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Tuesday, November 22, 2022
Tuesday, June 30, 2020
मोदी मनमोहन गठबंधन और अमेरिका ------ कुमुद सिंह
30-06-2020
मनमोहन की गद्दारी देश 100 साल बाद समझेगा
नेहरू ने जैसे जमींनदारी हस्तानांतरण कर रैयतों को मूर्ख बनाया, वैसे ही मनमोहन ने उपभोक्ता को गदहा बनाया है। नेहरू की बात छोडिये, वो मरे उनकी नीति मरी और वो समाज भी मर चुका है। बात करते हैं मनमोहन की।
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पाकिस्तान में जन्मा और इंग्लैंड में पढा यह आदमी विश्व बैंक और अमेरिका का घोषित एजेंट रहा है। पहले ललित बाबू, फिर प्रणब दा, फिर नरसिम्हा राव और अंत में सोनिया गांधी इसके टारगेट लीडर हुए। इस सूची से आप समझ सकते हैं कि अर्थशास्त्र से अधिक राजनीति शास्त्र इस आदमी का मजबूत है।
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अब आइये नीति पर। याद कीजिए 1989 का कालखंड। उदारवाद के पक्ष में सबसे बडा दावा क्या था। मनमोहन सिंह भारत को बाजार बनाने में लगे थे और उपभोक्ता को क्या समझा रहे थे। सबसे ज्यादा जोर किन बातों पर था। आइये बात टेलीकॉम से शुरु करते हैं। उस समय बीएसएनएल एक मात्र कंपनी थी। लोगों के पास कोई विकल्प नहीं था। मनमोहन ने कहा, "हम उदारवाद के तहत विकल्प देंगे।" भारत का उपभोक्ता लहालोट हो गया। फिर तो बीएसएनएल को "भाईसाहेबनहींलगेगा" का नाम मनमोहन सिंह ने दिला दिया। याद कीजिए जब अटल की सरकार बनी, तो भारत में 22 टेलीकॉम कंपनियां थी। उपभोक्ता मनमोहन को भारत रत्न समझने लगे। विकल्पों में गोदा लगाने लगे। लोहा पूरा गर्म हो चुका था। मनमोहन को अब वो करना था जो करने के लिए उदारवाद लाया गया था, मतलब बाजार पर एकाधिकार।
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इसी क्रम में मनमोहन ने एक घोटाला प्लांट किया, नाम दिया स्पेंट्रम घोटाला। इस घोटाले ने इस सेक्टर के तमाम खिलाडी को मैदान से बाहर कर दिया। आज टेलीकॉम सेक्टर मे कितने विकल्प हैं। एयरटेल और वोडा का सरकार पर क्या आरोप है। बीएसएनएल की तरह जिओ का बाजार शेयर 100 फीसदी के पास कैसे पहुंचा। जिओ मे अमेरिकी कंपनी की हिस्सेदारी कैसे बढ रही है। क्या 1989 में उदारवाद के पक्षकार ने ऐसा दावा किया था कि आज बीएसएनएल का एकाधिकार है, उदारवाद आने के बाद जिओ का एकाधिकार होगा, जिसमें अमेरिकी कंपनी की हिस्सेदारी होगी। विश्व बैंक और अमेरिका का घोषित एजेंट मनमोहन जी इससे बेहतर नीति और क्या बना सकते थे, अमेरिका के लिए। कहां है वो विकल्प जिसकी बात 1989 में उदारवाद के पक्षकार किया करते थे। समाजवाद का मतलब सरकारी और उदारवाद का मतलब रिलायंस कैसे हो गया मनमोहन बेटा।
साभार :
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https://www.facebook.com/esamaadmaithili/posts/3011681525546792?__cft__[0]=AZV78Lp1Y6WeCs-frkYUwnmSgWCwO2RyME_6s2sH4mlaOaOcmJNcesGBppByVKjQMNkpFxeh0C9myPhdxNhegSJSHrc1GAchIc6g8fZaFljDxupvnpCagmjbb9lJEjd8Iaute7epTvkT9mv3wCsayeyGFgZllaly6ibVmiaFUHmj6tmIQKIDHQcW3rY-i2D3Slo&__tn__=%2CO%2CP-y-R
~विजय राजबली माथुर ©
Tuesday, September 24, 2019
ह्यूस्टन का तमाशा: इससे किसी सार्थक और सकारात्मक परिणाम की अपेक्षा करना बेमानी है ------ हेमंत कुमार झा
Hemant Kumar Jha
24-09-2019
डोनाल्ड ट्रम्प की सरकार को नाओम चोम्स्की ने "अमेरिका के लोकतांत्रिक इतिहास की सर्वाधिक मानव द्रोही सरकार" की संज्ञा दी है। जीवित किंवदन्ती बन चुके, अमेरिका में रह रहे वयोवृद्ध विचारक चोम्स्की जब कुछ बोलते हैं तो दुनिया गम्भीरता से उन्हें सुनती है।नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की सरकार के कार्यकलापों को लेकर भी चोम्स्की के कुछ ऐसे ही विचार हैं। जब मोदी केंद्र की सत्ता में आए थे तो चोम्स्की ने इसे "भारत के लिये अंधेरा समय" की संज्ञा दी थी और अभी हाल में एक इंटरव्यू में उन्होंने मोदी सरकार पर "देश की संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को नष्ट करने" के आरोप लगाते हुए कहा कि "इसने लोकतंत्र और मानवाधिकार के लिये खतरा उत्पन्न कर दिया है।"
ट्रम्प प्रशासन पर भी संस्थाओं की गरिमा को चोट पहुंचाने के गम्भीर आरोप लगते रहे हैं और इस कारण अमेरिका में संवैधानिक पदों पर आसीन अनेक स्वाभिमानी लोगों ने बीते दिनों इस्तीफा दे दिया है।
ट्रम्प ने "अमेरिका फर्स्ट" का नारा दे कर राष्ट्रवाद के जिस नकारात्मक रूप को प्रस्तुत किया है उसने मानवीय त्रासदियों और व्यापारिक संकटों के नए सिलसिलों की शुरुआत कर दी और इन्हें लेकर पूरी दुनिया में चिन्ताएं व्यक्त की जा रही हैं। इधर, मोदी का राष्ट्रवाद भारतीयता की अवधारणा के विरुद्ध सिर उठा रही उन लंपट शक्तियों का मनोबल बढ़ा रहा है जिनकी अराजक कारगुजारियों के समक्ष संवैधानिक तंत्र लाचार नजर आ रहा है।
