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Monday, July 20, 2026

अरुणा आसफ अली ------ Old is Gold Films's Post





भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे नाम हैं जिन्हें इतिहास की किताबों में कुछ पन्नों तक सीमित कर दिया गया, जबकि उनका योगदान किसी पूरे अध्याय से कम नहीं था। जब भी "भारत छोड़ो आंदोलन" की बात होती है, हमारे मन में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य बड़े नेताओं की छवि उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 9 अगस्त 1942 की वह सुबह, जब लगभग पूरा कांग्रेस नेतृत्व अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका था, तब एक महिला ने हजारों लोगों के सामने तिरंगा फहराकर पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दे दी थी। यही महिला थीं अरुणा आसफ अली।

उन्हें "भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका", "1942 की रानी" और बाद में "Grand Old Lady of the Independence Movement" कहा गया। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान केवल तिरंगा फहराने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महात्मा गांधी के सम्मान के बावजूद, जब उन्हें लगा कि उनका रास्ता अलग है, तब गांधी जी की सलाह तक मानने से इनकार कर दिया। आखिर ऐसी कौन-सी महिला थी, जिसने देश की आजादी के लिए अपना घर, संपत्ति, पहचान और वर्षों का जीवन दांव पर लगा दिया? यही कहानी है उस असाधारण व्यक्तित्व की, जिसे आज भी भारत पूरी तरह जान नहीं पाया है।

एक ऐसे परिवार में जन्म, जहाँ विचारों की आजादी विरासत थी

16 जुलाई 1909 को ब्रिटिश भारत के कालका (आज का हरियाणा) में जन्मी अरुणा गांगुली एक शिक्षित बंगाली ब्राह्मण परिवार से थीं। उनका परिवार ब्रह्म समाज से जुड़ा हुआ था, जो उस दौर में सामाजिक सुधार और आधुनिक विचारों का समर्थन करता था। उनके पिता उपेंद्रनाथ गांगुली एक व्यवसायी थे, जबकि माँ अंबालिका देवी प्रसिद्ध समाज सुधारक त्रैलोक्यनाथ सान्याल की पुत्री थीं।

उनका परिवार साहित्य, शिक्षा और समाज सुधार से गहराई से जुड़ा था। उनके चाचा धीरेंद्रनाथ गांगुली भारतीय सिनेमा के शुरुआती फिल्म निर्देशकों में गिने जाते हैं, जबकि दूसरे चाचा नागेंद्रनाथ गांगुली ने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बेटी मीरा देवी से विवाह किया था। उनकी बहन पूर्णिमा बनर्जी आगे चलकर भारत की संविधान सभा की सदस्य बनीं।

ऐसे वातावरण में पली-बढ़ी अरुणा ने बचपन से ही स्वतंत्र सोच, शिक्षा और सामाजिक न्याय के मूल्य सीखे। उन्होंने लाहौर के Sacred Heart Convent और नैनीताल के All Saints' College में शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे कोलकाता के गोखले मेमोरियल स्कूल में अध्यापिका बनीं। लेकिन शायद नियति ने उनके लिए केवल अध्यापन नहीं, बल्कि इतिहास लिखना तय कर रखा था।

एक ऐसा विवाह जिसने पूरे समाज को हिला दिया

इलाहाबाद में उनकी मुलाकात कांग्रेस नेता और प्रसिद्ध वकील आसफ अली से हुई। आसफ अली वही व्यक्ति थे जिन्होंने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का अदालत में बचाव किया था। वे अरुणा से लगभग 23 वर्ष बड़े थे और मुस्लिम थे।

1928 में दोनों ने विवाह करने का निर्णय लिया।

आज के समय में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन उस दौर में यह फैसला सामाजिक विद्रोह से कम नहीं था। परिवार ने इस रिश्ते का तीखा विरोध किया। अरुणा के संरक्षक चाचा ने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि उनके लिए अरुणा मर चुकी हैं और उन्होंने उनका श्राद्ध तक कर दिया।

लेकिन अरुणा ने समाज के डर के बजाय अपने विवेक की आवाज सुनी। यही साहस आगे चलकर उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य के सामने भी अडिग खड़ा करने वाला था।

जब जेल उनके संघर्ष की पहली पाठशाला बनी

विवाह के बाद अरुणा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गईं और नमक सत्याग्रह सहित अनेक आंदोलनों में सक्रिय भाग लेने लगीं।

1931 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। गांधी-इरविन समझौते के बाद अधिकांश राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने अरुणा को छोड़ने से इनकार कर दिया। जेल की अन्य महिला कैदियों ने भी जेल छोड़ने से मना कर दिया और कहा कि यदि अरुणा नहीं जाएँगी तो वे भी नहीं जाएँगी।

आखिरकार जनता के दबाव और महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा किया गया।

