Friday, August 15, 2014

'हों योग-क्षेमकारी ,स्वाधीनता हमारी '---विजय राजबली माथुर



राजनीतिक रूप से 15 अगस्त स्वतन्त्रता दिवस है परंतु कुछ एथीस्टवादी और संघी लोग इसे आज़ादी का दिन नहीं मानते हैं और प्रश्न उठाते हैं कि किसकी स्वतन्त्रता?नरसिंघ राव जी भी पद-मुक्त होने के बाद THE INSIDER में लिख गए हैं कि हम "स्वतन्त्रता के भ्रमजाल में जी रहे हैं। " किसकी स्वतन्त्रता का जवाब प्रस्तुत  इस गीत में है।

यजुर्वेद के अध्याय 22 मन्त्र 22 मे "ओ 3 म आ---------------योगक्षेमों नः कल्पताम। ।" द्वारा स्वाधीनता की रक्षा हेतु 'राष्ट्रीय प्रार्थना' प्रस्तुत की गई है। किन्तु पाश्चात्य साम्राज्यवादी साहित्य एवं दृष्टिकोण के अनुगामी /विककी पीडिया विशेज्ञ हमारे देशीय विचारक मानते हैं कि राष्ट्रीयता की भावना का संचार अंग्रेज़ शासकों की नीतियों से हुआ है और यह आधुनिक धारणा है। मैं नहीं समझ सकता कि  यजुर्वेद के इस मन्त्र मे जो कहा गया है वह गलत कैसे माना जाता है? इस मन्त्र का भावानुवाद विद्वान कवि के अनुसार यह है-


ब्रहमन! सुराष्ट्र मे हों,द्विज ब्रहमतेजधारी।
क्षत्री महारथी हों अरी-दल -विनाशकारी। ।

होवे दुधारी गौवें,पशु अश्व आशुवाही।
आधार राष्ट्र की हों,नारी सुभग सदा ही। ।

बलवान सभ्य योद्धा,यजमान-पुत्र होवे।
इच्छानुसार वर्षे,पर्जन्य ताप धोवे । ।

फल फूल से लदी हो,औषद्ध अमोघ सारी।
हों योग-क्षेमकारी ,स्वाधीनता हमारी। ।

सृष्टि के प्रारम्भ मे ही मनुष्यों को अपने राष्ट्र के प्रति सदा सजग रहने का निर्देश दिया गया था जिसका उल्लंघन करके वेदों की मनगढ़ंत व्याख्या कर्मकांडी लोगों द्वारा खूब की गई और जनता को गुमराह किया गया परिणामस्वरूप हमारा देश 900 -1100 वर्ष से अधिक गुलाम रहा। गुलामी के दौरान सभी विदेशी शासकों ने इस देश की संस्कृति और सभ्यता को नष्ट किया तथा इसमे हमारे देश के स्वार्थी कर्मकांडी लोगों ने भरपूर उन शासकों की मदद  की। आज आजादी के 67  वर्ष व्यतीत होने के बावजूद उन लोगों ने अपने को अभी तक सुधारा नहीं है और देश की स्वाधीनता पर लगातार हो रहे आक्रमणों का यही सबसे बड़ा कारण है।

लोकसभा के महा सचिव रहे सुभाष कश्यप जी के इन विचारों को पढ़ें -



hindustan-lucknow-04/08/2011


एक तो वैसे ही संसद अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर रही है उसके बावजूद फासिस्ट प्रवृति के लोगों का संरक्षण प्राप्त कर तथाकथित समाज सुधारक अन्ना हज़ारे साहब संसद को पंगु करने हेतु अनशन की धमकी का सहारा ले रहे हैं। कारपोरेट घरानों का भरपूर समर्थन लेकर वह भ्रष्टाचार दूर करने का दिवा-स्वप्न दिखा रहे हैं। पूंजीवाद खुद ही भ्रष्टाचार की जड़ है और उसी पर आधारित कर्मकांडी पद्धति उसकी पोषक। इन दोनों का विरोध तो करना नहीं चाहते और भ्रष्टाचार दूर करने का खुद को ठेकेदार घोषित करते हैं। यह तानाशाही नहीं तो और क्या है?अन्ना ,रामदेव तो भ्रष्ट पूंजीवाद को बचाने के इंस्ट्रूमेंट हैं.भ्रष्टाचार तो पूंजीवाद का बाई-प्रोडक्ट है.देखिये 'आह्वान'का यह सम्पादकीय-(बड़ा देखने के लिए चित्र पर डबल  क्लिक करें)