पोस्ट-ट्रूथ पॉलिटिक्स के अध्येताओं ने ट्रम्प और मोदी, दोनों की चुनावी जीत को "वास्तविकताओं के स्थान पर कृत्रिम सत्य के प्रतिस्थापन का नकारात्मक निष्कर्ष" बताया। 2014 में नरेंद्र मोदी और 2016 में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के बाद 'पोस्ट-ट्रूथ' शब्द की इतनी चर्चा हुई कि ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने इस शब्द को 2016 का "वर्ड ऑफ द ईयर" घोषित कर दिया।
जब ट्रम्प राष्ट्रपति उम्मीदवार बने और फिर जीत भी गए तो पूरी दुनिया का बौद्धिक तबका हक्का-बक्का रह गया क्योंकि अमेरिकी लोकतंत्र की परिपक्वता को लेकर आमतौर पर एक आश्वस्ति का भाव रहा है। ट्रम्प की जीत को अमेरिका की राजनीतिक संस्कृति में मानवीय आदर्शों के पतनोन्मुख होने का स्पष्ट संकेत माना गया। कहा गया कि यह जीत अप्रत्याशित है और इसके लिये अमेरिका में बढ़ते नस्लभेद, कमजोर वर्गों के साथ ही स्त्री विरोधी मानसिकता को मुख्य रूप से जिम्मेदार माना गया।
नरेंद्र मोदी की जीत अप्रत्याशित तो बिल्कुल नहीं थी लेकिन इस जीत के परिणामों को लेकर भारत सहित दुनिया भर के बौद्धिक हलकों में गहरे संदेह व्यक्त किये गए। नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित आयरिश विचारक मैरीड मेग्योर ने मोदी की जीत को "मानवीय मूल्यों के संदर्भ में अत्यंत निराशाजनक परिणाम" कहते हुए इसे "भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के विरुद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक अराजकताओं को आमंत्रण" बताया।
ट्रम्प और मोदी दोनों बौद्धिकता विरोधी नेता हैं और अपने इस रुख को छिपाने में दोनों को ही कतई यकीन नहीं है। उन्हें पता है कि दुनिया का बौद्धिक तबका अगर उनको संदेह की नजरों से देखता है तो इस तबके को ठेंगे पर रख कर ही वे अपनी राजनीति को आगे बढ़ा सकते हैं। दोनों के समर्थन आधार में भी बौद्धिक व्यक्तियों के प्रति हिकारत और बौद्धिकता के प्रति निषेध के भाव मुखर रहे हैं।
सतह की निचली परतों में बढ़ती सड़ांध के बावजूद जहां मोदी 'न्यू इंडिया' के नारे के साथ आम लोगों को भरमाने में सफल हो रहे हैं वहीं ट्रम्प बढ़ती सामाजिक अराजकताओं और बुरी तरह बढ़ती आर्थिक विषमताओं के बावजूद 'बदलते अमेरिका' का राग अलापते रहते हैं।
प्रभावी रूप से झूठ बोलने में दोनों को ही महारत हासिल है। बतौर शासनाध्यक्ष, नीतियों और सरकारी कार्यकलापों से जुड़े झूठ ये दोनों बोलते ही रहते हैं। अंतर यही है कि जहां ट्रम्प को अमेरिका में खूब एक्सपोज किया जाने लगा है वहीं मोदी के झूठ को सच मानने और मनवाने में उनके समर्थक सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों तक अत्यंत सक्रिय रहते हैं। एक और अंतर यह है कि मोदी युग में जहाँ भारत में "मीडिया का भक्तिकाल" चल रहा है वहीं अमेरिका में प्रमुख मीडिया संस्थान ट्रम्प के झूठ को उजागर करने में कोई कोताही नहीं बरत रहे।
अभी हाल में 'वाशिंगटन पोस्ट' ने ट्रम्प के निरन्तर झूठ बोलने पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है। अखबार के "फैक्ट चेकर्स डेटाबेस" के मुताबिक राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प अपनी जनता से और पत्रकारों से 10 हजार 796 बार झूठ और गुमराह करने वाली बातें बोल चुके हैं। बहरहाल, मोदी के झूठों की फेहरिस्त बनाना उतना आसान नहीं क्योंकि उनके नेतृत्व में देश का सत्ता तंत्र झूठ की खेती करने में जिस तरह लगा हुआ है उससे सिर्फ भ्रम ही उपज सकता है, उपज भी रहा है।
दोनों ही बातें लम्बी-लम्बी करते हैं लेकिन दोनों के शासन काल में उनके समाजों में परस्पर असहिष्णुता में बढ़ोतरी हुई है। दोनों ने ही अपने-अपने देशों की अर्थव्यवस्थाओं के कायाकल्प का वादा किया था लेकिन दोनों इस संदर्भ में विफल रहे हैं और अपनी इस विफलता को ढंकने के लिये तरह-तरह के भ्रामक तथ्यों का सहारा लेते हैं।
ट्रम्प अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अपेक्षाओं के अनुरूप गतिशीलता नहीं ला सके वहीं मोदी ने तो भारत की अर्थव्यवस्था का बंटाधार करने में कोई कसर नही छोड़ी है। बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने सनसनी फैलाने के लिये नोटबन्दी का अचानक बिना आगा-पीछा सोचे निर्णय लिया, उसने भारतीय अर्थव्यवस्था, खास कर असंगठित क्षेत्र को जिस तरह बर्बाद किया उसे मानने के लिये आज भी न वे और न उनका थिंक टैंक तैयार हैं।
समकालीन वैश्विक राजनीति में दोनों एक दूसरे को वैधता देते हैं, एक दूसरे की प्रशंसा करते हैं और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से एक दूसरे के राजनीतिक छद्म को सहयोग देते हैं।
अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में जो प्रायोजित तमाशा हुआ उसमें ट्रम्प की मौजूदगी ने मोदी की छवि निर्माण की राजनीति को बढावा दिया और यह बिल्कुल स्वाभाविक था। आम तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपतियों से ऐसी उम्मीद नहीं की जाती, लेकिन ये तो डोनाल्ड ट्रम्प हैं जो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के नैतिक और राजनीतिक मानदंडों की ऐसी-तैसी करने में कोई संकोच नहीं करते...बात अगर चुनावी फायदे की हो तब तो बिल्कुल नहीं। अगले साल उन्हें राष्ट्रपति चुनाव में फिर उतरना है और अमेरिका में दिन ब दिन मजबूत और प्रभावी होती जा रही भारतीय लॉबी का समर्थन उनके बहुत काम आ सकता है।
