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Monday, May 5, 2025

जूलियस रेबेरो आईपीएस (सेवानिवृत्त) (पूर्व डी.जी.पी. महाराष्ट्र) का कथन ------ द्वारा Anand Surana

 



जूलियस रेबेरो ने पीएम नरेंद्र मोदी से क्या कहा, कृपया पढ़ें
पंजाब के पूर्व डीजीपी और देश के बेहद प्रतिष्ठित आईपीएस अधिकारी के विचार.
जूलियस रेबेरो आईपीएस (सेवानिवृत्त) (पूर्व डी.जी.पी. महाराष्ट्र)
आंखें खोलने वाला
देश के नागरिक के तौर पर मुझे लगा कि ये बात उन तक पहुंचानी होगी.
मोदी जी, एक मंच पर खड़े होकर चिल्लाने और यह सवाल पूछने का कोई 👍मतलब नहीं है कि पिछले 60 वर्षों में क्या हासिल हुआ। क्या आपको नहीं लगता कि हमारे देश के नागरिक मूर्ख हैं.  आप एक ऐसे देश के प्रधान मंत्री हैं, जो 300 से अधिक वर्षों तक ब्रिटिश शासन के अधीन था।  लोग बिल्कुल गुलामों की तरह जी रहे थे।  आज़ादी के बाद 1947 में कांग्रेस सत्ता में आई और शून्य से शुरुआत की. इस देश में अंग्रेजों द्वारा छोड़े गए कूड़े के अलावा कुछ भी नहीं था। अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद से भारत के पास एक पिन बनाने के भी संसाधन नहीं थे।  पूरे देश में केवल 20 गांवों के लिए बिजली उपलब्ध थी।  इस देश में केवल 20 शासकों (राजाओं) के लिए ही टेलीफोन सुविधा उपलब्ध थी। पीने के पानी की कोई आपूर्ति नहीं थी. केवल 10 छोटे बांध थे।  खेती के लिए न अस्पताल, न शैक्षणिक संस्थान, न खाद, न चारा, न पानी की आपूर्ति।  कोई नौकरियाँ नहीं थीं और पूरे देश में केवल भुखमरी देखी जा सकती थी।  अनेक शिशुओं की मृत्यु हुई।  सीमा पर बहुत कम सैन्य कर्मचारी. केवल 4 विमान, 20 टैंक और देश के चारों तरफ पूरी तरह खुली सीमाएँ। बहुत कम सड़कें और पुल। खाली खजाना.
इन परिस्थितियों में नेहरू सत्ता में आये।
60 साल बाद भारत क्या है?
विश्व की सबसे बड़ी सेना में से एक.  हजारों युद्धक विमान, टैंक।  लाखों औद्योगिक संस्थान। लगभग सभी गांवों में बिजली. सैकड़ों विद्युत विद्युत स्टेशन। लाखों किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग और ओवर ब्रिज।  नई रेलवे परियोजनाएं, स्टेडियम, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, अधिकांश भारतीय घरों में टेलीविजन, सभी देशवासियों के लिए टेलीफोन।  देश के भीतर और बाहर काम करने के लिए सभी बुनियादी ढांचे, बैंक, विश्वविद्यालय, एम्स, आईआईटी, आईआईएम, परमाणु हथियार, पनडुब्बी, परमाणु स्टेशन, इसरो, नवरत्न सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयाँ।
सालों पहले लाहौर तक घुसी थी भारतीय सेना...पाकिस्तान के 2 टुकड़े कर दिए. पाकिस्तान के 1 लाख सैनिकों और कमांडरों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
भारत ने खनिज और खाद्य पदार्थों का निर्यात शुरू कर दिया। श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण। भारत में कंप्यूटर का आगमन हुआ और भारत तथा देश के बाहर रोजगार के अनेक अवसर प्राप्त हुए।
आप सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर पीएम बने हैं.
जब आपने प्रधानमंत्री का पद संभाला था, तब भारत दुनिया की शीर्ष 10 अर्थव्यवस्थाओं में था। इसके अलावा जीएसएलवी, मंगलयान, मोनोरेल, मेट्रो रेल, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, पृथ्वी, अग्नि, नाग, परमाणु पनडुब्बियां....ये सब आपके पीएम बनने से पहले ही हासिल कर लिया गया था।
कृपया लोगों के पास चिल्लाने और पूछने न आएं कि कांग्रेस ने 60 वर्षों में क्या हासिल किया है।
कृपया लोगों को बताएं कि आपने पिछले 9 वर्षों में क्या हासिल किया है, नाम बदलने, मूर्ति स्थापित करने और लगातार गाय की राजनीति करने, हिंदू और मुस्लिम, हिंदू और ईसाई, हिंदू और दलित, हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों के बीच दरार पैदा करने के अलावा।
आपकी असफल नोटबंदी, खराब ढंग से क्रियान्वित जीएसटी (आज़ादी मिलने के बाद से सबसे कम) और लोगों को लंबी कतारों में खड़ा करना, जिससे अनावश्यक मौतें हुईं।
पाखंडी भाजपाइयों ने एफडीआई का विरोध किया और अब भाजपा बेशर्मी से एफडीआई का समर्थन कर रही है.. भाजपा भारत को अंबानी और अडानी को बेच रही है और भारत सरकार के स्वामित्व वाली एचएएल के बजाय अनिल अंबानी की 2 महीने पुरानी कंपनी को राफेल सौदा इसका एक प्रमुख उदाहरण है.. भाजपा  ज्यादा टैक्स लगाकर पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम बढ़ा दिए, जबकि कच्चे तेल के दाम सस्ते हो गए.. मोदी सरकार ने गरीबों से मिनिमम बैलेंस न रख पाने पर एसबीआई के जरिए जुर्माने के तौर पर 1771 करोड़ रुपये वसूले हैं.  भारत के लोग.  विकास अमित शाह के बेटे, शौर्य डोभाल, अंबानी, अडानी, बाबा रामदेव के पतंजलि समूह और बीजेपी को प्रायोजित करने वाले लोगों के लिए हो रहा है.. बीजेपी ने गंगा नदी को साफ करने के लिए 3000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जिसका भ्रष्टाचार हर कोई पा सकता है  गंगा नदी में डुबकी लगाने से आप अपने पूरे शरीर पर मल, मैल, ग्रीस लेकर बाहर आते हैं।
पुनश्च.  यह कांग्रेस के प्रचार अभियान का विज्ञापन नहीं है.  मैं कांग्रेस समर्थक नहीं हूं.  मैं सिर्फ एक जागरूक मतदाता हूं, जो हर बार यह महसूस करता है कि यह उसकी बुद्धि का अपमान है जब वर्तमान सरकार कहती है कि हमारा देश पिछले 60 वर्षों में अच्छा नहीं रहा है!
गरिमा पर समझौता नहीं किया जा सकता!!
 🙏 जय हिंद ---जय भारत🙏
From Rakesh Nagar post












