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Wednesday, June 26, 2019

कहानी 26 जून 1975 : एमर्जेंसी की ------ विजय राजबली माथुर





Friday, June 26, 2015
एमर्जेंसी 26 जून 1975 की --- विजय राजबली माथुर
इस वर्ष 1975 में लगी एमर्जेंसी को 44  वर्ष हो गए हैं और काफी दिनों से लोग इस पर बहुत कुछ लिखते रहे हैं। 1971 के मध्यावधी चुनाव को बांग्ला देश निर्माण की पृष्ठ भूमि में इंदिरा कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत से जीत तो लिया था किन्तु रायबरेली में उनके प्रतिद्वंदी रहे चौगटा मोर्चा के राजनारायण सिंह ने मोरारजी देसाई के समर्थन से उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में उनके चुनाव को रद्द करने के लिए एक याचिका दायर कर दी थी।मेरे कार्यस्थल के एक साथी मेरठ कालेज , मेरठ से ला कर रहे थे उनके शिक्षक सिन्हा साहब के एक रिश्तेदार जगमोहन लाल सिन्हा साहब उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। उन शिक्षक महोदय ने अपने छात्रों से कह दिया था कि निर्णय इन्दिरा जी के विरुद्ध भी जा सकता है। उन्होने उदाहरण स्वरूप चौधरी चरण सिंह संबंधी घटना का वर्णन किया था जिसमें उनके किसी चहेते का केस जस्टिस सिन्हा के पास मेरठ में चल रहा था और वह निर्णय उसके पक्ष में चाहते थे। मुख्यमंत्री रहते हुये चरण सिंह उनसे मिलने उनकी कोठी पर जब पहुंचे तो जस्टिस सिन्हा साहब ने अर्दली से पुछवाया कि चौधरी चरण सिंह मिलना चाहते हैं या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जिसके जवाब में चौधरी साहब ने कहलवाया था कि जज साहब से कह दो कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह मिलने आए हैं। जस्टिस सिन्हा ने चौधरी साहब को मिलने से इंकार कर दिया था और बाद में निर्णय भी उनके परिचित के विरुद्ध देते हुये डरे नहीं थे। इसलिए 12 जून 1975 के निर्णय को देते हुये जहां उन्होने राजनारायन द्वारा लगाए गए तमाम आरोपों को खारिज कर दिया था वहीं इंदिरा जी के चुनाव को भी दो तकनीकी कारणों के कारण रद्द कर दिया था। इंदिरा जी के चुनाव एजेंट यशपाल का सरकारी सेवा से त्याग पत्र विधिवत स्वीकृत न होने से उनको सरकारी अधिकारी माना गया और रायबरेली के जिलाधिकारी द्वारा सभा की तैयारी कराना भी सत्ता का दुरुपयोग माना गया । इन दो आधारों पर इन्दिरा जी का चुनाव रद्द हुआ था। उनके स्टेनो रहे आर के धवन ने अब कहा है कि इन्दिरा जी तब स्तीफ़ा देना चाहती थीं लेकिन उनके सहयोगियों ने नहीं देने दिया जो सर्वथा गलत वक्तव्य है। 
वस्तुतः इंदिराजी को सुझाव दिया गया था कि वह बाबू जगजीवन राम को पी एम बनवा कर सुप्रीम कोर्ट में अपील करें। परंतु एन डी ए सरकार की मंत्री के पति संजय गांधी (जिनके निर्देश पर जगमोहन जी ने 'तुर्कमान गेट' और जामा मस्जिद क्षेत्र में फायरिंग करवाई थी ) की ज़िद्द के कारण इंदिराजी ने एमर्जेंसी के कागजात पर  बिना केबिनेट की पूर्व स्वीकृति के विदेश गए राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली साहब  को सोते से जगवा कर फ़ाईलो पर हस्ताक्षर करवाए थे। यह एमर्जेंसी 25 जून की सुबह 09 बजे लगनी थी और इंदिराजी के विश्वस्त गृहमंत्री उमाशंकर दीक्षित(दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जी के श्वसुर साहब) को छोड़ कर अन्य मंत्रियों को इसकी कोई जानकारी न थी।  उमाशंकर दीक्षित जी उत्तर प्रदेश के राजभवन के अतिथि कक्ष में निर्धारित समय पर घोषणा की अपेक्षा में टहलते रहे थे । इंदिरा जी कुछ द्विधा में थीं और उमाशंकर दीक्षित जी ने दिल्ली लौट कर उनका हौंसला बढ़ाया तब 25 जून 1975 की रात्रि में 2 या 3 बजे जाकर एमेर्जेंसी की घोषणा की गई। 26 जून 1975 को मैं अन्य साथी के साथ दिल्ली में था खुद अपनी आँखों से इंडियन एक्स्प्रेस के दफ्तर पर काले कपड़ों की  विरोध पट्टिका को मुख्य द्वार पर  देखा था । अखबार का मुख पृष्ठ केवल काले हाशिये के चौखटे के साथ छ्पा था उस पर कोई खबर नहीं थी। 

होटल मुगल, आगरा में हमारे एक साथी लखनऊ के थे जो वस्तुतः उमाशंकर दीक्षित जी के दामाद के छोटे भाई अर्थात शीला दीक्षित जी की नन्द के देवर थे उनके पास अघोषित/अप्रकाशित खबरों का खजाना था उसी की कुछ मुख्य बातों का उल्लेख किया है। शुरू-शुरू में वह सज्जन आगरा के तत्कालीन DM विनोद दीक्षित जी के साथ रहे थे बाद में ताजगंज में अलग कमरा ले लिया था। जब अलग रहने लगे थे तब जब भी शीला दीक्षित जी किसी राजनीतिक/सामाजिक कार्य से होटल आती थीं तो उन सज्जन को बुलवा कर नियमित मिलती रहती थीं। 
https://krantiswar.blogspot.com/2015/06/26-1975.html



