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Friday, March 13, 2015

‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ मूवमेंट भारत में राजनैतिक अस्थिरता के लिए खड़ा हुआ

प्रस्तुत लेख आ आ पा और कांग्रेस में मिलीभगत को इंगित करता है। 2011 से ही अपने ब्लाग http://krantiswar.blogspot.in/ के माध्यम से स्पष्ट करता रहा हूँ कि हज़ारे/केजरीवाल/रामदेव के कारपोरेट भ्रष्टाचार संरक्षण आंदोलन को कांग्रेस के मनमोहन सिंह गुट/RSS का समान समर्थन रहा है। जब मनमोहन जी को तीसरी बार पी एम बनाने का आश्वासन नहीं मिला तो मोदी को पी एम बनवा दिया गया है और मोदी के विकल्प के रूप में केजरीवाल को तैयार किया जा रहा है। RSS के कांग्रेस मुक्त भारत की परिकल्पना को अमेरिका प्रवास के दौरान जस्टिस काटजू साहब बखूबी संवार रहे हैं महात्मा गांधी,नेताजी सुभाष और जिन्नाह साहब के विरुद्ध विष-वमन करके। मनमोहन जी के विकल्प के रूप में मोदी व मोदी के विकल्प के रूप में केजरीवाल की ताजपोशी की रूप रेखा व्हाईट हाउस में बराक ओबामा के निर्देश पर तैयार की गई थी और निर्वाचन प्राणाली की खामियों तथा ई वी एम के करिश्मे के जरिये उस पर जनता की मोहर लगवा ली गई है। परंतु साम्यवादियों/वामपंथियों का केजरीवाल की परिक्रमा करना आत्मघाती तो है ही बल्कि देश के लिए भी अहितकर है। ---विजय राजबली माथुर
 --------------------------"आआप" की हकीक़त--------------------------------
 अरविंद लंबे अरसे तक राजस्व विभाग से छुटटी लेकर भी सरकारी तनख्वाह ले रहे थे और एनजीओ से भी वेतन उठा रहे थे, जो ‘श्रीमान ईमानदार’ को कानूनन भ्रष्‍टाचारी की श्रेणी में रखता है। वर्ष 2006 में ‘परिवर्तन’ में काम करने के दौरान ही उन्हें अमेरिकी ‘फोर्ड फाउंडेशन’ व ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ ने ‘उभरते नेतृत्व’ के लिए ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार दिया, जबकि उस वक्त तक अरविंद ने ऐसा कोई काम नहीं किया था, जिसे उभरते हुए नेतृत्व का प्रतीक माना जा सके। इसके बाद अरविंद अपने पुराने सहयोगी मनीष सिसोदिया के एनजीओ ‘कबीर’ से जुड़ गए, जिसका गठन इन दोनों ने मिलकर वर्ष 2005 में किया था। अरविंद को समझने से पहले ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ को समझ लीजिए! अमेरिकी नीतियों को पूरी दुनिया में लागू कराने के लिए अमेरिकी खुफिया ब्यूरो ‘सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए)’ अमेरिका की मशहूर कार निर्माता कंपनी ‘फोर्ड’ द्वारा संचालित ‘फोर्ड फाउंडेशन’ एवं कई अन्य फंडिंग एजेंसी के साथ मिलकर काम करती रही है। 1953 में फिलिपिंस की पूरी राजनीति व चुनाव को सीआईए ने अपने कब्जे में ले लिया था। भारतीय अरविंद केजरीवाल की ही तरह सीआईए ने उस वक्त फिलिपिंस में ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ को खड़ा किया था और उन्हें फिलिपिंस का राष्ट्रपति बनवा दिया था। अरविंद केजरीवाल की ही तरह ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ का भी पूर्व का कोई राजनैतिक इतिहास नहीं था। ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ के जरिए फिलिपिंस की राजनीति को पूरी तरह से अपने कब्जे में करने के लिए अमेरिका ने उस जमाने में प्रचार के जरिए उनका राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ‘छवि निर्माण’ से लेकर उन्हें ‘नॉसियोनालिस्टा पार्टी’ का उम्मीदवार बनाने और चुनाव जिताने के लिए करीब 5 मिलियन डॉलर खर्च किया था। तत्कालीन सीआईए प्रमुख एलन डॉउल्स की निगरानी में इस पूरी योजना को उस समय के सीआईए अधिकारी ‘एडवर्ड लैंडस्ले’ ने अंजाम दिया था। इसकी पुष्टि 1972 में एडवर्ड लैंडस्ले द्वारा दिए गए एक साक्षात्कार में हुई। ठीक