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Wednesday, July 15, 2026

क्योंकि वे कर नहीं सकते ------ Pankaj Kumar Singh / Shyam Singh



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मोदी प्रेस से क्यों डरते हैं?
यह ऐसा सवाल है जो पिछले बारह वर्षों से भारतीयों के ज़हन और सार्वजनिक चर्चा में तो प्रायः आता रहता है और अब इस पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी बातें हो रही हैं लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है।
इसी मुद्दे पर Pankaj Kumar Singh की यह पोस्ट कुछ संकेत करती है, पढ़िए—
मोदी जी की चुप्पी के पीछे छिपा सच 
मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस इसलिए नहीं करते क्योंकि उन्हें पैसे देने वाले लोग उन्हें करने नहीं देते। यह सिर्फ़ एक इल्ज़ाम से कहीं ज़्यादा है। यह एक ऐसे 'स्ट्रक्चर' की पुष्टि है जो बहुत पहले से बना हुआ था और ज़्यादातर लोगों की सोच से कहीं ज़्यादा गहरा है।
(1). ACYPL ➤
यह सिर्फ़ 'ट्रेनिंग प्रोग्राम' नहीं, बल्कि 'रिक्रूटमेंट' की दीर्घकालिक योजना भी है।
मोदी ने 1993 में RSS के ग्रासरूट ऑर्गेनाइज़र (प्रचारक) के तौर पर यूनाइटेड स्टेट्स का दौरा किया, जिसे अमेरिकन काउंसिल ऑफ़ यंग पॉलिटिकल लीडर्स (ACYPL) ने होस्ट किया था। हालांकि, ACYPL सिर्फ़ एक एक्सचेंज प्रोग्राम नहीं था; इसे बड़े पैमाने पर CIA द्वारा विदेशी पॉलिटिकल टैलेंट को तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक फ्रंटल ऑर्गेनाइज़ेशन माना जाता था।
एक ज़रूरी बात यह है कि मोदी ने इसी दौरान यूरोप के कई हिस्सों का भी दौरा किया और उनकी यात्रा और रहने का खर्च विदेशी प्राइवेट कंपनियों ने उठाया। इसका मतलब है कि उनका 1993 का ट्रिप कोई इंडिपेंडेंट डिप्लोमैटिक एंगेजमेंट नहीं था, बल्कि एंगेजमेंट और कल्चर का एक स्ट्रक्चर्ड, बाहर से फंडेड प्रोसेस था। 
मोदी का नाम ACYPL की ऑफिशियल एल्युमनाई लिस्ट में है। 
जुलाइ 2026 में पाकिस्तानी मीडिया ने साफ तौर पर बताया कि ACYPL को आम तौर पर CIA का फ्रंट माना जाता है, एक ऐसा ऑर्गनाइज़ेशन जिसका इस्तेमाल CIA दुनिया भर में एसेट्स बनाने और भविष्य के लीडर्स को U.S. एजेंडा के साथ जोड़ने के लिए तैयार करने के लिए करती है।
मोदी सिर्फ CIA प्रोग्राम के एल्युमनाई नहीं थे। उन्होंने 1999 में युवा लीडर्स के लिए U.S. स्टेट डिपार्टमेंट के 'स्टडी ऑफ द U.S. इंस्टिट्यूट्स' (SUSI) प्रोग्राम में भी हिस्सा लिया था। नेशनल पॉलिटिकल स्टेज में आने से पहले उन्होंने कम से कम छह साल तक ट्रेनिंग ली।
 (2). 2014 ➤  CIA और मोसाद ने मोदी की जीत कैसे सुनिश्चित की—
2014 के चुनाव के नतीजे, जिसमें काँग्रेस पार्टी के साँसदों की संख्या 206 से घटकर 44 हो गई थी, वह 'नैचुरल मैंडेट' नहीं था।  काँग्रेस के पूर्व MP कुमार केतकर ने सबके सामने आरोप लगाया कि CIA और मोसाद ने काँग्रेस पार्टी की हार की साज़िश रची थी।
वजह? एक स्थिर, काँग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार भारत के फ़ैसले लेने में किसी भी बाहरी दखल को कम करेगी। इसलिए, उन्होंने एक गैर-कांग्रेसी बहुमत वाली सरकार बनाने का फ़ैसला किया, यह मानते हुए कि ऐसी लीडरशिप उनके फ़ायदे के लिए बेहतर होगी। खबर है कि मोसाद ने भारत के अलग-अलग राज्यों और चुनाव क्षेत्रों को कवर करते हुए डिटेल्ड पॉलिटिकल असेसमेंट डेटा इकट्ठा किया।
(3). ऐपस्टीन नेटवर्क मोसाद की शैडो डिप्लोमेसी ➤
'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट्स ने सबसे गुप्त लेयर का खुलासा किया—
जेफ्री ऐपस्टीन ने भारत-इज़राइल सम्बंधों के स्ट्रेटेजिक मोड़ में एक अहम भूमिका निभाई।