 ~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, November 14, 2019

जब दोनों पावर्स भारत को खुश करने की प्रतियोगिता कर रहे थे ------ मनीष सिंह





Manish Singh
दो ध्रुवीय विश्व हमारी पीढ़ी ने देखा है। हमारी सरकारों को कभी रूस और कभी अमरीका की कृपा के लिए जतन करते देखा है। पर एक वक्त था, जब इनके बीच गुटनिरपेक्ष देश तीसरा ध्रुव थे, भारत इनका अगुआ था, और नेहरू इसका चेहरा।

उस जमाने मे हम न परमाणु ताकत थे, न आर्थिक शक्ति, न विश्वयुद्ध के विजेताओं में शुमार थे। फिर भी नेहरू का स्टेट्स अगर वर्ल्ड लीडर्स के बराबर था, तो इसलिए 120 गुटनिरपेक्ष देश नेहरू की अगुआई में, हर मसले पर दुनिया की बड़ी ताकत को चुनौती देने का माद्दा रखते थे।

अन्तराष्ट्रीय राजनय में पहला विश्वस्तरीय फोरम "लीग ऑफ नेशन्स" था। लीग 1920 में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद बनी थी। थ्योरिटिकली इसमें सारे देश बराबर थे। पर असल मे चलती ब्रिटेन की थी, आधी दुनिया पर उसका राज था। अमरीका उसका साइडकिक था। दूसरे विश्वयुद्ध ने इक्वेशन बदल दिया। अमरीका, रूस ताक़तवर हुए। ब्रिटेन- फ्रांस जीतकर भी इतने कमजोर हो गए थे कि धड़ाधड़ कालोनियों को खाली कर वापस जाने लगे। एक और नया विजेता था- चीन। उसने एशिया की वर्ल्ड वार में जापान को हराया था। वो च्यांग काई शेक का चीन था।

ये 1945 का वर्ल्ड आर्डर था। ये पांच विजेता थे, ये पांच बड़े देश थे। इनकी अगुआई में यूनाइटेड नेशन्स बना। विजेताओं ने ताकत बांट ली। परमानेंट मेम्बर, वीटो, न्यूक्लियर ताकत अपने हाथ में रखा। आपस मे छुपा युद्ध लड़े भी, कैपिटलिस्ट- कम्युनिज्म के नाम पर। दुनिया पश्चिम और पूर्व के दो गुटों में बंट गयी।

चीन का किस्सा गजब हुआ। पश्चिमी प्रभाव वाले च्यांग काई शेक के चीन को 1949 में माओ की कम्युनिस्ट पार्टी ने जीत लिया। च्यांग को ताइवान भागना पड़ा। देश रातोरात कम्युनिस्ट हो गया। अमेरिका सहित पश्चिमी देश, चीन की सीट पर कम्युनिस्ट माओ को देखना नही चाहते थे। लेकिन स्टालिन का कम्युनिस्ट रूस, चीन के पक्ष में था। चीन की सीट होल्ड हो गयी।

कुछ गैरसरकारी पत्राचार में रिकार्ड है, की इस वक्त अमरीका ने नेहरू से पूछा था, की क्या वह भारत को चीन की सीट दिलाने की बात चलाये? नेहरू को पता था कि यह सम्भव नही है। इधर स्टालिन वीटो करके प्रस्ताव गिरा देगा, उधर माओ दुश्मनी छेड़ेगा। याने "खाया पिया कुछ नही, गिलास फोड़ा-बारह आना"। अभी भारत की हैसियत इनसे पंगा लेने की नही थी। फिर भी ये अमेरिका का यह पूछना, नेहरू की स्वीकार्यता का पैमाना समझिये।

देखा जाये तो भारत 1945 से ब्रिटिश कालोनी के रूप में भी यूएन का मेम्बर था। मगर सार्वभौम देश के रूप में अब नई चुनोतियाँ थीं। 1947 में आजाद हुआ ही था, की युद्ध मे फंस गया। कश्मीर फँसा था, जूनागढ़ हैदराबाद के एक्सेशन पर राजनीति गर्म थी। भारत पार्टीशन, दंगो में नहाकर सम्विधान निर्माण, प्रथम चुनाव की राह पर था।

मगर आगे आने वाले दस साल भारत अंतरराष्ट्रीय पहचान में वृद्धि के थे। 1954 में स्टालिन की मौत हुई। ख्रुश्चेव आये, तो नेहरू का 1955 का रूस दौरा माइलस्टोन रहा। इसके बाद भारत मे कारखाने, बांध, हाइड्रोइलेक्ट्रिक, न्यूक्लियर और स्पेस रिसर्च में रशियन तकनीक आयी। अमरीका भी भारत को रिझाने की कोशिश में था। कई व्यापारिक कंशेषन दिए, एड दी, खाद्यान्न दिया।

तो वो भी एक जमाना था जब दोनों पावर्स भारत को खुश करने की प्रतियोगिता कर रहे थे। सिक्युरिटी कॉउंसिल में बार बार भारत को द्विवार्षिक सदस्यता मिलती रही। कोरिया युध्द, इंडोचायना और स्वेज केनाल के विवाद प्राधिकरण में भारत चेयरमैन रहा। रंगभेद, ह्यूमन राइट और निरस्त्रीकरण पर भारत की आवाज बुलंद थी।

