Wednesday, June 12, 2013

एलोपैथी के दुष्परिणाम और बचाव का उपाय---विजय राजबली माथुर

हिंदुस्तान-लखनऊ-28/03/2012 
भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल) और क्योंकि प्रकृति के ये पाँच-तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं एवं इंनका कार्य  =G( सृष्टि-जेनरेट)+O(पालन-आपरेट)+D(संहार-डेसट्राय) होने के कारण ये ही गाड(GOD)हैं।
उपरोक्त स्कैन किया समाचार तो प्रतीक है एलोपैथी चिकित्सा के दुष्परिणामों पर प्रकाश डालने का। त्वरित राहत के नाम पर लोगों की भीड़ एलोपैथी चिकित्सा की ओर आकर्षित होती है और एलोपैथी चिकित्सक मजबूर रोगी का जम कर दोहन करते और अपने महल सजाते हैं। एक समय जर्मनी के डॉ हेनीमेन ने इस लूट से क्षुब्ध होकर एक नई चिकित्सा प्रणाली का आविष्कार किया था जिसे उनके नाम पर आज 'होम्योपैथी' के नाम से जाना जाता है। यह पद्धती हमारी 'आयुर्वेदिक' पद्धति के सादृश्य है। 

आयुर्वेद को पंचम वेद भी माना जाता है जो कि 'अथर्ववेद'पर आधारित है। आयुर्वेद में 'वात','कफ़','पित्त' को महत्व दिया जाता है जब तक ये शरीर को धारण करने के योग्य रहते हैं इनको 'धातु' कहा जाता है जब ये विकृत होने लगते हैं तब इनको 'दोष' और जब मलिन हो जाते हैं तब 'मल' कहा जाता है। 

'वायु' +'आकाश'-गगन तत्व = वात 
'भूमि'+'जल'तत्व= कफ़ 
'अग्नि' तत्व=पित्त 

'भगवान' के ये पांचों तत्व 'धातु' के रूप में 'सृष्टि व 'पालन'करते हैं तथा 'दोष' होकर 'मल'बन जाने पर संहार कर देते हैं। इसी लिए हमारे वैज्ञानिक ऋषियों ने 'हवन'='यज्ञ' का आविष्कार किया था। हवन या यज्ञ में जब जड़ी-बूटियों से निर्मित सामग्री को अग्नि मे डाला जाता है तो अग्नि अपने गुण के अनुसार डाले गए पदार्थों को परमाणुओं =एटम्स में विभाजित कर देती है एवं सर्वत्र व्यापक वायु उन परमाणुओं को सर्वत्र फैला देती है। इससे न केवल 'पर्यावरण' शुद्ध रहता है बल्कि मनुष्य स्वस्थ व दीर्घजीवी रहता है। ब्लड प्रेशर आदि जिन रोगों में घी खाने से परहेज करना बताया जाता है उन रोगों में भी 'हवन' पद्धति में घी के संस्कारित परमाणु नासिका के जरिये शरीर में प्रविष्ट होकर 'रक्त' में घुल कर शरीर को सबल बनाते हैं और 'हड्डियों' को मजबूती प्रदान करते हैं। यदि पहले की ही तरह 'बाल्यकाल' से ही हवन करने की आदत डाली जाये तो बुढ़ापे मे जाकर हड्डियों के कमजोर होने की नौबत ही नहीं आने पाये अतः 'फ्रेक्चर' आदि का सवाल ही न उठे। किन्तु आज कारपोरेट कल्चर में हवन संस्कृति को अपनाने को कोई तैयार ही नहीं है तब तो एलोपैथी चिकित्सकों द्वारा लूटे जाने के सिवा कोई दूसरा उपाय भी नहीं है।