लेकिन उनका संघर्ष यहीं नहीं रुका।

1932 में उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया और तिहाड़ जेल भेजा गया। वहाँ राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनके आंदोलन के बाद जेल प्रशासन को कई सुधार करने पड़े। हालांकि इसकी सजा उन्हें एकांत कारावास के रूप में मिली और बाद में अंबाला जेल भेज दिया गया।

9 अगस्त 1942... जब पूरा नेतृत्व जेल में था, तब एक महिला ने इतिहास बदल दिया

8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस ने "भारत छोड़ो आंदोलन" का प्रस्ताव पारित किया। महात्मा गांधी ने "करो या मरो" का आह्वान किया।

ब्रिटिश सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए गांधी, नेहरू, पटेल और लगभग पूरे कांग्रेस नेतृत्व को रातोंरात गिरफ्तार कर लिया।

अंग्रेजों को लगा कि नेतृत्व खत्म होते ही आंदोलन भी खत्म हो जाएगा।

लेकिन वे अरुणा आसफ अली को भूल चुके थे।

9 अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान (आज का अगस्त क्रांति मैदान) में हजारों लोगों की भीड़ जमा थी। पुलिस चारों ओर तैनात थी। गिरफ्तारी और गोलियों का खतरा था।

ऐसे समय में अरुणा आसफ अली मंच पर पहुँचीं।

उन्होंने निर्भीक होकर तिरंगा फहराया।

यह केवल एक झंडा फहराने की घटना नहीं थी। यह संदेश था कि आंदोलन नेताओं की गिरफ्तारी से नहीं रुकेगा।

उस क्षण की तस्वीर पूरे भारत में प्रतिरोध का प्रतीक बन गई। अंग्रेजों के लिए यह खुली चुनौती थी और भारतीय युवाओं के लिए यह क्रांति का नया बिगुल।

जब अंग्रेजों ने उनकी हर चीज छीन ली, लेकिन उनका हौसला नहीं

तिरंगा फहराने के बाद अंग्रेजों ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।

उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई।

घर और सामान नीलाम कर दिए गए।

उनके सिर पर इनाम घोषित किया गया।

लेकिन अरुणा गिरफ्तार नहीं हुईं।

वे भूमिगत हो गईं और लगभग चार वर्षों तक अंग्रेजों को चकमा देती रहीं। इसी दौरान उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर कांग्रेस की गुप्त पत्रिका "इंकलाब" का संपादन किया।

उनके लेख युवाओं को केवल भाषण सुनने के लिए नहीं, बल्कि क्रांति में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करते थे।

उन्होंने लिखा कि अब समय केवल बहस का नहीं, बल्कि कार्रवाई का है।

जब उन्होंने महात्मा गांधी की सलाह भी नहीं मानी

1946 में अरुणा लगातार भूमिगत जीवन जीते-जीते बेहद कमजोर हो चुकी थीं।

महात्मा गांधी ने उन्हें एक भावनात्मक पत्र लिखा।

उन्होंने कहा कि तुम्हारा साहस और बलिदान प्रेरणादायक है। अब सामने आकर आत्मसमर्पण कर दो। तुम्हारी गिरफ्तारी पर रखा गया इनाम हरिजन कल्याण में लगाया जा सकता है।

यह पत्र आज भी भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित पत्रों में गिना जाता है।

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अरुणा ने गांधी जी की इस सलाह को स्वीकार नहीं किया।

उन्होंने निर्णय लिया कि जब तक अंग्रेज स्वयं उनके खिलाफ जारी वारंट वापस नहीं लेते, तब तक वे सामने नहीं आएँगी।

बाद में जब इनाम और वारंट दोनों वापस लिए गए, तभी उन्होंने सार्वजनिक जीवन में वापसी की।

यह घटना दिखाती है कि वे गांधी जी का सम्मान करती थीं, लेकिन अंधानुकरण नहीं।

आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुआ उनका संघर्ष

1947 में देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन अरुणा का मिशन समाप्त नहीं हुआ।

उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक न्याय की लड़ाई अभी बाकी है।

1948 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी का दामन थाम लिया।

कुछ वर्षों बाद वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से भी जुड़ीं, हालांकि 1956 में सोवियत संघ की राजनीतिक घटनाओं के बाद उन्होंने उससे भी दूरी बना ली।

उन्होंने जीवनभर वामपंथी सामाजिक सोच, मजदूर अधिकार, महिलाओं की भागीदारी और सामाजिक समानता के मुद्दों पर काम जारी रखा।

दिल्ली की पहली महिला मेयर बनने तक का सफर

1958 में अरुणा आसफ अली दिल्ली की पहली महिला मेयर चुनी गईं।

उन्होंने केवल राजनीति नहीं की बल्कि दिल्ली के विकास, नागरिक सुविधाओं, शिक्षा और सामाजिक कल्याण पर विशेष ध्यान दिया।

