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Tuesday, September 29, 2026

लोकतंत्र के लिए हम सबको मिलकर आगे आना होगा ====== अंशू नेथानी / लोकतन्त्र की हत्या पर विदेशी मीडिया ------ राजेश सिंह





जिन संवैधानिक प्रावधानों के तहत चुनाव आयोग को काम करना था और भारतीय संसदीय प्रणाली के कार्यान्वित होने के लिए लोगों की सहभागिता को मतदान के माध्यम से सुनिश्चित करना था उसे करने में चुनाव आयोग पूरी तरह असफल रहा। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सारे संवैधानिक प्रावधानों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों  की हत्या की । और जब यह बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची तो सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक प्रावधानों के तहत चुनाव आयोग के खिलाफ कोई कार्रवाई की नहीं। भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कोई कदम उठाए नही। उल्टे अधिकारों को कुचले जाने का कोई संज्ञान तक नहीं लिया उन अधिकारों को कुचले जाने का उन्होंने समर्थन किया । कहा कोई बात नहीं अगली बार मत दे देना। जबकि मतदान नागरिकों का मौलिक अधिकार है। तो यहां जितना दोषी चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार है उतना ही दोषी सुप्रीम कोर्ट और इस मामले की सुनवाई करने वाले मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत भी व अन्य जो है वह भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।
हमारे लॉ आफ जूरिप्रूडेंस में क्या ऐसा प्रावधान है कि किसी अपराधी के द्वारा अपराध किए जाने के बाद अपराध को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया गया हो और उन अपराधों के प्रमाणित होने पर उनकी सजा के प्रावधानों में क्या कोई परिवर्तन आ सकता है और यदि अपराध संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों के द्वारा संवैधानिक अधिकारों व नियमों के विरुद्ध किया गया हो तो इस पर कार्रवाई और सजा का निर्धारण किस तरह से होगा।
लोकतंत्र के लिए हम सबको मिलकर आगे आना होगा। प्रेस क्लब में लोकतंत्र पर विचार विमर्श के दौरान अपनी बात कहते हुए।
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भारत के लोकतन्त्र की हत्या पर विदेशी मीडिया रिपोर्टिंग 
दुनिया के बड़े मीडिया हाउस पहली बार चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं! द न्यूयॉर्क टाइम्स, ब्लूमबर्ग, अल जज़ीरा, बीबीसी और अन्य विदेशी मीडिया ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेदों, SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया और करोड़ों वोटर के नाम हटाने की रिपोर्टिंग की है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि आयोग के दो आयुक्तों ने कई बार आपत्ति दर्ज की, फिर भी फैसले एकतरफा लिए गए। अल जज़ीरा ने "शेकन फेथ" कहकर भारतीय चुनावों पर अभूतपूर्व संदेह जताया।  ब्लूमबर्ग ने SIR विवाद और विरोध प्रदर्शनों को कवर किया।  हिंदुस्तान के इतिहास में शायद पहली बार दुनिया के बड़े मीडिया हाउस चुनाव आयोग पर अंगुली उठा रहे हैं। दुनिया की नजरों में भारत का चुनावी तंत्र शक के दायरे में आ गया है। मोदी सरकार और चुनाव आयोग पर विदेशी रिपोर्टिंग से अंतरराष्ट्रीय बदनामी का सवाल खड़ा हो गया है।