ऐपस्टीन ने मोदी को सलाह दी कि वे इज़राइल से मिलिट्री और इंटेलिजेंस खरीद $2 बिलियन बढ़ा दें। ताकि रिश्ते मज़बूत हों और ह्वाइट हाउस का सपोर्ट मिल सके। मोदी के एक्शन लेने से पहले उन्होंने ट्रंप प्रशासन के कैबिनेट अपॉइंटमेंट और फॉरेन पॉलिसी में बदलाव के बारे में पहले से जानकारी शेयर की थी। ऐपस्टीन ने भारतीय अरबपति अनिल अंबानी को भी गाइड किया कि स्टीव बैनन, टॉम बैरक और जेरेड कुशनर जैसे ट्रंप के करीबी लोगों से कैसे जुड़े थे।
खास बात यह है कि ऐपस्टीन इस्राएली इंटेलिजेंस एजेंसी—मोसाद के लिए एक हाइ-लेवल ऑपरेटिव था। एक FBI मेमो में साफ तौर पर लिखा है, "ऐपस्टीन के इस्राएल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक के साथ करीबी रिश्ते थे और उन्होंने उसकी गाइडेंस में जासूसी की ट्रेनिंग ली थी।" 
बराक 2013 और 2017 के बीच 30 से ज़्यादा बार ऐपस्टीन के न्यूयॉर्क टाउन हाउस गए।
ऐपस्टीन ने मोदी और इस्राएली 'डीप स्टेट' के बीच एक कनेक्शन का काम किया। उसकी भूमिका पर्सनल क्रिमिनैलिटी से कहीं ज़्यादा थी; यह एक जियोपॉलिटिकल ऑपरेशन था।  
(4). मोसाद के तरीके RAW ने दोहराए ➤
दरअसल, इज़राइल ने जो टूल फ़िलिस्तीनियों पर नज़र रखने के लिए बनाए थे, उन्हें भारत ने अपने आलोचकों को टारगेट करने के लिए अपनाया। मोसाद ने दशकों में 'टारगेटेड एलिमिनेशन' का जो तरीका विकसित किया, जिसमें ईरानी न्यूक्लियर साइंटिस्ट की हत्या भी शामिल है, उसे भारत के रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) ने कनाडा के सबअर्ब में सिख एक्टिविस्ट को टारगेट करने के लिए दोहराया।
14 फरवरी, 2026 को, भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता ने मैनहट्टन फ़ेडरल कोर्ट में एक US-कैनेडियन सिख एक्टिविस्ट गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साज़िश में शामिल होने का गुनाह कबूल किया और माना कि उसने एक भारतीय सरकारी कर्मचारी के कहने और कोऑर्डिनेशन पर काम किया। मोसाद के तरीकों को मोदी के ऑफ़िस के साथ भारत में सफ़लतापूर्वक 'एक्सपोर्ट' किया गया था, जो चेन ऑफ़ कमांड में सबसे ऊपर था।
(5). भारत इस्राएल के लिए एक 'प्रॉक्सी स्टेट' बन गया है ➤
मोदी प्रशासन असल में इस्राएल के लिए एक प्रॉक्सी स्टेट बन गया है, जिसमें भारतीय एजेंसियाँ ​​जासूसी के लिए इस्राएली टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही हैं। RAW और मोसाद के बीच जो सहयोग 1980 के दशक में शुरू हुआ था, मोदी के राज में एक फॉर्मल डिफेंस और इंटेलिजेंस अलायंस में बदल गया है।
|• इज़राइली पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल राहुल गाँधी, कम से कम 40 पत्रकारों, सुप्रीम कोर्ट के जजों और चुनाव कमिश्नरों की निगरानी के लिए किया गया था।
|• भारत के सुप्रीम कोर्ट ने जाँचे गए 29 डिवाइस में से 5 में मैलवेयर पाया।
|• मोदी प्रशासन ने जाँच में सहयोग करने से इनकार कर दिया।
|• इस्राएल की डिफेंस एक्सपोर्ट कंट्रोल एजेंसी (DECA) ने पेगासस की बिक्री को मंज़ूरी दी।
सबसे बड़ा सच ➤
मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते क्योंकि वे कर नहीं सकते। वे जब एक बार बोलते हैं, तो ये सवाल उठने ज़रूरी हो जाते हैं—
• 2014 ➤ CIA और मोसाद ने काँग्रेस पार्टी की हार कैसे करवाई?
• ऐपस्टीन ➤ एक सिद्ध-दोषी सेक्स अपराधी और मोसाद के एसेट ने इस्राएल के प्रति भारत की विदेश नीति बनाने में भूमिका क्यों निभाई?
• पेगासस ➤ भारतीय पत्रकारों, जजों और विपक्षी नेताओं पर नज़र रखने के लिए इज़राइली स्पाइवेयर का इस्तेमाल क्यों किया गया?
• हत्याएं ➤ RAW ने विदेशों में हत्याओं के लिए मोसाद के टारगेटेड किलिंग के तरीके को क्यों कॉपी किया?
• प्रॉक्सी स्टेटस ➤ भारत इज़राइल के लिए प्रॉक्सी स्टेट क्यों बन गया है?
मोदी की चुप्पी सिर्फ़ एक कम्युनिकेशन स्टाइल नहीं है, यह उनकी असली पहचान छिपाने के लिए बनाया गया एक शील्डिंग मैकेनिज्म है। बोलना पूरे स्ट्रक्चर को एक्सपोज़ करना होगा और ऐसा वे कभी नहीं होने देंगे।♦️
#एकदा_जंबूद्वीपे 
फोटो—ACYPL की वेबसाइट से See less