~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, January 24, 2019

प्रियंका गांधी को खूब सोच-समझ कर ही निर्णय लेने होंगे ------ विजय राजबली माथुर

  
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BBC News Hindi

Published on Jan 23, 2019
कांग्रेस ने 2019 आम चुनाव से पहले प्रियंका गांधी को आधिकारिक तौर पर सियासी मैदान में उतार दिया है. कांग्रेस ने प्रियंका को पार्टी का महासचिव बनाया है और उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी दी है. प्रियंका गांधी ये ज़िम्मेदारी फ़रवरी 2019 के पहले हफ़्ते से संभालेंगी. राहुल गांधी ने मीडिया से बात करते हुए कहा, ''प्रियंका और ज्योतिरादित्य को यूपी दो महीने के लिए नहीं भेजा है. मैंने इस मिशन के साथ दोनों को यूपी भेजा है कि सबके विकास के लिए वो काम करें. ताकि यूपी के युवा को जो चाहिए वो दे सकें. मुझे काफी खुशी है कि मेरी बहन बहुत कर्मठ और सक्षम हैं. हम यूपी की जनता को कहना चाहते हैं कि आपने अब बहुत समय वक़्त ज़ाया किया है. अब आप बीजेपी को हटाइए. हम यूपी को नंबर-1 प्रदेश बनाएँगे.'' प्रियंका के चुनाव लड़ने पर राहुल गांधी ने कहा, ''ये उनके ऊपर है. हम कहीं भी बैकफुट पर नहीं खेलेंगे. जहां मौका मिलेगा हम फ्रंटफुट पर खेलेंगे.'' रॉबर्ट वाड्रा ने प्रियंका को बधाई दी.

BBC News Hindi
Published on Jan 24, 2019


प्रियंका गांधी को कांग्रेस ने महासचिव बनाकर आम चुनावों का बिगुल फूंक दिया है. उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का ज़िम्मा सौंपा गया है. इससे पहले वो सक्रिय राजनीति से दूर रहती थीं और अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के लिए आयोजित चुनावी रैलियों और सभाओं में हिस्सा लिया करती थीं. इन सभाओं में वो जब बोलती थीं तो अपने परिवार और जनता के बीच रिश्तों की बात किया करती थीं. साथ ही नरेंद्र मोदी पर भी हमला बोलने में हिचकती नहीं थी. आइए देखें कि अतीत में वो मोदी के बारे में क्या कहती आई हैं और आगे चलकर चुनावी सभाओं में कैसे सीन देखने को मिल सकते हैं  : 








 


जिस प्रकार किसी वनस्पति का बीज जब बोया जाता है तब अंकुरित होने के बाद वह धीरे-धीरे बढ़ता है तथा पुष्पवित, पल्लवित होते हुये फल भी प्रदान करता है। उसी प्रकार जितने और जो कर्म किए जाते हैं वे भी समयानुसार सुकर्म, दुष्कर्म व अकर्म भेद के अनुसार अपना फल प्रदान करते हैं। यह चाहे व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र में हों अथवा व्यवसायिक क्षेत्रों में। पालक, गन्ना और गेंहू एक साथ बोने पर भी भिन्न-भिन्न समय में फलित होते हैं। उसी प्रकार विभिन्न कर्म एक साथ सम्पन्न होने पर भी भिन्न-भिन्न समय में अपना फल देते हैं। 16 वीं लोकसभा चुनावों में भाजपा की सफलता का श्रेय RSS को है जिसको राजनीति में मजबूती देने का श्रेय इंदिरा जी व राजीव जी को जाता है। 

आज से 63  वर्ष  पूर्व  इन्दिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनी थीं । यदि  27 मई 1964 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का निधन होने  के तुरंत  बाद कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलज़ारी लाल नन्दा को  कांग्रेस अपना नेता चुन कर स्थाई प्रधानमंत्री बना देती तो कांग्रेस की स्थिति सुदृढ़ रहती किन्तु इन्दिरा जी पी एम नहीं बन पातीं। इसलिए समाजवाद के घोर विरोधी लाल बहादुर शास्त्री जी को पी एम पद से नवाजा गया था जिंनका 10/11 जनवरी 1966 को ताशकंद में निधन हो गया फिर कार्यावाहक पी एम तो नंदा जी ही बने किन्तु उनकी चारित्रिक दृढ़ता एवं ईमानदारी के चलते  उनको कांग्रेस संसदीय दल का नेता न बना कर इंदिराजी को पी एम बनाया गया। 1967 के चुनावों में उत्तर भारत के अनेक राज्यों में कांग्रेस की सरकारें न बन सकीं। केंद्र में मोरारजी देसाई से समझौता करके इंदिराजी पुनः पी एम बन गईं। अनेक राज्यों की गैर -कांग्रेसी सरकारों में 'जनसंघ ' की साझेदारी थी। उत्तर प्रदेश में प्रभु नारायण सिंह व राम स्वरूप वर्मा (संसोपा), रुस्तम सैटिन व झारखण्डे राय(कम्युनिस्ट ), प्रताप सिंह (प्रसोपा), पांडे  जी आदि (जनसंघ) सभी तो एक साथ मंत्री थे। बिहार में ठाकुर प्रसाद(जनसंघ ), कर्पूरी ठाकुर व रामानन्द तिवारी (संसोपा ) एक साथ मंत्री थे। मध्य प्रदेश में भी यही स्थिति थी। इन्दिरा जी की नीतियों से कांग्रेस को जो झटका लगा था उसका वास्तविक लाभ जनसंघ को हुआ था। जनसंघी मंत्रियों ने प्रत्येक राज्य में संघियों को सरकारी सेवा में लगवा दिया था जबकि सोशलिस्टों व कम्युनिस्टों ने ऐसा नहीं किया कि अपने कैडर को सरकारी सेवा में लगा देते। 


