Thursday, January 5, 2012

विधानसभा चुनाव और बाम-पंथ


सन1942 ई .के भारत छोड़ो आंदोलन मे मात्र 17 वर्ष की आयु मे सक्रिय भाग लेने वाले ग्राम -कांकेरा,पोस्ट-अकबरपुर,जिला-मथुरा-281406 के मूल निवासी विजय आर्य सिद्धान्त शास्त्री जी आर्यप्रतिनिधि सभा से 26 वर्ष एक माह सम्बद्ध रह कर फिर स्वतंत्र रूप से स्वामी दयानन्द'सरस्वती' की नीतियों तथा उपदेशों के प्रचारक रहे हैं उनकी यह देश-भक्तिपूर्ण रचना आप भी देखें-


सुखदाई        सत         युग               लाना है। 
कलि         काल      कलंक        मिटाना      है। 
नित     प्रातः    प्रभु       गुण              गायें गे । 
सिर    मात -पिता        को                नायें  गे। 
शुचि संध्या यज्ञ रचाएंगे। सुंदर सुगंध फैलाएँगे। 
                                    दुर्गुण दुर्गंध मिटाना है। । 1 । । 


कुल क्रूर कुरीति तोड़ेंगे,पापों का भण्डा  फोड़ेंगे । 
सब दुष्कर्मों को छोड़ेंगे,सत कर्म से नाता जोड़ेंगे। 
                                  सबको यह पाठ पढ़ाना है। । 2 । । 


कभी मदिरा मांस न खाएँगे,फल फूल अन्न ही पाएंगे। 
भूले भी कुसंग न जाएँगे,मिल मेल मिलाप बढ़ाएँगे। 
                                   सत प्रेम की गंग बहाना है। । 3 । । 


जो निर्बल निर्धन भाई है,हरिजन मुस्लिम ईसाई है। 
इस देश के सभी सिपाही हैं,सब एक राह के राही है। 
                                    समता का सूर्य  उगाना है। । 4 । । 


वेदों  को पढ़ें पढ़ाएंगे ,यज्ञों को      करें   कराएंगे।  
ताप दान शील अपनाएँगे,ऋषियों के नियम निभाएंगे। 
                                   बन 'विजय' वीर दिखलाना है। । 5 । ।   


सर्व-प्रथम आचार्य श्री राम शर्मा ने गायत्री परिवार बना कर (जो अब उनके पुत्र और दामाद के बीच दान के बँटवारे को लेकर विवाद मे है) आर्यसमाज और इसके वेदिक सिद्धांतों पर जोरदार हमला बोला एवं पुनः ढोंग-पाखंड को चतुर्दिक फैला दिया। उसके बाद विभिन्न 'बापू' ,'स्वामी' आते गए और पाखंड का जैकारा लगवाते रहे। 1925 मे आर एस एस के गठन के बाद तो द्रुत गति से स्वामी दयानन्द के बताए मार्ग को ध्वस्त किया गया। इस सांप्रदायिक /साम्राज्यवादी/आलोकतांत्रिक संगठन ने 'आर्यसमाज' मे प्रबंध के स्तर पर भी घुस कर उसे मूल सिद्धांतों से भटका दिया। इसलिए हो सकता है कि कहीं-कहीं आर्यसमाज के मंच से आर एस एस ने अपनी बात कहला दी हो । लेकिन क्यों?स्वामी सहजानन्द 'सरस्वती' और गेंदा लाल दीक्षित सरीखे वरिष्ठ आर्यसमजी नेता जहां क्रांतिकारी कम्युनिस्ट रहे हों वहाँ कम्युनिस्टों का आर्यसमाज को समर्थन न देना ही आर एस एस के लिए मैदान खुला छोड़ देने के कारण ही तो। सी पी एम ,पश्चिम बंगाल से संबन्धित एक विद्वान खुल कर ढ़ोंगी -पाखंडी लोगों का समर्थन और आर्यसमाज तथा स्वामी दयानन्द की नाहक निंदा करते हैं-

मुरारीबापू की कथा में अनेक ऐसी बातें आती हैं जो समानतावादी और विवेकपूर्ण विमर्श को बढ़ावा देती हैं। कायदे से मुरारीबापू को मासकल्चर के अंग के रूप में पढ़ें,वे मासकल्चर के अंग के रूप में भारतीय पाठ बना रहे हैं। मुरारीबापू का मानना है विवेक चार प्रकार से मिलता है। 



एक जमाने में दयानन्द सरस्वती और आर्यसमाज ने मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति तीखी नफरत का इजहार किया था। वे इन दोनों को राष्ट्रीय एकीकरण का हिस्सा नहीं मानते थे। भारत में राष्ट्रीय एकीकरण में अल्पसंख्यकों को रखना होगा। विकास में भी उन्हें शामिल करना होगा। वरना समाज अपंग बनेगा।भाजपा को अपनी अल्पसंख्यक विरोधी भावनाओं को त्यागकर राष्ट्रीय एकता के निर्माण में सहयोग करना चाहिए।