उन्होंने "Patriot" नामक दैनिक समाचार पत्र और "Link" साप्ताहिक पत्रिका की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पत्रकारिता को उन्होंने सत्ता की प्रशंसा का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवाज माना।

महिलाओं, दलितों और समाज के वंचित वर्गों के लिए आजीवन संघर्ष

अरुणा आसफ अली का मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है।

वे दलितों, मजदूरों और गरीबों के अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाती रहीं।

उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर विशेष बल दिया।

दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने महिलाओं के लिए आरक्षण का खुलकर समर्थन नहीं किया। उनका विश्वास था कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ महिलाओं को कहीं अधिक मजबूत बनाएँगी।

उन्होंने अनियंत्रित औद्योगिकीकरण का भी विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि इससे पर्यावरण और समाज दोनों को नुकसान होगा।

सम्मान जिनसे बड़ी थी उनकी सादगी

अरुणा आसफ अली को जीवनभर अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।

उन्हें International Lenin Peace Prize, Jawaharlal Nehru Award for International Understanding, Padma Vibhushan और मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।

दिल्ली की एक प्रमुख सड़क अरुणा आसफ अली मार्ग उनके नाम पर है। उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया और दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल का नाम भी उनके नाम पर रखा गया।

लेकिन जिन लोगों ने उन्हें करीब से जाना, वे कहते हैं कि उन्हें पुरस्कारों से अधिक संतोष उस दिन मिला था, जब उन्होंने अंग्रेजों की आँखों में आँखें डालकर तिरंगा फहराया था।

क्यों आज भी अरुणा आसफ अली की कहानी अधूरी लगती है?

इतिहास में अक्सर वही चेहरे सबसे ज्यादा दिखाई देते हैं जो सत्ता के केंद्र में रहे। लेकिन कई बार असली परिवर्तन उन लोगों ने किया, जिन्होंने सबसे कठिन समय में नेतृत्व संभाला।

अरुणा आसफ अली उन्हीं लोगों में से एक थीं।



उन्होंने सामाजिक बंधनों को तोड़ा, अंतरधार्मिक विवाह किया, जेल की यातनाएँ झेलीं, भूख हड़ताल की, अंग्रेजों से वर्षों तक बचती रहीं, भूमिगत रहकर आंदोलन को जीवित रखा, गांधी जी से मतभेद होने पर भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और आजादी के बाद भी समाज के कमजोर वर्गों के लिए काम करती रहीं।

आज जब हम भारत छोड़ो आंदोलन को याद करते हैं, तो केवल 9 अगस्त 1942 का तिरंगा ही नहीं, बल्कि उस तिरंगे के पीछे खड़ी उस निर्भीक महिला को भी याद करना चाहिए जिसने साबित कर दिया था कि इतिहास केवल बड़े नेताओं से नहीं, बल्कि साहस से लिखा जाता है।

अरुणा आसफ अली का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा देशभक्त वही है जो परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाए।

OLDISGOLDFILMS ऐसी ही भूली-बिसरी ऐतिहासिक हस्तियों की अनसुनी कहानियों को आपके सामने लाता रहेगा, ताकि इतिहास केवल याद न रहे, बल्कि समझा भी जाए।


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  ~विजय राजबली माथुर ©


Friday, October 16, 2015

यह सोच नेताजी जैसे महान क्रांतिकारी का बहुत बड़ा अपमान है --- राजीव शुक्ला,पूर्व सांसद व मंत्री

मैं यह बात कतई मानने को तैयार नहीं हूं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस बीसों साल भारत में या दुनिया में कहीं भी रूप बदलकर, छिपकर जीवन गुजारते रहे। यह बात और यह सोच अपने आप में नेताजी जैसे महान क्रांतिकारी का बहुत बड़ा अपमान है। एक बेखौफ, जुझारू और वीर पुरुष भला इस तरह छिपकर अपनी जिंदगी क्यों गुजारना चाहेगा? जो लोग इस तरह की दलील देते हैं, लगता है कि उन्हें न तो सुभाष चंद्र बोस के स्वभाव के बारे में ठीक से पता है और न ही वे उनके अदम्य साहस को ही अच्छी तरह से पहचानते हैं। 

मेरे लिहाज से नेताजी सुभाष चंद्र बोस का परिवार प्रधानमंत्री से मिलकर सिर्फ यह जानना चाहता है कि विमान हादसे में उनकी मृत्यु हुई थी या नहीं? यदि नहीं, तो फिर उसके बाद वह कहां थे? यह किसी भी परिवार के लिए लाजमी है कि वह अपने किसी पूर्वज के बारे में जानकारी मांगे। 

