Sunday, July 31, 2011

मुंशी प्रेमचंद -जयंती पर स्मरण ------ विजय राजबली माथुर



लमही (वाराणासी)मे 31 जूलाई 1880 को जन्मे स्व.धनपत राय श्रीवास्तव जो प्रारम्भ मे धनपत राय के नाम से उर्दू मे लिखा करते थे ;मुंशी प्रेमचंद के नाम से हिन्दी साहित्य मे अमर कथाकार हैं । स्व .अमृत राय और स्व .धरम वीर भारती (धर्मयुग के सम्पादक भी रहे) नामक उनके दो पुत्रों ने भी हिन्दी साहित्य मे अपना अमिट स्थान बनाया है । प्रेमचंद जी ने 'सेवा सदन','रंग भूमि','गोदान','गबन'आदि कई उपन्यास और सैंकड़ों कहानियाँ लिखी हैं । आपकी रचनाओं मे भारत के दरिद्र किसानों का सजीव चित्रण किया गया है । भाषा आपकी सरल और प्रवाह बद्ध है ।

1969 -71 मे बी .ए.के कोर्स मे गबन उपन्यास मेरठ कालेज ,मेरठ मे पढ़ा था । स्वाधीनता आंदोलन मे आमजन की भागीदारी का बड़ा ही मर्मांतक विवेचन प्रेम चंद जी ने इसमे प्रस्तुत किया है । शुरुआत  मे 'जालपा' नामक बच्ची के गहनों के प्रति लगाव से उपन्यास चला है और उसके इसी लगाव के कारण  बाद मे उसके पति को फरार होकर कलकत्ता जाना तथा पुलिस के चंगुल मे फंस कर क्रांतिकारियों के विरुद्ध गवाही देना पड़ा है । परंतु जालपा ने अपने पति रमानाथ के पथ-भ्रष्ट होने पर उसकी आँखें खोलने के लिए उसकी गवाही पर फांसी की सजा प्राप्त दिनेश की वृदधा माँ,पत्नी,बच्चों की खूब सेवाकी और उसे घेरने हेतु लगाई गई वेश्या  'ज़ोहरा' का भी हृदय परिवर्तन कर दिया । अन्ततः जालपा का त्याग और मेहनत रंग लायी एवं दिनेश तथा रमानाथ दोनों ही बरी हो गए । प्रेमचंद जी ने सफाई पक्ष के वकील की जुबानी 'गबन ' मे जो चित्रण किया है ,उसका अवलोकन करें -

"फिर रमानाथ के पुलिस के पंजे मे फँसने,फर्जी मुखबिर बनने और शहादत देने का जिक्र करके उसने कहा-

अब रमानाथ के जीवन मे एक नया परिवर्तन होता है ,ऐसा परिवर्तन जो एक विलासप्रिय,पद लोलुप युवक को धर्मनिष्ठ और कर्तव्यशील बना देता है । उसकी पत्नी जालपा,जिसे देवी कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी,उसकी तलाश मे प्रयाग से यहाँ आती है और यहाँ जब उसे मालूम होता है कि रमा एक मुकदमे मे पुलिस का मुखबिर हो गया है,तो वह छिप कर उससे मिलने आती है । फाटक पर संतरी पहरा दे रहा है । जालपा को पति से मिलने मे सफलता नही होती । तब वह एक पत्र लिख कर उसके सामने फेंक देती है और देवीदीन  के घर चली जाती है । रमा यह पत्र पढ़ता है और उसकी आँखों के सामने से पर्दा हट जाता है । वह छिप कर जालपा के पास आता है । जालपा उससे सारा वृतांत कह सुनाती है और उससे अपना बयान वापस लेने पर ज़ोर देती है । रमा पहले शंकाएँ करता है,पर बाद को राजी हो जाता है और बंगले पर लौट आता है । वहाँ वह पुलिस अफसरों से साफ कह देता है,कि मैं अपना बयान बादल दूंगा । .............................

........ फिर जालपा देवी ने फांसी की सजा पाने वाले मुलजिम दिनेश के बाल-बच्चों का पालन-पोषण करने का निश्चय किया । इधर-उधर से चन्दे मांग-मांग कर वह उनके लिए जिंदगी की जरूरतें पूरी करती थी ,उसके घर का काम-काज अपने हाथों करती थी,उसके बच्चों को खेलाने को ले जाती थी ।

एक दिन रमानाथ मोटर पर सैर करता हुआ जालपा को सिर पर एक पानी का मटका रखे देख लेता है । उसकी आत्म-मर्यादा जाग उठती है । ज़ोहरा को  पुलिस कर्मचारियों ने रमानाथ के मनोरन्जन के लिए नियुक्त कर दिया है । ज़ोहरा युवक की मानसिक वेदना देख कर द्रवित हो जाती है और वह जालपा का पूरा समाचार लाने के इरादे से चलती है । दिनेश के घर उसकी जालपा से भेंट होती है । जालपा का त्याग,सेवा और साधना देख कर इस  वेश्या का हृदय इतना प्रभावित हो जाता है ,कि वह अपने जीवन पर लज्जित हो जाती है और दोनों मे बहनापा हो जाता है । वह एक सप्ताह के बाद जाकर रमा से सारा वृतांत कह सुनाती है । वह उसी वक्त वहाँ से चल पड़ता है और जालपा से दो-चार बातें करके जज के बंगले पर चला जाता है । "

