Tuesday, September 29, 2026

लोकतंत्र के लिए हम सबको मिलकर आगे आना होगा ====== अंशू नेथानी / लोकतन्त्र की हत्या पर विदेशी मीडिया ------ राजेश सिंह





जिन संवैधानिक प्रावधानों के तहत चुनाव आयोग को काम करना था और भारतीय संसदीय प्रणाली के कार्यान्वित होने के लिए लोगों की सहभागिता को मतदान के माध्यम से सुनिश्चित करना था उसे करने में चुनाव आयोग पूरी तरह असफल रहा। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सारे संवैधानिक प्रावधानों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों  की हत्या की । और जब यह बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची तो सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक प्रावधानों के तहत चुनाव आयोग के खिलाफ कोई कार्रवाई की नहीं। भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कोई कदम उठाए नही। उल्टे अधिकारों को कुचले जाने का कोई संज्ञान तक नहीं लिया उन अधिकारों को कुचले जाने का उन्होंने समर्थन किया । कहा कोई बात नहीं अगली बार मत दे देना। जबकि मतदान नागरिकों का मौलिक अधिकार है। तो यहां जितना दोषी चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार है उतना ही दोषी सुप्रीम कोर्ट और इस मामले की सुनवाई करने वाले मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत भी व अन्य जो है वह भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।
हमारे लॉ आफ जूरिप्रूडेंस में क्या ऐसा प्रावधान है कि किसी अपराधी के द्वारा अपराध किए जाने के बाद अपराध को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया गया हो और उन अपराधों के प्रमाणित होने पर उनकी सजा के प्रावधानों में क्या कोई परिवर्तन आ सकता है और यदि अपराध संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों के द्वारा संवैधानिक अधिकारों व नियमों के विरुद्ध किया गया हो तो इस पर कार्रवाई और सजा का निर्धारण किस तरह से होगा।
लोकतंत्र के लिए हम सबको मिलकर आगे आना होगा। प्रेस क्लब में लोकतंत्र पर विचार विमर्श के दौरान अपनी बात कहते हुए।
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भारत के लोकतन्त्र की हत्या पर विदेशी मीडिया रिपोर्टिंग 
दुनिया के बड़े मीडिया हाउस पहली बार चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं! द न्यूयॉर्क टाइम्स, ब्लूमबर्ग, अल जज़ीरा, बीबीसी और अन्य विदेशी मीडिया ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेदों, SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया और करोड़ों वोटर के नाम हटाने की रिपोर्टिंग की है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि आयोग के दो आयुक्तों ने कई बार आपत्ति दर्ज की, फिर भी फैसले एकतरफा लिए गए। अल जज़ीरा ने "शेकन फेथ" कहकर भारतीय चुनावों पर अभूतपूर्व संदेह जताया।  ब्लूमबर्ग ने SIR विवाद और विरोध प्रदर्शनों को कवर किया।  हिंदुस्तान के इतिहास में शायद पहली बार दुनिया के बड़े मीडिया हाउस चुनाव आयोग पर अंगुली उठा रहे हैं। दुनिया की नजरों में भारत का चुनावी तंत्र शक के दायरे में आ गया है। मोदी सरकार और चुनाव आयोग पर विदेशी रिपोर्टिंग से अंतरराष्ट्रीय बदनामी का सवाल खड़ा हो गया है।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने 23 सितंबर 2026 को अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारतीय चुनाव आयोग ने ऐसे उपाय तेजी से लागू किए जो करोड़ों लोगों को वोट देने से वंचित कर सकते हैं, भले ही तीन में से दो आयुक्तों ने इन कदमों की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए हों। अखबार ने इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें खुलासा हुआ कि दो चुनाव आयुक्तों ने आधिकारिक तौर पर 14 बार आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इन सभी को नजरअंदाज करके एकतरफा फैसले लेते रहे। न्यूयॉर्क टाइम्स ने सवाल उठाया कि क्या यह प्रक्रिया वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष है, या फिर मोदी सरकार के राजनीतिक फायदे के लिए डिजाइन की गई है। आयोग के बयान पर भी अखबार ने संदेह जताया, जिसमें कहा गया कि यह "मतभेद" नहीं, बल्कि "सामान्य चर्चा" थी, लेकिन बयान किसी वरिष्ठ अधिकारी ने नहीं, बल्कि एक जूनियर अधिकारी ने साइन किया था। यह पहला मौका है जब अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित अखबार ने सीधे तौर पर भारतीय चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं।
अल जज़ीरा ने 26 सितंबर 2026 को "शेकन फेथ" शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें लिखा गया कि भारतीय लोकतंत्र को नए खुलासों से गहरा झटका लगा है।  रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया के तहत 13 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं, जिनमें ज्यादातर गरीब, अल्पसंख्यक और वंचित तबके के लोग शामिल हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने अल जज़ीरा से कहा, "आज वह भरोसा हिल गया है। यह देश के लिए बहुत चौंकाने वाला है।" रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने में 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज कराई, जिसे संधू ने "अनधिकृत और गैरकानूनी" करार दिया। अल जज़ीरा ने सवाल उठाया कि क्या मोदी की BJP के फायदे के लिए एक खास तबके को वंचित किया जा रहा है, खासकर मुसलमानों को, जो BJP के हिंदूत्ववादी अभियान का मुख्य निशाना रहे हैं। यह रिपोर्ट सिर्फ भारत के भीतर ही नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम जगत में गूंज रही है।