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने 23 सितंबर 2026 को अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारतीय चुनाव आयोग ने ऐसे उपाय तेजी से लागू किए जो करोड़ों लोगों को वोट देने से वंचित कर सकते हैं, भले ही तीन में से दो आयुक्तों ने इन कदमों की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए हों। अखबार ने इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें खुलासा हुआ कि दो चुनाव आयुक्तों ने आधिकारिक तौर पर 14 बार आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इन सभी को नजरअंदाज करके एकतरफा फैसले लेते रहे। न्यूयॉर्क टाइम्स ने सवाल उठाया कि क्या यह प्रक्रिया वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष है, या फिर मोदी सरकार के राजनीतिक फायदे के लिए डिजाइन की गई है। आयोग के बयान पर भी अखबार ने संदेह जताया, जिसमें कहा गया कि यह "मतभेद" नहीं, बल्कि "सामान्य चर्चा" थी, लेकिन बयान किसी वरिष्ठ अधिकारी ने नहीं, बल्कि एक जूनियर अधिकारी ने साइन किया था। यह पहला मौका है जब अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित अखबार ने सीधे तौर पर भारतीय चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं।
अल जज़ीरा ने 26 सितंबर 2026 को "शेकन फेथ" शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें लिखा गया कि भारतीय लोकतंत्र को नए खुलासों से गहरा झटका लगा है।  रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया के तहत 13 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं, जिनमें ज्यादातर गरीब, अल्पसंख्यक और वंचित तबके के लोग शामिल हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने अल जज़ीरा से कहा, "आज वह भरोसा हिल गया है। यह देश के लिए बहुत चौंकाने वाला है।" रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने में 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज कराई, जिसे संधू ने "अनधिकृत और गैरकानूनी" करार दिया। अल जज़ीरा ने सवाल उठाया कि क्या मोदी की BJP के फायदे के लिए एक खास तबके को वंचित किया जा रहा है, खासकर मुसलमानों को, जो BJP के हिंदूत्ववादी अभियान का मुख्य निशाना रहे हैं। यह रिपोर्ट सिर्फ भारत के भीतर ही नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम जगत में गूंज रही है।
ब्लूमबर्ग ने 23 से 26 सितंबर के बीच कई रिपोर्टें प्रकाशित कीं, जिनमें चुनाव आयोग के खिलाफ बढ़ते विरोध, कांग्रेस के प्रदर्शनों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के अल्टीमेटम को कवर किया गया। ब्लूमबर्ग ने लिखा कि SIR प्रक्रिया इतनी विवादास्पद हो गई है कि युवा आंदोलन CJP ने CEC ज्ञानेश कुमार को 48 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया है, या तो इस्तीफा दो, या सड़कों पर उतरेंगे। कांग्रेस ने बड़े पैमाने पर देश भर में प्रदर्शन किए, जिनमें जम्मू-कश्मीर, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। ब्लूमबर्ग ने यह भी रिपोर्ट किया कि चुनाव आयोग ने विरोध के बाद कुछ प्रक्रियाओं में ढील देने की घोषणा की है, लेकिन यह कदम बहुत देर से और बहुत कम है। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और बाजारों के लिए यह संकेत है कि भारत की राजनीतिक स्थिरता और संस्थागत विश्वसनीयता खतरे में है।
