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Monday, January 11, 2016

विपक्ष में लाल बहादुर शास्त्री जैसे अदम्य साहसी नेता की परमावश्यकता ------ विजय राजबली माथुर

51 वीं पुण्यतिथि पर शास्त्री जी की आवश्यकता आज क्यों? : 


इतिहासकार रामचन्द्र गुहा साहब ने 1965 में हुये भारत-पाक संघर्ष के विजेता के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के साहस व निर्णय की सराहना करने के साथ-साथ उन परिस्थितियों की ओर भी संकेत किया है जो दोनों देशों के मध्य विवाद का हेतु हैं।

वस्तुतः 1857 की प्रथम क्रान्ति के बाद से ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी फूट डालो और शासन करो की जिस नीति पर चलते आ रहे थे उसके बावजूद जब 1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन, एयर-फोर्स व नेवी में विद्रोह तथा आज़ाद हिन्द फौज की गतिविधियों के कारण जब उनका टिके रहना मुश्किल हो गया तब नए साम्राज्यवादी सरगना यू एस ए ने भारत-विभाजन का सुझाव दिया जिस पर मेजर लार्ड ऐटली ने अपने प्रधान मंत्रित्व काल में अमल करते हुये पाकिस्तान व भारत दो स्वतंत्र देशों को सत्ता सौंप दी थी। पाकिस्तान तो तत्काल अमेरिकी प्रभुत्व में चला गया था किन्तु नेहरू जी ने गुट-निरपेक्ष आंदोलन के बैनर तले अमेरिका से दूरी बनाए रखी थी जिस कारण वह पाकिस्तान के माध्यम से भारत को परेशान करता रहा था। 1947 के बाद 1965 का संघर्ष भी उसी कड़ी में था और 1971 का बांग्लादेश व 1999 का कारगिल संघर्ष भी ।

जब जिया-उल-हक साहब की उपयोगिता अफगान समस्या के बाद समाप्त हो गई तब यू एस ए ने उनको अपने राजदूत की कीमत पर भी हवाई जहाज समेत उड़ा दिया था। ओसामा-बिन-लादेन के सफाये के साथ ही यू एस ए ने पाकिस्तान की सार्वभौमिकता को अमान्य कर दिया है। उसके लिए अब पाकिस्तान उपयोगी नहीं रह गया है विशेषकर तब जब मोदी के नेतृत्व में आर एस एस समर्थक सरकार भारत में गठित हो चुकी है। जब सरकार के माध्यम से भारत को अपने समर्थन में यू एस ए खड़ा देख रहा है तब पाकिस्तान के अस्तित्व का मतलब ही क्या रह जाता है? 
अनुच्छेद 370 को समाप्त कराने की मांग उठाते रहे लोग जब सत्ता में मजबूती से आ गए हैं तब बिना पाकिस्तान के अस्तित्व के ही 'जोजीला'दर्रे में स्थित 'प्लेटिनम' जो 'यूरेनियम' के उत्पादन में सहायक है यू एस ए को देर सबेर हासिल होता दीख रहा है । अड़ंगा चीन व रूस की तरफ से हो सकता है और उस स्थिति में भारत-भू 'तृतीय विश्वयुद्ध' का अखाड़ा भी बन सकती है। देश और देश कि जनता का कितना नुकसान तब होगा उसका आंकलन वर्तमान सरकार नहीं कर सकती है तो क्या विपक्ष भी नहीं करेगा ? और जनता से तादात्म्य स्थापित करने का कोई प्रयास साम्राज्यवाद विरोधी खेमे की ओर से भी अभी तो नहीं हो रहा है अभी तो वही पुरानी लीक ही पीटी जा रही है जिसका इस देश कि जनता पर कभी भी कोई भी असर हो ही नहीं सकता है। 

प्रस्तुत समाचार व अमेरिकी प्रवक्ता के बयान के लिंक  यू एस ए अभियान की पुष्टि करते हैं।


http://navbharattimes.indiatimes.com/world/america/is-us-hinting-at-covert-operation-after-pathankot-terror-attack/articleshow/50516993.cms?