1974 में जब जय प्रकाश नारायण गुजरात के छात्र आंदोलन के माध्यम से पुनः राजनीति में आए तब संघ के नानाजी देशमुख आदि उनके साथ-साथ उसमें शामिल हो गए।


1977 में मोरारजी देसाई की जनता पार्टी की केंद्र सरकार में आडवाणी व बाजपेयी साहब जनसंघ  कोटे से  तो राजनारायन संसोपा कोटे से मंत्री थे। बलराज माधोक तो मोरारजी देसाई को 'आधुनिक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ' कहते थे। जनसंघी मंत्रियों ने सूचना व प्रसारण तथा विदेश विभाग में खूब संघी प्रविष्ट करा दिये थे।  


1977 में उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव (पूर्व राज्यपाल, मध्य प्रदेश) की जनता पार्टी सरकार में कल्याण सिंह(जनसंघ), मुलायम सिंह(संसोपा ) आदि सभी एक साथ मंत्री थे। पूर्व जनसंघ गुट के मंत्रियों ने संघियों को सरकारी सेवाओं में खूब एडजस्ट किया था। 

 1975 में संघ प्रमुख मधुकर दत्तात्रेय 'देवरस ' ने जेल से बाहर आने हेतु इंदिराजी से एक गुप्त समझौता किया कि भविष्य में संकट में फँसने पर वह इंदिराजी की सहायता करेंगे। और उन्होने अपना वचन निभाया 1980 में संघ का पूर्ण समर्थन इन्दिरा कांग्रेस को देकर जिससे इंदिराजी पुनः पी एम बन सकीं।परंतु इसी से प्रतिगामी नीतियों पर चलने की शुरुआत भी हो गई 'श्रम न्यायालयों ' में श्रमिकों के विरुद्ध व शोषक व्यापारियों /उद्योगपतियों के पक्ष में निर्णय घोषित करने की होड लग गई।इंदिराजी की हत्या के बाद 1984 में बने पी एम राजीव गांधी साहब भी अपनी माता जी की ही राह पर चलते हुये कुछ और कदम आगे बढ़ गए । अरुण नेहरू व अरुण सिंह की सलाह पर राजीव जी ने केंद्र सरकार को एक 'कारपोरेट संस्थान ' की भांति चलाना शुरू कर दिया था।आज आप को 2014 में बनी मोदी  सरकार कारपोरेट के हित में  दिख रही है तो यह उसी नीति का ही विस्तार है। 

 1989 में उन्होने सरदार पटेल द्वारा लगवाए विवादित बाबरी मस्जिद /राम मंदिर का ताला खुलवा दिया। बाद में वी पी सिंह की सरकार को बाहर से समर्थन देने के एवज में भाजपा ने स्वराज कौशल (सुषमा स्वराज जी के पति) जैसे लोगों को राज्यपाल जैसे पदों तक नियुक्त करवा लिया था। सरकारी सेवाओं में संघियों की अच्छी ख़ासी घुसपैठ करवा ली थी। 


आगरा पूर्वी विधान सभा क्षेत्र मे 1985 के परिणामों मे संघ से संबन्धित क्लर्क कालरा ने किस प्रकार भाजपा प्रत्याशी को जिताया  वह कमाल पराजित घोषित कांग्रेस प्रत्याशी सतीश चंद्र गुप्ता जी के  अलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती देने से उजागर हुआ। क्लर्क कालरा ने नीचे व ऊपर कमल निशान के पर्चे रख कर बीच में हाथ का पंजा वाले पर्चे छिपा कर गिनती की थी जो जजों की निगरानी में हुई पुनः गणना में पकड़ी गई। भाजपा के सत्य प्रकाश 'विकल ' का चुनाव अवैध  घोषित करके सतीश चंद्र जी को निर्वाचित घोषित किया गया। 

ऐसे सरकारी संघियों के बल पर 1991 में उत्तर-प्रदेश आदि कई राज्यों में भाजपा की बहुमत सरकारें बन गई थीं।1992 में कल्याण सिंह के नेतृत्व की सरकार ने बाबरी मस्जिद ध्वंस करा दी और देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए। 1998 से 2004 के बीच रही बाजपेयी साहब की सरकार में पुलिस व सेना में भी संघी विचार धारा के लोगों को प्रवेश दिया गया। 

2011 में सोनिया जी के विदेश में इलाज कराने जाने के वक्त से डॉ मनमोहन सिंह जी हज़ारे / केजरीवाल के माध्यम से संघ से संबंध स्थापित किए हुये थे जिसके परिणाम स्वरूप 2014 के चुनावों में सरकारी अधिकारियों / कर्मचारियों ने भी परिणाम प्रभावित करने में अपनी भूमिका अदा की है :





1967,1975 ,1980,1989 में लिए गए इन्दिरा जी व राजीव जी के निर्णयों ने 2014 में भाजपा को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में RSS की भरपूर मदद की है। प्रियंका गांधी वाडरा, राहुल गांधी अथवा जो भी भाजपा विरोधी लोग राजनीति में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं उनको खूब सोच-समझ कर ही निर्णय आज लेने होंगे जिनके परिणाम आगामी समय में ही मिलेंगे। 'धैर्य',संयम,साहस के बगैर लिए गए निर्णय प्रतिकूल फल भी दिलवा सकते हैं।  


~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, November 19, 2017

इंदिराजी की जल्दबाजी और अदूरदर्शी चूकों पर भी गौर कर लिया जाये ------ विजय राजबली माथुर

