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Wednesday, April 8, 2026

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का बम ------ विजय राजबली माथुर

आज ०८ अप्रैल है -वह दिन जब केन्द्रीय असेम्बली में सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंका था.वह बम गूंगी -बहरी सरकार और क़ानून निर्माताओं को जगाने के लिए फेंका गया था किसी हिंसक इरादे से नहीं.न ही किसी की जान ही गई थी. २६ जनवरी १९३० को बांटे गए पर्चे में भगत सिंह ने कहा था-"एक क्रांतिकारी सबसे अधिक तर्क में विशवास करता है.वह केवल तर्क और तर्क में ही विशवास करता है.किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्दा,चाहे वह ऊंचे से ऊंचे स्तर से की गई हो,उसे अपने निश्चित उद्देश्य -प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती.यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या उसके कार्य की प्रशंसा न की गई तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा ,निरी मूर्खता है."



लोअर कोर्ट के जवाब में उन्होंने कहा था क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है-अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज -व्यवस्था में आमूल परिवर्तन."समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं.दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं.दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैय्या करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढंकने -भर को भी कपडा नहीं पा रहा है.सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर,लोहार तथा बढ़ई स्वंय गंदे बाड़ों में रह कर ही अपनी   जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं.इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वार-न्यारा कर देते हैं.........स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठ कर रंगरेलियां मना रहा है शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल पड़े हैं."


आज भी जो शासन-व्यवस्था है वह भगत सिंह आदि क्रांतिकारियों के सपनों का स्वराज्य नहीं है.उनका कथन है-"क्रांतिकारियों का विशवास है कि देश को क्रान्ति से ही स्वतंत्रता मिलेगी.वे जिस क्रान्ति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रान्ति का रूप उनके सामने स्पष्ट है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का सशस्त्र संघर्ष हो ,बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ -साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जाएँ.क्रान्ति पूंजीवाद,वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली ओरानाली का अंत कर देगी.यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी,उससे नवीन राष्ट्र और नए समाज का जन्म होगा.क्रान्ति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानों का राज्य कायम कर उन सब सामजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनीतिक शक्ति को हथियाए बैठे हैं."


आप खुद ही तुलना करें क्या हमें जो आजादी मिली है वह वैसी ही है जिसके लिए भगत सिंह ,बटुकेश्वर दत्त,अशफाक उल्ला खाँ,राम प्रसाद बिस्मिल ,चन्द्र शेखार आजाद आदि असंख्य क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया था.यदि नहीं तो उसे प्राप्त करने में आप क्या योगदान देंगें?

  ~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, July 23, 2011

तिलक और आजाद ------ विजय राजबली माथुर

बाल गंगा धर 'तिलक'और पं.चंद्रशेखर आजाद की जयन्ति २३ जूलाई पर श्र्द्धा -सुमन  


बाल गंगा धर 'तिलक 'का जन्म २३ जूलाई १८५६ ई.को रत्नागिरी (महाराष्ट्र)में हुआ था.१८९० में वह कांग्रेस में शामिल हुए.१८९६-९७ में महाराष्ट्र में प्लेग फैला तो उन्होंने राहत कार्यों को सुचारू रूप से संचालित किया.अरविन्द घोष के छोटे भाई बरेंद्र कुमार घोष एवं स्वामी  विवेकानंद(जिन्हें आर.एस.एस.जबरिया अपने बैनर पर घसीटता है) के भाई भूपेन्द्र नाथ दत्त 'युगांतर'तथा 'संध्या'नामक शक्तिशाली समाचार-पत्रों के माध्यम से 'क्रान्ति'का सन्देश फैला रहे थे.बंगाल के अरविन्द घोष और विपिन चन्द्र पाल तथा पूना के लोकमान्य तिलक कांग्रेस में 'बाम-पंथी'(लेफ्ट विंग)के नेता माने जाते थे.बम्बई के फीरोज शाह मेहता और पूना के जी.के.गोखले एवं बंगाल के एस.एन.बनर्जी  दक्षिण -पंथी (राईट विंग)के माने जाते थे.पंजाब के लाला लाजपत राय मध्यम मार्गी नेता थे.१९०६ में दादा भाई नौरोजी के कुशल नेत्रित्व के कारण कांग्रेस ने स्व-राज्य का ध्येय अपना लिया और स्व-देशी के प्रचार का प्रस्ताव भी पास किया.

