Tuesday, September 3, 2019

रिजर्व बैंक ने दांव पर लगाया अपना भविष्य ------ भरत झुनझुनवाला




http://epaper.navbharattimes.com/details/57310-77040-2.html






  

संकटकालीन बचत का एक हिस्सा सरकार को देकर सरकार के बैंकर ने अपने हाथ बांध लिए हैं
व्यापारी अपने प्रॉफिट का एक हिस्सा ‘रिजर्व’ में डालता है, जैसे बैंक के फिक्स्ड डिपॉजिट में अथवा सोना खरीदने में। इस रकम का उपयोग वह संकट के समय करता है। प्रॉफिट के दूसरे हिस्से से व्यापारी अपने घर का खर्च चलाता है या दुकान को बढ़ाता है या किसी और काम में निवेश करता है। व्यापारी को तय करना होता है कि मुनाफे में से कितना अंश वह रिजर्व में रखेगा और कितना अंश वर्तमान में खपत अथवा निवेश के लिए उपयोग करेगा। इसी तरह रिजर्व बैंक को हर साल प्रॉफिट होता है। उस प्रॉफिट का एक हिस्सा रिजर्व बैंक रिजर्व में डाल देता है जैसे सोना, विदेशी बांड, सरकारी बांड अथवा अन्य निवेशों में। इस निवेश का उपयोग रिजर्व बैंक किसी भी संभावित संकट के समय कर सकता है। प्रॉफिट का शेष अंश वह भारत सरकार को लाभांश के रूप में दे सकता है।• तरल पूंजी नहीं 

संकट के समय यह प्रक्रिया पलट जाती है। रिजर्व बैंक पूर्व में बनाए गए रिजर्व से पैसा निकाल कर देश की अर्थव्यवस्था को संभालने में उसका उपयोग कर सकता है। जैसे बैंकों पर यदि संकट आया तो उन्हें मदद देने के लिए रिजर्व बैंक अपने रिजर्व का इस्तेमाल कर सकता है। पिछले पांच वर्षों में रिजर्व बैंक ने अपने रिजर्व में धन डालना बंद कर दिया है। वर्ष 2012 में रिजर्व बैंक ने 27,000 करोड़ रुपये रिजर्व में डाले, वर्ष 2013 में 28,000 करोड़ रुपये डाले लेकिन वर्ष 2014 के बाद रिजर्व बैंक ने अपने रिजर्व में रकम डालना पूर्णतया बंद कर दिया है। इतना ही नहीं, जो रिजर्व थे, उनमें से 52,000 करोड़ की रकम निकालकर भी इस वर्ष सरकार को दे दिया है। 

रिजर्व बैंक ने आकलन किया कि उसके पास जरूरत से अधिक रिजर्व उपलब्ध हैं और उस अनावश्यक रिजर्व को उसने भारत सरकार को दे दिया। भारत सरकार ने रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान की अध्यक्षता में एक कमेटी बनायी थी, जिसने कहा था कि रिजर्व बैंक को अपनी कुल पूंजी का 24.5 से 20.0 प्रतिशत तक रिजर्व रखना चाहिए। वर्तमान में रिजर्व बैंक के रिजर्व 23.3 प्रतिशत थे। ये जालान समिति द्वारा बताए गए दायरे में थे लेकिन रिजर्व बैंक ने निर्णय किया कि इन्हें 23.3 प्रतिशत से घटाकर 20.0 प्रतिशत के न्यूनतम स्तर पर ले जाया जाए। ऐसा करने पर बची 52,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त रकम को रिजर्व बैंक ने इस वर्ष भारत सरकार को हस्तांतरित किया है। रिजर्व बैंक दवारा अपने रिजर्वों को पर्याप्त मानने के पीछे उसकी सोच में आया एक मौलिक परिवर्तन है। 