Friday, June 7, 2013

पेरिन दाजी और जेनी मार्क्स ---विजय राजबली माथुर

कुछ विद्वानों का दृष्टिकोण है कि कम्युनिस्ट नेताओं एवं विद्वान अध्येताओं ने अतीत में अपने बारे में व्यक्तिगत रूप से कुछ भी सार्वजनिक नहीं किया है अतः अब भी वही परंपरा कायम रहनी चाहिए। किन्तु अब कुछ नेताओं एवं अध्येताओं के बारे में उनके परिजन व अन्य विद्वजन सार्वजनिक रूप से प्रकाश डाल रहे हैं और मैं समझता हूँ कि ऐसा पहले ही किया जाना चाहिए था। कामरेड होमी दाजी के जीवन चरित्र पर उनकी जीवन संगिनी कामरेड पेरिन दाजी ने 'यादों की रोशनी में' पुस्तक की रचना की है जिसके विमोचन से संबन्धित सारिका श्रीवास्तव द्वारा प्रेषित विवरण  'पार्टी जीवन' में प्रकाशित हुआ था। -


मार्क्स का तप और त्याग  "हालांकि एक गरीब परिवार में जन्में और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा,परन्तु मार्क्स ने हार नहीं मानी,उन्होंने अपने कठोर तपी जीवन से गहन अध्ययन किया.समाज के विकास क्रम को समझा और भावी समाज निर्माण के लिए अपने निष्कर्षों को निर्भीकता के साथ समाज के सम्मुख रखा.व्यक्तिगत जीवन में अपने से सात वर्ष बड़ी प्रेमिका से विवाह करने के लिए भी उन्हें सात वर्ष तप-पूर्ण प्रतीक्षा करनी पडी.उनकी प्रेमिका के पिता जो धनवान थे मार्क्स को बेहद चाहते थे और अध्ययन में आर्थिक सहायता भी देते थे पर शायद अपनी पुत्री का विवाह गरीब मार्क्स से न करना चाहते थे.लेकिन मार्क्स का प्रेम क्षण-भंगुर नहीं था उनकी प्रेमिका ने भी मार्क्स की तपस्या में सहयोग दिया और विवाह तभी किया जब मार्क्स ने चाहा.विवाह के बाद भी उन्होंने एक आदर्श पत्नी के रूप में सदैव मार्क्स को सहारा दिया.जिस प्रकार हमारे यहाँ महाराणा प्रताप को उनकी रानी ने कठोर संघर्षों में अपनी भूखी बच्चीकी परवाह न कर प्रताप को झुकने नहीं दिया ठीक उसी प्रकार मार्क्स को भी उनकी पत्नी ने कभी निराश नहीं होने दिया.सात संतानों में से चार को खोकर और शेष तीनों बच्चियों को भूख से बिलखते पा कर भी दोनों पति-पत्नी कभी विचलित नहीं हुए और आने वाली पीढ़ियों की तपस्या में लीन रहे.देश छोड़ने पर ही मार्क्स की मुसीबतें कम नहीं हो गईं थीं,इंग्लैण्ड में भी उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था.लाईब्रेरी में अध्ययनरत मार्क्स को समय समाप्त हो जाने पर जबरन बाहर निकाला जाता था।" http://krantiswar.blogspot.in/2012/05/blog-post_05.html

अभी हाल ही में एक विद्वान द्वारा जेनी मार्क्स द्वारा कार्ल मार्क्स को दिये योगदान के बारे में इस प्रकार वर्णन किया है जबकि पूर्व में मैंने भी महर्षि कार्ल मार्क्स से संबन्धित पोस्ट में उपरोक्त उद्धृण दिया था।- 
"वह जेनी ही थी जो धनी माता-पिता की पुत्री होने के बावजूद मार्क्स के साथ भीषण गरीबी और अभाव का जीवन जीती रही. कभी उफ् तक न की. खुद तंगहाली में रहते हुए वह बल्कि कदम-दर-कदम उसका हौसला बढ़ाती रही.
मार्क्स के लंदन के दिनों का उल्लेख जेनी ने इन शब्दों में किया है—