१९०७ में सूरत अधिवेंशन में लाल-बाल-पाल जैसे कर्मठ नेता कांग्रेस से अलग होकर आजादी की लड़ाई में जुट गए.इन परिस्थितियों में ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार ने उदार कांग्रेसियों,मुस्लिमों जागीरदारों,धनवानों के प्रति नरम रुख रख कर उग्र -दल के नेताओं का निर्मम दमन-चक्र चलाया.

१९०७ में बंगाल के गवर्नर की रेल गाडी पर बम फेंका गया और ढाका के जिलाधीश की हत्या का असफल प्रयास हुआ.१९०८ में कलकत्ता के प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट पर गोली चलाई गयी.इस सम्बन्ध में खुदी राम बोस को फांसी की सजा दी गयी. इन बम कांडों पर १९०८ में 'केसरी' में तिलक ने लिखा था कि,"बम जनता के राजनीतिक तापक्रम का थर्मा मीटर है."एक दुसरे लेख में उन्होंने लिखा-"बंगालियों के बम समाज के लिए राजद्रोहात्मक न थे,वरन उनके मूल में देश-भक्ति की अत्यधिक भावना थी".ऐसे ही लेखों के लिए उन्हें छः वर्षों के लिए 'मांडला'(बर्मा)में कैद करके रखा गया.१९१४ में छूटने  के बाद वह पुनः आजादी के कार्य में जुट गए.

१९१५ में फीरोजशाह मेहता और गोपाल कृष्ण गोखले की मृत्यु हो गई अतः तिलक आदि १९१६ में  पुनः कांग्रेस में लौट आये .तिलक और एनी बेसेंट ने मिल कर १९१६ में 'होम रूल लीग'बना कर स्वदेशी आन्दोलन को और धार दी.१९१६ में लखनऊ में संपन्न हुए कांग्रेस अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने भी संयुक्त रूप से भाग लिया और इसका श्रेय पूरी तौर पर तिलक को है.(यह बेहद गौर करने की बात है जिन तिलक को आर.एस.एस.हिंदूवादी घोषित करते नहीं थकताऔर जनता को गुमराह करता रहता है  वही बाल गंगा धर तिलक मुस्लिम लीग को कांग्रेस के मंच पर लाने और आजादी के लिए संयुक्त संघर्ष हेतु राजी करने में सफल रहे थे,वस्तुतः तिलक बामपंथी -राष्ट्र भक्त थे).

अगस्त १९२० में तिलक का निधन होने से बाम-पंथी आन्दोलन अनाथ हो गया .


चंद्र शेखर आज़ाद 

बाल गंगाधर तिलक के जन्म के ५० वर्ष बाद २३ जूलाई १९०६ को पं.सीता राम तिवारी और माता जगरानी देवी के पुत्र के रूप में क्रांतिकारी चंद्रशेखर 'आजाद ' का जन्म हुआ.इनके पिता मूल रूप से कानपूर जिले के राउत मरा बानपुर के निकट भाँती ग्राम निवासी कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे.यह अपने माता -पिता की पांचवीं एवं अंतिम तथा एकमात्र जीवित संतान थे.इन्होने ईमानदारी तथा स्वाभिमान पिता से सीखा था.

१३ अप्रैल १९१९ को हुए जलियाँ वाला बाग़ नर-संहार ने  इन्हें व्यथित कर दिया था.१९२१ में गांधी जी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने पर इन्हें १५ बेंतों की सजा मिली थी जिसे गांधी जी की जयकारे के साथ इन्होने भुगता.मरहम -पट्टी के लिए इन्हें तीन आने मिले जिन्हें जेलर के ऊपर फेंक कर इन्होने अपने दोस्त डा. से मरहम-पट्टी कराई.