प्रेमचंद जी ने रमानाथ के बीच मे पुलिस के दबाव मे आने और लज्जा वश सकुचाने का वर्णन इस प्रकार किया है जो गौर फरमाने लायक है-

"इस लज्जा का सामना करने की उसमे सामर्थ्य न थी । लज्जा ने सदैव वीरों को परास्त किया है । जो काल से भी नहीं डरते ,वे भी लज्जा के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं करते । आग मे कूद जाना,तलवार के सामने खड़ा हो जाना,इसकी अपेक्षा कहीं सहज है । लाज की रक्षा ही के लिए बड़े-बड़े राज्य मिट गए हैं,रक्त की नदियां बह गई हैं,प्राणों की होली खेल डाली गई है । इसी लाज ने आज रमा के पग भी पीछे हटा दिये । शायद जेल की सजा से वह इतना भयभीत न होता । "

यह आजादी के संघर्ष का जमाना है जिसका वर्णन प्रेमचंद जी ने किया है आज आजादी के 64 वर्ष होते -होते शर्म-ओ-हया हवा हो गई हैं । आज बेशर्मी का नग्न नृत्य चल रहा है । आज प्रेमचंद जी की आत्मा को बेहद कष्ट हो रहा होगा । 'गबन' मे उन्होने जज से भी कहलाया है -

"मुआमला केवल यह है ,कि एक युवक ने अपनी प्राण -रक्षा के लिए पुलिस का आश्रय लिया और जब उसे मालूम हो गया कि जिस भय से वह पुलिसका आश्रय ले रहा है वह सर्वथा निर्मूल है,तो उसने अपना बयान वापस ले लिया । ............... वह उन पेशेवर गवाहों मे नहीं है जो स्वार्थ के लिए निरपराधियों को फँसाने से भी नहीं हिचकते । अगर ऐसी बात न होती तो ,वह अपनी पत्नी के आग्रह से बयान बदलने पर कभी राजी न होता । यह ठीक है कि पहली अदालत के बाद ही उसे मालूम हो गया था,कि उस पर गबन का कोई मुकदमा नहीं है और जज की अदालत मे वह अपने बयान को वापस ले सकता था । उस वक्त उसने यह इच्छा प्रकट भी अवश्य की;पर पुलिस की धमकियों ने फिर उस पर विजय पायी । पुलिस का बदनामी से बचने के लिए इस अवसर पर उसे धमकियाँ देना स्वभाविक है ,क्योंकि पुलिस को मुलजिमों के अपराधी होने के विषय मे कोई संदेह न था । रमानाथ धमकियों मे आ गया,यह उसकी दुर्बलता अवश्य है;पर परिस्थिति को देखते हुये क्षम्यहै । इसलिए मैं रमानाथ को बारी करता हूँ"।

'गबन'उपन्यास के माध्यम से प्रेमचंद जी ने उस समय देशवासियों को आजादी के आंदोलन मे भाग लेने के लिए प्रेरित किया था । जालपा द्वारा हृदय परिवर्तन हेतु गांधीवादी दृष्टिकोण को अपनाया है । परंतु मौलिक रूप से प्रेमचंद जी बामपंथी रुझान वाले प्रगतिशील सर्जक थे । 1935 ई .मे जब लंदन के युवा भारतीय संस्कृति कर्मियों द्वारा प्रगतिशील लेखक संघ स्थापित करने के उद्देश्य से एक मसौदा तैयार हुआ तो "हंस" की ओर से प्रेमचंद जी ने समर्थन किया था ।

लखनऊ के रफा -ए-आम हाल मे जब 10 अप्रैल 1936 को 'प्रगतिशील लेखक संघ ' की स्थापना हुयी तो प्रेमचंद जी ने उसकी अध्यक्षता की थी जिसमे सज्जाद जहीर साहब (नादिरा बब्बर के पिताजी) महामंत्री चुने गए थे । प्रेमचंद जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण मे कहा था-"हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा,जिसमें उच्च चिंतन हो ,स्वाधीनता का भाव हो,सौंदर्य का सार हो,सृजन की आत्मा हो,जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो -जो हमे गति,संघर्ष और बेचैनी पैदा करे सुलाये नहीं क्यों अब और सोना मृत्यु का लक्षण है"। 