‘मैंने फ्रैंकफर्ट जाकर चांदी के बर्तन बेच दिए और कोलोन में फर्नीचर बेचना पड़ा. लंदन के महंगे जीवन में हमारी सारी जमा-पूंजी जल्द ही समाप्त हो गई. हमारा सबसे छोटा बच्चा जन्म से ही बीमार रहता था. एक दिन मैं स्वयं छाती के दर्द से पीड़ित थी कि अचानक मकान-मालकिन किराये के बकाया पाउंड मांगने के लिए आ धमकी. उस समय हमारे पास उसको देने के लिए कुछ भी नहीं था. वह अपने साथ दो सिपाहियों को लेकर आई थी. उसने हमारी चारपाई, कपड़े, बिछौने, दो छोटे बच्चों के पालने तथा दोनों लड़कियों के खिलौने तक कुर्क कर लिए. सर्दी से ठिठुर रहे बच्चों को लेकर मैं कठोर फर्श पर पड़ी हुई थी. अगले दिन हमें घर से निकाल दिया गया. उस समय पानी बरस रहा था और बेहद ठंड थी. पूरे वातावरण में मनहूसियत छायी हुई थी…’

और ऐसे विकट समय में दवावाले, राशनवाले और दूधवाला अपना-अपना बिल लेकर उसके सामने खड़े हो गए. उनका बिल चुकाने के लिए जेनी को बिस्तर आदि घर का बचा-कुचा सामान भी बेचना पड़ा. इसके बावजूद वह महान स्त्री मार्क्स को कदम-कदम ढांढस बंधाती रही. मार्क्स घर की गरीबी देखकर जब भी खिन्न होता, जेनी का जवाब होता था—

‘दुनिया में सिर्फ हम लोग ही कष्ट नहीं झेल रहे हैं.’http://omprakashkashyap.wordpress.com/2010/03/07/कार्ल-मार्क्स-वैज्ञानिक/#comment-168

हिंदुस्तान,लखनऊ,09 मई 2013
इसी वर्ष लखनऊ में कैफी/शौकत आज़मी के संबंध में उनके पुत्री/दामाद द्वारा सार्वजनिक रूप से नाटक-मंचन द्वारा प्रकाश डाला गया है। 

यह एक अच्छी परंपरा और चलन है कि अब महान कम्युनिस्ट  नेताओं  एवं विद्वानों के बारे में जनता को जानकारी हासिल हो सकेगी कि उनको किन संघर्षों से गुजरना पड़ा परंतु फिर भी वे झुके नही।   

इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Sunday, June 2, 2013

चतुर्थ वर्ष में ब्लाग,कुछ अनुभूतियाँ ---विजय राजबली माथुर

यों तो ब्लाग-लेखन किस प्रकार प्रारम्भ हुआ इसका वर्णन 'विद्रोही स्व-स्वर में'हो चुका है-http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/05/blog-post_28.html 
परंतु कुछ लोगों के मन में उठ रहे अनेक संदेहों के निवारणार्थ निम्नाकित बातों को पुनः कहना चाहता हू :-
(1 )- पत्रकार स्व .शारदा पाठक ने स्वंय अपने लिए जो पंक्तियाँ लिखी थीं ,मैं भी अपने ऊपर लागू समझता हूँ :-


लोग कहते हम हैं काठ क़े उल्लू ,हम कहते हम हैं सोने क़े .
इस दुनिया में बड़े मजे हैं  उल्लू   होने   क़े ..

(2 ) ऐसा इसलिए समझता हूँ जैसा कि सरदार पटेल क़े बारदौली वाले किसान आन्दोलन क़े दौरान बिजौली में क्रांतिकारी स्व .विजय सिंह 'पथिक 'अपने लिए कहते थे मैं उसे ही अपने लिए दोहराता रहता हूँ :-

यश ,वैभव ,सुख की चाह नहीं ,परवाह नहीं जीवन न रहे .
इच्छा है ,यह है ,जग में स्वेच्छाचार  औ दमन न रहे ..


