Wednesday, September 19, 2018

देवी - देवता , अहिल्या और दुर्गा पूजा ------ विजय राजबली माथुर

*** *** भारतवर्ष को श्रेष्ठ =आर्ष=आर्य होने के कारण आर्यावृत भी कहा जाता था फारसी आक्रांताओं ने इनको हेय और निकृष्ट मानते हुये अपनी भाषा की एक गंदी गाली ' हिन्दू ' से विभूषित किया था। बौद्ध ग्रन्थों में हिंसा देने वालों को हिन्दू कहने का उल्लेख है किन्तु विद्वजन ढोंग- पाखंड को हिन्दू के रूप में पूजने का उपक्रम करते रहते हैं उनको मालूम होना चाहिए था कि ' देवता ' वह होता है जो देता है और लेता नहीं है ; जैसे नदी, वृक्ष, अग्नि, जल,वायु, धरती व आकाश आदि ।***  ***

"आज   देश के हालात कुछ  वैसे हैं :-मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों -२ दवा की। करम खोटे हैं तो ईश्वर  के गुण गाने से क्या होगा ,किया  परहेज़ न कभी  तो दवा खाने से क्या होगा.. आज की युवा शक्ति को तो मानो सांप   सूंघ  गया है वह कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं है और हो भी क्यों ? इस  सब के पीछे कुत्सित मानसिकता वाले बुर्जुआ लोग ही हैं । वैसे तो वे बड़े सुधारवादी ,समन्वय वादी बने फिरते हैं,किन्तु यदि उनके ड्रामा को सच समझ कर उनसे मार्ग दर्शन माँगा जाये तो वे गुमनामी में चले जाते हैं,लेकिन चुप न बैठ कर युवा चेहरे को मोहरा बना कर अपनी खीझ उतार डालते हैं । 
ऐसा नहीं है कि यह सब आज हो रहा है.गोस्वामी तुलसीदास ,कबीर ,रैदास ,नानक ,स्वामी दयानंद ,स्वामी विवेकानंद जैसे महान विचारकों को अपने -२ समय में भारी विरोध का सामना करना पड़ा था .१३ अप्रैल २००८ के हिंदुस्तान ,आगरा के अंक में नवरात्र की देवियों के सम्बन्ध में किशोर चंद चौबे साहब का शोधपरक लेख प्रकाशित हुआ था ,आपकी सुविधा के लिए उसकी स्केन प्रस्तुत कर रहे हैं
चैत्र और शरद नव रात्रों मे ढ़ोंगी-पाखंडी ढ़ोल-नगाड़ों से खुराफात करते हैं और खुद को देवी-भक्त घोषित करते हैं। ये नौ देवियाँ क्या हैं?चौबे साहब ने अच्छे और सरल ढंग से समझाया है किन्तु आम जनता की कौन कहे ?हमारे इंटरनेटी विद्वान भी मानने को तैयार न होंगे।
इन बदलते मौसमो मे उपरोक्त वर्णित औषद्धियों के सेवन से मानव मात्र को स्वस्थ रखने की कल्पना की गई थी। इन औषद्धियों से नौ दिन तक विशेष रूप से हवन करते थे जो ' धूम्र चिकित्सा ' का वैज्ञानिक आधार है। लेकिन आज क्या हो रहा है? भगवान =GOD=खुदा के दलालों (पुरोहितवादियों) ने मानव-मानव को लड़ा कर अपनी-अपनी दुकाने चला रखी हैं और मानव 'उल्टे उस्तरे' से उनके द्वारा ठगा जा रहा है। 'साईं बाबा','संतोषी माता','वैभव लक्ष्मी' नामक ठगी के नए स्तम्भ और ईजाद कर लिए गए हैं। जितना विज्ञान तरक्की कर रहा बताया जा रहा है उतना ही ज्यादा ढोंग-पाखंड का प्रचार होता जा रहा है जो पूर्णतः'अवैज्ञानिक' है।
एलोपैथी तो सिर्फ इतना भर जानती और मानती है कि,रोग का कारण बेक्टीरिया होते हैं और उन्हें नष्ट करने से उपचार हो जाता है। अब इसी पद्धति के विशेषज्ञ मानने लगे हैं कि न तो सभी बेक्टीरिया को नष्ट करना चाहिए और न ही अब एंटी बायोटिक दवाओ का असर रह गया है। पंचम वेद -'आयुर्वेद' मे 'वात-कफ-पित्त' के बिगड़ने को सभी रोगों का मूल माना है और यह निष्कर्ष पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है।


भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु)+I (अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)-इन पाँच तत्वों से मिल कर सम्पूर्ण सृष्टि बनती है जिसमे वनस्पतियाँ और प्राणी सभी शामिल हैं।


1-वात=आकाश +वायु
2-कफ=भूमि +जल
3-पित्त=अग्नि


'आयुर्वेद' मे पाँच तत्वों को उनके यौगिकों के आधार पर तीन तत्वों मे समायोजित कर लिया गया है। इसी लिए 'वैद्य' रोगी के हाथ की कलाई पर स्थित 'नाड़ी' पर अपने हाथ की तीन अंगुलियाँ रख कर इन तीन तत्वों की उसके शरीर मे स्थिति का आंकलन करते हैं। (1 )वात का प्रभाव 'तर्जनी',(2 )कफ का -'अनामिका',(3 )पित्त का 'मध्यमा' अंगुली पर ज्ञात किया जाता है।


 * अंगुष्ठ के तुरंत बाद वाली उंगली 'तर्जनी' है जो हाथ मे ब्रहस्पति -गुरु ग्रह का प्रतिनिधित्व करती है। 'गुरु'ग्रह गैसों का पिटारा है। वायु भी गैसों का संग्रह ही है।


 * तर्जनी के बाद की सबसे बड़ी उंगली ही 'मध्यमा' है जो शनि का प्रतिनिधित्व करती है। शनि को ज्योतिष मे 'आयु' का कारक ग्रह माना गया है और आयुर्वेद मे इसकी उंगली पित्त -ऊर्जा की स्थिति की सूचक है।


 * मध्यमा के तुरंत बाद की उंगली 'अनामिका' है जो हाथ मे सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है। ज्योतिष मे सूर्य को 'आत्मा' का कारक मानते हैं और हाथ मे यह उंगली आयुर्वेद के अनुसार  कफ की द्योतक है।


इन तीन उँगलियों पर पड़ने वाली नाड़ी की धमक वैद्य को रोगी के शरीर मे न्यूनता अथवा अधिकता का भान करा देती है जिसके अनुसार उपचार किया जाता है। जिस तत्व की अधिकता रोग का कारक है उसके शमन हेतु उसके विपरीत गुण वाले तत्व की औषद्धिया दी जाती हैं। जिस तत्व की न्यूनता होती है उसकी वृद्धि हेतु उसी तत्व वाले गुण की औषद्धिया दी जाती हैं। हमारे आयुर्वेद मे 'बेक्टीरिया' से रोग की उत्पत्ति मानने की सनक नहीं होती है,यह विशुद्ध प्राकृतिक  और वैज्ञानिक रूप से रोग की खोज करके उपचार करता है इसी लिए इसे आयु का विज्ञान =आयुर्वेद कहते हैं। 'आयुर्वेद' मे 'शल्य'चिकत्सा =सर्जरी का व्यापक महत्व था। गौतम बुद्ध के समय तक 'मस्तिष्क' तक की शल्य चिकित्सा होती थी और सिर दर्द का इलाज भी इस विधि से संभव था। 'बौद्ध' मत के विरोध की आंधी मे पोंगा-पंथियों ने मूल पांडु लिपियों और अनेक ग्रन्थों को जला डाला जिसका परिणाम यह हुआ कि  आगे से  आयुर्वेद मे शोद्ध होना बंद हो गया। उसके बाद 1100 वर्षों की गुलामी मे 'पौराणिकों' ने और ज्यादा ढोंग-पाखंड का कहर बरपाया । संत कबीर आदि ने इस ढोंग-पाखंड का विरोध उस काल मे किया और आधुनिक काल मे स्वामी दयानंद,स्वामी विवेकानंद आदि ने। किन्तु आचार्य श्री राम शर्मा आदि ने इनके प्रयासों पर पानी फेर दिया और ढोंग-पाखंड का आज इतना बोल बाला है कि अनेकों ढोंगियों ने खुद को आज भगवान घोषित कर दिया है।
राजनेता जनता को जाग्रत करने के बजाए जनता को दिग्भ्रमित करने के प्रयासों में लुटेरे व शोषकों की मन - मुराद पूरी करने में लगे हुये हैं : 