अरविंद केजरीवाल की ही तरह रेमॉन मेग्सेसाय की ईमानदार छवि को गढ़ा गया और ‘डर्टी ट्रिक्स’ के जरिए विरोधी नेता और फिलिपिंस के तत्कालीन राष्ट्रपति ‘क्वायरिनो’ की छवि धूमिल की गई। यह प्रचारित किया गया कि क्वायरिनो भाषण देने से पहले अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए ड्रग का उपयोग करते हैं। रेमॉन मेग्सेसाय की ‘गढ़ी गई ईमानदार छवि’ और क्वायरिनो की ‘कुप्रचारित पतित छवि’ ने रेमॉन मेग्सेसाय को दो तिहाई बहुमत से जीत दिला दी और अमेरिका अपने मकसद में कामयाब रहा था। भारत में इस समय अरविंद केजरीवाल बनाम अन्य राजनीतिज्ञों की बीच अंतर दर्शाने के लिए छवि गढ़ने का जो प्रचारित खेल चल रहा है वह अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए द्वारा अपनाए गए तरीके और प्रचार से बहुत कुछ मेल खाता है। उन्हीं ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ के नाम पर एशिया में अमेरिकी नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने वालों, वॉलेंटियर तैयार करने वालों, अपने देश की नीतियों को अमेरिकी हित में प्रभावित करने वालों, भ्रष्‍टाचार के नाम पर देश की चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने वालों को ‘फोर्ड फाउंडेशन’ व ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ मिलकर अप्रैल 1957 से ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ अवार्ड प्रदान कर रही है। ‘आम आदमी पार्टी’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल और उनके साथी व ‘आम आदमी पार्टी’ के विधायक मनीष सिसोदिया को भी वही ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार मिला है और सीआईए के लिए फंडिंग करने वाली उसी ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के फंड से उनका एनजीओ ‘कबीर’ और ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ मूवमेंट खड़ा हुआ है। भारत में राजनैतिक अस्थिरता के लिए एनजीओ और मीडिया में विदेशी फंडिंग! ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के एक अधिकारी स्टीवन सॉलनिक के मुताबिक ‘‘कबीर को फोर्ड फाउंडेशन की ओर से वर्ष 2005 में 1 लाख 72 हजार डॉलर एवं वर्ष 2008 में 1 लाख 97 हजार अमेरिकी डॉलर का फंड दिया गया।’’ यही नहीं, ‘कबीर’ को ‘डच दूतावास’ से भी मोटी रकम फंड के रूप में मिली। अमेरिका के साथ मिलकर नीदरलैंड भी अपने दूतावासों के जरिए दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी-यूरोपीय हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए वहां की गैर सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ को जबरदस्त फंडिंग करती है। अंग्रेजी अखबार ‘पॉयनियर’ में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक डच यानी नीदरलैंड दूतावास अपनी ही एक एनजीओ ‘हिवोस’ के जरिए नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को अस्थिर करने में लगे विभिन्‍न भारतीय एनजीओ को अप्रैल 2008 से 2012 के बीच लगभग 13 लाख यूरो, मतलब करीब सवा नौ करोड़ रुपए की फंडिंग कर चुकी है। इसमें एक अरविंद केजरीवाल का एनजीओ भी शामिल है। ‘हिवोस’ को फोर्ड फाउंडेशन भी फंडिंग करती है। डच एनजीओ ‘हिवोस’ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में केवल उन्हीं एनजीओ को फंडिंग करती है,जो अपने देश व वहां के राज्यों में अमेरिका व यूरोप के हित में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की क्षमता को साबित करते हैं। इसके लिए मीडिया हाउस को भी जबरदस्त फंडिंग की जाती है। एशियाई देशों की मीडिया को फंडिंग करने के लिए अमेरिका व यूरोपीय देशों ने ‘पनोस’ नामक संस्था का गठन कर रखा है। दक्षिण एशिया में इस समय ‘पनोस’ के करीब आधा दर्जन कार्यालय