मैंने केवल 'गबन'से कुछ उद्धरण दिये हैं सारा  का सारा प्रेमचंद साहित्य देश-प्रेम और आजादी के संघर्ष को धार देता हुआ है । 'नशा'कहानी मे भी उन्होने एक छात्र के माध्यम से गांधी जी के आंदोलन का समर्थन किया है । 'बौड़म ' कहानी मे उन्होने सांप्रदायिक सौहर्द के साथ-साथ स्वाधीनता संघर्ष की हिमायत की है एवं उसी प्रकार 'कर्तव्य बल' कहानी मे भी । 'पंचपरमेश्वर' सामाजिक सम्बन्धों और न्याय की कहानी है ।

आज जो उपन्यास अथवा कहानियाँ लोकप्रिय हो रहे हैं वे सब प्रेमचंद जी की सोच के विपरीत हैं। ब्लाग जगत का लेखन भी लगभग उस धारणा के विपरीत है । जो ब्लागर्स वैसा दृष्टिकोण अपना रहे हैं उन्हें आलोचना का शिकार बनाया जा रहा है । साहित्य क्या है?और कैसा होना चाहिए ?इस संबंध मे भी प्रेमचंद जी की अध्यक्षता वाले प्र.ले .स .ने अपने घोषणा पत्र मे बताया था -

"भारतीय समाज मे बड़े-बड़े परिवर्तन हो रहे हैं । पुराने विचारों और विश्वासों की जड़ें हिलती जा रही हैं और एक नए समाज का जन्म हो रहा है । भारतीय लेखकों का धर्म है कि वे भारतीय जीवन मे पैदा होने वाली 'क्रान्ति' को शब्द और रूप दें और राष्ट्र को उन्नति के मार्ग पर चलाने मे सहायक हों"। 

प्रेमचंद जी तो 08 अक्तूबर 1936 को यह दुनिया छोड़ गए । उनके अवसान को भी 75 वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं । उनके विचार आज भी देश,समाज ,परिवार और विश्व के सभी आबाल-वृद्ध,नर-नारी के लिए अनुकरणीय एवं ग्राह्य हैं ।
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Wednesday, July 27, 2011

'जन-हित में'

यों तो पहले से ही 'क्रान्तिस्वर' एवं 'विद्रोही स्व-स्वर में' लिखने का उद्देश्य "सर्वजन-हिताय ,स्वान्तः सुखाय" रहा है और 'कलम और कुदाल' पर पूर्व प्रकाशित लेख या सार्वजनिक हित के अन्य लोगों के विचार देता रहा हूँ फिर एक अलग ब्लॉग के माध्यम की क्या जरूरत आ पडी ,यह कौतूहल सब को हो सकता है. वस्तुतः काफी समय से मेरा विचार जन-हितकारी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित ऋषि-मुनियों द्वारा रचित स्तुतियाँ एवं प्रार्थनाएं ब्लॉग पर सार्वजानिक करने का था. विलम्ब इसलिए हुआ कि,'गर्व से ...',आर.एस.एस.ब्लागर्स ने अभद्र रूप से मेरे लेखों की आलोचना की तो इस सुविधा का लाभ वे भी क्यों उठायें?लेकिन व्यक्तिगत रूप से तीन ऐसे  ब्लागर्स भी  स्वास्थ्य संबंधी स्तुति हासिल कर चुके  हैं और उसके बाद उन्होंने एहसान फरामोशी की है. यदि मैं इन स्तुतियों को सार्वजनिक रूप से दे देता हूँ तो अन्य अनेक ब्लागर्स लाभ उठा सकते हैं और अपने परिचितों को भी लाभ दिला सकते हैं. कबीर दास जी का कथन है-

काल्ह करे सो आज कर ,आज करे सो अब.        
पल में परलय  होयगी ,बहुरी करेगो  कब?

जब एक बार विचार बना लिया तो उस पर अमल करना ही उचित है. हालांकि हमारे बहन-बहनोई इस बात के खिलाफ हैं कि मैं सब के भले की सोचता हूँ. उनके अनुसार मेरे भले की कौन सोचता है?उनकी ही बात पर ध्यान दें तो सबसे पहले वे लोग खुद  ही उस श्रेणी में आते हैं.उन्हें तमाम स्तुतियाँ प्रिंट करा कर दे दीं हैं और पहले भी लिख कर दे चुके हैं.भांजियों (उनकी बेटियों को भी स्तुतियाँ दी हैं), हमारे तमाम विरोधियों और हमसे  शत्रुवत व्यवहार  करने वालों के प्रति उनका न केवल झुकाव है बल्कि घनिष्ठ एवं मधुर सम्बन्ध भी हैं.हमारी संस्कृति में -'सर्वे भवन्तु सुखिनः ' का अधिक महत्व रहा है.हमारे नाना जी और पिताजी ने तमाम लोगों को बगैर किसी लाभ की उम्मीद किये मदद की है,हमारे बाबाजी भी गाँव में लोगों को अपने पास से बायोकेमिक दवाएं देते थे.पूनम के माता जी -पिताजी भी लोगों की निस्वार्थ मदद करते रहे हैं अतः उन्हें भी कोई ऐतराज नहीं है और यशवन्त तो फाईनल फिनिशिंग करता ही है ,उसे भी मदद करने का शौक है. उसी परम्परा को जारी रखते हुए इस नये ब्लॉग के माध्यम से आज से मैं स्तुतियों को सार्वजानिक करना शुरू कर रहा हूँ. 'इदं न मम' ये मेरा नहीं है मैं तो अर्जित ज्ञान को कंजूस का धन नहीं बनाना चाहता इसलिए सब के भले के लिए उजागर कर रहा हूँ .जो न लेना चाहें लाभ न लें यह उनके विवेक और इच्छा पर है. 