पुराण की एक कथा है। देवताओं को पता लगा कि पृथ्वीलोक में सहजानंद नामक एक ऐसे अनूठे साधक रहते हैं, जो भक्ति साधना में कुछ समय लगाने के बाद अधिकांश समय लोगों की सेवा करने, बीमारों का उपचार करने, बच्चों को शिक्षा देने जैसे परोपकार के काम में बिताते हैं। राग, द्वेष, लोभ, अहंकार, आसक्ति जैसे दुर्गुण उन्हें छू भी नहीं पाए हैं। 


लाउडस्पीकरसे आवाजें घर पर सुनायी दे रहीं थीं एक वेद-प्रचारक महोदय गा रहे थे-

(यह भजन पिछले वर्ष हमारे घर के समीप हो रहे एक आर्यसमजी कार्यक्रम मे जनता को सुनाया गया था,जिसका अर्थ है कि अभी भी आर्यसमाज मे वास्तविक 'सत्य' बोलने वाले लोग हैं)


दौलत के दीवानों उस दिन को पहचानों ;
जिस दिन दुनिया से खाली हाथ चलोगे..
चले दरबार चलोगे....
ऊंचे-ऊंचे महल अटारे एक दिन छूट जायेंगे सारे ;
सोने-चांदी तुम्हारे बक्सों में धरे रह जायेंगे...
जिस दिन दुनिया से खाली हाथ चलोगे...
चले दरबार चलोगे.......
दो गज कपडा तन की लाज बचायेगा ;
बाकी सब यहाँ पड़ा रह जाएगा......
चार के कन्धों पर चलोगे..
.चले दरबार चलोगे......
पत्थर की पूजा न छोडी-प्यार से नाता तोड़ दिया...
मंदिर जाना न छोड़ा -माता-पिता से नाता तोड़ दिया...
बेटे ने बूढ़ी माता से नाता तोड़ दिया ;
किसी ने बूढ़े पिता का सिर फोड़ दिया....
पत्थर की पूजा न छोडी ;मंदिर जाना न छोड़ा....
दया धर्म कर्म के रिश्ते छूट रहे;
माता-पिता से नाता छोड़ दिया....
उल्टी सीधी वाणी बोलकर दिल तोड़ दिया;
बूढ़ी माता से नाता तोड़ दिया.....
पत्थर की पूजा न छोडी मंदिर जाना न छोड़ा 
बूढ़ी माँ का दिल तोड़ दिया.....
वे क्या जाने जिसने प्रभु गुण गाया नहीं ;
वेद-शास्त्रों से जिसका नाता नहीं..
जिसने घर हवन कराया नहीं...
गुरुडम में फंस कर जिसने सत्य से मुंह मोड़ लिया ;
पाखण्ड को ओढ़ लिया ...
इसी कारण भारत देश गुलाम हुआ ...
भाई-भाई का आपस में घोर संग्राम हुआ ;
मंदिर ..मस्जिद तोड़े संग्राम हुआ.....
बुत परस्ती में लगा हुआ देश बुरी तरह गुलाम हुआ ;
देश मेरा बदनाम हुआ.....

कानों में आवाजें आ रहीं थीं कागज पर उतारा और आपको लिख दिया ;लेकिन सब बेकार है .हमारे फेसबुक / ब्लाग जगत में जहाँ सभी बुद्धीजीवी है -  पाखंड छोड़ने को तैयार नहीं तो आम जनता तो अबोध  है उससे क्या उम्मीद की जाये?


मेरठ सी पी एम से संबन्धित एक ब्लागर साहब तो मेरे पाखंड/ढोंग पर प्रहार का उपहास उड़ाने मे ही गर्व का अनुभव करते हैं जिस प्रकार कि,'गर्व से हिन्दू'होने का खुला ऐलान करने वाला सरकारी विभाग रेलवे का भ्रष्ट सर्जन। हालांकि खुलासा होने के बाद अब उस डॉ ने अपने प्रोफाईल से-'हिन्दी,हिन्दू,हिंदुस्तान'का स्लोगन हटा लिया है और इसी नाम का एक अलग ब्लाग खोल लिया है। एक तरफ सी पी एम यू पी मे चार दलों के बाम मोर्चा मे भी शामिल है दूसरी तरफ सी पी एम के लोग भाजपा/अन्ना के सर्वाधिकारवादी लोकपाल का भी समर्थन कर रहे हैं। 


आगामी माह होने वाले चुनावों मे यदि बाम मोर्चा को यू पी मे जनता के बीच अपनी स्थिति सुदृढ़ करनी है तो सन्त कबीर,स्वामी दयानन्द सरस्वती और स्वामी विवेकानंद के विचारों और दृष्टिकोण का सहारा लेकर ही भाजपा/ आर एस एस के मंसूबों को ध्वस्त किया जा सकता है। अब तक प्रचलित नीति का परिणाम यह हुआ है कि भाजपा आदि प्रतिगामी शक्तियाँ पूर्वज महापुरुषों के वचनों को तोड़-मरोड़ कर गलत-सलत व्याख्या प्रस्तुत करके जनता को मूर्ख बनाने मे कामयाब हो जाते हैं। उनके लिए धर्म का मैदान खुला छोडने की नीति ही वह मुख्य कारण है कि वे गलत होते हुये भी सफल रहते हैं और जनता का भारी अहित होता रहता है। 


संसदीय लोकतन्त्र मे धर्म (गलत रूप मे प्रचलित),जाति,संप्रदाय के नाम पर मतदाताओं को बहका कर पूंजीवादी दल बहुमत हासिल कर लेते हैं। कम्युनिस्ट पार्टियां और बाम-पंथी दल भी उसी गलत प्रचलित स्वरूप को धर्म मानने के कारण धर्म का विरोध करके जनता से कट जाते हैं और जनता का वोट हासिल नहीं कर पाते हैं। यदि 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या प्रस्तुत कर महापुरुषों के हवाले से जनता को समझाया जाए तो ढोंगियों की पोल खुल सकेगी और वे विफल हो जाएँगे। परंतु दिग्गज बाम-पंथी पुराणो और ढोंगियों का समर्थन व्यक्त करके क्या भाजपा के ही मंसूबों को नहीं पूरा कर रहे हैं?