  इस वक्त पाकिस्तान को झुका कर यू एस ए भारत में मोदी की हैसियत को मजबूत करना चाहता है जिनकी सरकार का लोकप्रिय होना दीर्घकालीन अमेरिकी हितों के अनुरूप होगा। निकट भविष्य में पाकिस्तान के स्थान पर कई छोटे-छोटे देश सृजित करवा कर अमेरिका भारत की बहुसंख्यक जनता के दिलों में अपना राज जमा कर अपने देश के व्यापारिक हितों को ही साधेगा जबकि यहाँ की जनता को लगेगा कि वह यहाँ कि बहुसंख्यक जनता का हितैषी है और यह सब मोदी व उनकी सरकार के चलते संभव हुआ है। 

अतः इस बात की कोई सम्भावना नहीं है कि ( जैसा कि इतिहासकार महोदय कल्पना कर रहे हैं ) मोदी साहब शास्त्री जी जैसी (1965 ) या इंदिरा जी जैसी (1971 ) दृढ़ता दिखाएंगे। तब तक भारत से नेहरू जी की  व्यावहारिक नीतियों का सफाया नहीं हुआ था और देश का स्वाभिमान कायम था। लेकिन 1975  में हुये देवरस-इन्दिरा 'गुप्त-समझौते' के तहत 1980 में इंदिराजी की पुनर्वापसी से देश में आर एस एस का जो प्रभाव बढ़ना शुरू हुआ था वह 1991 में मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री बनने के साथ ही मजबूत होता गया तथा 13 दिन, 13 माह और 60 माह की ए बी वाजपेयी सरकारों के दौरान उसने शासन-प्रशासन और इंटेलीजेंस में तगड़ी पकड़ बना ली थी। मनमोहन सिंह जी का 120 माह का कार्यकाल आर एस एस की दोहरी खुशियों का था जिसमें सत्ता व विपक्ष उसके ही इशारे पर चल रहा था। मोदी के सत्तारोहण ( जिसमें मनमोहन सिंह जी का सक्रिय योगदान है ) से सत्ता तो सीधे-सीधे आर एस एस से ही प्रभावित है किन्तु अब विपक्ष को पुनः अपनी पकड़ में लाने हेतु आर एस एस तमाम तिकड़में एक साथ चल रहा है। आ आ पा के रूप में उसे एक नया राजनीतिक दल तो मिल ही चुका है पुराने क्षेत्रीय दलों जैसे सपा, बसपा आदि-आदि को अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करके आर एस एस राजनीति में व्यापक रूप से अपने पैर पसार रहा है। भारत में सर्वहारा (दलित ) वर्ग को व्हाईट हाउस की नीतियों के तहत मोदी के पीछे गुप-चुप ढंग से लामबंद किया जा रहा है। 

अफसोसनाक बात यह है कि साम्राज्यवाद विरोधी साम्यवाद/वामपंथ के हिमायती यू एस ए व आर एस एस के इस अभियान का कोई विकल्प न प्रस्तुत करके उनकी चालों का शिकार होते जा रहे हैं और अपने ही हाथों अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चलाते जा रहे हैं। पोंगापंथ, ढोंगवाद/ब्रहमनवाद तेजी से अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है और प्रगतिशीलता/वैज्ञानिकता के नाम पर जिस तरीके से उसका विरोध किया जाता है उससे उसे अत्यधिक मजबूती ही मिलती जाती है। आज जब जनता को वास्तविक धर्म का मर्म समझाये जाने कि ज़रूरत थी तब माकपा महासचिव उसी पोंगापंथ के पथ का अनुसरण करके अंततः अपने विरोधियों को ही शक्तिशाली बनाने का कार्य शुरू कर चुके हैं। आज शासन में  तो अब संभव ही नहीं  है  अतः विपक्ष में लाल बहादुर शास्त्री जैसे अदम्य साहसी नेता की परमावश्यकता है जो जनता का दिल जीत कर किसान,जवान और मजदूर के हितों का संघर्ष चला कर नेतृत्व कर सके। 



~विजय राजबली माथुर ©
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