इसलिये, भारत में भयंकर मानवीय त्रासदी का रूप लेती जा रही बेरोजगारी और आर्थिक विफलताओं के बावजूद नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी शहर में जो फूहड़ तमाशा आयोजित किया उसमें उन्होंने "भारत में सब कुछ अच्छा चल रहा है" कह कर बेरोजगार भारतीय नौजवानों और नौकरी खोते जा रहे कामगारों का खुलेआम मजाक उड़ाया। उधर, ट्रम्प ने भी मोदी के साथ अपनी दोस्ती की कसमें खाते हुए यह कह कर उनकी हौसला अफजाई की कि..."मोदी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।"
नाटकीयता में दोनों का कोई सानी नहीं है और ट्रम्प के नाटक के बाद उसी नाटकीय अंदाज में मोदी ने भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के स्थापित मानदण्डों की धज्जियां बिखेरते हुए, हवा में हाथ लहराते हुए..."अबकी बार, ट्रम्प सरकार" का जब नारा लगाया तो यह भारत के प्रधानमंत्री की गरिमा के नितांत विरुद्ध होते हुए भी नरेंद्र मोदी के लिये स्वाभाविक ही था।
यद्यपि, भारत नामक देश ट्रम्प के नेतृत्व वाले अमेरिका से वास्तविक हितैषी होने की अगर उम्मीद करता है तो यह बेकार की उम्मीद ही साबित होगी।
ह्यूस्टन का तमाशा दो देशों की नहीं, दो नाटकीयता पसंद, छद्म मुद्दों पर राजनीति करने वाले राजनेताओं की सार्वजनिक जुगलबंदी का एक उदाहरण मात्र है जिससे किसी सार्थक और सकारात्मक परिणाम की अपेक्षा करना बेमानी है।
https://www.facebook.com/hemant.kumarjha2/posts/2377500485691184
~विजय राजबली माथुर ©
Monday, September 9, 2019
Thursday, March 7, 2019
Thursday, January 3, 2019
पी एम के साक्षात्कार की समीक्षा : अभिसार शर्मा / बाबी नक़वी द्वारा
NewsClickin
Published on Jan 2, 2019
2019 में मोदी ने मीडिया को पहला इंटरव्यू दियाI इसकी ख़ासियत यह रही कि इसमें देश के तमाम विवादास्पद मुद्दों पर सवाल उठाये गएI मगर अधिक्तर मुद्दों पर प्रधानमंत्री ने गोल-मोल जवाब दिये, कुछ मुद्दे तो छुए भी नहीं। आज अभिसार शर्मा न्यूज़चक्र के इस खास एपिसोड मे मोदी के बड़े इंटरव्यू का एक एक पहलू आपके सामने रखने जा रहे हैं। पेश है उनके इंटरव्यू की सबसे गहन समीक्षा।:
June 29, 2016 ·
Pm से मुलाकात हो रही है
प्रधानमंत्री के साथ साक्षात्कार की व्यवस्था करना लंबा खींचा और दुर्वह प्रक्रिया हो सकती है. मैं पिछले अगस्त को पहला हाथ अनुभव करने का अवसर था.
संयुक्त अरब अमीरात में उनकी यात्रा के आगे, मैंने अरब दुनिया में दो देशों और भारत की भूमिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों पर एक साक्षात्कार का अनुरोध किया । कई दिनों के लिए नौकरशाह के साथ कई ईमेल का आदान-प्रदान करने के बाद, मुझे एक बहुत ही वरिष्ठ अधिकारी से एक कॉल मिली: " बॉबी, मेरे पास अच्छी खबर और बुरी खबर है । कौन सा आप पहले सुनना चाहते हैं?"
मुझे नहीं पता था कि क्या कहना है. इससे पहले कि मैं बोल सकता था, उसने कहा कि " pm ने सहमति दी है." फिर उसने दो अन्य प्रकाशनों का उल्लेख भी किया होगा । मैं बहुत निराश था क्योंकि यह अब एक विशेष साक्षात्कार नहीं था. मेरा कोई विकल्प नहीं था, लेकिन कुछ विरोध के साथ इसे स्वीकार करने के लिए.
फिर मुझे पूर्व स्वीकृति के लिए अपने प्रश्नों को भेजने के लिए कहा गया था. और फिर सुरक्षा निकासी के लिए कई अनुरोधों का पालन किया: मेरे ड्राइवर, कार पंजीकरण नंबर, फोटोग्राफर के विवरण और उसके उपकरण आदि की सूची.
अंतिम क्षण तक, मैं इस बैठक के स्थान और समय के बारे में कोई सुराग नहीं था. मुझे बताया गया था कि यह स्वतंत्रता दिवस पर अपने लाल किले के भाषण के बाद कभी भी हो सकता है. 14 अगस्त को हुए कॉल करने के बाद, मुझे दिल्ली में अपने संपर्क का फोन नंबर दिया गया था. इस व्यक्ति, एक युवा अधिकारी ने मुझे दोपहर से पहले राजधानी में होने के लिए कहा और कहा कि सटीक समय और स्थान बाद में प्रदान किया जाएगा.
मैं 14 अगस्त को फ्लाइट पर सवार होने से पहले, मुझे एक अजीब फोन कॉल मिल गया. यह एक प्रमुख मुस्लिम व्यक्तित्व से था जो pm के करीब माना जाता है । " कर रवाना pm साहब का इंटरव्यू, बड़े, बड़े लग लाइन में bhaithen हैं उनसे मिलने के लिए."
मैं हैरान हो गया था और यह पता नहीं चला कि वह कैसे मेरी बैठक के बारे में पता चला है क्योंकि यह व्यक्ति सरकार का हिस्सा नहीं है.
अगली सुबह दिल्ली में, एक और झटका मुझे इंतजार कर रहा है । मेरे संपर्क अधिकारी ने सूचित किया कि मेरे फोटोग्राफर की अनुमति नहीं होगी और वह तस्वीरें पीएम के आधिकारिक फोटोग्राफर द्वारा ली जाएगी । मैंने अपने पैर को नीचे रखने का निर्णय लिया और उसे बताया कि मैं ऐसा नहीं कर सकता. तनाव वार्तालाप पीछे और बाहर और कुछ घंटे बाद फोटोग्राफर को एक शर्त पर अनुमति दी गई - कि वह केवल पांच मिनट अंदर खर्च करेगा.