       *                *                 *

भाकपा ने प्रत्याशियों की दूसरी सूची जारी की

अगली विधान सभा में मजबूत उपस्थिति दर्ज करेगी भाकपा
लखनऊ 5 जनवरी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने विधान सभा चुनावों के लिये आज अपनी दूसरी सूची जारी कर दी है। इससे पहले भाकपा 30 सीटों पर प्रत्याशियों की सूची जारी कर चुकी है। इस तरह भाकपा अब तक कुल 45 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर चुकी है। भाकपा अपनी अगली सूची शीघ्र ही जारी करेगी।
सूची जारी करते हुए भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने बताया कि भाकपा प्रदेश में चारों वामपंथी दलों के साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतर रही है। इसके अलावा धर्मनिरपेक्ष, जातिनिरपेक्ष, प्रगतिशील एवं जनवादी कई अन्य पार्टियों से चुनावी तालमेल की कोशिशें जारी हैं।
भाकपा राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा है कि भाकपा प्रदेश में एक संवेदनशील, संघर्षशील एवं सशक्त वामपंथी विकल्प को आगे बढ़ाने के काम में जुटी है। वह महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा के बाजारीकरण, भूमि अधिग्रहण और कानून-व्यवस्था के सवाल पर केन्द्र एवं राज्य सरकारों को बेनकाब करने के प्रयासों में जुटी रही है। इसके अलावा भाकपा सत्तालोलुप जातिवादी एवं सम्प्रदायवादी पार्टियों के मंसूबों को भी जनता के सामने बेनकाब करती रही है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदेश की आम जनता में व्याप्त व्यापक चेतना के कारण आम जनता में वामपंथ के प्रति रूझान है और इस राजनैतिक वातावरण में निश्चय ही भाकपा और वामपंथ अगली विधान सभा में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करेंगे, इस दृढ़ विश्वास के साथ भाकपा चुनाव मैदान में उतर रही है।


भाकपा द्वारा जारी दूसरी सूची
1 -    पड़रौना                                   सगीर अहमद
2 -    गौरा                                       मसीहुद्दीन चौधरी
3 -    मेहनौन                                  श्रीमती मीनू वर्मा
4 -    महाराजगंज (सुरक्षित)            राम केवल पासवान
5 -    उतरौला                                  धर्मेन्द्र कुमार मिश्र
6 -    जहूराबाद                                शमीम अहमद
7 -    खागा                                      राम राज एडवोकेट
8 -    हुसैनगंज                                राकेश कुमार प्रजापति
9 -    बांगरमऊ                               राज बहादुर त्रिवेदी
10 -    ओबरा                                 सर्वचन्द पाण्डेय
11 -    अयोध्या                              अशोक तिवारी
12 -    फूलपुर                                इम्तियाज बेग
13 -    लालगंज (सुरक्षित)              उमेश चौधरी
14 -    आज़मगढ़ सदर                   जमील आज़मी
15 -    बबेरू                                   श्रीमती गीता सागर


Tuesday, January 3, 2012

इसमे ब्लाग-लेखन भी शामिल है


न्याय मूर्ति मार्कन्डेय काटजू साहब के विचार स्कैन पर डबल क्लिक करके देखें । सिर्फ पत्रकारों पर ही नहीं ब्लागर्स पर भी इन्हें लागू माना जाना चाहिए।
हिंदुस्तान --03/01/2012 
न्यायमूर्ति काटजू ने बेबाक कहा है-"जब मीडिया 90 फीसदी मनोरंजन करे और महज 10 फीसदी हिस्से मे वास्तविक और सामाजिक -आर्थिक मसले को उठाए ,तो साफ है कि उसने अपने कर्तव्यों के अनुपात के मायने भुला दिये हैं। "

अभी -अभी एक ब्लागर साहब ने अपने ब्लाग मे ब्लागर्स को पत्रकारों के समान मान्यता-सुविधाएं देने की मांग उठाई है। इससे पूर्व 11 सितंबर 2011 को लखनऊ मे हिन्दी ब्लागिंग का इतिहास पुस्तक के विमोचन के अवसर पर भी वक्ताओं ने ब्लागिंग को पांचवा खंबा बता कर इसे मान्यता-सुविधाओं की मांग उठाई थी। अब जरा काटजू साहब के निष्कर्ष के संदर्म्भ मे ब्लागर्स भी यदि अपना 'आत्मावलोकन' करें तो मीडिया से भिन्न स्थिति यहाँ भी नहीं है। लगभग अधिकांश लेखन रौब-दाब,प्रदर्शन और अहंकार से भरा है।

