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Saturday, July 20, 2013

विनाश के खण्डहर पर पुनर्निर्माण की पताका ---विजय राजबली माथुर

 11 मार्च 2013 को प्रकाशित समाचार---






 उपरोक्त समाचारों एवं चेतावनियों से स्पष्ट है कि आज मानवता पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। ज्यों-ज्यों विज्ञान प्रगति करता जा रहा है मनुष्य का नैतिक पतन होता जा रहा है। जहां संचार माध्यमों ने दुनिया  में एक-दूसरे को नजदीक लाने का काम किया हैं वहीं इनके द्वारा वैमनस्य फैलाने का कार्य भी तीव्र गति से चलाया जा रहा है। आज मानवता के कल्याण के प्रयास करने वालों को उत्पीड़ित किया जा रहा है उन पर अत्याचार ढाये जा रहे हैं। मानवता का शोषण करने वाले दूसरे मनुष्यों को अपने से हेय समझने वाले लोगों का महिमा मंडन ज़ोर-शोर से किया जाता है उनको जिम्मेदार लोगों का प्रश्रय भी सुगमता से मिल जाता है। दुखद स्थिति तो तब बनती है जब 'मानव को मानव के शोषण से मुक्त'कराने वाले दलों में भी ऐसे शोषक लोग आसानी से नीति-निर्धारक तत्व बन कर अपने ही कार्यकर्ताओं का शोषण करने लगते हैं। जब गोर्बाचोव रूस मे 70 वर्षों से स्थापित 'साम्यवाद' की चूलें कुछ ही वर्षों में हिला कर उसे वहाँ से समाप्त करने का प्रबंध कर सकते हैं तब भारत में उनके जैसे तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रदीप घोटालू ,पी टी सीतापुरिया जैसे लोग अगर आज कामयाब हैं तो आश्चर्य की कोई बात नहीं है। ऐसे लोग शोषण-उत्पीड़न विहीन समाज-व्यवस्था की स्थापना के घोर शत्रु हैं और कालांतर से साम्राज्यवादी/सांप्रदायिक शक्तियों के ही हाथ मजबूत कर रहे हैं। जिस प्रकार सोवियत रूस में भ्रष्ट पार्टी पदाधिकारी आज वहाँ उद्योगपति बन बैठे हैं उसी प्रकार भारत में ऐसे पदाधिकारी समानान्तर रूप से अपना निजी व्यवसाय मजबूत किए हुये हैं जिसके संरक्षण हेतु इनको पद-पोस्ट की सुरक्षा की महती आवश्यकता है। लेकिन जो निस्वार्थ सेवा भाव से श्रम दान करना चाहते हैं ऐसे लोगों को यदि शोषक पदाधिकारी मार्ग से न हटाएँ तो उनकी स्वार्थ लिप्सा की पूर्ती संभव ही नहीं है। परंतु मार्ग से हटाने का मार्ग यदि उस सेवक या उसके परिवारीजनों के जीवन से खिलवाड़ करना हो और फिर भी उसे मान-मर्यादा मिलती जाये तब यह प्रश्न-चिन्ह लगता है कि क्या वास्तव में हम जैसा कहते हैं वैसा ही करना चाहते भी हैं या नहीं?और यही कारण है कि जन पक्षधरता की बात करने वाले दल जनता का समर्थन नहीं प्राप्त कर पाते । एक ओर ये खुद को धर्म विरोधी घोषित करते हैं दूसरी ओर ढोंग-पाखंड-आडंबर को बढ़ाने वाले लोगों को धार्मिकता का प्रमाण पत्र देते हैं। 

वस्तुतः धर्म=जो शरीर व समाज को धरण करने हेतु आवश्यक हो जैसे: 
सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रह्मचर्य। 

भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)
चूंकि प्रकृति के ये पांचों तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी इंसान ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही 'खुदा'हैं। 
एवं इन तत्वों का कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) है अतः ये ही GOD-गाड हैं। 
लेकिन शोषकों,उतपीडकों,लुटेरों (व्यापारी और सत्ताधीश)तथा उनके दलालों (पुरोहित व पुजारी लोगों)ने विश्व में धर्म,भगवान,खुदा,गाड की भ्रामक व्याख्याएँ फैला रखी हैं जिनसे उनकी शोषण और मुनाफे की व्यवस्था बदस्तूर चलती रहे। यही व्यवस्था यदा-कदा,यत्र-तत्र-सर्वत्र त्रासदियाँ व तबाहियाँ उत्पन्न करती है जैसा कि अभी नवीनतम रूप से उत्तराखंड मे हुई। 

धर्म का पालन करने के लिए कहीं भागने की आवश्यकता नहीं है। 'हवन'-यज्ञ के माध्यम से दी गई आहुतियाँ मंत्र शक्ति-ध्वनि (viobretion)द्वारा 'भगवान'/'खुदा'/गाड तत्वों तक सुगमता से पहुँच जाती हैं क्योंकि अग्नि में डाले गए पदार्थ ,पदार्थ विज्ञान (Material Science) के अनुसार परमाणु (Atoms) में विभाजित हो जाते हैं और वायु द्वारा गंतव्य तक पहुंचा दिये जाते हैं। 

तीर्थाटन के नाम पर मुनाफे की व्यापारिक गतिविधियां ही चलाई जाती हैं उनका उद्देश्य धन बटोरना है ,जन-कल्याण नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि,ऐसे ढोंगियों का तो पर्दाफाश किया ही जाये उनके समर्थक जो जन-कल्याण की चाहना वाले दलों में घुस कर बाहर की प्रतिगामी शक्तियों को मजबूत कर रहें हैं उनको भी पहचान कर अलग-थलग किया जाये तभी मानवता की रक्षा हो सकेगी। 

मैं जानता हूँ कि मेरे लेखन से शोषक -सांप्रदायिक/साम्राज्यवादी वर्ग को तो ऐतराज है ही साम्यवादी दलों में बैठे उनके  पी टी सीतापुरिया सरीखे समर्थकों को भी घोर आपत्ति है और दोनों वर्ग मिल कर मेरे व मेरे परिवार के विरुद्ध घृणित अभियान चलाते रहते हैं। मुझे कोई संशय नहीं है कि मेरे सुझावों पर अमल करने की कोई पहल की जाएगी। निश्चय ही हम लोग ऐसी अनेकों त्रासदियों का सामना अवश्यंभावी रूप से करेंगे। यदि कभी सर्व-विनाश हो गया और मेरे विचार किसी जन-कल्याणकारी /परोपकारी के हाथों में सुरक्शित बच गए तो वह उनका प्रयोग 'विनाश के खण्डहर पर पुनर्निर्माण की पताका फहराने' हेतु कर सकेगा। 


इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Wednesday, July 27, 2011

'जन-हित में'

यों तो पहले से ही 'क्रान्तिस्वर' एवं 'विद्रोही स्व-स्वर में' लिखने का उद्देश्य "सर्वजन-हिताय ,स्वान्तः सुखाय" रहा है और 'कलम और कुदाल' पर पूर्व प्रकाशित लेख या सार्वजनिक हित के अन्य लोगों के विचार देता रहा हूँ फिर एक अलग ब्लॉग के माध्यम की क्या जरूरत आ पडी ,यह कौतूहल सब को हो सकता है. वस्तुतः काफी समय से मेरा विचार जन-हितकारी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित ऋषि-मुनियों द्वारा रचित स्तुतियाँ एवं प्रार्थनाएं ब्लॉग पर सार्वजानिक करने का था. विलम्ब इसलिए हुआ कि,'गर्व से ...',आर.एस.एस.ब्लागर्स ने अभद्र रूप से मेरे लेखों की आलोचना की तो इस सुविधा का लाभ वे भी क्यों उठायें?लेकिन व्यक्तिगत रूप से तीन ऐसे  ब्लागर्स भी  स्वास्थ्य संबंधी स्तुति हासिल कर चुके  हैं और उसके बाद उन्होंने एहसान फरामोशी की है. यदि मैं इन स्तुतियों को सार्वजनिक रूप से दे देता हूँ तो अन्य अनेक ब्लागर्स लाभ उठा सकते हैं और अपने परिचितों को भी लाभ दिला सकते हैं. कबीर दास जी का कथन है-

काल्ह करे सो आज कर ,आज करे सो अब.        
पल में परलय  होयगी ,बहुरी करेगो  कब?

