Wednesday, January 22, 2020

संविधान क्यों बना जन प्रतिरोध का हथियार ------ अनिल सिन्हा / CAA-NRC संविधान विरोधी और विभाजनकारी ------ कमल जैसवाल,कनन गोपीनाथन( सेवानिवृत्त आईएएस )

  
Anil Sinha
1 hr
संविधान क्यों बना जन प्रतिरोध का हथियार

भारत के संविधान को आकार देते वक्त इसके निर्माता भीमराव आंबेडकर ने शायद ही सोचा होगा कि इसके लागू होने के 70 साल बाद लोग इसकी दुहाई एक धर्मग्रंथ की तरह देते हुए अपना अधिकार मांगेंगे। दुनिया में कहीं ऐसा नहीं हुआ कि संविधान को लोग सिर्फ शासन के नियमों की किताब मानने के बजाय प्रतिरोध का हथियार बना लें। भारतीय संविधान ऐसा महान दस्तावेज कैसे बन गया/ ऐसा इसलिए हुआ कि इसने लोकतंत्र के विकास के कई चरण एक साथ पार किए हैं। यह आजादी के आंदोलन के संघर्षों को इनकी समग्रता में अभिव्यक्त करता है। विविधता से भरे स्वाधीनता आंदोलन को हर तरह की गैर-बराबरी के खिलाफ संघर्ष करना पड़ा। यही वजह है कि दुनिया के बाकी संविधानों के विपरीत इसने न सिर्फ अपने सभी नागरिकों को बराबरी के सारे अधिकार एक साथ दिए बल्कि इससे आगे जाकर बेहतर संसार रचने का सपना भी दिया। वयस्क मताधिकार को ही लें। इंग्लैंड या अमेरिका जैसे महान लोकतंत्रों में भी यह सबको एक साथ नहीं मिला। महिलाओं को मताधिकार देने में उन्होंने लंबा वक्त लगाया। कहीं नस्ल और धर्म तो कहीं आर्थिक आधार पर लोगों को इससे वंचित रखा गया। कई लोग मानते हैं कि भारतीय संविधान को ब्रिटिश सरकार की ओर से समय-समय पर लाए गए वैधानिक परिवर्तनों का आधार मिला था। लेकिन भारत जब आजाद हुआ तो देश में सिर्फ 14 प्रतिशत लोग ही वोट दे सकते थे, जो संपत्ति वाले और पढ़े-लिखे थे। यानी जमींदार, व्यापारी, वकील, डॉक्टर आदि। अलग-अलग समुदायों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र भी थे।

भारत में एक विकलांग लोकतंत्र बन रहा था। संविधान निर्माताओं के पास इसी सीमित लोकतंत्र की औपनिवेशिक परंपरा थी और जमींदारों, पूंजीपतियों या जड़ सामाजिक सोच वाले समूहों के प्रतिनिधियों से भरी संविधान सभा। सोचिए, 1952 में जमींदार और हल जोतने वाला भूमिहीन वोट देने के लिए एक ही लाइन में खड़े हुए तो उनके मन में भाव क्या रहे होंगे/ सदियों से हर सार्वजनिक स्थान से बहिष्कृत रहता आया दलित जब लोकतंत्र के मंदिर में तथाकथित इज्जत वालों के साथ खड़ा हुआ तो उसे कैसा लगा होगा/ इसका लेखा-जोखा तो असंभव है लेकिन इस अधिकार की ताकत को जानना हो तो बिहार और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास को पलटना चाहिए, जहां उच्च वर्ण के लोग दलितों को वोट ही नहीं डालने देते थे। कई बार तो दलितों को जान गंवानी पड़ती थी। बूथ कैप्चरिेंग कही जाने वाली इन घटनाओं को मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने चुनौती के रूप स्वीकार किया और भारतीय चुनाव प्रणाली को इस बीमारी से छुटकारा दिलाया।

सभी को वोट का अधिकार देने वाले संवैधानिक अनुच्छेद को बाबा साहेब ने लिखा था। उन्होंने कहा था कि वोट देने का अधिकार नागरिकता के लिए आवश्यक है और यह लोगों को नैतिक रूप से राजकीय व्यवस्था का सदस्य बनाता है। उनके अनुसार, ‘यह उन लोगों की राजनीतिक शिक्षा का जरिया है जिन्हें राजनीतिक और सामाजिक जीवन से आज तक बाहर रखा गया है।’ उनका इशारा उनकी ओर था जिन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी मंदिरों, रास्तों, कुंओं, तालाबों से दूर रखा गया था और जो इंसान होने के नैसर्गिक अधिकार से भी वंचित थे। भावी पीढ़ियां इस पर जरूर अचरज करेंगी कि ऐसा देश, जिसका विभाजन मजहब के आधार पर हुआ था और जहां दस लाख से भी ज्यादा लोग दंगों में मारे गए थे, एक सेक्युलर मुल्क कैसे बन गया। इसका श्रेय उन बलिदानों को जाता है, जो हमारे रहनुमाओं और हमारी जनता ने दिया है। हमें नोआखाली के नदी-नालों को पार कर मजहबी उन्माद की आग बुझाने में लगे महात्मा की बेचैन आंखों में झांकना होगा, या दिल्ली में मनाई जा रही आजादी की खुशियों से दूर कोलकता में आमरण उपवास पर बैठे गांधी की ओर देखना पड़ेगा, जिन्होंने नफरत की आग को मानवता की मद्धिम आंच में बदल दिया।