  ~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, August 5, 2012

सीमा आज़ाद और उनके पति को रिहा किया जाये

सीमा आज़ाद के जन्मदिवस 05 अगस्त पर ---

हम सीमा आज़ाद को जन्मदिन की मुबारकवाद देते हैं और उनके सुखद,सुंदर,स्वस्थ,समृद्ध और उज्ज्वल पारिवारिक,सामाजिक,राजनीतिक भविष्य  एवं दीर्घायुष्य  की मंगलकामना तथा उनके और उनके पति की शीघ्र रिहाई की आशा करते हैं। 



 सीमा-विश्वविजय रिहाई मंच के द्वारा 19 जूलाई 2012 को जारी प्रेस नोट मे  अध्यक्ष की 04 जूलाई की प्रेस कान्फरेंस के हवाले से कहा गया है कि-
“पत्रकार सीमा आजाद और विश्वविजय के पास वास्तव में कोई माओवादी साहित्य था ही नहीं. पुलिस ने जो भी आपत्तिजनक साहित्य बरामद दिखाया, वह सब उन्हें झूठा फंसाने की उच्च-स्तरीय साज़िश के तहत फर्जी तरीके से दिखाया गया था.”

01 जूलाई को नैनी जेल मे मिलने गए प्रतिनिधिमंडल से  सीमा आजाद ने  कहा कि उनके पास कोई माओवादी साहित्य था ही नहीं. जो किताबें वह दिल्ली स्थित विश्व पुस्तक मेले से खरीद लायी थीं उनमें उम्दा किस्म की साहित्यिक रचनाएँ थीं. जिनकी सूची उन्होंने उक्त जेल मुलाकात के दौरान नोट भी करा दी।  इसी आधार पर उक्त प्रतिनिध-मंडल में शामिल ‘सीमा-विश्वविजय रिहाई मंच’ के तदर्थ अध्यक्ष जीपी मिश्र ने पत्रकार वार्ता में यह बयान दिया था।