परन्तु जो इनसे लाभ उठाना चाहें वे कुछ बातों को ध्यान रखें कि यह कोई पूजा-पाठ नहीं है. किसी आडम्बर या वितंड की जरूरत नहीं है. धुप-दीप,जल,किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है,केवल औषद्धि के रूप में इसका प्रयोग करें.यह भी ध्यान रखें वाचन के समय मुख पश्चिम की और रहे तथा अपने खुद के और धरती के बीच कोई इन्सुलेशन अवश्य   रहे.अर्थात लकड़ी के पट्टे,ऊनी वस्त्र या पोलीथिन शीट पर बैठें.ऐसा न करके नंगे पाँव या सीधी धरती पर बैठने से ऊर्जा-एनर्जी 'अर्थ'हो जायेगी और कोई लाभ नहीं प्राप्त होगा उससे अच्छा है कि करें ही नहीं.

किसी के भी बहकावे में किसी भी दशा में स्तुति पाठ के समय कोई भी मूर्ती या चित्र कभी भी न रखें ,यदि आपने ढोंग से जोड़ा और परिणाम शून्य रहा तो स्तुति या प्रस्तुतकर्ता का कोई दोष न होगा आप खुद ब खुद जिम्मेदार होंगें..

आज प्रथम दिवस 'गणेश -स्तुति 'से ही शुरुआत कर रहे हैं.'गणेश'=ज्ञान और मोक्ष का नियंता 'गणेश' है .कहावत है कि चिता मरनेके बाद जलाती है और  चिंता जीते जी जलाती है.तो आज 'चिंता और रोग' के निवारणार्थ यह 'गणेश' स्तुति प्रस्तुत है।
(http://janhitme-vijai-mathur.blogspot.com/2011/07/blog-post.html)

Monday, July 25, 2011

ऋतु अनुकूल मेह बरसे दुखप्रद दुष्काल न आवे

वृक्ष रूप में बच्चों ने चेन्ने के एक स्कूल में बैठ कर हमको वृक्षों एवं पर्यावरण की रक्षा का अनुपम सन्देश दिया है;देखें २९ जून २०११ के हिंदुस्तान,लखनऊ-पृष्ठ १७  पर  प्रकाशित इस तस्वीर की स्कैन कापी- 




"येभ्यो माता ................................................................आदित्यां अनुमदा स्वस्तये " (ऋग्वेद मंडल १० /सूक्त ६३ में वर्णित इस मन्त्र के भवानी दयाल सन्यासी जी द्वारा किये काव्यानुवाद की प्रथम पंक्ति को इस लेख का शीर्षक बनाया गया है-

ऋतू अनुकूल मेंह बरसे दुखप्रद दुष्काल न आवे.
सुजला सुफला मातृ भूमि हो,मधुमय क्षीर पिलावे..

आज से १० लाख वर्ष पूर्व जब मानव की इस पृथ्वी पर सृष्टि हुई तो रचयिता (परमात्मा)ने इस प्रथ्वी का उपभोग करने हेतु मानव के लिए कुछ नियमों का निरूपण किया .पूर्व सृष्टि में मोक्ष-प्राप्त आत्माओं को इस धरती पर ऋषियों के रूप में भेज कर उनसे इन वेदों का उपदेश दिलाया गया है.जिस प्रकार किसी भी संगठन अथवा संस्था के निर्माण से पूर्व बाई-लाज या विधान बनाया जाता है उसी प्रकार  इस सृष्टि में निर्वहन हेतु वेदोक्त उपदेश हैं.अपने अहंकार,अज्ञान और विदेशी भटकाव से ग्रस्त विद्वान वेदों के महत्व को नकार कर उनकी आलोचना करते हैं या कुछ उनकी गलत व्याख्या प्रस्तुत करते हैं जिसका परिणाम हम सब के समक्ष अपने वीभत्स रूप में मुंह बाये खड़ा है.

