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Wednesday, January 17, 2018

भारतवर्ष तो आर्य था हिन्दुत्व की राजनीति गुलामी का प्रतीक है ------ विजय राजबली माथुर

दुर्भाग्य से आज विद्वान कम्यूनिज़्म को धर्म विरोधी कहते हैं और कम्युनिस्ट भी इसी मे गर्व महसूस करते हैं। धर्म जिसका अर्थ 'धारण करने'से है को न मानने के कारण ही सोवियत रूस मे कम्यूनिज़्म विफल हुआ और चीन मे सेना के दम पर जो शासन चल रहा है वह कम्यूनिज़्म के सिद्धांतों पर नहीं है। 'कम्यूनिज़्म' एक भारतीय अवधारणा है और उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य मे ही सफलता मिल सकती है।

 'नास्तिक ' स्वामी विवेकानंद के अनुसार वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास नहीं है और 'आस्तिक' वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास है। लेकिन पोंगापंथी उल्टा पाठ सिखाते हैं। परंतु कम्युनिस्ट सीधी बात क्यों नहीं समझाते?....................................................................यह देश का दुर्भाग्य ही है कि पढे - लिखे विद्वान तक 'सत्य ' कहने से बचते हैं और विदेशियों द्वारा हमारे देशवासियों को दिया गया नामकरण ही प्रयोग करते रहते हैं। उसकी हकीकत ...... कि, हिन्दुत्व वस्तुतः शोषण को मजबूत बनाने की एक व्यापारिक राजनीति है।.............................................. 
"गुरुडम में फंस कर जिसने सत्य से मुंह मोड़ लिया ;
पाखण्ड को ओढ़ लिया ...
इसी कारण भारत देश गुलाम हुआ ...
भाई-भाई का आपस में घोर संग्राम हुआ ;
मंदिर ..मस्जिद तोड़े संग्राम हुआ.....
बुत परस्ती में लगा हुआ देश बुरी तरह गुलाम हुआ ;
देश मेरा बदनाम हुआ....."






*************** यह देश का दुर्भाग्य ही है कि पढे - लिखे विद्वान तक 'सत्य ' कहने से बचते हैं और विदेशियों द्वारा हमारे देशवासियों को दिया गया नामकरण ही प्रयोग करते रहते हैं। उसकी हकीकत ऊपर और नीचे प्रस्तुत वीडियो देख कर समझी जा सकती है कि, हिन्दुत्व वस्तुतः शोषण को मजबूत बनाने की एक व्यापारिक राजनीति है। निम्नलिखित पूर्व प्रकाशित नोट्स इसे समझने में सहायक हो सकते हैं*************** 

December 21, 2011 ·

वेद प्रचारक ने कहा था
दौलत के दीवानों उस दिन को पहचानों ;
जिस दिन दुनिया से खाली हाथ चलोगे..
चले दरबार चलोगे....
ऊंचे-ऊंचे महल अटारे एक दिन छूट जायेंगे सारे ;
सोने-चांदी तुम्हारे बक्सों में धरे रह जायेंगे...
जिस दिन दुनिया से खाली हाथ चलोगे...
चले दरबार चलोगे.......
दो गज कपडा तन की लाज बचायेगा ;
बाकी सब यहाँ पड़ा रह जाएगा......
चार के कन्धों पर चलोगे..
.चले दरबार चलोगे......
पत्थर की पूजा न छोडी-प्यार से नाता तोड़ दिया...
मंदिर जाना न छोड़ा -माता-पिता से नाता तोड़ दिया...
बेटे ने बूढ़ी माता से नाता तोड़ दिया ;
किसी ने बूढ़े पिता का सिर फोड़ दिया....
पत्थर की पूजा न छोडी ;मंदिर जाना न छोड़ा....
दया धर्म कर्म के रिश्ते छूट रहे;
माता-पिता से नाता छोड़ दिया....
उल्टी सीधी वाणी बोलकर दिल तोड़ दिया;
बूढ़ी माता से नाता तोड़ दिया.....
पत्थर की पूजा न छोडी मंदिर जाना न छोड़ा 
बूढ़ी माँ का दिल तोड़ दिया.....
वे क्या जाने जिसने प्रभु गुण गाया नहीं ;
वेद-शास्त्रों से जिसका नाता नहीं..
जिसने घर हवन कराया नहीं...
गुरुडम में फंस कर जिसने सत्य से मुंह मोड़ लिया ;
पाखण्ड को ओढ़ लिया ...
इसी कारण भारत देश गुलाम हुआ ...
भाई-भाई का आपस में घोर संग्राम हुआ ;
मंदिर ..मस्जिद तोड़े संग्राम हुआ.....
बुत परस्ती में लगा हुआ देश बुरी तरह गुलाम हुआ ;
देश मेरा बदनाम हुआ.....

March 23, 2012 
साम्यवादी विद्वान आर एस एस की अफवाहों को सही क्यों मानते हैं ?
बेहद अफसोसनाक है साम्यवादी विद्वानों द्वारा आर एस एस की अफवाहों को सही मानना 

साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासकों ने अपने चहेते पुराण वादियों के सहारे आर एस एस की स्थापना अफवाहों के जरिये देश को बांटने हेतु करवाई थी जिसमे वे पूरी तरह सफल रहे। आर एस एस ने अफवाह उड़ा दी कि नव-संवत हिंदुओं का केलेनडर है और साम्यवादी विद्वानों ने उसी को सच मान कर नव-संवत का विरोध आँखें बंद करके करना शुरू कर दिया। यह प्रवृति साम्यवाद के लिए आत्म-घाती है । 

सर्व प्रथम बौद्धों ने अपने मठ उजाड़ने ,विहारों को जलाने,साहित्य को नष्ट करने वाले उग्रवादियों हेतु 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग -'हिंसा देने वाले' के संदर्भ मे किया था। फिर जब विदेशी आक्रांता भारत मे शासन करने आए तो फारसी भाषा की एक गंदी गाली-हिन्दू का प्रयोग यहा के निवासियों हेतु करने लगे और आर एस एस जो विदेशी साम्राज्यवादियों की हितचिंतक संस्था है यहाँ के लोगों को 'गर्व से हिन्दू' कहने लगी। 