हिमांशु कुमार जी ने अपने फेसबुक स्टेटस द्वारा जागरूक छात्रों, महिलाओं, मजदूरों, किसानों और लोकतंत्र-पसंद बुद्धिजीवियों से  UAPA और 121, 121A, 124A आईपीसी जैसे काले कानूनों के तहत तमाम बेक़सूर युवाओं, साहसी पत्रकारों एवं समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं को फर्जी मुकदमों में फंसाये जाने के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए सीमा आज़ाद के जन्मदिन 05 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंत्र मे साँय 05 बजे एकत्र होने का आह्वान किया है।

हम जो लोग दिल्ली नहीं पहुँच सके  सीमा आज़ाद के जन्मदिन पर उनके और उनके पति की रिहाई की मांग करते हैं।  8 जून को अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री सुनील कुमार सिंह की अदालत द्वारा ढाई साल से नैनी केन्द्रीय कारागार में निरुद्ध रही सीमा आजाद और उनके पति विश्वविजय को विभिन्न धाराओं में उम्र कैद की सज़ा सुना दी थी जबकि हकीकत यह थी कि सीमा आज़ाद अवैध्य खनन माफिया के विरुद्ध अभियान चला रही थीं। गैर कानूनी कारोबारियों को बचाने के लिए कानून का गलत प्रयोग करके सीमा आज़ाद और उनके पति को जेल मे रखा गया है। आज सीमा आज़ाद के जन्मदिन पर उनकी ही आवाज़ मे ये पाँच क्रांतिकारी गीत सुनिए-




   

Wednesday, October 19, 2011

भ्रष्टाचार मिटाने को भ्रष्टाचार का सहारा एक तरफ और जन-संघर्ष दूसरी तरफ

Hindustan-Lucknow-13/10/2011
रामदेव,अन्ना ट्रायल के बाद आडवाणी साहब( जो भारत की आजादी के पाँच साल बाद  मुंबई से कारांची पहुंचे जेड ए भुट्टो के बदले मे करांची से भारत एक गुप्त समझौते के तहत आए थे) 'भ्रष्टाचार'के विरोध मे और सुशासन के पक्ष मे एक माडर्न-रथ पर सवार होकर निकले जिसके पक्ष मे  सूचना देने के लिए मध्य -प्रदेश मे पत्रकारों को रु 500/-500/-की खुली रिश्वत दी गई जिसे आप ऊपर के स्कैन मे देख रहे हैं।

आडवाणी साहब खुद भी पत्रकार रहे हैं उनसे बेहतर पत्रकारों को कोई नहीं समझ सकता है। इस मामले मे प्रबन्धकों ने गोपनीयता का पालन क्यों नहीं किया ?आडवाणी साहब का भंडाफोड़ क्यों कर दिया?ये सब बातें भाजपा की अंदरूनी राजनीति से ताल्लुक रखती हैं ,हमारे चिंतन का विषय नहीं है। हम केवल यह बताना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के तीरों से भ्रष्टाचार को समाप्त करने की कलाकारी क्या सिर्फ जनता को बेवकूफ बनाने के लिए नहीं है?

1974 मे भी लोकनायक जयप्रकाश नारायण के 'सप्तक्रांति'/सम्पूर्ण  क्रान्ति  आंदोलन मे नानाजी देशमुख को आगे करके संघ और जनसंघ ने अपनी घुसपैठ कर ली थी और उसी के परिणामस्वरूप मोरारजी देसाई की जनता सरकार मे अटल बिहारी बाजपेयी 'विदेश' तथा आडवाणी साहब 'सूचना व प्रसारण मंत्री' बन सके थे। इन लोगों ने अपने-अपने विभागों मे संघियों को नियुक्त कर लिया था। इनके द्वारा नियुक्त कर्मचारियों-अधिकारियों ने भविष्य मे आने वाली सरकारों को भी प्रभावित किया।

1975 की एमेर्जेंसी के दौरान सम्पन्न  'देवरस-इंदिरा' गुप्त  समझौते के अनुसार संघियों ने जनता सरकार को गिरा दिया और खुल कर संघ ने 1980 मे इंदिरा कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत दिला दिया । भाजपा ने इस चुनाव मे दो सीटें प्राप्त कीं और अटल जी भी हार गए किन्तु संघ को जो राजनीतिक लाभ मिला वह कहीं ज्यादा लाभप्रद था।