भारतीय रिजर्व बैंक के रिजर्व दो प्रकार के होते हैं। पहला सोना, अमेरिकी सरकार के बांड, विदेशी करेंसी इत्यादि हैं। दूसरी श्रेणी में भारत सरकार के बांड अथवा अन्य घरेलू निवेश आते है। इनमें पहले प्रकार के रिजर्व को वास्तविक रिजर्व मानने में संकट है क्योंकि इन्हें तात्कालिक आवश्यकता के अनुसार नगदी में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। जैसे भारी मात्रा में सोना बेचने से अंतराष्ट्रीय बाज़ार में सोने के दाम गिर जाएंगे। कुछ वर्ष पूर्व कई देशों ने अपने सोने का भंडार बेचा था और विश्व बाजार में सोने के दाम गिर गए थे। 

निकट भविष्य में अगर कभी ऐसी नौबत आई तो इन रिजर्व की वास्तविक कीमत आज से बहुत कम हो जाएगी। अमेरिकी सरकार के बांड बेचने से भारत और अमेरिका के सामरिक संबंधों पर प्रभाव पड़ेगा। इसलिए इन पूंजियों को तरल नहीं माना जा सकता है। पर इन्हें ही रिजर्व मानकर रिजर्व बैंक ने अपने रिजर्वों की मात्रा कम कर दी है जिससे कि वह सरकार को अधिक से अधिक रकम मुहैया करा सके। 

रिजर्व बैंक के इस कदम से कई प्रकार के संकट उत्पन्न हो गए हैं। पहली बात यह कि अब तक प्रॉफिट का एक हिस्सा भविष्य के संकटों को संभालने के लिए रिजर्व में डाला जाता रहा है। अब उस नीति को पलटकर पूर्व में अर्जित रिजर्व का उपयोग वर्तमान खर्चों को पोषित करने के लिए किया जाने लगा है। जैसे व्यापारी घर के सोने को बेच कर फाइव स्टार होटल में ऐयाशी करे। यह देश की अर्थव्यवस्था के संकट को इंगित करता है। 

दूसरे, पिछले पांच वर्षों में सरकार को रिजर्व बैंक से मिले लाभांश का उपयोग सराहनीय नहीं रहा है। सरकार ने अपने कुल घाटे यानी वित्तीय घाटे में सराहनीय कटौती हासिल की है। हमारा कुल घाटा जीडीपी का सात प्रतिशत था जो वर्तमान में लगभग तीन प्रतिशत हो गया है। लेकिन यह कमी मुख्यत: पूंजी खर्चों में कटौती करके हासिल की गई है। पूंजी खर्चों में कटौती से तीन प्रतिशत वित्तीय घाटा कम हुआ है जबकि चालू खर्चों में कटौती से केवल एक प्रतिशत कम हुआ है। 

यह बताता है कि सरकार अपने चालू खर्चों पर नियंत्रण करने में नाकाम है और इन्हें पोषित करने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा वितरित लाभांश का उपयोग किया जाएगा।

 तीसरे, जालान कमिटी ने 24.5 से 20.0 प्रतिशत तक रिजर्व रखना उचित माना था, लेकिन रिजर्व बैंक ने इसको मध्य स्तर पर रखने के स्थान पर न्यून स्तर पर रखा है, यानी हमारा सुरक्षा कवच न्यून हो गया है।

 चौथे, रिजर्व का विदेशी हिस्सा त्वरित रूप से नगद में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है, इसलिए संकट के समय देश की परिस्थिति और गंभीर हो जाएगी।

 • क्षितिज पर संकट : 


पांचवें, वर्तमान अर्थव्यवस्था में कई प्रकार के संकट क्षितिज पर दिख रहे हैं। पकिस्तान से हमारे संबंध बिगड़ रहे हैं, ईरान से सस्ता तेल आयात करने में संकट है, बैंकों के खटाई में पड़े लोन बढ़ रहे हैं, अर्थव्यवस्था में मंदी बढ़ रही है, इत्यादि। इन परिस्थितियों से जूझने के लिए हमें रिजर्व की अधिक जरूरत पड़ेगी न कि कम। सरकार ने अपने तात्कालिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए रिजर्व बैंक को इस दिशा में प्रेरित किया है और सरकार के दबाव में रिजर्व बैंक ने देश के भविष्य को दांव पर लगाया है। 