बौद्धों  को सताये जाने और फारसी आक्रांताओं के आने से बहुत पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सिंहासन पर बैठने के उपलक्ष्य मे चंद्र गुप्त  ने 'विक्रमादित्य '  की उपाधि धारण की और इसी दिन से 'विक्रमी संवत' नामक नया कलेंडर  चालू किया था। भारतीय इतिहास मे गुप्त काल को 'स्वर्ण युग'कहा जाता है जिसमे चंद्र गुप्त 'विक्रमादित्य'का शासन जनता के हित मे श्रेष्ठ था। भारतीय खुद को श्रेष्ठ अर्थात 'आर्ष'कहते थे जो अब अपभ्रंश रूप मे 'आर्य' कहा जाता है। यूरोप के विदेशियों ने आर्यों को यूरोप का बता दिया और 'गुलाम प्रवृति' के विद्वानों ने उसे भी सही मान लिया । इसी कारण 'विक्रमी संवत' को साम्यवादी विद्वान भी  आर एस एस की भांति ही हिन्दू  संवत मानते हैं जो सर्वथा गलत है। हिन्दू शब्द की उत्पत्ति से बहुत पहले लागू 'विक्रमी संवत' हिंदुओं का नही भारत के श्रेष्ठ आर्य शासक चंद्र गुप्त 'विक्रमादित्य' की याद दिलाता है जिस पर प्रत्येक स्वाभिमानी भारतीय को गर्व करना चाहिए और साम्यवादी विद्वानों को इसका विरोध करके आर एस एस का दावा मजबूत नहीं करना चाहिए। 
शिव अर्थात भारतवर्ष : 
"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है

MONDAY, MARCH 7, 2016
शिव का अर्थ है ‘कल्याण' अर्थात मानव मात्र के कल्याण हेतु जो संदेश दे वही शिव है। शिव बुद्धि,ज्ञान व विवेक का द्योतक है। 
हमारे विद्वान बुद्धिजीवी जिनमे बामपंथी भी शामिल हैं 'धर्म' का अर्थ ही नहीं समझते और न ही समझना चाहते हैं। पुरोहितवादियो ने धर्म को आर्थिक शोषण के संरक्षण का आधार बना रखा है और इसीलिए बामपंथी पार्टियां धर्म का विरोध करती हैं। जब कि वह धर्म है ही नहीं जिसे बताया और उसका विरोध किया जाता है। धर्म का अर्थ समझाया है 'शिवरात्रि' पर बोध प्राप्त करने वाले मूलशंकर अर्थात दयानंद ने। उन्होने 'ढोंग-पाखंड' का प्रबल विरोध किया है उन्होने 'पाखंड खंडिनी पताका' पुस्तक द्वारा पोंगापंथ का पर्दाफाश किया है। 
दयानन्द ने आजादी के संघर्ष को गति देने हेतु1875 मे  'आर्यसमाज' की स्थापना की थी ,उसे विफल करने हेतु ब्रिटिश शासकों ने 1885 मे  कांग्रेस की स्थापना करवाई तो आर्यसमाँजी उसमे शामिल हो गए और आंदोलन को आजादी की दिशा मे चलवाया।1906 मे अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग स्थापित करवाकर देश मे एक वर्ग को आजादी के आंदोलन से पीछे हटाया। 1920 मे हिन्दू महासभा की स्थापना करवा कर दूसरे वर्ग को भी आजादी के आंदोलन से पीछे हटाने का विफल प्रयास किया। 1925 मे साम्राज्यवादी हितों के पोषण हेतु आर एस एस का गठन करवाया जिसने मुस्लिम लीग के समानान्तर सांप्रदायिकता को भड़काया और अंततः देश विभाजन हुआ। आर्यसमाज के आर  एस एस के नियंत्रण मे जाने के कारण राष्ट्रभक्त आर्यसमाजी जैसे स्वामी सहजानन्द ,गेंदा लाल दीक्षित,राहुल सांस्कृत्यायन आदि 1925 मे स्थापित 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी' मे शामिल हुये जिसका गठन आजादी के क्रांतिकारी आंदोलन को गति देने हेतु हुआ था। सरदार भगत सिंह,राम प्रसाद 'बिस्मिल' सरीखे युवक 'सत्यार्थ प्रकाश'पढ़ कर ही क्रांतिकारी कम्युनिस्ट बने थे। 
दुर्भाग्य से आज विद्वान कम्यूनिज़्म को धर्म विरोधी कहते हैं और कम्युनिस्ट भी इसी मे गर्व महसूस करते हैं। धर्म जिसका अर्थ 'धारण करने'से है को न मानने के कारण ही सोवियत रूस मे कम्यूनिज़्म विफल हुआ और चीन मे सेना के दम पर जो शासन चल रहा है वह कम्यूनिज़्म के सिद्धांतों पर नहीं है। 'कम्यूनिज़्म' एक भारतीय अवधारणा है और उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य मे ही सफलता मिल सकती है।

 'नास्तिक ' स्वामी विवेकानंद के अनुसार वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास नहीं है और 'आस्तिक' वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास है। लेकिन पोंगापंथी उल्टा पाठ सिखाते हैं। परंतु कम्युनिस्ट सीधी बात क्यों नहीं समझाते? 

~विजय राजबली माथुर ©

Friday, June 3, 2016

वेद,वैदिक संस्कृति,डॉ रोमिला थापर : भ्रम और निवारण ------ विजय राजबली माथुर/ध्रुव गुप्त

वेद और आर्य शब्दों की साम्राज्यवादी व्याख्या ने भ्रम की स्थिति उत्पन्न की है जिसका पूरा-पूरा लाभ उसकी सहोदरी सांप्रदायिकता ने उठाया है। हालांकि डॉ हरबंस मुखिया ने जे एन यू की राष्ट्रवाद की क्लास में स्पष्ट किया कि, अब अंग्रेजों ने अपने यहाँ इतिहास संशोधित कर लिया है परंतु भारत में अभी भी सांप्रदायिक आधार पर ही इतिहास चल रहा है जिसका लाभ सांप्रदायिक शक्तियों ने भरपूर उठाया है। अतः भ्रम का  शीघ्रातिशीघ्र निवारण होना उचित है ।
http://krantiswar.blogspot.in/2012/11/sampradayikta-dharam-nirpexeta.html
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जे एन यू में डॉ रोमिला थापर एवं डॉ हरबंस मुखिया 