किसी किसान नेता ने नहीं,मजदूर नेता ने नहीं बल्कि 'भारतीय प्रेस परिषद' के चेयरमेन न्यायमूर्ति काटजू ने कहा है-"यह कटु सत्य है कि लाखों किसानों की जमीने छिन चुकी  हैं। वे अपनी आजीविका खो चुके हैं। अब वे शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि शहरों मे नौकरी मिल जाएगी,जबकि ऐसा कतई नहीं है। ब्रिटेन मे औद्योगिक क्रांति के दौरान विस्थापित किसानों को नव-उत्पन्न उद्योगों मे नौकरियाँ मिल गई थीं। लेकिन भारत मे हाल के वर्षों मे उत्पादन कम हुआ है। कई फेक्टरियों मे ताले लग गए हैं। और अब उनके मालिक जमीन-जायदाद के धंधे मे कूद पड़े हैं। नतीजतन अधिकांश विस्थापित किसान विवश होकर घरेलू नौकर बन गए हैं या फिर फ़ेरीवाले का काम कर रहे हैं। यही नहीं बड़ी तादाद तो भिक्षावृत्ति को अपना पेशा बना चुकी है। ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं है ,जिनहोने खुद को मजबूरन आपराधिक धंधे और वेश्यावृत्ति मे उतार लिया है। कर्ज न चुकाने के चलते किसान ख़ुदकुशी भी कर रहे हैं। पिछले 15 वर्षों मे ढाई लाख किसान ख़ुदकुशी कर चुके हैं। अब भी 86 करोड़ भारतीय रोजाना 25 रुपए से कम मे गुजर-बसर करते हैं। यही नहीं, देशके 47 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। यह फीसदी अपने आप मे भयावह और त्रासद है,क्योंकि उप सहारा व अफ्रीकी देशों मसलन सोमालिया और इथोपिया मे भी आंकड़े इस स्तर तक नहीं पहुंचे हैं। एक तथ्य यह भी है कि अपने यहाँ गत 20 वर्षों मे नाटकीय तौर पर अमीरों और गरीबों के बीच की खाई और चौड़ी हुई है। "

इतना ही नहीं न्यायमूर्ति की वेदना को आगे देखिये वह क्या कहते हैं-"जाहिर है,यह एक बदसूरत तस्वीर है। ऐसे मे मीडिया द्वारा ज्यादा से ज्यादा फिल्मी खबरों को प्रकाशित-प्रसारित करने की प्रवृत्ति को क्या जायज ठहराया जा सकता है?क्या मीडिया जान-बूझ कर देश की वास्तविक चुनौतियों से लोगों का ध्यान नहीं हटा रहा है?क्या भारतीय मीडिया की भूमिका फ्रांस की महारानी एंतोईने की तरह नाही है,जो लोगों को यह सलाह देती थी कि अगर उनके पास रोटी नहीं है ,तो वे केक खाएं?मीडिया मे ज्योतिष आधारित अंधविश्वासी बकबक तो खूब होती है,जबकि उसे तर्कसंगत व वैज्ञानिक विचारों को तरजीह देनी चाहिए। ऐसे मे मीडिया की भूमिका क्यों जन-विरोधी नहीं है?"  

हमारे ब्लाग जगत मे भी धड़ल्ले से मनोरंजन हेतु ही लेखन हो रहा है। मुझ जैसा यदि कोई लिखता है तो वह उपेक्षित ही है। मैंने लगातार लिख कर आगाह किया है कि मनमोहन सिंह द्वारा 1991 से उदारवादी नीतियाँ जिन्हें अमेरिका जाकर आडवाणी साहब अपनी नीतियों को चुराया बता आए थे के कारण ही आज विषमता ,शोषण और भ्रष्टाचार बढ़ गया है। भ्रष्ट लोगों के संरक्षण हेतु इन्हीं पी एम साहब ,आर एस एस/भाजपा के सहयोग से अन्ना आंदोलन चला कर रोटी-रोजी ,मंहगाई,बेकारी -भूख आदि समस्याओं से ध्यान हटाया गया है। सरकारी रेलवे का सर्जन और दूसरे बड़े अधिकारी जो खुद सम्पन्न है अन्ना का लोगो लगा कर उसके गीत गाते हैं अर्थात गरीबों का उपहास उड़ाते और शोषण का पृष्ठपोशन करते हैं। बी एच ई एल का अवकाश प्राप्त इंजीनियर और रेलवे सर्जन खुले आम पोंगा-पंथ को बढ़ावा देते हैं।मै  जब ज्योतिष,धर्म आदि की वैज्ञानिक व्याख्या देता हूँ तो ऐसे ब्लागर्स मुझ पर शब्द बाण चलाते हैं। अतः मै सामझता हूँ कि न्यायमूर्ति काटजू ने जो पीड़ा मीडिया के संबंध मे व्यक्त की है वह ब्लागर्स पर भी लागू होती है। मै संतोष कर सकता हूँ कि उपेक्षित रह कर मैंने खुद को ऐसी भीड़ से अलग रखा है । 

Sunday, January 1, 2012

नव-वर्ष मंगलमय हो-'मानव' बन जाइये




एक आर्यसमाजी विद्वान ने 'मानव' की निम्नलिखित पहचान बताई है। यदि हम सभी 'मानव' बन जाएँ तो निश्चय ही आज से प्रारम्भ वर्ष 2012 हम सब को मंगलमय प्रतीत होगा-