आजाद हिन्द फौज ने 'एक चूहा हाथी का सरदार' शीर्षक से पर्चे छपवाकर तोप मे भर कर ब्रिटिश सेना मे भारतीय जवानों के समक्ष फिंकवाए थे यह बताने के लिए कि हम लोगों की कमजोरी से विदेशी संख्या मे कम होकर भी हम पर हावी हैं। वही स्थिति आज भी है। मुट्ठी भर पूंजीपति अपने विदेशी साम्राज्यवादी आकाओं के हितार्थ देश की बहुसंख्यक आबादी का शोषण कर रहे हैं। बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे दोनों ही घपलों मे फंस कर कोर्ट को चकमा दे रहे हैं और इतनी बड़ी आबादी को गुमराह करके ठग रहे हैं। दोनों के जैकारे लग रहे है। भ्रष्टाचार तो ये दूर कर सकते नहीं परन्तु त्याग और बलिदान से प्राप्त 'स्वाधीनता' को जरूर खतरे मे डाल देंगे।

आजादी के बाद से मिलेटरी शासन की एक तबका वकालत करता आ रहा है ,पाकिस्तान मे इसी प्रकार के शासन ने उस देश के अस्तित्व पर ही खतरा पैदा कर रखा है। भारत को लोकतान्त्रिक देश होने के कारण ही साम्राज्यवादी उस प्रकार दबोच नहीं पाये जिस प्रकार पाकिस्तान की 'संप्रभुता' को ठेंगा दिखा कर नग्न ताण्डव करते रहते हैं। अन्ना-रामदेव को समर्थन देने वाले यह तय कर लें कि क्या अब आजादी को बरकरार नहीं रखना चाहते? 06 अगस्त 2011 के हिंदुस्तान ,लखनऊ के पृष्ठ 14 पर छापे गए इस समाचार को कुछ लोग खुशी से सराहेंगे परंतु मुझे संदेह है कि यह भारत विशेषकर काश्मीर के अंदरूनी मामले मे साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त करने की चाल है। आतंकवाद को क्या पाकिस्तान मे घुस कर ड्रोगन हमले की भांति ही भारत मे घुस कर समाप्त करने का इशारा तो नहीं है यह प्रस्ताव।


hindustan-lucknow-06/08/2011


अमेरिका की चाल अब पाकिस्तान को टुकड़ों मे बाँट कर कमजोर करने की है भारत मे एक तबका इस बात से बेहद खुश होगा। लेकिन गंभीरता से सोचे तो समझ आ जाएगा कि पाकिस्तान के संभावित छोटे-छोटे टुकड़े पूरी तरह अमेरिका के कब्जे मे होंगे जो भारत के लिए किसी भी तरह से हितकर नहीं होगा। जो संगठन ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा हेतु अस्तित्व मे आया था वह आज पूरी तरह से अमेरिकी साम्राज्यवाद का भारत मे हितचिंतक बना हुआ है और धर्म की गलत व्याख्या एवं दुरुपयोग द्वारा जनता को अपने साथ बांध लेता है,उसके द्वारा ऐसे अमेरिकी प्रस्तावों पर खुश होना लाजिमी है ।

अमेरिकी कूटनीतिज्ञ लगातार अन्ना के आंदोलन का समर्थन करती रही हैं। अमेरिका से पूर्ण रूप से समर्थित अन्ना आंदोलन देश की जनता को सही मार्ग पर नहीं चलने देना चाहता है। आजादी के बाद जब तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज  के रूप मे फहरा दिया गया तो भी यूनियन जैक को उतारा नहीं गया था और वह संसद के गुंबद पर कई सप्ताह बाद तक फहराता रहा था। हिंदुस्तान,आगरा,16 अगस्त,2009 अंक मे प्रकाशित सत्येन महापात्र की दिल्ली से भेजी रिपोर्ट मे सप्रमाण इसका उल्लेख किया गया है। आप खुद ही इसकी स्कैन कापी का अध्ययन करें-