~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, August 29, 2019

अब ताकत में हैं, तो इतिहास की किताबें बदल रहे है ------ मनीष सिंह / रश्मि त्रिपाठी

Rashmi Tripathi
August 26 at 8:49 AM  

1757 में प्लासी की लड़ाई के पचास साल बाद तक अंग्रेजो ने भारत की सामाजिक व्यवस्था को छुवा नही। पर जब यकीन होने लगा, की यहां उनको लम्बा टिकना है तब अपने सेवक तैयार करने की जरूरत महसूस हुई।

1813 में कम्पनी के बजट में एक लाख रुपए शिक्षा के लिए रखे गए। कम्पनी सरकार को स्किल डेवलपमेंट करना था ताकि सस्ते पीए, मुंशी, स्टोरकीपर, अर्दली, मुंसिफ और डिप्टी कलेक्टर मिल सकें।

कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में यूनिवर्सिटी खुली। कलकत्ता यूनिवर्सिटी की जो पहली बैच के ग्रेजुएट निकले, उनमे बंकिम चन्द्र चटर्जी थे। वही सुजलाम सुफलाम, मलयज शीतलाम वाले .. । अंग्रेजी पढ़े छात्र आनन्दमठ लिखने लगे, तो खेल कम्पनी सरकार के हाथ से फिसलने लगा।

दरअसल इंडियन्स ने अंग्रेजी पढ़ी,तो वैश्विक ज्ञान के दरवाजे खुले। नए नवेले पढ़े लिखो ने योरोपियन सोसायटी को देखा, उनके विचारको की किताबें पढ़ी। लिबर्टी, सिविल राइट, डेमोक्रेसी, होमरूल .. जाने क्या क्या।

कुछ तो लन्दन तक गए, बैरिस्टरी छान डाली और अंग्रेजो को कानून सिखाने लगे। कुछ सिविल सर्विस में आ गए, कुछ ने अखबार खोल लिया। दादा भाई नोरोजी ब्रिटिश संसद में पहुंच गए "अधिकार" मांगने लगे। सरकारों को जब जनता की समझ और ज्ञान से डर लगे तो लोगो को लड़वाना शुरू करती हैं। समुदायों को फेवर और डिसफेवर इसके औजार होते हैं।

1857 की क्रांति के लिए अंग्रेजो ने मुस्लिम शासकों को दोषी माना, और लगभग इग्नोर किया। हिन्दू राजे और बौद्धिको पर सरकार के फेवर रहे। जनता के असन्तोष के सेफ पैसेज के लिए एक सभा बनवा दी, जिसमे देश भर के सभी ज्ञानी ध्यानी आते, अपनी मांग रखते, सरकार दो चार बातें मान लेती।

सभा को इंग्लिश में "कांग्रेस" कहते है। सालाना बैठक को कांग्रेस का अधिवेशन कहा जाता। इस कॉंग्रेस में हिन्दू ज्यादा संख्या में थे। आबादी के हिसाब से स्वाभाविक था, पर जो अब तक राज में थे, उनमे कुंठा बढ़ी।

सैयद अहमद खान ने कौम को समझाया- अंग्रेज़ी पढ़ो, सरकार में घुसो। वरना जो अपर हैंड पांच सात सौ सालों से है, खत्म हो जाएगा। आज के लीडरान की तरह बात सिर्फ ज़ुबानी नही थी। एक कॉलेज खोला, शानदार ... जो अपने वक्त से काफी आगे का था। मुस्लिम जनता ने मदद की, मगर ज्यादा मदद नवाबो से आई। उच्चवर्गीय मुस्लिम और नवाब एक साथ आये।