प्रसिद्ध इतिहासकार और चिंतक रोमिला थापर से रणबीर चक्रवर्ती की इतिहास, समाज और संस्कृति पर बातचीत. साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार, अंग्रेज़ी पाक्षिक फ्रंटलाइन में प्रकाशित, रोमिला थापर के लंबे साक्षात्कार “लिंकिंग द पास्ट एंड द प्रेजेंट” का कुछ संपादित रूप है और यहां इसका पहला आधा हिस्सा प्रकाशित किया जा रहा है। अनुवाद: शुभनीत कौशिक। 
1 ) उदाहरण के लिए, जब हम छात्र थे तो हमें यह बताया जाता था कि ऋग्वेद की भाषा इंडो-आर्यन भाषा ही है। पर आज यदि आप ऐसा वक्तव्य दें, तो वैदिक काल में विशेषज्ञता रखने वाले कुछ विद्वान इस कथन से जरूर अपनी असहमति जताएंगे क्योंकि भाषा-विज्ञान के सिद्धांतों के प्रयोग ने यह दर्शाया है कि ऋग्वेद में द्रविड़ भाषाओं के भी अंश सम्मिलित हैं। इन जानकारियों से इतिहासकार के प्रत्यक्षीकरण और स्रोतों के प्रति उसके दृष्टिकोण में भी बदलाव आते हैं। अब ऋग्वेद के संदर्भ में ही यह जानकारी इतिहासकार को ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ के अध्ययन के लिए प्रेरित करती है, जो एकल संस्कृति का न होकर सह-अस्तित्व में विद्यमान उन संस्कृतियों का है, जिनमें एक का प्रभुत्त्व है। तो इतिहासकार को इन अन्य संस्कृतियों के बारे में भी जानकारी जुटानी होगी और उनका अध्ययन करना होगा। इतिहासकार को नदियों के जल तंत्र के अध्ययन (हाइड्रोलॉजी) और आनुवंशिकी के अध्ययन और रिपोर्टों से मिलने वाली जानकारियों का समावेश भी अपने अध्ययन में करना होगा। 

2 ) 
प्राचीन भारत पर काम करने वाले विद्वानों का मानना है कि आर्य भाषा मध्य एशिया से ईरान होते हुए भारत पहुँची। पर अब भारत में कुछ लोगों द्वारा इस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है कि आर्यभाषा भाषी भारत के स्थानीय निवासी ही थे। कुछ तो हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को भी आर्य साबित करते हुए यह सुझाना चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति में कोई गैर-आर्य तत्त्व था ही नहीं! यह ऐसा तर्क है जो मुझे विभिन्न कारणों से कतई स्वीकार नहीं। भाषाई और पुरातात्विक आधार पर भी यह किसी तरह से संभव नहीं जान पड़ता। हम कहते हैं कि ऋग्वैदिक संस्कृति उत्तर-हड़प्पाकालीन थी, तो जाहिर है कि इसका मतलब हुआ कि इसमें इसकी पूर्वतर संस्कृति परिलक्षित नहीं होगी। हड़प्पा संस्कृति का संपर्क ओमान और मेसोपोटामिया से था, जिनका जिक्र ऋग्वेद में नहीं मिलता।

3 )  
हाँ, ऋग्वेद में इस रूप में महापाषाणकालीन (मेगालिथिक) संस्कृति का जिक्र नहीं है। पर इस टेक्स्ट में अन्य समूहों की चर्चा जरूर की गयी है, जैसे असुर, दास, दस्यु आदि। ऋग्वेद दो वर्णों की चर्चा करता है – आर्य और दास। ‘दास’ कौन थे? उनके बारे में ऋग्वेद में जो विवरण मिलता है वह यह है कि वे उन कर्मकांडों और रीति-रिवाजों को मानने वाले थे, जो आर्यों से भिन्न थे। ‘दास’ अलग देवताओं की उपासना करते थे, और वे वैदिक ग्रंथों के लेखकों की भाषा से भिन्न भाषाएँ बोलते थे। वे समृद्ध थे, मवेशियों के रूप में उनकी संपत्ति ईर्ष्या का विषय थी और वे अलग बसावटों में रहते थे। इसलिए कुछ विद्वान यह भी सोचते हैं कि वे अलग संस्कृति के थे। इतिहासकार के रूप में हमें यह सवाल करना होगा कि ‘दास कौन थे’ और उनका मिथकीकरण क्यों किया गया?

इसी तरह ‘दासी-पुत्र ब्राह्मणों’ का भी उल्लेख मिलता है। जिन्हें पहले तो अस्वीकार्य माना गया, पर बाद में जब इन लोगों ने अपनी शक्ति दिखाई तो उन्हें ब्राह्मण के रूप में स्वीकार कर लिया गया। ‘दासी-पुत्र ब्राह्मण’ स्वयं में ही एक विरोधाभाषी शब्द है क्योंकि ‘दासी-पुत्र’ (यानि एक दासी से उत्पन्न हुआ पुत्र) होना और ब्राह्मण की हैसियत दोनों में विरोध भाव है। वैदिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि देवों और असुरों में अक्सर संघर्ष होते रहते थे। यह एक स्तर पर मिथक है, पर यह मिथक भी तत्कालीन समाज की अवधारणाओं से बिलकुल अलग नहीं है। इतिहासकारों के मत में, वैदिक ग्रंथों में उत्तर-हड़प्पा काल से लेकर ईसापूर्व पाँचवी सदी के ऐतिहासिक नगरों के रूप में नगरीय संस्कृति के उदय तक का उल्लेख मिलता है। ऐसी स्थिति में क्या यह कहना संभव है कि ये वैदिक ग्रंथ संस्कृति के एक पैटर्न के उद्विकास के परिचायक भर हैं!