जयप्रकाश के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन,वी पी सिंह के बोफोर्स भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और अभी हाल ही मे अन्ना साहब के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन मे घुस कर संघ/भाजपा ने अपनी स्थिति सुदृढ़  कर ली है। इस स्थिति को आगामी चुनावों तक बरकरार रखने के लिए भाजपा ने अपने कई नेताओं को रथ-यात्राओं पर उतारा था उसी कड़ी मे खुद को सुपर लीडर बताने हेतु आडवाणी साहब भी कूद पड़े। उनको वहम  है कि 'जिन्ना' साहब की पाकिस्तान जाकर तारीफ करने से उन्हें दूसरे दलों का भी समर्थन मिल जा सकता है। ज्योतिषीय आधार पर वह उप-प्रधानमंत्री तक ही पहुँच सकते थे जो पहुँच चुके अब उनकी सारी कवायद व्यर्थ है बस उससे केवल वह भाजपा के भ्रष्टाचार को ढकने का ही कार्य कर पाएंगे।

आज पत्रकार बड़े-बड़े नेताओं को अपने इशारे पर नचा कर फोटो खींचते और उनकी रिपोर्ट छापते  हैं यही वजह है कि बड़े से बड़े पूंजीवादी  नेता उन्हें खुश करने हेतु आडवाणी साहब जैसा ही प्रयास करते हैं। पत्रकार दावा करते हैं कि वे चाहे जिस नेता को गिरा दें ,चाहे जिस नेता को उठा दें। एक छोटा सा उदाहरण देना चाहूँगा।

आगरा मे एक वर्ष सूखा पड़ने पर भाजपा ने प्रार्थना-प्रदर्शन की योजना बनाई थी ,दैनिक जागरण उन्हीं की विचार-धारा का अखबार होने के कारण उन्होने संबन्धित पत्रकार को मुंह-मांगी रकम देने से इंकार कर दिया। उस पत्रकार ने भाजपा का प्रदर्शन फ्लाप करने हेतु समाजवादी पार्टी की महिला विंग की नगर मंत्री से संपर्क साध कर उनके प्रदर्शन कार्यक्रम से एक दिन पूर्व विक्टोरिया पार्क मे 'समाजवादी महिला सभा' की कुछ महिलाओं को इस प्रकार के सिटिंग एरेञ्ज्मेंट्स से बैठा कर फोटो खींच कर अखबार मे खबर और फोटो सुर्खियों के साथ छाप दिये। प्रदर्शन काफी बड़ा नजर फोटो मे आ रहा था। ऐसे पत्रकारों को मेनेज किए बगैर भाजपा /आडवाणी रथ यात्रा सुर्खियां कैसे बटोर सकती थी?अतः यह धन-वितरण उसी का एक छोटा सा नमूना है।ये भी खबरें हैं कि यू पी से एम पी मे प्रवेश के समय 'टोल टैक्स'की भी चोरी की गई है तथा आडवाणी साहब की सभाओं हेतु माईक के लिए बिजली चोरी की स्तेमाल की गई है।

प्रगतिशील पत्रकार धन नहीं दूसरे तरीकों से लेखकों को अपने इशारे पर नचाने का प्रयास करते हैं। वे अपने ही राष्ट्रीय नेताओं के पक्ष की टिप्पणियों और लेखों को सेंसर करके रख देते हैं एवं ब्लाग्स तथा अखबार मे नहीं छापते हैं। उन्हें भय है कि कहीं नए लोग दूसरों की नजर मे न आ जाएँ ,इसलिए उन्हें दबा दो भले ही इससे उनके अपने  संगठन को क्षति होती है तो होती रहे उनका एक छत्र राज् तो कायम ही रहेगा। 

उन्होने 18 अक्तूबर 2011 के उपवास-धरना हेतु sms जारी किए जिनमे 'you have to' शब्दों का इस्तेमाल किया गया था जबकि वह खुद प्रदर्शन-स्थल पर 12 .14 pm पर पधारे और 01 .19 पर प्रस्थान कर गए जबकि उनके वरिष्ठ नेता ने 'please attend' शब्दावली का प्रयोग किया था और पूरे वक्त प्रदर्शन स्थल पर डटे रह कुशल संचालन किया।

