Tuesday, July 24, 2012

इन पोंगा पंडितों के रहते भारत मे साम्यवाद दूर की कौड़ी

19 अप्रैल  2012 को 'रेखा  -राजनीति मे आने की सम्भावना' मेरा लेख प्रकाशित हुआ और राष्ट्रपति महोदया ने 26 अप्रैल 2012 को 'रेखा जी' को राज्यसभा के लिए मनोनीत कर दिया तो अगले ही दिन 27 अप्रैल 2012 को  'साम्यवाद के पोंगा पंडित' इन महोदय ने मुझ से  संपर्क किया क्योंकि तब उनकी मान्यता यह थी -
क्रांति स्वर.....: बामपंथी कैसे सांप्रदायिकता का संहार करेंगे? ---
September 19, 2011
Arun Prakash Mishra

  • dekh liyaa ... bahut behtar

  • April 27
    Arun Prakash Mishra


    • Vijai ji, how much you charge?
      Arun


  • April 27
    Vijai RajBali Mathur
    • कामरेड आप क्यों चार्ज की चिंता करते हैं?अपना या परिवार के किसी भी सदस्य का आप निसंकोच पूछ सकते हैं। कई ब्लागर्स को जिनमे दो इस समय केनाडा मे हैं मैंने बिना किसी चार्ज के बताया है और उन्होने उसका लाभ भी उठाया है। वे अपनी विचार धारा के भी नहीं हैं। आप अपने हैं किसी प्रकार की चिंता किए बगैर संबन्धित व्यक्ति का जन्म समय,तारीख,स्थान और संभव हो तो दिन भी भेज देंगे मै विवरण तैयार कर दूँगा। विशेष प्रश्न हो तो उसका भी उल्लेख कर दें।


  • April 27
    Arun Prakash Mishra


    • 14:45
      3-Nov-1955
      kanpur
      videsh ki kyaa sthiti ban rahee hai?


  • April 27
    Vijai RajBali Mathur
    • कल दिन मे आपको विवरण गणना करके भेज दूँगा।


  • April 28
    Arun Prakash Mishra
    • dhanyavad aur aabhaar.

    • April 28
      Vijai RajBali Mathur
      • मिश्रा जी आपका विश्लेषण बना कर ई-मेल मे सेव कर लिया है। कृपया अपना ई-मेल एड्रेस दें जिससे आपको भेज सकें क्योंकि मेसेज मे न आ सकेगा।


    • April 28
      Arun Prakash Mishra
      • drapm@ymail.com

03-11-1955, 14-45 pm,कानपुर पर आधारित विश्लेषण

Vijai mathur
Apr 28

from: Vijai mathur vijai.jyotish@gmail.com
to: drapm@ymail.com
date: Sat, Apr 28, 2012 at 8:28 PM
subject: 03-11-1955, 14-45 pm,कानपुर पर आधारित विश्लेषण
mailed-by: gmail.com
अरुण प्रकाश मिश्रा जी,
नमस्ते,

 03-11-1955, 14-45 pm,कानपुर पर आधारित विश्लेषण 

आपके द्वारा दी गई उपरोक्त विषयक सूचना के अनुसार आपकी जन्म कुंडली संलग्नक के अनुसार निम्नवत होगी-

लग्न-कुम्भ,राशि-मिथुन,नक्षत्र-मृगशिरा तृतीय चरण,कार्तिक कृष्ण चतुर्थी,विक्रमी संवत-2012,शाक-1877,परिध योग,वनिज कारण,दिन-गुरुवार है। 
चतुर्थ भाव मे-वृष का केतू। 
पंचम भाव मे -मिथुन का चंद्रमा। 
सप्तम भाव मे-सिंह का ब्रहस्पति। 
अष्टम भाव मे -कन्या के बुध व मंगल। 
नवां भाव मे-तुला के सूर्य और शनि। 
दशम भाव मे-वृश्चिक के शुक्र व राहू। 

इन सब का सम्मिलित प्रभाव इस प्रकार है-

सभ्य,शांत एवं कुलीन होने के साथ-साथ 'दार्शनिक' विचार धारा के धनी होंगे। दूसरों की सेवा-सहायता व सहानुभूति को सदा तत्पर रहते होंगे। खरी-खरी कहने मे हिचकिचाहट महसूस नहीं करते होंगे। क्रोध आपको जितना शीघ्र आता होगा उतना ही शीघ्र उतर भी जाता होगा। ऐसे संकेत हैं कि बचपन मे सिर मे चोट लगी होगी। जीवन के 52,54,55वे वर्ष अच्छे रहे होंगे। आगे 60वां वर्ष भी अच्छा रहने के योग हैं। आप खुद भी आराम कम करते होंगे और अधीनस्थों को भी आराम न करने देते होंगे। पत्नी भाव मे बैठा -ब्रहस्पति जहां एक ओर आपको विद्वान,कला-प्रिय,व गुणज्ञ बना रहा है वहीं यह आपकी पत्नी को सफल एवं समझदार भी बना रहा है एवं तुनक-मिजाज भी। काव्य,संगीत व नाटक मे भी आपकी अभिरुचि हो सकती है। वृद्धावस्था आनंदमय रहेगी-पूर्ण संतान-सुख प्राप्त रहेगा। 

उच्चाधिकार,मान-प्रतिष्ठा मे बाधाएँ उपस्थित होती होंगी। शत्रु अधिक होंगे व परेशान करने वाले होंगे। नवां भाव स्थित शनि ( जो लग्नेश भी है और  उच्च का भी है)तथा दशम भाव गत राहू आपको सक्रिय राजनीति मे सफलता अवश्य ही दिलाएँगे। आपके जैसा राहू डॉ राजेन्द्र प्रसाद,नेताजी सुभाष बॉस,सदा शिव कान्होजी पाटील,चंगेज़ खाँ एवं महात्मा गांधी की कुंडलियों मे भी था जिसने उन्हें राजनीति मे इतना मान दिलाया किन्तु इन सब को चतुर्थ के केतू ने जीवन के अंतिम वर्षों मे कष्ट भी प्रदान किया अतः आप 'बचाव एवं राहत प्राप्ति' हेतु अभी से ही-'ॐ कें केतवे नमः' का प्रतिदिन जाप 108 या कम से कम 27 बार पश्चिम की ओर मुंह करके तथा धरती और अपने बीच इंसुलेशन बनाते हुये किसी ऊनी आसन आदि पर बैठ कर करें और 'केतू' के दुष्प्रभाव को टालने का प्रयास करें। 

स्वास्थ्य -

कफ,सर्दी,दमा,पीलिया,त्रिदोष,क्षय,जलोदर,मोतिया,लीवर की खराबी,प्रमेह,रक्त-पित्त,सूजन,कैंसर आदि रगों के होने की संभावना है। वृद्धावस्था मे पेट एवं छाती के रोग भी हो सकते हैं। 

अतः आप खट्टी वस्तुओं एवं तेल से बनी चीजों का सेवन न करें। बीड़ी ,तंबाकू,शराब से दूर रहें। 

                                     शुभ                                                                                                अशुभ 


दिन-    सोम,शुक्र व मंगल ,ब्रहस्पतिवार ।                                                                                                  बुध व रविवार ।                                             शनिवार  -हानीदायक। 


रंग-  पीला,लाल,सफ़ेद,क्रीम।                                                                                                                  हरा व नीला।                                                  **************************

शुभ रंगों के वस्त्र धारण करें या कम से कम किसी एक रंग का रूमाल ही साथ रखें।                                           अशुभ रंगों का प्रयोग न करें न ही इन रंगों की पुताई कराएं। 

समय सारिणी 

19-11-1999 से 18-05-2008 तक समय शुभ व सफलता का था। 

19-05-2008 से 15-05-2009 तक 'भूमि' लाभ का समय था। 

16-05-2009 से 03-12-2011 तक हानीदायक समय था। 

04-12-2011 से 09-03-2014 तक लाभदायक समय चल रहा है। प्रयास करके पूरा लाभ उठा लें चूकें नहीं। 

10-03-2014 से 18-11-2016 तक वैसे तो समय सामान्य है और अधिक प्रयास करके ही लाभ उठा सकते हैं किन्तु इसी दौरान 60वा  वर्ष भी आएगा अतः 59 वर्ष पूर्ण करते ही विशेष प्रयास द्वारा विशेष लाभ उठा लें। ढील न होने दें। 

19-11-2016 से 21-10-2018 तक समय उन्नति,लाभ,सुख का रहेगा तदनुकूल प्रयास करते रह कर लाभ अवश्य लें। 

22-10-2018 से 21-05-2019 तक 'हानीकारक' समय है। बचाव एवं राहत प्राप्ति हेतु प्रतिदिन 108 बार-ॐ सों सोमाय नमः'का जाप करें। 

22-05-2019 से 18-10-2019 तक 'रोगकारक' समय रहने की संभावना है। प्रतिदिन-108 बार 'ॐ अंग अंगारकाय नमः'का जाप करें। 

19-10-2019 से 06-11-2020 तक चिंता एवं बाधा का समय है। इससे निबटने हेतु प्रतिदिन-108 बार 'ॐ रा राहवे नमः' का जाप करें। 

07-11-2020 से 08-11-2023 तक समय अनुकूल,धन लाभ का एवं शुभ है। सद्प्रयास से लाभ उठाएँ। 

दान न दें-

1-छाता,कलम,मशरूम,घड़ा,हरा मूंग,हरे वस्त्र,हरे फूल,सोना,पन्ना,केसर,कस्तूरी,हरे रंग के फल,पाँच-रत्न,कपूर,हाथी-दाँत,शंख,घी,मिश्री,धार्मिक पुस्तकें,कांसा और उससे बने बर्तन आदि।

2-सोना,नीलम,उड़द,तिल,सभी प्रकार के तेल विशेष रूप से सरसों का तेल,भैंस,लोहा और स्टील तथा इनसे बने पदार्थ,चमड़ा और इनसे बने पदार्थ जैसे पर्स,चप्पल-जूते,बेल्ट,काली गाय,कुलथी, कंबल,अंडा,मांस,शराब आदि।