खेद और अफसोस की बात है कि जो बामपंथ भारत की एकता और  अखंडता का हामी है उसे जनता धर्म-विरोधी कह कर ठुकरा देती है। धर्म क्या है इसे बामपंथ ने अधार्मिकों के हवाले कर रखा है क्योंकि वह इसे मानता ही नहीं तो जनता को समझाये कैसे?अधार्मिक तत्व इस स्थिति का लाभ उठा कर धर्म की पूंजीवादी व्याख्या अपने हित मे प्रस्तुत कर देते हैं। कुल मिला कर हानि मजदूर और शोषित वर्ग की ही होती है और इजारेदार शोषक वर्ग दानी एवं धार्मिक कहलाकर उसी उत्पीड़ित वर्ग से ही पूजा जाता है। आजादी के आंदोलन मे त्याग और बलिदान का लम्बा अनुभव और इतिहास रखते हुये भी आज बामपंथ का जनता से जुड़ाव न हो पाना इसी धर्म-अधर्म का झंझट है।बामपंथ ने यदि धर्म को अधार्मिक और साम्राज्यवादी/सांप्रदायिक लोगों के लिए खुला न छोड़ा होता और जनता को धर्म का वास्तविक अर्थ समझाया होता तो आज देश की दिशा और दशा  कुछ और ही होती। जन्म से मृत्यु तक जीवन मे अनेक संस्कारों की आवश्यकता होती है जिन्हें मजबूरन पोंगा-पंथियों से ही लोग सम्पन्न कराते हैं और उनके प्रभाव मे आकर गलत दिशा मे वोटिंग कर जाते हैं। यह सब प्रशिक्षण के आभाव का ही दुष्परिणाम है।  आज आजादी के 68 वे सालगिरह को मनाते हुये प्रबुद्ध जनों का परम दायित्व है कि आगे इस आजादी को कैसे बचाए रखा जाये इस बात पर गंभीरता से विचार करें  जबकि पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंघा राव जी  बहुत पहले अपने -'The Insider' मे खुलासा कर गए हैं कि ,"हम स्वतन्त्रता के भ्रम जाल मे जी रहे हैं । "

उच्च वर्ग के लिए आजादी का कोई विशेष महत्व नहीं है। अतः मध्य वर्ग का ही यह दायित्व है कि वह आगे बढ़ कर जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक करे और आजादी पर मंडरा रहे खतरे के प्रति आगाह करे एवं इसकी रक्षा हेतु आवश्यक कदम उठाए।
(मूल रूप से इसी ब्लाग में 15 अगस्त 2011 को यह लेख प्रकाशित हो चुका है जिसका यह पुनर्प्रकाशन है )

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Saturday, August 9, 2014

ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकायाम्:रक्षा बंधन---विजय राज बली माथुर

' ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकायाम् ' यह लिखा है कादम्बरी में सातवीं शताब्दी में आचार्य बाणभट्ट ने.अर्थात  महाश्वेता ने जनेऊ पहन रखा है, तब तक लड़कियों का भी उपनयन होता था.(अब तो सबका उपहास अवैज्ञानिक कह कर उड़ाया जाता है).श्रावणी पूर्णिमा अर्थात रक्षा बंधन पर उपनयन क़े बाद नया विद्यारम्भ होता था.लेकिन कालांतर में पोंगा-पंडितों ने अपने निजी स्वार्थ में इस रक्षा-सूत्र-बंधन  अर्थात जनेऊ धारण करने के पावन-पर्व को राखी बांधने-बँधवाने तथा बहन-भाई के बीच सीमित कर दिया .
 उपनयन अर्थात जनेऊ के लाभों से साधारण जनता को छल पूर्वक वंचित कर दिया गया है.
 उपनयन अर्थात जनेऊ क़े तीन धागे तीन महत्वपूर्ण बातों क़े द्योतक हैं-
१ .-माता,पिता,तथा गुरु का ऋण उतारने  की प्रेरणा.
२ .-अविद्या,अन्याय ,आभाव दूर करने की जीवन में प्रेरणा.
३ .-हार्ट,हार्निया,हाईड्रोसिल (ह्रदय,आंत्र और अंडकोष -गर्भाशय )संबंधी नसों का नियंत्रण ;इसी हेतु कान पर शौच एवं मूत्र विसर्जन क़े वक्त धागों को लपेटने का विधान था.आज क़े तथा कथित पश्चिम समर्थक विज्ञानी इसे ढोंग, टोटका कहते हैं क्या वाकई ठीक कहते हैं?
विश्वास-सत्य द्वारा परखा  गया तथ्य
अविश्वास-सत्य को स्वीकार न  करना
 अंध-विश्वास--विश्वास अथवा अविश्वास पर बिना सोचे कायम रहना
विज्ञान-किसी भी विषय क़े नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्ययन को विज्ञान कहते हैं.
इस प्रकार जो लोग साईंस्दा होने क़े भ्रम में भारतीय वैज्ञानिक तथ्यों को झुठला रहे हैं वे खुद ही घोर अन्धविश्वासी हैं.वे तो प्रयोग शाळा में बीकर आदि में केवल भौतिक पदार्थों क़े सत्यापन को ही विज्ञान मानते हैं.यह संसार स्वंय ही एक प्रयोगशाला है और यहाँ निरन्तर परीक्षाएं चल रहीं हैं.परमात्मा एक निरीक्षक (इन्विजीलेटर)क़े रूप में देखते हुए भी नहीं टोकता,परन्तु एक परीक्षक (एक्जामिनर)क़े रूप में जीवन का मूल्यांकन करके परिणाम देता है.इस तथ्य को विज्ञानी होने का दम्भ भरने वाले नहीं मानते.यही समस्या है.