भारत के साथ और भी देश आजाद हुए थे। सबने साम्राज्यवाद को भुगता था। पीड़ा झेले हुए छोटे छोटे देश किसी का पिछलग्गू नही होना चाहते थे। नेहरू ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई थी। 1955 में बांडुंग कांफ्रेंस में इसकी नीतियां बनी। 1961 में गुटनिरपेक्ष देश के फोरम बनाकर सामने आए। ऐसी नीति को पसंद करने वाले 120 देश गुटनिरपेक्ष आंदोलन से जुड़े। नेहरू नेता, प्रवक्ता, मार्गदर्शक थे। ये भारत का जलवा था।

1961 याद करने वक्त इसलिए भी है, की भारत ने योरोपीय देश, पुर्तगाल की कालोनी गोआ के सैनिक हस्तक्षेप से जीत लिया। पुर्तगाल यूएन में गया, मगर नेहरू ने कुछ देशो को पक्ष में लिया, कुछ को अनुपस्थित करवा दिया। मामला बराबरी पर आया तो रूस ने वीटो कर दिया। गोआ दमन और दीव पर भारत का तिरंगा लहराया। ये भारत और नेहरू का पीक टाइम था।

लेकिन इसके बाद अगले 40 साल का किस्सा निराशाजनक है। चीन से युद्ध, हार, नेहरू की मौत, पाकिस्तान से युध्द.. भारत का जलवा ढलता गया। रूस पर निर्भरता बढ़ती गयी। माओ मरे, तो 1970 में चीन को सीट वापस मिल गयी। इकोनमिकली भी वो ताकतवर होता गया।

हमें 1971 में बंगलादेश की जीत के जश्न के बाद, औऱ जश्न के मौके नही आये। चीन- अमरीका से रार बढ़ती गयी। अफगान युद्ध के कारण पाकिस्तान का महत्व बढ़ गया। रूस का घटता जलवा, इमरजेंसी, ढीली ग्रोथ, आतंकवाद, टूटी फूटी सरकारें। नरसिंहराव के वक्त एक बार द्विवार्षिक मेम्बरशिप मिलना ही उपलब्धि थी।

जेब मे पैसे हों, तो सब सलाम करते हैं। आर्थिक सुधारों के बाद भारत एशिया में सबसे तेज बढ़त लेने लगा। तब क्लिंटन के दूसरे कार्यकाल में हमे फिर तवज्जो मिलनी शुरू हुई। जार्ज बुश काल मे हम ऑफिशियल न्यूक्लियर पावर स्वीकार हुए तो ओबामा ने भारत की परमानेंट सदस्यता को समर्थन किया, यूएस कांग्रेस में प्रस्ताव पारित कराया। आठ विकसित देशों की बैठकों में बुलाया जाने लगा। ब्रिक्स बना, तो लगा भारत फिर उभर रहा है।

लेकिन जेब फिर खाली हो रही है। चीन हमें काफी पीछे छोड़ चुका है। रूस शनै शनै दूर हो रहा है। अमरीका की कृपा कभी आती है, अटक जाती है। लेकिन कूटनीति स्टेडियमो में झूम रही है। विदेश नीति, विदेशी नेता की निजी ताबेदारी में बदल गयी है।


हमने नेहरू को गरियाने का फैशन बना लिया है। मगर उंसके वक्त की ऊंचाई हम दोबारा कब पा सकेंगे, यह उत्तर भविष्य के गर्भ में है।
साभार : 
https://www.facebook.com/manish.janmitram/posts/2446917952059174

  ~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, September 30, 2019

हरि सिंह कश्मीरियों के बीच बेहद अलोकप्रिय थे :वे गैर-कश्मीरी शासक थे: ------ अजेय कुमार

 
http://epaper.navbharattimes.com/details/63237-77176-1.html

अजेय कुमार
कश्मीर समस्या के लिए क्या नेहरू जिम्मेदार ? 

शेख अब्दुल्ला पर जब महाराजा ने राजद्रोह का मुकदमा चलाया तो उनकी ओर से लड़ने के लिए बतौर वकील जवाहरलाल नेहरू कश्मीर गए
अगर महाराजा हरि सिंह ने ढुलमुल रवैया नहीं अपनाया होता तो घाटी की यह हालत नहीं होती
बीते 4 सितंबर को बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने एक विडियो जारी किया है जिसमें जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने और उसे दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटने को एक ऐतिहासिक कदम बताया गया है। यह 11 मिनट का विडियो है, जिसके लगभग अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि पटेल व आंबेडकर दोनों नेहरू की कश्मीर नीति के खिलाफ थे। विडियो के अनुसार सरदार पटेल ने 562 देसी रियासतों का भारत में सफल ढंग से विलय करवा दिया मगर कश्मीर मुद्दे को नेहरू ने अपने हाथों में ले लिया और राज्य को विशेष दर्जा देने की भयंकर भूल की।
• गांधी की अपील 

सवाल है कि केवल कश्मीर को नेहरू ने अपने हाथों में क्यों लिया? जिन देसी रियासतों का विलय पटेल ने कराया, वे भारत की भौगोलिक सीमा के अंदर थीं और उनमें से किसी पर विदेशी आक्रमण नहीं हुआ था। कश्मीर भारत-पाकिस्तान की सीमा पर था और 1941 की जनगणना के अनुसार घाटी में मुसलमानों की जनसंख्या 93.45 प्रतिशत, जम्मू में 61.35 प्रतिशत (जम्मू के कुल 6 जिलों में से तीन जिले मुस्लिम बहुल हैं) और लद्दाख, गिलगिट आदि में 86.7 प्रतिशत थी। इस तरह कश्मीर की भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां अन्य रियासतों से अलग थीं। इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी के बावजूद जम्मू-कश्मीर की सत्ता महाराजा हरि सिंह के हाथों में थी जो एक डोगरा हिंदू थे। अमृतसर की संधि के बाद केवल 75 लाख रुपये में घाटी और लद्दाख के क्षेत्र जम्मू डोगराशाही के अधीन आ गए थे।

