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Monday, September 28, 2015

नेताजी सुभाष के बाद शास्त्री जी की मौत पर भी अब विवाद की वजह --- विजय राजबली माथुर

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की रहस्यपूर्ण मृत्यु के  विवाद के बाद अब पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु के लगभग 50 वर्षों बाद उसे रहस्यपूर्ण बताते हुये जांच की  मांग की गई है। वैसे तो ताशकंद समझौता  होने के बाद जनसंघ ने सारी दिल्ली को काले झंडों से पाट दिया था जो शास्त्री जी की वापसी पर विरोध जताने के लिए था। किन्तु ताशकंद में उनकी मृत्यु की खबर मिलने के बाद वे झंडे हटा लिए गए थे। उस समय के अखबारों में ऐसी खबरें मिल जाएंगी। यह भी खबर उडी थी कि लाल बहादुर जी के बड़े सुपुत्र हरी किशन शास्त्री ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री व गृह मंत्री गुलज़ारी लाल नंदा जी से मिल कर अपने पिता की मृत्यु पर संदेह प्रकट किया था। लेकिन नंदा जी ने उनको पारिवारिक संकट से बचने हेतु चुप रहने की सलाह दी थी और बाद में उनको लोकसभा सदस्य बनवा दिया था। 

मोरारजी देसाई को कांग्रेस संसदीय दल में परास्त कर इन्दिरा जी प्रधानमंत्री बन गईं थीं 1967 के आम चुनाव के बाद फिर मोरारजी देसाई ने उनको चुनौती दी थी । इस बार इंदिराजी ने उनको उप-प्रधानमंत्री व वित्तमंत्री बना कर समझौता कर लिया किन्तु  बनवाने वालों के लिए 'गूंगी गुड़िया' न सिद्ध हुईं तो के कामराज नाडार ( जो राष्ट्रपति राधा कृष्णन से मिल कर नेहरू जी को पदच्युत करने का असफल प्रयास कर चुके थे), एस निजलिंगप्पा, एस के पाटिल,अतुल घोष और मंत्रीमंडल से बर्खास्त मोरारजी देसाई ने मिल कर 1969 में  111 सांसदों का अलग गुट बना कर 'कांग्रेस ओ ' का गठन कर लिया था। हरी कृष्ण शास्त्री भी इस गुट में शामिल हो गए थे। 1972  के मध्यावधी चुनावों में कांग्रेस ओ के टिकट पर चौगुटा मोर्चा के समर्थन से वह मेरठ संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी थे। तब पहली बार जनसंघ ने उनको 'ताशकंद के शहीद' का पुत्र कह कर प्रचारित किया था। बाद में उनकी पत्नि रीता शास्त्री भाजपा सांसद भी रही हैं। 

1989 में जब वी पी सिंह ने सुनील शास्त्री को हरा कर संसदीय सीट जीती तब अनिल शास्त्री को अपने मंत्रीमंडल में शामिल किया था। लेकिन तब अनिल शास्त्री ने उन वी पी सिंह के समक्ष अपने पिता की मृत्यु की जांच की मांग नहीं रखी जो खुद शास्त्री जी को पिता-तुल्य मानते थे। वी पी सिंह ने केंद्र में मोरारजी की जनता पार्टी सरकार बनने के बाद विदेशों में इंदिरा जी की एमर्जेंसी के पक्ष में प्रचार किया था और जनसंघ तब जनता पार्टी में विलीन था। लेकिन 1989 में भाजपा का वी पी सिंह को समर्थन व अनिल शास्त्री का केंद्रीय मंत्री होना भी शास्त्री जी की मृत्यु के संबंध में कोई विवाद न उठा सका था, क्यों?