चेन्ने के स्कूली बच्चों द्वारा वृक्षों के महत्व को समझाने का प्रयास स्तुत्य एवं अनुकरणीय है.इस प्रकृति में पदार्थ तीन अवस्थाओं में हमें मिलते हैं जिनका परस्पर रूपांतरण होता रहता है और वे कभी नष्ट नहीं होते हैं.परन्तु मानव ने प्रकृति-नियमों की अवहेलना करके इन पदार्थों का कृत्रिम रूपांतरण कर दिया है जो मानव के अस्तित्व के लिए ही संकट का हेतु बन गया है.आज प्रथ्वी पर वृक्ष आदि वनस्पतियों का अंधाधुंध दोहन होने के  कारण अकाल पड़ता जा रहा है और कार्बन गैसें मात्रा में बढ़ कर प्रथ्वी का तापमान बढाती जा रही हैं.पर्वतों पर ग्लेशियरों के पिघलने का खतरा उत्पन्न हो गया है ,यदि ऐसा हुआ तो समुद्र में जल बढ़ कर काफी आबादी का सफाया कर देगा और शेष मनुष्य जल एवं वर्षा के आभाव में भूख-प्यास से तड़प-तड़प कर असमय मौत के कराल गाल में समाविष्ट होने को बाध्य होंगे.
19 जूलाई 2011 का समपादकीय -
('हिंदुस्तान'-लखनऊ-19/07/2011)

चेन्ने के स्कूली बच्चों,शिक्षकों ,अभिभावकों को धन्यवाद कि,उन्होंने प्रकृति की इस गंभीर समस्या को मानवीय दृष्टिकोण से उठाया है.आज का संकट अपनी वैज्ञानिक -वैदिक संस्कृति को तिलांजली देने (और अवैज्ञानिक-पौराणिक पद्धति को आत्मसात करने )के कारण उत्पन्न हुआ है.प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यग्य-हवन किये जाते थे.अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है. अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.

एक विद्वान की इस प्रार्थना पर थोडा गौर करें -

ईश हमें देते हैं सब कुछ ,हम भी तो कुछ देना सीखें.
जो कुछ हमें मिला है प्रभु से,वितरण उसका करना सीखें..१ ..

हवा प्रकाश हमें मिलता है,मेघों से मिलता है पानी.
यदि बदले में कुछ नहीं देते,इसे कहेंगे बेईमानी..
इसी लिए दुःख भोग रहे हैं,दुःख को दूर भगाना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..२ ..

तपती धरती पर पथिकों को,पेड़ सदा देता है छाया.
अपना फल भी स्वंय न खाकर,जीवन उसने सफल बनाया..
सेवा पहले प्रभु को देकर,बाकी स्वंय बरतना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..३..

मानव जीवन दुर्लभ है हम,इसको मल से रहित बनायें.
खिले फूल खुशबू देते हैं,वैसे ही हम भी बन जाएँ..
जप-तप और सेवा से जीवन,प्रभु को अर्पित करना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..४..

असत नहीं यह प्रभुमय दुनिया,और नहीं है यह दुखदाई.
दिल-दिमाग को सही दिशा दें,तो बन सकती है सुखदाई ..
'जन'को प्रभु देते हैं सब कुछ,लेकिन 'जन'तो बनना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..५..

शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है. दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है.जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है.

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यग्य रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं.

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रातहव्या डे
शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयो :शन्न इन्द्रा पूष्णा वाजसात..

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव -सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं.इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की.

दुर्भाग्य से महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी अन्य विचारकों की भाँती ही गलत उपासना-पद्धतियों (ईसाइयत,इस्लाम और हिन्दू ) को ही धर्म मानते हुए धर्म की कड़ी आलोचना की है ,उन्होंने कहा है-"मैंन  हैज क्रियेटेड द गाड फार हिज मेंटल सिक्योरिटी ओनली".आज भी उनके अनुयाई एक अन्धविश्वासी की भांति इसे ब्रह्म-वाक्य मान कर यथावत चल रहे हैं.जबकि आवश्यकता है उनके कथन को गलत अधर्म के लिए कहा गया मानने की.'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है. 

यदि हम चेन्ने के स्कूली बच्चों द्वारा बताए संदेश पर चल कर अपने वृक्षों और पर्यावरण की रक्षा हेतु आगे बढ़ें तो मानवता की सच्ची सेवाऔर रक्षा दोनों होगी.

