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Friday, November 14, 2014

बाल दिवस तो मनाते हैं पर बच्चो की परवाह नहीं करते---विजय राजबली माथुर



Hindustan-Lucknow-12/10/2011





उपरोक्त स्कैन से स्पष्ट हो जाएगा कि भीड़-भरी ,प्रदेश की राजधानी की सड़क पर गिरी साहब के बेटे का दर्दनाक एक्सीडेंट हुआ जिसमे उसे अपनी जान गवानी पड़ी। अपराधी को गिरफ्त मे लाने हेतु उन्हे खुद किस प्रकार जनता की गुहार करनी पड़ी और किसी भी प्रत्यक्ष-दर्शी  का सहयोग न मिला। पुलिस तो अपनी ड्यूटी कभी भी पूरी करती ही नहीं है। मैंने एक लेख-'युवाओ जीवन अनमोल है इसकी रक्षा करो' शीर्षक से इसी हादसे को इंगित करते हुये इसी ब्लाग मे दिया था और यात्रा के दौरान सुरक्षा हेतु 'सप्तजीवी स्तुति' भी प्रस्तुत की थी।
किन्तु लगता है ब्लागर्स बंधु इन स्तुतियों से लाभ उठाना नहीं चाहते क्योंकि बेंगलोर के एक इंजीनियर ब्लागर साहब के सुझाव पर मैंने 'जन हित मे' शीर्षक से एक ब्लाग प्रारम्भ किया है जिसमे जीवनोपयोगी स्तुतिया जो प्राचीन ऋषि-मुनियो द्वारा रचित है अपनी आवाज मे देता जा रहा हू ,परंतु ब्लागर्स उनकी उपेक्षा कर रहे हैं।

इस एक्सीडेंट के बाद वाराणासी मे एक और छात्र का बाईक से एक्सीडेंट हुआ कामा मे रहने के बाद उसका भी निधन हो गया। वह छात्र हमारे एक क्लाइंट जो यू पी सेक्रेटेरिएट मे अधिकारी हैं का भांजा था मैंने उनके द्वारा 'सप्तजीवी स्तुति' इन्टरनेट के माध्यम से भिजवाई थी परंतु उससे पूर्व ही उसने संसार छोड़ दिया। जब युवा इस प्रकार समाज से उऋण हुये ही संसार छोड़ देते हैं तो वह स्थिति संसार के लिए उत्तम नहीं है। परंतु हमारे देश मे ढोंग -पाखंड और पोंगा-पंडितवाद इतना प्रबल है कि लोगोंकों सच्चाई स्वीकार नहीं होती।

फिर भी अपना कर्तव्य समझ कर मै प्रयास करता रहता हूँ कि शायद जैसे रस्सी की रगड़ से कुएं की घिर्री और मन  तक घिस जाती है कभे-न-कभी मानव मन भी घिसे और सत्य को स्वीकार कर सन्मार्ग पर चल कर अपना तथा समाज का भला कर सके।

आज 'बाल-दिवस' पर मै कुछ बालको (लड़का-लड़की दोनों) के हित की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहा हू जो ' नित्य कर्म विधि' पुस्तक से साभार ली गई हैं। 'आर्य कुमार गीतांजली' शीर्षक से तीन गीत 'तपोभूमि',मथुरा के संपादक प्रेम भिक्षुक वानप्रस्थ जी ने प्रस्तुत किए हैं ,उन्हे ही उद्धृत किया जा रहा है-


 (1)

बाल विनय

हे प्रभी! आनंद-दाता  ज्ञान हमको दीजिये।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये। ।
लीजिये हमको शरण मे,हम सदाचारी बने।
ब्रह्मचारी धर्म-रक्षक ,वीर व्रतधारी बने। ।
कार्य जो हमने उठाए आपकी ही आस से ।
 ऐसी कृपा करिए प्रभों!सब पूर्ण होवे दास से। ।


धर्म-रक्षक=वह नही है जैसा पुरोहितवादी बताते हैं। बल्कि इसका अभिप्राय 'धारण करने' से है। उसके बाद-

(2)


 तब वन्दन हे नाथ करे हम ।


तब चरणों की छाया पाकर,शीतल सुख उपभोग करे हम। ।
भारत माता की सेवा का  व्रत भारी हे नाथ!करे हम।
माँ के हित की रक्षा के हित न्योछावर निज प्राण करे हम। ।
पाप-शैल को तोड़ गिरावे वेदाज्ञा निज शीश धरे हम।
राग-द्वेष को दूर हटा कर प्रेम-मंत्र का जाप करे हम । ।
फूले दयानंद फुलवारी विद्द्या-मधु का पान करे हम।
प्रातः साँय तुझको ध्यावे तेरा ही गुणगानकरे हम। ।


अब देखिये गलत  उपासना पद्धतियों ने टकराव और द्वेष को धर्म के नाम पर भड़का रखा है और भारत-माता की चिंता कहाँ और कैसे हो आजकल तो अपने माता-पिता की ही चिंता नहीं हो रही है। पहले तो बालक भगवान से क्या प्रार्थना करते थे ज़रा गौर फरमाये-

(3)


हम बालकों की ओर भी भगवान तेरा ध्यान हो ।


हो दूर सारी मूर्खता कलयांणकारी ज्ञान हो। ।
हम ब्रह्मचारी,वीर,व्रतधारी,सदाचारी बने।
हमको हमारे देश भारत पर सदा अभिमान हो। ।
होकर बड़े कुछ कर दिखाने के लिए तैयार हो।
मन मे हमारे देश सेवा का भरा अरमान हो। ।
हो नौजवानो की कभी जो मांग प्यारे देश को।
तो मातृवेदी पर प्रथम रखा हमारा प्राण हो । ।
संसार का शिरमौर होकर 'देश' हमसे कह सके-
हे वीर बालक!धन्य तुम मेरे सफल संतान हो। ।

पहले हमारे देशवासी ऐसी शिक्षा अपनी-अपनी संतानों को दिलवाते थे और आज -माता -पिता अपने बच्चों को भूत-प्रेतों के मेले मे घुमाते हैं। मंहगी और ढकोसले वाली शिक्षा ग्रहण कराते है फिर अपने व देश के लिए उनसे बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ रखते हैं। भला बच्चों का क्या दोष वे कहाँ से और कैसे इन अपेक्षाओं को पूरा करे? जबकि उनके अभिभावकों ने उन्हे उचित शिक्षा से खुद ही वंचित रखा है। सरकार ने शिक्षा बजट को बेहद कम करके बाजारू बना दिया है। यदि समय रहते देशवासी नहीं चेते तो, देश के भावी कर्ण धार आज के बालक आने वाले समय मे आज की पीढ़ी को जम कर कोसेंगे।

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