नवाबो को इसका एक नया फायदा मिला। ताकतवर होती कांग्रेस में रियाया के लोग थे, कई मांगे ऐसी रखते थे जिनमे उनकी जेब कटती थी। सैय्यद साहब और उनके सम्भ्रांत साथी, नवाबो के हित-अहित से जुड़ी मांगों पर दबाव बनाते थे। 1906 आते आते उन्ही के बीच से मुस्लिम लीग बनी। ढाका नवाब चेयरमैन हुए, भोपाल नवाब सचिव। बंगाल विभाजन हुआ था। कांग्रेस बंग-भंग के विरोध में थी, लीग ने समर्थन किया। मुस्लिम अब अंग्रेजो के प्यारे हो चले थे।

रह गए हिन्दू राजे रजवाडे। कांग्रेस का फेवर पाते नही थे, अंग्रेज सुनते नही थे। अपना कोई जनसंघठन न था। कुछ करने की उनकी बारी थी। तो देश भर में कई छोटे छोटे संगठन थे, जो हिन्दू पुनर्जागरण और सामाजिक सुधार कर रहे थे। बहुतेरी हिन्दू सभाएं-संस्थाये थी। जोड़ने वाला कोई चाहिए था। मिला- पण्डित मदन मोहन मालवीय।

पंडितजी ने अलीगढ़ से बड़ा, बेहतर, हिन्दू विश्वविद्यालय का बीड़ा उठाया था। जनता के बीच जा रहे थे। राजाओ ने खुलकर दान दिया, सभाएं करवायीं। मालवीय साहब पूरे देश मे घूमे, हिन्दू संगठनों को एक छतरी तले लेकर आये। काशी हिन्दू विश्विद्यालय बना , और अखिल भारतीय हिन्दू महासभा भी बन गयी। यह 1915 का वर्ष था। अब तीन संगठन अस्तित्व में आ चुके थे।

पहला, कामन पीपुल के लिए बात करने वाली कांग्रेस, जो सिविल लिबर्टी, इक्वलिटी, सेकुलरिज्म की बात करती थी। इसको ताकत जनता से मिलती थी, धन मध्यवर्ग के साथ नए जमाने के उद्योगपति व्यापारी पूंजीपतियों से मिलता था। इसके नेता भारत के भविष्य को ब्रिटेन के बर-अक्स देखते थे।

दूसरी ताकत, मुस्लिम समाज, उसके धार्मिक सांस्कृतिक विशेषाधिकार की पैरोकार मुस्लिम लीग, जिसकी ताकत मुस्लिम कौम थी, और फंडिग नवाबो, निज़ामों की थी। ये भारत का सपना उस मुगलकाल के बर-अक्स देखते थे, जिसमे सारी ताकत उनके हाथ मे थी।

तीसरी ताकत, हिन्दू समाज, उसके धार्मिक सांस्कृतिक विशेषाधिकार की पैरोकार और हिन्दू रजवाड़ों के हितों को ध्यान रखने करने वाली महासभा थी। जिसके लिए भारत का भविष्य मौर्य काल से लेकर शिवाजी की हिन्दू पादशाही के बीच झूलता था।

आगे चलकर अंग्रेज चुनावी सुधार करते हैं, सत्ता में भागीदारी खुलनी शुरू हो जाती है। मार्ले मिंटो सुधार और 1935 के इंडिया गवर्नेस एक्ट के आने के साथ, तीनो प्रेशर ग्रुप चुनावी दलों के रूप में तब्दील हो जाते हैं।

समय के साथ नए नेता इन संगठनो की लीडरशीप लेते हैं। ये गांधी, जिन्ना और सावरकर की धाराएं हो जाती हैं। दो धाराएं देश की घड़ी को, अपने अपने तरीके से पीछे ले जाना चाहती थी, एक आगे की ओर...।। पीछे ले जाने वाली धाराएं मिलकर विधानसभाओं में मिलकर सरकारें बनाती हैं, और सड़कों पर अपने समर्थकों से दंगे भी करवाती हैं। सत्ता की गंध से संघर्ष में खून का रंग मिल जाता है।