 आज से तीन वर्ष पूर्व इस ब्लाग का प्रारम्भ किया गया था मेरा उद्देश्य तो 'स्वांत: सुखाय,सर्वजन हिताय' ही था। किन्तु उच्च सरकारी पदों पर आसीन कुछ ब्लागर्स ने 'टिप्पणी' को विषय बना कर इसका मखौल भी खूब उड़ाया। आज फिर एक राजनीतिक ब्लागर् साहब की बात सामने आ चुकी है कि,बिना किसी महत्वाकांक्षा के कोई भी कोई कार्य नहीं करता है।एक और राजनीतिक ब्लागर साहब कहते हैं बिना किसी स्वार्थ के आज कल कोई भी किसी को एक ग्लास पानी को भी नहीं पूंछता है।  यदि कोई 'महत्वाकांक्षा'मुझे है तो वह यह है कि मृत्योपरांत लोग मुझे सद्कार्यों हेतु याद रखें। बस इससे अधिक किसी धन या मान प्राप्ति की महत्वाकांक्षा मुझे नहीं है। किसी स्वार्थ-वश मैं लेखन क्षेत्र में नहीं हूँ जैसा कि कुछ धृष्ट-भृष्ट-निकृष्ट धन-लोलुप  ब्लागर्स किए हुये है । 

परंतु पता नही क्यों लोग अपने जैसा ही मुझे भी समझते हैं। मैं खुद को भीड़ में शामिल करके 'भेड़-चाल'का हिस्सा नहीं बनना चाहता। मेरा लेखन इस तथ्य का साक्षी है। मैं 2+2 =4 ही कहता हूँ इसे पौने चार या सवा चार कहने की चालबाजी मैं नहीं कर सकता जैसा की अक्सर लोग करते और फिर फँसते हैं।  

1972 में नौकरी शुरू करने के बाद उस संपर्क के माध्यम से मेरठ में एक स्थानीय साप्ताहिक पत्र में मेरे लेख 1973 से ही छ्प रहे थे। फिर 1980 से आगरा के एक साप्ताहिक पत्र में लेख छ्पते रहे, जिसमें बाद में मुझे पहले सहायक सम्पादक और फिर उपसंपादक की हैसियत भी दी गई। दूसरे साप्ताहिक पत्रों ने भी लेख मुझसे लेकर छापे और इनके आधार पर वैश्य समुदाय की एक त्रैमासिक पत्रिका के सम्पादक ने  जातिसूचक शब्द हटा कर  मुझे उपसंपादक की हैसियत से उसमें मुझे मेरे लेखन के आधार पर ही जोड़ा था जिनसे कोई पूर्व परिचय भी न था। 