विदेश की स्थिति- 

जन्म कुंडली का प्रथम भाव- आत्मा,मस्तिष्क और शरीर का प्रतिनिधित्व करता है,तृतीय भाव -विदेश यात्रा का और नवां भाव -लंबी यात्राओं का। 

आपका लग्नेश 'शनि' नवम भाव मे शुक्र की राशि मे आत्मा के कारक सूर्य के साथ स्थित है। तृतीयेश 'मंगल'अष्टम भाव मे बुध की राशि मे और बुध के साथ स्थित है जबकि बुध की दूसरी राशि मे चंद्र जो मन का कारक होता है स्थित है । शुक्र दशम भाव मे मंगल की राशि मे राहू जो शनि सदृश्य फल देता है के साथ स्थित है। 

इस प्रकार आपके प्रथम 'लग्न' भावके स्वामी 'शनि' का तृतीय भाव के अधिपति मंगल के साथ शुक्र का वहाँ स्थित होने से एवं नवम भाव के स्वामी से उसकी राशि मे वहीं स्थित होने से घनिष्ठ संबंध है। 

ग्रहों के अनुसार आपको लंबी विदेश यात्राएं सम्पन्न करते हुये काफी समय विदेश मे गुजारने के हैं और उन्हीं के अनुरूप आप विदेश यात्राएं करते रहेंगे। 

जहां तक मेरा निष्कर्ष है आप विदेश मे बसेंगे नहीं क्योंकि आपको 'राजनीति' मे सक्रिय भूमिका निभानी है और उसके लिए आपको देश सेवा करनी ही होगी। अब से अक्तूबर 2018 तक महा दशा और अंतर्दशा के हिसाब से आपका समय आपके पक्ष मे है ,आप खुद अपने हिसाब से निर्णय करके इस दौरान सक्रिय होंगे। 

हम चाहते हैं कि आप शीघ्र राजनीति मे उच्च पद ग्रहण करें। हमारी शुभ कामनाएँ आपके साथ हैं। हम भी कह सकेंगे कि ये महान व्यक्ति हमारे पूर्व परिचित हैं। 
Picture 004.jpg
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लेकिन अफसोस यह कि यह व्यक्ति महान नहीं हैं। पत्रकार 'यशवन्त  सिंह' के जेल जाने पर मदन तिवारी जी,अमलेंदू उपाध्याय जी एवं दयानन्द पांडे जी के लेखों को मैंने भी शेयर किया और पत्रकार की रिहाई की मांग का समर्थन किया। तभी से यह भड़क गए और इनहोने यशवन्त सिंह की गिरफ्तारी को जायज ठहराया क्योंकि इनके खुद के संबंध विनोद कापड़ी से रहे हों प्रतीत होते हैं। 'लाल झण्डा यूनिटी सेंटर'-फेसबुक के ग्रुप मे मैं और यह साहब दोनों ही एडमिन थे। मैंने तो इनकी असभ्य एवं अश्लील भाषा प्रयोग (वह भी तब जब यह मुझसे निशुल्क सेवाएँ प्राप्त कर चुके थे)के बावजूद 'लोकतान्त्रिक स्वतन्त्रता' के भाव के कारण इनको नहीं निकाला किन्तु इनहोने मुझे उस ग्रुप से ब्लाक कर दिया । मुझे न तो ग्रुप से हटने पर कोई हानि है और न ही यदि यह मुझे भाकपा से भी निकलवा देंगे (जैसा कि उपरोक्त टिप्पणी से स्पष्ट होता है)तो कोई हानि होगी।वैसे भाकपा के तीन वरिष्ठ नेताओं ने मुझसे कुंडलियाँ बनवाई हैं। लखनऊ के ज़िला सचिव जो मुस्लिम संप्रदाय से हैं श्री कृष्ण को 'साम्यवाद का प्रयोग्कर्ता' बताने मे नहीं झिजकते हैं। प्रदेश सचिव जो ब्राह्मण जाति मे जन्मे हैं 'शिव की जटाओं से गंगा निकालने' की बात कहने मे नहीं शर्माते। राष्ट्रीय एक सचिव  ने 02 फरवरी 2011 की जनसभा मे खुले आम राम चरित मानस से उद्धरण दिये थे। अगर साम्यवाद को जन-प्रिय बनाना है तो जनता को समझाना ही होगा। 'स्टालिन' तक को कम्युनिस्ट न मानने वाले पोंगा साम्यवादी पंडित ए पी मिश्रा जी कुछ ज़्यादा ही प्रकांड विद्वान हैं वह और तरक्की करें,हमारी शुभकामनायें हैं। 


प्रेस और जनता के बीच भाकपा द्वारा जो नया मसौदा जारी किया गया है उसके अनुसार पार्टी भारत के विद्वानों के उद्धरण लेकर जनता के बीच जाना चाह रही है। मेरे प्रयास पहले से ही अपने ब्लाग के माध्यम से इस दिशा मे चल रहे थे और चलते रहेंगे। लेकिन ए पी मिश्रा जैसे 'साम्यवादी पोंगा पंडितों' के रहते भारत मे साम्यवाद का  प्रचार व प्रसार असंभव है क्योंकि ये लोग प्रचलित व्यवस्था मे अपना हित निहित होने के कारण उसका पोषण और पुष्टि करते रहते हैं। यदि 'मनसा-वाचा-कर्मणा' यह साम्यवाद के पोषक होते तो यूनिटी सेंटर को 'ए पी डिक्टेटरशिप सेंटर'मे न तब्दील करते और वस्तुस्थिति को समझते। यह शख्स इतने गरूर मे भरा हुआ है कि देखिये इंनका प्रवचन-

 चूंकि इन महाशय ने अपनी थीसिस मे स्टालिन को गलत साबित किया है इसलिए सारी दुनिया को मान लेना चाहिए कि स्टालिन कम्युनिस्ट नहीं था यह है इनकी अवधारणा। जो यह कहें उसे पूरी दुनिया माने और यह खुद किसी की बात भी नहीं सुन सकते।साम्राज्यवादियो के हित मे इस व्यक्ति ने स्टालिन की आलोचना की तो उस पर डाकटरेट मिलना ही था।  यदि ऐसे लोगों के हाथ मे साम्यवाद को लागू करने का प्रोग्राम दे दिया जाये तो यह सब कुछ गुड-गोबर कर डालेंगे जिससे सारी योजना ही ध्वस्त हो जाये। इंनका उद्देश्य तो यथा-स्थिति बनाए रख कर अपने जन्म-जाति बंधुओं के व्यापार (ढोंग-पाखंड-आडंबर)को बल प्रदान करना है। इनकी कुंडली का विश्लेषण जो इनको भेजा था उसकी कापी ऊपर प्रस्तुत कर दी है। किन्तु जो बातें उस विश्लेषण मे देना उचित नहीं समझा था उनको भी अब उजागर करना आवश्यक है।

 हालांकि किसी की जन्म पत्री का विश्लेषण गोपनीय रखा जाता है और किसी दूसरे को नहीं बताया जाता है परंतु इस अहंकारी और उच्छ्श्रंखल व्यक्ति का विश्लेषण असाधारन और विशेष परिस्थितियों मे सखेद  सार्वजनिक करना पड़ रहा है। क्योंकि जैसा कि इनकी उपरोक्त टिप्पणियों से स्पष्ट है कि यह अपनी फेसबुक वाल तथा लाल झण्डा यूनिटी सेंटर ग्रुप मे मेरे प्रति कुत्सित टिप्पणियाँ सार्वजनिक रूप से करते आ रहे हैं। अतः इंनका चरित्र उजागर करना लाजिमी हो गया था।

पूना मे प्रवास कर रही एक ब्लागर महोदया ने भी 'रेखा' वाले मेरे आलेख की खिल्ली उड़ाई थी जबकि वह अपने बच्चों की चार कुंडलियाँ मुझसे बनवा चुकी थीं। परंतु चेतावनी के बाद फिर उनकी गतिविधियां फिलहाल रुक गई जबकि  विदेश मे प्रवास कर रहे  पंडित ए पी मिश्रा जी बार-बार ,लगातार फेसबुक और इसके ग्रुप मे मेरे विरुद्ध अनावश्यक विष-वमन करते जा रहे हैं। 'जनहित' मे दी गई स्तुतियों को इस शख्स ने 'चाशनी की जलेबी' और मेरे वाचन को 'भारी आवाज़' बताया है। 'स्तुतियाँ' मैंने नहीं रची हैं वे विद्वानों की खोज हैं। मुझे सिर्फ  लोगों के भले का संदेश देना था अपनी आवाज़ को लोकप्रिय बनाना उद्देश्य न था जो पहले गायन सीख कर आता। 'मोटे फ्रेम का चश्मा' अपनी हैसियत या पसंद के अनुसार लगाता हूँ। कोई दूसरा कौन होता है हिदायत देने वाला फिर उम्र मे पौने चार वर्ष छोटे एहसान फरामोश ए पी मिश्रा जी की बातों पर तवज्जो क्यों दी जाये?