जब अर्थ का अनर्थ किया जाएगा तब उसकी प्रतिक्रिया भी वैसी ही होगी : 




  





भारतवर्ष को श्रेष्ठ =आर्ष=आर्य होने के कारण आर्यावृत भी कहा जाता था फारसी आक्रांताओं ने इनको हेय और निकृष्ट मानते हुये अपनी भाषा की एक गंदी गाली ' हिन्दू ' से विभूषित किया था। बौद्ध ग्रन्थों में हिंसा देने वालों को हिन्दू कहने का उल्लेख है किन्तु विद्वजन ढोंग- पाखंड को हिन्दू के रूप में पूजने का उपक्रम करते रहते हैं उनको मालूम होना चाहिए था कि ' देवता ' वह होता है जो देता है और लेता नहीं है ; जैसे नदी, वृक्ष, अग्नि, जल,वायु, धरती व आकाश आदि ।  
~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, September 2, 2018

चहेते उद्योगपतियों के लिए कर्ज की रिस्ट्रक्चरिंग कर दी ------ गिरीश मालवीय

   * यानी खेल बिल्कुल साफ है पहले UPA ने इन उद्योगों को, उद्योगपतियों को कर्ज दिया फिर जब आपकी सरकार आयी तो आपने इन कर्ज़ डुबोने वाले उद्योगपतियों को ओर कर्ज दिया टेक्निकल भाषा मे आपने कर्ज की रिस्ट्रक्चरिंग कर दी लेकिन नाम फिर भी आपने सामने नही आने दिए क्योंकि ये नाम आपके चहेते उद्योगपतियों के ही थे
ओर अब आप इस रिपोर्ट को सदन के पटल पर रखे जाने से रोक रहे हो
** मोदी जी आपने अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में कर्जदारों पर कुछ ठोस कार्यवाही क्या की ? विजय माल्या भगा दिए गए, नीरव मोदी 'अपने मेहुल भाई' भगा दिए


Girish Malviya
02-09-2018 
मोदी जी के नाम एक खुला पत्र.............

बात तो NPA पर होनी ही चाहिए मोदी जी,.... कल आप इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक की शुरुआत करते हुए खूब गरजे कि लोन डिफॉल्टर्स से सरकार एक-एक पैसा वसूल रही है ओर एनपीए समस्या के लिए यूपीए सरकार ही जिम्मेदार है,..... ब्ला ब्ला ब्ला.....नामदार कामदार... आदि ..इत्यादि..

पर मोदी जी आपने अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में कर्जदारों पर कुछ ठोस कार्यवाही क्या की ? विजय माल्या भगा दिए गए, नीरव मोदी 'अपने मेहुल भाई' भगा दिए गए आपने जो दीवालिया कानून बनाया है वह भी इतना लचर कानून है कि अभी तक सिर्फ 1 या 2 मामले ही इसके अंतर्गत हल हो पाए हैं बाकी सब मामले कानूनी पचड़ों में पड़े हैं

वैसे माल्या से याद आया.... क्या जनता जानती हैं कि देश का सबसे बड़ा कर्जदार व्यक्ति कौन है इस संदर्भ में जो आखिरी आँकड़ा 2016 में आया था उसके अनुसार अनिल अंबानी की कंपनी अनिल धीरुभाई अंबानी ग्रुप पर देश मे सबसे ज्यादा कर्ज है उन पर 1 लाख 13 हजार करोड़ रूपये का कर्ज उस वक्त यानी 2016 में ही था दूसरे नम्बर पर रुइया भाइयों का एस्सार समूह है और उस पर भी एक लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज है इसके बाद अनिल अग्रवाल का वेदांता ओर फिर गौतम अडानी का अडानी ग्रुप चौथा सबसे बड़ा कर्जदार ग्रुप है