यह सिर्फ एक संस्थागत विवाद नहीं, बल्कि मोदी, अमित शाह और RSS की सुनियोजित साजिश है। 2014 से मोदी सरकार ने चुनाव आयोग को धीरे-धीरे अपने कब्जे में लिया।  2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया बदल दी गई, जिससे सरकार को सीधे तौर पर CEC चुनने का अधिकार मिल गया।  ज्ञानेश कुमार जैसा व्यक्ति, जो Article 370 के खत्म होने और राम मंदिर ट्रस्ट जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार के लिए काम कर चुका है, को CEC बनाया गया।  SIR प्रक्रिया के तहत 13 करोड़ नाम हटाना कोई संयोग नहीं, बल्कि भारतीय लोकतन्त्र को ध्वस्त करने के लिए एक सुनियोजित रणनीति है, गरीबों, प्रवासियों, अल्पसंख्यकों और उन तबकों को वंचित करना, जो BJP के पक्ष में वोट नहीं करते। अमित शाह, जो "मशीनमैन" के नाम से जाने जाते हैं, ने चुनावी रणनीति का मास्टरमाइंड रहकर यह सुनिश्चित किया कि मतदाता सूची में ऐसे बदलाव हों जो BJP को फायदा पहुंचाएं। RSS, जो हिंदूत्ववादी विचारधारा का प्रचार करती है, ने दशकों से "एक देश, एक वोट" का नारा लगाया है, लेकिन हकीकत में उनका मकसद है, एक देश, एक वोट, लेकिन सिर्फ उनका वोट चले। मुसलमानों, अति पिछड़े, दलितों, आदिवासियों और गरीबों को वंचित करके BJP अपनी सत्ता बरकरार रखना चाहती है। यह लोकतंत्र नहीं बल्कि तानाशाही है। और दुनिया अब यह देख रही है।
दशकों तक भारत ने अपने आप को "विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र" कहकर पेश किया। लेकिन अब यह मुखौटा गिर चुका है। न्यूयॉर्क टाइम्स, अल जज़ीरा, ब्लूमबर्ग, बीबीसी जैसे प्रतिष्ठित मीडिया हाउस जब एक स्वर में सवाल उठाएं, तो यह सिर्फ राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीयता का संकट है। अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व में भारत की छवि खराब हो रही है। निवेशक सोचने लगे हैं कि क्या भारत में संस्थाएं स्वतंत्र हैं या सरकार के इशारे पर चलती हैं। मानवाधिकार संगठन चुनावी धांधली और वंचितीकरण की जांच की मांग कर रहे हैं। मोदी सरकार विदेशी मीडिया की रिपोर्टिंग को "झूठा और पक्षपातपूर्ण" कहकर खारिज कर रही है, लेकिन हकीकत यह है कि आंतरिक दस्तावेज और आयुक्तों की आपत्तियां सामने आ चुकी हैं। जब दो आयुक्त खुद कहें कि प्रक्रिया "गैरकानूनी" है, तो सरकार का बचाव कैसे माना जाए? अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब सवाल पूछ रहा है, क्या 2029 के चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे? क्या करोड़ों भारतीयों का वोट छीना जाएगा? और अगर हां, तो क्या दुनिया इसे स्वीकार करेगी?
निष्कर्ष: अब या तो सुधार होगा, या क्रांति, दुनिया की नजरें भारत पर टिकी हैं। अगर मोदी-शाह-RSS गठजोड़ ने चुनाव आयोग को सुधारने, SIR प्रक्रिया को रोकने और वंचित मतदाताओं को बहाल करने का कदम नहीं उठाया, तो नतीजा भयानक होगा। CJP का अल्टीमेटम सिर्फ शुरुआत है।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और विपक्षी दल 30 सितंबर को दिल्ली में बड़ी बैठक करने वाले हैं। अगर संसदीय रास्ते काम नहीं आए, तो भारत की जनता सड़कों पर उतरेगी। मोदी के पास दो रास्ते हैं, या तो वे लोकतंत्र को बचाएं, या लोकतंत्र उन्हें उखाड़ फेंकेगा। विदेशी मीडिया की रिपोर्टिंग ने दुनिया को आंखें खोल दी हैं। अब बहाने बिल्कुल नहीं चलेंगे। भारत की जनता नें मन बना लिया है कि या तो सुधार होगा, या क्रांति। तीसरा रास्ता बंद है।
Rajesh R. Singh 
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  ~विजय राजबली माथुर ©