हरि सिंह कश्मीरियों के बीच बेहद अलोकप्रिय थे। वे दरअसल गैर-मुस्लिम से अधिक गैर-कश्मीरी शासक थे। उनके शासन के विरुद्ध शेख अब्दुल्ला ने संघर्ष का आह्वान किया और ‘महाराजा, कश्मीर छोड़ो’ का नारा दिया। कश्मीर के इतिहास में विभाजन रेखा इस्लाम नहीं, बल्कि कश्मीरी से गैर-कश्मीरी शासन का परिवर्तन है। दूसरी ओर, नेहरू और गांधी की अहम भूमिका थी जिन्होंने कश्मीरी मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से रोका। जब महाराजा ने शेख अब्दुल्ला पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया तो बतौर वकील उनकी ओर से लड़ने के लिए जवाहरलाल नेहरू कश्मीर गए। गांधी जी ने भी एक अगस्त 1947 को कश्मीर का दौरा किया जिसने कश्मीरियों को प्रभावित किया। गांधी जी ने अमृतसर समझौते, जिसने महाराजा को कश्मीर पर शासन करने का कानूनी अधिकार दिया था, को एक ऐसी सेल-डीड कहा, जिसका अंग्रेजी शासन खत्म होने पर कोई औचित्य न था। उन्होंने कश्मीर की जनता की तारीफ की कि जहां शेष भारत में सांप्रदायिक दंगे हो रहे हैं, कश्मीर एक आशा की किरण है। इस तरह नेहरू और गांधी, दोनों ने अपनी भावनात्मक अपीलों से मुस्लिम सांप्रदायिकता को बेअसर करके जनता में कश्मीरी देशभक्ति की भावना जागृत की। इसलिए आज अगर कश्मीर भारत का हिस्सा है तो उसका बहुत कुछ श्रेय शेख अब्दुल्ला के साथ-साथ नेहरू और गांधी को भी जाता है। 

शेख अब्दुल्ला को भरोसा था कि भारत आजादी के बाद नेहरू के नेतृत्व में एक धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील देश बनेगा। उन्हें जिन्ना की सांप्रदायिक राजनीति से नफरत थी। जिन्ना ने शेख अब्दुल्ला के आंदोलन को ‘गुंडों का आंदोलन’ कहा था। इधर हरि सिंह ‘मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं’ की पसोपेश में थे। 12 अक्टूबर, 1947 को रियासत के उप दीवान राय बहादुर बत्रा ने घोषणा कीः ‘हम हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना चाहते हैं। भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का हमारा कोई इरादा नहीं है।’

कश्मीर समस्या की जड़ यहां है, नेहरू की नीतियों में नहीं। अगर महाराजा सही वक्त पर सही रुख अपनाते तो आज कश्मीर का मुद्दा कहीं न होता! महाराजा के ढुलमुलपन का फायदा पाकिस्तान उठाना चाहता था। पाकिस्तान के दो दूतों ने श्रीनगर में शेख अब्दुल्ला से मुलाकात की और पाकिस्तान के पक्ष में निर्णय कराने पर जोर दिया। वरना, उनका कहना था कि दूसरे तरीके इस्तेमाल किए जाएंगे। यह सरासर धमकी थी। शेख अब्दुल्ला ने अपनी आत्मकथा ‘आतिशे चिनार’ में लिखा है कि जब वे पाकिस्तान के कुछ नेताओं से बातचीत में मशगूल थे, पाकिस्तानी हमलावर कश्मीर के लोगों की जमीन और उनके अधिकारों को अपने पांवों तले कुचल रहे थे।’

कश्मीर पर कई पुस्तकों के लेखक बलराजपुरी ने लिखा है ‘इन घटनाओं के कारण महाराजा हरि सिंह के पास हिंदुस्तान की तरफ मुड़ने के अलावा कोई चारा न था। महाराजा ने नेहरू तक यह संदेश पहुंचाया कि मैं भारत में शामिल हो सकता हूं, शर्त यह है कि भारतीय सेना के जहाज इसी शाम को श्रीनगर पहुंच जाएं, अन्यथा मैं जाकर जिन्ना से बात कर लूंगा। नेहरू को यह सौदेबाजी अच्छी नहीं लगी लेकिन शेख अब्दुल्ला के आग्रह पर वे नरम पड़े और 27 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी आक्रमणकारियों का सफाया करने के लिए भारतीय सेना भेजी।’ 
• कोई मतभेद नहीं : 


नेहरू ने कश्मीर मामले से जुड़े सभी मुद्दों पर पटेल समेत केंद्रीय मत्रिमंडल से बाकायदा बातचीत की। प्रख्यात पत्रकार दुर्गादास ने 10 खंडों में पटेल के पत्रों (1947 से 1950 तक) का एक बड़ा संकलन ‘सरदार पटेल्ज कॉरेसपॉन्डेंस’ नाम से तैयार किया है। इसमें नेहरू को लिखे कई पत्र हैं जिनमें कहीं भी इसका जिक्र नहीं है कि उनके नेहरू से कोई गहरे मतभेद थे। पटेल जैसे ‘लौह-पुरुष’ क्या अपना अपमान सह सकते थे! अगर कोई मतभेद होते तो वे फौरन केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे देते। आज पटेल के उस भाषण को याद करने की जरूरत है जो उन्होंने 30 अक्टूबर, 1948 को बंबई में एक आमसभा को संबोधित करते हुए दिया था, ‘हम कश्मीर में इसलिए हैं क्योंकि वहां के लोग ऐसा चाहते हैं। जिस क्षण हमें लगेगा कि कश्मीर के लोग नहीं चाहते कि हम वहां रहें, उसके बाद हम एक मिनट भी वहां नहीं रुकेंगे.... हम कश्मीर को धोखा नहीं दे सकते।’
साभार : 

http://epaper.navbharattimes.com/details/63237-77176-1.html


 ~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, November 25, 2017

वर्तमान शासकों को जनमत के आगे झुकाने हेतु नेहरू की प्रासंगिकता ------ विजय राजबली माथुर









26 नवंबर 1949 को संविधानसभा ने वर्तमान संविधान को स्वीकृत किया था जिसे 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया है ।  वर्तमान सत्तारूढ़ दल जिसे ध्वस्त करने की दिशा में बढ़ रहा है उस संविधान को भले ही डॉ बी आर अंबेडकर की अध्यक्षता वाली समिति ने बनाया और डॉ राजेन्द्र प्रसाद के सभापतित्व वाली संविधानसभा ने स्वीकृत किया किन्तु इसे स्वीकृत कराने और फिर लागू करने में टटकाली प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का भारी अतुलनीय योगदान रहा है। अतः संविधान की रक्षा हेतु नेहरू युग की नीतियों को पुनः बहाल करना जनहित में आवश्यक है । 