फरवरी १९२२ में चौरी-चौरा के आधार पर गांधी जी के आन्दोलन वापिस लेने पर यह १९२३ में 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी'में सम्मिलित हो गए.क्रांतिकारी कार्यों हेतु धन-संग्रह के उद्देश्य से लखनऊ के 'काकोरी'स्टेशन पर इनके नेत्रित्व में गार्ड के डिब्बे से ०९ अगस्त १९२५ ई.को  सरकारी खजाना हस्तगत कर लिया गया.हालांकि अशफाक उल्ला खान ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि,ऐसा करने पर प्रशासन  उनके दल को जड़ से उखाड़ देगा और उनकी यह भविष्य वाणी सत्य हुई.

१७ तथा १९ दिसंबर १९२७ को राम प्रसाद 'बिस्मिल',अशफाक उल्ला खान ,रोशन सिंह तथा राजेन्द्र लाहिड़ी को फांसी दे दी गई.अब चंद्रशेखर 'आजाद'ने सरदार भगत सिंह के साथ मिल कर दल का पुनर्गठन करके 'सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन' नामकरण कर दिया.पं.जवाहर लाल नेहरू ने 'स्वराज भवन'में आजाद के दल के सदस्यों को रूस में प्रशिक्षण हेतु रु.१०००/-दिए थे जिनमें से बचे हुए रु.४४८/-उनके वस्त्रों से शहादत के समय प्राप्त हुए थे.

भगत सिंह और साथियों द्वारा नेशनल असेम्बली में बम फेंक कर गिरफ्तार होने से वह अकेले पड़ गए थे.इलाहाबाद में ०६ फरवरी १९२७ को मोती लाल नेहरू की शव यात्रा में उन्होंने गुप्त रूप से भाग लिया था और ब्रिटिश पुलिस उन्हें पकड़ न सकी थी.यह छिपते-छिपाते अंग्रेजों के छक्के छुडाते रहे.किन्तु जब साथियों को रूस भेजने की योजना पर विचार करने हेतु सुखदेव से २७ फरवरी १९३१ को अल्फ्रेड पार्क ,इलाहाबाद में वह चर्चा कर रहे थे तो मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने पार्क को चारों और से घेर लिया.अकेले ही पिस्तौल से संघर्ष करते रहे और जब आख़िरी गोली बची तब उसे अपने सीने में उतार कर 'आजाद'ही रहते हुए प्राणोत्सर्ग कर दिया.परन्तु शत्रु ब्रिटिश साम्राज्यवाद उन्हें गुलाम न बना सका.

हिन्दुस्तान,लखनऊ के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित प्रबुद्ध पाठकों के विचारों का अवलोकन करें तो आज के तथा-कथित नेताओं के प्रति वितृष्णा होती है.वस्तुतः ये लोग जन-नेता नहीं हैं बल्कि स्वयंभू नेता हैं और वस्तुतः आधुनिक साम्राज्यवादियों के एजेंट हैं.क्या  इन्हीं की मौज मस्ती के लिए 'तिलक','आजाद' सरीखे जन-नायकों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी.कदापि नहीं उनका ध्येय कोटि-कोटि जनता की आर्थिक और राजनीतिक आजादी था.आज अपने इन दो महान नेताओं के जन्म दिन पर नमन,स्मरण,आदि औपचारिक संबोधनों का परित्याग करते हुए हम सब क्या  यह संकल्प ले सकते हैं कि ,भारत माँ के इन वीर सपूतों की इच्छा को अब साकार करेंगे?

हिंदुस्तान-लखनऊ-22/07/2011 
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Friday, April 8, 2011