1947 में इस रंग ने भारत का इतिहास ,भूगोल , नागरिकशास्त्र, सब बदल दिया। एक धारा पाकिस्तान चली गयी, मगर अवशेष बाकी है। दूसरी सत्ता में बैठे बैठे सड़ गयी, उसके भी अवशेष ही बाकी हैं। तीसरी पर गांधी के लहू के छींटे थे। बैन लगा, तो चोला बदल लिया, नाम बदल लिया। अब ताकत में हैं, तो इतिहास की किताबें बदल रहे है। अजी हां, स्किल डेवलमेंट पर भी फोकस है।

उधर कलकत्ता, अलीगढ़ और बनारस की यूनिवर्सिटीज आज भी खड़ी हैं। लेकिन हिंदुस्तान का मुस्तकबिल बनाने वाले छात्र नदारद हैं।



Manish Singh

साभार : 
https://www.facebook.com/rashmi.tripathi.73113/posts/1362771200565084


~विजय राजबली माथुर ©

Wednesday, August 28, 2019

जम्मू-कश्मीर में आगे कैसे होगा विकास ------ अजेय कुमार



*जम्मू-कश्मीर ने अपनी उलझी राजनीतिक परिस्थितियों और सीमा पार से आतंकी घुसपैठ के बावजूद कई हिंदीभाषी राज्यों से बेहतर प्रदर्शन किया है
** अब तक यानी 5 अगस्त, 2019 तक, जब अनुच्छेद 370 लागू था, कश्मीर के विकास संबंधी आंकड़े क्या दर्शाते हैं। जम्मू-कश्मीर न केवल मानव विकास सूचकांकों में अन्य राज्यों के साथ कदम मिलाकर चलता रहा है, बल्कि साक्षरता, औसत आयु, पांच साल तक के बच्चों की मृत्यु दर, स्कूली शिक्षा, न्यूनतम मजदूरी आदि कई संकेतकों में वह उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बहु-प्रचारित विकास मॉडल वाले राज्य गुजरात से बेहतर स्थिति में रहा है।
***यह तब है जब पिछले वर्षों में अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे विशेष दर्जा वाले राज्यों के मुकाबले जम्मू-कश्मीर को दी गई केंद्रीय सहायता एक-तिहाई से भी कम रही है। 
****इसलिए यह कहना कि अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर में विकास अवरुद्ध रहा है, गलत है। 
***** पूरे देश में जब कोई विकास नहीं हुआ तो भला जम्मू-कश्मीर में विकास कैसे संभव है, जब देश के कर्ता-धर्ता हर जगह एक से ही होंगे। 
जब पूरी अर्थव्यवस्था में ही सुस्ती है तो घाटी में निवेश कहां से आएगा और रोजगार कैसे बढ़ेंगे ------



http://epaper.navbharattimes.com/details/55923-77248-2.html










पिछले दिनों संसद में गृह मंत्री अमित शाह ने कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर दिए अपने भाषण में कहा- ‘अनुच्छेद 370 के कारण कश्मीर घाटी के लोग गुरबत में रह रहे थे।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि 370 खत्म होने से प्रदेश का विकास होगा और लोगों को रोजगार मिलेगा। आइए देखें, अब तक यानी 5 अगस्त, 2019 तक, जब अनुच्छेद 370 लागू था, कश्मीर के विकास संबंधी आंकड़े क्या दर्शाते हैं। जम्मू-कश्मीर न केवल मानव विकास सूचकांकों में अन्य राज्यों के साथ कदम मिलाकर चलता रहा है, बल्कि साक्षरता, औसत आयु, पांच साल तक के बच्चों की मृत्यु दर, स्कूली शिक्षा, न्यूनतम मजदूरी आदि कई संकेतकों में वह उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बहु-प्रचारित विकास मॉडल वाले राज्य गुजरात से बेहतर स्थिति में रहा है।• विशेष दर्जे के लाभ : 