हम तीनों -- मेरा ड्राइवर, मेरे भाई Saify और फोटोग्राफर Pankaj ने भारत के सबसे प्रसिद्ध पते को भगा दिया । उस दिन बिल्लियों और कुत्तों की बारिश हो रही थी । 7 rcr पर पहले चेकपॉइंट पर हमने एक और मुसीबत का सामना किया । जब एक रेनकोट में एक भारी सशस्त्र आदमी कार के पास आ गया तो एक विशाल टॉर्च ने हमें लगभग अंधा कर दिया. भारी बारिश की आवाज ने उसे सुनना असंभव बना दिया । वह सब समझ सकता था कि हम " दुबई से " हैं ", शब्द उन्होंने कई बार दोहराया कि वह उन्हें सही सुना है । वह फिर सुरक्षा कार्यालय में वापस चला गया. कुछ मिनट बाद वह वापस आ गया और हमें उस गाड़ी को अवरोध से दूर करने के लिए कहा और मुझे उसका अनुसरण करने के लिए इशारा किया । एक अधिकारी ने फिर से हमारा विवरण लिया और उन्हें कार्यालय-निवास परिसर के अंदर अपने sodium को radioed किया. कई मिनट बाद उन्होंने कहा कि फोटोग्राफर को कोई सुरक्षा निकासी नहीं थी. मैंने फिर से अपने संपर्क अधिकारी से संपर्क किया और समस्या को समझाया. बाद में कई बेचैन पल, हमें अंदर की अनुमति दी गई और विज़िटर पार्किंग के लिए निर्देशित किया गया, रिसेप्शन हॉल से कुछ मीटर दूर.
अंदर तीव्र सुरक्षा जाँच के बाद हमें एक दूसरे कमरे में इंतजार करने के लिए कहा गया था जहां एक सूँघने वाला कुत्ता लाया गया था । जल्द ही, हम एक एसपीजी आदमी द्वारा संचालित शटल कार में मुख्य इमारत के लिए स्थानांतरित किया गया था.
अंदर, हम एक कमरे ग्रीन लॉन को निहार रहे थे, जहां मैं "साक्षात्कार के आदेश" पर लप्पास किया गया था.
" फोटो और दोनों के बाद, प्रधानमंत्री आपको देख लेंगे, और फिर आप अपनी बातचीत शुरू कर देंगे," एक अधिकारी ने मुझे एक स्वर में बताया जो विनम्र था लेकिन दृढ़ है । एक और शॉकर -- कि मैं केवल एक प्रश्न पूछ सकता हूँ और मेरे बाकी प्रश्नों के उत्तर मिलने के बाद लिखने में प्रदान किया जाएगा.
ब्रीफिंग के बाद हम पीएम के टीम के सदस्यों को पेश किया गया, जिसमें बिहार से मुस्लिम अधिकारी शामिल हैं (इस अधिकारी, मुझे बताया गया था, pm का प्रसिद्ध सिलिकॉन वैली भाषण लिखा था).
यह बैठक स्क्रिप्ट के अनुसार चली गई. एक गर्म हाथ से हाथ मिलाने के बाद हमने हिंदी में अपनी देर रात की उड़ान और उसके लाल किले के भाषण के बारे में बात की । एक और पत्रकार जो आगे बोलने के लिए शेड्यूल किया गया था (वह हमारे पास से आया और ड्यूटी मुक्त से पीएम के लिए एक उपहार उठाया) एक अनुवादक के माध्यम से अंग्रेजी में बोले, एक वरिष्ठ महिला अधिकारी प्रचार मंडल से । बैठक के बाद एक घंटे या इसलिए, मैं बातचीत के प्रिंट प्रतिलिपियाँ दिया गया था और मेरे सवालों के जवाब दे दिया था कि मैं पूछ नहीं सका.
आज, मुझे आश्चर्य नहीं था कि जब मैं समय के लिए उस सवाल को पढ़ रहा था, अब इंटरव्यू एडवांस में मांग लिया गया था । मुझे यकीन नहीं है कि यह इस सरकार के लिए सभी पीएमएस या अद्वितीय के लिए एक मानक प्रक्रिया है.
~विजय राजबली माथुर ©
Published on Jan 2, 2019
2019 में मोदी ने मीडिया को पहला इंटरव्यू दियाI इसकी ख़ासियत यह रही कि इसमें देश के तमाम विवादास्पद मुद्दों पर सवाल उठाये गएI मगर अधिक्तर मुद्दों पर प्रधानमंत्री ने गोल-मोल जवाब दिये, कुछ मुद्दे तो छुए भी नहीं। आज अभिसार शर्मा न्यूज़चक्र के इस खास एपिसोड मे मोदी के बड़े इंटरव्यू का एक एक पहलू आपके सामने रखने जा रहे हैं। पेश है उनके इंटरव्यू की सबसे गहन समीक्षा।:
| Smita Prakash , ANI |
Pm से मुलाकात हो रही है
प्रधानमंत्री के साथ साक्षात्कार की व्यवस्था करना लंबा खींचा और दुर्वह प्रक्रिया हो सकती है. मैं पिछले अगस्त को पहला हाथ अनुभव करने का अवसर था.
संयुक्त अरब अमीरात में उनकी यात्रा के आगे, मैंने अरब दुनिया में दो देशों और भारत की भूमिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों पर एक साक्षात्कार का अनुरोध किया । कई दिनों के लिए नौकरशाह के साथ कई ईमेल का आदान-प्रदान करने के बाद, मुझे एक बहुत ही वरिष्ठ अधिकारी से एक कॉल मिली: " बॉबी, मेरे पास अच्छी खबर और बुरी खबर है । कौन सा आप पहले सुनना चाहते हैं?"
मुझे नहीं पता था कि क्या कहना है. इससे पहले कि मैं बोल सकता था, उसने कहा कि " pm ने सहमति दी है." फिर उसने दो अन्य प्रकाशनों का उल्लेख भी किया होगा । मैं बहुत निराश था क्योंकि यह अब एक विशेष साक्षात्कार नहीं था. मेरा कोई विकल्प नहीं था, लेकिन कुछ विरोध के साथ इसे स्वीकार करने के लिए.
फिर मुझे पूर्व स्वीकृति के लिए अपने प्रश्नों को भेजने के लिए कहा गया था. और फिर सुरक्षा निकासी के लिए कई अनुरोधों का पालन किया: मेरे ड्राइवर, कार पंजीकरण नंबर, फोटोग्राफर के विवरण और उसके उपकरण आदि की सूची.
अंतिम क्षण तक, मैं इस बैठक के स्थान और समय के बारे में कोई सुराग नहीं था. मुझे बताया गया था कि यह स्वतंत्रता दिवस पर अपने लाल किले के भाषण के बाद कभी भी हो सकता है. 14 अगस्त को हुए कॉल करने के बाद, मुझे दिल्ली में अपने संपर्क का फोन नंबर दिया गया था. इस व्यक्ति, एक युवा अधिकारी ने मुझे दोपहर से पहले राजधानी में होने के लिए कहा और कहा कि सटीक समय और स्थान बाद में प्रदान किया जाएगा.