त्याग-तपस्या से पवित्र-परिपुष्ट हुआ जिसका 'तन'है,


भद्र भावना -भरा स्नेह-संयुक्त शुद्ध जिसका 'मन' है। 


होता व्यय नित-प्रति पर-हित मे, जिसका शुचि संचित 'धन'है,


वही श्रेष्ठ -सच्चा 'मानव'है,धन्य उसी का 'जीवन' है। 

सन 1857 की 'क्रान्ति' की विफलता के बाद सन 1875 की चैत्र प्रतिपदा को स्वामी दयानन्द 'सरस्वती' ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की अलख जन-जन मे जगाने हेतु 'आर्यसमाज' की स्थापना की थी। उन्होने एक सुस्पष्ट राजनीतिक अवधारणा प्रस्तुत की थी। हालांकि आज उनके आर्यसमाज पर अधिकांशतः आर एस एस का नियंत्रण दिखाई देता है जो उनके सिद्धांतों के सर्वथा  विरुद्ध चलता है। मथुरा के भजनोपदेशक विजय सिंह जी ने स्वामी दयानन्द के मंतव्य को इस प्रकार स्पष्ट किया है-(और इस नव-वर्ष की पवन-बेला मे हम इसी प्रकार की व्यवस्था को भारत मे स्थापित किए जाने की सदाशा करते हैं)-

जिस दिन वेद के मंत्रों से धरती को सजाया जाएगा।
उस दिन मेरे गीतों का त्योहार मनाया जाएगा। ।

खेतों मे सोना उपजेगा      झूमेगी           डाली-डाली।
वीरानों की कोख से पैदा होगी जिस  दिन हरियाली। ।

विधवाओं के सूने मस्तक   पर   लाली           जब ।
दीन अनाथों निराश्रितों के घर-घर होगी खुशहाली । ।

निर्धन की कुटिया मे जिस दिन दीप जलाया जाएगा।
खलियानों की खाली झोली भर जाएगी मेहनत से। ।

इन्सानों की मजबूरी    जब टकराएगी      दौलत से।
सदियों की मासूम लड़कपन जाग उठेगा गफलत से। ।

कर्म वीर पौरुष के बेटे जब   जूझेंगे  किस्मत       से।
भूखे बच्चों को जिस दिन भूखा न सुलाया जाएगा। ।

जिस दिन काले बाज़ारों मे धन के   चोर नहीं  होंगे।
जिस दिन मदिरा के शौदाई तन के  चोर नहीं  होंगे। ।

जिस दिन सच कहने वालों के मन कमजोर नहीं होंगे।
अंडे मांस के खाने वाले   आदम   खोर   नहीं       होंगे। ।

झूठी रस्मों को जिस दिन नीलाम    कराया     जाएगा ।
वीर शहीदों के जिस दिन   कुर्बानी   की  पूजा  होगी। ।

बिस्मिल और सुभाष की जब जिन्दगानी  की पूजा होगी।
वीर शिरोमणि    झांसी  वाली रानी         की  पूजा होगी। ।

सब कुछ    दिया  देश  के हित  उस दानी की  पूजा होगी।
दयानन्द  के स्व्प्नो   को      साकार   बनाया     जाएगा। ।      

Friday, December 30, 2011

कारपोरेट घरानों की जीत/जनता की हार

स्कैन पर डबल क्लिक करके पढ़ें 

Hindustan-30/12/2011

इस वर्ष 2011 के शुरू मे धड़ाधड़ भ्रष्टाचार के मामलों का खुलासा CAG के प्रयासों के फल स्वरूप  हुआ था।एक एक कर राजनेता जेल भेजे गए। तह मे जाने पर जैसे ही लाभार्थियों मे रत्न टाटा,अनिल अंबानी,नीरा राडिया जैसे उद्योगपतियों और दलालों के नाम सामने आए और उनके विरुद्ध कारवाई की संभावना बनते दिखी वैसे ही कारपोरेट घरानों ने अपने अमेरिकी संपर्कों के सहयोग से पहले रामदेव फिर अन्ना को आगे करके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरू करा दिया। जम कर राजनेताओं और संसदीय संस्थाओं को कोसा गया।  ऐसा वातावरण सृजित किया गया जैसे सभी भ्रष्टाचार की जड़ यह संसदीय लोकतन्त्र और राजनेता ही हैं। खाता-पीता सम्पन्न वर्ग जो एयर कंडीशंड कमरों मे बैठ कर आराम फरमाता है और वोट डालने भी नहीं जाता है नेताओं के पीछे हाथ धोकर पड़ गया। कारपोरेट मीडिया ने इसी आराम तलब वर्ग के जमावड़े को जन-आंदोलन की संज्ञा दी। परंतु मैंने इसे देश मे तानाशाही लाने का उपक्रम बताया था।

उस समय अमेरिकी प्रशासन ने खुल कर अन्ना आंदोलन का समर्थन किया था। भाजपा सरकार से नियम/कानून विरुद्ध हिमाचल प्रदेश मे चाय बागान लेने वाले वकील साहब ने तब अमेरिकी सरकार के निर्णय का बड़ी ही बेशर्मी से स्वागत किया था। लेकिन अब 20 दिसंबर 2011 को उसी अमेरिकी सरकार के गुप्तचर संगठन CIAने अन्ना को आर एस एस /हुर्रियत कान्फरेंस के समक्ष तौल दिया है। 