****** इंदिराजी के जन्मदिन पर   आज  उनको याद करने,नमन करने और उनकी प्रशंसा के गीत गाने के साथ-साथ ज़रा उनकी जल्दबाजी और अदूरदर्शी चूकों पर भी गौर कर लिया जाये और उनसे बचने का मार्ग ढूँढना शुरू किया जाये तो देशहित में होगा व इंदिराजी को भी सच्ची श्रद्धांजली होगी।****** 




 
इतिहासकार सत्य का अन्वेषक होता है उसकी पैनी निगाहें भूतकाल के अंतराल में प्रविष्ट होकर ' तथ्य के मोतियों ' को सामने लाती हैं । इन्दिरा जी का कार्यकाल इतना भी भूतकाल नहीं है जो उसको ज्ञात करने के लिए किसी विशेष अनुसंधान की आवश्यकता पड़े। खेद की बात है कि, प्रोफेसर मृदुला मुखर्जी साहिबा ने इन्दिरा जी के कार्यकाल के प्रथम भाग के आधार पर उनका चित्रण किया है जबकि, उनके कार्यकाल के दिवतीय भाग के अलग आचरण की अवहेलना नज़र आती है। दो वर्ष पूर्व प्रकाशित अपने एक लेख का ज़िक्र इस अवसर पर पुनः  करना अपना दायित्व समझता हूँ ------
इन्दिरा गांधी का वर्तमान केंद्र सरकार के निर्माण में योगदान  : 
VIJAI RAJBALI MATHUR·THURSDAY, NOVEMBER 19, 2015

1966 में लाल बहादुर शास्त्री जी के असामयिक निधन के बाद सिंडीकेट (के कामराज नाडार, अतुल घोष, सदाशिव कान्होजी पाटिल, एस निज लिंगप्पा, मोरारजी देसाई ) की ओर से मोरारजी देसाई कांग्रेस संसदीय दल के नेता पद के प्रत्याशी थे जबकि कार्यवाहक प्रधानमंत्री नंदा जी  व अन्य नेता गण की ओर से इंदिरा जी । अंततः इन्दिरा जी का चयन गूंगी गुड़िया समझ कर हुआ था और वह प्रधानमंत्री बन गईं थीं। 1967 के आम चुनावों में उत्तर भारत के राज्यों में कांग्रेस का पराभव हो गया व संविद सरकारों का गठन हुआ। पश्चिम बंगाल में अजोय मुखर्जी (बांग्ला कांग्रेस ),बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा (जन क्रांति दल ),उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह (जन कांग्रेस - चन्द्र् भानु  गुप्त के विरुद्ध बगावत करके ) , मध्य प्रदेश में गोविंद नारायण सिंह (द्वारिका प्रसाद मिश्र के विरुद्ध बगावत करके ) मुख्यमंत्री बने ये सभी कांग्रेस छोड़ कर हटे थे। केंद्र में फिर से मोरारजी देसाई ने इंदिरा जी को टक्कर दी थी लेकिन उन्होने उनसे समझौता करके उप-प्रधानमंत्री बना दिया था। 1969 में 111 सांसदों के जरिये सिंडीकेट ने कांग्रेस (ओ ) बना कर इन्दिरा जी को झकझोर दिया लेकिन उन्होने वामपंथ के सहारे से सरकार बचा ली। 1971 में बांगला देश निर्माण में सहायता करने से उनको जो लोकप्रियता हासिल हुई थी उसको भुनाने से 1972 में उनको स्पष्ट बहुमत मिल गया किन्तु 1975 में एमर्जेंसी के दौरान हुये अत्याचारों ने 1977 में उनको करारी शिकस्त दिलवाई। मोरारजी प्रधानमंत्री बन गए और उनके विदेशमंत्री ए बी बाजपेयी व सूचना प्रसारण मंत्री एल के आडवाणी। इन दोनों ने संघियों को प्रशासन में ठूंस डाला। इसके अतिरिक्त गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह के पीछे ए बी बाजपेयी,पी एम मोरारजी के पीछे सुब्रमनियम स्वामी तथा जपा अध्यक्ष चंद्रशेखर के पीछे नानाजी देशमुख छाया की तरह लगे रहे और प्रशासन को संघी छाप देते चले। संघ की दुरभि संधि के चलते मोरारजी व चरण सिंह में टकराव हुआ और इंदिराजी के समर्थन से चरण सिंह पी एम बन गए। 

एमर्जेंसी के दौरान हुये मधुकर दत्तात्रेय 'देवरस'- इन्दिरा (गुप्त ) समझौते  को आगे बढ़ाते हुये चरण सिंह सरकार गिरा दी गई और 1980 में संघ के पूर्ण समर्थन से इन्दिरा जी की सत्ता में वापसी हुई। अब संघ के पास (पहले की तरह केवल जनसंघ ही नहीं था ) भाजपा के अलावा जपा और इन्दिरा कांग्रेस भी थी। संघ के इशारे पर केंद्र में सरकारें बनाई व गिराई जाने लगीं। सांसदों पर उद्योपातियों का शिकंजा कसता चला गया। 1996 में 13 दिन, 1998 में 13 माह फिर 1999 में पाँच वर्ष ए बी बाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र सरकार का भरपूर संघीकरण हुआ। 2004 से 2014 तक कहने को तो मनमोहन सिंह कांग्रेसी पी एम रहे किन्तु संघ के एजेंडा पर चलते रहे। 1991 में जब वह  वित्तमंत्री बन कर ‘उदारीकरण ‘ लाये थे तब यू एस ए जाकर आडवाणी साहब ने उसे उनकी नीतियों को चुराया जाना बताया था। स्पष्ट है कि वे नीतियाँ संघ व यू एस ए समर्थक थीं। जब सोनिया जी ने प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बना कर मनमोहन जी को राष्ट्रपति बनाना चाहा  था तब तक वह हज़ारे /रामदेव/केजरीवाल आंदोलन खड़ा करवा चुके थे। 2014 के चुनावों में 100 से अधिक कांग्रेसी मनमोहन जी के आशीर्वाद से भाजपा सांसद बन कर वर्तमान केंद्र सरकार के निर्माण में सहायक बने हैं। 