मुझे शिकायत सिर्फ उन लोगों से है, जो तरह-तरह के इंटरव्यू और बयान देकर यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि अमुक व्यक्ति दरअसल नेताजी थे, जो साधु बनकर रहे, फलां व्यक्ति नेताजी थे, जो ताशकंद मैन बनकर     रूस में रहे। कोई कहता है कि सुभाष बाबू  करीब 30 साल तक गुमनाम बनकर अयोध्या में रहे, तो कोई यह कहता है कि वह पंजाब में रहे; कोई कहता है कि वह कई बरस तक बिहार में थे, तो कोई कहता है कि वह जर्मनी में रहे। दावे तो ऐसे भी किए गए कि एक बार बाबा जयगुरुदेव के समर्थकों ने उन्हें कानपुर के फूलबाग मैदान में सुभाष चंद्र बोस घोषित कर उनके प्रकट होने का नाटक कराया और उसके बाद वहां मौजूद लाखों लोगों ने बाबा के उन समर्थकों से जमकर मारपीट की। 

आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक के सी सुदर्शन स्वयं इस बात पर हमेशा विश्वास करते रहे कि नेताजी नोएडा में रहते थे। और तो और, नेताजी के गृह प्रदेश की राजधानी कोलकाता में तो आज भी ऐसे तमाम बंगाली परिवार आपको मिल जाएंगे, जो यह मानते हैं कि 118 साल की उम्र में भी नेताजी जिंदा हैं, और कहीं पर छिपे हुए हैं, जिनको भारत सरकार जान-बूझकर नहीं खोज रही है। 

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर नेताजी देश की आजादी के बाद भी वेश बदलकर  छिपकर  क्यों रहेंगे? ऐसा मानने वालों में कुछ लोगों का तर्क यह है कि क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध में उन्होंने ब्रिटेन के नेतृत्व वाले एलाइड देशों का विरोध किया था, इसलिए वह  ब्रिटिश सरकार के कानून के अधीन युद्ध अपराधी घोषित थे और अगर वह सामने आ जाते, तो उन्हें ब्रिटिश सरकार गिरफ्तार कर सकती थी। इसी डर से वह वेश बदलकर, और छिपकर रहे। मगर यह तर्क अपने आप में बेहद हल्का और अपमानजनक है। गुलाम भारत में आजादी की लड़ाई लड़ते हुए जो व्यक्ति ब्रिटिश सरकार की जेल से नहीं डरा और  गांधी के सिद्धांतों से असहमत होते हुए अपना सैनिक संगठन बनाकर लड़ाई के लिए तैयार था, वह आजाद भारत में, जहां अंग्रेजों का कुछ भी नहीं रह गया था, भला उनकी जेल से क्यों डरेगा? ऐसे लोगों का एक और तर्क हो सकता है कि आजादी के बाद भी ब्रिटिश सरकार भारत सरकार पर दबाव डालकर उन्हें इंग्लैंड ले जाती और उन्हें जेल में डाल देती। 

ऐसे लोगों से पूछने लायक एक ही सवाल है कि आजाद भारत में किस सरकार की इतनी हिम्मत हो सकती थी कि वह नेताजी को ब्रिटिश सरकार को सौंप देती? फिर अगर कोई हिमाकत करने की कोशिश भी करता, तो करोड़ों भारतीय उसके विरोध में खड़े हो जाते और जन भावनाएं अगर इतने बड़े पैमाने पर हों, तो भला किसकी ऐसी हिम्मत पड़ सकती है? और तो और, इन भावनाओं को देखते हुए भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी उनको देश के बाहर ले जाने पर रोक लगा देता और  फिर ब्रिटिश सरकार सालोंसाल अंतरराष्ट्रीय अदालत में लड़ती रहती। वैसे भी, ब्रिटेन की कोई सरकार सुभाष चंद्र्र बोस को सौंपने की मांग करती ही नहीं। इतना तो शायद   

अंग्रेज भी जानते थे कि यह काम कतई संभव नहीं है। कई बार ब्रिटेन ने खुद ही दुनिया के ऐसे बड़े लोगों के खिलाफ केस वापस ले लिए थे। वैसे आज भी न जाने कितने भारतीय अपराधी मजे से इंग्लैंड में रह रहे हैं और भारत सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद वहां की छोटी-छोटी अदालतें उन्हें भारत सरकार को नहीं सौंप रही हैं। फिर भला भारत सरकार नेताजी सुभाष चंद्र्र बोस को अंग्रेजों के हवाले क्यों कर देती? 

