Thursday, September 16, 2010

ब्रह्मवर्चसी जायताम आराष्ट्रे

यजुर्वेद के अध्याय २२ के मन्त्र संख्या २२ ''ॐ आ ब्राह्मन........वीरो जयताम......योगक्षेमों न कल्पताम'' का स्वामी भवानी दयाल जी द्वारा हिंदी काव्यानुवाद का अवलोकन करें-
ब्राह्मन!स्वराष्ट्र में हों द्विज ब्रह्म तेजधारी
क्षत्रिय महारथी हों,अरिदल विनाश कारी
होवें दुधारू गौवें ,वृष अश्व आशु वाही
आधार राष्ट्र की हों नारी सुभग सदा ही
बलवान सभ्य योद्धा,यजमान पुत्र होवें
इच्छानुसार वर्षें,पर्जन्य ताप धोवें
फल फूल से लदीं हों,औषध अमोघ सारी
हो योगक्षेम्कारी,स्वाधीनता हमारी.
युगदृष्टा मूलशंकर तिवारी जो महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती के नाम से जाने जाते है,मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण मौलिक या मूल ज्ञान के पक्षधर रहे उन्होंने प्रत्येक गृहस्थ के पालन हेतु जिन वेद मन्त्रों का संकलन किया है उन में इस मन्त्र का राष्ट्रीय चेतना के रूप में विशेष महत्त्व है.वेद सृष्टि के आदि काल में पिछली सृष्टि की मोक्ष प्राप्त आत्माओं के इस सृष्टि के वैदिक ज्ञान प्रदाता ऋषियों के मुख से आम जन के समक्ष आये.सुन कर याद किये जाने के कारण इन्हें श्रुति और स्मृति भी कहा जाता है.महाभारत काल के बाद जब वैदिक ज्ञान क्षीण होने लगा तो समाज में विकृति आने लगी और अब से लगभग १३ सौ वर्ष पूर्व हम गुलामी के भंवर जाल फंसते गए.उस समय के शासकों को खुश करने के लिए और इनाम में धन व् रुतबा पाने के लिए हमारे विद्वानों ने कुरआन की तर्ज़ पर पुराण रच लिए तथा अपनी संस्कृति व् ज्ञान को नष्ट कर दिया.राष्ट्रवादी महापुरुषों मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम व् योगी राज श्री कृष्ण को अवतार घोषित कर के उनके कृत्यों को अलौकिक बना दिया अथार्त पूज्य जबकि अनुकरणीय बनाया जाना चाहिए था तभी हमारी राष्ट्रीयता की अस्मिता की रक्षा हो सकती थी.गुरु नानक,कबीर आदि संतों ने जनता को जगाने की भरपूर कोशिश की किन्तु ''पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं''का सन्देश देने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी के ग्रन्थों को संस्कृति के रखवालों की नगरी काशी में जला डाला गया और उन्हें अवधी की शरण लेनी पड़ी.
जनता पार्टी के शासन में हिमाचल यूनिवर्सिटी के उप कुलपति रहे डाक्टर गणपति चन्द्र गुप्त ने १९६८ में छपे ''साप्ताहिक हिन्दुस्तान'' के अपने लेख में लिखा था की देश में क्षेत्रीय राष्ट्रवाद तीव्र है.उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया की राजस्थान में ''म्हारो देस'' तथा पंजाब में ''साड्डा देस पंजाब मारा''के गीत गाये जाते हैं.उन्होंने कहा की बंकिम बाबु के वन्दे मातरम में भी -''सुजलाम,सुफलाम,मलयज शीतलाम'' में ''बंग'' की कल्पना है भारत की नहीं.
साम्राज्यवादियों ने भारत को प्रायदीप (सब कंटीनेंट)इसीलिए कहा की वे इसे बहु राष्ट्र मानते हैं.पहले पाकिस्तान फिर बांगला देश राष्ट्र बने.काश्मीर में अलगाववादी संघर्ष चलता रहता है.मिजोरम और नागालैंड में भी ऐसा हो चुका है.सिर्फ जनता ही सम्पूर्ण भारत को एक राष्ट्र मानती है.बड़े विद्वान समय -समय पर क्षेत्रीय राष्ट्रवाद को हवा देते रहते हैं जो की देश हित की बात नहीं है.अब तो चिदम्बरम भी हिंदी बोलने लगे हैं और करूणानिधि भी अब हिंदी विरोधी नहीं हैं.हिन्दी सम्पूर्ण भारत को एक राष्ट्र के रूप में मानने वाली भाषा है कोई क्षेत्रीय भाषा नहीं है.क्षेत्रीय भाषाएँ तो ब्रज,अवधी,भोजपुरी,मैथिलि आदि हैं और उन का हिंदी से कोई विरोध नहीं है.मन्ना डे और ए.आर.रहमान बांगला और तमिल भाषी होते हुए भी हिंदी के अच्छे गायक हैं.लता मंगेशकर और आशा भोंसले मराठी होते हुए भी हिंदी भाषियों में लोकप्रिय हैं. हिंदी संविधान के अनुसार तो राजभाषा के साथ राष्ट्र भाषा है ही जनता उसे केवल राष्ट्र भाषा मानती है,राज भाषा तो अभी तक बनी ही नहीं.अफ़सोस है आज हिंदी के बड़े-बड़े विद्वान् राष्ट्रीयता शब्द को यूरोप के देन बताते हैं.जब हमारे यहाँ वेदों का जय घोष हो रहा था यूरोप वासी नंगे रहते व् पेड़ों पर निवास किया करते थे.हमारे हिंदी के विद्वान् आज उसी यूरोप के एनसाईंक्लोपीडिया और विकिपीडिया को ब्रह्म वाक्य मान कर भारत को राष्ट्र के रूप में अपूर्ण मानते हैं. वस्तुतः जब हम कहते हैं-''ॐ नमः शिवाय च'' तो संत श्याम जी पराशर के अनुसार उसका अर्थ होता है--''the salutation to that lord the benifactor of all ''.उन के अनुसार भारत के उत्तर में बर्फीला हिमालय शिव के मस्तक का अर्ध चन्द्र है और सर से निकलती गंगा मानसरोवर (तिब्बत)से इसके उदगम का प्रतीक है जब की ''शिव''अथार्त हमारा भारत राष्ट्र है.राम चरित मानस में तुलसी दास ने राम से कहलाया है-''जो सिव द्रोही सो मम द्रोही'' अथार्त भारत से द्वेष रखने वाला राम भक्त नहीं हो सकता.इसी प्रकार राम को मानने वाले को भारत भक्ति अथार्त भारतीय राष्ट्रवाद पर शक नहीं करना चाहिए और विदेशों का मुहं नहीं ताकना चाहिए.


6 comments:

हमारीवाणी.कॉम said...

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arvind said...

bahut acchha laga hindi anuvad padhkar....aabhaar.

ZEAL said...

बहुत सुन्दर लेख। नयी जानकारियों से युक्त , ऊर्जा प्रदान करते हुए इस लेख के लिए आपको नमन।

mukta said...

school colleges mein bhi hindi second lang. hi bankar reh gayi hai jabki chetriya bhasha toh bachche ghar se bhi sekh sakte hain.

Akshita (Pakhi) said...

कित्ती अच्छी जानकारियां मिली...अच्छा लगा यहाँ आकर.
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नन्हीं 'पाखी की दुनिया' में भी आयें.

Surendra Singh Bhamboo said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति है। आप इसी तरह अपना ज्ञान लोगों में बांटते चलिए