नेहरू जी द्वारा तानाशाही के प्रति चेतावनी  : 
धर्मयुग 13 नवंबर 1977 के  अंक में शिव प्रसाद सिंह जी ने अपने लेख में ज़िक्र किया है कि ," नेहरू जी का  सांस्कृतिक व्यक्तित्व एक स्वप्न दृष्टा का व्यक्तित्व था " । उन्होने यह भी उल्लेख किया है कि नेहरू जी जनता की उनके प्रति प्रतिक्रिया को काफी महत्व देते थे। इसी क्रम में नेहरू जी ने 'चाणक्य ' नामक छद्यम रूप से एक लेख लिखा था -"एक हल्का सा झटका और बस जवाहर लाल मंथर गति से चलने वाले जनतंत्र के टंट-घंट को एक तरफ करके तानाशाह में बदल सकते हैं। वे तब भी शायद प्रजातन्त्र और समाजवाद की शब्दावली और नारे दोहराते रहेंगे, लेकिन हम जानते हैं कि किस तरह तानाशाहों ने इस तरह के नारों से अपने को मजबूत किया है। और कैसे समय आने पर इन्हें बकवास कह कर एक तरफ झटक दिया है। सामान्य परिस्थितियों में वे शायद सफल और योग्य शासक बने रहते , परंतु इस  क्रांतिकारी युग में , सीजरशाही हमेशा ताक में बैठी रहती है और क्या यह संभव नहीं है कि नेहरू सीजर की भूमिका में उतरनेकी कल्पना कर रहे हों। "

शिव प्रसाद जी ने लिखा है कि इस लेख में व्यक्त विचारों के कारण जनता उस 'चाणक्य' को मारने/ फांसी देने को इच्छुक हो गई तब नेहरू जी को खुलासा करना पड़ा कि वह खुद इसके लेखक है इस खुलासे ने विस्मय उत्पन्न कर दिया था। 


नेहरू जी की उदारता : 

पूर्व पी एम बाजपेयी साहब ने भी नेहरू जी की उदारता का ज़िक्र करते हुये बताया था कि जब वह पहली बार सांसद बने थे तो लोकसभा की एक बैठक में जम कर नेहरू जी के परखचे उघाड़े थे लेकिन नेहरू जी चुपचाप सुनते रहे थे। उसी शाम राष्ट्रपति भवन में एक भोज था जिसमें वह नेहरू जी का सामना करने से बच रहे थे, किन्तु नेहरू जी खुद चल कर उनके पास आए और उनके कंधे पर हाथ रख कर कहा 'शाबाश नौजवान ' इसी तरह डटे रहो तुम एक दिन ज़रूर इस देश के प्रधानमंत्री बनोगे।  


पीटर रोनाल्ड डिसूजा साहब का  लेख ज़िक्र करता है कि, बाद में नेहरू जी की इस सहिष्णुता का परित्याग कर दिया गया। भीष्म नारायण सिंह जी ने भी उदारीकरण के इस दौर में नेहरू जी की प्रासंगिकता की और ज़रूरत को रेखांकित किया है। 


नेहरू जी और उनकी नीतियों पर आक्रामक प्रहार  : 

लेकिन हम व्यवहार में देखते हैं कि 1977 के मुक़ाबले आज 40  वर्षों बाद नेहरू जी और उनकी नीतियों पर आक्रामक प्रहार किए जा रहे हैं। उस समय की  मोरारजी देसाई की जपा सरकार के मुक़ाबले आज की भाजपाई मोदी सरकार तो नेहरू जी का नामोनिशान तक मिटा देने पर आमादा है। नेहरू जी ने यू एस ए अथवा रूस के खेमे में जाने के बजाए यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो तथा मिश्र के कर्नल अब्दुल गामाल नासर के साथ मिल कर एक 'गुट निरपेक्ष' खेमे को खड़ा करके दोनों के मध्य संतुलन बनाने का कार्य किया था। आज की मोदी सरकार ने यू एस ए के समक्ष ही नहीं देश के कारपोरेट घरानों के समक्ष भी आत्म समर्पण कर दिया है। नेहरू जी ने देश में मिश्रित अर्थ व्यवस्था लागू की थी और योजना आयोग के माध्यम से  विकास का खाका खींचा था जिसने देश को आत्म-निर्भर बना दिया था। अब योजना आयोग समाप्त किया जा चुका है और सार्वजानिक क्षेत्र को समाप्त किए जाने की जो प्रक्रिया बाजपेयी नीत  भाजपा सरकार ने शुरू की थी उसे पूर्ण सम्पन्न करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए बने क़ानूनों को समाप्त या निष्प्रभावी किया जा रहा है।'चाणक्य ' नाम से नेहरू जी ने जो लिखा था वह मोदी साहब पर लागू होने के आसार साफ-साफ नज़र आ रहे हैं।  जनता त्राही-त्राही कर रही है जो नेहरू जी जनता की प्रतिक्रिया को महत्व देते थे उनके आज के उत्तराधिकारी जनता को महत्वहीन मानते हुये कुचलने पर आमादा हैं। ऐसे में वर्तमान शासकों को जनमत के आगे झुकने के लिए मजबूर करने के लिए नेहरू जी के कार्यों व उनकी नीतियों को बहाल करने की मांग उठाना आज वक्त की जोरदार ज़रूरत है। 