काम कर रहे हैं। ‘पनोस’ में भी फोर्ड फाउंडेशन का पैसा आता है। माना जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल के मीडिया उभार के पीछे इसी ‘पनोस’ के जरिए ‘फोर्ड फाउंडेशन’ की फंडिंग काम कर रही है। ‘सीएनएन-आईबीएन’ व ‘आईबीएन-7’ चैनल के प्रधान संपादक राजदीप सरदेसाई ‘पॉपुलेशन काउंसिल’ नामक संस्था के सदस्य हैं, जिसकी फंडिंग अमेरिका की वही ‘रॉकफेलर ब्रदर्स’ करती है जो ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार के लिए ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के साथ मिलकर फंडिंग करती है। माना जा रहा है कि ‘पनोस’ और ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ की फंडिंग का ही यह कमाल है कि राजदीप सरदेसाई का अंग्रेजी चैनल ‘सीएनएन-आईबीएन’ व हिंदी चैनल ‘आईबीएन-7’ न केवल अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ने’ में सबसे आगे रहे हैं, बल्कि 21 दिसंबर 2013 को ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ का पुरस्कार भी उसे प्रदान किया है। ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ के पुरस्कार की प्रयोजक कंपनी ‘जीएमआर’ भ्रष्‍टाचार में में घिरी है। ‘जीएमआर’ के स्वामित्व वाली ‘डायल’ कंपनी ने देश की राजधानी दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विकसित करने के लिए यूपीए सरकार से महज 100 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन हासिल किया है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ‘सीएजी’ ने 17 अगस्त 2012 को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जीएमआर को सस्ते दर पर दी गई जमीन के कारण सरकारी खजाने को 1 लाख 63 हजार करोड़ रुपए का चूना लगा है। इतना ही नहीं, रिश्वत देकर अवैध तरीके से ठेका हासिल करने के कारण ही मालदीव सरकार ने अपने देश में निर्मित हो रहे माले हवाई अड्डा का ठेका जीएमआर से छीन लिया था। सिंगापुर की अदालत ने जीएमआर कंपनी को भ्रष्‍टाचार में शामिल होने का दोषी करार दिया था। तात्पर्य यह है कि अमेरिकी-यूरोपीय फंड, भारतीय मीडिया और यहां यूपीए सरकार के साथ घोटाले में साझीदार कारपोरेट कंपनियों ने मिलकर अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ा’ है, जिसका मकसद आगे पढ़ने पर आपको पता चलेगा। ‘जनलोकपाल आंदोलन’ से ‘आम आदमी पार्टी’ तक का शातिर सफर! आरोप है कि विदेशी पुरस्कार और फंडिंग हासिल करने के बाद अमेरिकी हित में अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया ने इस देश को अस्थिर करने के लिए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ का नारा देते हुए वर्ष 2011 में ‘जनलोकपाल आंदोलन’ की रूप रेखा खिंची। इसके लिए सबसे पहले बाबा रामदेव का उपयोग किया गया, लेकिन रामदेव इन सभी की मंशाओं को थोड़ा-थोड़ा समझ गए थे। स्वामी रामदेव के मना करने पर उनके मंच का उपयोग करते हुए महाराष्ट्र के सीधे-साधे, लेकिन भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध कई मुहीम में सफलता हासिल करने वाले अन्ना हजारे को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली से उत्तर भारत में ‘लॉंच’ कर दिया। अन्ना हजारे को अरिवंद केजरीवाल की मंशा समझने में काफी वक्त लगा, लेकिन तब तक जनलोकपाल आंदोलन के बहाने अरविंद ‘कांग्रेस पार्टी व विदेशी फंडेड मीडिया’ के जरिए देश में प्रमुख चेहरा बन चुके थे। जनलोकपाल आंदोलन के दौरान जो मीडिया अन्ना-अन्ना की गाथा गा रही थी, ‘आम आदमी पार्टी’ के गठन के बाद वही मीडिया अन्ना को असफल साबित करने और अरविंद केजरीवाल के महिमा मंडन में जुट गई। विदेशी फंडिंग तो अंदरूनी जानकारी है, लेकिन उस दौर से लेकर आज तक अरविंद केजरीवाल को प्रमोट करने वाली हर मीडिया संस्थान और