जो लोग और खासकर वे विद्वान जो अन्ना/रामदेव का समर्थन करते रहे हैं इस बदलाव का कारण बता सकते हैं? शायद नहीं। जब अमेरिका अर्थ संकट से घिरा था उसके नागरिक असंतोष व्यक्त कर रहे थे -आकूपाई वाल स्ट्रीट उभार पर था तो अमेरिका ने बड़ी ही चतुराई से भारतीय कारपोरेट घरानों से मिल कर भारत मे रामदेव/अन्ना आंदोलन शुरू करा दिये जिससे यहाँ के लोग यहीं उलझे रहें और अमेरिका की आंतरिक दुर्दशा देख कर उससे खिचे नहीं। जून 2011 मे साईबेरिया की एक अदालत मे ISCON के संस्थापक द्वारा व्याख्यायित गीता जो योगीराज श्री कृष्ण की गीता से कहीं से भी मेल नहीं खाती है के विरुद्ध केस वहाँ की सरकार ने चला दिया। ISCON कोई धार्मिक संगठन नहीं है वह तो CIA की ही एक इकाई है लेकिन भारत के बुद्धिमान लोगों की बुद्धि का कमाल देखिये संसद मे भाजपा/सपा/राजद सभी के सांसद उस कृष्ण विरोधी/धर्म विरोधी गीता के बचाव मे एकत्र हो गए और हमारे विदेश मंत्री एस एम कृष्णा साहब ने रूसी सरकार पर दबाव डाला की अदालत उस गीता पर प्रतिबंध न लगाए। इत्तिफ़ाक से रूस मे प्रधानमंत्री ब्लादीमीर पुतिन साहब की चुनावों मे जीत को वहाँ की जनता ने धांधली करार दिया। भारत से संबंध मधुर बनाए रखने के लिए परेशान रूसी सरकार ने अदालत मे कमजोर पैरवी की और अदालत ने रूसी सरकार की याचिका खारिज कर दी। यह जीत भारत की जनता की नहीं अमेरिकी CIA की जीत है कि उसके सहयोगी संगठन को निर्बाध छूट मिल गई। इन्हीं दलों के साथ यू पी मे लोकायुक्त से परेशान बसपा ने भी 'संवैधानिक लोकपाल' का गठन नहीं होने दिया।

अन्ना आंदोलन के दौरान सभी भ्रष्टाचार -अभियुक्त जमानत पर रिहा हो गए। अब इस आंदोलन की जरूरत भी नहीं रह गई। अमेरिकी प्रशासन और CIA ने अन्ना टीम से हाथ खींच लिया। अतः यह पूरी तरह से कारपोरेट घरानों और अमेरिकी नीतियों की जीत है। देश की जनता की यह हार है। लोकपाल मे NGOs और कारपोरेट घरानों को जब तक नहीं शामिल किया जाता तब तक उसका गठन बेमानी ही है। 

Tuesday, December 27, 2011

परमात्मा पढे-लिखों को बुद्धि प्रदान करें



हिंदुस्तान,लखनऊ के दिनांक 25 दिसंबर 2011 के समपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित ऊपर के स्कैन कापियों को डबल क्लिक करके देखें। अखबार के प्रधान संपादक श्री शशि शेखर जी के लेख का यह अंश भी गौर करने लायक है जिसमे वह कहते हैं-"इस समय हर शहर की सड़कों व गलियों मे हमारे नेताओं के चाल,चरित्र और चेहरे पर सवाल उछल रहे हैं। भ्रष्टाचार ने समूची व्यवस्था को अपनी चपेट मे ले लिया है। यही वजह है कि कुछ गावों मे अपना प्रभाव रखने वाले अन्ना हज़ारे अचानक लोकप्रियता के शिखर पर पहुँच गए। सिर्फ दो दिन बाद लोकसभा लोकपाल पर चर्चा करने जा रही है । क्या यह बिल इस सत्र मे पास हो सकेगा?क्या सरकारी अथवा अन्ना और उनके साथियों द्वारा प्रस्तावित लोकपाल सारी बीमारियों का अकेला इलाज है?क्या हमारे माननीय सांसद अपनी साख पर उठ रहे सवालों पर चर्चा करेंगे?क्या इस बहस के बाद से राजनीतिक दल आत्मशुद्धि के बारे मे भी सोचेंगे?एक तरफ संसद सुलगते सवालों पर चर्चा कर रही होगी ,दूसरी तरफ अन्ना अपने आंदोलन की आग मे घी डाल रहे होंगे। सवाल उठता है कि यह देश संसद से चलेगा या सड़कों से?क्या यह बदगुमानी से शुरू हुये वर्ष का त्रासद अंत है?"

