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Sunday, November 19, 2017

इंदिराजी की जल्दबाजी और अदूरदर्शी चूकों पर भी गौर कर लिया जाये ------ विजय राजबली माथुर

****** इंदिराजी के जन्मदिन पर   आज  उनको याद करने,नमन करने और उनकी प्रशंसा के गीत गाने के साथ-साथ ज़रा उनकी जल्दबाजी और अदूरदर्शी चूकों पर भी गौर कर लिया जाये और उनसे बचने का मार्ग ढूँढना शुरू किया जाये तो देशहित में होगा व इंदिराजी को भी सच्ची श्रद्धांजली होगी।****** 




 
इतिहासकार सत्य का अन्वेषक होता है उसकी पैनी निगाहें भूतकाल के अंतराल में प्रविष्ट होकर ' तथ्य के मोतियों ' को सामने लाती हैं । इन्दिरा जी का कार्यकाल इतना भी भूतकाल नहीं है जो उसको ज्ञात करने के लिए किसी विशेष अनुसंधान की आवश्यकता पड़े। खेद की बात है कि, प्रोफेसर मृदुला मुखर्जी साहिबा ने इन्दिरा जी के कार्यकाल के प्रथम भाग के आधार पर उनका चित्रण किया है जबकि, उनके कार्यकाल के दिवतीय भाग के अलग आचरण की अवहेलना नज़र आती है। दो वर्ष पूर्व प्रकाशित अपने एक लेख का ज़िक्र इस अवसर पर पुनः  करना अपना दायित्व समझता हूँ ------
इन्दिरा गांधी का वर्तमान केंद्र सरकार के निर्माण में योगदान  : 
VIJAI RAJBALI MATHUR·THURSDAY, NOVEMBER 19, 2015

1966 में लाल बहादुर शास्त्री जी के असामयिक निधन के बाद सिंडीकेट (के कामराज नाडार, अतुल घोष, सदाशिव कान्होजी पाटिल, एस निज लिंगप्पा, मोरारजी देसाई ) की ओर से मोरारजी देसाई कांग्रेस संसदीय दल के नेता पद के प्रत्याशी थे जबकि कार्यवाहक प्रधानमंत्री नंदा जी  व अन्य नेता गण की ओर से इंदिरा जी । अंततः इन्दिरा जी का चयन गूंगी गुड़िया समझ कर हुआ था और वह प्रधानमंत्री बन गईं थीं। 1967 के आम चुनावों में उत्तर भारत के राज्यों में कांग्रेस का पराभव हो गया व संविद सरकारों का गठन हुआ। पश्चिम बंगाल में अजोय मुखर्जी (बांग्ला कांग्रेस ),बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा (जन क्रांति दल ),उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह (जन कांग्रेस - चन्द्र् भानु  गुप्त के विरुद्ध बगावत करके ) , मध्य प्रदेश में गोविंद नारायण सिंह (द्वारिका प्रसाद मिश्र के विरुद्ध बगावत करके ) मुख्यमंत्री बने ये सभी कांग्रेस छोड़ कर हटे थे। केंद्र में फिर से मोरारजी देसाई ने इंदिरा जी को टक्कर दी थी लेकिन उन्होने उनसे समझौता करके उप-प्रधानमंत्री बना दिया था। 1969 में 111 सांसदों के जरिये सिंडीकेट ने कांग्रेस (ओ ) बना कर इन्दिरा जी को झकझोर दिया लेकिन उन्होने वामपंथ के सहारे से सरकार बचा ली। 1971 में बांगला देश निर्माण में सहायता करने से उनको जो लोकप्रियता हासिल हुई थी उसको भुनाने से 1972 में उनको स्पष्ट बहुमत मिल गया किन्तु 1975 में एमर्जेंसी के दौरान हुये अत्याचारों ने 1977 में उनको करारी शिकस्त दिलवाई। मोरारजी प्रधानमंत्री बन गए और उनके विदेशमंत्री ए बी बाजपेयी व सूचना प्रसारण मंत्री एल के आडवाणी। इन दोनों ने संघियों को प्रशासन में ठूंस डाला। इसके अतिरिक्त गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह के पीछे ए बी बाजपेयी,पी एम मोरारजी के पीछे सुब्रमनियम स्वामी तथा जपा अध्यक्ष चंद्रशेखर के पीछे नानाजी देशमुख छाया की तरह लगे रहे और प्रशासन को संघी छाप देते चले। संघ की दुरभि संधि के चलते मोरारजी व चरण सिंह में टकराव हुआ और इंदिराजी के समर्थन से चरण सिंह पी एम बन गए। 