हाल ही में एक अभियान यह चला कि फैजाबाद के गुमनामी बाबा ही नेताजी थे। तमाम पत्रों का हवाला दिया गया, लेकिन कुछ साबित नहीं हो पाया। गुमनामी बाबा एक ऐसे साधु थे, जो परदे के  पीछे छिपकर रहते थे और किसी को अपना चेहरा नहीं दिखाते थे, इसलिए उन्हें नेताजी बताना लोगों को आसान लग रहा है। सवाल यह उठता है कि नेताजी भला फैजाबाद में क्यों रहेंगे? और फिर वह परदे के पीछे क्यों छिपेंगे? क्यों नहीं, उन्होंने कभी अपने भाई-भतीजे के परिवार से कोलकाता में मिलने की कोशिश की, उन्हें फोन क्यों नहीं किया, उन्हें पत्र क्यों नहीं लिखा? जर्मनी में अपनी पत्नी और बेटी से कभी संपर्क क्यों नहीं किया? यह सब एक इंसान के लिए कैसे संभव है? चलिए, हम यह मान भी लें, तो आजाद हिंद फौज में जो लोग उनसे सबसे करीबी थे, उन तक उन्होंने कोई सूचना नहीं दी। 

सबसे बाद तक तो उनकी घनिष्ठ सहयोगी डॉक्टर लक्ष्मी सहगल जीवित रहीं और 98 वर्ष की उम्र में पिछले साल कानपुर में उनका निधन हुआ। उन्होंने भी कभी यह नहीं बताया कि नेताजी का कभी कोई संदेश उन्हें मिला। 
मेरा मानना है कि देश को इस तरह के विवाद से ऊपर उठकर नेताजी की स्मृति को संजोए रखना चाहिए और उससे प्रेरणा लेकर कई और नेताजी पैदा करने चाहिए, जो देश के लिए उतने ही समर्पित बन सकें। 

(ये लेखक के अपने विचार हैं)
http://www.livehindustan.com/news/guestcolumn/article1-Netaji-Subhash-Chandra-BoseIndiaWorld-Life-499414.html

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Aflatoon Afloo उन्होंने 'अंग्रेजों,भारत छोड़ो-करो या मरो' का आवाहन किया था।नेताजी ने रंगून से प्रसारित राष्ट्र के नाम रेडियो सन्देश में देश वासियों से इसका समर्थन करने के लिए कहा था।इसी सन्देश में गांधी को Father of Our Nation' संबोधित किया था।कस्तूरबा जब जेल में गुजरीं तो नेताजी ने राष्ट्रमाता कह कर श्रद्धान्जलि दी।

https://www.facebook.com/aflatoon.afloo/posts/10153901903873646?pnref=story


राजीव शुक्ला जी के विचार 'तर्कपूर्ण'हैं और स्वतः स्पष्ट हैं। वस्तुतः वर्तमान संघ नियंत्रित केंद्र की मोदी सरकार 'महात्मा गांधी' व जवाहर लाल नेहरू के स्वाधीनता संघर्ष में दिये योगदान को धूमिल करने हेतु नेताजी सुभाष चंद्र बोस व लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु को विवादास्पद मुद्दा बना कर देश की जनता को गुमराह कर रही है। जब 1905 के 'बंग- भंग' को ब्रिटिश सरकार को जनता की 'एकता' के आगे रद्द करना पड़ा तब उसने जनता को बांटने के लिए 'सांप्रदायिकता' का सहारा लिया। ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन (जो शासक थे ,जन-प्रतिनिधि नहीं ) के माध्यम से 'मुस्लिम लीग' की स्थापना करवाई तथा  पंडित मदन मोहन मालवीय एवं लाला लाजपत राय के माध्यम से 'हिन्दू महासभा ' की। हिंदूमहासभा की सैन्य शाखा के रूप में 1925 में आर एस एस अस्तित्व में आया जिसका आधार 'मुस्लिम विरोध' था। देश भीषण सांप्रदायिक दंगों की भट्ठी में झुलस गया और अंग्रेज़ सरकार की साम्राज्यवादी/सांप्रदायिक चाल के तहत पाकिस्तान व भारत दो देशों में बाँट गया। पाकिस्तान तो आज़ाद होते ही इंग्लैंड के साम्राज्यवादी उत्तराधिकारी यू एस ए के इशारों पर चलने लगा किन्तु भारत को जवाहर लाल नेहरू ने 'गुट निरपेक्ष ' रखा जो न तो इंग्लैंड न ही अमेरिका के आगे झुका बल्कि साम्यवादी रूस से सहायता लेकर 'आत्म निर्भर' बन गया। 