पत्रकारों के चेहरे को गौर से देखिए। इनमें से अधिकांश वो हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के द्वारा अंजाम दिए गए 1 लाख 76 हजार करोड़ के 2जी स्पेक्ट्रम, 1 लाख 86 हजार करोड़ के कोल ब्लॉक आवंटन, 70 हजार करोड़ के कॉमनवेल्थ गेम्स और ‘कैश फॉर वोट’ घोटाले में समान रूप से भागीदार हैं। आगे बढ़ते हैं…! अन्ना जब अरविंद और मनीष सिसोदिया के पीछे की विदेशी फंडिंग और उनकी छुपी हुई मंशा से परिचित हुए तो वह अलग हो गए, लेकिन इसी अन्ना के कंधे पर पैर रखकर अरविंद अपनी ‘आम आदमी पार्टी’ खड़ा करने में सफल रहे। जनलोकपाल आंदोलन के पीछे ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के फंड को लेकर जब सवाल उठने लगा तो अरविंद-मनीष के आग्रह व न्यूयॉर्क स्थित अपने मुख्यालय के आदेश पर फोर्ड फाउंडेशन ने अपनी वेबसाइट से ‘कबीर’ व उसकी फंडिंग का पूरा ब्यौरा ही हटा दिया। लेकिन उससे पहले अन्ना आंदोलन के दौरान 31 अगस्त 2011 में ही फोर्ड के प्रतिनिधि स्टीवेन सॉलनिक ने ‘बिजनस स्टैंडर’ अखबार में एक साक्षात्कार दिया था, जिसमें यह कबूल किया था कि फोर्ड फाउंडेशन ने ‘कबीर’ को दो बार में 3 लाख 69 हजार डॉलर की फंडिंग की है। स्टीवेन सॉलनिक के इस साक्षात्कार के कारण यह मामला पूरी तरह से दबने से बच गया और अरविंद का चेहरा कम संख्या में ही सही, लेकिन लोगों के सामने आ गया। सूचना के मुताबिक अमेरिका की एक अन्य संस्था ‘आवाज’ की ओर से भी अरविंद केजरीवाल को जनलोकपाल आंदोलन के लिए फंड उपलब्ध कराया गया था और इसी ‘आवाज’ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए भी अरविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी’ को फंड उपलब्ध कराया। सीरिया, इजिप्ट, लीबिया आदि देश में सरकार को अस्थिर करने के लिए अमेरिका की इसी ‘आवाज’ संस्था ने वहां के एनजीओ, ट्रस्ट व बुद्धिजीवियों को जमकर फंडिंग की थी। इससे इस विवाद को बल मिलता है कि अमेरिका के हित में हर देश की पॉलिसी को प्रभावित करने के लिए अमेरिकी संस्था जिस ‘फंडिंग का खेल’ खेल खेलती आई हैं, भारत में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और ‘आम आदमी पार्टी’ उसी की देन हैं। सुप्रीम कोर्ट के वकील एम.एल.शर्मा ने अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया के एनजीओ व उनकी ‘आम आदमी पार्टी’ में चुनावी चंदे के रूप में आए विदेशी फंडिंग की पूरी जांच के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर रखी है। अदालत ने इसकी जांच का निर्देश दे रखा है, लेकिन केंद्रीय गृहमंत्रालय इसकी जांच कराने के प्रति उदासीनता बरत रही है, जो केंद्र सरकार को संदेह के दायरे में खड़ा करता है। वकील एम.एल.शर्मा कहते हैं कि ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट-2010’ के मुताबिक विदेशी धन पाने के लिए भारत सरकार की अनुमति लेना आवश्यक है। यही नहीं, उस राशि को खर्च करने के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना भी जरूरी है। कोई भी विदेशी देश चुनावी चंदे या फंड के जरिए भारत की संप्रभुता व राजनैतिक गतिविधियों को प्रभावित नहीं कर सके, इसलिए यह कानूनी प्रावधान किया गया था, लेकिन अरविंद केजरीवाल व उनकी टीम ने इसका पूरी तरह से उल्लंघन किया है। बाबा रामदेव के खिलाफ एक ही दिन में 80 से अधिक मुकदमे दर्ज करने वाली कांग्रेस सरकार की उदासीनता दर्शाती है कि अरविंद केजरीवाल को वह अपने राजनैतिक फायदे के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
 साभार :
 https://www.facebook.com/dhruva.n.gupta/posts/10153868256385752 
 ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। 
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Wednesday, February 12, 2014