मोदी के नेतृत्व में सरकार गठन के एक वर्ष उपरांत अनिल शास्त्री ने ताशकंद में शास्त्री जी की मृत्यु की पीछे विदेशी हाथ कह कर अप्रत्यक्ष रूप से साम्यवादी रूस की तरफ इशारा किया है। 1945 में हुये विमान हादसे को षड्यंत्र बताने की थ्यौरी में भी नेताजी को रूस के सईबेरिया की जेल में गिरफ्तार होना बताया जाता है। 'सारदानन्द' तथा 'गुमनामी बाबा' दो अलग -अलग हस्तियों को नेताजी बताया जाता है। फाइलें सार्वजनिक करके नेताजी की मृत्यु के विवाद को गहराया जा रहा है लेकिन यह नहीं बताया जा रहा है कि मोदी सरकार के गठन के बाद जो फाइलें नष्ट की गईं थीं उनको सार्वजनिक न करने का कारण क्या था ?

नेताजी की मृत्यु के संबंध में नेहरू जी व शास्त्री जी की मृत्यु के संबंध में इंदिराजी को जनता की नज़रों में गिरा कर भाजपा को मनोवैज्ञानिक जीत दिलाना और सरकार की मजबूती को चिरस्थाई बनाना ही इस अभियान का लक्ष्य है। दुर्भाग्य यह है कि जो साम्यवादी/वामपंथी  खुद को भाजपा/संघ की फासिस्ट नीतियों के प्रबल विरोधी बताते हैं उनका नेतृत्व जन्मना ब्राह्मणों अथवा ब्राह्मण वादियों के हाथ में है जो वस्तुतः अपनी कार्यशैली से भाजपा/संघ की फासिस्टी प्रवृति को दृढ़ता प्रदान कर रही है। गैर वामपंथी और गैर भाजपाई दल भी 'मूल निवासी' की भूल- भुलैया में भटक कर या पोंगापंथी आस्थाओं में उलझ कर अंततः भाजपा/संघ को ही मजबूत करते प्रतीत हो रहे हैं। पाकिस्तान के जरिये अमेरिका और चीन भारत को घेरते जा रहे हैं। चीन का हौआ दिखा कर अमेरिका भारत की भाजपाई सरकार को अपने चंगुल में जकड़ता जा रहा है । 

दिवास्वप्न देखने वाले वामपंथी मोदी सरकार के अपदस्थ होने के लक्षण गिनाते जा रहे हैं और अपने कार्यकर्ताओं तथा जनता को विभ्रम में रख रहे हैं।यदि नेताजी व शास्त्री जी के विषय में बोलते हुये नेहरू जी व इन्दिरा जी का बचाव किया गया तो जनता के बीच देशद्रोही के रूप में प्रचारित किया जाएगा। मार्क्स और भगत सिंह के नाम पर 'नास्तिकता' - एथीस्टवाद का जो नशा साम्यवादियों/वामपंथियों ने चढ़ा रखा है उसके उतरने के कोई लक्षण या संकेत नहीं मिल रहे हैं। संप्रदायों को विभिन्न धर्म बताया जा रहा है। धर्म निरपेक्षता के मंत्र जाप से फासिस्ट शक्तियों को परास्त करने के झूठे आश्वासन दिये जा रहे हैं। सीधे-सीधे यह नहीं कहा जा रहा है कि जिसे 'धर्म' कहा जा रहा है वह तो 'अधर्म' है। वास्तविक धर्म को बताने-समझाने को नास्तिकता की ओट में तैयार नहीं हैं। कारण वही ब्राह्मण वादी नेतृत्व की निजी तिकड़में । बात नेताजी व शास्त्री जी की मृत्यु की नहीं है बल्कि जनता पर आसन्न संकट को टालने की है। उसके लिए गहन व गूढ अध्यन का सहारा लेकर भारतीय दर्शन यथा- वेद आदि (लेकिन पुराणों से नहीं  जो ब्राह्मणों को प्रिय हैं ) से साम्यवाद के सिद्धांतों को सिद्ध करते हुये जनता के बीच जाएँगे तभी जन-समर्थन हासिल करके फासिस्टों को गलत सिद्ध करते हुये परास्त किया जा सकेगा।   

 ~विजय राजबली माथुर ©
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Saturday, September 26, 2015

नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर विवाद क्यों? --- विजय राजबली माथुर




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एशिया न्यूज़ के संपादक पुष्प रंजन साहब ने 15 अप्रैल 2015 को प्रकाशित एक लेख में विस्तृत रूप से बताया है कि जिस जर्मनी से वह सहयोग कर रहे थे उसने भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पीछे अपने जासूस लगा रखे थे। उनके जिन पौत्र सूर्य बोस के हवाले से भारत में उनकी जासूसी करवाने की जांच की मांग की जा रही है वह इस लेख के मुताबिक नेताजी सुभाष बोस के भतीजे अमियनाथ बोस के पुत्र हैं। 

अमियनाथ बोस जी ने यह आरोप लगाते हुये कि फारवर्ड ब्लाक (जिसका गठन स्वम्य नेताजी ने किया था ) नेताजी के आदर्शों से भटक गया है 'आज़ाद हिन्द संघ' नामक एक नया राजनीतिक दल बना लिया था। बताया गया था कि इसमें नेताजी की आज़ाद हिन्द फौज के सेनानी शामिल हैं। मेरठ के भैंसाली ग्राउंड में प्रति वर्ष 23 जनवरी को इस संघ की ओर से नेताजी की जयंती मनाई जाती थी। इस कार्यक्रम में प्रतिवर्ष तत्कालीन सयुस और संसोपा नेता  और वर्तमान में भाजपा कार्यकारिणी के सदस्य   सतपाल मलिक  साहब (पूर्व अध्यक्ष- छात्र संघ, मेरठ कालेज, मेरठ) ज़ोर-शोर से नेताजी के विमान हादसे में मृत्यु होने की जांच की मांग उठाते थे। हालांकि 'शाहनवाज़ जांच आयोग' व 'खोसला जांच आयोग' ने विमान हादसे को ही सही घोषित कर दिया था। 
सतपाल मलिक जी तब तक के तीनों प्रधानमंत्रियों पर नेताजी की उपेक्षा किए जाने के संदर्भ में मुकदमा चलाये जाने की मांग भी उठाते थे। एक वर्ष ललिता शास्त्री जी भी उस कार्यक्रम में अतिथि थीं उस वर्ष उनके द्वारा सिर्फ पहले व तीसरे प्रधानमंत्री पर मुकदमे की बात उठाई गई थी व ललिता जी को माताजी का सम्बोधन दिया गया था। उसके बाद से फिर तीनों प्रधानमंत्रियों पर मुकदमे की मांग उनके द्वारा की जाती रही थी। जिस प्रकार 1962 के चीनी आक्रमण को कुछ लोगों द्वारा नेताजी की 'मुक्ति वाहिनी' की संज्ञा दी गई थी उसी प्रकार 1971 के बांगला देश के 'आमार सोनार बांगला' आंदोलन को मलिक जी द्वारा नेताजी प्रेरित बताया जाता था। अपनी बात की पुष्टि  के लिए मलिक जी शेख मुजीबुर रहमान के इस वक्तव्य की ओर ध्यानाकर्षण करते थे जिसमें कथित रूप से उन्होने कहा था- 'मेरे दो गुरु थे, हैं : सुहारा वर्दी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस'। इस आधार पर मलिक जी उस समय तक नेताजी को जीवित मानते थे जैसा कि अमियनाथ बोस जी व उनके आज़ाद हिन्द संघ का कहना था। 

ऐसा भी माना जाता है कि नेताजी जर्मन विनायक दामोदर सावरकर के कहने पर नज़रबंदी से भाग कर गए थे। सावरकर का संघ और जनसंघ देश में लोकप्रियता पाने में विफल रहे थे इसलिए अमियनाथ जी (जिंनका चरित्र संजय गांधी जैसा था ) को आगे करके आज़ाद हिन्द संघ गठित करवाया गया था आज उनके ही पुत्र मोदी के समक्ष मांग उठा रहे हैं जो संघ-नियंत्रित केंद्र सरकार के मुखिया हैं। जो नेताजी समाजवाद और साम्यवाद के लिए संघर्ष करते थे उनको हिटलर का समर्थन लेने के कारण संघी अपने रंग में अब रंग दे रहे हैं जबकि हिटलर से तो अनाक्रमण समझौता खुद स्टालिन ने भी कर रखा था जिसे विंस्टन चर्चिल ने तिकड़म करके हिटलर द्वारा रूस पर आक्रमण करके तुड़वा दिया गया था। इसी वजह से हिटलर का पतन हुआ और नेताजी को जापान जाना पड़ा था।