यह भारत की आत्मनिर्भरता ही अमेरिका की आँख का कांटा बन गई जिस कारण वह पाकिस्तान के माध्यम से भारत को 'युद्ध' में उलझाता रहा। 1965 , 1971 के युद्धों में पाक की करारी हार हुई और वह विभक्त भी हो गया। भारत में साम्राज्यवाद समर्थक आर एस एस आज़ादी के बाद से ही अमेरिका समर्थक रहा जिसे 1980 में इन्दिरा गांधी की सत्ता वापसी में मदद देने से अपनी शक्ति विस्तार का स्वर्ण अवसर प्राप्त हो गया है। 6 दिसंबर 1992 को विवादित बाबरी मस्जिद/राम मंदिर (जिसे ब्रिटिश सरकार ने अपनी सांप्रदायिक नीति के अंतर्गत विवादित बनवाया था ) को ढहा कर भारतीय संविधान को ढहाने की मुहिम सांप्रदायिक आधार पर संघ के निर्देश पर आडवाणी साहब द्वारा छेड़ दी गई। 

2014 के लोकसभा चुनावों के जरिये तत्कालीन पी एम मनमोहन सिंह जी की मदद से संघ को  मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनवाने का अवसर मिल गया है। तब से अब तक संविधान को हिलाने की कई कोशिशें हो रही हैं। जब संसद व विधानसभाओं में दो तिहाई बहुमत हासिल कर लिया जाएगा तब वर्तमान संविधान को ध्वस्त कर दिया जाएगा। तब तक के लिए देश की जनता को पुरानी  ब्रिटिश शैली से विभक्त करने के हर संभव प्रयास किए जाते रहेंगे। इसी कड़ी के रूप में नेताजी व शास्त्री जी की मृत्यु को विवादास्पद बना कर जनता का भावनात्मक दोहन किया जा रहा है। इसी हेतु महात्मा गांधी व जवाहर लाल नेहरू की छवि  खराब की जा रही है।  
------(विजय राजबली माथुर )


  ~विजय राजबली माथुर ©
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Friday, October 2, 2015

गांधी को पूजनीय नहीं अनुकरणीय बनाइये --- विजय राजबली माथुर

आज सारे देश में गांधी जयन्ती मनाई जा रही है.कहीं कहीं तकली और चरखा भी चलाया जाएगा और गांधी जी का प्रिय भजन भी गाया जाएगा.गांधी जी के चित्रों पर माल्यार्पण भी किया जाएगा उन के आदर्शों का गुण गान भी किया जाएगा,लेकिन कोई भी उन के आदर्शों का अनुसरण करता नज़र नहीं आएगा.दरअसल यही हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम लोग महापुरुषों का गुणगान तो करते हैं परन्तु उनका अनुसरण नहीं कर सकते.गांधी जी के सम्बन्ध में सिंहासन राय 'सिद्धेश' ने लिखा है:-

''धरा जब जब विकल होती,मुसीबत का समय आता,
किसी न किसी रूप में कोई न कोई महामानव चला आता.''

जी हाँ जब १८५७ की क्रान्ति कुचले जाने के बाद हमारा देश स्वतंत्रता के लिए छटपटा रहा था और हर छिटपुट विद्रोह कुचला जा रहा था तो गांधी जी ने सत्य और अहिंसा(जिन के बीज वेदों में मौजूद थे) का मार्ग अपनाया.उन्होंने विदेशी शासकों के विरुद्ध सत्याग्रह का प्रयोग किया.सत्य का मार्ग दुर्गम और कठिन होता है गांधी जी ने स्वंय पर आत्मानुशासन लागू कर इसे अपनाया और जनता का आह्वान किया.उसका प्रभाव भी हुआ जनता ने गांधी जी की अपीलों का हाथों हाथ पालन किया.कविवर सोहन लाल द्विवेदी ने लिखा है:-

चल पड़े जिधर भी दो डग मग में
बढ़ चले कोटि पग उसी ओर
गड़ गयी जिधर भी एक दृष्टी
गड़ गए कोटि द्रग उसी ओर.

उस समय के लोग गांधी जी का अनुसरण करते हुए त्यागी बने और अपने प्राणों तक का बलिदान भी किया तब जा कर कहीं यह आजादी मिली है.

लेकिन आज राम और कृष्ण ,नानक,बुद्ध और महावीर की भाँति ही गांधी जी को भी पूजनीय तो बना दिया गया  है.कोई भी उनमे से किसी का भी अनुसरण करने को तैय्यार नहीं है.इसी लिए भौतिक विकास के बावजूद देश में तमाम समस्याएँ मुहं बाएं  खडी हैं और उनका समाधान नहीं निकल पा रहा है.

गांधी जी के एक शिष्य लाल बहादुर शास्त्री जी का भी आज ही के दिन जन्म हुआ था.वह भी त्याग और सादगी के प्रतीक थे.जब उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में साम्राज्यवादी अमेरीका के PL -४८० से टक्कर ली तो जनता से उन्होंने सप्ताह में एक दिन एक समय अन्न त्यागने का आह्वान किया जिसे जनता ने सहर्ष स्वीकार भी किया.ईमानदारी में शास्त्री जी का कोई मुकाबला नहीं था.जब वह वह उ.प्र.के सिंचाई मंत्री थे तो विभाग के कायस्थ चीफ इंजीनियर को भ्रष्टाचार के कारण सस्पेंड करने में कोई देर नहीं की.