भ्रष्टाचार के मुद्दे का उपयोग भ्रष्टाचार की जननी पूंजी और पूंजीवादी व्यवस्था के सर्वाधिक प्रतिक्रियावादी स्वरुप को आगे बढ़ाने के लिए किया गया---सर्वहारा समाजवाद जिंदाबाद

अण्णा-केजरीवाल के "जनलोकपाल" का सिद्धांत क्या है? इसका राजनीतिक अर्थशास्त्र क्या है?:






भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कल के सरताज़ श्री अण्णा हज़ारे तो आज भाजपा-कांग्रेस की गोद में बैठे हैं, लेकिन अरबिंद केजरीवाल अभी भी "जनलोकपाल" के झुनझुने से लोगों को झांसा देने में लगे हुए हैं। भ्रष्टाचार से तंग-तबाह आम जन अण्णा-केजरीवाल के "जनलोकपाल" के झांसे में आ जा रहे हैं, यह स्वाभाविक भी है। "जनलोकपाल" का तथाकथित सिद्धांत क्या है? आइए, इस पर थोडा विस्तार से विचार करें।

अण्णा-केजरीवाल के "जनलोकपाल" के पीछे का तथाकथित व्यवस्थाविरोधी और क्रांतिकारी सिद्धांत यह है कि "भ्रष्टाचार ही हमारी सारी समस्याओं की जड़ है और खासकर अविकास और गरीबी का मूल कारण है।" प्रश्न है, क्या यह विचार अण्णा-केजरीवाल का कोई मौलिक विचार है? हम जैसे ही इस पर विचार करते हैं और कुछ खोजबीन करते हैं तो पाते हैं कि "भ्रष्टाचार ही हमारी सारी समस्याओं की जड़ है" वाला यह सिद्धांत नवउदारवाद के प्रादुर्भाव (जन्म) के समय से ही साम्राज्यवादी थिंक टैंकों (जैसे कि वर्ल्ड बैंक आदि) द्वारा लगातार फैलाई जा रही एक मिथ्या धारणा का भारतीय नवसंस्करण मात्र है। साम्राज्यवादी थिंक टैंकों द्वारा लगातार फैलाई जा रही यह मिथ्या धारणा यह है कि "भ्रष्टाचार आम जनता का दुश्मन नंबर एक है।" लेकिन यह पूरी तरह एक मिथ्या धारणा है, जिसे फ़ैलाने में और इस तरह साम्राज्यवादी थिंक-टैंकों को मदद करने के मामले में अण्णा-केजरीवाल की जोड़ी का कोई जवाब नहीं है। हम जानते हैं कि 1991 के बाद से ही, जब से "नयी आर्थिक नीति" और "नव उदारीकरण-भूमंडलीकरण" की हवा चली, राजकीय-सेक्टर को पूरी तरह से तोड़ देने, पूर्ण निजीकरण-बाज़ारीकरण को आगे बढ़ाने, कृषि, उद्योग और शिक्षा-स्वास्थ्य-बिजली-पानी-सड़क जैसी सामाजिक जरूरतों में निवेश से सरकार द्वारा अपने हाथ पूरी तरह खींच लेने और सभी चीज़ों को पूरी तरह बाज़ार की अंधी और बेरहम शक्तियों के हवाले कर देने की साजिशों को सरंजाम तक पहुंचाने के लिए "राज्य व सरकार के हस्तक्षेप", और "सरकारी उद्यमों व परियोजनाओं" पर भ्रष्टाचार और अक्षमता के हवाले से अँधाधुंध हमले शुरू किये गए। घोषणा की गयी कि सरकारी कार्यालय के भ्रष्टाचार और अक्षमता के कारन ही अविकास और गरीबी बनी हुई है और फैली है। एक सच को (कि सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार है) को एक बहुत बड़े झूठ को आगे बढाने, खुले और नग्न पूंजीवादी लूट पर आधारित और साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण से प्रेरित नवउदारवाद-बाज़ारवाद-उपभोक्तावाद की मज़बूती से नींव रखने के लिए जनमानस को तैयार करने के काम में लगाया गया। साम्राज्यवादी एजेंटों - एनजीओवादियों और छद्म पूंजीवादी-उदारवादी सुधारकों की अनगिनत टोलियों को हरवों-हथियार के साथ मैदान में उतारा गया। ज्ञातव्य हो कि यह हमला आज भी बदस्तूर जारी है। ध्यान देने वाली बात है कि "अविकास, गरीबी और भ्रष्टाचार" के इस पूरे विमर्श में पूंजीवाद-साम्राज्यवाद द्वारा किये जा रहे मानवताविरोधी नृशंष अपराध कहीं भी शामिल नहीं हैं, बिलकुल ही नहीं। वर्ल्ड बैंक ने 1991 से लगातार अपने द्वारा प्रस्तुत किये गए वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट में भ्रष्टाचार को सामने रखकर निजी पूंजी और बाज़ार को खुली छूट देने की वकालत की। World Development Report 1991 में इसे सामने रखते हुए एक टोन सेट किया गया, जो अभी तक जारी है और हम पाते हैं कि अण्णा-केजरीवाला की भ्रष्टाचार-विरोधी भाषा और वर्ल्ड बैंक की भ्रष्टाचार-विरोधी भाषा में कोई अंतर नहीं है। वर्ल्ड बैंक की तरह अण्णा-केजरीवाल भी पूंजीवाद के अपराधों पर चुप्पी साध लेते हैं। 