नेताजी का खुद को भांजा बताने वाले रेलवे के पूर्व क्लर्क प्रभात रंजन सरकार ने आनंद मूर्ती नाम से 'आनंद मार्ग' और इसके राजनीतिक विंग- 'प्राउटिस्ट ब्लाक आफ इंडिया' का गठन किया था जिसने कई चुनावों में विफलता के साथ भाग भी लिया था। इंदिराजी ने प्रेमपाल रावत उर्फ बाल योगेश्वर ( जो अब यू एस ए से अपनी गतिविधियां चला रहा है) के 'डिवाईंन लाईट मिशन'-'दिव्य ज्योति परिषद' , प्रभात रंजन सरकार उर्फ आनंद मूर्ती के आनंद मार्ग तथा लेखराज कृपलानी (पूर्व हीरा व्यापारी) के 'ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय' को पुलिस कारवाई द्वारा नियंत्रित कर लिया था जो कि देशद्रोही गतिविधियों में संलग्न थे और अब पुनः सक्रिय हो गए हैं। 

कार्गिल से लेह जाने वाले मार्ग पर स्थित 'द्रास' क्षेत्र में  ( जो जोजीला दर्रे की वजह व राजग सरकार में पाक से युद्ध के कारण विख्यात है ) 'प्लेटिनम' धातु जो 'स्वर्ण' से भी अधिक मूल्यवान होती है तथा जिसका उपयोग यूरेनियम के निर्माण में भी होता है प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसी के कारण काश्मीर 1947 से ही विवादित चल रहा है क्योंकि यू एस ए, जर्मन और कनाडा तथा रूस व चीन की निगाहें भी इसके भंडार पर लगी हुई हैं। यदि जोजीला पर सुरंग- टनल बन जाये तो श्रीनगर से लेह तक का सफर कुछ ही घंटों का हो जाये। कनाडा की एक फर्म ने नाम-मात्र शुल्क पर और जर्मन की फर्म ने निशुल्क इस टनल को बनाने का प्रस्ताव इंदिरा जी को दिया था किन्तु उनकी शर्त थी कि 'मलवा' वे अपने देश ले जाएँगे। इंदिरा जी शुल्क देने को तैयार थीं किन्तु 'मलवा' नहीं तो इसी 'प्लेटिनम' की वजह से ही। 

काश्मीर से आर्टिकल 370 हटवाने की मांग इसी प्लेटिनम पर कब्जे की इच्छुक विदेशी शक्तियों के इशारे पर उठती रही है और अब वहाँ की सत्ता में ऐसे मांग-कर्ता भी शामिल है उनके ही समक्ष जर्मन प्रवासी सूर्य बोस जी ने नेताजी पर ताज़ा विवाद शुरू करा दिया है। नेताजी की पुत्री अनीता बोस जी खामोश हैं जैसा कि पुष्प रंजन जी का लेख कहता है। 

इस वक्त नेताजी पर विवाद को आर्टिकल 370 हटाने की मांग, जोजीला क्षेत्र के 'प्लेटिनम' से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए और देश-रक्षक शक्तियों को एकजुट होकर षड्यंत्र को विफल करना चाहिए।



  ~विजय राजबली माथुर ©
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Thursday, June 26, 2014