25 दिसंबर को ही प्रकाशित 'लोकसंघर्ष'के इस लेख को भी पढ़ें और मनन करें कि क्या अन्ना आंदोलन जन-हित मे है अथवा अर्द्ध सैनिक तानाशाही स्थापित करने के मंसूबों वाले शोषकों व उतपीडकों के हित मे।

http://loksangharsha.blogspot.com/2011/12/blog-post_25.html

जन पक्ष मे प्रकाशित इस कविता को भी ध्यान से पढ़ें और अन्ना के मंसूबों को समझें-


http://jantakapaksh.blogspot.com/2011/12/blog-post_14.html




अन्ना के वरदान-राष्ट्रध्वज के अपमान पर भी गौर फरमाये जो हिंदुस्तान मे पूर्व प्रकाशित है। और साथ-साथ अन्ना के मौसेरे भाई रामदेव जी की इस गाथा को भी पढ़ें जिसे 'तहलका' ने प्रकाशित किया है-



http://www.tehelkahindi.com/index.php?news=1050

'लोकसंघर्ष','जन पक्ष','समाजवादी जन-परिषद','मानवीय सरोकार','जंतर-मंतर',जैसे इने-गुने ब्लाग्स पर ही इनके संचालकों ने हकीकत बयान की है और अन्ना आंदोलन को आम जनता के शोषण-उत्पीड़न को पुख्ता करने वाला तथा कारपोरेट घरानों के भ्रष्टाचार का पोषण करने वाला बताया है। बाकी ब्लाग जगत झूठ,छल-फरेब ,तिकड़म से ओत -प्रेत ,अन्ना आंदोलन' के गुण गाँन  से रंगा हुआ पाया है। दुखद पहलू यह है कि पढे-लिखे इंटरनेटी शूर-वीर जो रामदेव-अन्ना के पक्षधर हैं बेहद बेहूदी और गंदी तथा भद्दी गलियों के साथ अन्ना/रामदेव  की पोल खोलने वालों के साथ  पेश आते हैंऔर खुद को 'खुदा' समझते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो दोहरा खेल खेलते हुये कहते हैं अन्ना जी ठीक हैं केवल उनका तरीका ही गलत है,उनसे निवेदन है कि वे निम्नलिखित वीडियो जरूर देखें-सुने-




यदि इतनी सब हकीकत जानने के बाद भी हमारे इंटरनेटी विद्वान अन्ना/रामदेव की भक्ति मे तल्लीन रहते हैं तब तो बाबू गोपाल राम गहमरी द्वारा व्यक्त विचार कि -'बुद्धि के रासभ और अक्ल के खोते ' ही उन पर चस्पा होता प्रतीत  होता है।

फेसबुक का हाल तो ब्लाग्स से भी ज्यादा बुरा है वहाँ तो अन्ना/रामदेव भक्त गलियों और भद्दी तसवीरों के प्रकाशन के लिए ही जाने जाते हैं। अधिकांश लोग गुमराह ही हैं किन्तु फिर भी अफलातून जी,अरुण प्रकाश मिश्रा जी,पंकज चतुर्वेदी जी,अमलेंदू उपाध्याय जी, ज़ोर शोर से और दबे -दबे स्वरों मे महेंद्र श्रीवास्तव जी
अन्ना और उनकी टीम की कारस्तानिये उजागर करते रहते हैं। हिन्दी साहित्य के जाने माने आलोचक वीरेंद्र यादव जी तो बुलंदगी के साथ कल (26 दिसंबर 2011) भी लिख रहे हैं ,पढ़िये और सोचिए-

अन्ना टीम के प्रमुख सदस्य प्रशांत भूषण को हिमाचल की भाजपा सरकार ने नियमों में विशेष छूट प्रदान कर एक बड़े चाय बागान की जमीन को खरीदने अनुमति प्रदान की . नियमानुसार हिमाचल के बाहर का व्यक्ति वहां जमीन नहीं खरीद सकता . प्रशांतभूषण की भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम और भाजपा सरकार द्वारा प्रदान की गयी इस छूट के निहितार्थों को समझा जाना चाहिए . क्या प्रशांत भूषण द्वारा यह छूट प्राप्त करना भ्रष्टाचार की सीमा में नहीं आता ? क्या यह कानून द्वारा स्वीकृत भ्रष्टाचार नहीं है ? ASSEMBLY
Prashant Bhushan’s society bought tea garden land
Tribune News Service

Dharamsala, December 23
A close aide of Anna Hazare, Prashant Bhushan, bought 4-68-28 hectares (122 kanals) of tea garden land in the Palampur area in the name of an educational society.

The information came in response to a question raised by the Congress MLA from Baijnath, Sudhir Sharma, in the Himachal Assembly today.

Sharma had sought details from the government regarding the number of permissions given by the present government under Section 118 of the Land Tenancy Act to purchase tea gardens in the state during a period extending from 2008 to November 2011.

While replying to the query Minister for Revenue Ghulab Singh informed the House that just one permission, to buy tea garden land, had been given during the said period. He said the Kumud Bhushan Educational Society, Kandbari, through Prashant Bhushan, son of Shanti Bhushan, resident of Noida, had been given permission to buy 4-68-28 hectares of tea garden land.