मैं 14 अगस्त को फ्लाइट पर सवार होने से पहले, मुझे एक अजीब फोन कॉल मिल गया. यह एक प्रमुख मुस्लिम व्यक्तित्व से था जो pm के करीब माना जाता है । " कर रवाना pm साहब का इंटरव्यू, बड़े, बड़े लग लाइन में bhaithen हैं उनसे मिलने के लिए."
मैं हैरान हो गया था और यह पता नहीं चला कि वह कैसे मेरी बैठक के बारे में पता चला है क्योंकि यह व्यक्ति सरकार का हिस्सा नहीं है.
अगली सुबह दिल्ली में, एक और झटका मुझे इंतजार कर रहा है । मेरे संपर्क अधिकारी ने सूचित किया कि मेरे फोटोग्राफर की अनुमति नहीं होगी और वह तस्वीरें पीएम के आधिकारिक फोटोग्राफर द्वारा ली जाएगी । मैंने अपने पैर को नीचे रखने का निर्णय लिया और उसे बताया कि मैं ऐसा नहीं कर सकता. तनाव वार्तालाप पीछे और बाहर और कुछ घंटे बाद फोटोग्राफर को एक शर्त पर अनुमति दी गई - कि वह केवल पांच मिनट अंदर खर्च करेगा.
हम तीनों -- मेरा ड्राइवर, मेरे भाई Saify और फोटोग्राफर Pankaj ने भारत के सबसे प्रसिद्ध पते को भगा दिया । उस दिन बिल्लियों और कुत्तों की बारिश हो रही थी । 7 rcr पर पहले चेकपॉइंट पर हमने एक और मुसीबत का सामना किया । जब एक रेनकोट में एक भारी सशस्त्र आदमी कार के पास आ गया तो एक विशाल टॉर्च ने हमें लगभग अंधा कर दिया. भारी बारिश की आवाज ने उसे सुनना असंभव बना दिया । वह सब समझ सकता था कि हम " दुबई से " हैं ", शब्द उन्होंने कई बार दोहराया कि वह उन्हें सही सुना है । वह फिर सुरक्षा कार्यालय में वापस चला गया. कुछ मिनट बाद वह वापस आ गया और हमें उस गाड़ी को अवरोध से दूर करने के लिए कहा और मुझे उसका अनुसरण करने के लिए इशारा किया । एक अधिकारी ने फिर से हमारा विवरण लिया और उन्हें कार्यालय-निवास परिसर के अंदर अपने sodium को radioed किया. कई मिनट बाद उन्होंने कहा कि फोटोग्राफर को कोई सुरक्षा निकासी नहीं थी. मैंने फिर से अपने संपर्क अधिकारी से संपर्क किया और समस्या को समझाया. बाद में कई बेचैन पल, हमें अंदर की अनुमति दी गई और विज़िटर पार्किंग के लिए निर्देशित किया गया, रिसेप्शन हॉल से कुछ मीटर दूर.
अंदर तीव्र सुरक्षा जाँच के बाद हमें एक दूसरे कमरे में इंतजार करने के लिए कहा गया था जहां एक सूँघने वाला कुत्ता लाया गया था । जल्द ही, हम एक एसपीजी आदमी द्वारा संचालित शटल कार में मुख्य इमारत के लिए स्थानांतरित किया गया था.
अंदर, हम एक कमरे ग्रीन लॉन को निहार रहे थे, जहां मैं "साक्षात्कार के आदेश" पर लप्पास किया गया था.
" फोटो और दोनों के बाद, प्रधानमंत्री आपको देख लेंगे, और फिर आप अपनी बातचीत शुरू कर देंगे," एक अधिकारी ने मुझे एक स्वर में बताया जो विनम्र था लेकिन दृढ़ है । एक और शॉकर -- कि मैं केवल एक प्रश्न पूछ सकता हूँ और मेरे बाकी प्रश्नों के उत्तर मिलने के बाद लिखने में प्रदान किया जाएगा.
ब्रीफिंग के बाद हम पीएम के टीम के सदस्यों को पेश किया गया, जिसमें बिहार से मुस्लिम अधिकारी शामिल हैं (इस अधिकारी, मुझे बताया गया था, pm का प्रसिद्ध सिलिकॉन वैली भाषण लिखा था).
यह बैठक स्क्रिप्ट के अनुसार चली गई. एक गर्म हाथ से हाथ मिलाने के बाद हमने हिंदी में अपनी देर रात की उड़ान और उसके लाल किले के भाषण के बारे में बात की । एक और पत्रकार जो आगे बोलने के लिए शेड्यूल किया गया था (वह हमारे पास से आया और ड्यूटी मुक्त से पीएम के लिए एक उपहार उठाया) एक अनुवादक के माध्यम से अंग्रेजी में बोले, एक वरिष्ठ महिला अधिकारी प्रचार मंडल से । बैठक के बाद एक घंटे या इसलिए, मैं बातचीत के प्रिंट प्रतिलिपियाँ दिया गया था और मेरे सवालों के जवाब दे दिया था कि मैं पूछ नहीं सका.
आज, मुझे आश्चर्य नहीं था कि जब मैं समय के लिए उस सवाल को पढ़ रहा था, अब इंटरव्यू एडवांस में मांग लिया गया था । मुझे यकीन नहीं है कि यह इस सरकार के लिए सभी पीएमएस या अद्वितीय के लिए एक मानक प्रक्रिया है.