ब्लूमबर्ग ने 23 से 26 सितंबर के बीच कई रिपोर्टें प्रकाशित कीं, जिनमें चुनाव आयोग के खिलाफ बढ़ते विरोध, कांग्रेस के प्रदर्शनों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के अल्टीमेटम को कवर किया गया। ब्लूमबर्ग ने लिखा कि SIR प्रक्रिया इतनी विवादास्पद हो गई है कि युवा आंदोलन CJP ने CEC ज्ञानेश कुमार को 48 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया है, या तो इस्तीफा दो, या सड़कों पर उतरेंगे। कांग्रेस ने बड़े पैमाने पर देश भर में प्रदर्शन किए, जिनमें जम्मू-कश्मीर, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। ब्लूमबर्ग ने यह भी रिपोर्ट किया कि चुनाव आयोग ने विरोध के बाद कुछ प्रक्रियाओं में ढील देने की घोषणा की है, लेकिन यह कदम बहुत देर से और बहुत कम है। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और बाजारों के लिए यह संकेत है कि भारत की राजनीतिक स्थिरता और संस्थागत विश्वसनीयता खतरे में है।
यह सिर्फ एक संस्थागत विवाद नहीं, बल्कि मोदी, अमित शाह और RSS की सुनियोजित साजिश है। 2014 से मोदी सरकार ने चुनाव आयोग को धीरे-धीरे अपने कब्जे में लिया।  2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया बदल दी गई, जिससे सरकार को सीधे तौर पर CEC चुनने का अधिकार मिल गया।  ज्ञानेश कुमार जैसा व्यक्ति, जो Article 370 के खत्म होने और राम मंदिर ट्रस्ट जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार के लिए काम कर चुका है, को CEC बनाया गया।  SIR प्रक्रिया के तहत 13 करोड़ नाम हटाना कोई संयोग नहीं, बल्कि भारतीय लोकतन्त्र को ध्वस्त करने के लिए एक सुनियोजित रणनीति है, गरीबों, प्रवासियों, अल्पसंख्यकों और उन तबकों को वंचित करना, जो BJP के पक्ष में वोट नहीं करते। अमित शाह, जो "मशीनमैन" के नाम से जाने जाते हैं, ने चुनावी रणनीति का मास्टरमाइंड रहकर यह सुनिश्चित किया कि मतदाता सूची में ऐसे बदलाव हों जो BJP को फायदा पहुंचाएं। RSS, जो हिंदूत्ववादी विचारधारा का प्रचार करती है, ने दशकों से "एक देश, एक वोट" का नारा लगाया है, लेकिन हकीकत में उनका मकसद है, एक देश, एक वोट, लेकिन सिर्फ उनका वोट चले। मुसलमानों, अति पिछड़े, दलितों, आदिवासियों और गरीबों को वंचित करके BJP अपनी सत्ता बरकरार रखना चाहती है। यह लोकतंत्र नहीं बल्कि तानाशाही है। और दुनिया अब यह देख रही है।
दशकों तक भारत ने अपने आप को "विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र" कहकर पेश किया। लेकिन अब यह मुखौटा गिर चुका है। न्यूयॉर्क टाइम्स, अल जज़ीरा, ब्लूमबर्ग, बीबीसी जैसे प्रतिष्ठित मीडिया हाउस जब एक स्वर में सवाल उठाएं, तो यह सिर्फ राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीयता का संकट है। अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व में भारत की छवि खराब हो रही है। निवेशक सोचने लगे हैं कि क्या भारत में संस्थाएं स्वतंत्र हैं या सरकार के इशारे पर चलती हैं। मानवाधिकार संगठन चुनावी धांधली और वंचितीकरण की जांच की मांग कर रहे हैं। मोदी सरकार विदेशी मीडिया की रिपोर्टिंग को "झूठा और पक्षपातपूर्ण" कहकर खारिज कर रही है, लेकिन हकीकत यह है कि आंतरिक दस्तावेज और आयुक्तों की आपत्तियां सामने आ चुकी हैं। जब दो आयुक्त खुद कहें कि प्रक्रिया "गैरकानूनी" है, तो सरकार का बचाव कैसे माना जाए? अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब सवाल पूछ रहा है, क्या 2029 के चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे? क्या करोड़ों भारतीयों का वोट छीना जाएगा? और अगर हां, तो क्या दुनिया इसे स्वीकार करेगी?
निष्कर्ष: अब या तो सुधार होगा, या क्रांति, दुनिया की नजरें भारत पर टिकी हैं। अगर मोदी-शाह-RSS गठजोड़ ने चुनाव आयोग को सुधारने, SIR प्रक्रिया को रोकने और वंचित मतदाताओं को बहाल करने का कदम नहीं उठाया, तो नतीजा भयानक होगा। CJP का अल्टीमेटम सिर्फ शुरुआत है।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और विपक्षी दल 30 सितंबर को दिल्ली में बड़ी बैठक करने वाले हैं। अगर संसदीय रास्ते काम नहीं आए, तो भारत की जनता सड़कों पर उतरेगी। मोदी के पास दो रास्ते हैं, या तो वे लोकतंत्र को बचाएं, या लोकतंत्र उन्हें उखाड़ फेंकेगा। विदेशी मीडिया की रिपोर्टिंग ने दुनिया को आंखें खोल दी हैं। अब बहाने बिल्कुल नहीं चलेंगे। भारत की जनता नें मन बना लिया है कि या तो सुधार होगा, या क्रांति। तीसरा रास्ता बंद है।
Rajesh R. Singh 
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  ~विजय राजबली माथुर ©


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