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Thursday, May 4, 2017

जब तक कारपोरेट के द्वारा सरकारों का नियंत्रण होता रहेगा ------ विजय राजबली माथुर

  
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सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर नौकरी से हटाये जाने के संदेह  के आधार पर आत्महत्या हो अथवा कारपोरेट कंपनी के स्टोर्स से नौकरी से हटाये जाने के बाद  इसका मूल कारण व्यापारियों / उद्योगपतियों / कारपोरेट के पक्ष में श्रम कानूनों  को श्रमिक विरोधी बनाया जाना है। 
1973-74 में मेरठ कालेज, मेरठ के ला के अध्यापक और वरिष्ठ वकील सिन्हा साहब ने ( जो कि, इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा साहब के रिश्तेदार थे ) अपने छात्रों  को जो  विशेष बातें बताईं थीं उनमें से दो बातों का ज़िक्र मेरे सहकर्मी गुप्ता जी ने मुझसे  इसलिए किया था क्योंकि, मैं राजनीति में दिलचस्पी रखता था। 
(1 ) रायबरेली से 1971 का  इन्दिरा जी का चुनाव रद्द हो सकता है। 
(2 ) सन 1980 के बाद से श्रम न्यायालयों में श्रमिकों के विरुद्ध फैसले होने लगेंगे। 
उनके दोनों आंकलन सही सिद्ध हुये थे। 
*जगमोहन लाल सिन्हा साहब जुड़ीशियल सर्विसेज द्वारा जुड़ीशियल मेजिस्ट्रेट नियुक्त हुये थे। सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार को एक याचिका द्वारा चुनौती दी गई तब तत्कालीन मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी जी सिन्हा साहब को अपने साथ सुप्रीम कोर्ट लेकर गईं थीं । सिन्हा साहब ने अन्य तर्कों के अलावा यह भी दलील दी कि,  उनको अपनी नौकरी जाने की चिंता नहीं है, चिंता है तो यह कि,उनके जैसे अन्य मेजिस्ट्रेट्स द्वारा अब तक किए गए फैसलों का क्या होगा ? क्या वे सभी फैसले भी रद्द होंगे और उनसे जिनको जो हानि या लाभ हो चुका है उसका क्या होगा ? जस्टिस सिन्हा साहब के तर्कों से सुचेता कृपलानी जी जीत गईं थीं। वह निष्पक्ष और न झुकने वाले जज थे। 1969-70 में  वह मेरठ में ज़िला व सत्र न्यायाधीश थे उनसे मिलने तब के सी एम अपने जानने वाले की सिफ़ारिश लेकर पहुंचे थे। उन्होने अर्दली के जरिये पुछवाया कि, चौधरी चरण सिंह या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह हैं ? चौधरी साहब ने जवाब भिजवाया कि, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह जज साहब से मिलना चाहते हैं। सिन्हा साहब ने सी एम साहब से मिलने से इंकार कर दिया और बाद में फैसला भी उनके जानने वाले के खिलाफ गया। केस की इसी कमजोरी के चलते सी एम साहब जज साहब को प्रभावित करना चाहते थे जो वह नहीं हुये। इसीलिए 1975 में पी एम इन्दिरा जी के विरुद्ध भी फैसला लेने में उनको दिक्कत नहीं हुयी थी। 
* 1973- 74 में जिस करवट विश्व की आर्थिक गतिविधियां चल रही थीं उनके आधार पर ही प्रोफेसर / वकील सिन्हा साहब ने लेबर कोर्ट संबन्धित आंकलन अपने छात्रों को दिया था। जज सिन्हा साहब के फैसले के बाद देश में एमर्जेंसी लगा दी गई थी और  लोकसभा का कार्यकाल एक वर्ष बढ़ा कर छह वर्ष कर दिया गया था परंतु 1977 के मध्यवधी चुनावों में इन्दिरा जी को व्यक्तिगत व राजनीतिक शिकस्त का सामना करना पड़ा था। आर एस एस के तीन नेता  1 ) सुब्रमनियम स्वामी  पी एम मोरारजी के साथ, 2)ए बी बाजपेयी  गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह के साथ , 3) नानाजी  देशमुख जनता पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर के साथ हो गए थे । इन तीनों ने संघ के निर्देश पर उन तीनों को टकरा दिया था और मोरारजी के बदले चौधरी साहब इन्दिरा जी के समर्थन से पी एम बना दिये गए थे। चौधरी साहब द्वारा इन्दिरा जी की चिकमङलूर की सदस्यता छीन कर उनको  जब एक माह के लिए ' तिहाड़ ' भिजवाया गया  था उसी दौरान एक और समांनांतर आर एस एस  ( राजनारायन संजय संघ ) का गठन आर एस एस की प्रेरणा से हुआ था। देवरस - इन्दिरा गुप्त समझौते के अंतर्गत 1980 के मध्यावधी  चुनावों  में आर एस एस ने अपना वोट इन्दिरा कांग्रेस को दिलवा कर इन्दिरा जी को पुनः पी एम बनवा दिया था। इंदिराजी की यह सरकार केवल हिन्दू वोटों से बनी पहली सरकार थी। उनकी हत्या के बाद 1985 के चुनावों में राजीव गांधी की सरकार आर एस एस  व हिन्दू वोटों के समर्थन से बनी दूसरी सरकार थी तब भाजपा को आर एस एस की रणनीति के तहत सिर्फ दो सीटें मिली थीं । इस सरकार के कार्यकाल में  पहले पहल केंद्र सरकार को कारपोरेट कल्चर पर चलाया गया जो आगे भी जारी रहा है। 
* जब 2014 में  2011 के कारपोरेट भ्रष्टाचार संरक्षण आंदोलन के भरोसे आर एस एस व हिन्दू वोटों के जरिये  तीसरी सरकार मोदी साहब के नेतृत्व में बनी तब तक संसद व बाहर विपक्ष नितांत क्षीण हो चुका था। आर एस एस जो मूलतः बनियों ( व्यापारियों ) व ब्राह्मणों ( व्यापारियों के हितैषी ) का संगठन माना जाता रहा है आज खुल कर सरकार को कारपोरेट हितों में चलवा रहा है। विभिन्न कारपोरेट स्टोर्स व कंपनियों में कर्मचारियों  की निरंतर छटनी की जा रही है और इसके लिए कर्मचारियों से ही स्तीफ़ा लिखवाया जाता है। कर्मचारियों को जान बूझ कर ऐसे ऐसे टार्गेट दिये जाते हैं जो पूरे हो ही नहीं सकते हैं। नतीजा अपनी नौकरी गंवा कर कर्मचारियों को चुकाना पड़ता है , उनके परिवार का पालन कैसे हो ? इसी वजह से आत्महत्या की दुखद घटनाएँ  सामने आ रही हैं। 

जब तक कारपोरेट के द्वारा सरकारों का नियंत्रण होता रहेगा कर्मचारियों, श्रमिकों और साधारण जनता के साथ साथ छोटे कारोबारियों का जीवन उनके परिवारों सहित नारकीय ही बना रहेगा। 

~विजय राजबली माथुर ©