World Development Report 1991 में कहा गया था - "[c]orruption can rarely be reduced unless its large underlying causes are addressed.It flourishes in situations where domestic and international competition is suppressed, rules and regulations are excessive and discretionary, civil servants are underpaid, or
the organization they serve has unclear or conflicting objectives."

हम स्वयं देख सकते हैं कि इस रिपोर्ट में किस टोन (स्वर) में भ्रस्टाचार के विरोध की जरूरत को रेखांकित किया गया था। इसमें खुले तौर पर घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूंजी के खुले निष्कंटक प्रवाह की जरूरत के साथ, 'अतिशय' सरकारी व राजकीय नियंत्रण व नियमन की व्यवस्था को ख़त्म व निरस्त करने की जरूरत के साथ और फिर खुले बाज़ार की शक्तियों के बीच खुली प्रतिस्पर्धा तथा निजीकरण की तथाकथित जरूरत के साथ भ्रष्टाचार विरोध के एजेंडे को जोड़ा गया है, मिलाया गया। भारत में 1991 से लेकर आज तक इसके हुए परिणामो को देखें तो हम पाते हैं कि अक्षरसः यही हुआ और आज भी हो रहा है। इस तरह भ्रष्टाचार के मुद्दे का उपयोग भ्रष्टाचार की जननी पूंजी और पूंजीवादी व्यवस्था के सर्वाधिक प्रतिक्रियावादी स्वरुप को आगे बढ़ाने के लिए किया गया। 
हम पाते हैं कि 1991 के बाद से वर्ल्ड बैंक ने लगातार भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर लोगों का ध्यान पूंजीवाद के अपराधों से हटवाया, ताकि बेरोजगारी, गरीबी, भूख, कुपोषण और बदहाली से जूझती अवाम पूंजीवाद को नहीं अपने-अपने देश की सरकारों को निशाना बनाये। हम इसे क्रमवार दिखाते हैं। 1992 में भी, Governance and Development नाम से पेश अपनी रिपोर्ट में एक बार फिर करप्शन विरोध को मुद्दा बनाया गया और टास्क फाॅर्स बनाया गया। 1995 में जब James Wolfensohn इसके अध्यक्ष बने तो 1996 में उन्होंने खुलेआम करप्शन को "कैंसर" कहा और फिर उसके बाद बैंक की बोर्ड में ही इस विषय पर खुलकर बहस होने लगी। जब 1997-98 में East Asian crisis आया, तो फिर वर्ल्ड बैंक ने बड़ी चालाकी से इसका ठीकरा मुख्य रूप से करप्शन पर ही फोड़ा, जब कि यह संकट स्वयं पूंजीवादी-साम्राज्यवादी नीतियों की उपज था। 
1997 में ही, वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट एक बार फिर आयी, जिसमें एक बार फिर करप्शन को मुख्य मुद्दा बनाया गया। इसी साल वर्ल्ड बैंक ने "Helping Countries to Combat Corruption" नामक एक पेपर को अपनी स्वीकृति देकर इसे एक बार फिर मुद्दा बना दिया। Anti-Corruption Reforms: Challenges, Effects and Limits of World Bank Support में कहा गया है - 