Monday, July 20, 2026

अरुणा आसफ अली ------ Old is Gold Films's Post





भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे नाम हैं जिन्हें इतिहास की किताबों में कुछ पन्नों तक सीमित कर दिया गया, जबकि उनका योगदान किसी पूरे अध्याय से कम नहीं था। जब भी "भारत छोड़ो आंदोलन" की बात होती है, हमारे मन में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य बड़े नेताओं की छवि उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 9 अगस्त 1942 की वह सुबह, जब लगभग पूरा कांग्रेस नेतृत्व अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका था, तब एक महिला ने हजारों लोगों के सामने तिरंगा फहराकर पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दे दी थी। यही महिला थीं अरुणा आसफ अली।

उन्हें "भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका", "1942 की रानी" और बाद में "Grand Old Lady of the Independence Movement" कहा गया। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान केवल तिरंगा फहराने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महात्मा गांधी के सम्मान के बावजूद, जब उन्हें लगा कि उनका रास्ता अलग है, तब गांधी जी की सलाह तक मानने से इनकार कर दिया। आखिर ऐसी कौन-सी महिला थी, जिसने देश की आजादी के लिए अपना घर, संपत्ति, पहचान और वर्षों का जीवन दांव पर लगा दिया? यही कहानी है उस असाधारण व्यक्तित्व की, जिसे आज भी भारत पूरी तरह जान नहीं पाया है।

एक ऐसे परिवार में जन्म, जहाँ विचारों की आजादी विरासत थी

16 जुलाई 1909 को ब्रिटिश भारत के कालका (आज का हरियाणा) में जन्मी अरुणा गांगुली एक शिक्षित बंगाली ब्राह्मण परिवार से थीं। उनका परिवार ब्रह्म समाज से जुड़ा हुआ था, जो उस दौर में सामाजिक सुधार और आधुनिक विचारों का समर्थन करता था। उनके पिता उपेंद्रनाथ गांगुली एक व्यवसायी थे, जबकि माँ अंबालिका देवी प्रसिद्ध समाज सुधारक त्रैलोक्यनाथ सान्याल की पुत्री थीं।

उनका परिवार साहित्य, शिक्षा और समाज सुधार से गहराई से जुड़ा था। उनके चाचा धीरेंद्रनाथ गांगुली भारतीय सिनेमा के शुरुआती फिल्म निर्देशकों में गिने जाते हैं, जबकि दूसरे चाचा नागेंद्रनाथ गांगुली ने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बेटी मीरा देवी से विवाह किया था। उनकी बहन पूर्णिमा बनर्जी आगे चलकर भारत की संविधान सभा की सदस्य बनीं।

ऐसे वातावरण में पली-बढ़ी अरुणा ने बचपन से ही स्वतंत्र सोच, शिक्षा और सामाजिक न्याय के मूल्य सीखे। उन्होंने लाहौर के Sacred Heart Convent और नैनीताल के All Saints' College में शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे कोलकाता के गोखले मेमोरियल स्कूल में अध्यापिका बनीं। लेकिन शायद नियति ने उनके लिए केवल अध्यापन नहीं, बल्कि इतिहास लिखना तय कर रखा था।

एक ऐसा विवाह जिसने पूरे समाज को हिला दिया

इलाहाबाद में उनकी मुलाकात कांग्रेस नेता और प्रसिद्ध वकील आसफ अली से हुई। आसफ अली वही व्यक्ति थे जिन्होंने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का अदालत में बचाव किया था। वे अरुणा से लगभग 23 वर्ष बड़े थे और मुस्लिम थे।

1928 में दोनों ने विवाह करने का निर्णय लिया।

आज के समय में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन उस दौर में यह फैसला सामाजिक विद्रोह से कम नहीं था। परिवार ने इस रिश्ते का तीखा विरोध किया। अरुणा के संरक्षक चाचा ने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि उनके लिए अरुणा मर चुकी हैं और उन्होंने उनका श्राद्ध तक कर दिया।

लेकिन अरुणा ने समाज के डर के बजाय अपने विवेक की आवाज सुनी। यही साहस आगे चलकर उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य के सामने भी अडिग खड़ा करने वाला था।

जब जेल उनके संघर्ष की पहली पाठशाला बनी

विवाह के बाद अरुणा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गईं और नमक सत्याग्रह सहित अनेक आंदोलनों में सक्रिय भाग लेने लगीं।

1931 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। गांधी-इरविन समझौते के बाद अधिकांश राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने अरुणा को छोड़ने से इनकार कर दिया। जेल की अन्य महिला कैदियों ने भी जेल छोड़ने से मना कर दिया और कहा कि यदि अरुणा नहीं जाएँगी तो वे भी नहीं जाएँगी।

आखिरकार जनता के दबाव और महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा किया गया।