Saturday, July 23, 2011

तिलक और आजाद ------ विजय राजबली माथुर

बाल गंगा धर 'तिलक'और पं.चंद्रशेखर आजाद की जयन्ति २३ जूलाई पर श्र्द्धा -सुमन  


बाल गंगा धर 'तिलक 'का जन्म २३ जूलाई १८५६ ई.को रत्नागिरी (महाराष्ट्र)में हुआ था.१८९० में वह कांग्रेस में शामिल हुए.१८९६-९७ में महाराष्ट्र में प्लेग फैला तो उन्होंने राहत कार्यों को सुचारू रूप से संचालित किया.अरविन्द घोष के छोटे भाई बरेंद्र कुमार घोष एवं स्वामी  विवेकानंद(जिन्हें आर.एस.एस.जबरिया अपने बैनर पर घसीटता है) के भाई भूपेन्द्र नाथ दत्त 'युगांतर'तथा 'संध्या'नामक शक्तिशाली समाचार-पत्रों के माध्यम से 'क्रान्ति'का सन्देश फैला रहे थे.बंगाल के अरविन्द घोष और विपिन चन्द्र पाल तथा पूना के लोकमान्य तिलक कांग्रेस में 'बाम-पंथी'(लेफ्ट विंग)के नेता माने जाते थे.बम्बई के फीरोज शाह मेहता और पूना के जी.के.गोखले एवं बंगाल के एस.एन.बनर्जी  दक्षिण -पंथी (राईट विंग)के माने जाते थे.पंजाब के लाला लाजपत राय मध्यम मार्गी नेता थे.१९०६ में दादा भाई नौरोजी के कुशल नेत्रित्व के कारण कांग्रेस ने स्व-राज्य का ध्येय अपना लिया और स्व-देशी के प्रचार का प्रस्ताव भी पास किया.

१९०७ में सूरत अधिवेंशन में लाल-बाल-पाल जैसे कर्मठ नेता कांग्रेस से अलग होकर आजादी की लड़ाई में जुट गए.इन परिस्थितियों में ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार ने उदार कांग्रेसियों,मुस्लिमों जागीरदारों,धनवानों के प्रति नरम रुख रख कर उग्र -दल के नेताओं का निर्मम दमन-चक्र चलाया.

१९०७ में बंगाल के गवर्नर की रेल गाडी पर बम फेंका गया और ढाका के जिलाधीश की हत्या का असफल प्रयास हुआ.१९०८ में कलकत्ता के प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट पर गोली चलाई गयी.इस सम्बन्ध में खुदी राम बोस को फांसी की सजा दी गयी. इन बम कांडों पर १९०८ में 'केसरी' में तिलक ने लिखा था कि,"बम जनता के राजनीतिक तापक्रम का थर्मा मीटर है."एक दुसरे लेख में उन्होंने लिखा-"बंगालियों के बम समाज के लिए राजद्रोहात्मक न थे,वरन उनके मूल में देश-भक्ति की अत्यधिक भावना थी".ऐसे ही लेखों के लिए उन्हें छः वर्षों के लिए 'मांडला'(बर्मा)में कैद करके रखा गया.१९१४ में छूटने  के बाद वह पुनः आजादी के कार्य में जुट गए.

१९१५ में फीरोजशाह मेहता और गोपाल कृष्ण गोखले की मृत्यु हो गई अतः तिलक आदि १९१६ में  पुनः कांग्रेस में लौट आये .तिलक और एनी बेसेंट ने मिल कर १९१६ में 'होम रूल लीग'बना कर स्वदेशी आन्दोलन को और धार दी.१९१६ में लखनऊ में संपन्न हुए कांग्रेस अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने भी संयुक्त रूप से भाग लिया और इसका श्रेय पूरी तौर पर तिलक को है.(यह बेहद गौर करने की बात है जिन तिलक को आर.एस.एस.हिंदूवादी घोषित करते नहीं थकताऔर जनता को गुमराह करता रहता है  वही बाल गंगा धर तिलक मुस्लिम लीग को कांग्रेस के मंच पर लाने और आजादी के लिए संयुक्त संघर्ष हेतु राजी करने में सफल रहे थे,वस्तुतः तिलक बामपंथी -राष्ट्र भक्त थे).

अगस्त १९२० में तिलक का निधन होने से बाम-पंथी आन्दोलन अनाथ हो गया .


चंद्र शेखर आज़ाद 

बाल गंगाधर तिलक के जन्म के ५० वर्ष बाद २३ जूलाई १९०६ को पं.सीता राम तिवारी और माता जगरानी देवी के पुत्र के रूप में क्रांतिकारी चंद्रशेखर 'आजाद ' का जन्म हुआ.इनके पिता मूल रूप से कानपूर जिले के राउत मरा बानपुर के निकट भाँती ग्राम निवासी कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे.यह अपने माता -पिता की पांचवीं एवं अंतिम तथा एकमात्र जीवित संतान थे.इन्होने ईमानदारी तथा स्वाभिमान पिता से सीखा था.

१३ अप्रैल १९१९ को हुए जलियाँ वाला बाग़ नर-संहार ने  इन्हें व्यथित कर दिया था.१९२१ में गांधी जी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने पर इन्हें १५ बेंतों की सजा मिली थी जिसे गांधी जी की जयकारे के साथ इन्होने भुगता.मरहम -पट्टी के लिए इन्हें तीन आने मिले जिन्हें जेलर के ऊपर फेंक कर इन्होने अपने दोस्त डा. से मरहम-पट्टी कराई.