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| NBT,Lko.,03-01-2019,Page-12 |
~विजय राजबली माथुर ©
Tuesday, October 23, 2018
मोदी के जाने की आहट : टॉप ब्यूरोक्रेट्स ने मोदी को ठेंगा दिखाना शुरु कर दिया ------ राजेश राजेश
Rajesh Rajesh
मोदी के जाने की आहट : टॉप ब्यूरोक्रेट्स ने मोदी को ठेंगा दिखाना शुरु कर दिया---------------//
देश के इतिहास में ये पहली बार है कि किसी जांच एजेंसी ने अपनी जांच एजेंसी के खिलाफ छापेमारे शुरू कर दी है।
प्रधानमंत्री मोदी ने राकेश अस्थाना और अलोक वर्मा को तलब किया मगर दोनों के बीच बढ़ चुकी दूरियां कम होंगी, इसकी उम्मीद कम ही नज़र आती है।
3 करोड़ की घूसखोरी में फंसे सीबीआई के राकेश अस्थाना पीएम मोदी और भाजपा के तड़ीपार अमित शाह के बेहद करीबी हैं। मोदी जी के कहने पर ही सीबीआई में उन्हें नम्बर 2 यानी स्पेशल डायरेक्टर की पोस्ट दी गई उन्होंने ही गोधरा जांच से मोदी को बचाया तो अब एफआईआर दर्ज होने के बाद भी पीएमओ के हस्तक्षेप से अस्थाना भी गिरफ्तारी से अभी तक बचे हुए हैं।
गुजरात के सूरत में पुलिस कमिश्नर रहने के समय से ही घूसखोर अस्थाना को मोदी वाला पीआर का चस्का लगा हुआ है और उसने बकायदा वीडियो बनवाकर अपनी तुलना सरदार पटेल और स्वामी विवेकानंद से की।
लेकिन मोदी, अमित शाह और तमाम बड़े-बड़े नामों का तमगा लगाये भ्रष्टाचारी अस्थाना की मूर्ति को सीबीआई निदेशक ने एक झटके में जमींदोज कर दिया। आलोक वर्मा ने अचानक सौ सुनार की ओर एक लोहार की तर्ज पर चोट मारी।
हकबकाये मोदी ने तुरंत सीबीआई निदेशक को बुलावा भेजा लेकिन सीबीआई निदेशक वर्मा ने साफ कर दिया कि इस घूसखोर अस्थाना को अब सीबीआई में और बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। मोदी को जो उखाड़ना है उनका उखाड़ लें।
मोदी और शाह के ईशारों पर चलने वाले राकेश अस्थाना के निशाने पर सारे विपक्षी दल थे। ******
अमित शाह के कहने पर ही अस्थाना ने मेडिकल कॉलेज घूसखोरी में रंगेहाथ 2 करोड़ की वसूली की रकम ऐंठते पकड़े गये इंडिया टीवी के बड़े पत्रकार दलाल का नाम एफआईआर से निकाल दिया और रंगेहाथ पकड़े जाने के बावजूद उसे छोड़ दिया।क्योंकि उसके पकड़े जाने पर जांच की आंच खुद अमित शाह तक पहुंच जाती और 200 करोड़ की वसूली का पूरा खेल खुल जाता।
हालांकि मोदी सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा से बहुत नाराज हैं और चाहते हैं कि उनकी छुट्टी हो मगर प्रधानमंत्री उनको बर्खास्त नहीं कर सकते। उधर टॉप ब्यूरोक्रेट्स और आम नौकरशाही में फैली चर्चा की मानें तो अधिकारी जानते हैं कि 2019 में मोदी लौटकर सत्ता में नहीं आ रहे। इसलिये अब अफसरों ने मोदी को ठेंगा दिखाना शुरु कर दिया। सीबीआई निदेशक वर्मा ने भी मोदी को साफ कर दिया कि अब और नहीं चलेगा ये सब। घूसखोरों को सीबीआई से बाहर जाना ही होगा।खैर, मोदी की गढ़ी हुई झूठ और झूठी ईमानदारी की मूर्तियां एक-एक कर गिरना शुरु हो चुकी हैं।अब तो तय है कि 2019 के चुनावों में मोदी ईमानदारी का ढोल कतई नहीं पीट पायेंगे और अंततः उनको बेआबरु होकर सत्ता छोड़नी ही होगी।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=762971610718457&set=a.111828709166087&type=3
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~विजय राजबली माथुर ©
Saturday, July 21, 2018
संसद में राहुल - मोदी मिलाप : जो न समझे वे गफलत में ------ विजय राजबली माथुर
पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिंघा राव साहब ने पदमुक्त होने के बाद अपने उपन्यास ' The Insider ' में उल्लेख किया है कि, हम लोकतन्त्र के भ्रमजाल में जी रहे हैं।
वस्तुतः आज संसद और विधायिकाओं में जन- प्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित लोग अधिकतर किसी न किसी व्यवसायिक घराने से संबंध रखते हैं और वे अपने वर्ग के लोगों के हक में निर्णय लेते हैं न कि जनता के हक में।
यही गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर हो जाये तो विपक्ष को अपना गठबंधन बनाने में आसानी हो जाये वरना अभी तो कुछ विपक्ष इधर कुछ उधर भटक रहा है और यही आर एस एस की नीति है कि , सत्ता और विपक्ष दोनों पर उसका नियंत्रण रहे । 1980 में इन्दिरा गांधी और 1985 में राजीव गांधी आर एस एस के सहयोग से बहुमत पा सके थे इसीलिए उनको खुश करने के लिए अयोध्या से ताला खुलवाया था और 1992 में कांग्रेस शासन में ही विवादित ढांचा गिराया गया जिसके बाद तेजी से भाजपा की बढ़त हुई थी और वर्तमान मोदी सरकार मनमोहन सिंह की कृपा का फल है। लेकिन कांग्रेस-भाजपा विरोधी विपक्ष जनता से कटा होने के कारण उसके लिए कांग्रेस का साथ देना मजबूरी हो जाती है। राहुल गांधी खुद को मोदी से अधिक हिन्दू होने का दावा कर रहे हैं और चूंकि मोदी - शाह गठजोड़ आर एस एस को कबजाने की कोशिश कर रहा है इसलिए राहुल कांग्रेस को आर एस एस का समर्थन मिल सकता है।
इस संदर्भ में पी यू सी एल नेता सीमा आज़ाद जी का दृष्टिकोण यह है --- '' भाजपा को हराकर कांग्रेस को सत्ता में ले आने पर भी भाजपा और उनके अनुसंगी संगठन समाज में बने ही रहेंगे और अपना काम करते रहेंगे। कांग्रेस उन पर रोक लगायेगी ऐसा सोचना भी नासमझी है, उल्टे पिछली घटनायंे बताती हैं कि कांग्रेस सहित दूसरे चुनावी दल उनके साम्प्रदायिक कर्मांे को अपने हित के लिए इस्तेमाल ही करती रही है। ''
(https://www.facebook.com/seema.azad.33/posts/2509223352636533 )
एक बहुत ही सोची - समझी रणनीति के तहत जनता के मध्य यह प्रचारित करा दिया गया है कि, राजनेता भ्रष्ट होते हैं और भले लोगों को राजनीति में नहीं आना चाहिए। जब देश आज़ाद हुआ तब आज़ादी के आंदोलन से तपे तपाये नेता राजनीति में आए थे और तब राजनीतिक आदर्श उच्च थे। धीरे - धीरे व्यापारी वर्ग राजनीतिज्ञों को प्रभावित करने लगा और अपने हक में नियम - कानून बनवाने लगा। वर्तमान में राजनीतिज्ञों के नाम पर व्यापारी, उद्योगपति और कारपोरेट घराने संसद व विधानसभाओं में काबिज हैं। ऐसे में गरीब जनता, किसान और मजदूर के हक की बातें कहाँ से विधायिका में उठ सकती हैं ?