यह महाशय अपने कुटुम्ब के साथ द्वेष रखते होंगे। यह ज़रूरत से ज़्यादा कपटी एवं स्वार्थी होंगे। जलाघात एवं वृक्षाघात का इनको सामना करना पड़  सकता है। पुत्रों की ओर से भी इनको दुख मिल सकता है। इनके व्यवहार से इनकी पत्नी का स्वास्थ्य कमजोर रहता होगा और उनको उदर संबंधी रोगों-लीवर /किडनी का भी सामना करना पड़ सकता है। चूंकि इनहोने सार्वजनिक ग्रुप मे मेरे ज्योतिषीय ज्ञान की खिल्ली उड़ाई है अतः इन्हें मेरे द्वारा बताए गए उपायों एवं मंत्रों का सहारा नहीं लेना चाहिए क्योंकि मखौल उड़ाते हुये मंत्रों का प्रयोग उल्टा भी पड़ सकता है। नैतिकता का भी यही तक़ाज़ा है कि जिस बात की खिलाफत करते हैं उससे लाभ न उठाएँ। 

परंतु अहम सवाल तो यह है कि 'साम्यवादी सोच' के लोग इनको साथ लेकर किसका भला कर सकेंगे ?जनता का तो नहीं ही। जब तक ऐसे लोग साम्यवादी विचार धारा मे रहेंगे तब तक भारत मे 'साम्यवाद' की कल्पना दिवा-स्वप्न ही है।

Sunday, July 22, 2012

साम्यवाद के शत्रु ये मार्क्सवादी' ---

हिंदुस्तान,लखनऊ,29 -04 --2012

क्या यह एक कार्टूनिस्ट की कपोल कल्पना है या हकीकत इसे जानने के लिए इस आलेख को गंभीरता से पढ़ना और समझना पड़ेगा। जब मार्क्स का आविर्भाव हुआ था उस समय यूरोप खास कर जर्मनी और इंग्लैंड मे कारखांनदारों द्वारा मजदूरों का शोषण चरम पर था और वहाँ प्रचलित ईसाई धर्म लोगों को कुरीतियों मे जकड़े हुआ था। इसलिए मजदूरों की दशा सुधारने के लिए जो नियम मार्क्स ने निर्धारित किए उनमे धर्म को बिलकुल वर्जित कर दिया। आज हमारे देश के 'मार्क्सवादी' महर्षि कार्ल मार्क्स के इसी नियम को उस प्रकार चिपकाए हुये हैं जिस प्रकार एक बंदरिया अपने मारे हुये बच्चे की खाल को चिपकाए हुये घूमती है। मार्क्स ने तो यह भी कहा था कि जब सम्पूर्ण औद्योगीकरण हो जाएगा और शोषण चरम पर पहुँच जाएगा तब मजदूर वर्ग संगठित होकर 'सर्व हारा वर्ग का अधिनायक वाद' स्थापित कर लेगा। क्या ऐसा ही हुआ ? कदापि नहीं 1917 मे जब रूस मे जार के विरुद्ध क्रांति हुई तो रूस एक कृषि प्रधान देश था और यह क्रांति विभिन्न छोटे-छोटे दलों ने मिल कर की थी जिंनका बहुमत था जिसे रूसी भाषा मे 'बोलेश्विक' कहते हैं इसी लिए इस क्रांति को 'बोलेश्विक क्रांति' कहते हैं। इस क्रांति मे वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी का भी योगदान था किन्तु यह कम्युनिस्टों के नेतृत्व मे नहीं हुई थी। व्लादीमीर इलीच लेनिन जो एक स्कूल इंस्पेक्टर के बेटे थे स्व-निर्वासित थे वह तो सफल क्रांति के बाद रूस लौटे और सरकार का नेतृत्व अपने हाथ मे लेकर वहाँ कम्युनिस्ट शासन उन्होने स्थापित कर दिया। जिसे आगे स्टालिन ने मजबूत किया।

इसी प्रकार जब 1949 मे माओत्से तुंग के नेतृत्व मे चीन मे कम्युनिस्ट शासन स्थापित हुआ तब चीन भी एक कृषि प्रधान देश था। अतएव रूस और चीन दोनों बड़े देशों मे बगैर औद्योगीकरण पूर्ण हुये ही कम्युनिस्ट क्रांतियाँ कर दी गई जो मार्क्स के कथनानुसार गलत कदम था किन्तु इसे कोई मार्क्सवादी गलत नहीं कहता। उनकी सनक और ज़िद्द केवल धर्म के संबंध मे है और भगवान शब्द के संबंध मे। ये तथाकथित मार्क्सवादी विद्वान संकीर्ण सोच को त्यागना ही नहीं चाहते। कई बार समझाने का प्रयत्न किया है कि धर्म -हिन्दू,ईसाई ,इस्लाम आदि-आदि संप्रदाय नहीं हैं इनमे से एक ईसाइयत को देख और धर्म मान कर मार्क्स ने उसे अफीम कहा था। वस्तुतः धर्म=जो शरीर को धरण करने योग्य है,जैसे सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। मार्क्स ने इनका विरोध कब और कहाँ किया है?लेकिन जड़ मार्क्सवादी इसलिए धर्म के विरुद्ध हैं कि ऐसा मार्क्स का कथन है। इसी प्रकार भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)=प्रकृति के इन पाँच तत्वों के मेल को भगवान कहते हैं और चूंकि ये खुद बने हैं इनको किसी ने बनाया नहीं है अतः इन्हे 'खुदा' भी कहते है। G(जेनेरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) करने के कारण इनको ही गाड भी कहते हैं। जब मार्क्स ने इस पर विचार ही नहीं किया फिर विरोध करने के लिए मार्क्स की आड़ लेना कौन सी अक्लमंदी है?

विदेश मे बैठे और उद्योगपतियों-व्यापारियों के हितैषी एक महाशय जो खुद को बड़ा मार्क्सवादी चिंतक विचारक बताते नहीं अघाते मुझ पर इसलिए आक्रोशित हैं क्योंकि मैं मदन तिवारी जी,अमलेंदू उपाध्याय जी ,दयानन्द पांडे जी के आलेखों को शेयर करके युवा साहसी पत्रकार 'यशवन्त सिंह' का समर्थन कर रहा हूँ। यह तथाकथित कामरेड विनोद कापड़ी आदि उतपीडकों के हितचिंतक हैं। इन साहब ने फेसबुक के  'लाल झण्डा यूनिटी सेंटर' ग्रुप मे क्या लिखा एक बानगी देखें-




  •  पहले यह क्या रहे और अब क्यों बदले?---
  •  
  • Vijai RajBali Mathur

    • कृपया मेरा यह आलेख देखने का कष्ट करें-

      http://krantiswar.blogspot.com/2011/09/blog-post_18.html

      धन्यवाद!


    • क्रांति स्वर.....: बामपंथी कैसे सांप्रदायिकता का संहार करेंगे?
      krantiswar.blogspot.com
      अरे भई लीडर नहीं,मैं तो प्लीडर हूँ प्राफेसर नहीं-प्रूफ़ रीडर हूँ . आग फूस की मत मुझको समझो,न एक बबूला हूँ. मत समझो मुझको छैनी,मैं तो एक वसूला हूँ मिट्टी का माधव मैं नहीं,कहलो शेर ए मिटटी हूँ मत समझना मुझको अणु विभु से भारी तुम- परमाणु की एक गिट्टी हूँ
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  • September 19, 2011
    Arun Prakash Mishra
    • dekh liyaa ... bahut behtar


  • September 19, 2011
    Vijai RajBali Mathur

    • धन्यवाद मिश्रा जी।


  • April 27
    Arun Prakash Mishra


    • Vijai ji, how much you charge?
      Arun


  • April 27
    Vijai RajBali Mathur
    • कामरेड आप क्यों चार्ज की चिंता करते हैं?अपना या परिवार के किसी भी सदस्य का आप निसंकोच पूछ सकते हैं। कई ब्लागर्स को जिनमे दो इस समय केनाडा मे हैं मैंने बिना किसी चार्ज के बताया है और उन्होने उसका लाभ भी उठाया है। वे अपनी विचार धारा के भी नहीं हैं। आप अपने हैं किसी प्रकार की चिंता किए बगैर संबन्धित व्यक्ति का जन्म समय,तारीख,स्थान और संभव हो तो दिन भी भेज देंगे मै विवरण तैयार कर दूँगा। विशेष प्रश्न हो तो उसका भी उल्लेख कर दें।


  • April 27
    Arun Prakash Mishra


    • 14:45
      3-Nov-1955
      kanpur
      videsh ki kyaa sthiti ban rahee hai?


  • April 27
    Vijai RajBali Mathur
    • कल दिन मे आपको विवरण गणना करके भेज दूँगा।


  • April 28
    Arun Prakash Mishra
    • dhanyavad aur aabhaar.


  • April 28
    Vijai RajBali Mathur
    • मिश्रा जी आपका विश्लेषण बना कर ई-मेल मे सेव कर लिया है। कृपया अपना ई-मेल एड्रेस दें जिससे आपको भेज सकें क्योंकि मेसेज मे न आ सकेगा।


  • April 28
    Arun Prakash Mishra
    • drapm@ymail.com
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट होगा कि पंडित ए पी मिश्रा जी ने मुझसे अपना ज्योतिषीय विश्लेषण मंगवाया था जो मैंने उनके द्वारा दी  गई  आई डी पर भेज दिया था। पत्रकार यशवंत सिंह के मामले मे वह मुझसे यशवंत सिंह का समर्थन करने के कारण रुष्ट हो गए और अनर्गल बयानबाजी 'लाल झण्डा यूनिटी सेंटर' ग्रुप मे करने लगे जब उनकी असलियत बताने की बाबत कहा तो उन्होने मुझे उस ग्रुप से हटा कर ब्लाक कर दिया। वस्तुतः ऐसे ही पोंगा-पंडितों ने भारत मे साम्यवाद को अछूत बना रखा है। ये लोग जन-हितैषी विश्लेषण ही बर्दाश्त नहीं कर सकते तो जनता का हित क्या खाक करेंगे? साम्यवादी सिद्धांतों को तो जनता से दूर रखने के दोषी हैं ही ये दकियानूस लोग।---21 july  2012



उपरोक्त के अवलोकन से बिलकुल साफ-साफ स्पष्ट है कि पहले तो तथा कथित कामरेड ए पी मिश्रा जी ने मुझसे अपना ज्योतिषीय विवरण हासिल किया फिर 'भस्मासुर' की भांति मुझ पर ही प्रहार करने लगे। माननीय विवेकानंद त्रिपाठी जी का कथन बिलकुल सही है। किन्तु जब पंडित ए पी मिश्रा जी लगातार आक्रमण किए जा रहे हों तब चुप रहने का मतलब खुद को गलत साबित करना होता। मिश्रा जी के और भी हमले देखें-