देश के सबसे बड़े कर्जदार को आपने फ्रांस के साथ हुए राफेल के सौदे में पार्टनर बनवा दिया, 2015- 16 में रक्षा खरीद में मेक इन इंडिया की नीति को रिलायंस डिफेंस के पक्ष में किस तरह मोड़ा गया यहाँ बताने बैठूँगा तो कितने ही पन्ने भर जाएंगे, आज रिलायंस डिफेंस रिलायंस नेवल बन कर दीवालिया होने वाला है

आपने कल कहा कि UPA सरकार में कितना पैसा फंसा है यह देश से छुपाया गया, चलिए तो आपने क्या किया आपने भी उन कर्जदाताओं के नाम छुपा लिए........... 2016 में भारतीय रिजर्व बैंक ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के ऋण न चुकाने वालों (डिफॉल्टरों) की सूची को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में ही इस सूचना को सार्वजनिक करने का आदेश दिया था

इस सूचना में एक करोड़ रुपये या अधिक के कर्जों की नियमित अदायगी न करने वालों की जानकारी मांगी गयी थी चलिए सूचना के अधिकार को भी छोड़िए

8 नवम्बर 2016 को की गयी नोटबन्दी के कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट से यह सूचना छिपाई गयी कि किन 57 लोगों के ऊपर 85 हज़ार करोड़ का कर्ज बकाया है. कोर्ट ने रिज़र्व बैंक से पूछा था कि आखिर इन लोगों के नाम सार्वजनिक क्यों नहीं कर दिए जाते ? तब भी आप मोदीं जी इन लोगों के साफ साफ बचा गये !

चलिए 2016 की भी छोड़िए हम आज की ही बात कर लेते हैं संसद में वित्त मामलों की स्थायी समिति ने आपके पिछले सालो के काम का अध्ययन करते हुए यह पाया कि आपके कार्यकाल में बैंक नॉन परफॉर्मिंग एसेट (NPA) में 6.2 लाख करोड़ रुपये की बढ़त हुई है. यह आंकड़ा मार्च 2015 से मार्च 2018 के बीच का है. समिति की एक ड्राफ्ट रिपोर्ट के अनुसार इसकी वजह से बैंकों को 5.1 लाख करोड़ रुपये तक की प्रोविजनिंग करनी पड़ी हैं जब कोई लोन वापस नहीं मिलता है तो बैंक को उस रकम की व्यवस्था किसी और खाते से करनी होती है तो इसे प्रोविजनिंग करना कहा जाता है

इस समिति ने RBI से सवाल किया है कि वह आखिर दिसंबर, 2015 में हुई बैंको की एसेट क्वालिटी की समीक्षा (AQR) से पहले जरूरी उपाय अपनाने में विफल क्यों रहा? समिति के सदस्यों में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शामिल थे, समिति ने इसकी वजह जाननी चाही है कि आखिर क्यों कर्जों के रीस्ट्रक्चरिंग (वापसी की शर्तों में फेरबदल) के द्वारा दबाव वाले खातों को एनपीए बनने दिया जा रहा है?

यानी खेल बिल्कुल साफ है पहले UPA ने इन उद्योगों को, उद्योगपतियों को कर्ज दिया फिर जब आपकी सरकार आयी तो आपने इन कर्ज़ डुबोने वाले उद्योगपतियों को ओर कर्ज दिया टेक्निकल भाषा मे आपने कर्ज की रिस्ट्रक्चरिंग कर दी लेकिन नाम फिर भी आपने सामने नही आने दिए क्योंकि ये नाम आपके चहेते उद्योगपतियों के ही थे

ओर अब आप इस रिपोर्ट को सदन के पटल पर रखे जाने से रोक रहे हो

देश में 9,339 कर्जदार ऐसे हैं जिन्होंने एक लाख 11 हजार करोड़ रु का कर्ज जानबूझकर नहीं चुकाया यानी यह लोग विलफुल डिफॉल्टर है कानूनन इनका नाम बताया जा सकता हैं लेकिन तब भी उनका नाम डिस्क्लोज नही किया जा रहा है

चीन तो आपका यार है कभी चीन में उन लोगो के क्या हाल किये जाते हैं जो इस तरह जानबूझकर कर्ज नही देते यह पता कीजिएगा.........