12 जून 1975 को तत्कालीन पी एम इन्दिरा गांधी का चुनाव इलाहाबाद हाई कोर्ट में रद्द घोषित करने वाले न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा साहब के एक रिश्तेदार वकील प्रोफेसर साहब ने अपने छात्रों को ऐसा परिणाम आ सकने का आभास पहले ही दे दिया था जो उनकी निडरता व निष्पक्षता से पूर्ण परिचित थे। उन प्रोफेसर सिन्हा साहब ने ही 1974 - 75 के छात्रों को बता दिया था कि , जिस प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियेँ चल रही हैं उनके अनुसार 1980 से भारत में भी श्रम - न्यायालयों (Labour Court ) से श्रमिकों के विरुद्ध फैसले होने लगेंगे।
एमर्जेंसी के दौरान सम्पन्न ' देवरस - इन्दिरा ' गुप्त समझौते के अंतर्गत 1980 में संघ के समर्थन से इन्दिरा गांधी के पुनः सत्तासीन होने पर श्रमिक विरोधी निर्णय श्रम न्यायालयों से होने शुरू हो गए थे। संघ के समर्थन से ही 1984 में पी एम बने उनके पुत्र राजीव गांधी तो सरकार कारपोरेट की तर्ज पर चलाने लगे थे। उदाहरण के तौर पर शिक्षा मंत्रालय का नामांतरण मानव संसाधन मंत्रालय किया जाना है।
1991 में पी एम बने नरसिंघा राव साहब के वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने जिन उदारीकरण की नीतियों को लागू किया उनको न्यूयार्क जाकर एल के आडवाणी साहब ने उनकी अर्थात भाजपा की नीतियों का चुराया जाना बताया था। उनके बाद बाजपेयी साहब के वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा साहब ने उन नीतियों को ही जारी रखा तथा फिर पी एम बनने पर मनमोहन सिंह जी ने वही नीतियाँ जारी रखीं और आजके पी एम मोदी साहब भी वही नीतियाँ चला रहे हैं। इस प्रकार संघ अर्थात व्यापारियो, उद्योगपतियों व कारपोरेट घरानों का शुभचिंतक राजनीति में मजबूत होता गया है। भाजपा और कांग्रेस की आर्थिक नीतियों में कोई अंतर है ही नहीं। अतः पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी साहब द्वारा नागपूर जाकर संघ को मजबूती देने का प्रयास अनायास नहीं है जनतंत्र पर हावी होते कारपोरेट तंत्र का यह स्व्भाविक परिणाम है।
परंतु 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के विरोध जैसी भयानक गलती फिर भाकपा द्वारा दोहराई गई है पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के संघ कार्यक्रम में दिये भाषण की सराहना करके। :
इसी प्रकार संघ प्रमुख मोहन भागवत साहब की सीख के अनुसार राहुल गांधी द्वारा 20 जूलाई 2018 को पी एम मोदी को गले लगाने की घटना की भी अनेक भाकपा नेताओं ने सराहना करते समय 1980 से चल रहे संघ - कांग्रेस के परस्परिक रिश्तों को नजरंदाज कर दिया है। इसका खामियाजा देश और जनता को भुगतना होगा।
~विजय राजबली माथुर ©
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फेसबुक कमेंट्स :
| 22-07-2018 |
Saturday, December 9, 2017
Saturday, April 1, 2017
निराधार नहीं हैं आधार पर उठ रही आशंकायेँ ------ शशांक दिववेदी
***हिंदुस्तान, लखनऊ, दिनांक 01-04-2017, पृष्ठ --- 12 पर प्रकाशित ***
कारपोरेट के तीन दलाल - नीलकेनी,मोदी और केजरीवाल।
The UIDAI was set up by executive notification on 28th January, 2009 to be initially located in the Planning Commission. It was decided early on that the law would be thought about at some, indefinite, later date. A Bill was actually introduced only on 3rd December 2010, over two months after the UIDAI had begun to enroll and data base the citizenry. It happened even then only because many groups and individuals were insistent, demanding to know how a project that was collecting personal information, including fingerprints and iris, was proceeding without public discussion and parliamentary consideration. The Bill was referred to the Standing Committee on Finance which on 13th December 2011, which roundly rejected the Bill, and recommended that the project be sent back to the drawing board. What did the UIDAI do? They carried straight on with enrolment, and the law fell into a well of silence. When the Supreme Court began to hear cases that had been filed before it challenging the UID project, then it was that talk of a revised Bill was briefly revived, but it led to nothing. So, there is still no law, nothing to define the limits of the project and protect the citizenry against situations such as loss of the data, data theft, abuse by anyone gaining access to the data, and recognise the privacy interest of the individual.
http://www.kractivist.org/aadhaar-the-many-wrongs-of-an-unseemly-project-uid/
And so it goes on. No respect for law, for court orders, for the individual’s privacy. Using a technology that is uncertain and untested. Deploying coercion and compulsion. Making a business without our data. And more, much more. Such as creating a database that make surveillance, tagging, tracking so much simpler than it was. Such as handing over our data to foreign companies with close links with intelligence agencies including the CIA and Homeland Security in the US, and then saying, most amazingly (in an RTI) that they had no means of knowing that they were foreign companies! And, most unforgivably, causing a culture to emerge when every person will be presumed to be a potential wrongdoer and therefore with each person having to ensure that they are transparent to those who want to control us, and our actions.
The hard-earned gains of getting the state to be transparent by using the RTI is turned on its head, and it is now we who are to be transparent to the state and to whoever else has access to the data and in the many places where the number resides. This, we are told, is how the system is being set right. How much more irony can our democracy bear!