कई बार भारतीय संविधान को धर्मनिपरेक्ष बनाने का श्रेय हिंदू धर्म की सहिष्णुता को देने की कोशिश की जाती है। लेकिन आजादी के आंदोलन में हिंदुत्व की धारा की भूमिका को गौर से देखने पर एक अलग ही तस्वीर उभरती है। इसके सिद्धांतकार विनायक दामोदर सावरकर इस्लाम और ईसाइयत को बाहरी धर्म मानते थे और उन्हें मानने वालों को भारत की पूर्ण नागरिकता के काबिल नहीं मानते थे। मुसलमान उनके दुश्मन थे, जो यहीं के थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजाद हिंद फौज बना रहे थे, लेकिन हिंदू महासभा अंग्रेजों की फौज में भर्तियां कराने में जुटी थी। अगर संविधान-निर्माता संविधान को सेक्युलर बना पाए तो इसलिए कि उनके पास गांधी, बिस्मिल-अशफाकुल्ला और भगत सिंह की शानदार शहादत की विरासत थी, जिसने सहिष्णुता को किसी धर्म या मजहब से नहीं बंधने दिया। भारतीय संविधान की एक और कामयाबी है, भारत में लोकतंत्र की एक मजबूत नींव डालने की। भारतीय उपमहाद्वीप में हमारे साथ जन्म लेने वाले पाकिस्तान को ही देख लें। आज भी वहां एक अर्ध-लोकतंत्र ही है, क्योंकि चुनी हुई सरकार फौज की मर्जी के खिलाफ कुछ नहीं कर सकती।


पाकिस्तान में लोकतंत्र का यह हश्र इसलिए हुआ क्योंकि मुस्लिम लीग लोकतांत्रिक और सेक्युलर मूल्यों में यकीन नहीं करती थी। जिन्ना ने बंटवारा कराने में सफलता जरूर पा ली, लेकिन गांधीजी ने मुल्क बनाने में उन्हें हरा दिया। उनके वारिस जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल अगर सांप्रदायिक नफरत के बीच भी उनके मूल्यों पर न टिके होते तो डॉ. आंबेडकर जैसे विलक्षण व्यक्तित्व भी एक ऐसी किताब भारत के लोगों के हाथ में नहीं रख पाते, जो संशय की हर अंधेरी रात में लोगों को रोशनी देती है। लोकतंत्र के सामने एक चुनौती इंदिरा गांधी के आपातकाल के समय आई थी तो गांधीजी के ही एक शिष्य जयप्रकाश नारायण के आंदोलन ने उसे पटरी पर ला दिया था। ऐसा हर झटका बर्दाश्त करने की ताकत भारत के संविधान में है।

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CAA-NRC संविधान के आधारभूत मूल्यों के ख़िलाफ़ है

पिछले कुछ समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के ख़िलाफ़ ज़ोरदार प्रदर्शन हो रहे हैंI न्यूज़क्लिक से बात करते हुए सेवानिवृत्त आईएएस अफ़सर कमल जैसवाल ने CAA, NRC और राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर (NPR) के बीच के संबंध को स्पष्ट कियाI उन्होंने इस क़ानून की व्यावहारिकता और संवैधानिकता पर भी कुछ दिलचस्प सवाल उठायेI






 बीजेपी सिर्फ मुसलमानों को नहीं हिंदुओं को भी बाँट रही है
पूर्व IAS अफसर कनन गोपीनाथन ने HW न्यूज़ को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा है. गोपीनाथन ने बताया की किस तरह केंद्र सरकार देश के लोगो को बाँट रही है



~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, January 19, 2020

स्वर्णिम आंदोलन ------ हर्ष मंदर / रिज़्वान अंसारी

  