4 ) एक प्रचलित तर्क यह भी है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और भारत से ही वे दुनिया के अन्य हिस्सों में गए और यूरोप में भी सभ्यता लेकर आर्य ही गए। इस सिद्धांत की खोज की गयी 19वीं सदी में, पर यह आज भी उतना ही लोकप्रिय है। सबसे पहले अमेरिका के थिओसोफिस्ट, कर्नल हेनरी एस ओलकाट ने इसे प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत थिओसोफिस्टों ने अपना लिया। यद्यपि थिओसोफिस्ट कुछ समय के लिए आर्य समाज के निकट थे, पर स्वयं आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य तिब्बत से आए थे। 

ये वे सिद्धांत हैं जो भारत के प्राचीनतम अतीत से जुड़े ऐतिहासिक विवादों से गहरे जुड़े हुए हैं। इनकी शुरुआत 19वीं सदी में हुई। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि यह वही समय था जब ‘नस्ल विज्ञान’ के अधीन यूरोपीय सर्वोच्चता पर, आर्य उत्पत्ति को आधार बनाकर चर्चा की जा रही थी। इनमें से कुछ सिद्धांत, बीसवीं सदी के यूरोप में ‘आर्यवाद’ को विनाशकारी दिशा की ओर ले गए। अतिरेक राष्ट्रवाद और अस्मिता की राजनीति के साथ ऐतिहासिक सिद्धांतों की जुगलबंदी के भयानक नतीजे हो सकते हैं, इसलिए यह ज़रूरी है इन सिद्धांतों पर चर्चा की जाए। 

स्त्रोत :
http://hashiya.blogspot.in/2015/11/blog-post_24.html
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भ्रम निवारण : 
Dhruv Gupt
 02-06-2016  

क्या वैदिक ऋषि सचमुच गोमांस खाते थे ? :

फेसबुक पर और अन्यत्र भी कई मित्रों ने वैदिक साहित्य का हवाला देते हुए बार-बार यह साबित करने की कोशिश की है कि वैदिक ऋषि और उस कालखंड के लोग गोमांस का भक्षण किया करते थे। इस विषय पर मेरे भी मन में भी कुछ उलझनें थीं। कहीं भी अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं पाकर अंततः मैंने देश के कुछ गिने-चुने वेद मर्मज्ञों में एक 'मातृसदन', कनखल, हरिद्वार के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी शिवानंद जी के सामने अपनी जिज्ञासा रखी। उन्होंने बताया कि ज्ञान जब अधकचरा हो तो वेद की ऋचाओं और उपनिषद के मंत्रों के शाब्दिक अर्थ लेकर लोग ऐसी ही स्थापनाएं निकालते हैं। वेद और उपनिषद मूलतः यौगिक साहित्य हैं जिनमें योग की गूढ़ और रहस्यमय क्रियाओं को लौकिक शब्दों और उपमाओं के माध्यम से समझाने के प्रयास किए गए हैं। यह गुरू और शिष्यों के बीच का हजारों वर्षों तक श्रुति परंपरा में चला संवाद है जिसे योग विद्या में प्रवेश करने वाले जिज्ञासु ही समझ सकते हैं। आमलोग जब इन ऋचाओं और मन्त्रों के शाब्दिक अर्थ लगाएंगे तो अर्थ का अनर्थ तो होगा ही। उन्होंने वृहदकारण्य उपनिषद से यह उद्धरण सुनाकर मेरी तमाम जिज्ञासाओं का शमन कर दिया। 

वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चतवारहः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हंतकारहः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हंतकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः। (छा. उ. 5/8/1) 

अर्थात वाक् ही धेनु या गाय है। उस धेनु का प्राण वृषभ है और बछड़ा उसका मन। उसके चार स्तन हैं-स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वाधाकार। उसके दो स्तनों- स्वाहाकार और वषट्कार उपजीवी देवगण हैं जो उनका उपभोग करते हैं। हन्तकार का उपभोग मनुष्य करते हैं और स्वाधाकार का पितृगण। यह एक रूपक है जिसके द्वारा यौगिक क्रिया प्राणोपासना की व्याख्या की गई है। ऐसे कई मंत्रों और ऋचाओं के सतही अर्थ लगाने वाले लोगों ने यह भ्रांति फैलाई है कि वैदिक ऋषि और आमजन गोमांस का भक्षण करते थे।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1062190717190859&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3&permPage=1
********************************************************जी हाँ इसी प्रकार 5 वर्ष से अधिक पुराना वह 'जौ ' जिसे बोने से उगे नहीं को 'अश्व ' कहा जाता था और उसकी हवन में आहुतियाँ दी जाती थीं। पोंगा पंडितों ने अश्व का अर्थ 'घोडा ' लगा कर घोड़े की आहुती देने की बेसुरी तान छेड़ दी । वैदिक संस्कृत को साहित्यिक रूप में न लेकर बीज गणित के सूत्रों की भांति लेंगे तभी सही समाधान पर पहुंचेंगे। लेकिन क्या पोंगा-पंथी और एथीस्ट सच को स्वीकार करेंगे?

