Monday, September 13, 2010

कनागत:जियत मात -पिता से दंगम दंगा

जियत पिता से दंगम दंगा, मरे पिता पहुचाये गंगा
जियत पिता की न पूछी बात,मरे पिता को खीर और भात
जियत पिता को घूंसे लात,मरे पिता को श्राद्ध करात
जियत पिता को डंडा लठिया,मरे पिता को तोसक तकिया
जियत पिता को कछु न मान,मरत पिता की पिंडा दान
यह एक महान कवि की कपोल कल्पना नहीं है .आप अपने चारों और नज़र घुमाते ही ऐसे ज्वलंत उदहारण देख सकते हैं.यहाँ पिता से आशय माता-पिता,गुरुजन,सास ससुर सब से है.आज परिवार में माता-पिता व् समाज में गुरु जनों को को वह सम्मान प्राप्त नहीं है,जिस के वे वाजिब हकदार होते हैं.व्यक्ति को संसार में जन्म देने वाले तो माता -पिता होते हैं तो समाज में रहने लायक बनाने वाला विद्यालय का शिक्षक होता है.इसीलिए विद्या-समपन्न व्यक्ति को द्विज कहा जाता था.द्विज अथार्त जिसका दूसरा जन्म हुआ हो.दूसरा जन्म विद्यालय का गुरु ही देता था,अतः माता पिता,सास-ससुर व् गुरु जनों के प्रति श्रद्धा भक्ति रखना व् उन्हें तृप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक कर्त्तव्य मन जाता था.यही श्रद्धा व् तृप्ति की भावना ही श्राद्ध और तर्पण कहलाती थी.परन्तु आज व्यक्ति अपने माता -पिता की उनके जीवन कल में पूर्ण अवहेलना करता है उन्हें कष्ट देने व् दुःख पहुचाने में अपनी श्रेष्ठता समझता है,उनके मनोभावों को समझने की अपेक्षा उनकी उपेक्षा ही करता है,लेकिन जब यही माता पिता अपना भौतिक शरीर छोड़ कर अगले जन्म के लिए चले जाते हैं तो दुनिया के नाम पर ढोंग दिखावा करते हुए प्रतिवर्ष उनके नाम पर श्राद्ध व् तर्पण करते हैं;जैसा कि कवी ने दर्शाया है.वस्तुतः श्राद्ध पक्ष में किया गया दान पुण्य अपने लिए तो हो सकता है परन्तु उसका कोई लाभ उस व्यक्ति के मृत माता पिता की आत्मा को नहीं मिल सकता क्यों कि कहीं न कहीं उनका जन्म हो चुका होगा या मोक्ष मिल गया होगा.
लेकिन आप देखेंगे कि २३ सितम्बर से२०१० से ०७ अक्तूबर २०१० तक श्राद्ध और तर्पण के नाम पर खूब ढोंग और पाखंड चलेगा.अपने जीवित माता पिता की जम कर उपेक्षा करने वाले निकम्मे कपूत इस दौरान उन्हीं माता पिता के मरणोपरांत उनके नाम पर दान पुण्य कर के समाज को अपनी पितृ भक्ति का प्रमाण प्रस्तुत करेंगे.ऐसे लोग समाज को तो धोखा दे सकते हैं परन्तु भगवन को धोखा देने में कामयाब नहीं हो सकते,क्यों कि-
जिस दिल में ईश्वर भक्ति है-वह पाप कमाना क्या जाने?माँ बाप कि सेवा करते है,उनके दुखों को हरते है-वह मथुरा,काशी,हरिद्वार वृन्दावन जाना क्या जाने?
अपने माता पिता कि परिक्रमा करने वाले श्री गणेश देवताओं में सर्वप्रथम पूजनीय हैं.गणेश पूजन यही प्रेरणा देता है कि प्रत्येक व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक अपने माता पिता कि सेवा करे जिससे वे तृप्त हो सकें,यही सच्चा श्राद्ध व् तर्पण है.

2 comments:

विजय राज बली माथुर said...

फेसबुक ग्रुप 'BURBAK MANDALI' में प्राप्त टिप्पणी---
Kalra Karnail: GURUVANI MEIN LIKHA HAI KI(jiwat pitra na poojey koi ,mue shradh krawe)ARTHAT JIWIT MAA-BAAP KO KOI NHIN POOJTA AUR MARNE KE BAAD DIKHAWE KE LIYE POORI HALWA BNA KAR LOGON KO KHILATA H,SAB LOG PAKHND KE PEECHHEY LGE HAIN.

विजय राज बली माथुर said...

फेसबुक ग्रुप 'जागो भारत वासी' में प्राप्त टिप्पणी---
Ashok Kumar: मै आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ। आज माता पिता की सेवा हो या गुरुजनों का सम्मान किन्ही का नहीं होता बेटा अपने पत्नी और बच्चो तक सीमित है तो छात्र अपने कैरिअर तक ही गुरूजी को पहचानते हैं। मुझे लगता है ये बाजार का असर है कि जरूरत के हिसाब से कोई किसी को सम्मान करते है जरूरत ख़त्म इज्जत देना भी ख़त्म।