मोदी जी सच तो यह है कि आपने अपने मित्रों को बचाने के लिए पूरे देश की अर्थव्यवस्था को भयानक कर्ज के जाल में उलझा दिया है
https://www.facebook.com/girish.malviya.16/posts/2053248078040163?__xts__%5B0%5D=68.ARC7yN52Q0LSpQbWbtGru56ZC7qRJPRJPvPLPGI6-3MB-CN9mXCuoAZ4G08H-xNGj-lKL4RU9E6pVEKphGf052vPyq4gTZOceuRStEhYpmK8RTKFo7ygknT22MywS0_uEtFWbH7aJfP4ZPgXYiXYFRZxGIxo7XVkSIMp27FkDRRE2lYNklU7vg&__tn__=-R

~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, August 26, 2018

क्या था रक्षाबंधन और क्या हो गया ? ------ विजय राजबली माथुर

 




' ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकायाम् ' यह लिखा है कादम्बरी में सातवीं शताब्दी में आचार्य बाणभट्ट ने। अर्थात  महाश्वेता ने जनेऊ पहन रखा है, तब तक लड़कियों का भी उपनयन होता था। (अब तो सबका उपहास अवैज्ञानिक कह कर उड़ाया जाता है)। श्रावणी पूर्णिमा अर्थात रक्षा - बंधन पर उपनयन क़े बाद नया विद्यारम्भ होता था। लेकिन कालांतर में पोंगा-पंडितों ने अपने निजी स्वार्थ में इस रक्षा-सूत्र-बंधन  अर्थात जनेऊ धारण करने के पावन-पर्व को राखी बांधने-बँधवाने तथा बहन-भाई के बीच सीमित कर दिया । 
 उपनयन अर्थात जनेऊ के लाभों से साधारण जनता को छल पूर्वक वंचित कर दिया गया है। 
 उपनयन अर्थात जनेऊ क़े तीन धागे तीन महत्वपूर्ण बातों क़े द्योतक हैं-
१ .-माता,पिता,तथा गुरु का ऋण उतारने  की प्रेरणा। 
२ .-अविद्या,अन्याय ,आभाव दूर करने की जीवन में प्रेरणा। 
३ .-हार्ट,हार्निया,हाईड्रोसिल (ह्रदय,आंत्र और अंडकोष - गर्भाशय )संबंधी नसों का नियंत्रण ;इसी हेतु कान पर शौच एवं मूत्र विसर्जन क़े वक्त धागों को लपेटने का विधान था। आज क़े तथा कथित पश्चिम समर्थक विज्ञानी इसे ढोंग, टोटका कहते हैं क्या वाकई ठीक कहते हैं ?
विश्वास- सत्य द्वारा परखा  गया तथ्य ,
अविश्वास- सत्य को स्वीकार न  करना,
 अंध-विश्वास-- विश्वास अथवा अविश्वास पर बिना सोचे कायम रहना ,
विज्ञान- किसी भी विषय क़े नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्ययन को विज्ञान कहते हैं। 
इस प्रकार जो लोग साईंस्दा होने क़े भ्रम में भारतीय वैज्ञानिक तथ्यों को झुठला रहे हैं वे खुद ही घोर अन्धविश्वासी हैं। वे तो प्रयोग शाळा में बीकर आदि में केवल भौतिक पदार्थों क़े सत्यापन को ही विज्ञान मानते हैं। यह संसार स्वंय ही एक प्रयोगशाला है और यहाँ निरन्तर परीक्षाएं चल रहीं हैं। परमात्मा एक निरीक्षक (इन्विजीलेटर)क़े रूप में देखते हुए भी नहीं टोकता, परन्तु एक परीक्षक (एक्जामिनर) क़े रूप में जीवन का मूल्यांकन करके परिणाम देता है। इस तथ्य को विज्ञानी होने का दम्भ भरने वाले नहीं मानते यही समस्या है। 