"The OECD and the United Nations have also developed separate anti-corruption programs to assist governments in tackling the problem.3 Several bilateral development agencies have followed and placed anti-corruption high on their development agendas, including DFID, Norad, Sida, and the USAID.4 Improving governance and reducing corruption are today considered essential to helping poor people to escape poverty and countries to achieve the Millennium Development Goals (MDGs). This is an important change in focus of aid policy, but it remains to be seen whether it is possible for donors to find workable policy instruments to fight corruption."

इस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ जोर-जोर की जा रही चीख पुकार में भ्रष्टाचार की जननी पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को आम जनता के गुस्से से बचा लेने की छटपटाहट स्पष्ट देखी जा सकती है। हमलोग "जनलोकपाल" की मांग को मनवाने के लिए हुए संघर्ष व आंदोलन के दौरान अण्णा-केजरीवाल के शब्दों पर गौर करें तो ऐसा लगेगा मानो यह अरबिंद केजरीवाल नहीं वर्ल्ड बैंक ग्रुप का चेयरमैन Jim Yong Kim बोल रहा है, जिसने 13 दिसंबर को former World Bank President James D. Wolfensohn, former Chairman of the US Federal Reserve Paul Volcker, Chair of Transparency InternationalHuguette Labelle, and Secretary of Finance for the Philippines Cesar V. Purisima के समक्ष एक मीटिंग में यह कहा -

"the World Bank Group is more committed than ever to continue the fight against corruption -- and that will be a critical part of our work to end extreme poverty and to boost shared prosperity,” 
ऐसा लगता है, मानो यह वर्ल्ड बॅंक ग्रूप का अध्यक्ष किम नहीं, हमारा केजरीवाल बोल रहा है! केजरीवाल को क्या यह कहते हुए नहीं सुनते हैं कि वे भ्रस्टाचार को खत्म कर के गरीबी मिटा देंगे?और क्या यह महज़ यह संजोग है कि केजरीवाल-अण्णा - किम इन तीनों में से कोई भी मानवहन्ता पूंजीवाद के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलता है ?

https://www.facebook.com/sarwaharasamajwad/posts/786299681399620

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अजय सिन्हा साहब का प्रस्तुत लेख अन्ना हज़ारे/केजरीवाल की पोल खोलने वाला है लेकिन उनका यह मानना कि हज़ारे भाजपा के साथ और केजरीवाल उनसे अब अलग हैं पर्याप्त नहीं है। हज़ारे/केजरीवाल आज भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और दोनों की डोर RSS से बंधी हुई है। उपरोक्त समाचार में हज़ारे के बयान से भी इसकी पुष्टि हो जाती है बल्कि इनके पीछे वर्तमान पी एम साहब का ज़बरदस्त वरद हस्त है इसे भी ध्यान रखा जाना चाहिए। हज़ारे/केजरीवाल का भ्रष्टाचार आंदोलन RSS/मनमोहन की मिलीभगत का अंजाम था । मनमोहन और मोदी की अलोकप्रियता के मद्देनजर केजरीवाल को उभारा गया है और सारा नाटक देश की साधारण जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने हेतु खेला जा रहा है। 


~विजय राजबली माथुर ©
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  ~विजय राजबली माथुर ©
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