लेकिन जब दो राजनीतिक ब्लागर्स अपनी विपरीत राय देते हैं तो वह वैसे ही अंनजाने में कुछ नहीं कहते हैं। वस्तुतः शुरू-शुरू से ही हमारी छोटी भांजी जो अब पूना में बस गई है ने ब्लाग्स में प्राप्त टिप्पणियों के माध्यम  से टिप्पणी दाताओं की प्रोफाईल खोजते-खोजते कुछ ब्लागर्स को चुना और उसके पिता हमारे बहनोई साहब ने उन ब्लागर्स को हमारे विरुद्ध उकसाया। दो वर्ष पूर्व तक उनकी कारगुजारियाँ छिपी रहीं और घरेलू रिश्ता भी चलता रहा। किन्तु अब वह स्थिति नहीं है। वे लोग मेरे साथ-साथ यशवन्त को भी तबाह करना चाहते हैं और पूनम तो शुरू से ही उनके निशाने पर रही हैं। बल्कि इसीलिए पटना से संबन्धित श्रीवास्तव ब्लागर (जो अब पूना प्रवासी है)का चयन किया गया था। दरियाबाद और पटना से संबन्धित श्रीवास्तव ब्लागर्स ने ही ब्लाग जगत में हमारे विरुद्ध लामबंदी कर रखी है। इन ब्लागर्स  ने अपने रिश्ते व संपर्कों के आधार पर राजनीतिक ब्लागर्स को गुमराह कर रखा है जो वे अनर्गल राय प्रकट करते हैं। छोटे मियां तो छोटे मियां बड़े मियां सुभान अल्लाह की तर्ज़ पर एक दूसरे दल के प्रादेशिक राजनेता  श्रीवास्तव साहब जो दरियाबाद  से संबन्धित ब्लागर के रिश्तेदार भी हैं और उनके भाईयों के मोहल्लेदार भी ने तो हद ही कर दी कि यशवन्त से मुफ्त या कन्सेशनल काम करवाते हुये भी हमारे परिवार के तीनों सदस्यों पर नाहक तोहमत भी लगा दी। आस-पास के वकीलों और अपने रिशतेदारों को हमारी खुफियागिरी करने के लिए तैनात कर दिया। जबकि पूना प्रवासी ब्लागर की भांति ही (जिसने चार-चार जन्मपत्रियों का निशुल्क विश्लेषण प्राप्त किया था) यह साहब भी दो जन्मपत्रियों का मुझसे निशुल्क विश्लेषण प्राप्त कर चुके हैं  तब भी एहसान फरामोशी की इंतिहा कर दी ,अंततः मुझे अपने घर  पर उनके आने को प्रतिबंधित ही करना पड़ा है। 

अध्यन-लेखन का बचपन से शौक होने के कारण ब्लाग्स के माध्यम से लेखन जारी रखे हुये हूँ जिस आधार पर कुछ सार्वजनिक सहयोग की भी मुझसे अपेक्षा की गई है और मैंने निस्वार्थ भाव से उसे सहर्ष स्वीकार भी कर लिया है। हो सकता है कि इससे मेरा निजी लेखन कुछ प्रभावित हो किन्तु समाप्त नहीं होगा,इस ब्लाग के चतुर्थ वर्ष में प्रवेश के अवसर पर आज मेरा यही संकल्प है। 


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Tuesday, May 28, 2013

मंगल और अमंगल का दंगल ---विजय राजबली माथुर

 
 हिंदुस्तान,लखनऊ के 27 मई,2013 के अंक में पृष्ठ-07 पर "डेढ़ सौ साल से ज़्यादा पुरानी है जेठ के मंगल की परंपरा" के अंतर्गत आँचल अवस्थी  जी का विश्लेषण प्रकाशित हुआ है। इसके अनुसार 1846 से 1856 के मध्य एक 'इत्र'व्यापारी द्वारा जेठ माह के पहले मंगलवार को अलीगंज क्षेत्र में एक हनुमान मंदिर की स्थापना करवाई गई थी। तब से ही प्रत्येक वर्ष के जेठ माह के पहले मंगल को बड़ा मंगल के नाम से एक उत्सव के रूप मे मनाने की परिपाटी चली आ रही है लेकिन अब जेठ माह के सभी मंगलवार -बड़ा मंगल के रूप मे मनाए जा रहे हैं। 

ऐसे ही पहले मंगल अर्थात बड़ा मंगल (तब तक वही पहला मंगल बड़ा मंगल होता था सभी नहीं)पर मैं मौत के मुंह मे समाते-समाते बच गया था जिसका विवरण पूर्व में प्रकाशित हो चुका है।  : -

"५ या ६ वर्ष का रहा होऊंगा तब बड़े मंगल पर अलीगंज मंदिर में में भीड़ में छूट गया था.बउआ महिला विंग से गयीं.नाना जी ने अजय को गोदी ले लिया और बाबु जी शोभा को गोदी में लिए थे मैने बाबूजी का कुर्ता पकड़ रखा था.पीछे से भीड़ का धक्का लगने पर मेरे हाथ से बाबू जी का कुर्ता छूट गया और मैं कुचल कर खत्म ही हो जाता अगर एक घनी दाढ़ी वाले साधू मुझे गोद में न उठा लेते तो.वे ही मुझे लेकर बाहर आये और सब को खोजने के बाद एक एकांत कोने में मुझे रेलिंग पर बैठा कर खड़े रहे उधर नाना जी और बाबु जी भी अजय और शोभा को बाउआ के सुपुर्द कर मुझे ढूंढते हुए पहुंचे और खोते-खोते मैं बच गया".http://vidrohiswar.blogspot.in/2010/08/blog-post_14.html