ढोंग पाखण्ड जिंदाबाद !तो नहीं ख़तम होगा आतंकवाद!! ------ विजय राजबली माथुर

6 अप्रैल 2010 से दंतेवाड़ा से प्रारंभ हुआ नक्सली आतंकवाद लगातार बढ़ता जा रहा है.नक्सली और सैन्य बल कर्मी दोनों भारत माँ की संतानें हैं और एक दुसरे के खून की प्यासी हो रही हैं.नक्सलियों को वायुसेना के प्रहार से नष्ट करने की मांग ज़ोर पकड़ रही है परन्तु नक्सलवाद के उभार के जो कारण हैं उन्हें दूर करने की मांग दबाई जा रही है.अभी २ मई से २३ जुलाई २०१ ० तक गुरु मीन राशी में रहकर शनि से सम-सप्तक योग बना रहा था -यह योग  जन साधारण के हित में नहीं है;चाहे लैला नमक समुद्री तूफ़ान हो या छत्तीस गढ़ का नक्सली आन्दोलन,पिसना गरीब जनता को ही पड  रहा है.सरकारी दमन से नक्सलवाद को कुछ समय के लिए दबाया तो जा सकता है परन्तु सदा के लिए समाप्त नहीं किया जा सकता.यह छोटी सी बात सरकार चलाने  वाले या सरकार की आलोचना करने वाले नेतागण नहीं समझ रहे हैं या जानबूझ कर नहीं समझना चाह रहे हैं यह शोध का विषय नहीं है.स्पष्ट है की लोकतान्त्रिक सरकार जनता की,जनता द्वारा और जनता के लिए सैद्दांतिक अवधारणा मात्र है.वस्तुतः सरकार बनाने और चलाने में धनाढ्य और साफ साफ कहा जाये तो पूंजीपति वर्ग का हाथ रहता है जो जन साधारण के हित की बात सोच ही नहीं सकता। स्वाभाविक रूप से पूजीपति वर्ग से प्रभावित सरकारें चाहे वे जिस भी दल की हों पूंजीपति वर्ग का ही हित साधन सोच व संपन्न कर सकती हैं.तंत्र पर जन नहीं प्रभावी है बल्कि जन पर तंत्र हावी है.ऐसे में यदि जन साधारण अपने हक़ और हुकूक की बात करता है तो उसे अनसुना करदिया जाता है तभी नक्सलवाद जन को प्रभावित कर ले जाता है.नक्सलवाद कोई सिरफिरे देशद्रोही नौजवानों का खेल नहीं है जैसा की किसी मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया है।

नक्सलवाद १९६७ में बंगाल के सिलिगुड़ी के निकट नक्सलबारी से शुरू हुआ था.१९६९ में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से अलग होकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिन वादी) का गठन करने वाले नेताओं और उनके विभाजित अनुयाइयों द्वारा संचालित सशस्त्र आन्दोलन ही नक्सलवाद है.१९६४ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन से भाकपा (M) का गठन हुआ था जबकि भाकपा का गठन १९२५ में कानपूर में हुआ था जिसको गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे उद्भट विद्वान का समर्थन प्राप्त था.१९१७ में रूस में लेनिन के नेत्रत्त्व में कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना से प्रभावित हो कर भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के उद्भट और कर्मठ नेताओं ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी.१९२५ में ही स्थापित आर.एस.एस.(जो साम्राज्यवादियों से समर्थन प्राप्त था) का राजनैतिक संगठन तो ६ वर्ष तक केंद्र सरकार का नेत्रत्त्व करने में कामयाब रहा परन्तु कम्युनिस्ट आन्दोलन बिखरते बिखरते जनता से दूर हो गया.