लगभग सभी बाम-पंथी विद्वान सबसे बड़ी गलती यही करते हैं कि हिन्दू को धर्म मान लेते हैं फिर सीधे-सीधे धर्म की खिलाफत करने लगते हैं। वस्तुतः 'धर्म'=शरीर को धारण करने हेतु जो आवश्यक है जैसे-सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रह,और ब्रह्मचर्य।  इंनका  विरोध करने को आप कह रहे हैं जब आप धर्म का विरोध करते हैं तो। अतः 'धर्म' का विरोध न करके  केवल अधार्मिक और मनसा-वाचा- कर्मणा 'हिंसा देने वाले'=हिंदुओं का ही प्रबल विरोध करना चाहिए।
विदेशी शासकों की चापलूसी मे 'कुरान' की तर्ज पर 'पुराणों' की संरचना करने वाले छली विद्वानों ने 'वैदिक मत'को तोड़-मरोड़ कर तहस-नहस कर डाला है। इनही के प्रेरणा स्त्रोत हैं शंकराचार्य। जबकि वेदों मे 'नर' और 'नारी' की स्थिति समान है। वैदिक काल मे पुरुषों और स्त्रियॉं दोनों का ही यज्ञोपवीत संस्कार होता था। बाणभट्ट ने महाश्वेता द्वारा 'जनेऊ'धरण करने का उल्लेख किया है।  नर और नारी समान थे। पौराणिक हिंदुओं ने नारी-स्त्री-महिला को दोयम दर्जे का नागरिक बना डाला है। अपाला,घोशा,मैत्रेयी,गार्गी आदि अनेकों विदुषी महिलाओं का स्थान वैदिक काल मे पुरुष विद्वानों से  कम न था। अतः वेदों मे नारी की निंदा की बात ढूँढना हिंदुओं के दोषों को ढकना है। वस्तुतः 'हिन्दू' कोई धर्म है ही नही।बौद्धो के विरुद्ध क्रूर हिंसा करने वालों ,उन्हें उजाड़ने वालों,उनके मठों एवं विहारों को जलाने वाले लोगों को 'हिंसा देने' के कारण बौद्धों द्वारा 'हिन्दू' कहा गया था। फिर विदेशी आक्रांताओं ने एक भद्दी तथा गंदी 'गाली' के रूप मे यहाँ के लोगों को 'हिन्दू' कहा।साम्राज्यवादियों के एजेंट खुद को 'गर्व से हिन्दू' कहते हैं। ढोंगवाद धर्म नहीं है---




वेद जाति,संप्रदाय,देश,काल से परे सम्पूर्ण विश्व के समस्त मानवों के कल्याण की बात करते हैं। उदाहरण के रूप मे 'ऋग्वेद' के कुछ मंत्रों को देखें -

'संगच्छ्ध्व्म .....उपासते'=
प्रेम से मिल कर चलें बोलें सभी ज्ञानी बनें।
पूर्वजों की भांति हम कर्तव्य के मानी बनें। ।