~विजय राजबली माथुर ©

Monday, March 27, 2017

जमाना योगीयुग : योगी का योगफल ------ K Vikram Rao

 "नतीजन योगी की समता पिछले मुख्यमंत्रियों से नही की जा सकती है। कुछ मायनों में तीसरे मुख्यमंत्री चन्दुभानु गुप्त से संभव है। प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष की अनिच्छा के बावजूद भी गुप्ताजी मुख्यमंत्री बन गये थे। हालांकि लखनऊ पूर्व तथा मोदहा (महोबा) से विधानसभा चुनाव लगातार हार गये थे। पार्टी के भीतरी शत्रुओं तथा खुद मुख्यमंत्री संपूर्णानन्द कारक बने थे। फिर भी अपने आत्मबल से गुप्ताजी 1960 में सीधे शीर्षपद पर जा पहुंचे बिना विधानसभा पहुंचे। फिर उन्हें हटाने के लिए कामराज योजना नेहरू लाये। पार्टी काम हेतु गुप्ताजी को सरकार छोड़ना पड़ा।
योगी जी का भी सत्ता तक सफर सरल नही था। भाजपायी महाबलियों को ठेलकर वे रेस जीते। ऐसा उदाहरण कुछ मायनो में मौर्यराज में विप्र सेनापति पुष्यमित्र शुंग का मिलता है जिसने शासकीय अहिंसा के कारण हिन्दुओं पर हो रहे म्लेच्छ हमले का खात्मा किया था।
अब विश्लेषण कर लें कि योगी क्या कर रहें हैं और क्या करेंगे ?" --- के  विक्रम राव 
****** वरिष्ठ  पत्रकार  के विक्रम राव  साहब लिखते हैं कि, यू पी के तत्कालीन सी एम चंद्र भानु गुप्त को हटाने के लिए नेहरू 'कामराज प्लान ' लाये थे। लेकिन हकीकत यह नहीं है। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राधा कृष्णन  के एक अंगरक्षक रहे एक मेजर साहब ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि, राधाकृष्णन जी खुद पी एम बनना चाहते थे अतः तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज नाडार  से तमिल भाषा में वार्ता कर उन्होने  ही  1963 में ' कामराज  प्लान ' बनवाया था जो कि, नेहरू जी को पी एम पद से हटाने के लिए था न कि, यू पी के सी एम  चंद्रभानु  गुप्त को क्योंकि उस प्लान के अंतर्गत तमाम सी एम और कुछ मंत्री सरकार से बाहर हुये और संगठन में लगाए गए। जबकि, नेहरू जी को उन मेजर साहब ने आगाह कर दिया था अतः दिखावे में तो उन्होने पद- त्याग की इच्छा की किन्तु समर्थकों के जरिये अपने पद - त्याग प्रस्ताव को रद्द करा दिया। चन्द्र्भाणु गुप्त जी ने फैजाबाद की तत्कालीन सांसद सुचेता कृपलानी जी को सी एम बनवा दिया और पहले के किसी मंत्री व विधायक को मौका नहीं मिलने दिया था। अतः 'कामराज प्लान  सी बी गुप्ता को हटाने के लिए नेहरू जी का नहीं था बल्कि नेहरू जी को हटाने के लिए डॉ राधाकृष्णन जी का था जो विफल हो गया था।
(विजय राजबली माथुर ) 