जब एक बार विचार बना लिया तो उस पर अमल करना ही उचित है. हालांकि हमारे बहन-बहनोई इस बात के खिलाफ हैं कि मैं सब के भले की सोचता हूँ. उनके अनुसार मेरे भले की कौन सोचता है?उनकी ही बात पर ध्यान दें तो सबसे पहले वे लोग खुद  ही उस श्रेणी में आते हैं.उन्हें तमाम स्तुतियाँ प्रिंट करा कर दे दीं हैं और पहले भी लिख कर दे चुके हैं.भांजियों (उनकी बेटियों को भी स्तुतियाँ दी हैं), हमारे तमाम विरोधियों और हमसे  शत्रुवत व्यवहार  करने वालों के प्रति उनका न केवल झुकाव है बल्कि घनिष्ठ एवं मधुर सम्बन्ध भी हैं.हमारी संस्कृति में -'सर्वे भवन्तु सुखिनः ' का अधिक महत्व रहा है.हमारे नाना जी और पिताजी ने तमाम लोगों को बगैर किसी लाभ की उम्मीद किये मदद की है,हमारे बाबाजी भी गाँव में लोगों को अपने पास से बायोकेमिक दवाएं देते थे.पूनम के माता जी -पिताजी भी लोगों की निस्वार्थ मदद करते रहे हैं अतः उन्हें भी कोई ऐतराज नहीं है और यशवन्त तो फाईनल फिनिशिंग करता ही है ,उसे भी मदद करने का शौक है. उसी परम्परा को जारी रखते हुए इस नये ब्लॉग के माध्यम से आज से मैं स्तुतियों को सार्वजानिक करना शुरू कर रहा हूँ. 'इदं न मम' ये मेरा नहीं है मैं तो अर्जित ज्ञान को कंजूस का धन नहीं बनाना चाहता इसलिए सब के भले के लिए उजागर कर रहा हूँ .जो न लेना चाहें लाभ न लें यह उनके विवेक और इच्छा पर है. 

परन्तु जो इनसे लाभ उठाना चाहें वे कुछ बातों को ध्यान रखें कि यह कोई पूजा-पाठ नहीं है. किसी आडम्बर या वितंड की जरूरत नहीं है. धुप-दीप,जल,किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है,केवल औषद्धि के रूप में इसका प्रयोग करें.यह भी ध्यान रखें वाचन के समय मुख पश्चिम की और रहे तथा अपने खुद के और धरती के बीच कोई इन्सुलेशन अवश्य   रहे.अर्थात लकड़ी के पट्टे,ऊनी वस्त्र या पोलीथिन शीट पर बैठें.ऐसा न करके नंगे पाँव या सीधी धरती पर बैठने से ऊर्जा-एनर्जी 'अर्थ'हो जायेगी और कोई लाभ नहीं प्राप्त होगा उससे अच्छा है कि करें ही नहीं.

किसी के भी बहकावे में किसी भी दशा में स्तुति पाठ के समय कोई भी मूर्ती या चित्र कभी भी न रखें ,यदि आपने ढोंग से जोड़ा और परिणाम शून्य रहा तो स्तुति या प्रस्तुतकर्ता का कोई दोष न होगा आप खुद ब खुद जिम्मेदार होंगें..

आज प्रथम दिवस 'गणेश -स्तुति 'से ही शुरुआत कर रहे हैं.'गणेश'=ज्ञान और मोक्ष का नियंता 'गणेश' है .कहावत है कि चिता मरनेके बाद जलाती है और  चिंता जीते जी जलाती है.तो आज 'चिंता और रोग' के निवारणार्थ यह 'गणेश' स्तुति प्रस्तुत है।
(http://janhitme-vijai-mathur.blogspot.com/2011/07/blog-post.html)