लगभग सभी बाम- पंथी विद्वान सबसे बड़ी गलती यही करते हैं कि हिन्दू को धर्म मान लेते हैं फिर सीधे-सीधे धर्म की खिलाफत करने लगते हैं। वस्तुतः 'धर्म'= शरीर को धारण करने हेतु जो आवश्यक है जैसे-सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रह,और ब्रह्मचर्य।  इंनका  विरोध करने को आप कह रहे हैं जब आप धर्म का विरोध करते हैं तो। अतः 'धर्म' का विरोध न करके  केवल अधार्मिक और मनसा-वाचा- कर्मणा 'हिंसा देने वाले'= हिंदुओं का ही प्रबल विरोध करना चाहिए। 
विदेशी शासकों की चापलूसी मे 'कुरान' की तर्ज पर 'पुराणों' की संरचना करने वाले छली विद्वानों ने 'वैदिक मत'को तोड़-मरोड़ कर तहस-नहस कर डाला है। इनही के प्रेरणा स्त्रोत हैं शंकराचार्य। जबकि वेदों मे 'नर' और 'नारी' की स्थिति समान है। वैदिक काल मे पुरुषों और स्त्रियॉं दोनों का ही यज्ञोपवीत संस्कार होता था। आचार्य बाणभट्ट  ने महाश्वेता द्वारा 'जनेऊ' धारण करने का उल्लेख किया है।  नर और नारी समान थे। पौराणिक हिंदुओं ने नारी-स्त्री-महिला को दोयम दर्जे का नागरिक बना डाला है। अपाला,घोषा,मैत्रेयी,गार्गी आदि अनेकों विदुषी महिलाओं का स्थान वैदिक काल मे पुरुष विद्वानों से  कम न था। अतः वेदों मे नारी की निंदा की बात ढूँढना हिंदुओं के दोषों को ढकना है। वस्तुतः 'हिन्दू' कोई धर्म है ही नही।बौद्धो के विरुद्ध क्रूर हिंसा करने वालों , उन्हें उजाड़ने वालों,उनके मठों एवं विहारों को जलाने वाले लोगों को 'हिंसा देने' के कारण बौद्धों द्वारा 'हिन्दू' कहा गया था। फिर विदेशी आक्रांताओं ने एक भद्दी तथा गंदी 'गाली' के रूप मे यहाँ के लोगों को 'हिन्दू' कहा।साम्राज्यवादियों के एजेंट खुद को 'गर्व से हिन्दू' कहते हैं। ढोंगवाद धर्म नहीं है---
महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'दास केपिटल'एवं 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो'की रचना की। महात्मा हेनीमेन ने 'होम्योपैथी' की खोज की और डॉ शुसलर ने 'बायोकेमी' की। होम्योपैथी और बायोकेमी हमारे आयुर्वेद पर आधारित हैं और आयुर्वेद आधारित है 'अथर्ववेद'पर। अथर्ववेद मे मानव मात्र के स्वास्थ्य रक्षा के सूत्र दिये गए हैं फिर इसके द्वारा नारियों की निंदा होने की कल्पना कहाँ से आ गई। निश्चय ही साम्राज्यवादियो के पृष्ठ-पोषक RSS/भाजपा/विहिप आदि के कुसंस्कारों को धर्म मान लेने की गलती का ही यह नतीजा है कि, कम्युनिस्ट और बामपंथी 'धर्म' का विरोध करते हैं । मार्क्स महोदय ने भी वैसी ही गलती यथार्थ को समझने मे कर दी। यथार्थ से हट कर कल्पना लोक मे विचरण करने के कारण कम्युनिस्ट जन-समर्थन प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि शोषक -उत्पीड़क वर्ग और-और शक्तिशाली होता जाता है। 


आज समय की आवश्यकता है कि 'धर्म' को व्यापारियों/उद्योगपतियों के दलालों (तथाकथित धर्माचार्यों)के चंगुल से मुक्त कराकर जनता को वास्तविकता का भान कराया जाये।संत कबीर, दयानंद,विवेकानंद,सरीखे पाखंड-विरोधी भारतीय विद्वानों की व्याख्या के आधार पर वेदों को समझ कर जनता को समझाया जाये तो जनता स्वतः ही साम्यवाद के पक्ष मे आ जाएगी। काश साम्यवादी/बामपंथी विद्वान और नेता समय की नजाकत को पहचान कर कदम उठाएँ तो सफलता उनके कदम चूम लेगी। 
~विजय राजबली माथुर ©
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Thursday, August 23, 2018