K Vikram Rao
योगी का योगफल
Yogi Adityanath
विगत सत्तर वर्षों में बीसियों मुख्यमंत्री यूपी में आये-गये। मगर उनके नाम से उनका दौर जुड़ नहीं पाया। महंत आदित्यनाथ योगी का जुदा हैं, वे निराले भी। इसीलिए उनका जमाना योगीयुग कहलाने लगा है। जुमा जुमा पखवाडे भर में ही। कारण तलाशने के लिए गहनशोध की दरकार नहीं है। पहचान अलग हो तो विशिष्ट आ ही जाती है। मात्र परिधान, ललाट, गात्रक इत्यादि से ही नहीं। बात अंदर की है। वैचारिक, अतः मस्तिष्कीय है। नतीजन योगी की समता पिछले मुख्यमंत्रियों से नही की जा सकती है। कुछ मायनों में तीसरे मुख्यमंत्री चन्दुभानु गुप्त से संभव है। प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष की अनिच्छा के बावजूद भी गुप्ताजी मुख्यमंत्री बन गये थे। हालांकि लखनऊ पूर्व तथा मोदहा (महोबा) से विधानसभा चुनाव लगातार हार गये थे। पार्टी के भीतरी शत्रुओं तथा खुद मुख्यमंत्री संपूर्णानन्द कारक बने थे। फिर भी अपने आत्मबल से गुप्ताजी 1960 में सीधे शीर्षपद पर जा पहुंचे बिना विधानसभा पहुंचे। फिर उन्हें हटाने के लिए कामराज योजना नेहरू लाये। पार्टी काम हेतु गुप्ताजी को सरकार छोड़ना पड़ा।******
योगी जी का भी सत्ता तक सफर सरल नही था। भाजपायी महाबलियों को ठेलकर वे रेस जीते। ऐसा उदाहरण कुछ मायनो में मौर्यराज में विप्र सेनापति पुष्यमित्र शुंग का मिलता है जिसने शासकीय अहिंसा के कारण हिन्दुओं पर हो रहे म्लेच्छ हमले का खात्मा किया था।
अब विश्लेषण कर लें कि योगी क्या कर रहें हैं और क्या करेंगे ? पदारूढ़ होते ही योगी ने गाय को अहमियत दी। सही भी हैं। गोरक्षधाम के मुखिया रहें हैं, तो यह स्वाभाविक है। यूं भी जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी गाय के नाम पर सत्ता पाने की राजनीति करती रही। ठोस कुछ किया नहीं। लखनऊ की सड़कों पर 1953 में युवा अटल बिहारी वाजपेयी नारा लगाते रहे ”कटती गौयें करे पुकार, बन्द करो यह अत्याचार।“ अटलजी सत्ता के सोपान का आरोहित होते रहे। उधर गायें भी कटती रहीं। गोरक्षा पर राष्ट्रीय कदम नहीं उठा सके। सत्ता के केन्द्र लोकभवन में प्रवेश करते ही योगी ने गोकशी कानून पर सख्ती की। बूचडखानों पर ताला डलवा दिया। सवा सौ साल पुराने टुण्डे कवाब की दुकान के मालिक मोहम्मद उस्मान ने कहा कि वे गोश्त अन्य जिलों से आयात करेंगे क्योंकि लखनऊ में एक भी वैघ वघशाला नहीं है। सोचें जरा इतने वर्षों से राजधानी में अलग रंग की सरकारें आई और बूचड़खाने बिना लाइसेंस के पनपते रहे। मायावती राज में कानून बना था कि सचिवालय में पान और गुटखा प्रतिबंधित हो। मनभावन कदम था। संगमरमर से निर्मित फर्श और चमकती दीवारें चन्द महीनों बाद इतनी विकृत हो गई कि मानो पीक नहीं पेंट हो और कलाकृतियां चित्रित हो रहीं थें। अब वे चित्रकारी घिसकर, रगड़कर मिटाई जा रही है।
कुछ ज्यादा पढे़ लिखे लोगों को ये कार्य छोटा लगेगा। वही आरोप कि प्रधानमंत्री अब वैश्विक समस्याओं पर ध्यान न देकर स्वच्छ भारत पर केंद्रित है। झाडू थामे है। सत्ता मोह से कभी भी न अघानेवाले सोनिया कांग्रेसियों ने कोयला, रेत का खनन, टूजी ठेका, बैंक से उधारी, हेलिकाप्टर खरीदी आदि को प्राथमिक योजनाएं बनाईं थीं। इधर यूपी में मायावती द्वारा राजकोष की लूट पहला कार्यक्रम रहा। उनके मुख्यमंत्री काल में वर्तनी ही बदल गयी थी दौलत तथा दलित के बीच।
अगर मोदी Narendra Modi शासन की तर्ज पर योगी ने भी स्वच्छ प्रदेश का संकल्प लिया है वो यह सीख महात्मा गांधी से ही मिली है। बापू ने नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद आदि से सेवाग्राम आश्रम में पहले संडास साफ करवाया था। घमण्ड तोड़ने का यह रामबाण है। बापू भारत की आत्मा को भलीभांति पहचानते थे। गुजराती का प्रभाव मोदी पर पड़ना तार्किक रहा। ठीक भी। अर्थात योगी के गुटखामुक्त सचिवालय की योजना को इसी नजरिये से देखना चाहिए।
बड़ी बड़ी विकास योजनाओं का दम भरनेवाले जब आमजन की दैनिक आवश्यकताओं और समस्याओं को टाल देते हैं, तो वही हश्र होता है जो काम बोलनेवालों का हुआ। काम उनका “टें” बोल गया।
मसलन योगी ने सरकारी नौकरों को साढ़े नौ बजे कार्यस्थल में आने का आदेश दिया है। अब दूरदराज गांव से देहातीजन लखनऊ सचिवालय आयें और बडे़ साहब मीटिंग में, पूजा में, बाथरूम में आदि जगहों पर व्यस्त रहें तो वही संदेश जायेगा कि 27 साल से बेहाल यूपी। इसीलिए योगी ने सुशासन की शुरूआत पुलिस थानों से की है। प्रधानमंत्री कहते रहे कि थाने सभी सपा कार्यालय हो गये हैं। जिला प्रशासन ही पूर्णतया यादवमय हो गया था। गोरक्षक योगी अब इन यदुवंशियों को हटा रहे हैं। उनका पहला आदेश तो था कि सैफई गांव में चार घंटे बिजली सप्लाई कम कर दी गई। सैफई समानान्तर राजधानी थी। अगले माह नवरात्रि पर बिजली पूरी आयेगी अर्थात भेदभाव की नीति नकार दी जायेगी। कुछ शमशान-कब्रिस्तान की तर्ज पर।
भेदभाव तो कम होता खूब दिख रहा है। हद पार कर गया था जब अखिलेश यादव Akhilesh Yadav का राज होता था। उदाहरणार्थ उर्दू को तरजीह और संस्कृत अध्यापकों को वेतन न मिलना। गोरखधाम में वेद शिक्षा के प्रबंधक योगी ने विकृति खत्म कर दी है। सरकारी वाहनों पर से हूटर हटवाया है। कारण है कि ध्वनि प्रदूशण दूर करे। मगर इससे राजमद भी टूटेगा।
तीन तलाक से मुक्ति दिलाने के आश्वासन पर त्रस्त मुस्लिम महिलाओं का बहुमत पाने वाले योगी अब मनचलों से बेटियों को निजात दिलाने के लिए क्रियाशील हो गये है। हिरासत में रोमियों की संख्या बढ़ रही है।
खनन माफिया तो सपा सरकार में सत्ता पर सवार थे, सुरक्षित थे। योगी ने एक महिला Archana Pandey को खनन राज्य मंत्री नियुक्त किया है। खुद मंत्री हैं। नदियों का संरक्षण (बालू अब चोरी नहीं किया जायेगा)।
ये सब तो अल्पकालीन काम योगी ने एक आंचलिक पद्धति पर किया है। उनका सबसे बड़ा काम, यदि सफल हुआ तो, है “जाति तोड़ो”।
वही नारा जो राममनोहर लोहिया तथा दीनदयाल उपाध्याय ने दिया था। लोहिया के नारे को सपाइयों ने घुमाफिरा कर एक ही जाति के लिए प्रगति का मार्ग बना दिया। योगी ने इसे सुधारने का वादा किया है। इसका आधारभूत कारण भी है। यादव और जाटव के अलावा यूपी में मानों कोई पिछड़ा और दलित है ही नहीं। ये दोनों जातिवाले कुलश्रेष्ठ बना दिये गये थे। उन्हें समतल बनाकर जाति तोड़ो के अभियान की दिशा में एक सम्यक शुरूआत होगी। याद कीजिए जब 1963 के लोकसभाई उपचुनाव के जौनपुर से जनसंघ पण्डित दीनदयाल उपाध्याय हार गये थे क्योंकि उन्होंने विप्रसभा को संबोधित करने से इंकार कर दिया था। यही उपाध्याय जी आज योगी के प्रथम मार्गदर्षक है। उनका एकात्म मानववाद चिन्तन हैं, प्रकाश स्तंभ है।
पड़ोसी बिहार के पुरोधाओं से वैचारिक मतविशमता भले ही हो पर योगी प्रदेश में भी शराबंदी के इच्छुक हैं। यूं भी अखिलेश यादव सरकार ने अत्यंत अनैतिक कार्य किया। शराब व्यापारियों को अगले वर्ष तक ठेका दे डाला जो गैरकानूनी है। संसाधन के नाम पर खुली लूट हुई है। शराब माफिया, दिवंगत पोन्टी चड्डा के मायावती और अखिलेश यादव खास मित्र रहे। नियम ताक पर थे। सिद्धांतों का तो सवाल ही नही उठता था। उनपर अब योगी की कोपदृष्टि पड़ने की प्रतीक्षा है।
लेकिन योगी पर अभी राजनीतिक कठिनाई आशांकित है। करीब छह मंत्री है जिन्हें विधानमंडल का सदस्य बनना है। किस क्षेत्र से भेजेंगे ? स्वयं भी चुनाव लडेंगे। फिर दो लोकसभाई उपचुनाव होंगे। अपना गोरखपुर से तथा केशव मौर्य का फूलपुर से। दोनों सीटों पर प्रधानमंत्री की साख दांव पर लगी होगी। योगी की प्रथम छमाई की भी परीक्षा होगी।
लेकिन सबसे बड़ा वही प्रश्न होगा मुसलमानों का मिजाज दुरूस्त रखने का। विगत तीन दशकों से मुस्लिमपरस्त, तुष्टिकरण वाली राजनीति से मुसलमान वोट बैंक बड़ा सौदागर बन गया है। मगर मोदी ने साबित कर दिया कि बिना मुस्लिम वोट के भी सत्ता जीती जा सकती है। मोदी की इसी अद्भुत सफलता को योगी को बलवती बनाना होगा ताकि मजहब के नाम पर लामबंदी और सियासत खत्म हो। फिलहाल किसानों का कर्जा माफ करना तथा गोरखपुर से सटे हुये नेपाल की नदियों से पूर्वांचल में आनेवाले बाढ़ से त्रस्त क्षेत्र का परित्राण करना नये मुख्यमंत्री की तात्कालिक चुनौती है। तब योगी का योगफल दिखेगा।
के विक्रम राव
पत्रकार
9415000909
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 क्या ऐसा होगा?  
09/08/2016 03:02
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अयोध्या के बाबरी प्रकरण के बाद उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन की सरकार का अस्तित्व आया था। काशीराम जी को अपने गृह जनपद इटावा से मुलायम सिंह जी ने सांसद तक बनवाया था। यदि यह गठबंधन कायम रहता तो सदा-सर्वदा के लिए उत्तर प्रदेश से भाजपा का अस्तित्व समाप्त हो जाता। अतः संघप्रिय गौतम के माध्यम से मायावती जी को मुलायम सिंह जी के विरुद्ध करके वह सरकार गिरा दी गई। भाजपा के समर्थन से कई बार मायावती जी मुख्यमंत्री बनीं किन्तु उनकी सरकार भाजपा द्वारा ही हर बार गिरा दी गई। इसके बावजूद गुजरात नर-संहार के बाद 2002 में मायावती जी ने अटल व मोदी के साथ भाजपा का वहाँ प्रचार किया था।
2014 के लोकसभा चुनावों से काफी पहले  व्हाईट हाउस में बराक हुसैन ओबामा द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय गोपनीय बैठक की गई थी जिसमें भारत से भी कई दलित कहे जाने वाले चिंतक शामिल हुये थे जिनमें से एक लखनऊ के विद्वान भी थे। वहीं पर मुस्लिमों के विरुद्ध विश्व व्यापी मुहिम चलाये जाने और उसमें प्रत्येक देश के दलित माने जाने वाले लोगों का सहयोग लेने की रूप रेखा तय की गई थी। उसी अनुसार 2014 के लोकसभा चुनावों में समस्त दलित कहे जाने वाले वर्ग का वोट बसपा के बजाए भाजपा को गया था और बसपा का एक भी सांसद न जीत सका था। उसी मुहिम का परिणाम है बसपा से हाल ही में हुई टूटन। मायावती जी को उनके खास लोगों ने उसी अंदाज़ में उनको झटका दिया है जिस अंदाज़ में 1995 में उन्होने खुद मुलायम सिंह जी को झटका दिया था तब उनको भी भाजपा का समर्थन हासिल था जिस प्रकार अब उनको झटका देने वालों को हासिल हुआ है।
2017 के आसन्न चुनावों में यदि बसपा-सपा गठबंधन बना कर चुनाव लड़ा जाये तो अब भी भाजपा के मंसूबों को ध्वस्त किया जा सकता है वरना अभी तो भाजपा बसपा को ध्वस्त करने के लिए गोपनीय समर्थन देकर सपा सरकार फिर से बनवा देगी लेकिन उसके बाद सपा को उसी प्रकार तोड़ेगी जिस प्रकार अभी बसपा को तोड़ा है। मायावती जी व मुलायम सिंह जी दूरदर्शिता का परिचय दें तो दीर्घकालीन मजबूत गठबंधन बना कर न केवल उत्तर प्रदेश में वरन सम्पूर्ण देश में भाजपा को परास्त कर सकते हैं। लेकिन क्या ऐसा होगा?
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1137504919644816