लेकिन उनका संघर्ष यहीं नहीं रुका।

1932 में उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया और तिहाड़ जेल भेजा गया। वहाँ राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनके आंदोलन के बाद जेल प्रशासन को कई सुधार करने पड़े। हालांकि इसकी सजा उन्हें एकांत कारावास के रूप में मिली और बाद में अंबाला जेल भेज दिया गया।

9 अगस्त 1942... जब पूरा नेतृत्व जेल में था, तब एक महिला ने इतिहास बदल दिया

8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस ने "भारत छोड़ो आंदोलन" का प्रस्ताव पारित किया। महात्मा गांधी ने "करो या मरो" का आह्वान किया।

ब्रिटिश सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए गांधी, नेहरू, पटेल और लगभग पूरे कांग्रेस नेतृत्व को रातोंरात गिरफ्तार कर लिया।

अंग्रेजों को लगा कि नेतृत्व खत्म होते ही आंदोलन भी खत्म हो जाएगा।

लेकिन वे अरुणा आसफ अली को भूल चुके थे।

9 अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान (आज का अगस्त क्रांति मैदान) में हजारों लोगों की भीड़ जमा थी। पुलिस चारों ओर तैनात थी। गिरफ्तारी और गोलियों का खतरा था।

ऐसे समय में अरुणा आसफ अली मंच पर पहुँचीं।

उन्होंने निर्भीक होकर तिरंगा फहराया।

यह केवल एक झंडा फहराने की घटना नहीं थी। यह संदेश था कि आंदोलन नेताओं की गिरफ्तारी से नहीं रुकेगा।

उस क्षण की तस्वीर पूरे भारत में प्रतिरोध का प्रतीक बन गई। अंग्रेजों के लिए यह खुली चुनौती थी और भारतीय युवाओं के लिए यह क्रांति का नया बिगुल।

जब अंग्रेजों ने उनकी हर चीज छीन ली, लेकिन उनका हौसला नहीं

तिरंगा फहराने के बाद अंग्रेजों ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।

उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई।

घर और सामान नीलाम कर दिए गए।

उनके सिर पर इनाम घोषित किया गया।

लेकिन अरुणा गिरफ्तार नहीं हुईं।

वे भूमिगत हो गईं और लगभग चार वर्षों तक अंग्रेजों को चकमा देती रहीं। इसी दौरान उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर कांग्रेस की गुप्त पत्रिका "इंकलाब" का संपादन किया।

उनके लेख युवाओं को केवल भाषण सुनने के लिए नहीं, बल्कि क्रांति में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करते थे।

उन्होंने लिखा कि अब समय केवल बहस का नहीं, बल्कि कार्रवाई का है।

जब उन्होंने महात्मा गांधी की सलाह भी नहीं मानी

1946 में अरुणा लगातार भूमिगत जीवन जीते-जीते बेहद कमजोर हो चुकी थीं।

महात्मा गांधी ने उन्हें एक भावनात्मक पत्र लिखा।

उन्होंने कहा कि तुम्हारा साहस और बलिदान प्रेरणादायक है। अब सामने आकर आत्मसमर्पण कर दो। तुम्हारी गिरफ्तारी पर रखा गया इनाम हरिजन कल्याण में लगाया जा सकता है।

यह पत्र आज भी भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित पत्रों में गिना जाता है।

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अरुणा ने गांधी जी की इस सलाह को स्वीकार नहीं किया।

उन्होंने निर्णय लिया कि जब तक अंग्रेज स्वयं उनके खिलाफ जारी वारंट वापस नहीं लेते, तब तक वे सामने नहीं आएँगी।

बाद में जब इनाम और वारंट दोनों वापस लिए गए, तभी उन्होंने सार्वजनिक जीवन में वापसी की।

यह घटना दिखाती है कि वे गांधी जी का सम्मान करती थीं, लेकिन अंधानुकरण नहीं।

आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुआ उनका संघर्ष

1947 में देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन अरुणा का मिशन समाप्त नहीं हुआ।

उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक न्याय की लड़ाई अभी बाकी है।