The sale and conversion of status of tea garden land in Himachal is strictly prohibited under the revenue laws. The status of tea garden lands, most of which are located in Kangra district, cannot be changed without permission from the state government

फेसबुक के जनवादी जन मंच और कम्युनिस्ट पार्टी ग्रुप तो खुल कर सच्चाई के साथ और अन्ना-ड्रामे के विरुद्ध हैं। मै लगातार अपने 'क्रांतिस्वर' एवं 'कलम और कुदाल' के माध्यम से अन्ना और उनकी टीम के विरुद्ध कारवाई किए जाने की मांग कर रहा हूँ। इसी ब्लाग मे पहले भी लिख चुका हूँ और 'विद्रोही स्व-स्वर मे' तो विस्तार से लिखा है कि,ईमानदारी के कारण आभावों मे जीवन यापन पिताजी ने भी किया और मै भी कर रहा हूँ। मै तो प्राईवेट लिमिटेड,पब्लिक लिमिटेड ,पार्टनरशिप और प्रोपराइटरशिप कंपनियों द्वारा प्रताड़ित भी इसी ईमानदारती की वजह से हो चुका हूँ। मै बखूबी जानता हूँ कि ये व्यापारी और उद्योगपति किस प्रकार पहले नंबर दो कमाते और फिर उसे कैसे नंबर एक मे बदलते हैं। इसी प्रक्रिया मे NGOs उनके बहुत बड़े सहयोगी हैं,मंदिर आदि चैरिटेबल ट्रस्ट इन व्यापारियों के 'काले धन' को एक मे बदलने के उपकरण हैं। ये सभी अन्ना/रामदेव आंदोलनों की 'रीढ़'हैं। मैंने शुरू से ही अन्ना आंदोलन को भ्रष्टाचार संरक्षण का सबसे बड़ा रक्षा-कवच बताया है। 


कुछ ब्लाग्स को रामदेव और कुछ को अन्ना के चलते अनफालों करना पड़ा एवं फेसबुक से करीब एक दर्जन लोगों को अपनी फ्रेंड लिस्ट से हटाना पड़ा। मेरी सुस्पष्ट एवं सुदृढ़ अवधारणा है कि जो लोग अन्ना/रामदेव के समर्थक हैं वे सब राष्ट्र -भक्त नहीं हैं और आम जनता के हितैषी तो कतई नहीं हैं । इसी ब्लाग मे लेखों के माध्यम से बताया है कि आर एस एस की नीति है कि शहरों का 3 प्रतिशत व गावों का 2 प्रतिशत जन समर्थन हासिल करके वह अपनी अर्द्ध-सैनिक तानाशाही स्थापित कर सकता है। उसी की कड़ी हैं ये अन्ना/रामदेव आंदोलन जो 'संसदीय लोकतन्त्र ' को नष्ट-भ्रष्ट करने हेतु चलाये गए हैं और महाराष्ट्र हाई कोर्ट की फटकार के बावजूद रुके नहीं हैं। अब इन लोगों ने न्यायपालिका को भी चुनौती देनी शुरू कर दी है। सरकारी सर्जन,डाक्टर, इंजीनियर ,अफसर जो कहीं न कहीं भ्रष्टाचार मे संलिप्त रहे हैं  बड़ी ही बेशर्मी से अन्ना का समर्थन अपने-अपने ब्लाग्स मे कर रहे हैं। 21 वर्षों से जिनकी 'उदारवादी' नीतियों का स्व्भाविक परिणाम भ्रष्टाचार मे द्रुत-वृद्धि है वह पी एम साहब अन्ना की पीठ पर हैं ,इसलिए सरकारी मैनुयल्स का उल्लंघन करने वाले इन ब्लागर्स एवं फेसबुकियों के विरुद्ध कोई कारवाई नहीं हो सकी है।

मै सन 2011 की समाप्ती से पूर्व 'परमात्मा' से प्रार्थना करता हूँ कि 'पढे-लिखे' किन्तु घोर अज्ञानी इन इंटरनेटी विद्वानों को सद्बुद्धि प्रदान करें जिससे कि आने वाले वर्ष 2012 मे हमारे देश और इसकी बहुसंख्यक गरीब -उत्पीड़ित जनता के पक्ष मे ये इंटरनेटी शूर-वीर भी खड़े हो सकें और देश तथा देश की जनता का कल्याण हो सके। धनाढ्यो के 'रक्षस आंदोलनो' को इन विद्वानों का समर्थन समाप्त हो सके।क्योंकि जिसके पीछे वे भाग रहे हैं वह तो 21 सैनिकों की  बे-मौत जिंदगी छीनने का जिम्मेदार है जैसा कि प्रोफेसर अरुण प्रकाश मिश्रा जी ने कल फेसबुक पर सूचित किया है-


एक आदमी पूरे देश की आम जनता को गुमराह कर रहा है, उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहा है, दिवा-स्वप्न दिखा रहा है और पढ़े-लिखे लोग चुप देखते रहें, यह इतिहास के साथ विश्वासघात है | ज़रुरत हरेक पल इसके मसूबों के पर्दाफाश करने की है |

२१ बहादुर जवानों से भरे ट्रक को छोड़कर जो ड्राईवर भागकर अपनी जान बचा ले और बहादुर जवान उस के भागने से मारे जाएँ, उसे 'भगोड़ा' नहीं तो क्या 'भारत-रत्न' कहेंगे !! कृष्ण अगर रथ को छोड़कर भाग गए होते तो क्या अर्जुन जीवित बचते???

देखिये पूर्व फौजी जेनरल के विचार-http://vijaimathur.blogspot.com/2011/12/blog-post_27.html