यहाँ सिर्फ यह स्पष्ट करना अभीष्ट है कि इस प्रकार के आयोजनों का कोई भी धार्मिक या आध्यात्मिक महत्व नहीं है ये मात्र 'व्यापारिक आयोजन' ही हैं जैसा कि इस परंपरा को एक व्यापारी द्वारा शुरू किए जाने की बात से ही सिद्ध हो जाता है। 

'हनुमान' तो 'राम' की वायु  सेना के प्रधान  थे अर्थात चीफ एयर मार्शल। वह प्रकांड विद्वान व 'कूटनीतिज्ञ' भी थे। उनके रूप व चरित्र को जिस तरह इन मंदिरों में दिखाया जा रहा है वह स्पष्टत : उनका घोर अपमान करना ही है। राम द्वारा लंका पर आक्रमण करने से पूर्व हनुमान ने उनके 'राजदूत' के रूप में वहाँ जाकर रावण की सेना व खजाने को अपनी चतुराई से अग्नि बमों (नेपाम बमों)से नष्ट करके खोखला कर दिया था। उनके 'राडार' जिसे 'सुरसा' नाम से जाना जाता था को पूर्व में ही नष्ट कर डाला था जिससे राम की वायु सेना के विमानों की टोह रावण की सेना को न लग सकी थी। 

विदेशी शासकों ने 'राम' और 'हनुमान' के साम्राज्यवाद विरोधी चरित्र को दबाने व छिपाने हेतु हनुमान का रूप विकृत करने हेतु पोंगा-पंडितों को उकसाया जिसका दुष्परिणाम आज भयावह रूप में सामने है। इन थोथे उत्सव आयोजनों द्वारा जनता को न केवल उल्टे उस्तरे से मूढ़ा जा रहा है बल्कि उसके मस्तिष्क को भी ध्वस्त किया जा रहा है। 

दन्त कथाओं मे गुमराह करने की बातें गढ़ कर जनता को मूर्ख बनाने हेतु कह दिया है कि 'हनुमान' ने पाँच वर्ष की बाल्यावस्था में 'सूर्य' को रसगुल्ला समझ कर निगल लिया था। (बाल समय रवि भक्ष्य लियो ,तीनों लोक भयो अंधियारों)। 

जब ये बातें गढ़ी जा रही थीं हमारा देश गुलाम था और विदेशी शासक जनता को मूर्ख बना कर दबाने के उपक्रम करते रहते थे। उन विदेशी शासकों ने जनता को अपने पक्ष मे करने हेतु यह प्रचारित किया कि उनके हज़रत साहब ने 'चाँद' के दो टुकड़े कर दिये थे -आशय यह था कि यहाँ की उपेक्षित जनता उनकी अनुयाई बन कर शासकों को समर्थन प्रदान करे। उसको रोकने हेतु मूर्ख पंडितों ने कहानी गढ़ी कि वह क्या?हनुमान ने तो बचपन में ही सूर्य को निगल लिया था। 

आज इक्कीसवीं सदी के प्रगतिशील युग में जब चाँद और मंगल पर मानव की पहुँच हो गई है भारत की असंख्य जनता गुलाम भारत के कुचक्रों से अपने को 'मुक्त' नहीं करना चाहती ,क्यों?क्योंकि व्यापारी/उद्योगपति/कारपोरेट/विदेशी साम्राज्यवादी भारत की जनता को जागरूक नहीं होने देना चाहते हैं सिर्फ इसीलिए ये सब ढोंग-पाखंड खूब धूम-धाम से मनाए जाते हैं।