इन पंडित जी की भाषा का तमाशा तो दिखा ही दिया है।'लाल झण्डा यूनिटी सेंटर' ग्रुप  मे मैं भी एडमिन था इनकी भाषा मे अभद्रता और अश्लीलता के आधार पर मैं भी इनको हटा सकता था किन्तु 'लोकतान्त्रिक स्वतन्त्रता' का पक्षधर होने के कारण मैंने ऐसा नहीं किया। किन्तु खुद एडमिन होने का लाभ लेकर इन पंडित जी ने मुझे ग्रुप से हटा दिया लेकिन खुद CPM पॉलिट ब्यूरो को क्या आदेश दे रहे हैं देखिये-


विदेश मे बैठे यह पंडित जी बड़ी एप्रोच वाले हैं क्यों नहीं लखनऊ,भाकपा को आदेश देते मुझे हटाने वास्ते?न तो मैं किसी ग्रुप से न किसी राजनीतिक दल से व्यक्तिगत लाभ उठाता हूँ जो मुझे कोई घाटा होगा। मैंने सदैव लोगों को अपना समय और दिमाग खर्च कर मदद ही दी है जो यह पंडित जी खुद भी लाभ ले चुके हैं।

ए पी मिश्रा जी सरीखी सोच के मार्क्सवादी ही आज भारत मे साम्यवाद के सबसे शत्रु हैं जो 'राम' की तुलना 'ओबामा' से किए जाने को साम्यवादी सोच बताते हैं और मेरे द्वारा 'राम' को 'साम्राज्यवादी रावण' का संहारकर्ता बताना उनको गैर साम्यवादी लगता है। एक ओर भाकपा अपने नए दस्तावेजों द्वारा भारतीय विद्वानों के माध्यम से भारत की जनता से निकट संबंध बनाना चाहती है दूसरी ओर विदेश मे बैठे ए पी मिश्रा जी और भारत मे उनके पिछलग्गू उल्टी गंगा बहाने मे लगे हैं ताकि 'साम्यवाद' जनता से दूर ही बना रहे एवं शोषकों की लूट बदस्तूर जारी रहे। यही चिंता है कार्टून कार राजेन्द्र धोड़पकर जी की। 

Tuesday, July 17, 2012

श्रद्धांजली सभा की सैर




साभार फेसबुक
इस स्लोगन को देखा,पढ़ा और सोचा तो क्यों न अपनी श्रद्धांजली सभा ही आयोजित कर ली जाये। क्योंकि बाद मे कौन मेरे बारे मे क्या कहेगा मुझे कैसे पता चलेगा?वैसे यह विचार मेरा खुद का मौलिक नहीं है। आर्यसमाज,कमलनगर-बलकेशवर,आगरा मे जब पांचवा रविवार पड़ता था तो एक सन्यासी -स्वामी स्वरूपानन्द जी प्रवचन देने आते थे वह अक्सर प्रबन्धकों से यही निवेदन करते थे कि उनके जीते जी उनकी श्रद्धांजली सभा आयोजित कर दें जिससे वह भी जान सकें कि उन्हें किसने क्या कहा। लेकिन ऐसा होता कहाँ है ?अतः उनकी श्रद्धांजली सभा उनके मरणोपरांत ही हुई थी। हमारे देश मे बुरे से बुरा व्यक्ति भी मरणोपरांत पूजनीय हो जाता है फिर वह तो सन्यासी प्रचारक थे। सभी ने उनकी तारीफ़ों के पुल बांधे जिनमे वे लोग भी शामिल थे जिन्हें उनकी बातें 'शूल' की तरह चुभा करती थीं। 

पूरन चंद एंड कंपनी आगरा मे 'गोदरेज'  की एक मशहूर फर्म थी जहां टाईप राइटर से लेकर लाकर,सेफ आदि सभी उपलब्ध थे। पूरन चंद जी के बड़े बेटे ने शिक्षा संस्थान भी खोल लिए थे जो भारी मुनाफा देते हुये चल रहे थे। पूरन चंद जी को आर्यसमाज,आगारा का भामाशाह कहा जाता था। उनके पुत्र और पौत्र भी पूरन चंद जी के लिहाज मे आर्यसमाजी थे (व्यवहार मे थे या नहीं यह नहीं पता ) किन्तु उनके प्रपौत्रों की पीढ़ी इन विचारों पर नहीं चलना चाहती थी और पूरन चंद जी उनको भी बांधे रखना चाहते थे। अपने एक और प्रपौत्र के नामकरण संस्कार को 'अग्रसेन सेवा सदन,'कमला नगर,आगरा मे  उन्होने बड़े पैमाने पर आयोजित किया था और उसमे 'आचार्य' के रूप मे स्वामी स्वरूपा नन्द जी को सादर आमंत्रित किया था। उनके रिश्तेदार,नगर के आर्यसमाजी तथा अन्य तमाम लोगों के मजमे के बीच अपने प्रवचन के बीच मे स्वामी जी ने कहा -"आपके खानदान मे पैसा ,प्रतिष्ठा,पढ़ाई अभी तक सब कुछ है,लेकिन आगे सब कुछ अच्छा नहीं है क्योंकि पैसा तो एक 'वेश्या' और एक 'कसाई' के पास भी हो सकता है लेकिन समाज मे उनकी हैसियत क्या होती है ?" उन्होने आगे कहा-"यदि कमाया गया पैसा किसी का शोषण करके आया है या अपनी कमाई से किसी ज़रूरतमन्द की भलाई नहीं की जाती है तो वह कसाई और वेश्या की कमाई से भी बदतर है। " इतना सुनते ही पंडाल मे एकदम मुरदनी छा गई पूरन चंद जी के पौत्र और प्रपौत्र सभी के चेहरे गुस्से से लाल हो गए। उनके पुत्र गण सबको समझाने लगे। स्वामी जी ने ऐलान कर दिया वह कार्यक्रम छोड़ कर जा रहे हैं क्योंकि उनकी भावी पीढ़ियों को सही बात सुनना पसंद नहीं है। पूरन चंद जी ने पहले अपने परिजनों को लगभग डपटते हुये कहा कि तुम लोग बिगड़ने लगे हो इसलिए स्वामी जी को बुलाया था कि उनकी फटकार से सम्हल जाओ नहीं खुद तो डूबोगे ही और उनका नाम भी ऊपर से डुबाओगे। फिर स्वामी जी की मनुहार की। स्वामी जी ने फिर चंद शब्दों मे ही प्रवचन समाप्त कर दिया।

स्वामी जी की इच्छा उनके जीवन काल मे उनकी श्रद्धांजली सभा आयोजित करने की पूर्ण न हो सकी। अतः मैंने सोचा कि क्यों न इन्टरनेट के खुले मैदान मे खुद की श्रंधाजली सभा खुद ही आयोजित कर ली जाये। तो देखिये मुझे श्रद्धांजली देते हुये किसने क्या कहा-

(वैसे नाम आदि सभी 'काल्पनिक' हैं किन्तु यदि संयोग से किसी का नाम,पद आदि उससे मिलता-जुलता हो तो वह खुद अपने लिए न समझे) 

एस जी (मैं हू-मैं हूँ)---पर्ले दर्जे का मूर्ख और बेपर की उड़ाने वाला चला गया चलो अब जनता को राहत मिली।

एम के(दिल्ली ) ---इस आदमी को तो बंगाल की खाड़ी मे पहले ही डुबा देना चाहिए था।

एम के (कलकत्ता )---यह सनकी जन नायक अन्ना का सबसे बड़ा विरोधी था बताओ "अन्ना के पीछे नहीं भागें तो किसके पीछे भागें"?अब अन्ना आंदोलन की खिलाफत कम होगी और भ्रष्टाचार  खूब फूले फलेगा।

ए पी म ---यह जातिवादी था और नेगेटिव एप्रोच वाले सुभाष बोस का समर्थन करता था मेरे 'स्टालिन' की खिलाफत के जवाब मे इसने 'लेनिन' के दोष सामने रख दिये थे चलो अब राहत मिली।

एम एस ---कभी मैं मार्क्सवादी शिक्षक था और आज एक तो कोई मुझे पूछता ही नही उस पर भी यह बीच-बीच मे 'धार्मिक-भटकाव' खड़े कर देता था अब कोई विघ्न नहीं डाल पाएगा।

पी सी जी ---इसको गोडसे की किताब पढ़ने को कहा था नहीं पढ़ी 'शिव' को 'बामदेव'-बामपंथी कहता था। चलो अब रोड़ा हट गया।

डॉ अंतर्मंठन---अन्ना के आशय पर संशय नहीं करना चाहिए इतना क्या कह दिया इसने दनादन अन्ना विरोधी लेखों,वीडियों की झड़ी लगा दी। एक तो सबसे कटा रहा -टिप्पणियों का मामला गिव एंड टेक होता है। कौन इस पर टिप्पणी करता और कौन पढ़ता? बेकार का लिखना अब बंद हो गया।

एस एम  एम (पार्सल बाबू)---मैंने इसका मकान हड़पने की सोची थी इसके बेटे को तो दबोच लेता यह आगरा छोड़ कर लखनऊ भाग गया मुझे घाटा दे गया।

एस एम (काली पप्पी )---मैंने हर तरह के हथकंडे अपना कर इस आदमी को अपने कब्जे मे घेरने का हर प्रयास किया जिसे इसने विफल कर दिया और हम उसके मकान को हड़प न सके इस बात का तो मलाल रहेगा लेकिन अब चैन भी मिलेगा क्योंकि अब कौन पोल खोलेगा?