****** आर्य न कोई जाति थी न है  : ******
Vijai RajBali Mathur
May 29, 2012 · 
आर्य न कोई जाति थी न है। आर्य=आर्ष=श्रेष्ठ। अर्थात श्रेष्ठ कार्यों को करने वाले सभी व्यक्ति आर्य हैं। 'कृंणवनतों विश्वार्यम' के अनुसार सम्पूर्ण विश्व को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनाना है। लेन पूल,कर्नल टाड आदि-आदि विदेशी और आर सी मजूमदार सरीखे भारतीय इतिहासकारों ने साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ती हेतु आर्यों को एक जाति के रूप मे निरूपित करके बेकार का झगड़ा खड़ा किया है।
अब से लगभग 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव-सृष्टि इस पृथ्वी पर हुई तो विश्व मे तीन स्थानों-
1-मध्य यूरोप,
2- मध्य अफ्रीका ,
3-मध्य एशिया –मे एक साथ ‘युवा स्त्री और युवा पुरुषों’के जोड़े सृजित हुये। भौगोलिक स्थिति की भिन्नता से तीनों के रूप-रंग ,कद-काठी मे भिन्नता हुई। इन लोगों के माध्यम से जन-संख्या वृद्धि होती रही। जहां-जहां प्रकृति ने राह दी वहाँ-वहाँ सभ्यता और संस्कृति का विकास होता गया और जहां प्रकृति की विषमताओं ने रोका वहीं-वहीं रुक गया। 
मध्य एशिया के ‘त्रिवृष्टि’जो अब तिब्बत कहलाता है उत्पन्न मानव तीव्र विकास कर सके जबकि दूसरी जगहों के मानव पिछड़ गए। आबादी बढ्ने पर त्रिवृष्टि के लोग दक्षिण के निर्जन प्रदेश आर्यावृत्त मे आकर बसने लगे।जब ‘जंबू द्वीप’उत्तर की ओर ‘आर्यावृत्त’ से जुड़ गया तो यह आबादी उधर भी फ़ेल गई। चूंकि आबादी का यह विस्तार निर्जन प्रदेशों की ओर था अतः किसी को उजाड़ने,परास्त करने का प्रश्न ही न था। साम्राज्यवादियों ने फूट परस्ती की नीतियों के तहत आर्य को जाति बता कर व्यर्थ का बखेड़ा खड़ा किया है। त्रिवृष्टि से आर्यावृत्त आए इन श्रेष्ठ लोगों अर्थात आर्यों ने सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान-विज्ञान से परिचित कराने का बीड़ा उठाया। इस क्रम मे जिन विद्वानों ने पश्चिम से प्रस्थान किया उनका पहला पड़ाव जहाँ स्थापित हुआ उसे ‘आर्यनगर’ कहा गया जो बाद मे एर्यान और फिर ईरान कहलाया। ईरान के अंतिम शासक तक ने खुद को आर्य मेहर रज़ा पहलवी कहा। आगे बढ़ कर ये आर्य मध्य एशिया होकर यूरोप पहुंचे। यूरोपीयो ने खुद को मूल आर्य घोषित करके भारत पर आक्रमण की झूठी कहाने गढ़ दी जो आज भी यहाँ जातीय वैमनस्य का कारण है। 
‘तक्षक’ और ‘मय’ऋषियों के नेतृत्व मे पूर्व दिशा से विद्वान वर्तमान साईबेरिया के ब्लादिवोस्तक होते हुये उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के अलास्का (जो केनाडा के उत्तर मे यू एस ए के कब्जे वाला क्षेत्र है)से दक्षिण की ओर बढ़े। ‘तक्षक’ ऋषि ने जहां पड़ाव डाला वह आज भी उनके नाम पर ही ‘टेक्सास’ कहलाता है जहां जान एफ केनेडी को गोली मारी गई थी। ‘मय’ ऋषि दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के जिस स्थान पर रुके वह आज भी उनके नाम पर ‘मेक्सिको’ कहलाता है। 
दक्षिण दिशा से जाने वाले ऋषियों का नेतृत्व ‘पुलत्स्य’ मुनि ने किया था जो वर्तमान आस्ट्रेलिया पहुंचे थे। उनके पुत्र ‘विश्रवा’मुनि महत्वाकांक्षी थे। वह वर्तमान श्रीलंका पहुंचे और शासक ‘सोमाली’ को आस्ट्रेलिया के पास के द्वीप भेज दिया जो आज भी उसी के नाम पर ‘सोमाली लैंड’कहलाता है। विश्रवा के बाद उनके तीन पुत्रों मे सत्ता संघर्ष हुआ और बीच के रावण ने बड़े कुबेर को भगा कर और छोटे विभीषण को मिला कर राज्य हसगात कर लिया। वह साम्राज्यवादी था। उसने साईबेरिया के शासक (जहां 06 माह का दिन और 06 माह की रात होती है अर्थात उत्तरी ध्रुव प्रदेश)’कुंभकर्ण’तथा पाताल-वर्तमान यू एस ए के शासक ‘एरावन’ को मिला कर भारत –भू के आर्यों को चारों ओर से घेर लिया और खुद अपने गुट को ‘रक्षस’=रक्षा करने वाले (उसका दावा था कि यह गुट आर्य सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करने वाला है)कहा जो बाद मे अपभ्रंश होकर ‘राक्षस’कहलाया। 
राम-रावण संघर्ष आर्यों और आर्यों के मध्य राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद का संघर्ष था जिसे विदेशी इतिहासकारों और उनके भारतीय चाटुकारों ने आर्य-द्रविड़ संघर्ष बता कर भारत और श्रीलंका मे आज तक जातीय तनाव /संघर्ष फैला रखा है। 
जब अब आपने यह विषय उठाया है तो विदेशियों के कुतर्क और विकृति को ठुकराने का यही सही वक्त हो सकता है। जनता के बीच इस विभ्रम को दूर किया जाना चाहिए कि ‘आर्य’ कोई जाति थी या है। विश्व का कोई भी व्यक्ति जो श्रेष्ठ कर्म करे आर्य था और अब भी होगा।

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/364918650236784

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Wednesday, November 18, 2015

स्वामी दयानन्द सरस्वती को हिन्दू बताना एक घोर साजिश ------ विजय राजबली माथुर


http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.in/2015/11/blog-post_16.html









http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.in/2015/11/blog-post_16.html

उद्धृत कथन है मथुरा के मूल निवासी और जे एन यू छात्र  यूनियन के अध्यक्ष रहे एक प्रोफेसर साहब का। यह कथन सत्य से कोसों दूर और अप्रत्यक्ष रूप से आर एस एस को सहायता पहुंचाने वाला है । 

मूल नक्षत्र में जन्में मूल शंकर तिवारी को नौ वर्ष की अवस्था में जब यह भान हुआ कि, जिस शिव लिंग को ईश्वर बताया जा रहा था उस पर चढ़े फल-फूल, मिष्ठान्न को बड़े आराम से चूहा जैसा छोटा जीव उस पर चढ़ कर खा सकता है तो वह भ्रम है-ईश्वर नहीं और वह गृह त्याग कर 'गुरु' की खोज में निकल पड़े थे। 'गुरु' अर्थात 'गु' अंधकार से 'रू' प्रकाश की ओर ले जाने वाला। भटकते हुये वह जब वृन्दावन (मथुरा ) के स्वामी विरजानन्द जी के यहाँ पहुंचे तो उनकी खोज सम्पन्न हुई। नया जमाना ब्लाग के लेखक ने एक अन्य लेख द्वारा स्वामी विरजानन्द जी को हिन्दू-मुस्लिम एकता का पक्षधर घोषित किया है। 