फरवरी १९२२ में चौरी-चौरा के आधार पर गांधी जी के आन्दोलन वापिस लेने पर यह १९२३ में 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी'में सम्मिलित हो गए.क्रांतिकारी कार्यों हेतु धन-संग्रह के उद्देश्य से लखनऊ के 'काकोरी'स्टेशन पर इनके नेत्रित्व में गार्ड के डिब्बे से ०९ अगस्त १९२५ ई.को  सरकारी खजाना हस्तगत कर लिया गया.हालांकि अशफाक उल्ला खान ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि,ऐसा करने पर प्रशासन  उनके दल को जड़ से उखाड़ देगा और उनकी यह भविष्य वाणी सत्य हुई.

१७ तथा १९ दिसंबर १९२७ को राम प्रसाद 'बिस्मिल',अशफाक उल्ला खान ,रोशन सिंह तथा राजेन्द्र लाहिड़ी को फांसी दे दी गई.अब चंद्रशेखर 'आजाद'ने सरदार भगत सिंह के साथ मिल कर दल का पुनर्गठन करके 'सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन' नामकरण कर दिया.पं.जवाहर लाल नेहरू ने 'स्वराज भवन'में आजाद के दल के सदस्यों को रूस में प्रशिक्षण हेतु रु.१०००/-दिए थे जिनमें से बचे हुए रु.४४८/-उनके वस्त्रों से शहादत के समय प्राप्त हुए थे.

भगत सिंह और साथियों द्वारा नेशनल असेम्बली में बम फेंक कर गिरफ्तार होने से वह अकेले पड़ गए थे.इलाहाबाद में ०६ फरवरी १९२७ को मोती लाल नेहरू की शव यात्रा में उन्होंने गुप्त रूप से भाग लिया था और ब्रिटिश पुलिस उन्हें पकड़ न सकी थी.यह छिपते-छिपाते अंग्रेजों के छक्के छुडाते रहे.किन्तु जब साथियों को रूस भेजने की योजना पर विचार करने हेतु सुखदेव से २७ फरवरी १९३१ को अल्फ्रेड पार्क ,इलाहाबाद में वह चर्चा कर रहे थे तो मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने पार्क को चारों और से घेर लिया.अकेले ही पिस्तौल से संघर्ष करते रहे और जब आख़िरी गोली बची तब उसे अपने सीने में उतार कर 'आजाद'ही रहते हुए प्राणोत्सर्ग कर दिया.परन्तु शत्रु ब्रिटिश साम्राज्यवाद उन्हें गुलाम न बना सका.

हिन्दुस्तान,लखनऊ के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित प्रबुद्ध पाठकों के विचारों का अवलोकन करें तो आज के तथा-कथित नेताओं के प्रति वितृष्णा होती है.वस्तुतः ये लोग जन-नेता नहीं हैं बल्कि स्वयंभू नेता हैं और वस्तुतः आधुनिक साम्राज्यवादियों के एजेंट हैं.क्या  इन्हीं की मौज मस्ती के लिए 'तिलक','आजाद' सरीखे जन-नायकों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी.कदापि नहीं उनका ध्येय कोटि-कोटि जनता की आर्थिक और राजनीतिक आजादी था.आज अपने इन दो महान नेताओं के जन्म दिन पर नमन,स्मरण,आदि औपचारिक संबोधनों का परित्याग करते हुए हम सब क्या  यह संकल्प ले सकते हैं कि ,भारत माँ के इन वीर सपूतों की इच्छा को अब साकार करेंगे?

हिंदुस्तान-लखनऊ-22/07/2011 
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Friday, July 22, 2011

दान की भ्रामक दास्तान

हिंदुस्तान,लखनऊ के 18 जूलाई 2011 के पृष्ठ 16 पर मुंबई से एक भ्रामक दास्तान छ्पी है कि,'अमीर और दानवीर होते जा रहे हैं भारतीय'।स्कैन कापी का अवलोकन करें :-




यह आंकलन अपर्ण सेठ और मधुर सिंघल ने 'भारत परोपकार रिपोर्ट 2011'मे 300 अमीरों पर किए सर्वे के आधार पर दिया है।उन्होने यह भी बताया है कि ,74 प्रतिशत दान कारपोरेट क्षेत्र और विदेशी फंड से आता है।यही वह रहस्य है जो इस धोखे के खेल को समझने के लिए काफी है।आय कर की धारा 80 एल आदि के अंतर्गत दान देने वाले को आय कर मे छूट मिल जाती है जिसका लाभ उठाने हेतु दान का यह स्वांग किया जाता है।इस दान का प्रयोग कहाँ होता है जब आप यह जानेंगे तब मानेंगे कि वस्तुतः यह न तो दान है और न ही परोपकार।