यदि इंदिरा जी ने 1975 में  'देवरस'से समझौता  नहीं किया होता व 1980 में संघ के समर्थन से चुनाव न जीता होता तब 1984 में राजीव जी भी संघ का समर्थन प्राप्त कर बहुमत हासिल नहीं करते। विभिन्न दलों में भी संघ की खुफिया घुसपैठ न हुई होती। 

इंदिराजी के जन्मदिन पर   आज  उनको याद करने,नमन करने और उनकी प्रशंसा के गीत गाने के साथ-साथ ज़रा उनकी जल्दबाजी और अदूरदर्शी चूकों पर भी गौर कर लिया जाये और उनसे बचने का मार्ग ढूँढना शुरू किया जाये तो देशहित में होगा व इंदिराजी को भी सच्ची श्रद्धांजली होगी। 
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प्रोफेसर मृदुला मुखर्जी साहिबा ने इस तथ्य को भी नहीं इंगित किया है कि, 1977 के  चुनावों में पराजित होने के बाद इंदिराजी भयभीत हो गईं थीं और उनको पुनः सत्ता वापिसी की उम्मीद नहीं थी इसलिए मोरारजी देसाई की सरकार को परेशान करने हेतु पंजाब में भिंडरावाला के माध्यम से खालिस्तान आंदोलन खड़ा करवाया था उनके सम्मेलन में भाग लेने अपने पुत्र संजय गांधी को भी भेजा था। परंतु संजय के प्रयासों से  1980 में पुनः सत्तासीन होने और फिर संजय के निधन के बाद वह चाह कर भी इस आंदोलन को ठंडा नहीं कर पाईं और अपने दूसरे पुत्र राजीव गांधी से भिंडरावाला को 'इस सदी के महान संत ' का खिताब दिलवाने के बावजूद भी उनके राज़ी न होने पर जून 1984 में सैनिक कारवाई के जरिये भिंडरावाला को खत्म किया गया जिसकी प्रतिक्रिया में उसी वर्ष अक्तूबर में उनकी हत्या हुई और जिसके बाद  देशव्यापी सिख विरोधी दंगे हुये। ये गतिविधियेँ निश्चित तौर पर ' सांप्रदायिक ' ही थीं। 
(होने जा रहे गुजरात के इन चुनावों में इन्दिरा जी के पौत्र और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जिस साफ्ट हिन्दुत्व का सहारा ले रहे हैं उसके पीछे भी आर एस एस से प्रभावित वहाँ की जनता और उस संगठन की सहानुभूति प्राप्त करना ही है। यदि वहाँ कांग्रेस सरकार गठित होती है तो 1980 व 1984 की भांति उसके पीछे आर एस एस का समर्थन ही होगा जो मोदी को नियंत्रित करने की उसकी एक चाल मात्र ही होगी। )
~विजय राजबली माथुर ©
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Thursday, November 19, 2015

इन्दिरा गांधी का वर्तमान केंद्र सरकार के निर्माण में योगदान ------ विजय राजबली माथुर