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Sunday, May 26, 2013

समस्याएँ अनेक-समाधान एक---विजय राजबली माथुर

04 मई से 29 मई 2013 तक वृष राशि में 'गुरु' व 'शुक्र' ग्रह एक साथ होने का परिणाम है आज कल ग्रीष्म का प्रचंड -प्रकोप । 'राहू' व 'मंगल' तथा 'शनि' व 'मंगल' के मध्य बना 180 डिग्री का संबंध अमेरिका के तूफानी बवंडर ,बस्तर आदि की आतंकवादी  घटनाओं के कारक हैं (निर्णय सागर पंचांग के पृष्ठ-32एवं 33 पर पूर्व चेतावनी दी गई थी-
"राहू भौम सप्तम गति,शनि भौम संम सप्त। 
भूक्रंदनजन धन क्षति,मनसा मानस तप्त। । 
चक्रवात आंधी पवन,सागर देश विदेश। 
संहारक रचना गति,जन धन मध्य विशेष। । "

26 मई से 23 जून के मध्य सीमा क्षेत्रों में यातना तथा सम्पूर्ण विश्व में आतंकवादी हिंसा बढ्ने की चेतावनी दी गई है। 
परंतु खेद के साथ कहना और लिखना पड़ रहा है  कि कोई भी इस ओर उसी प्रकार ध्यान नहीं देगा जैसा कि पूर्व में हुआ था जो कि निम्नांकित के अवलोकन से सिद्ध हो जाएगा। :-----
 

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

[२७ अप्रैल २०१० को लखनऊ के एक स्थानीय समाचार पत्र में पूर्व प्रकाशित आलेख ]


दंतेवाडा त्रासदी - समाधान क्या है? http://krantiswar.blogspot.in/2011/04/blog-post_06.html




(त्रासदी के एक साल पूरा होने पर )

समय करे नर क्या करे,समय बड़ा बलवान.

असर ग्रह सब पर करे ,परिंदा पशु इनसान। 



मंगल वार 6 अप्रैल 2010 के भोर में छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा में ०३:३० प्रात पर केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल पर नक्सलियों का जो हमला हुआ उसमें ७६ सुरक्षाबल कर्मी और ८ नक्सलियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.यह त्रासदी समय कि देन है.हमले के समय वहां मकर लग्न उदित थी और सेना का प्रतीक मंगल-गृह सप्तम भाव में नीच राशिस्थ था.द्वितीय भाव में गुरु कुम्भ राशिस्थ व नवं भाव में शनि कन्या राशिस्थ था.वक्री शनि और गुरु के मध्य तथा गुरु और नीचस्थ मंगल के मध्य षडाष्टक योग था.द्वादश भाव में चन्द्र-रहू का ग्रहण योग था.समय के यह संकेत रक्त-पात,विस्फोट और विध्वंस को इंगित कर रहे थे जो यथार्थ में हो कर रहा.विज्ञानं का यह नियम है कि,हर क्रिया कि प्रतिक्रिया होती है.यदि आकाश मंडल में ग्रहों की इस क्रिया पर शासन अथवा जनता के स्तर से प्रतिक्रिया ग्रहों के अरिष्ट शमन की हुई होती तो इतनी जिन्दगियों को आहुति न देनी पड़ती।