कारपोरेट क .पार्कों आदि को गोद लेकर उनका विकास करती हैं जिनमे झूले वगैरह लगाए जाते हैं घूमने का प्रबंध किया जाता है और इंनका  प्रयोग समृद्ध वर्ग ही करता है।वहाँ गरीब और निम्न आय वर्ग के लोगों का प्रवेश संभव ही नहीं है,फिर वह कैसा दान हुआ? विदेशी कारपोरेट क .जो धन देती हैं वह राजनीतिक दृष्टिकोण उनके देश के पक्ष मे करने हेतु व्यय किया जाता है ।जब पी.एल.480 के तहत शराब हेतु सत्व खींचने के बाद गेंहू हमारे देश मे अमेरिका से आता था तो अमेरिकी विदेश मंत्रालय कालेजों के छात्रों को वहाँ की मेगजीन्स आदि मुफ्त मे वितरित करता था जाहिर है यह उनका दान था जो उनकी विचार-धारा फैलाने के काम आता था।

बाबरी आंदोलन के दौरान कार निर्माता क .फोर्ड ने 'फोर्ड फाउंडेशन' के फ़ंड से 'विश्व हिन्दू परिषद'को बेहद दान दिया था जो रथ-यात्राएं,ईंट-पूजन,शस्त्र-खरीद आदि मे व्यय हुआ था और नतीजा इतिहास मे दर्ज है ।इसी प्रकार आज कल 26 प्रतिशत दान देने वाले निजी लोग भी इस दान का व्यवसायिक और राजनीतिक लाभ लेते हैं,आयकर से छूट अलग प्राप्त हो जाती है।क्या यह सब दान है?

पहले हमारे देश मे जब व्यापारी दान देते थे तो वह उस धन से छायादार वृक्ष मार्ग के दोनों ओर लगवाते थे,प्याऊ लगवा कर यात्रियों की क्षुधा शांत करने का प्रबंध करते थे।तालाब खुदवाते थे,बावड़ियों का बंदोबस्त करते थे और इन सब चीजों से आम जनता को प्रत्यक्ष लाभ होता था,राहत मिलती थी।उन चीजों को तो दान की श्रेणी मे माना जा सकता है परंतु आयकर विभाग से छूट प्राप्त  करने हेतु किया गया स्वांग दान नहीं है ।

हाल ही मे आपने पढ़ा कि दान किया खजाना मंदिरों मे छिपा पड़ा है और असंख्य जनता भूख से तड़प -तड़प कर अपनी जान गवां रही है,तमाम लोग अपने बच्चों से बाल-मजदूरी करा रहे हैं उनके पढ़ने का प्रबंध नहीं कर पा रहे हैं ।क्या ऐसा धन दान है?इसका पुण्य दाता को मिलेगा ?कदापि नहीं।वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति को हर वस्तु का दान करना भी नहीं चाहिए अन्यथा हानि ही होती है।एक दो उदाहरण देना चाहूँगा -

एक सेमी इंजीनियर साहब ने अपनी फैक्टरी के मंदिर मे अपनी श्रीमती जी के नाम का पत्थर लगवाने के चक्कर मे रु.1100/-का दान दिया जिसका नतीजा यह हुआ आर्मी स्कूल मे वाईस प्रिंसीपल उनकी श्रीमती जी का लौटते मे कार से एक्सीडेंट हुआ जिसमे सामने से टकराने वाले मोटर साईकिल सवार दंपति की मौत हो गई।भले ही गलती मरने वालों की थी इन लोगों को नौ वर्ष मुकदमे को झेलना और व्यर्थ की परेशाने तथा धन की तबाही का सामना करना पड़ा ।यह कैसा दान हुआ ?पुण्य मिला या दण्ड?लेकिन ठोकर खा कर भी अक्ल मे सुधार नहीं हुआ।

एक ई.ओ.सहाब ने अपने साढू की नकल मे एक देवी मंदिर मे रु .101/-चढ़ाये नतीजा?उनकी माता जी गंभीर बीमार हुयीं तथा परेशानी और अपव्यय का सामना करना पड़ा ।उनके साढू साहब तो अक्सर दान करते ही रहते थे और असमय केंसर से मौत को गले लगा चुके हैं और परेशानी उनके बच्चों एवं पत्नी को है ।

एक ई .ई .साहब पहले गरीबों को भोजन आदि खूब कराते थे उनकी पत्नी भी मांगने वालों को भोजन या सीधा देती रहती थीं । नतीजा उनके साथ लूट-पाट की घटनाएँ होती रहती थीं । अपने आगरा के कार्यकाल मे वह मेरे संपर्क मे आए थे ,मैंने उन्हें तमाम चीजों के दान का निषेद्ध बताया तब से नहीं कर रहे हैं । अब यहाँ लखनऊ मे भी वह मेरे संपर्क मे हैं। गोमती नगर मे अपने मकान का भूमि-पूजन उन्होने कर्मकांडी से नहीं मुझसे ही कराया था।

आगे किसी लेख मे किस व्यक्ति को किस वस्तु का दान नहीं देना चाहिए यह स्पष्ट करने का प्रयास  करूंगा ।