ज़ाहिर है ऐसा नहीं हुआ और इसी लिए भाजपा का सत्तारोहण हुआ । 
****** वरिष्ठ  पत्रकार  के विक्रम राव  साहब लिखते हैं कि, यू पी के तत्कालीन सी एम चंद्र भानु गुप्त को हटाने के लिए नेहरू 'कामराज प्लान ' लाये थे। लेकिन हकीकत यह नहीं है। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राधा कृष्णन  के एक अंगरक्षक रहे एक मेजर साहब ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि, राधाकृष्णन जी खुद पी एम बनना चाहते थे अतः तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज नाडार  से तमिल भाषा में वार्ता कर उन्होने  ही  1963 में ' कामराज  प्लान ' बनवाया था जो कि, नेहरू जी को पी एम पद से हटाने के लिए था न कि, यू पी के सी एम  चंद्रभानु  गुप्त को क्योंकि उस प्लान के अंतर्गत तमाम सी एम और कुछ मंत्री सरकार से बाहर हुये और संगठन में लगाए गए। जबकि, नेहरू जी को उन मेजर साहब ने आगाह कर दिया था अतः दिखावे में तो उन्होने पद- त्याग की इच्छा की किन्तु समर्थकों के जरिये अपने पद - त्याग प्रस्ताव को रद्द करा दिया। चन्द्र्भाणु गुप्त जी ने फैजाबाद की तत्कालीन सांसद सुचेता कृपलानी जी को सी एम बनवा दिया और पहले के किसी मंत्री व विधायक को मौका नहीं मिलने दिया था। अतः 'कामराज प्लान  सी बी गुप्ता को हटाने के लिए नेहरू जी का नहीं था बल्कि नेहरू जी को हटाने के लिए डॉ राधाकृष्णन जी का था जो विफल हो गया था। 
(विजय राजबली माथुर )

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