के एम एम (कुक्कू)---मैंने इसके सारे रिशतेदारों को तोड़ रखा है दुनिया मे जहां भी जाता मैं इसे परेशान रखता चलो झंझट खत्म हुआ।

के बी एम ---35 सालों तक साले को छकाए रखा ,लखनऊ जाकर पकड़ से निकल भागा था चलो अब कुक्कू भाई की तरह मुझे भी चैन मिला।

एस एम ---बड़ा 'आत्म कथा' लिखने चला था, अब रह गई न अधूरी।'कलम और कुदाल' लेकर 'क्रान्ति' और 'विद्रोह' के 'स्वर' बड़े 'जन हित' मे बुलंद करता था ,हो गई आस पूरी?

सी पी एम (मु),पूना ---मैंने तो खूब फेक आई डी बना कर खूब परेशान किया था अब किसे परेशान करेंगे?

उर्वशी (बब्बी ),पूना ---कमबख्त को सबके सब षडयंत्रों का पता नहीं कैसे पता चल जाता था अब कोई खतरा नहीं रहा।

टी पी,पूना---बहुत धम्की देता था बच्चों की  जन्म कुंडली के आधार पर  मखौल उड़ाने वाले का खुलासा कर देंगे अपनी कुंडली का कुछ पता था क्या?

यू पी एस,जूलाजिस्ट ---सारे राजनेता धूर्त होते हैं ,नेता गिरी करता था,अङ्ग्रेज़ी की,IAS आफ़ीसर्स की  खिलाफत करता था अब क्या कर लेगा?

डी डी आर आर ---कहता था 'हवन' करो कौन बैठेगा घंटों पुजारी को डिब्बा दिखाया और लड्डू खाया उसे गलत कहता था। अरे भाई डाइबिटीज़ नहीं होगी,दवा नहीं खाएँगे तो डॉ और केमिस्ट न भूखे मर जाएँगे?सबको स्तुतिए बाँट कर इलाज करता था, अमीरों की कोई फिकर ही नहीं थी अब चक्कर खत्म।

गरूरी सिंह---बहुत समझाया कि 1- 1 =0 होता है उसे इतनी सी गणित ही न समझ आई। शहर छोड़ कर चला गया। आगारा का पागलखाना छोड़ कर पगला लखनऊ गया था ,क्या हासिल कर लिया?

गरूरन (घमंडना)---मैंने बराबर कहा 1 और 1 ग्यारह (11 ) होता है यह भी न समझ आया। हाँ यह ज़रूर है कि उस आदमी ने जिसे मदद की उसने उसे धोखा दिया और जिससे संपर्क ही न था और  जिसके लिए कुछ न किया उसने वक्त पर उसका भला  किया और इसी वजह से हम सब मिल कर भी उसे परास्त न कर सके वह अकेला ही हम सबको परास्त कर गया।

आर एम ---मैंने उसे ट्रेंड किया और ऊपर उठाया इसलिए उसे मेरे गलत कार्यों मे भी मदद करनी चाहिए थी। वह सिद्धांतवादी बन कर अड़ गया। मैंने धमकाया कि "हमारी बिल्ली हमही से म्याऊँ?मैं हाथ पर बैठी मक्खी की तरह मसल कर फेंक दूंगा। " तपाक से कहता है  'मक्खी' तो बड़ा जीव है वह उससे भी छोटी 'चींटी' है और मुझे 'हाथी' और फिर  से कहता है कि बचा के सूंड को रखना कहीं उसमे चींटी घुस न जाये। जहां कोई मेरे सामने ज़ुबान नहीं खोल सकता था उसने मेरे अपने अज़ीज़ को मेरे खिलाफ खड़ा करके मुझे पदच्युत करा दिया। 9 वर्ष कमांडर रह कर 9 वर्ष सन्यास मे रहना पड़ा। कोई बात नहीं उसका काम सही था वह ईमानदार भी था फिर से कमांडर बनने पर मैंने उसे अपना सहायक बना लिया लेकिन वह मेरे चंगुल से निकल भागा। दरअसल मकान बेचने का आइडिया उसे मैंने ही दिया था मैं  सस्ते मे उससे लेना चाहता था। उसने मुझे भी चकमा दे दिया। वह जो कुछ भी था मेरे ही बदौलत था।

वी बी एस ---मैंने उसे दबाना चाहा वह दबा नहीं पता नहीं अकेले-अकेले कैसे इतने सबसे टकरा गया?मैंने सस्ते मे उससे मकान मांगा था उसने दो टूक मना कर दिया। फिर तो वह मुझसे अपनी तारीफ भी सुनने को राज़ी नहीं था उसके न रहने से एक हेंकड़ीबाज तो कम हुआ।

एस एस एस ---वह एक ईमानदार और सहयोगी आदमी था और ऐसा आदमी कभी किसी से दब नहीं सकता  ये सब लोग बेवकूफ थे जो आदमी की काबिलियत को न समझ कर उसे बेवकूफ मानते हुये उसकी प्रापर्टी हड़प करना चाहते थे। मेरे हर सार्वजनिक कार्यक्रम मे उसने मदद की और व्यक्तिगत बुलावे पर भी खुशी-खुशी आया। उसने केवल मुझ पर ही विश्वास किया मकान बेचने मे मैंने उसे मदद दी और उसने 'कैश' मेरे कस्टडी मे रखवाया। पूरी सर्विस मे 10 प्रतिशत कमीशन खाता रहा हूँ पर उस आदमी से मैंने 10 पैसे भी नहीं लिए। उसके शहर छोडने से मुझे 'सलाहकार'से वंचित होना पड़ा था अब उसके न रहने से मुझे क्या फर्क?

पी एस ,बालाघाट ---मैंने उसे उल्लू बनाना चाहा कि द्वादश भाव लग्न होता है तो उसने मुझसे ऐसा साफ्टवेयर बना कर देने को कह दिया। अब उसे कैसे समझाता कि उसे उल्लू बनाना चाहता था। पर वह था उल्लू ही 'अंधेरे' मे भी देख लेता था।

एन एस,बालाघाट ---  "निशाना बहुत सही है" यह व्यंग्य तब किया था जब वह सड़ा हुआ अमरूद तो खिड़की से पार न फेंक सका । परंतु सारी दुनिया को पार पाने का मार्ग बताता फिरता था। अब खुद पार पाया या कहीं भटक गया,क्या पता?

बड़का  ---इससे-उससे सबसे चकमा देकर भिड़ाने का प्रयास किया लेकिन वह किसी से न भिड़ कर मुझसे ही भिड़ गया  नतीजा क्या हुआ खुद का खात्मा।

बड़कन  ---कई बार आना टलवाया इस बार भी एड़ी-चोटी का दम लगाया लेकिन इस बार उसने कोई दाल न गलने दी तो क्या हुआ मैं भी अपनी दौरानी की असली जिठानी हूँ उससे तगड़ा व्यंग्य जड़ दिया -"फिर आइये,बार-बार आइये। " जबकि अपने जोरू के गुलाम को निर्देश दे दिया था उसको भीतर तक कचोट देने को जो उसने बखूबी किया और आज उसका परिणाम भी सामने आ ही गया।

एस वी,कदम कुआं ---मैंने ब्लाग जगत मे उसके विरुद्ध तगड़ी लाम बंदी कर रखी है  खुद अपने पर शक न होने देने के लिए उसे 'चरण स्पर्श','प्रणाम','मुझ पर शताब्दियों तक आशीर्वाद बनाए रखिए' जैसे शब्दों के जरिये उलझाना चाहता था। लेकिन लगता है वह सब समझ रहा था और मुझसे किनारा कर लिया। अब तो सबको ही उससे छुटकारा मिल गया।

पी टी ---'मार्कस्वाद' मे 'धर्म' का घाल-मेल कर देता था। कोरा सिद्धांतवादी था,व्यावहारिक ज्ञान से बहुत दूर। अरे भाई जब 'धर्म' भी ठीक हो जाये और 'मार्कस्वाद' भी तब हमारा क्या होगा?यह वह नहीं सोचता था उसे तो सब कुछ ठीक-ठाक करने की पड़ी रहती थी। दुनिया के लिए एकदम अनफ़िट और धरती पर बोझ था वह।

ए पी एम ---कुछ कहने से छूट गया था वह यह कि उस कामरेड को मैंने इन्टरनेट माध्यमों से दबाना चाहा यह जानते हुये भी कि वह मेरे बारे मे सब कुछ जानता है। मैंने ऊपर से अविश्वास रखते हुये भी अपनी जन्मपत्री का विश्लेषण उसी से कराया था।  टी पी तो पूना मे प्रवास करते हुये अपने बच्चों की जन्मपत्रियाँ बनवा कर धोखा दे सकती है तो मैं तो विदेश मे प्रवास कर रहा हूँ धोखा देने मे पीछे क्यों रहता?लेकिन उसका ज्ञान क्या था ?वह यह क्यों नहीं समझा कि मैं धोखेबाज़ शख्स था या वह जान बूझ कर मुझे एक्सपोज कर रहा था?चलो अब छुटकारा मिल गया।

इस श्रद्धांजली समारोह की संयुक्त रूप से अध्यक्षता कर रहे-ब्लागस्पाट और फेसबुक ने अब कोई वक्ता शेष न रहने के कारण मुझे बोलने को पुकारा। मेरा नाम सुनते ही  और मुझ पर निगाह पड़ते ही ए पी एम ने जेब से बाल पेन टाईप कुछ  निकाला और बटन दबा कर उसे कान मे खोंस लिया जैसे डाकिये अपने कान मे पेन लगा कर चलते हैं और कोई गेरुआ कपड़ा हिलाता हुआ 'भूत'---'भूत'---'भूत' चिल्लाता हुआ आसमान मे उड़ गया विदेश प्रवास को । बाकी लोग उस कामरेड का चमत्कार हैरानी पूर्वक निहारते रह गए।


मैंने अपनी ओर से कुछ न कह कर यही कहा कि , पत्रकार स्व .शारदा पाठक ने स्वंय अपने लिए जो पंक्तियाँ लिखी थीं ,मैं भी अपने ऊपर लागू समझता हूँ :-


लोग कहते हम हैं काठ क़े उल्लू ,हम कहते हम हैं सोने क़े .
इस दुनिया में बड़े मजे हैं  उल्लू   होने   क़े ..