वस्तुतः स्वामी विरजानन्द जी ने स्वामी दयानन्द सरस्वती जी को जो शिक्षा दी वह सम्पूर्ण मानवता को श्रेष्ठ =आर्ष=आर्य बनाने की थी और उसी पर दयानन्द जी चले भी। यह आर्य न कोई जाति है न धर्म न ही नस्ल न ही किसी मजहब की शाखा या प्रशाखा। न ही किसी क्षेत्र विशेष से संबन्धित। विश्व का कोई भी वह मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करे वह आर्य है। अश्रेष्ठ या निकृष्ट कर्म करने वाला अनार्य । 

स्वामी दयानन्द जी का जन्म मूल शंकर तिवारी के रूप में हुआ था अर्थात प्रचलित ब्राह्मण जाति में लेकिन उन्होने घर-परिवार और दुनिया में जो देखा व अपने गुरु विरजानन्द जी से जो समझा-सीखा उससे वह जिस निष्कर्ष पर पहुंचे थे उनके ही शब्दों में प्रस्तुत है। ('सत्यार्थप्रकाश' : सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा , नई दिल्ली- 2 से प्रकाशित के पृष्ठ- 262 व 263 पर ) :

"जब ब्राह्मण लोग विद्द्याहीन हुए तब क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के अविद्वान होने में तो कथा ही क्या कहनी? जो परंपरा से वेदादि शास्त्रों का अर्थसहित पढ़ने का प्रचार था वह भी छूट गया। केवल जीविकार्थ पाठमात्र ब्राह्मण लोग पढ़ते रहे, सो पाठ्मात्र भी क्षत्रिय आदि को न पढ़ाया। क्योंकि जब अविद्वान हुये गुरु बन गए तब छल, कपट, अधर्म भी उनमें बढ़ता चला । ब्राह्मणों ने विचारा कि अपनी जीविका का प्रबंध बांधना चाहिए। सम्मति करके यही निश्चय कर क्षत्रिय आदि को उपदेश करने लगे कि हम हीं तुम्हारे पूज्यदेव हैं। बिना हमारी सेवा किए तुमको स्वर्ग या मुक्ति न मिलेगी। किन्तु जो तुम हमारी सेवा न करोगे तो घोर नरक में पड़ोगे। जो-जो पूर्ण विद्या वाले धार्मिकों का नाम ब्राह्मण और पूजनीय वेद और ऋषि-मुनियों के शास्त्र में लिखा था, उसको अपने मूर्ख, विषयी, कपटी, लमपट,अधर्मियों पर घटा बैठे। भला वे आप्त विद्वानों के लक्षण इन मूरखों में कब घट सकते हैं? परंतु जब क्षत्रियादी यजमान संस्कृत विद्या से अत्यंत रहित हुये तब उनके सामने जो-जो गप्प मारी, सो-सो बिचारों सब मान ली। जब मान ली तब इन नाम मात्र ब्राह्मणों की बन पड़ी। सबको अपने वचन जाल में बांध कर वशीभूत कर लिया और कहने लगे कि :--- 
ब्रह्मवाक्यं जनार्दन:  :। । 

अर्थात जो कुछ ब्राह्मणों के मुख से वचन निकलता है, वह जानों साक्षात भगवान के मुख से निकला। जब क्षत्रियादी वर्ण 'आँख के अंधे और गांठ के पूरे' अर्थात भीतर विद्या की आँख फूटी हुई और जिनके पास धन पुष्कल है, ऐसे-ऐसे चेले मिले, फिर इन व्यर्थ ब्राह्मण नामवालों को विषयानंद का उपवन मिल गया। यह भी उन लोगों ने प्रसिद्ध किया कि जो कुछ पृथिवी में उत्तम पदार्थ हैं, वे सब ब्राह्मणों के लिए हैं। अर्थात जो गुण,कर्म,स्वभाव से ब्राहमणादि वर्णव्यवस्था थी, उसको नष्ट कर जन्म पर रखी और मृतक पर्यंत का भी दान यजमानों से लेने लगे। जैसी अपनी इच्छा हुई वैसा करते चले "   

स्वामी दयानन्द जी ने महाभारत काल के बाद से वैदिक व्यवस्था का पतन माना है जो ऐतिहासिक रूप से भी सत्य है। राम और कृष्ण के समय में उनके लिए 'आर्यपुत्र' शब्द प्रयुक्त होता था। बाद में बौद्धों के विहार व मठ उजाड़ने वालों को ( हिंसा देने वालों को  बौद्धों द्वारा )हिन्दू  कहा गया। जब ईरानी यहाँ आए तो अपनी फारसी भाषा की एक गंदी और भद्दी गाली के रूप में यहाँ के निवासियों को 'हिन्दू' कह कर पुकारा तब से ही यह शब्द प्रचालन में आया है जिसको ब्रिटिश शासकों ने एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में पोषित किया था। 

स्वामी दयानन्द जी ने भी सन 1857 ई ॰ की क्रान्ति में सक्रिय भाग लिया था और क्रांति के विफल होने पर 1875 में उन्होने 'आर्यसमाज' की स्थापना पूर्ण स्वराज्य प्राप्ति के हेतु की थी और उसकी प्रारम्भिक शाखाएँ ब्रिटिश छवानी वाले शहरों में स्थापित की थीं। 

एम एम अहलूवालिया साहब ने अपनी पुस्तक :FREEDOM STRUGGLE IN INDIA के पृष्ठ 222 पर लिखा है-

"The Government was never quite happy about the Arya Samaj. They disliked it for its propaganda of self-confidence,self-help and self-reliance.The authorities,sometimes endowed it with fictitious power by persecuting to members whose Puritanism became political under intolerable conditions." 