(चार बामपंथी दलों के आह्वान पर पूरे प्रदेश से आए कार्यकताओं ने राजधानी के 'झूले लाल वाटिका' मे एक-दिवसीय 'उपवास'और धरना दिया जो साँय तक शांतिपूर्ण और पूर्ण अनुशासित रूप सम्पन्न हुआ। इसके उद्देश्यों को नीचे स्कैन को डबल क्लिक करके देख सकते हैं।)



सभा का संचालन भाकपा के राज्य सचिव डॉ गिरीश ने किया और उदघाटन भाषण दिया फारवर्ड ब्लाक के प्रदेश अध्यक्ष राम किशोर शर्मा जी ने। महिला फ़ेडरेशन की आशा मिश्रा जी,एडवा की मधु गर्ग जी, सी पी एम के प्रदेश सचिव डॉ श्री प्रकाश कश्यप,भकपा के वरिष्ठ नेता अशोक मिश्रा जी, डॉ अरविंद राज स्वरूप AISF की प्रदेश संयोजिका निधि चौहान,AIYF के प्रदेश संयोजक नीरज यादव ,पूर्व विधायक इम्तियाज़ अहमद आदि ने संबोधित किया। बामपंथी नेताओं के वक्तव्यों मे जनता  के हितों उसकी मूलभूत समस्याओं पर ज़ोर था। डॉ प्रो .रमेश दीक्षित ने भी सभा को संभोधित करते हुये बाम-पंथ का आह्वान किया की जनता उनकी ओर देख रही है और वे आगे आ कर उसका मार्ग-दर्शन व नेतृत्व करें। डॉ दीक्षित खुद बामपंथी नहीं हैं और उनका संबंध यू पी ए के एक घटक से है,परंतु वह जन-हितैषी हैं इसलिए AISF तथा प्रगतिशील लेखकों के सम्मेलन मे भी उपस्थित रहे थे। 

1991 के बाद से अपनाई 'उदारीकरण'की आर्थिक नीतियों को भ्रष्टाचार  के तीव्र प्रसार का कारक वक्ताओं ने बताया। 70 प्रतिशत 'काला धन'श्रमिकों की मजदूरी चुराने से सृजित होता है। अतः शोषण समाप्त किए बगैर भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता। जो लोग लफ्फाजी करके जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं वे वस्तुतः 'कारपोरेट घरानों'का ही संरक्षण कर रहे हैं। इसी हेतु उनकी 'जन-लोकपाल' मे कारपोरेट घरानों को लाने की मुहिम नहीं है और इसलिए भी कि देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों से उनके एन जी ओज को भारी रकम चंदे के नाम पर रिश्वत स्वरूप मिलती है। 

2012 के यू पी के चुनावों मे चारों बामपंथी दलों ने मिल कर जनता को उसके वास्तविक शत्रुओं -जातिवाद,संप्रदाय वाद से परिचित कराने का संकल्प व्यक्त किया। किसानों के भूमि-अधिग्रहण,उनकी आत्म-हत्याओं ,मजदूरों के शोषण-उत्पीड़न,बेरोजगारी,मंहगाई आदि का सामाजिक जन-जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है अतः इंनका वास्तविक निदान कराने हेतु  जनता को बाम-पंथी मोर्चे के पीछे लामबंद करने की आवश्यकता बताई गई। डॉ ,सर्जन,प्रो ,आदि बुद्धिजीवी लोग लगातार भाकपा कार्यालय मे आकर उनसे ऐसा निवेदन कर रहे हैं।   

सभा के अंत मे लोक मंडली ने एक नाटक प्रस्तुत किया जिसकी मुख्य उल्लेखनीय बातों मे था-'जय हो जय हो भ्रष्टाचार विरोधी नारे की जय हो','आयेगा-आयेगा एन जी ओ वाला आयेगा -उल्टे उस्तरे से जनता को मूढ़ ले जाएगा'। 

भ्रष्टाचार सिर्फ आर्थिक ही नहीं होता है वह-सामाजिक,धार्मिक भी होता है। जब तक इस सामाजिक-धार्मिक भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं होगा तब तक आर्थिक भ्रष्टाचार का भी खात्मा नहीं हो सकता। चाहे जितनी रथ-यात्राएं निकल जाएँ,जितने चाहे प्रदर्शन -अनशन हो जाएँ।