गरीबी रेखा के सरकारी आंकड़ों को देखें तो पूरे देश में 21 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, जबकि जम्मू-कश्मीर में केवल 10 प्रतिशत लोग ही गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करते हैं। 2001 में प्रदेश की साक्षरता दर 55.52 फीसदी थी जो 2011 में बढ़कर 68.74 हो गई। जहां तक महिलाओं द्वारा अपने बैंक खाते खुलवाने का प्रश्न है, अखिल भारतीय स्तर पर यह संख्या 2005-06 में 15.5 प्रतिशत थी, जो 2015-16 में बढ़कर 53 प्रतिशत हो गई, जबकि जम्मू-कश्मीर में यह 22 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत हो गई जो कि गुजरात के समान है और कई उत्तर भारतीय राज्यों से ज्यादा है। गर्भ निरोधकों का इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर में 57 प्रतिशत जनता करती है, जबकि गुजरात में यह आंकड़ा मात्र 46.9 है। 5 वर्ष से कम आयु की औसत शिशु मृत्यु दर जम्मू-कश्मीर में 35 प्रति हजार है जबकि गुजरात में 36.5 प्रति हजार। इसी तरह बिजली, स्वच्छ पेयजल, साफ-सफाई और खाना बनाने में पर्यावरण-अनुकूल ईंधन के इस्तेमाल में भी जम्मू व कश्मीर छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे कई राज्यों से कहीं बेहतर है।

यह तब है जब पिछले वर्षों में अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे विशेष दर्जा वाले राज्यों के मुकाबले जम्मू-कश्मीर को दी गई केंद्रीय सहायता एक-तिहाई से भी कम रही है। इसलिए यह कहना कि अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर में विकास अवरुद्ध रहा है, गलत है। बल्कि जम्मू-कश्मीर ने अपने तमाम राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों और सीमा पार से आतंकी घुसपैठ के बावजूद कई हिंदीभाषी राज्यों से बेहतर प्रदर्शन करके दिखाया है। इसके पीछे, सबसे बड़ा कारण शेख अब्दुल्ला द्वारा राज्य में भूमि सुधारों को लागू करना है, जिससे साधारण जनता की आमदनी बढ़ी और उसके परिणाम स्वरूप सारे विकास संकेतकों में सुधार हुआ। भारत में वामपंथी शासन वाले राज्यों केरल, प. बंगाल, त्रिपुरा और कुछ हद तक कर्नाटक को छोड़कर अन्य किसी भी राज्य में भूमि सुधार लागू नहीं किए गए। इसके विपरीत शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में सबसे पहले जम्मू-कश्मीर में जमीदारों की जमीनें बिना उनको कोई मुआवजा दिए किसानों को बांटी गई। 

इससे पहले राज्य के कुल सिंचित क्षेत्र का अधिकांश भाग महाराजा और उनके चेले-चपाटों के हाथ में था। शेख अब्दुल्ला के प्रयासों के कारण ही जम्मू-कश्मीर में मात्र दो प्रतिशत से कम परिवार भूमिहीन हैं जबकि देश के अन्य भागों में कुल ग्रामीण परिवारों का एक तिहाई हिस्सा भूमिहीनों का है। यह संभव हो पाया अनुच्छेद 370 के कारण, जिसके चलते जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के दायरे से कुछ हद तक बाहर रहने का विशेषाधिकार हासिल था। शेष भारत में कानून था कि सरकार जमींदारों को मुआवजा दिए बिना उनकी जमीन का अधिग्रहण नहीं कर सकती थी। 26 मार्च, 1952 को जम्मू व कश्मीर संविधान सभा ने बिना किसी मुआवजे के सभी बड़ी-बड़ी जागीरें जब्त कर लीं। यह नीति कांग्रेस और केंद्र सरकार की नीति के भी उलट थी।

