Sunday, September 26, 2010

प्रलय की भविष्यवाणी झूठी है-यह दुनिया अनूठी है--(अंतिम भाग)

(पिछली पोस्ट से आगे....)

प्रकृति में जितने भी जीव हैं उनमे मनुष्य ही केवल मनन करने के कारण श्रेष्ठ है,शेष जीव ज्ञान और विवेक द्वारा अपने उपार्जित कर्मफल को अच्छे या बुरे में बदल सकता है.कर्म तीन प्रकार के होते हैं-सद्कर्म का फल अच्छा,दुष्कर्म का फल बुरा होता है.परन्तु सब से महत्वपूर्ण अ-कर्म होता है  जिसका अक्सर लोग ख्याल ही नहीं करते हैं.अ-कर्म वह कर्म है जो किया जाना चाहिए था किन्तु किया नहीं गया.अक्सर लोगों को कहते सुना जाता है कि हमने कभी किसी का बुरा नहीं किया फिर हमारे साथ बुरा क्यों होता है.ऐसे लोग कहते हैं कि या तो भगवान है ही नहीं या भगवान के घर अंधेर है.वस्तुतः भगवान के यहाँ अंधेर नहीं नीर क्षीर विवेक है परन्तु पहले भगवान को समझें तो सही कि यह क्या है--किसी चाहर दिवारी में सुरक्षित काटी तराशी मूर्ती या  नाडी के बंधन में बंधने वाला नहीं है अतः उसका जन्म या अवतार भी नहीं होता.भगवान तो घट घट वासी,कण कण वासी है उसे किसी एक क्षेत्र या स्थान में बाँधा नहीं जा सकता.भगवान क्या है उसे समझना बहुत ही सरल है--अथार्त भूमि,-अथार्त गगन,व्-अथार्त वायु, I -अथार्त अनल (अग्नि),और -अथार्त-नीर यानि जल,प्रकृति के इन पांच तत्वों का समन्वय ही भगवान है जो सर्वत्र पाए जाते हैं.इन्हीं के द्वारा जीवों की उत्पत्ति,पालन और संहार होता है तभी तो GOD अथार्त Generator,Operator ,Destroyer  इन प्राकृतिक तत्वों को  किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसलिए ये खुदा हैं.

जब भगवान,गौड और खुदा एक ही हैं तो झगड़ा किस बात का?परन्तु झगड़ा है नासमझी का,मानव द्वारा मनन न करने का और इस प्रकार मनुष्यता से नीचे गिरने का.इस संसार में कर्म का फल कैसे मिलता है,कब मिलता है सब कुछ एक निश्चित प्रक्रिया के तहत ही होता है जिसे समझना बहुत सरल है किन्तु निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा जटिल बना दिया गया है.हम जितने भी सद्कर्म,दुष्कर्म या अकरम करते है उनका प्रतिफल उसी अनुपात में मिलना तय है,परन्तु जीवन काल में जितना फल भोग उसके अतिरिक्त कुछ शेष भी बच जाता है.यही शेष अगले जनम में प्रारब्ध(भाग्य या किस्मत) के रूप में प्राप्त होता है.अब मनुष्य अपने मनन द्वारा बुरे को अच्छे में बदलने हेतु एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा समाधान कर सकता है.यदि समाधान वैज्ञानिक विधि से किया जाए तो सुफल परन्तु यदि ढोंग-पाखंड विधि से किया जाये तो प्रतिकूल फल मिलता है.

प्रारब्ध को समझने हेतु जन्म समय के ग्रह-नक्षत्रों से गणना करते हैं और उसी के अनुरूप समाधान प्रस्तुत करते हैं.अधिकाँश लोग इस वैज्ञानिक नहीं चमत्कार का लबादा ओड़ कर भोली जनता को उलटे उस्तरे से मूढ़ते हैं.गाँठ के पूरे किन्तु अक्ल के अधूरे लोग तो खुशी खुशी मूढ़ते हैं लेकिन अभावग्रस्त  पीढित लोगों को भी भयाक्रांत करके जबरन मूढा जाता है जो कि ज्योतिष के नियमों के विपरीत है.ज्योतिष में २+२=४ ही होंगे किन्तु जब पौने चार या सवा चार बता कर लोगों को गुमराह किया जाए तो वह ज्योतिष नहीं ठगी का उदहारण बन जाता है .ज्योतिष जीवन को सही दिशा में चलाने के संकेत देता है.बस आवश्यकता है सही गणना करने की और समय को साफ़ साफ़ समझने और समझाने की.जिस प्रकार धूप या वर्षा को हम रोक तो नहीं सकते परन्तु उसके प्रकोप से बचने हेतु छाता और बरसाती का प्रयोग कर लेते हैं उसी प्रकार जीवन में प्रारब्ध के अनुसार आने वाले संकटों का पूर्वानुमान लगाकर उनसे बचाव का प्रबंध किया जा सकता है और यही ज्योतिष विज्ञान का मूल आधार है.कुछ लोग अपने निजी स्वार्थों के कारण इस ज्योतिष का व्यापारीकरण करके इसके वैज्ञानिक आधार को क्षति पहुंचा देते हैं उन से बचने और बचाने की आवश्यकता है.मनुष्य अपने ग्रह-नक्षत्रों द्वारा नियंत्रित पर्यावरण की उपज है.

पर्यावरण को शुद्ध रखना और ग्रह नक्षत्रों का शमन करना ज्योतिष विज्ञान सिखाता है.हम ज्योतिष के वैज्ञानिक नियमों का पालन कर के अनूठी दुनिया  का अधिक से अधिक लुत्फ़ उठा सकते हैं.आवश्यकता है सच को सच स्वीकार करने की और अपनी इस धरती को तीन लोक से न्यारी बनाने की. 

Typist -यशवन्त

1 comment:

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

विजय जी नमस्‍कार,

अच्‍छा लगा आपको पढ़कर... धरती को न्‍यारी बनाने के इस काम में ब्‍लॉग की सहायता से आपने अच्‍छा कदम उठाया है। उम्‍मीद है लेखों का काफिला ऐसे ही जारी रहेगा।