तमाम विद्वानों,बुद्दिजीवियों,लेखकों,कवियों,रंगकर्मियों से  समर्थन प्राप्त होने के बावजूद भी कम्युनिस्ट आम जनता को प्रभावित करने में असमर्थ रहे इसीलिए जनता और सत्ता से दूर रहे.पश्चिम बंगाल और केरल में वाम मोर्चा की सरकारें प्रचलित तंत्र और ढर्रे पर ही चलीं.चूंकि वे कोई क्रांतिकारी कदम उठा ही नहीं सकती थीं न उठा ही सकीं.आज सोवियत संघ ही बिखर गया,कम्युनिज्म उखड गया कम्युनिस्ट हताशा निराशा में चले गए. जब सभी कम्युनिस्ट एकजुट भी थे तभी उनके विरुद्ध १९३० में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हो चुकी थी जिसके पुरोधा डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने अपनी पुस्तक इतिहास चक्र में लिखा है की,भारत के लिए कोई भी यूरोपीय वाद न तो पूँजी वाद और न ही साम्यवाद उपयुक्त है.परन्तु डॉक्टर लोहिया समाजवाद का समर्थन करते थे.समाजवाद वह आर्थिक प्रणाली है जिसमे उत्पादन व वितरण के साधनों पर समाज का नियंत्रण हो.यदि व्यव्हार में ऐसा भी होता या गाँधी जी का ट्रस्टीशिप सिद्दांत ही अमल में लाया जाता तो आज नक्सल वाद की कोई समस्या ही नहीं होती.कम्युनिज्म पूर्णतय:  भारतीय दर्शन है न तो खुद कम्युनिस्टों ने कभी दावा किया न ही विद्वानों ने कभी सोचा की महर्षि कार्ल मार्क्स ने जिस सिद्दांत का प्रतिपादन किया वो मौलिक रूप से भारतीय दर्शन ही है.साम्यवाद का मूल मन्त्र है प्रत्येक से उसकी योग्यतानुसार और प्रत्येक को उसकी आवश्यकतानुसार.सर्वे सन्तु निरामयः और सर्वे सन्तु सुखिनः की कामना की सुन्दर व्याख्या आधुनिक युग में पहले पहल महर्षि कार्ल मार्क्स ने ही की थी' दास कैपिटल' एवं' कम्युनिस्ट मनिफैस्तो' द्वारा मार्क्स ने मानव द्वारा मानव के शोषण का पुर जोर विरोध किया था.कार्लमार्क्स मूलतः जर्मन थे जहाँ के मैक्समूलर साहब ने भारत में ३० वर्ष रहकर संस्कृत का गहन अध्ययन किया था और हमारी प्राचीन पांडुलिपियों को लेकर जर्मन चले गए थे.वेदोक्त सिद्दांतों का मैक्समूलर  साहब ने जर्मन भाषा में अनुवाद किया था और उन्ही का पूर्ण अध्ययन करने के बाद महर्षि कार्लमार्क्स ने साम्यवाद के सिद्दांतों का निरूपण किया था इसलिए मार्क्स के सिद्दांत पूर्णतः भारतीय दर्शन पर आधारित हैं.रूस में साम्यवाद की विफलता का कारण भारतीय दर्शन का अनुपालन न होने की वजह है.भारतीय कम्युनिस्टों की विफलता का कारण भी भारतीय दर्शन से दूरी बनाये रखना ही है और यही वजह है की भारत की जनता अपने ही दर्शन से कटे होने के कारण त्राहि त्राहि कर रही है.साम्राज्यवादियों द्वारा प्र्ष्ठपोषित तथाकथित भारतीयता वादियों के दर्शन में साधारण जन का हित साधन नहीं है वे तो पूंजीपतियों के हित चिन्तक हैं.


आर्ष चरित्रों की पूंजीवादी व्याख्या -हमारे प्राचीन आर्ष चरित्र चाहे वे मर्यादा  पुरोषत्तम श्री राम हों या योगिराज श्री कृष्ण ,उत्तरवर्ती महावीर जिन हों या तथागत बुद्ध ,मध्य युगीन गुरुनानक,कबीर,तुलसीदास,आधुनिक दयानंद सरस्वती,विवेकानंद,राजा  राम मोहन राय,लाला लाजपत राय,विपिनचन्द्र पाल ,बाल गंगाधर तिलक आदि महापुरुषों को पूंजीवादियों ने इस रूप में पेश किया है की वे सबल वर्ग का समर्थन करते हैं जबकि हकीकत यह है की इनमे से प्रत्येक तथा बाद के डॉ.अम्बेडकर,महात्मा गाँधी आदि सभी ने निर्बल व असहाय वर्ग के उत्थान के लिए प्रयास किया है.तुलसीदास ने रामचरितमानस को सर्वजन हिताय लिखा है जिसमे कागभुशुंडी से गरुण को उपदेश दिलाते हुए उन्होंने समाज में हेय वर्ग के उत्थान का सन्देश दिया है परन्तु आज के ढोंगी और पाखंडियों ने क्रन्तिकारी कृति का  पूंजीवादीकरण कर लिया है और उसका अखंड पाठ करने के नाम पर जनता को भ्रमित कर रखा है.रामचरितमानस का अखंड पाठ करने पुस्तक की पूजा करने और आरती उतारने से किसी का भला होने वाला नहीं है.तुलसीदास जी के मर्म को समझने की आवश्यकता है उन्होंने अपने महाकाव्य के माध्यम से उत्पीडित जनता को साम्राज्यवादी शोषण के विरुद्द जाग्रत कर संघर्ष करने का आह्वाहन किया है जिस प्रकार राम ने साम्राज्यवादी रावन का संहार कर के किया था.परन्तु आज हमारे देश में हो क्या रहा है-रामचरित मानस का पाठ ,भोग,आरती,और शोषकों उत्पीदकों का महिमा मंडन इसी प्रकार अन्याय का विरोध करने वाले योगिराज श्री कृष्ण के उच्च एवं आर्ष चरित्र को रासलीला के माध्यम से एक रसिक के रूप में पेश करदिया गया है.श्री कृष्ण के तप  और त्याग को भुला कर उनकी जन्माष्टमी को भोग कीर्तन,आरती तक सीमित कर दिया गया है.परिणाम हमारे और आप के सब के सामने हैं-अशांति,अव्यवस्था,अराजकता और आतंकवाद।