भूमि-सुधारों का असर राज्य के सामाजिक ताने-बाने और भूमि वितरण पर तो पड़ा ही, इससे वहां आय की असमानताओं पर भी थोड़ा अंकुश लगा। 2010-11 में जम्मू-कश्मीर में ग्रामीण गरीबी अनुपात 8.1 प्रतिशत था, जबकि पूरे देश के लिए यह 33.8 फीसदी था। जम्मू-कश्मीर राज्य में भारत के कुल सेब उत्पादन का 77 प्रतिशत पैदा होता है। आम लोगों की धारणा यह है कि जम्मू-कश्मीर में पर्यटन के अलावा कुछ नहीं है जबकि यहां कई प्रकार के खनिज काफी बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। जैसे चूना पत्थर, संगमरमर, जिप्सम, ग्रेनाइट, बॉक्साइट, डोलोमाइट, कोयला, सीसा इत्यादि। देश के उद्योगपतियों की नजरें इन पर हैं। उन्हें कश्मीर सोने की खान लग रहा है। कश्मीर की जमीन की उन्हें बड़ी फिक्र है, कश्मीरियों की नहीं। 

आज जब कश्मीर के विकास के बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाए जा रहे हैं, तब प्रश्न उठता है कि कश्मीर को छोड़कर भारत के अन्य भागों में पूंजी-निवेश, रोजगार और तथाकथित विकास का हाल कैसा है/ सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारी की दर पिछले 45 वर्षों में सबसे ऊपर है। ऑटोमोबाइल सेक्टर का कहना है कि मंदी के कारण उसे 3 लाख 50 हजार श्रमिकों की छंटनी करनी होगी। मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली कंपनियां भी यही करने जा रही हैं। मंदी का आलम यह है कि 5 रुपये के बिस्कुट के पैकेट बेचने वाली पार्ले ने 10,000 मजदूरों को निकालने की धमकी दी है। शिवसेना ने हाल ही में केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि पिछले वर्षों की आर्थिक-औद्योगिक नीतियों के कारण लगभग 2 करोड़ नौकरियां खत्म हो चुकी हैं।

 • बढ़ती हुई मंदी : 


जब हर जगह तमाम छोटे-बड़े कारखाने बंद हो रहे हों तो यह उम्मीद करना कि कश्मीर में नए कारखाने खुलने वाले हैं, एक दिवास्वप्न ही हो सकता है। पिछले 5 वर्षों में पूरे भारत में एक भी नया सरकारी विश्वविद्यालय नहीं खुला, एकाध नमूनों को छोड़कर एक भी नई रेलगाड़ी नहीं चली, एक भी नए हवाई अड्डे की स्थापना नहीं हुई। पूरे देश में जब कोई विकास नहीं हुआ तो भला जम्मू-कश्मीर में विकास कैसे संभव है, जब देश के कर्ता-धर्ता हर जगह एक से ही होंगे। 

http://epaper.navbharattimes.com/details/55923-77248-2.html













~विजय राजबली माथुर ©

Monday, August 26, 2019

उर्दू वाला चश्मा की प्रस्तोता नूपुर शर्मा जी को शुभकामनायें

  








Nupur Sharma
25-08-2019  at 10:00 AM 


UPDATE: Break from URDU WALA CHASHMA (@The Wire) - after TWO years of a TRANSFORMATIVE & ENRICHING experience - I’ll be taking a TEMPORARY BREAK.

AGENDA:

1) At this point in life I feel the need to CONSOLIDATE my work and life EXPERIENCE (which has been...well...“INTERESTING” 😊) into something CONCRETE. So I will work on a BOOK.

2) I want to learn how to read and write URDU - filhaal pooree RAVAANI se nahi padh paati.

3) Also on the agenda is IMMERSING myself in URDU & PANJABI poetry and literature. I feel that if I don’t REPLENISH myself on this count my work will stagnate.

Thanks ever so much for all the KHULOOS & IZZAT that you so graciously bestowed upon me - truly MOVED and INSPIRED by your GENEROSITY of SPIRIT.