अर्थात-"आर्यसमाज से सरकार को कभी भी खुशी नहीं हुई। शासकों ने आर्यसमाज को इसलिए नहीं चाहा कि यह आत्मविश्वास,स्व-सहाय और आत्म-निर्भरता का प्रचार करता था। कभी-कभी तो अधिकारियों ने इसकी शक्ति को इतना अधिक महत्व दिया कि उसके सदस्यों को दंडित किया और असहनीय दशाओं में उनके सुधारवादी आंदोलन ने राजनीतिक रूप ले लिया। "
 ब्रिटिश शासकों ने महर्षि दयानन्द को 'क्रांतिकारी सन्यासी' (REVOLUTIONARY SAINT) की संज्ञा दी थी। आर्यसमाज के 'स्व-राज्य'आंदोलन से भयभीत होकर वाईस राय लार्ड डफरिन ने अपने चहेते अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन (A. O.)हयूम के सहयोग से वोमेश चंद्र (W.C.)बेनर्जी जो परिवर्तित क्रिश्चियन थे की अध्यक्षता में 1885 ई .में  इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य के 'सेफ़्टी वाल्व'के रूप मे करवाई थी। किन्तु महर्षि दयानन्द की प्रेरणा पर आर्यसमाजियों ने कांग्रेस में प्रवेश कर उसे स्वाधीनता आंदोलन चलाने पर विवश कर दिया। 'कांग्रेस का इतिहास' नामक पुस्तक में लेखक -डॉ पट्टाभि सीता रमईय्या ने स्वीकार किया है कि देश की आज़ादी के आंदोलन में जेल जाने वाले 'सत्याग्रहियों'में 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे।  


यही वजह है कि आज भी 'साम्राज्यवाद' के हितैषी लोग समय-समय पर महर्षि स्वामी दयानन्द पर हमले करते रहते हैं। दयानंद जी को 'महान हिन्दू' घोषित करना ब्राह्मणवादी षड्यंत्र के सिवा और कुछ नहीं है । आर्यसमाज प्रभावित गांधी जी के असहयोग आंदोलन को छिन्न -भिन्न करने हेतु प्रयासों में  (मुस्लिम लीग : स्थापित 1906 , हिंदूमहासभा : स्थापित 1920 ) विफल रहने के उपरांत 1925 में आर एस एस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा हेतु करवाई गई थी जो तब 'दंगों की भट्टी' में देश को झोंक कर 1947 में साम्राज्यवादी विभाजन कराने में सफल रहा था और आज यू एस ए के साम्राज्यवादी हितों की रक्षा में अग्रणी और पुनः देश के कई विभाजन कराने की ओर अग्रसर है।  ऐसे संगठन की हौसला अफजाई का ही काम करेगा दयानन्द जी को हिन्दू घोषित करने का घृणित अभियान । आज आर्यसमाज पर भी वह आर एस एस जो उसके विरोध में गठित हुआ था हावी है इसलिए उस ओर से प्रतिरोध की आवाज़ उठने की संभावना क्षीण है जिससे दयानन्द के निंदकों व विरोधियों के हौसले बुलंद हैं जो उनको हिन्दू का खिताब दे डाला। 

1925 में आर्यसमाज प्रभावित क्रांतिकारी कांग्रेसियों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन आज़ादी के आंदोलन को तीव्र करने के लिए किया था। इस साम्यवादी आंदोलन में उत्तर-प्रदेश से गेंदालाल दीक्षित, बिहार से स्वामी सहजानन्द और राहुल सांस्कृत्यायन व पंजाब से सरदार भगत सिंह जैसे प्रबुद्ध आर्यसमाजियों ने अपना प्रबल योगदान दिया है। लेकिन एथीज़्म के नाम पर उनकी ओर से भी दयानन्द जी के प्रति हो रहे अन्याय के प्रति प्रतिरोध की संभावना क्षीण ही है। फिर भी अपना फर्ज़ पूरा करना मेरा ध्येय था ही। 

~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Friday, December 5, 2014

साम्राज्यवाद हितैषी सांप्रदायिकता पर इस तरह फतह कैसे हासिल करेंगे? --- विजय राजबली माथुर

वास्तविकता तो यह है कि 'आर्य ' न तो कोई जाति है न ही नस्ल या धर्म। आर्य शब्द 'आर्ष' का पर्यायवाची है जिसका अर्थ है-'श्रेष्ठ' अर्थात 'श्रेष्ठ कर्म' करने वाले सभी मनुष्य आर्य हैं चाहें वे जिस भी क्षेत्र के हों ,नस्ल के हों या मजहब/संप्रदाय/रिलीजन को मानते हों। यह तो पाश्चात्य साम्राज्यवादियो का षड्यंत्र है कि आर्य को एक नस्ल या जाति और मध्य यूरोप का वासी तथा भारत पर आक्रांता घोषित कर दिया और इसी धारणा को ही सही मानते हुये ' मूलनिवासी आंदोलन' चल पड़ा है। कंवल भारती जी का यह निष्कर्ष सही है कि सभी मनुष्य एक ही जैसे हैं।