सत्यपाल मलिक और कश्मीर समस्या ------ विजय राजबली माथुर





विभिन्न अखबारों व टी वी चेनलों पर श्री सत्यपाल मलिक के बिहार से जम्मू व कश्मीर स्थानांतरण का कारण उनका प्रधानमंत्री से नजदीकी होना बताया जा रहा है। NDTV पर साक्षात्कार में श्रीनगर के पत्रकार गौहर गिलानी ने उनको भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का करीबी कहा है। 
वस्तु स्थिति का आंकलन नहीं कर पाये हैं ये विश्लेषक। बिहार में राज्यपाल रहते हुये वह   वहाँ के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में शिक्षा माफिया के विरुद्ध  तमाम धमकियों के बावजूद भी अभियान छेड़े हुये थे । जैसा उनका स्वभाव है और उन्होने एक वक्तव्य में कहा भी था कि , वह कानून सम्मत किसी भी कारवाई को करने में किसी से भी नहीं डरेंगे इससे वहाँ का शिक्षा माफिया जो भाजपा के बहुत नजदीक है बहुत घबराया हुआ था। उस तबके के हितों की रक्षा के लिए श्री मलिक का बिहार में बने रहना असुविधाजनक था। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने शिक्षा माफिया के बजाए आतंकवाद से मुक़ाबला करने के लिए श्री मलिक को कश्मीर स्थानान्तरित करवा  दिया है।
श्री मलिक को खबरों में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का भी करीबी बताया जा रहा है जबकि वह पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के अनुयाई और समर्थक रहे थे। मौलिक रूप से श्री सत्यपाल मलिक अपने छात्र जीवन में  समाजवादी युवजन सभा (SYS) से जुड़े हुये थे  तथा डॉ राम मनोहर लोहिया व मधु लिमये के समर्थक थे। राय बरेली में इन्दिरा जी को परास्त करने वाले राजनारायन सिंह से भी वह प्रभावित थे। 
जिस वर्ष श्री सत्यपाल मलिक ने मेरठ कालेज, मेरठ में प्रवेश लिया था उसी वर्ष मेरठ कालेज छात्र संघ की ओर से आयोजित ' संसद ' में उन्होने राजनारायन की भूमिका का निर्वहन किया था जिसकी भूरी - भूरी प्रशंसा प्रत्यक्ष दर्शक के रूप में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह ने भी की थी जिसे हमारे पोलिटिकल साईन्स के प्रोफेसर कैलाश चंद्र गुप्ता 1969 में हम नए छात्रों को बड़े गर्व से सुनाते थे। मैंने 1969 में मेरठ कालेज में प्रवेश लिया था जबकि श्री मलिक ने उसी वर्ष कालेज छोड़ा था। पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष के नाते वह कालेज आते रहे। लाहोर में भारतीय विमान जलाए जाने के बाद विरोध प्रदर्शन में कालेज प्राचार्य डॉ बी भट्टाचार्य के साथ उन्होने भी नेतृत्व किया था। समाजशास्त्र परिषद की ओर से आयोजित बांगला देश को मान्यता संबन्धित गोष्ठी में समस्त छात्रों व अध्यापकों के एकमत के विपरीत मैंने बांगलादेश को मान्यता दिये जाने का विरोध किया था। इसकी सूचना श्री मलिक के साथ छात्रसंघ उपाध्यक्ष रहे राजेन्द्र सिंह यादव द्वारा उनको दिये जाने पर उन्होने मुझसे कहा था कि, वह मेरे मत से तो सहमत नहीं हैं लेकिन आम राय के विरुद्ध अपनी बात को मजबूती से रखने के मेरे प्रयास की सराहना करते हैं और मुझसे आगे भी इसी प्रकार की दृढ़ता बनाए रखने को उन्होने कहा था। (ठीक इसी तरह उस गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे बानिज्य विभाध्यक्ष डॉ खान ने उसी गोष्ठी में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था )। 
श्री सत्यपाल मलिक कश्मीर में तब राज्यपाल के रूप में पहुंचे हैं जब वहाँ ' ज़ोजिला ' दर्रे पर सुरंग निर्माण का कार्य शुरू हो चुका है उनको वहाँ के स्थानीय नागरिकों से व्यक्तिगत संपर्क स्थापित करके इसके मलवे में ' प्लेटिनम ' होने की जानकारी हासिल करके उसे भारत के बाहर जाने से रोकने की कारवाई भी करनी चाहिए , यदि वह इसमें कामयाब रहे तब कश्मीर समस्या का समाधान भी कर सकेंगे।    
जोजीला दर्रा का प्लेटिनम है कश्मीर समस्या की जड़ ------