एमर्जेंसी के दौरान हुये मधुकर दत्तात्रेय 'देवरस'- इन्दिरा (गुप्त ) समझौते  को आगे बढ़ाते हुये चरण सिंह सरकार गिरा दी गई और 1980 में संघ के पूर्ण समर्थन से इन्दिरा जी की सत्ता में वापसी हुई। अब संघ के पास (पहले की तरह केवल जनसंघ ही नहीं था ) भाजपा के अलावा जपा और इन्दिरा कांग्रेस भी थी। संघ के इशारे पर केंद्र में सरकारें बनाई व गिराई जाने लगीं। सांसदों पर उद्योपातियों का शिकंजा कसता चला गया। 1996 में 13 दिन, 1998 में 13 माह फिर 1999 में पाँच वर्ष ए बी बाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र सरकार का भरपूर संघीकरण हुआ। 2004 से 2014 तक कहने को तो मनमोहन सिंह कांग्रेसी पी एम रहे किन्तु संघ के एजेंडा पर चलते रहे। 1991 में जब वह  वित्तमंत्री बन कर ‘उदारीकरण ‘ लाये थे तब यू एस ए जाकर आडवाणी साहब ने उसे उनकी नीतियों को चुराया जाना बताया था। स्पष्ट है कि वे नीतियाँ संघ व यू एस ए समर्थक थीं। जब सोनिया जी ने प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बना कर मनमोहन जी को राष्ट्रपति बनाना चाहा  था तब तक वह हज़ारे /रामदेव/केजरीवाल आंदोलन खड़ा करवा चुके थे। 2014 के चुनावों में 100 से अधिक कांग्रेसी मनमोहन जी के आशीर्वाद से भाजपा सांसद बन कर वर्तमान केंद्र सरकार के निर्माण में सहायक बने हैं। 

यदि इंदिरा जी ने 1975 में  'देवरस'से समझौता  नहीं किया होता व 1980 में संघ के समर्थन से चुनाव न जीता होता तब 1984 में राजीव जी भी संघ का समर्थन प्राप्त कर बहुमत हासिल नहीं करते। विभिन्न दलों में भी संघ की खुफिया घुसपैठ न हुई होती। 

इंदिराजी के जन्मदिन पर   आज  उनको याद करने,नमन करने और उनकी प्रशंसा के गीत गाने के साथ-साथ ज़रा उनकी जल्दबाजी और अदूरदर्शी चूकों पर भी गौर कर लिया जाये और उनसे बचने का मार्ग ढूँढना शुरू किया जाये तो देशहित में होगा व इंदिराजी को भी सच्ची श्रद्धांजली होगी। 
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प्रोफेसर मृदुला मुखर्जी साहिबा ने इस तथ्य को भी नहीं इंगित किया है कि, 1977 के  चुनावों में पराजित होने के बाद इंदिराजी भयभीत हो गईं थीं और उनको पुनः सत्ता वापिसी की उम्मीद नहीं थी इसलिए मोरारजी देसाई की सरकार को परेशान करने हेतु पंजाब में भिंडरावाला के माध्यम से खालिस्तान आंदोलन खड़ा करवाया था उनके सम्मेलन में भाग लेने अपने पुत्र संजय गांधी को भी भेजा था। परंतु संजय के प्रयासों से  1980 में पुनः सत्तासीन होने और फिर संजय के निधन के बाद वह चाह कर भी इस आंदोलन को ठंडा नहीं कर पाईं और अपने दूसरे पुत्र राजीव गांधी से भिंडरावाला को 'इस सदी के महान संत ' का खिताब दिलवाने के बावजूद भी उनके राज़ी न होने पर जून 1984 में सैनिक कारवाई के जरिये भिंडरावाला को खत्म किया गया जिसकी प्रतिक्रिया में उसी वर्ष अक्तूबर में उनकी हत्या हुई और जिसके बाद  देशव्यापी सिख विरोधी दंगे हुये। ये गतिविधियेँ निश्चित तौर पर ' सांप्रदायिक ' ही थीं। 
(होने जा रहे गुजरात के इन चुनावों में इन्दिरा जी के पौत्र और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जिस साफ्ट हिन्दुत्व का सहारा ले रहे हैं उसके पीछे भी आर एस एस से प्रभावित वहाँ की जनता और उस संगठन की सहानुभूति प्राप्त करना ही है। यदि वहाँ कांग्रेस सरकार गठित होती है तो 1980 व 1984 की भांति उसके पीछे आर एस एस का समर्थन ही होगा जो मोदी को नियंत्रित करने की उसकी एक चाल मात्र ही होगी। )
~विजय राजबली माथुर ©
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