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हालाँकि, सरकार और पुलिस को चुनौती दे रहीं इन महिलाओं के सामने भी कई चुनौतियाँ है। चुनौतियाँ, इस प्रदर्शन को जारी रखने की और प्रदर्शन के मकसदों से न भटकने की। चुनौतियाँ, अपने परिवार को देखने की औरे बच्चों को संभालने की। लेकिन, ये औरतें हर चुनौतियों को मात दे रहीं हैं। हालाँकि, इस प्रदर्शन को उस जगह से हटाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में दो याचिकाएँ दायर की गई थी जिसमें पहले को तो कोर्ट ने खारिज कर दिया। लेकिन, दूसरी याचिका में कोर्ट ने पुलिस को कानून के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। लिहाजा, अब पुलिस के सामने चुनौती है कि वह इस प्रदर्शन को कैसे हटाए। दरअसल, ये महिलाएँ शांतिपूर्वक इस प्रदर्शन को आगे बढ़ा रहीं हैं। अभी तक किसी भी हिंसा की घटना नहीं हुई है और यही इस प्रदर्शन की सबसे बड़ी खासियत है। 
ये वही महिलाएँ हैं जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी मां-बहन कह कर तीन तलाक जैसी कुप्रथा से निजात दिलाने के लिए एक कानून को स्थापित किया। लेकिन, हमारे प्रधानमंत्री को उन माँ-बहनों की आवाज सुनाई नहीं दे रही है जो सर्दी की खामोश रातों में भी अपनी आवाज बुलंद कर रहीं हैं। ये वही महिलाएँ जिनमें से अधिकतर ने तीन तलाक पर सरकार के रुख की तारीफ की थी, तब भाजपा ने इन्हें अपनी मां-बहन बताया था। लेकिन, आज जब ये सीएए का विरोध कर रहीं हैं तब भाजपा सरकार का कोई प्रतिनिधि बात तक करने नहीं गया है। व्यापक स्तर पर यह अफवाह फैलाइ जा रही है कि प्रदर्शन करने वालों में अधिकांश मुस्लिम हैं। फिर सवाल है कि क्या मुस्लिमों की मांग की कोई प्रासंगिकता नहीं होती? क्या वे नागरिक नहीं हैं? अगर वे नागरिक हैं तो उनकी मांगों को अनसुना कर देना कितना मुनासिब है? सरकार भले ही इन महिलाओं की आवाज को अनसुना कर रही है। लेकिन, सबसे सुकून वाली बात यह है कि ये महिलाएँ गांधी के विचारों को सार्थक करती हुईं प्रतीत हो रही हैं।
1920 के बाद आंदोलनों में प्रमुखता से गांधी के पदार्पण के बाद महिलाओं की भूमिका निर्णायक तौर पर उभर सामने आई। असहयोग आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक में महिलाओं की भूमिका से कोई इनकार नहीं कर सकता। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में तो महिलाओं ने तो बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। महिलाओं को आगे करने के पीछे गांधी की सोच थी कि महिलाएँ अहिंसक और सहनशील होती हैं। सत्ता के खिलाफ आंदोलन छेड़ने के लिए इन दोनों ही गुणों का होना जरूरी है। उनका मानना था कि आंदोलनों के प्रभावी होने के लिए उसका अहिंसक होना जरूरी है और लंबे समय तक जारी रखने के लिए सहनशीलता की जरूरत है। लिहाजा, आंदोलनों को लंबे समय तक जारी रखने के लिए उन्होंने महिलाओं की भागीदारी को जरूरी समझा। ऐसा लग रहा है मानो जैसे शाहीन बाग की ये महिलाएँ गांधी की इसी सोच को सार्थक करने की मुहिम में जुट गईं हों। 