ऐसा इसलिए समझता हूँ जैसा कि सरदार पटेल क़े बारदौली वाले किसान आन्दोलन क़े दौरान बिजौली में क्रांतिकारी स्व .विजय सिंह 'पथिक 'अपने लिए कहते थे मैं उसे ही अपने लिए दोहराता रहता हूँ :-

यश ,वैभव ,सुख की चाह नहीं ,परवाह नहीं जीवन न रहे .
इच्छा है ,यह है ,जग में स्वेच्छाचार  औ दमन न रहे ..








Tuesday, July 10, 2012

जनता की दुर्दशा के लिए उत्तरदाई कौन?









हाल ही में मथुरा में बाबा जयगुरूदेव का निधन हुआ है। ये स्वभाव से संत थे। इनके गुरू घूरेलाल मल्लाह थे। मेरे मथुरा स्थित घर में घूरेलाल का बराबर आना जाना था। मथुरा में हमारे घाट हैं 3 पैतृक।उनमें से एक घाट पर घूरे अपनी नाव लगाता था और सवारियां उठाता था। यमुना के उस पार वह झोंपड़ी बनाकर रहता था और वहीं पर बाबा जयगुरूदेव आरंभ में उनके पास ही रहते थे। बाबा जयगुरूदेव के पास आरंभ में कोई संपत्ति नहीं थी। लेकिन उनके मरने के बाद आज दैनिक भास्कर ने छापा है कि बाबा बेशुमार संपत्ति छोड़कर मरे हैं। लिखा है-
"ब्रह्मलीन हुए बाबा जय गुरुदेव की संपत्ति का हिसाब-किताब लगाया जा रहा है तो आंखें चौंधिया जा रही हैं। शुरुआती आकलन के मुताबिक बाबा 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का साम्राज्‍य छोड़ गए हैं। बाबा टाट के वस्‍त्र धारण करने की नसीहत देते थे, लेकिन उनकी संपत्ति से ठाठ का अंदाज लगाया जा सकता है। और अब यह संपत्ति उत्‍तराधिकार विवाद को गहरा सकती है।
संपत्ति में क्‍या-क्‍या बाबा के ट्रस्ट के मथुरा में आधा दर्जन से ज्यादा बैंक शाखाओं में खाते और एफडीहैं। एसबीआइ मंडी समिति ब्रांच के चालू खाते में एक अरब रुपए जमा बताए जाते हैं। कई अरब रुपए की एफडी भी हैं। अचल संपत्ति में ज्यादातर मथुरा-दिल्ली हाईवे पर एक तरफ साधना केंद्र से जुड़ी जमीनें हैं, तो दूसरी तरफ बाबा का आश्रम है। तीन सौ बीघे जमीन पर एक आश्रम इटावा के पास खितौरा में बन रहा है। एक आकलन के मुताबिक बाबा के ट्रस्ट के पास चार हजार एकड़ से ज्यादा जमीन है। जय गुरुदेव के ट्रस्ट के नाम से मथुरा में स्कूल और पेट्रोल पंप भी हैं। बाबा के आश्रम में दुनिया की सबसे महंगी गाड़ियों का लंबा काफिलाहै। इसमें पांच करोड़ से ज्यादा कीमत की लिमोजिन गाड़ी भी है। करोड़ों की प्लेमाउथ, ओल्ड स्कोडा, मर्सडीज बेंज और बीएमडब्ल्यू सहित तमाम गाडियों की कीमत 150 करोड़ के आसपास आंकी जा रही है।
दान से आय: आश्रम को हर महीने दस-बारह लाख रुपये का दान मिलता है। इसमें पूर्णिमा, गुरू पूर्णिमा और होली के आयोजनों पर आने वाला दान शामिल नहीं है। "
 ·  ·  · 52 minutes ago · 


    • Narendra Tomar धर्म और आध्‍यात्‍म की दुकान लगाने से बढिया धंघा और कोई नहीं है, और दुनिया भर के उपदेशों के बावजूद घोर लोभ लालच में फंसे हम आम 
      हिंदुस्‍तानियों को इन बाबा वैरागियों के हाथे लुटने में कोई हर्ज नही ल्गता है।
      19 minutes ago ·  ·  


'धर्म'और 'अध्यात्म' का जब विद्वान लोग ही गलत अर्थ ले रहे हैं तब आम जनता को क्या दोष दिया जाये?इसी ब्लाग के माध्यम से एक नहीं अनेकों बार स्पष्ट किया है कि-

धर्म=जो शरीर को धारण करने के लिए आवश्यक हो वही 'धर्म' है बाकी सब 'ढोंग-पाखंड और आडंबर।' 

अध्यात्म=अधययन +आत्मा=अपनी आत्मा का अध्ययन। 

अब ज़रा इन ढोंगियों के आचरण पर गौर करें तो स्वतः स्पष्ट हो जाएगा कि इंनका 'धर्म' और 'अध्यात्म ' से कोई संबंध है ही नहीं। इंनका उद्देश्य तो 'रोटी खाओ घी शक्कर से,दुनिया लूटो मक्कर से' होता है। जो लोग इन पाखंडियों का महिमामंडन करते हैं वे अपने निहित स्वार्थों के कारण ही ऐसा करते है न कि किसी 'परमार्थ'की भावना से। उत्तर-प्रदेश मे नए समाजवादी  मुख्यमंत्री और उनके पिता श्री को शाल ओढ़ाने आए RSS समर्थक सन्यासी जो सलवार-कुर्ता मे भाग खड़े हुये थे को सम्मान देना हो या उपरोक्त वर्णित सन्यासी महोदय के पार्थिव शरीर पर माल्यार्पण करना हो सत्ताधारी नेताओं ने अपनी जाति-बिरादरी मे अपनी साख बनाने के हितार्थ किया। किन्तु इससे जनता मे गलत संदेश जाता है कि जब इतने बड़े और प्रभावशाली नेता इनको इतना मान-सम्मान दे रहे हैं तो ये वाकई पहुंचे हुये विद्वान होंगे और वह भी उनके पीछे लुटने चली जाती है। 

कानपुर मे एक बार उत्तम चंद मल्होत्रा नामक एक व्यक्ति ने फूल बाग मे बहुत बड़ी सभा यह कह कर आयोजित की थी कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस प्रकट होने वाले हैं और इन बाबा जय गुरुदेव को मंच पर पेश कर दिया था। जनता ने उत्तम चंद मल्होत्रा को पकड़ कर खूब पीटा भी था। लेकिन इस सब से जय गुरुदेव की दूकानदारी खूब चमक उठी जैसा कि अब अखबार बता रहे हैं। इन लोगों को बढ़ाने और उठाने मे भ्रष्ट व्यापारी,उद्योगपति,इन लोगों की जाति के राजनेता आदि खूब योगदान देते हैं । पूर्व मुख्यमंत्री  कल्याण सिंह ने भी अपनी जाति के एक सन्यासी को चमकाने और संसद मे पहुंचाने मे बड़ी भूमिका निभाई थी। एक ओर तो ये जातियाँ 'ब्राह्मणवाद' की तिक्त एवं कटु आलोचना करती हैं और जब इंनका ही कोई जाति-बंधु उसी 'ब्राहमनवाद' के जरिये सामने आता है तो उसका महिमामंडन भी बखूबी करती हैं। इस दोहरे आचरण से जनता का उत्पीड़न और शोषण बेहद मजबूत होता जाता है। यही मुख्य समस्या है 'समृद्ध भारत' की जनता की गरीबी की। 






सरकार द्वारा अनाज भंडारण की कुव्यवस्था 


आदमी भूख से मरता है और गेहूँ सड़ता है.....
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हमारे देश में सामाजिक ढांचा आज भी धार्मिक-सत्ता से शासित है....धार्मिक सत्ता पारंपरिक है.....उसका खुद का स्वरूप लोकतांत्रिक नहीं है। जनता को सरकार चुनने का हक तो मिल गया है....किन्तु लोकतांत्रिक मशीनरी को चलाने की शिक्षा उसे नहीं मिली है| वह कौन है जो आज भी आम आदमी को जाहिल बनाए रखना चाहता है। सामंती शासन में .....शिक्षा का अधिकार आम जनता को न था। आजादी के बाद अधिकार तो मिला.....किन्तु प्रभावकारी शैक्षिक-व्यवस्था आज भी लागू न हो सकी। लोकतंत्र की गाड़ी येनकेनप्रकारेण धर्म-तंत्र के ड्राइवर के हाथों में रहती है। अपरोक्ष रूप से वे उसे अपनी तरह.....से चलते हैं| यह सब असमानतावादी कुप्रबंधन और पाखंड की देन है। बहु-संख्यक जनता के अशिक्षित होने के परिणाम सबके सामने हैं| भारतीय लोकतंत्र का दिनोदिन दागदार इसी कारण होता जा रहा है| आदमी भूख से मरता है और गेहूँ सड़ता है।

उपरोक्त चित्र देख कर आदरणीय 'डंडा लखनवी ' जी ने लोकतान्त्रिक -सामंती व्यवस्था का जो हेतु बताया है वह भी यही इशारा कर रहा है कि प्रचलित धार्मिक व्यवस्था ही भूख,गरीबी और शोषण के लिए उत्तरदाई है। 


मैंने जन-जागरण के उद्देश्य से ही यह ब्लाग तथा 'जन-हित मे' प्रारम्भ किए थे। किन्तु हमारे फेसबुक धुरंदर एवं  ब्लागर्स शूर-वीर अपनी आत्म-प्रशंसा मे डूब कर मेरे विचारों को कुचलने का कार्य  फेसबुक और ब्लाग के माध्यम से करते रहते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि आम जनता जागरूक हो। लेकिन जब कोई इस प्रकार की घटना घटित हो जाती है तो घड़ियाली आँसू बहा कर जन-हितैषी होने का स्वांग अवश्य ही भरते हैं। आवश्यकता है -'धर्म,अध्यात्म आदि की सही व्याख्या जनता को समझाने की न कि धर्म और अध्यात्म की आलोचना करने की। हाँ आत्मालोचना करने की नितांत आवश्यकता है तभी ढोंगियों के पाखंड से जनता को बचाना संभव हो सकेगा। 

Tuesday, July 3, 2012

साम्राज्यवाद को मजबूत करने मे 'साम्यवाद 'का कितना योगदान?