इन्दिरा गांधी का वर्तमान केंद्र सरकार के निर्माण में योगदान
1966 में लाल बहादुर शास्त्री जी के असामयिक निधन के बाद सिंडीकेट (के कामराज नाडार, अतुल घोष, सदाशिव कान्होजी पाटिल, एस निज लिंगप्पा, मोरारजी देसाई ) की ओर से मोरारजी देसाई कांग्रेस संसदीय दल के नेता पद के प्रत्याशी थे जबकि कार्यवाहक प्रधानमंत्री नंदा जी व अन्य नेता गण की ओर से इंदिरा जी । अंततः इन्दिरा जी का चयन गूंगी गुड़िया समझ कर हुआ था और वह प्रधानमंत्री बन गईं थीं। 1967 के आम चुनावों में उत्तर भारत के राज्यों में कांग्रेस का पराभव हो गया व संविद सरकारों का गठन हुआ। पश्चिम बंगाल में अजोय मुखर्जी (बांग्ला कांग्रेस ),बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा (जन क्रांति दल ),उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह (जन कांग्रेस - चन्द्र् भानु गुप्त के विरुद्ध बगावत करके ) , मध्य प्रदेश में गोविंद नारायण सिंह (द्वारिका प्रसाद मिश्र के विरुद्ध बगावत करके ) मुख्यमंत्री बने ये सभी कांग्रेस छोड़ कर हटे थे। केंद्र में फिर से मोरारजी देसाई ने इंदिरा जी को टक्कर दी थी लेकिन उन्होने उनसे समझौता करके उप-प्रधानमंत्री बना दिया था। 1969 में 111 सांसदों के जरिये सिंडीकेट ने कांग्रेस (ओ ) बना कर इन्दिरा जी को झकझोर दिया लेकिन उन्होने वामपंथ के सहारे से सरकार बचा ली। 1971 में बांगला देश निर्माण में सहायता करने से उनको जो लोकप्रियता हासिल हुई थी उसको भुनाने से 1972 में उनको स्पष्ट बहुमत मिल गया किन्तु 1975 में एमर्जेंसी के दौरान हुये अत्याचारों ने 1977 में उनको करारी शिकस्त दिलवाई। मोरारजी प्रधानमंत्री बन गए और उनके विदेशमंत्री ए बी बाजपेयी व सूचना प्रसारण मंत्री एल के आडवाणी। इन दोनों ने संघियों को प्रशासन में ठूंस डाला। इसके अतिरिक्त गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह के पीछे ए बी बाजपेयी,पी एम मोरारजी के पीछे सुब्रमनियम स्वामी तथा जपा अध्यक्ष चंद्रशेखर के पीछे नानाजी देशमुख छाया की तरह लगे रहे और प्रशासन को संघी छाप देते चले। संघ की दुरभि संधि के चलते मोरारजी व चरण सिंह में टकराव हुआ और इंदिराजी के समर्थन से चरण सिंह पी एम बन गए।
एमर्जेंसी के दौरान हुये मधुकर दत्तात्रेय 'देवरस'- इन्दिरा (गुप्त ) समझौते को आगे बढ़ाते हुये चरण सिंह सरकार गिरा दी गई और 1980 में संघ के पूर्ण समर्थन से इन्दिरा जी की सत्ता में वापसी हुई। अब संघ के पास (पहले की तरह केवल जनसंघ ही नहीं था ) भाजपा के अलावा जपा और इन्दिरा कांग्रेस भी थी। संघ के इशारे पर केंद्र में सरकारें बनाई व गिराई जाने लगीं। सांसदों पर उद्योपातियों का शिकंजा कसता चला गया। 1996 में 13 दिन, 1998 में 13 माह फिर 1999 में पाँच वर्ष ए बी बाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र सरकार का भरपूर संघीकरण हुआ। 2004 से 2014 तक कहने को तो मनमोहन सिंह कांग्रेसी पी एम रहे किन्तु संघ के एजेंडा पर चलते रहे। 1991 में जब वह वित्तमंत्री बन कर ‘उदारीकरण ‘ लाये थे तब यू एस ए जाकर आडवाणी साहब ने उसे उनकी नीतियों को चुराया जाना बताया था। स्पष्ट है कि वे नीतियाँ संघ व यू एस ए समर्थक थीं। जब सोनिया जी ने प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बना कर मनमोहन जी को राष्ट्रपति बनाना चाहा था तब तक वह हज़ारे /रामदेव/केजरीवाल आंदोलन खड़ा करवा चुके थे। 2014 के चुनावों में 100 से अधिक कांग्रेसी मनमोहन जी के आशीर्वाद से भाजपा सांसद बन कर वर्तमान केंद्र सरकार के निर्माण में सहायक बने हैं।
यदि इंदिरा जी ने 1975 में  'देवरस'से समझौता नहीं किया होता व 1980 में संघ के समर्थन से चुनाव न जीता होता तब 1984 में राजीव जी भी संघ का समर्थन प्राप्त कर बहुमत हासिल नहीं करते। विभिन्न दलों में भी संघ की खुफिया घुसपैठ न हुई होती।
इंदिराजी के जन्मदिन पर आज उनको याद करने,नमन करने और उनकी प्रशंसा के गीत गाने के साथ-साथ ज़रा उनकी जल्दबाजी और अदूरदर्शी चूकों पर भी गौर कर लिया जाये और उनसे बचने का मार्ग ढूँढना शुरू किया जाये तो देशहित में होगा व इंदिराजी को भी सच्ची श्रद्धांजली होगी।
 ~विजय राजबली माथुर ©
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Tuesday, May 26, 2015

'संसदीय लोकतन्त्र' को बचाने के मजबूत प्रयास न हुये तो --------- विजय राजबली माथुर


सोनिया जी के इस मार्च की तुलना इन्दिरा जी से :
जबकि BBC द्वारा सोनिया जी के इस मार्च की तुलना इन्दिरा जी की 1978 की घटना से करने का प्रयास किया गया है परंतु वस्तुतः यह ऐसा है नहीं। जब 2009 में मनमोहन जी दोबारा पी एम बनने के लिए अड़ गए तो उनको बनाया तो गया था लेकिन बीच में उनको राष्ट्रपति बनवा कर हटाने का प्रयत्न हुआ था जिसको प्रेस में ममता बनर्जी द्वारा लीक करने से वह प्रयास विफल हो गया था। तब हवाई जहाज़ में जापान से लौटते वक्त मनमोहन जी ने कह दिया था कि वह जहां हैं वहीं ठीक हैं बल्कि तीसरे कार्यकाल के लिए भी तैयार हैं। इस घटना से पूर्व ही 2011 में सोनिया जी के इलाज के वास्ते विदेश जाने पर मनमोहन जी ने RSS/हज़ारे/केजरीवाल/रामदेव के सहयोग से 'कारपोरेट भ्रष्टाचार संरक्षण' का आंदोलन खड़ा करवा दिया था जिसके परिणाम के रूप में मोदी सरकार सत्तारूढ़ है। पूर्व पी एम नरसिंघा राव जी ने अपने उपन्यास THE INSIDER के जरिये खुलासा कर दिया था कि 'हम स्वतन्त्रता के भ्रमजाल में जी रहे हैं'। मनमोहन जी उनके प्रिय शिष्य रहे हैं और वही उनको वित्तमंत्री के रूप में राजनीति में लाये थे। उस वक्त यू एस ए जाकर एल के आडवाणी साहब ने कहा था कि मनमोहन जी ने उनकी (भाजपा की ) नीतियाँ चुरा ली हैं। अब तो सीधे-सीधे भाजपा का ही शासन है। मनमोहन जी के जरिये भाजपा को सत्तारूढ़ कराने के बाद उनकी कोई उपयोगिता नहीं रह गई है इसलिए उनके विरुद्ध अदालती कारवाई हो रही है जिसमें राजनीतिक रूप से कुछ किया जाना संभव नहीं होगा। 'जैसी करनी वैसी भरनी' का दृष्टांत है यह परिघटना। सोनिया जी के कदम अंततः उनकी पार्टी को ही क्षति पहुंचाएंगे जैसा कि यू एस ए प्रवास के दौरान जस्टिस काटजू साहब के अभियान से संकेत मिलते हैं। काटजू साहब को 'मूल निवासी' आंदोलन व वामपंथी रुझान के दलित वर्ग से संबन्धित नेताओं व विद्वानों का भी समर्थन है जो एक प्रकार से 'गोडसेवाद' को ही समर्थन करना हुआ। भाजपा/RSS विरोधी गफलत में भटके हुये चल रहे हैं और देश दक्षिण-पंथी अर्द्ध-सैनिक तानाशाही की ओर बढ़ रहा है यदि अभी भी 'संसदीय लोकतन्त्र' को बचाने के मजबूत प्रयास न हुये तो दिल्ली की सड़कों पर निकट भविष्य में ही 'रक्त-रंजित' संघर्ष की संभावनाएं हकीकत में बदलते देर न लगेगी।
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13 मार्च 2015 के इस नोट को 'हस्तक्षेप' द्वारा भी स्थान दिया गया है:
http://www.hastakshep.com/ 