रिजवान अंसारी

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~विजय राजबली माथुर ©

Tuesday, January 7, 2020

*अपनो पे सितम गैरों पर करम* #C.A.A.# ------ रजनीश किमार श्रीवास्तव


Rajanish Kumar Srivastava 
#C.A.A.# यानी *अपनो पे सितम गैरों पर करम*
जब विभाजन का दंश झेल भारत आजाद हुआ तो बहुत सारे हिन्दू और सिखों ने इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान को छोड़ कर सेकुलर भारत को तरजीह देते हुए भारत आना और भारत का नागरिक बन देश की सेवा करना स्वीकार किया और अपनी हवेली,खेत और सम्पत्ति सब कुछ पाकिस्तान में छोड़कर भारत में गरीबी का जीवन स्वीकार किया और भारत के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।लेकिन लगभग दो करोड़ हिन्दू और सिखों ने अपनी सम्पत्ति के लालच में कट्टर इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान को ही अपना मादरे वतन कुबूल करना मुनासिब समझा।हालाँकि कट्टर इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान से सेकुलर भारत जैसी उदारता की उम्मीद तो की भी नहीं जा सकती थी।लिहाजा उन पर अत्याचार तो हुए।अब सवाल यह है कि सम्पत्ति के लालच में कट्टर इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान को अपना मादरे वतन कुबूल करने का गलत निर्णय लेने वाले लोगों को रिकार्ड बेरोजगारी और दुनिया के सबसे ज्यादा गरीबों का पहले से ही बोझ ढ़ोने वाले भारत को बोझ बर्दाश्त कर अपने मूल नागरिकों का हिस्सा उनमें बाँट देना चाहिए? इस पृष्ठभूमि में नागरिकता संशोधन विधेयक -2019 को इस कहानी से समझें-----↓
*******कहानी*****
एक गरीब व्यक्ति अपने वृद्ध माता और पिता के साथ किसी तरह अपने पाँच बच्चों को पाल रहा था।बच्चे कुपोषण के शिकार थे और बेरोजगार भी थे।तभी उस गरीब व्यक्ति के वृद्ध पिता को अपने से भी ज्यादा गरीब पड़ोसी के पाँच बच्चों पर इस कारण से दया आ गयी कि उनकी सौतेली माता उन्हें बहुत प्रताड़ित करती है।अतः उसने अपने गरीब पुत्र को दया के वशीभूत आदेश दिया कि वह पड़ोसी के इन प्रताड़ित पाँचों बच्चो को गोद ले ले।गरीब व्यक्ति घबरा गया कि जब वह अपनें ही पाँच बच्चों का ठीक से पालन पोषण नहीं कर पा रहा है और न ही उन्हें रोजगार दिला पा रहा है तो ऐसी दशा में वह पड़ोसी के पाँच और बच्चों को कैसे गोद ले ले।उधर उस गरीब व्यक्ति के पाँचों बच्चों ने भी अपने बाबा के गोद लेने वाले आदेश के खिलाफ बगावत कर दी ।क्योंकि उनको भय हो गया कि गोद लेने की दशा में पड़ोसी के ये पाँच गोद लिए बच्चे भी उनकी छोटी सी जमीन और घर के हिस्सेदार हो जाएँगे और पिता की कमाई का बहुत थोड़ा सा हिस्सा अब इनके पालन पोषण पर भी खर्च हो जाएगा।....... अब आप ही फैसला करें कि पहले से कुपोषित,गरीब और बेरोजगार पाँचो सगे पुत्रों की बगावत सही है या गलत।









~विजय राजबली माथुर ©
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Thursday, December 26, 2019

क्रान्तिकारी - राष्ट्रवादी वीणा दास ------ संतोष कुमार झा / सुनील सिंह





26 दिसंबर:पूण्यतिथि विशेष

#जब_एक_युवती_द्वारा_चलायी_गयी_गोलियों_से_थर्रा_उठा_कलकत्ता_विश्वविद्यालय

6 फरवरी 1932 को कलकत्ता विश्व विद्यालय के कनवोकेशन हाल में दीक्षांत समारोह में सैकड़ों लोग एक युवती द्वारा लगातार चलायी जा रही गोलियों से स्तब्ध रह गए.उस युवती केनिशाने पर बंगाल का तत्कालीन गवर्नर स्टेनले जैक्सन था.जैक्सन के अपने निकट पहुँचते ही उस पर उस युवती ने एक के बाद एक 5 गोलियां दाग दीं.
हालांकि दुर्भाग्य से जैक्सन बच गया और बीना दास को गिरफ्तार कर 9 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दीगयी.
उस दीक्षांत समारोह में गोली चलानेवाली क्रान्तिकारी और राष्ट्रवादी विचारों से ओत प्रोत वो युवती थी वीणा दास.वह अन्य स्नातकों के साथ दीक्षांत समारोह में थी.1937 में प्रान्तों में कोंग्रेसी सरकार बनने के बाद अन्य राजबंदियो के साथ बीना भी जेल से बाहर आ गयी.भारत छोड़ो आन्दोलन” के समय उन्हें तीन वर्ष केलिए नजरबंद कर लिया गया था.1946 से 1951 तक वे बंगाल विधानसभा की सदस्य रही . गांधीजी की नौआखाली यात्रा के समय लोगो के पुनर्वास के काम में बीना (Bina Das) ने भी आगे बढकर भाग लिया .

बंगाल के कृष्णानगर में 24 अगस्त 1911 को प्रसिद्द ब्रह्मसमाजी शिक्षक बेनी माधव दास और समाजसेविका सरला देवी के घर पर जन्मीं .बीना दास अपने अध्ययन काल में ही अंग्रेजों के खिलाफ निकाले जाने वाले विरोध मार्चों और रैलियों में बढ़ चढ़ कर भाग लेने लगी.1947 में उनका युगान्तर समूह के भारतीय स्वतन्त्रता कार्यकर्ता जतीश चन्द्र भौमिक से विवाह हो गया.पति के देहान्त के बाद उन्होंने ऋषिकेश में एकान्त जीवन व्यतीत करना आरम्भ किया और अज्ञातवास में ही 26 दिसंबर 1986 को मृत्यु को प्राप्त किया.


Sunil Singh

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  ~विजय राजबली माथुर ©