"MAN HAS CREATED THE GOD FOR HIS MENTAL SECURITY ONLY"---
                                                                                                               KARL  MARX

अर्थात कार्ल मार्क्स का कथन है कि,"मनुष्य ने अपनी दिमागी सुरक्षा के लिए भगवान की उत्पत्ति  की है"।

महर्षि कार्ल मार्क्स ने  किस संदर्भ और परिस्थितियों मे यह लिखा इसे समझे बगैर एयर कंडीशंड कमरों मे बैठ कर उदभट्ट विद्वान 'धर्म' की चर्चा को भटकाने वाला तथ्य कहते हैं और उनमे से कुछ यह भी घोषणा करते हैं कि,;हिन्दू','इस्लाम','ईसाई'आदि ही धर्म हैं एवं धर्म की अन्य कोई परिभाषा मान्य नहीं है। इसका सीधा-सादा अर्थ है कि 'तर्क'और ज्ञान के आभाव मे ये विद्वान ढोंग-पाखंड-आडंबर जिसे साम्राज्यवादी धर्म बताते हैं उसी को धर्म स्वीकारते हैं और तभी धर्म पर प्रहार करके जनता से कटे रहते हैं। हालांकि कुछ प्रगतिशील और जागरूक साम्यवादी नेता तो धर्म को सही परिप्रेक्ष्य मे समझ कर जनता से संवाद करने लगे हैं और वे लोकप्रिय भी हैं।मुस्लिम वर्ग के एक कामरेड तो श्री कृष्ण को 'साम्यवाद ' का प्रयोग करने वाला बताते हैं और उनका जनता पर अनुकूल प्रभाव भी पड़ता है।  किन्तु बुद्धिजीवी विद्वान अभी भी 18वीं सदी की सोच से साम्यवाद लाने के नाम पर नित्य ही साम्राज्यवाद के हाथ मजबूत कर रहे हैं  फेसबुक पर अपने थोथे  बयानों से।और तो और मजदूर नेता एवं विद्वान कामरेड ने तो तब हद ही कर दी जब RSS की वकालत वाला एक लेख ही शेयर कर डाला। देखें-
Shriram Tiwari shared a link.

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साम्यवाद की विचारधारा क्या भारतीय संस्कृति के अनुकूल है? या साम्यवाद का भारतीय संस्कृति, धर्म और इतिहास से भी कोई संबंध है? यदि इन जैसे प्रश्नों के उत्तर खोजे जाऐं तो ज्ञात होता है कि वास्तविक साम्यवाद भारतीय संस्कृति में ही है। संसार का कम्युनिस्ट समाज भारतीय साम्यवाद को समझ नहीं पाया है और ना ही स...
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    • Vijai RajBali Mathur लेख मे मुद्दो की बात उठाते-उठाते अंततः RSS का समर्थन करके गुमराह किया गया है। 1857 की क्रांति मे भाग ले चुके महर्षि दयानन्द को अंग्रेज़-REVOLUTIONARY SAINT कहते थे और उनके संगठन को क्षति पहुँचने के उद्देश्य से RSS की स्थापना कराई थी जो आज आर्यसमाज को ही नियंत्रित करता प्रतीत होता है।


तो आइये सबसे पहले आर एस एस क्यों बनवाया गया इसे जानें फिर समझें कि 'साम्यवाद है ही भारतीय अवधारणा'। 'महाभारत काल'के बाद भारत का सांस्कृतिक पतन तीव्र गति से हुआ और आंतरिक फूट के कारण यह विदेशियों का गुलाम बना । विदेशी सत्ता ने यहाँ के तत्कालीन विद्वानों को अपनी ओर मिलाकर ऐतिहासिक संदर्भों को संदेहास्पद बनाने हेतु 'पुराणों' की रचना करवाई। आम जनता ने इन विद्वानों से गुमराह होकर पुराणों को धार्मिक ग्रंथ मान लिया और आज तक वही विभ्रम पूजा जा रहा है। हमारे साम्यवादी विद्वान भी इन ग्रन्थों को ही धार्मिक ग्रंथ की संज्ञा देते हैं जो उनकी ज़िद्द और जड़ता का प्रतीक है।हवाला तो ये मार्क्स का देते हैं किन्तु ये सब महर्षि कार्ल मार्क्स के पैर के अंगूठे के नाखून की नोक के बराबर भी नहीं ठहरते ज्ञान के मामले मे।

सर्वप्रथम बौद्धों पर अत्याचार करने वाले लोगों यथा उनके मठों को उजाड़ने,विहारों और उनके ग्रन्थों को जलाने वाले लोगों को 'हिंसा देने' के कारण 'हिन्दू' की संज्ञा दी गई थी। उसके बाद फारसियों ने एक गंदी और भद्दी गाली के रूप मे यहाँ के लोगों को 'हिन्दू' कहा। यहाँ के लोगों ने अपने तत्कालीन पुरोहितो,पुजारियों और विदेशी सत्ता के लालच मे फंसे विद्वानों की बातों को सिर -माथे पर लिया और खुद को 'हिन्दू' कहलाने लगे।

अब चूंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्ता 'मुस्लिम शासकों' से छीनी थी इसलिए उसने इन हिंदुओं को बढ़ावा देकर मुसलमानों को कुचला जिससे वे शिक्षा और रोजगार मे पिछड़ गए। कंपनी शासन ने मुस्लिमों और हिंदुओं मे खाई गहराने हेतु 'बाबरी मस्जिद' प्रकरण खड़ा कराया।

ब्रिटिश अत्याचारों और शोषण से त्रस्त होकर मुगल शासक 'बहादुर शाह जफर' के नेतृत्व मे 1857 मे तथाकथित हिंदुओं और मुसलमानों ने मिल कर क्रांति कर दी जो आंतरिक फूट के कारण निर्ममता से कुचल दी गई। पंजाब के सिखों,ग्वालियर के सिंधिया,भोपाल की बेगम,नेपाल के राणा ने 'आज़ादी की प्रथम क्रान्ति'को कुचलने मे अंग्रेजों का भरपूर साथ दिया और बहादुर शाह जफर को मांडले मे कैद करके भारत से निर्वासित कर दिया गया। इस क्रांति के बाद मुसलमानों का और भी दमन किया गया क्योंकि मुगल शासक ने इसका नेतृत्व किया था।

अपनी युवावस्था मे महर्षि दयानंद 'सरस्वती'ने भी इस क्रांति मे भाग लिया था और रानी लक्ष्मी बाई से भी उनका संपर्क था। 'क्रांति' के दमन की क्रूरता को देख कर दयानन्द ने ईस्वी सन 1875 की चैत्र प्रतिपदा को (क्रांति के 18 वर्ष बाद),'आर्यसमाज'का गठन किया जिसका उद्देश्य जनता को जागरूक करके देश को आज़ादी दिलाना था। प्रारम्भ मे जितने भी आर्यसमाज स्थापित हुये ब्रिटिश छावनी वाले नगरों मे ही हुये थे। ब्रिटिश सरकार ने उन पर कई मुकदमे भी चलवाये उनको REVOLUTIONARY SAINT कहा गया। महर्षि दयानंद 'सरस्वती' ने विदेशियों द्वारा प्रदत्त  'हिन्दू' संज्ञा का प्रबल विरोध किया। उन्होने देशवासियों को 'सनातन आर्यत्व' पर लौटने का आहवाहन किया।

दयानन्द के प्रचार से भयभीत होकर ब्रिटिश गवर्नर जनरल ने रिटायर्ड ICS एलेन आकटावियन हयूम की मदद से वोमेश चंद्र बेनर्जी (जो ईसाई थे)की अध्यक्षता मे इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना कारवाई जो सम्पूर्ण आज़ादी नही केवल 'डोमिनियन स्टेट' चाहती थी। अतः दयानन्द के निर्देश पर आर्यसमाजी इस कांग्रेस के सदस्य बन गए और उन लोगों के प्रयास से कांग्रेस को 'सम्पूर्ण' आज़ादी को ध्येय बनाना पड़ा।डॉ पट्टाभि सीता रमय्या ने 'कांग्रेस का इतिहास' मे लिखा है कि स्वतन्त्रता आंदोलन मे भाग लेने वाले सत्याग्रहियों मे 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे।

अतः अब इस कांग्रेस को कमजोर बनाने हेतु मुसलमानों का सहारा लिया गया और ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन के माध्यम से 1906 मे  'मुस्लिम लीग'की स्थापना ब्रिटिश सरकार ने करवाई दूसरी ओर 'मुस्लिम सांप्रदायिकता' के जवाब मे मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व मे 1920 मे 'हिन्दू महासभा' का गठन करवाया गया। अभी तक महर्षि दयानन्द   के बाद भी उनका प्रभाव समाप्त नहीं हुआ था अतः आर्यसमाजियों के प्रभाव से हिंदूमहासभा 'हिन्दू सांप्रदायिकता' को उभाड़ने मे विफल रही। लेकिन कांग्रेस मे सांप्रदायिक आधार पर धड़ेबंदी शुरू हो गई। इन परिस्थितियों मे 'राष्ट्र्वादी कांग्रेसियों' ने 25/26 दिसंबर 1925 को कानपुर मे कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। स्वामी सहजानन्द 'सरस्वती',क्रांतिकारी गेंदा लाल दीक्षित और महा पंडित राहुल सांस्कृत्यायन सरीखे आर्यसमाजियों ने कम्युनिस्ट पार्टी को मजबूत बनाने मे अपना अमित योगदान दिया।