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फिरकापरस्तों के हवाले वतन साथियो
(कँवल भारती)
मुरादाबाद के कांठ में जनता और पुलिस के संघर्ष से बचा जा सकता था. किन्तु, जिला प्रशासन ने मुजफ्फरनगर के दंगों से भी कोई सबक नहीं लिया और सरकार की मंशा के अनुरूप एक गुट को खुश करने के लिए दूसरे गुट के खिलाफ कार्यवाही करके पूरी फिजा बिगाड़ दी. प्रशासन को तब तो और भी सावधानी बरतनी चाहिए थी, जब उसे पता था कि हिन्दू-मुस्लिम की दृष्टि से मुरादाबाद एक संवेदनशील जिला है, जहाँ पहले भी कई सांप्रदायिक संघर्ष हो चुके हैं. क्या जरूरत थी जिला प्रशासन को अकबरपुर चैदरी गाँव में मन्दिर से लाउडस्पीकर उतारने की? क्या लाउडस्पीकर उतारने का यह काम पुलिस ने मुस्लिम गुट को खुश करने के लिए नहीं किया था? प्रशासन के इसी कारनामे ने कांठ में भाजपा के नेतृत्व वाले हिन्दू संगठनों को उत्तेजित-आन्दोलित करने का काम किया. जब संविधान ने सेकुलरिज्म के अंतर्गत हर धर्म के समुदाय को अपनी आस्था के अनुसार पूजा-उपासना करने का अधिकार दिया है, तो प्रशासन इसके खिलाफ क्यों गया? चैदरी गाँव में मन्दिर पर लगाया लाउडस्पीकर कोई अनोखी घटना नहीं थी, बल्कि यह बहुप्रचलित परम्परा है. भारत में कौन सा धार्मिक स्थल ऐसा है, जिस पर लाउडस्पीकर न लगा हो? यह वह देश है, जहाँ लाउडस्पीकर के बिना न मन्दिर में आरती होती है, न मस्जिद में अजान और न गुरूद्वारे में पाठ. रात-रात भर चलने वाले देवी-जागरण और मजलिशों पर क्या लाउडस्पीकर की पाबन्दी आयद होती है? क्या ये लाउडस्पीकर दूसरे गुटों के लिए परेशानी पैदा नहीं करते हैं? लेकिन न कोई शिकायत करता है और न प्रशासन उन्हें उतारता है, क्योंकि मामला धर्म से जुड़ा होता है और संवेदनशील होता है. पर जिस तरह जिला प्रशासन ने अकबरपुर चैदरी गाँव में मन्दिर से लाउडस्पीकर उतारने में दिलचस्पी दिखाई, वह मुझे कहीं से भी प्रशासनिक कार्यवाही नहीं लगती. उसके पीछे जरूर कोई सियासी मकसद नजर आता है. कहा जा रहा है कि इसके पीछे सपा विधायक का दलित-द्वेष था. वह दलितों का मन्दिर था, जिससे लाउडस्पीकर उतारा गया था. और सुना है कि चैदरी गाँव के दलित लोकसभा के चुनावों में सपा के पक्ष में नहीं थे. सपा विधायक ने सोचा होगा कि दलितों में कहाँ इतनी हिम्मत है कि वे सपा-सरकार से टक्कर लेंगे, सो उन्होंने अपने दबाव से दलित-मन्दिर से लाउडस्पीकर उतरवा दिया. पर वे यह भूल गये कि ऐसे ही मामलों में भाजपा की हिन्दू-अस्मिता जागृत हो जाती है. जो दलित उसके सामाजिक अजेंडे में नहीं होते, वे उसके राजनीतिक अजेंडे में सबसे ऊपर होते हैं. इसलिए यह समझने की जरूरत है कि भले ही सपा-सरकार में दलितों की लड़ने की हिम्मत नहीं है, पर जिस तरह धर्म के सवाल पर हिन्दू संगठनों ने उन्हें हिन्दू चेतना से जोड़ने में जरा भी देर नहीं लगायी, उससे यह जरूर साबित हो गया है कि दलित हिंदुत्व के नाम पर भाजपा के साथ खड़े हो गये हैं. अत: कहना न होगा कि प्रशासन की एक गलती से एक ही झटके में दो काम हो गये—(1) भाजपा की हिन्दू राजनीति को दलितों का साथ मिल गया और (2) भाजपा यह सन्देश देने में कामयाब हो गयी कि सपा-सरकार हिन्दू-विरोधी है, जो मुसलमानों को खुश करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. क्या मुरादाबाद का सपा-नेतृत्व भी यही चाहता था कि राजनीति हिन्दू-मुस्लिम के बीच (दूसरे शब्दों में फिरकापरस्त ताकतों के बीच) में विभाजित हो जाये, ताकि सपा को लाभ मिले? इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि लोकसभा के नतीजों के बाद सपा हाई कमान को मुसलमानों का ही एकमात्र सहारा रह गया है, हिन्दू वोट तो उससे अलग हो ही गया है, उसका अपना पिछड़ा वोट भी खिसक गया है.
आज सपा और भाजपा भले ही कांठ के संघर्ष में अपने राजनीतिक फायदे देख रही हों, पर यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है कि मुरादाबाद में फिरकापरस्त ताकतें फिर से जिंदा हो रही हैं.
(5 जुलाई 2014)
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 वस्तुतः 'शिव धनुष' वह मिसाईल था जो कि धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर आधारित था और इसीलिए कोई भी उसे बिना चुम्बकीय चाबी (मेग्नेटिक रिंग) के हिला तक नहीं सकता था जिसे ऋषियों ने सिर्फ सीता को ही सौंपा था और उसे सीता ने 'पुष्प वाटिका' में राम को हस्तांतरित कर दिया था जिसके जरिये राम ने उस शिव-धनुष अर्थात मेग्नेटिक मिसाईल को उठा कर डिफ्यूज - निष्क्रिय कर दिया था। ढ़ोंगी-पाखंडी-पोंगापंथियों ने विदेशी शासकों को खुश करने के लिए सीता द्वारा झाड़ू लगाने की मनगढ़ंत बात लिख दी तो क्या हमें मान लेना चाहिए कि एक राजकुमारी झाड़ू लगाती थी? हम 'मनुष्य ' हैं अतः 'मनन' द्वारा हमें सच्चाई ज्ञात करके सबको बताना ही चाहिए। लेकिन हो क्या रहा है:
04 Dec. 2014 :


'शास्त्रों' से यदि अभिप्राय 'पुराणों ' से है तो वे शोषकों/उतपीडकों के हित मे सत्ताधीशों द्वारा विद्वानों को खरीद कर लिखवाये गए हैं अतः उन में जन-विरोधी बातें होना स्वभाविक है। उन पर विश्वास करना घातक है। साम्राज्यवाद हितैषी सांप्रदायिकता पर इस तरीके से फतह नहीं हासिल हो पाएगी। उसके लिए विषद विवेचन व अध्यन का आश्रय लेकर ही मुक़ाबला किया जा सकता है 'हास्य तीरों' से नहीं। ढोंगवाद से जनता को 'मुक्त' करने के लिए जनता को समझाना होगा कि लुटेरे पोंगा-पंडित जनता को गुमराह कर रहे हैं और जनता को 'रामायण पाठ',भागवत पाठ,देवी जागरण आदि में भाग न लेने के लिए तैयार करना होगा जिसके लिए वैज्ञानिक व्याख्या समझाना होगा । 'व्यंग्य' का सहारा लेकर  अथवा विवेक हीन  विरोध कर आप जनता को अपने पीछे लामबंद नहीं कर सकते।

'एकला चलो रे' के सिद्धान्त पर मैंने पूर्व लेखों द्वारा वैज्ञानिक विश्लेषण उपलब्ध कराये हैं जिनको विद्वजन इसलिए नहीं स्वीकार कर सकते क्योंकि मैं कोई मशहूर हस्ती नहीं हूँ।  

Monday, August 20, 2012

वैज्ञानिक परम्पराएँ-वेद और हवन

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  ~विजय राजबली माथुर ©
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