जब हम जानते हैंकि तेज धुप या बारिश होने वाली है तो बचाव में छाते का प्रयोग करते हैं.शीत प्रकोप में ऊनी वस्त्रों का प्रयोग करते हैं तब जानबूझकर भी अरिष्ट ग्रहों का शमन क्यों नहीं करते? नहीं करते हैं तभी तो दिनों दिन हमें अनेकों त्रासदियों का सामना करना पड़ता है.जाँच-पड़ताल,लीपा – पोती ,खेद –व्यक्ति ,आरोप प्रत्यारोप के बाद फिर वही बेढंगी चाल ही चलती रहेगी.सरकारी दमन और नक्सलियों का प्रतिशोध और फिर उसका दमन यह सब क्रिया-प्रतिक्रिया सदा चलती ही रहेगी.तब प्रश्न यह है कि समाधान क्या है?महात्मा बुद्द के नियम –दुःख है! दुःख दूर हो सकता है!! दुःख दूर करने के उपाय हैं!!! दंतेवाडा आदि नक्सली आन्दोलनों का समाधान हो सकता है सर्वप्रथम दोनों और की हिंसा को विराम देना होगा फिर वास्तविक धर्म अथार्त सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रह्मचर्य  का वस्तुतः पालन करना होगा.

सत्य-सत्य यह है कि गरीब मजदूर-किसान का शोषण व्यापारी,उद्योगपति,साम्राज्यवादी सब मिलकर कर रहे हैं.यह शोषण अविलम्ब समाप्त किया जाये.

अहिंसा-अहिंसा मनसा,वाचा,कर्मणा  होनी चाहिए.शक्तिशाली व समृद्ध वर्ग तत्काल प्रभाव से गरीब किसान-मजदूर का शोषण और उत्पीडन बंद करें.
अस्तेय-अस्तेय अथार्त चोरी न करना,गरीबों के हकों पर डाका डालना व उन के निमित्त सहयोग –निधियों को चुराया जाना तत्काल  प्रभाव से 

बंद किया जाये.कर-अपवंचना  समाप्त की जाये.
अपरिग्रह-जमाखोरों,सटोरियों,जुअरियों,हवाला व्यापारियों,पर तत्काल प्रभाव से लगाम कासी जाये और बाज़ार में मूल्यों को उचित स्तर पर आने दिया जाये.कहीं नोटों को बोरों में भर कर रखने कि भी जगह नहीं है तो अधिकांश गरीब जनता भूख से त्राहि त्राहि कर रही है इस विषमता को तत्काल दूर किया जाये.
ब्रह्मचर्य -धन का असमान और अन्यायी वितरण ब्रह्मचर्य  व्यवस्था को खोखला कर रहा हैऔर इंदिरा नगर, लखनऊ के कल्याण अपार्टमेन्ट जैसे अनैतिक व्यवहारों को प्रचलित कर रहा है.
अतः आर्थिक विषमता को अविलम्ब दूर किया जाये.चूँकि हम देखते हैं कि व्यवहार में धर्मं का कहीं भी पालन नहीं किया जा रहा है इसीलिए तो आन्दोलनों का बोल बाला हो रहा है. दंतेवाडा त्रासदी खेदजनक है किन्तु इसकी प्रेरणा स्त्रोत वह सामाजिक दुर्व्यवस्था है जिसके तहत गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर होता जा रहा है.कहाँ हैं धर्मं का पालन कराने वाले?पाखंड और ढोंग तो धर्मं नहीं है,बल्कि यह ढोंग और पाखण्ड का ही दुष्परिनाम है कि शोषण और उत्पीडन की घटनाएँ बदती जा रही हैं.जब क्रिया होगी तो प्रतिक्रिया होगी ही.



शुद्द रहे व्यवहार नहीं,अच्छे आचार नहीं.
इसीलिए तो आज ,सुखी कोई परिवार नहीं.



समय का तकाजा है कि हम देश,समाज ,परिवार और विश्व को खुशहाल बनाने हेतु संयम पूर्वक धर्म का पालन करें.झूठ ,ढोंग-पाखंड की प्रवृत्ति को त्यागें और सब के भले में अपने भले को खोजें.



यदि करम खोटें हैं तो प्रभु के गुण गाने से क्या 
होगा?
किया न परहेज़ तो दवा खाने से क्या होगा?

आईये मिलकर संकल्प करें कि कोई किसी का शोषण न करे,किसी का उत्पीडन न हो,सब खुशहाल हों.फिर कोई दंतेवाडा सरीखी त्रासदी भी नहीं दोहराए.



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