वह वायदे के भी पक्के थे यही सोच कर उनके गृहमंत्री काल में लखनऊ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने स्टेडियम में पुलिस उत्पीडन की शिकायत की और मांग रखी कि स्टेडियम में लाल टोपी नहीं दिखाई देनी चाहिए तब तक U P पुलिस की टोपी लाल होती थी.शास्त्री जी ने हामी भर दी,छात्र खुश हो कर लौट गए.सारी रात लखनऊ के तमाम दर्जी लगा कर सैकड़ों खाकी टोपियाँ बनवाईं और अगले दिन पुलिस को खाकी टोपी पहना कर स्टेडियम में तैनात करवा दिया.छात्र दुबारा शास्त्री जी से शिकायत ले कर मिले तो उन्होंने तपाक से कहा कि आप लोगों ने लाल टोपी पर ऐतराज़ किया था हमने उसे हटा कर खाकी टोपी कर दी-छात्र अपना सा मुहं ले कर लौट आये.

१९६५ में प्रधान मंत्री के रूप में देश को पाकिस्तान के विरुद्ध जीत दिलवाई जो उनकी दृढ़ता का प्रतीक है.जिस समय शास्त्री जी का निधन हुआ उनके ऊपर कार की किश्तें लोन के रूप में अदा करने को बाक़ी थीं.आज तो पार्षद भी लाखों,करोड़ों बना लेता है.कहीं कोई गांधी व शास्त्री जैसी सादगी व त्याग को अपनाना नहीं चाहता.

कुछ लोग राहुल गांधी में देश के लिए संभावनाएं देख रहे हैं.राहुल गांधी का देश के प्रति त्याग क्या है?उन के पिता की ह्त्या श्रीलंका के लिट्टे के विरुद्ध उनकी कार्रवाई के कारण हुई थी.राहुल गरीबों के हक़ की बातें केवल अपनी पार्टी को लोकप्रिय बनाने के लिए कर रहे हैं,गरीबों के हित की योजनाएं बना कर उन पर अमल  करवाने की कोई  कसरत नहीं की  है जबकि केंद्र में उनकी पार्टी की सरकार रह चुकी  है.

आज हमें राहुल गांधी के आडम्बर में फंसने की नहीं महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री सरीखे त्याग और साहस की आवश्यकता है.सारे देशवासी इन दो महानुभावों के जीवन से प्रेरणा ले कर  वैसा ही आचरण करें तो हम देश को उचत्तम   सोपान पर पहुंचा सकते हैं.कोरे स्तुति गान से कुछ नहीं होगा.  

Typist -यशवन्त
(नोट : यह लेख मूल रूप से 02-10-2010 को प्रकाशित हुआ था जिसका यह पुनर्प्रकाशन है )
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Thursday, October 1, 2015

गांधी जी की छवी को धूमिल करने का उद्देश्य क्या है?---विजय राजबली माथुर

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प्रस्तुत आलेख के माध्यम से 62 हज़ार भारतीय सैनिकों की मौत व 67 हज़ार सैनिकों के प्रथम विश्व युद्ध में घायल होने की ज़िम्मेदारी महात्मा गांधी जी पर डाली गई है। नाम इतिहास का लिया जा रहा है। इतिहास तो यह भी है कि संभवतः गांधी जी को ही इस 'हिंदुस्तान' का सर्व प्रथम संपादक घनश्याम दास बिड़ला जी द्वारा बनवाया गया था जिसके प्रधान संपादक महोदय आज गांधी जी को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। केवल व्यापारी नहीं थे घनश्याम दास जी बल्कि साहित्य जगत में भी उनका उसी प्रकार मान-सम्मान था जिस प्रकार सेठ गोविंद दास जी का था। कृष्ण कुमार बिड़ला साहब भी साहित्यिक हस्तियों व राजनेताओं का सम्मान करते थे। कभी विहिप द्वारा सब्सिडाइज़ 'आज',आगरा के स्थानीय संपादक रहे पंडित जी जब हिंदुस्तान के प्रधान संपादक बन गए तो गांधी जी से भी महान हो गए जो उनको अपने संस्थापक संपादक पर हमला बोलते तनिक भी संकोच नहीं हुआ।



इतिहासकार तो 'सत्य ' का अन्वेषक होता है उसकी पैनी निगाहें  भूतकाल के अंतराल में प्रविष्ट होकर 'तथ्य ' के मोतियों को सामने लाती हैं। 
किन्तु प्रस्तुत संपादकीय गांधी जी के प्रति तथ्यात्मक दृष्टिकोण नहीं अपनाता है। इसका प्रमुख कारण यह  है कि आज इस अखबार का वह उद्देश्य नहीं रह गया है जिस उद्देश्य के लिए घनश्याम दास बिड़ला जी ने गांधी जी को इससे सम्बद्ध करवाया था। आज यह कारपोरेट घराने के मुनाफा कमाने वाला एक प्रोडक्ट  है।ग्रामीण कुटीर उद्योगों के चहेते गांधी जी को भला कारपोरेट घराना क्यों महत्व देने लगा?