I am THANKFUL for the CONSTRUCTIVE CRITICISM. It helped me GROW 🙏

I am EVEN MORE THANKFUL for the KIRDAARKUSHI and NASTY jibes 🙃

Online and Offline I have been called a “MULLI”, “PAKISTANI Agent”, "Brainwashed victim of ‘LOVE JIHAD’”, “MENOPAUSAL" (by men who seem 60 plus) & “SLUT” with all the glorious variations of the word that are used by self appointed SAMAAJ KE THEKEDAARS - men (AND women too). These are people who award KIRDAAR KE TAMGHAY in the KHAANDAANI KHAATOON/BAZAARU AURAT, IZZATDAAR/BESHARAM, WHORE/MADDONA binary - anything but SIMPLY HUMAN.

As for the conduct of the MARD HAZRAAT themselves - well, "MEN will be MEN” 🙂 - the same parameters don't apply of course. And PATRIARCHAL women SUPPORT the men in this.

I do not SHARE this to evoke SYMPATHY, PITY or ANGER - only to CALL OUT the MISOGYNY, COMMUNALISM and ISLAMOPHOBIA in DESI society.

These WEAPONS must be DIFFUSED by DE-CONSTRUCTION. The process also helps one HEAL and eventually TRANSCEND to a state of FORGIVENESS. One then hopes that someday these Trolls will rid themselves of the INSECURITY that makes them ACT OUT, makes them want to CRUSH YOUR SPIRIT.

As a friend explained to me - TROLLS are TORMENTED souls at one level.

I know I am NOT UNIQUE in this. For instance, MUSLIM ladies (and gentlemen) on SOCIAL MEDIA face much more VITRIOL.

Yes, the TOXICITY was DEEPLY HURTFUL initially but it also TOUGHENED me, made me a better JUDGE OF HUMAN NATURE going forward.

It DID NOT SUCCEED IN KILLING MY SELF BELIEF or MAKING ME CYNICAL ABOUT MY FELLOW HUMANS 🤗

In any case, “...HATRED is too heavy a BURDEN to bear.” Martin Luther King Jr.

On BALANCE, the LOVE and RESPECT that I received FAR outweighed the HATRED (essentially borne out of FEAR). #GodsChildrenALL

In the course of 2 years I did over 50 EPISODES of Urdu Wala Chashma and met countless PEOPLE - it was ALL EDUCATIVE and EXHILARATING.

My VIEWS on some topics have EVOLVED over time but I stand behind the basic SPIRIT of each episode of UWC.

There is also hopefully a somewhat better GRIP on the LANGUAGE in the latter episodes. I welcome CANDID FEEDBACK.

You can access almost all the episodes of URDU WALA CHASHMA here: 
https://www.youtube.com/playlist…

There is also my page on Facebook. Search for NUPUR SHARMA OFFICIAL - a portal of my WORK and CONCERNS.

THE WIRE ka TAH E DIL se shukria - you gave me a PLATFORM and PURPOSE, I felt that I COUNTED as a CITIZEN even if in a MODEST way.

I am PROUD to be associated with a COURAGEOUS organisation such as this.

For some months I may be relatively DORMANT on FACEBOOK or even GO OFF it at times - please don’t take it amiss. #ZindagiGulzarHai 🌻

Apna khaas khayaal rakhiyega. See you later InshaAllah.

Warmly, 
 Nupur


https://www.facebook.com/nupur.sharma.39794/posts/10156574322126302


~विजय राजबली माथुर ©

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Saturday, August 10, 2019

आतंकवाद बढ्ने की संभावना ------ ए एस दुलत ( रा के पूर्व प्रमुख )




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फारूख अब्दुल्ला साहब की बेटी और दामाद ( सचिन पायलट )  
सत्तारूढ़ सरकार द्वारा फारूख अब्दुल्ला साहब के परिवार पर भी कश्मीर के विकास की बाधा होने का आरोप लगाया गया है जबकि वहाँ की जनता में उनकी लोकप्रियता आज भी कायम है। सरकार के गलत कदम कश्मीर को अशांत कर सकते हैं जैसा कि, पूर्व रा प्रमुख ए एस दुलत साहब आशंका व्यक्त कर रहे हैं। 
  ~विजय राजबली माथुर ©