Usha Ramanathan
http://krantiswar.blogspot.in/2014/04/blog-post_15.html
हिंदुस्तान ~विजय राजबली माथुर ©
कारपोरेट के तीन दलाल - नीलकेनी,मोदी और केजरीवाल।
The UIDAI was set up by executive notification on 28th January, 2009 to be initially located in the Planning Commission. It was decided early on that the law would be thought about at some, indefinite, later date. A Bill was actually introduced only on 3rd December 2010, over two months after the UIDAI had begun to enroll and data base the citizenry. It happened even then only because many groups and individuals were insistent, demanding to know how a project that was collecting personal information, including fingerprints and iris, was proceeding without public discussion and parliamentary consideration. The Bill was referred to the Standing Committee on Finance which on 13th December 2011, which roundly rejected the Bill, and recommended that the project be sent back to the drawing board. What did the UIDAI do? They carried straight on with enrolment, and the law fell into a well of silence. When the Supreme Court began to hear cases that had been filed before it challenging the UID project, then it was that talk of a revised Bill was briefly revived, but it led to nothing. So, there is still no law, nothing to define the limits of the project and protect the citizenry against situations such as loss of the data, data theft, abuse by anyone gaining access to the data, and recognise the privacy interest of the individual.
http://www.kractivist.org/aadhaar-the-many-wrongs-of-an-unseemly-project-uid/
And so it goes on. No respect for law, for court orders, for the individual’s privacy. Using a technology that is uncertain and untested. Deploying coercion and compulsion. Making a business without our data. And more, much more. Such as creating a database that make surveillance, tagging, tracking so much simpler than it was. Such as handing over our data to foreign companies with close links with intelligence agencies including the CIA and Homeland Security in the US, and then saying, most amazingly (in an RTI) that they had no means of knowing that they were foreign companies! And, most unforgivably, causing a culture to emerge when every person will be presumed to be a potential wrongdoer and therefore with each person having to ensure that they are transparent to those who want to control us, and our actions.
The hard-earned gains of getting the state to be transparent by using the RTI is turned on its head, and it is now we who are to be transparent to the state and to whoever else has access to the data and in the many places where the number resides. This, we are told, is how the system is being set right. How much more irony can our democracy bear!
Usha Ramanathan
http://krantiswar.blogspot.in/2014/04/blog-post_15.html
हिंदुस्तान ~विजय राजबली माथुर ©
Tuesday, May 26, 2015
'संसदीय लोकतन्त्र' को बचाने के मजबूत प्रयास न हुये तो --------- विजय राजबली माथुर
सोनिया जी के इस मार्च की तुलना इन्दिरा जी से :
जबकि BBC द्वारा सोनिया जी के इस मार्च की तुलना इन्दिरा जी की 1978 की घटना से करने का प्रयास किया गया है परंतु वस्तुतः यह ऐसा है नहीं। जब 2009 में मनमोहन जी दोबारा पी एम बनने के लिए अड़ गए तो उनको बनाया तो गया था लेकिन बीच में उनको राष्ट्रपति बनवा कर हटाने का प्रयत्न हुआ था जिसको प्रेस में ममता बनर्जी द्वारा लीक करने से वह प्रयास विफल हो गया था। तब हवाई जहाज़ में जापान से लौटते वक्त मनमोहन जी ने कह दिया था कि वह जहां हैं वहीं ठीक हैं बल्कि तीसरे कार्यकाल के लिए भी तैयार हैं। इस घटना से पूर्व ही 2011 में सोनिया जी के इलाज के वास्ते विदेश जाने पर मनमोहन जी ने RSS/हज़ारे/केजरीवाल/रामदेव के सहयोग से 'कारपोरेट भ्रष्टाचार संरक्षण' का आंदोलन खड़ा करवा दिया था जिसके परिणाम के रूप में मोदी सरकार सत्तारूढ़ है। पूर्व पी एम नरसिंघा राव जी ने अपने उपन्यास THE INSIDER के जरिये खुलासा कर दिया था कि 'हम स्वतन्त्रता के भ्रमजाल में जी रहे हैं'। मनमोहन जी उनके प्रिय शिष्य रहे हैं और वही उनको वित्तमंत्री के रूप में राजनीति में लाये थे। उस वक्त यू एस ए जाकर एल के आडवाणी साहब ने कहा था कि मनमोहन जी ने उनकी (भाजपा की ) नीतियाँ चुरा ली हैं। अब तो सीधे-सीधे भाजपा का ही शासन है। मनमोहन जी के जरिये भाजपा को सत्तारूढ़ कराने के बाद उनकी कोई उपयोगिता नहीं रह गई है इसलिए उनके विरुद्ध अदालती कारवाई हो रही है जिसमें राजनीतिक रूप से कुछ किया जाना संभव नहीं होगा। 'जैसी करनी वैसी भरनी' का दृष्टांत है यह परिघटना। सोनिया जी के कदम अंततः उनकी पार्टी को ही क्षति पहुंचाएंगे जैसा कि यू एस ए प्रवास के दौरान जस्टिस काटजू साहब के अभियान से संकेत मिलते हैं। काटजू साहब को 'मूल निवासी' आंदोलन व वामपंथी रुझान के दलित वर्ग से संबन्धित नेताओं व विद्वानों का भी समर्थन है जो एक प्रकार से 'गोडसेवाद' को ही समर्थन करना हुआ। भाजपा/RSS विरोधी गफलत में भटके हुये चल रहे हैं और देश दक्षिण-पंथी अर्द्ध-सैनिक तानाशाही की ओर बढ़ रहा है यदि अभी भी 'संसदीय लोकतन्त्र' को बचाने के मजबूत प्रयास न हुये तो दिल्ली की सड़कों पर निकट भविष्य में ही 'रक्त-रंजित' संघर्ष की संभावनाएं हकीकत में बदलते देर न लगेगी।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=847638945298083&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=1&theater
13 मार्च 2015 के इस नोट को 'हस्तक्षेप' द्वारा भी स्थान दिया गया है:
http://www.hastakshep.com/
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जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने गांधी के इस जादू को समझने की जगह घटनाओं की बड़ी थोथी और स्थूल व्याख्या कर उन पर वे आरोप लगा दिए जो किसी ने नहीं लगाए थे. किसी ने उन्हें कभी ब्रिटिश एजेंट नहीं माना और न ही हिंदू-मुस्लिम समुदायों में दरार डालने वाला. काटजू अगर यहां तक सोच पाए तो इसलिए कि शायद उनकी सोच का दायरा यहीं तक जाता है. धार्मिकता और सांप्रदायिकता में फ़र्क होता है, यह बात वे समझ ही नहीं पाए. जो बहुत पढ़े-लिखे और बिल्कुल आधुनिक लोग थे – मोहम्मद अली जिन्ना और लियाकत ख़ान जैसे – वे अपनी राजनीति में निहायत सांप्रदायिक रहे और जो टोपी-दाढ़ी वाले मौलाना बंधु थे, वे धर्मनिरपेक्ष और कांग्रेसी बने रहे.--------
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/847603305301647?pnref=story
~विजय राजबली माथुर ©
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