गांधी जी के ही प्रांत-राज्य के वह मोदी साहब अब सरकार के मुखिया हैं जो गांधी जी के हत्यारे से सहानुभूति रखने वाले संगठन और पार्टी से ताल्लुक रखते हैं। लिहाजा संपादकीय द्वारा गांधी जी को भारतीय सैनिकों की क्षति के लिए उत्तरदाई ठहराना राजनीतिक कलाबाजी है न कि ऐतिहासिक सच्चाई। 

वस्तुतः 28 जून 1914 को आस्ट्रिया के राजकुमार की हत्या की गई थी जिसके बाद युद्ध की चिंगारी सुलग उठी थी ।जर्मन सम्राट विलियम कौसर द्वितीय का प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रिंस बिस्मार्क ने जर्मनी  को ब्रिटेन के मुक़ाबले श्रेष्ठ साबित करने और जर्मन साम्राज्य स्थापित करने में बाधक 'प्रशिया' प्रांत को जर्मनी से निकाल दिया था जबकि प्रशियन जर्मनी में बने रहना चाहते थे और इस हेतु संघर्ष छेड़ दिया था। जर्मनी साम्राज्य स्थापना करके ब्रिटेन के लिए चुनौती न प्रस्तुत करे इसलिए ब्रिटेन ने  04 अगस्त 1914 को जर्मनी के विरुद्ध   युद्ध की घोषणा कर दी थी ।

उस समय के प्रभावशाली कांग्रेस नेता बाल गंगाधर तिलक   मांडले जेल मे कैद थे और मोहनदास करमचंद गांधी  अफ्रीका से भारत आ गए थे और  गोपाल कृष्ण गोखले के स्वर मे स्वर मिलाने लगे थे । लाला हरदयाल(माथुर ) साहब  ने विदेश में जाकर  गदर पार्टी की स्थापना देश को आज़ाद कराने हेतु की थी जिसको  सिंगापुर मे सफलता भी मिली थी।गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार को इस आश्वासन के बाद युद्ध में सहयोग किया था कि युद्ध समाप्त होते ही भारत को आज़ाद कर दिया जाएगा। 1857 की क्रांति की विफलता और गदर पार्टी को जनता का व्यापक समर्थन न देख कर गांधी जी ने 'सत्य ' और 'अहिंसा ' के नए शस्त्रों से आज़ादी के संघर्ष को चलाने की पहल की थी और उन्होने शासकों पर भरोसा किया था। जब द्वितीय महायुद्ध  के दौरान गांधी जी ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का आह्वान किया था तब भी अनेकों भारतीय ब्रिटिश फौज में भर्ती हुये थे। बेरोजगारी ने उनको मजबूर किया था विदेशी फौज में रोजगार पाने के लिए। यदि गांधी जी 1914 में भी फौज में भर्ती का विरोध करते तो क्या भूख से बेहाल गरीब फौज की सेवा में न जाकर रोजगार से वंचित होता? काबिल संपादक महोदय इस तथ्य को क्यों नज़रअंदाज़ कर गए? ज़ाहिर है उनके समक्ष राजनीतिक चापलूसी करके अपने कारपोरेट घराने के लिए आर्थिक लाभ कमाना उद्देश्य था -गांधी जी पर प्रहार करना।
 1917 में जब नील की खेती में गोरों ने भारतीय किसानों पर अत्याचार ढाना शुरू किया था तब गांधी जी 'चंपारण ' गए थे। आदिवासी किसानों के बीच की घोर गरीबी उनको तब दिखाई दी थी जब एक परिवार की माँ और पुत्री के बीच एक ही साड़ी होने तथा बारी-बारी से उसका प्रयोग करने की बात उनको पता चली थी। उस दिन से उन्होने खुद भी आधी धोती पहनने का व्रत लिया जिसका आजन्म निर्वहन किया। क्या गांधी जी को आरोपित करने वाले अपने देश की जनता के लिए कुछ भी त्याग कर सकते हैं?
 बहुत खतरनाक स्थिति है  यह जब साहित्य व समाचारों के माध्यम से सत्ता राजनीति के साथ कदमताल मिलाई जा रही हो। निर्भीक और जागरूक लोगों का कर्तव्य है कि वे 'सत्य ' को कुचले जाने की प्रक्रिया का तीव्र विरोध करें। 
    ~विजय राजबली माथुर ©
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