1948 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी का दामन थाम लिया।

कुछ वर्षों बाद वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से भी जुड़ीं, हालांकि 1956 में सोवियत संघ की राजनीतिक घटनाओं के बाद उन्होंने उससे भी दूरी बना ली।

उन्होंने जीवनभर वामपंथी सामाजिक सोच, मजदूर अधिकार, महिलाओं की भागीदारी और सामाजिक समानता के मुद्दों पर काम जारी रखा।

दिल्ली की पहली महिला मेयर बनने तक का सफर

1958 में अरुणा आसफ अली दिल्ली की पहली महिला मेयर चुनी गईं।

उन्होंने केवल राजनीति नहीं की बल्कि दिल्ली के विकास, नागरिक सुविधाओं, शिक्षा और सामाजिक कल्याण पर विशेष ध्यान दिया।

उन्होंने "Patriot" नामक दैनिक समाचार पत्र और "Link" साप्ताहिक पत्रिका की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पत्रकारिता को उन्होंने सत्ता की प्रशंसा का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवाज माना।

महिलाओं, दलितों और समाज के वंचित वर्गों के लिए आजीवन संघर्ष

अरुणा आसफ अली का मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है।

वे दलितों, मजदूरों और गरीबों के अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाती रहीं।

उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर विशेष बल दिया।

दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने महिलाओं के लिए आरक्षण का खुलकर समर्थन नहीं किया। उनका विश्वास था कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ महिलाओं को कहीं अधिक मजबूत बनाएँगी।

उन्होंने अनियंत्रित औद्योगिकीकरण का भी विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि इससे पर्यावरण और समाज दोनों को नुकसान होगा।

सम्मान जिनसे बड़ी थी उनकी सादगी

अरुणा आसफ अली को जीवनभर अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।

उन्हें International Lenin Peace Prize, Jawaharlal Nehru Award for International Understanding, Padma Vibhushan और मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।

दिल्ली की एक प्रमुख सड़क अरुणा आसफ अली मार्ग उनके नाम पर है। उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया और दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल का नाम भी उनके नाम पर रखा गया।

लेकिन जिन लोगों ने उन्हें करीब से जाना, वे कहते हैं कि उन्हें पुरस्कारों से अधिक संतोष उस दिन मिला था, जब उन्होंने अंग्रेजों की आँखों में आँखें डालकर तिरंगा फहराया था।

क्यों आज भी अरुणा आसफ अली की कहानी अधूरी लगती है?

इतिहास में अक्सर वही चेहरे सबसे ज्यादा दिखाई देते हैं जो सत्ता के केंद्र में रहे। लेकिन कई बार असली परिवर्तन उन लोगों ने किया, जिन्होंने सबसे कठिन समय में नेतृत्व संभाला।

अरुणा आसफ अली उन्हीं लोगों में से एक थीं।



उन्होंने सामाजिक बंधनों को तोड़ा, अंतरधार्मिक विवाह किया, जेल की यातनाएँ झेलीं, भूख हड़ताल की, अंग्रेजों से वर्षों तक बचती रहीं, भूमिगत रहकर आंदोलन को जीवित रखा, गांधी जी से मतभेद होने पर भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और आजादी के बाद भी समाज के कमजोर वर्गों के लिए काम करती रहीं।

आज जब हम भारत छोड़ो आंदोलन को याद करते हैं, तो केवल 9 अगस्त 1942 का तिरंगा ही नहीं, बल्कि उस तिरंगे के पीछे खड़ी उस निर्भीक महिला को भी याद करना चाहिए जिसने साबित कर दिया था कि इतिहास केवल बड़े नेताओं से नहीं, बल्कि साहस से लिखा जाता है।

अरुणा आसफ अली का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा देशभक्त वही है जो परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाए।

OLDISGOLDFILMS ऐसी ही भूली-बिसरी ऐतिहासिक हस्तियों की अनसुनी कहानियों को आपके सामने लाता रहेगा, ताकि इतिहास केवल याद न रहे, बल्कि समझा भी जाए।


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  ~विजय राजबली माथुर ©