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जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने गांधी के इस जादू को समझने की जगह घटनाओं की बड़ी थोथी और स्थूल व्याख्या कर उन पर वे आरोप लगा दिए जो किसी ने नहीं लगाए थे. किसी ने उन्हें कभी ब्रिटिश एजेंट नहीं माना और न ही हिंदू-मुस्लिम समुदायों में दरार डालने वाला. काटजू अगर यहां तक सोच पाए तो इसलिए कि शायद उनकी सोच का दायरा यहीं तक जाता है. धार्मिकता और सांप्रदायिकता में फ़र्क होता है, यह बात वे समझ ही नहीं पाए. जो बहुत पढ़े-लिखे और बिल्कुल आधुनिक लोग थे – मोहम्मद अली जिन्ना और लियाकत ख़ान जैसे – वे अपनी राजनीति में निहायत सांप्रदायिक रहे और जो टोपी-दाढ़ी वाले मौलाना बंधु थे, वे धर्मनिरपेक्ष और कांग्रेसी बने रहे.--------   
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/847603305301647?pnref=story 

 ~विजय राजबली माथुर ©
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Tuesday, May 27, 2014

प्रियंका-राहुल को राजनीति में रहना है तो समझ लें उनके पिता व दादी के कृत्यों का प्रतिफल है नई सरकार का सत्तारोहण ---विजय राजबली माथुर

नेहरू जी की 51वीं पुण्य तिथि पर विशेष :
जिस प्रकार किसी वनस्पति का बीज जब बोया जाता है तब अंकुरित होने के बाद वह धीरे-धीरे बढ़ता है तथा पुष्पवित,पल्लवित होते हुये फल भी प्रदान करता है। उसी प्रकार जितने और जो कर्म किए जाते हैं वे भी समयानुसार सुकर्म,दुष्कर्म व अकर्म भेद के अनुसार अपना फल प्रदान करते हैं। यह चाहे व्यक्तिगत,पारिवारिक,सामाजिक,राजनीतिक क्षेत्र में हों अथवा व्यवसायिक क्षेत्रों में। पालक,गन्ना और गेंहू एक साथ बोने पर भी भिन्न-भिन्न समय में फलित होते हैं। उसी प्रकार विभिन्न कर्म एक साथ सम्पन्न होने पर भी भिन्न-भिन्न समय में अपना फल देते हैं। 16 वीं लोकसभा चुनावों में भाजपा की सफलता का श्रेय RSS को है जिसको राजनीति में मजबूती देने का श्रेय इंदिरा जी व राजीव जी को जाता है। 

आज से 50 वर्ष पूर्व 27 मई 1964 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का निधन हुआ था। कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलज़ारी लाल नन्दा को यदि कांग्रेस अपना नेता चुन कर स्थाई प्रधानमंत्री बना देती तो कांग्रेस की स्थिति सुदृढ़ रहती किन्तु इन्दिरा जी पी एम नहीं बन पातीं। इसलिए समाजवाद के घोर विरोधी लाल बहादुर शास्त्री जी को पी एम पद से नवाजा गया था जिंनका 10/11 जनवरी 1966 को ताशकंद में निधन हो गया फिर कार्यावाहक पी एम तो नंदा जी ही बने किन्तु उनकी चारित्रिक दृढ़ता एवं ईमानदारी के चलते  उनको कांग्रेस संसदीय दल का नेता न बना कर इंदिराजी को पी एम बनाया गया। 1967 के चुनावों में उत्तर भारत के अनेक राज्यों में कांग्रेस की सरकारें न बन सकीं। केंद्र में मोरारजी देसाई से समझौता करके इंदिराजी पुनः पी एम बन गईं। अनेक राज्यों की गैर-कांग्रेसी सरकारों में 'जनसंघ' की साझेदारी थी। उत्तर प्रदेश में प्रभु नारायण सिंह व राम स्वरूप वर्मा (संसोपा) ,रुस्तम सैटिन व झारखण्डे राय(कम्युनिस्ट ),प्रताप सिंह (प्रसोपा),पांडे  जी आदि (जनसंघ) सभी तो एक साथ मंत्री थे। बिहार में ठाकुर प्रसाद(जनसंघ ),कर्पूरी ठाकुर व रामानन्द तिवारी (संसोपा ) एक साथ मंत्री थे। मध्य प्रदेश में भी यही स्थिति थी। इन्दिरा जी की नीतियों से कांग्रेस को जो झटका लगा था उसका वास्तविक लाभ जनसंघ को हुआ था। जनसंघी मंत्रियों ने प्रत्येक राज्य में संघियों को सरकारी सेवा में लगवा दिया था जबकि सोशलिस्टों व कम्युनिस्टों ने ऐसा नहीं किया कि अपने कैडर को सरकारी सेवा में लगा देते। 