यदि हमें विश्व को सुन्दर,सुखद व सम्रद्द बनाना है ,मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त करना ही होगा.जब तक दरिद्र नारायण की सच्ची सेवा नहीं होगी,प्रत्येक निर्धन के घर में दीपक की रौशनी नहीं होगी केवल मुट्ठी भर धनवानों की चलती रहेगी तो हमारा भारत ही नहीं पूरी दुनिया कराहती रहेगी.आज यहाँ,कल वहां,आतंकवाद का साया छाया रहेगा ढोंग व पाखंड को छाती से चिपका कर खुशहाली के सपने देखना आकाश -कुसुम तोड़ने जैसा ही है ये याद रखें.


(इसी ब्लाग में यह लेख पहले ०४ जून २०१० को तथा लखनऊ के एक स्थानीय अखबार में २५ मई २०१० को प्रकाशित हो चूका है,आज भी परिस्थितियें वैसी की वैसी ही होने के कारण पुनर्प्रकाशित किया है ) 

विशेष-आज ०८ अप्रैल है -वह दिन जब केन्द्रीय असेम्बली में सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंका था.वह बम गूंगी -बहरी सरकार और क़ानून निर्माताओं को जगाने के लिए फेंका गया था किसी हिंसक इरादे से नहीं.न ही किसी की जान ही गई थी. २६ जनवरी १९३० को बांटे गए पर्चे में भगत सिंह ने कहा था-"एक क्रांतिकारी सबसे अधिक तर्क में विशवास करता है.वह केवल तर्क और तर्क में ही विशवास करता है.किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्दा,चाहे वह ऊंचे से ऊंचे स्तर से की गई हो,उसे अपने निश्चित उद्देश्य -प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती.यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या उसके कार्य की प्रशंसा न की गई तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा ,निरी मूर्खता है."



लोअर कोर्ट के जवाब में उन्होंने कहा था क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है-अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज -व्यवस्था में आमूल परिवर्तन."समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं.दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं.दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैय्या करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढंकने -भर को भी कपडा नहीं पा रहा है.सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर,लोहार तथा बढ़ई स्वंय गंदे बाड़ों में रह कर ही अपनी   जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं.इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वार-न्यारा कर देते हैं.........स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठ कर रंगरेलियां मना रहा है शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल पड़े हैं."


आज भी जो शासन-व्यवस्था है वह भगत सिंह आदि क्रांतिकारियों के सपनों का स्वराज्य नहीं है.उनका कथन है-"क्रांतिकारियों का विशवास है कि देश को क्रान्ति से ही स्वतंत्रता मिलेगी.वे जिस क्रान्ति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रान्ति का रूप उनके सामने स्पष्ट है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का सशस्त्र संघर्ष हो ,बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ -साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जाएँ.क्रान्ति पूंजीवाद,वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली ओरानाली का अंत कर देगी.यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी,उससे नवीन राष्ट्र और नए समाज का जन्म होगा.क्रान्ति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानों का राज्य कायम कर उन सब सामजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनीतिक शक्ति को हथियाए बैठे हैं."


आप खुद ही तुलना करें क्या हमें जो आजादी मिली है वह वैसी ही है जिसके लिए भगत सिंह ,बटुकेश्वर दत्त,अशफाक उल्ला खाँ,राम प्रसाद बिस्मिल ,चन्द्र शेखार आजाद आदि असंख्य क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया था.यदि नहीं तो उसे प्राप्त करने में आप क्या योगदान देंगें?