आर्यसमजी और कम्युनिस्ट मिल कर कहीं ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ न फेंके इस लिए पूर्व क्रांतिकारी सावरकर साहब जो खुद को नास्तिक कहते थे के माध्यम से RSS का गठन करवाया गया। शासकों के साथ दुरभि संधि के तहत इस संगठन को नाजी हिटलर के 'स्टार्म फोर्स' की भांति रखा गया जिससे जनता को गुमराह किया जा सके क्योंकि हिटलर शुद्ध आर्य होने का दावा करता था और उसका वारिस यह संगठन भारत मे खुद को घोषित करने लगा। इससे यह शक नहीं पैदा हो सका कि इसके पीछे ब्रिटिश सरकार का हाथ है जबकि यह उसी के मंसूबे पूरे करने हेतु ही गठित हुआ था। RSS की जूते से टोपी तक पोशाक और परेड की गतिविधियां जर्मनी के 'स्टार्म फोर्स' की तर्ज पर रखी गईं। यह नस्लवादी तौर पर मुस्लिमों के विरुद्ध घृणा फैलाता था । मुस्लिम लीग -RSS के प्रयासों से देश 'हिन्दू-मुस्लिम दंगों'की आग मे झुलसा दिया गया और अंततः 'पाकिस्तान' एवं 'भारत' दो देशों मे बाँट दिया गया। यह साम्राज्यवाद के नए मसीहा अमेरिका की नीतियों और योजनाओं का परिणाम था।

पूंजीवाद के समर्थक नेहरू जी ने बड़ी ही चालाकी से रूस से मित्रता करके भारतीय कम्युनिस्टों को प्रभाव हींन कर दिया।  आज कम्युनिस्ट आंदोलन कई पार्टियों मे विभक्त होकर पूरी तरह बिखर गया है। कांग्रेस जहां कमजोर पड़ती है वहाँ RSS समर्थित भाजपा को आगे बढ़ा देती है। दोनों साम्राज्यवादी अमेरिका समर्थक पार्टियां हैं। ऐसे मे साम्यवाद के मजबूत होकर उभरने की आवश्यकता है परंतु सबसे बड़ी बाधा वे 'साम्यवादी विद्वान और नेता' खड़ी करते हैं जो आज भी अनावश्यक और निराधार ज़िद्द पर अड़े हुये हैं कि 'मार्क्स' ने धर्म को अफीम कह कर विरोध किया है अतः साम्यवाद धर्म विरोधी  है।

'एकला चलो रे ' की नीति पर चलते हुये इस ब्लाग के माध्यम से मैं सतत 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या बताने का प्रयास करता रहता हूँ जो वस्तुतः 'नक्कारखाने मे तूती की आवाज़' की तरह है। फिर भी एक बार और-

'धर्म'=जो शरीर को धरण करने के लिए आवश्यक है जैसे-'सत्य','अहिंसा','अस्तेय','अपरिग्रह'और 'ब्रह्मचर्य'।
(क्या मार्क्स ने इन सद्गुणों को अफीम बताया है?जी नहीं मार्क्स ने उस समय यूरोप मे प्रचलित 'ईसाई पाखंडवाद'को अफीम कह कर उसका विरोध किया था। पाखंडवाद चाहे ईसाइयत का हो,इस्लाम का हो या तथाकथित हिन्दुत्व का उन सब का प्रबल विरोध करना ही चाहिए परंतु 'विकल्प' भी तो देते चलिये। )

'भगवान'=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल) का समन्वय।

'खुदा'=चूंकि ये पाँच तत्व खुद ही बने हैं इन्हे किसी ने बनाया नहीं है इसलिए इन्हे खुदा भी कहते हैं।

GOD=G(जेनेरेट)+O(आपरेट)+D(देसट्राय)। 'भगवान' या 'खुदा' सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन,पालन और 'संहार' भी करते हैं इसलिए इन्हें GOD भी कहा जाता है।

क्या मार्क्स ने प्रकृति के इन पाँच तत्वों को अफीम कहा था?'साम्यवाद' को संकुचित करने वाले वीर-विद्वान क्या जवाब देंगे?  


देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-वृक्ष ,नदी,समुद्र,वायु,अग्नि,आकाश,ग्रह-नक्षत्र आदि न कि कोई व्यक्ति विशेष। क्या मार्क्स ने प्रकृति प्रदत्त इन उपादानों का कहीं भी विरोध किया है?'साम्यवाद' के नाम पर साम्यवाद का अवमूल्यन करने वाले दिग्गज विद्वान क्या जवाब देंगे?

जनता को सही राह दिखाना किस प्रकार 'भटकाव' है?जो भटकाव करते हैं उनको तो धर्म कह कर ये विद्वान सिर पर चढ़ाते हैं और उसी प्रकार मार्क्स को बदनाम करने की कोशिश करते हैं जिस प्रकार साम्राज्यवादियों के पिट्ठू विद्वान राम को बदनाम करने का साहित्य सृजन करते हैं। राम ने नौ लाख वर्ष पूर्व साम्राज्यवादी रावण को परास्त किया और उसका साम्राज्य ध्वस्त किया था। लेकिन साम्यवाद के मसीहा कहलाने वाले ये विद्वान राम-रावण युद्ध को कपोल कल्पना कह कर राम को साम्राज्यवादी RSS का खिलौना बना देते हैं। साम्राज्यवादियों ने दो धाराएँ फैला कर वास्तविकता को ढकने का स्वांग रचा है। पहले कहा गया कि वेद गड़रियों के गीत हैं और खुद 'मेक्समूलर' के माध्यम से यहाँ से मूल पांडुलिपियाँ ले गए। अंनुसन्धान किए और वेदों का भरपूर लाभ उठाया। दूसरे RSS,मूल निवासी,आदिवासी,आदि तमाम संगठनों के माध्यम से वेद और आर्यों के विरुद्ध दुष्प्रचार करवाया । कोई हिटलर की तर्ज पर हिन्दुत्व को नस्लवादी आर्य बताता है तो कोई आर्यों को यहाँ के मूल निवासियों का शोषक आक्रांता। दुर्भाग्य यह है कि साम्यवादी विद्वान इनमे से ही किसी न किसी बात को सही मानते हैं और अपना दिमाग लगा कर कुछ सोचना व समझना ही नहीं चाहते हैं। यदि कोई ऐसा प्रयास करता है तो तत्काल उसे प्रतिगामी घोषित कर देते हैं जबकि खुद कार्ल मार्क्स ने 'साम्यवाद' को देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार लागू करने की बात कही थी। भारत मे कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना होने पर स्टालिन ने भी इसके संस्थापकों से ऐसा ही कहा था। किन्तु इन लोगों ने न तो मार्क्स के सिद्धांतों का पालन किया न ही स्टालिन के सुझाव माने और रूसी पैटर्न की नकल कर डाली। भारतीय वांगमय से मेल न खाने के कारण यहाँ की जनता के बीच साम्राज्यवादियों के सहयोग से यह प्रचारित किया गया कि साम्यवाद विदेशी विचार-धारा है और देश के अनुकूल नहीं है। डॉ राम मनोहर लोहिया और लाल बहादुर शास्त्री सरीखे नेताओं ने इसी आधार पर साम्यवाद को अत्यधिक क्षति पहुंचाई। स्टालिन ने हिटलर से समझौता  कर लिया तो ठीक था लेकिन नेताजी सुभाष बोस ने हिटलर का सहयोग लेकर जापान मे पनाह ली तो उनको 'तोजो का कुत्ता' कह कर इन साम्यवादी विद्वानों ने संभोधित किया और अपेक्षा करते हैं कि जनता उनको सहयोग दे । हालांकि अब यह स्वीकार कर लिया गया है कि नेताजी का विरोध करना तब गलत था।

'रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना' के माध्यम से मैंने बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार राम ने रावण के 'साम्राज्यवाद' को नष्ट किया था। यदि आज भी साम्यवाद को कामयाब करना है तो राम की नीतियों को अपनाना पड़ेगा ,राम की आलोचना करके या अस्तित्व को नकार के कामयाब न अभी तक हुये हैं न ही आगे भी हो सकेंगे। योगी राज श्री कृष्ण ने तो सर्वाधिकार का बचपन से ही विरोध किया था गावों की संपत्ति का शहरी उपभोग समाप्त करने के लिए उन्होने 'मटका फोड़' आंदोलन चलाया था और गावों का मक्खन शहर आने से रोका था। गो-संवर्द्धन पर अनुसंधान करवाया और सफलता प्राप्त की लेकिन ढ़ोंगी गोवर्धन-परिक्रमा के नाम पर इस उपलब्धि पर पलीता लगाते हैं क्योंकि उसी मे साम्राज्यवादियों का हित छिपा हुआ है। किन्तु साम्यवादी क्यों नही 'सत्य' को स्वीकार करते हैं? क्यों साम्यवादी विद्वान ढोंगियों के कथन पर ध्यान देते हैं और वास्तविकता से आँखें मूँद लेते हैं। 

अभी तक सभी साम्यवादी विद्वानों ने साम्राज्यवादियों के षड्यंत्र मे फंस कर 'नकारात्मक' सोच को सच माना है। किन्तु अब आवश्यकता है कि इस सोच को सकारात्मक बना कर 'सच' को स्वीकार करें और सफलता हासिल करें। अन्यथा पूर्व की भांति 'साम्राज्यवाद को ही मजबूत' करते रहेंगे। मार्क्स ने जिस GOD का विरोध किया वह पाखंडियों की सोच वाला था वास्तविक नहीं। हमे जनता को बताना चाहिए वास्तविक GOD,खुदा या भगवान प्रकृति के पाँच तव हैं और कुछ नहीं। जनता को धर्म का मर्म बताना पड़ेगा तब ही वह ढोंग-पाखंड-आडंबर से दूर हो पाएगी। कृपया साम्यवाद का चोला ओढ़ कर 'मार्क्स' को बदनाम करना और इस प्रकार 'साम्राज्यवाद को' मजबूत करना बंद करें।