1974 में जब जय प्रकाश नारायण गुजरात के छात्र आंदोलन के माध्यम से पुनः राजनीति में आए तब संघ के नानाजी देशमुख आदि उनके साथ-साथ उसमें शामिल हो गए।

1977 में मोरारजी देसाई की जनता पार्टी की केंद्र सरकार में आडवाणी व बाजपेयी साहब जनसंघ  कोटे से  तो राजनारायन संसोपा कोटे से मंत्री थे। बलराज माधोक तो मोरारजी देसाई को 'आधुनिक श्यामा प्रसाद मुखर्जी' कहते थे। जनसंघी मंत्रियों ने सूचना व प्रसारण तथा विदेश विभाग में खूब संघी प्रविष्ट करा दिये थे। 

1977 में उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव (वर्तमान राज्यपाल-मध्य प्रदेश) की जनता पार्टी सरकार में कल्याण सिंह(जनसंघ),मुलायम सिंह(संसोपा ) आदि सभी एक साथ मंत्री थे। पूर्व जनसंघ गुट के मंत्रियों ने संघियों को सरकारी सेवाओं में खूब एडजस्ट किया था।
 1975 में संघ प्रमुख मधुकर दत्तात्रेय 'देवरस' ने जेल से बाहर आने हेतु इंदिराजी से एक गुप्त समझौता किया कि भविष्य में संकट में फँसने पर वह इंदिराजी की सहायता करेंगे। और उन्होने अपना वचन निभाया 1980 में संघ का पूर्ण समर्थन इन्दिरा कांग्रेस को देकर जिससे इंदिराजी पुनः पी एम बन सकीं।परंतु इसी से प्रतिगामी नीतियों पर चलने की शुरुआत भी हो गई 'श्रम न्यायालयों' में श्रमिकों के विरुद्ध व शोषक व्यापारियों /उद्योगपतियों के पक्ष में निर्णय घोषित करने की होड लग गई।इंदिराजी की हत्या के बाद 1984 में बने पी एम राजीव गांधी साहब भी अपनी माता जी की ही राह पर चलते हुये कुछ और कदम आगे बढ़ गए । अरुण नेहरू व अरुण सिंह की सलाह पर राजीव जी ने केंद्र सरकार को एक 'कारपोरेट संस्थान' की भांति चलाना शुरू कर दिया था।आज 2014 में नई सरकार कारपोरेट के हित में जाती दिख रही है तो यह उसी नीति का ही विस्तार है। 

 1989 में उन्होने सरदार पटेल द्वारा लगवाए विवादित बाबरी मस्जिद/राम मंदिर का ताला खुलवा दिया। बाद में वी पी सिंह की सरकार को बाहर से समर्थन देने के एवज में भाजपा ने स्वराज कौशल (सुषमा स्वराज जी के पति) जैसे लोगों को राज्यपाल जैसे पदों तक नियुक्त करवा लिया था। सरकारी सेवाओं में संघियों की अच्छी ख़ासी घुसपैठ करवा ली थी। 

आगरा पूर्वी विधान सभा क्षेत्र मे 1985 के परिणामों मे संघ से संबन्धित क्लर्क कालरा ने किस प्रकार भाजपा प्रत्याशी को जिताया  वह कमाल पराजित घोषित कांग्रेस प्रत्याशी सतीश चंद्र गुप्ता जी के  अलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती देने से उजागर हुआ। क्लर्क कालरा ने नीचे व ऊपर कमल निशान के पर्चे रख कर बीच में हाथ का पंजा वाले पर्चे छिपा कर गिनती की थी जो जजों की निगरानी में हुई पुनः गणना में पकड़ी गई। भाजपा के सत्य प्रकाश'विकल' का चुनाव अवैध  घोषित करके सतीश चंद्र जी को निर्वाचित घोषित किया गया। 
ऐसे सरकारी संघियों के बल पर 1991 में उत्तर-प्रदेश आदि कई राज्यों में भाजपा की बहुमत सरकारें बन गई थीं।1992 में कल्याण सिंह के नेतृत्व की सरकार ने बाबरी मस्जिद ध्वंस करा दी और देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए। 1998 से 2004 के बीच रही बाजपेयी साहब की सरकार में पुलिस व सेना में भी संघी विचार धारा के लोगों को प्रवेश दिया गया। 

2011 में सोनिया जी के विदेश में इलाज कराने जाने के वक्त से डॉ मनमोहन सिंह जी हज़ारे/केजरीवाल के माध्यम से संघ से संबंध स्थापित किए हुये थे जिसके परिणाम स्वरूप 2014 के चुनावों में सरकारी अधिकारियों/कर्मचारियों ने भी परिणाम प्रभावित करने में अपनी भूमिका अदा की है :




 1967,1975 ,1980,1989 में लिए गए इन्दिरा जी व राजीव जी के निर्णयों ने 2014 में भाजपा को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में RSS की भरपूर मदद की है। प्रियंका गांधी वाडरा,राहुल गांधी अथवा जो भी भाजपा विरोधी लोग राजनीति में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं उनको खूब सोच-समझ कर ही निर्णय आज लेने होंगे जिनके परिणाम आगामी समय में ही मिलेंगे। 'धैर्य',संयम,साहस के बगैर लिए गए निर्णय प्रतिकूल फल भी दिलवा सकते हैं। 



  ~विजय राजबली माथुर ©
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