सावधान झूठ का खेल शुरू हो चुका है ---विजय राजबली माथुर

" मधुकर दत्तात्रेय (उर्फ बाला साहब) देवरस चाहते हैं कि,संघ उनके जीवन काल मे सत्ता पर काबिज हो जाये। इसके लिए डा जयदत्त पन्त के मतानुसार उन्होने लक्ष्य रखा था कि,शहरों का 2 प्रतिशत और गावों का 3 प्रतिशत जनसमर्थन प्राप्त कर लिया जाये जो संभवतः रामजन्म भूमि आंदोलन बनाम आडवाणी कमल रथ यात्रा से पूरा हो गया लगता है।"
http://krantiswar.blogspot.in/2011/09/blog-post_25.html

उपरोक्त पोस्ट के माध्यम से मैंने 1991 में व्यक्त विचारों को प्रकाशित किया था। 2014 के चुनाव परिणामों से उसकी पुष्टि भी हो गई है। कुल मतदान का 31 प्रतिशत वोट हासिल करके भाजपा (अप्रत्यक्ष रूप से RSS) सत्तासीन है, इसी ब्लाग के माध्यम से लगातार आगाह करता रहा हूँ परंतु मेरी हैसियत ही क्या है जो कोई मेरे विचारों पर ध्यान देता?

रियूमर स्पीच्युटिंग सोसाईटी ने अपना अफवाह फैलाने का कार्य बदस्तूर शुरू कर दिया है और इस बार मोहरा बनाया गया है नेताजी सुभाष चंद्र बोस को । फेसबुक पर नेताजी के संबंध में RSS समर्थक अखबार द्वारा भ्रामक प्रचार किया गया है जिसका कुछ वांम समर्थकों पर यह प्रभाव हुआ है कि वे नेताजी को संकीर्ण जातिवादी और श्रमिक विरोधी मान बैठे। नेताजी सुभाष खुद को साम्यवादी विचार धारा का वाहक कहते थे और देश में समाजवादी व्यवस्था स्थापित किए जाने के हामी थे। जिस प्रकार पुराणों के माध्यम से 'राम' व 'कृष्ण' का चारित्रिक पतन किया गया है उसी प्रकार वर्तमान में आधुनिक जन-नायकों के चरित्र हनन का सिलसिला शुरू किया गया है। यदि अभी से इसका डट कर मुक़ाबला नहीं किया गया तो दुष्प्रचारक अपने उद्देश्य में उसी प्रकार सफल हो जाएँगे जिस प्रकार जनता का वोट हासिल करने मे सफल हो गए थे। 

कामरेड बाला साहब देवाधे धन्यवाद के पात्र हैं जिनके सद प्रयत्नों से सच्चाई का तुरंत खुलासा भी हो गया है। इसी प्रकार हम सब को सतत जागरूक रहना होगा व जनता को भ्रमित होने से बचाना होगा।






लन्दन के फुटपाथ पर दो भारतीय रुके और
जूते पोलिश करने वाले से एक व्यक्ति ने जूते पोलिश करने को कहा ...

जूते पोलिश हो गये ..
पैसे चुका दिए और वो दोनों अगले जूते पोलिश करने वाले के
पास पहुँच गये !

वहां पहुँच कर भी उन्होंने वही किया...
जो व्यक्ति अभी जूते पोलिश करवाके आया था,

उसने फिर जूते पोलिश करवाए और पैसे चूका कर
अगले जूते पोलिश करने वाले के पास चला गया...........

जब उस व्यक्ति ने 7-8 बार पोलिश किये हुए ~
जूतो को पोलिश करवाया तो .....
उसके साथ के व्यक्ति के सब्र का बाँध टूट पड़ा.....
उसने पूछ ही लिया

" भाई जब एक बार में तुम्हारे जूते पोलिश हो चुके तो
बार-बार क्यों पोलिश करवा रहे हो"?

प्रथम व्यक्ति बोला
" ये अंग्रेज मेरे देश में राज़ कर रहे हैं,
मुझे इन घमंडी अंग्रेजो से जूते साफ़ करवाने में बड़ा मज़ा आता है !!

वह थे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस..!!!
www.nationalparivartan.com













 ~विजय राजबली माथुर ©
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