताव गिरा देगा, उधर माओ दुश्मनी छेड़ेगा। याने "खाया पिया कुछ नही, गिलास फोड़ा-बारह आना"। अभी भारत की हैसियत इनसे पंगा लेने की नही थी। फिर भी ये अमेरिका का यह पूछना, नेहरू की स्वीकार्यता का पैमाना समझिये।

देखा जाये तो भारत 1945 से ब्रिटिश कालोनी के रूप में भी यूएन का मेम्बर था। मगर सार्वभौम देश के रूप में अब नई चुनोतियाँ थीं। 1947 में आजाद हुआ ही था, की युद्ध मे फंस गया। कश्मीर फँसा था, जूनागढ़ हैदराबाद के एक्सेशन पर राजनीति गर्म थी। भारत पार्टीशन, दंगो में नहाकर सम्विधान निर्माण, प्रथम चुनाव की राह पर था।

मगर आगे आने वाले दस साल भारत अंतरराष्ट्रीय पहचान में वृद्धि के थे। 1954 में स्टालिन की मौत हुई। ख्रुश्चेव आये, तो नेहरू का 1955 का रूस दौरा माइलस्टोन रहा। इसके बाद भारत मे कारखाने, बांध, हाइड्रोइलेक्ट्रिक, न्यूक्लियर और स्पेस रिसर्च में रशियन तकनीक आयी। अमरीका भी भारत को रिझाने की कोशिश में था। कई व्यापारिक कंशेषन दिए, एड दी, खाद्यान्न दिया।

तो वो भी एक जमाना था जब दोनों पावर्स भारत को खुश करने की प्रतियोगिता कर रहे थे। सिक्युरिटी कॉउंसिल में बार बार भारत को द्विवार्षिक सदस्यता मिलती रही। कोरिया युध्द, इंडोचायना और स्वेज केनाल के विवाद प्राधिकरण में भारत चेयरमैन रहा। रंगभेद, ह्यूमन राइट और निरस्त्रीकरण पर भारत की आवाज बुलंद थी।

भारत के साथ और भी देश आजाद हुए थे। सबने साम्राज्यवाद को भुगता था। पीड़ा झेले हुए छोटे छोटे देश किसी का पिछलग्गू नही होना चाहते थे। नेहरू ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई थी। 1955 में बांडुंग कांफ्रेंस में इसकी नीतियां बनी। 1961 में गुटनिरपेक्ष देश के फोरम बनाकर सामने आए। ऐसी नीति को पसंद करने वाले 120 देश गुटनिरपेक्ष आंदोलन से जुड़े। नेहरू नेता, प्रवक्ता, मार्गदर्शक थे। ये भारत का जलवा था।

1961 याद करने वक्त इसलिए भी है, की भारत ने योरोपीय देश, पुर्तगाल की कालोनी गोआ के सैनिक हस्तक्षेप से जीत लिया। पुर्तगाल यूएन में गया, मगर नेहरू ने कुछ देशो को पक्ष में लिया, कुछ को अनुपस्थित करवा दिया। मामला बराबरी पर आया तो रूस ने वीटो कर दिया। गोआ दमन और दीव पर भारत का तिरंगा लहराया। ये भारत और नेहरू का पीक टाइम था।

लेकिन इसके बाद अगले 40 साल का किस्सा निराशाजनक है। चीन से युद्ध, हार, नेहरू की मौत, पाकिस्तान से युध्द.. भारत का जलवा ढलता गया। रूस पर निर्भरता बढ़ती गयी। माओ मरे, तो 1970 में चीन को सीट वापस मिल गयी। इकोनमिकली भी वो ताकतवर होता गया।

हमें 1971 में बंगलादेश की जीत के जश्न के बाद, औऱ जश्न के मौके नही आये। चीन- अमरीका से रार बढ़ती गयी। अफगान युद्ध के कारण पाकिस्तान का महत्व बढ़ गया। रूस का घटता जलवा, इमरजेंसी, ढीली ग्रोथ, आतंकवाद, टूटी फूटी सरकारें। नरसिंहराव के वक्त एक बार द्विवार्षिक मेम्बरशिप मिलना ही उपलब्धि थी।

जेब मे पैसे हों, तो सब सलाम करते हैं। आर्थिक सुधारों के बाद भारत एशिया में सबसे तेज बढ़त लेने लगा। तब क्लिंटन के दूसरे कार्यकाल में हमे फिर तवज्जो मिलनी शुरू हुई। जार्ज बुश काल मे हम ऑफिशियल न्यूक्लियर पावर स्वीकार हुए तो ओबामा ने भारत की परमानेंट सदस्यता को समर्थन किया, यूएस कांग्रेस में प्रस्ताव पारित कराया। आठ विकसित देशों की बैठकों में बुलाया जाने लगा। ब्रिक्स बना, तो लगा भारत फिर उभर रहा है।

लेकिन जेब फिर खाली हो रही है। चीन हमें काफी पीछे छोड़ चुका है। रूस शनै शनै दूर हो रहा है। अमरीका की कृपा कभी आती है, अटक जाती है। लेकिन कूटनीति स्टेडियमो में झूम रही है। विदेश नीति, विदेशी नेता की निजी ताबेदारी में बदल गयी है।


हमने नेहरू को गरियाने का फैशन बना लिया है। मगर उंसके वक्त की ऊंचाई हम दोबारा कब पा सकेंगे, यह उत्तर भविष्य के गर्भ में है।
साभार : 
https://www.facebook.com/manish.janmitram/posts/2446917952059174

  ~विजय राजबली माथुर ©
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