 * वस्तुतः 1857 की प्रथम क्रान्ति के बाद से ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी फूट डालो और शासन करो की जिस नीति पर चलते आ रहे थे उसके बावजूद जब 1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन, एयर-फोर्स व नेवी में विद्रोह तथा आज़ाद हिन्द फौज की गतिविधियों के कारण जब उनका टिके रहना मुश्किल हो गया तब नए साम्राज्यवादी सरगना यू एस ए ने भारत-विभाजन का सुझाव दिया जिस पर मेजर लार्ड ऐटली ने अपने प्रधान मंत्रित्व काल में अमल करते हुये पाकिस्तान व भारत दो स्वतंत्र देशों को सत्ता सौंप दी थी। पाकिस्तान तो तत्काल अमेरिकी प्रभुत्व में चला गया था किन्तु नेहरू जी ने गुट-निरपेक्ष आंदोलन के बैनर तले अमेरिका से दूरी बनाए रखी थी जिस कारण वह पाकिस्तान के माध्यम से भारत को परेशान करता रहा था। 1947 के बाद 1965 का संघर्ष भी उसी कड़ी में था और 1971 का बांग्लादेश व 1999 का कारगिल संघर्ष भी ।

** इस वक्त पाकिस्तान को झुका कर यू एस ए भारत में मोदी की हैसियत को मजबूत करना चाहता है जिनकी सरकार का लोकप्रिय होना दीर्घकालीन अमेरिकी हितों के अनुरूप होगा। निकट भविष्य में पाकिस्तान के स्थान पर कई छोटे-छोटे देश सृजित करवा कर अमेरिका भारत की बहुसंख्यक जनता के दिलों में अपना राज जमा कर अपने देश के व्यापारिक हितों को ही साधेगा जबकि यहाँ की जनता को लगेगा कि वह यहाँ कि बहुसंख्यक जनता का हितैषी है और यह सब मोदी व उनकी सरकार के चलते संभव हुआ है।

*** प्लेटिनम स्वर्ण से भी मंहगी धातु है और इसका प्रयोग यूरेनियम निर्माण में भी होता है.कश्मीर के केसर से ज्यादा मूल्यवान है यह प्लेटिनम.सम्पूर्ण द्रास क्षेत्र प्लेटिनम का अपार भण्डार है.अगर संविधान में सरदार पटेल और रफ़ी अहमद किदवई ने अनुच्छेद  '३७०' न रखवाया  होता  तो कब का यह प्लेटिनम विदेशियों के हाथ पड़ चुका होता क्योंकि लालच आदि के वशीभूत होकर लोग भूमि बेच डालते और हमारे देश को अपार क्षति पहुंचाते। 

**** अनुच्छेद 370 को समाप्त कराने की मांग उठाते रहे लोग जब सत्ता में मजबूती से आ गए हैं तब बिना पाकिस्तान के अस्तित्व के ही 'जोजीला'दर्रे में स्थित 'प्लेटिनम' जो 'यूरेनियम' के उत्पादन में सहायक है यू एस ए को देर सबेर हासिल होता दीख रहा है । अड़ंगा चीन व रूस की तरफ से हो सकता है और उस स्थिति में भारत-भू 'तृतीय विश्वयुद्ध' का अखाड़ा भी बन सकती है। देश और देश कि जनता का कितना नुकसान तब होगा उसका आंकलन वर्तमान सरकार नहीं कर सकती है। 

***** बाजपेयी सरकार में मंत्री रहे जगमोहन जब जम्मू कश्मीर के गवर्नर थे तब उनकी विभेदकारी नीति के अंतर्गत उनकी ही प्रेरणा से कश्मीरी पंडितों को घाटी से खदेड़ा गया था और ऐसा सांप्रदायिक रंगत देने के लिए किया गया था जो अब पूरा गुल खिला रहा है। 



   ~विजय राजबली माथुर ©














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