'समानी मंत्र : ....... हविषा जुहोमी ' =


हों विचार समान सबके चित्त मन सब एक हों।
ज्ञान पाते हैं बराबर भोग्य पा सब नेक हों। ।


'समानी व आकूति....... सुसाहसती'=


हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा।
मन भरे हों प्रेम से जिससे बढ़े सुख सम्पदा। ।


'सर्वे भवनतु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पशयन्तु मा कश्चिद दुख भाग भवेत। । '=


सबका भला करो भगवान सब पर दया करो भगवान ।
सब पर कृपा करो भगवान ,सब का सब विधि हो कल्याण। ।
हे ईश सब सुखी हों कोई  न हो दुखारी।
सब हों निरोग भगवनधन-धान्यके भण्डारी। ।
सब भद्रभाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों।
दुखिया न कोई होवे सृष्टि मे प्राण धारी। ।  

ऋग्वेद न केवल अखिल विश्व की मानवता की भलाई चाहता है बल्कि समस्त जीवधारियों/प्रांणधारियों के कल्याण की कामना करता है। वेदों मे निहित यह समानता की भावना ही साम्यवाद का मूलाधार है । जब मैक्स मूलर साहब भारत से मूल पांडुलिपियाँ ले गए तो उनके द्वारा किए गए जर्मन भाषा मे अनुवाद के आधार पर महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'दास केपिटल'एवं 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो'की रचना की। महात्मा हेनीमेन ने 'होम्योपैथी' की खोज की और डॉ शुसलर ने 'बायोकेमी' की। होम्योपैथी और बायोकेमी हमारे आयुर्वेद पर आधारित हैं और आयुर्वेद आधारित है 'अथर्ववेद'पर। अथर्ववेद मे मानव मात्र के स्वास्थ्य रक्षा के सूत्र दिये गए हैं फिर इसके द्वारा नारियों की निंदा होने की कल्पना कहाँ से आ गई। निश्चय ही साम्राज्यवादियो के पृष्ठ-पोषक RSS/भाजपा/विहिप आदि के कुसंस्कारों को धर्म मान लेने की गलती का ही यह नतीजा है कि,कम्युनिस्ट और बामपंथी 'धर्म' का विरोध करते हैं । मार्क्स महोदय ने भी वैसी ही गलती यथार्थ को समझने मे कर दी। यथार्थ से हट कर कल्पना लोक मे विचरण करने के कारण कम्युनिस्ट जन-समर्थन प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि शोषक -उत्पीड़क वर्ग और-और शक्तिशाली होता जाता है। 

आज समय की आवश्यकता है कि 'धर्म' को व्यापारियों/उद्योगपतियों के दलालों (तथाकथित धर्माचार्यों)के चंगुल से मुक्त कराकर जनता को वास्तविकता का भान कराया जाये।संत कबीर, दयानंद,विवेकानंद,सरीखे पाखंड-विरोधी भारतीय विद्वानों की व्याख्या के आधार पर वेदों को समझ कर जनता को समझाया जाये तो जनता स्वतः ही साम्यवाद के पक्ष मे आ जाएगी। काश साम्यवादी/बामपंथी विद्वान और नेता समय की नजाकत को पहचान कर कदम उठाएँ तो सफलता उनके कदम चूम लेगी। 

 ~विजय राजबली माथुर ©
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Comment in 'Unify Communists in one Party'group :
 
29-08-2015 ---






Wednesday, July 30, 2014

श्रद्धा और आस्था की बेड़ियों में जकड़े लोग क्या आज़ाद होकर सच को मान सकेंगे?---विजय राजबली माथुर




हरियाली तीज / स्त्रियों की मानसिक दासता का पर्व :

सावन महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरियाली तीज के रुप में मनाया जाता है। यह व्रत अविवाहित कन्याएं योग्य वर पाने की तथा विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की चाहत में करती हैं। देश के पूर्वी इलाकों में इसे कजली तीज के रुप में जाना जाता हैं। सवाल है कि पति की लंबी ज़िन्दगी के लिए हमेशा से सिर्फ स्त्रियां ही क्यों ब्रत करती हैं रही ? पतियों में ऐसे कौन से सुर्खाब के पर लगे होते हैं ? कोई ऐसा व्रत हमारे शास्त्रों और परंपराओं में क्यों नहीं है जो हिन्दू पति अपनी पत्नी की लंबी उम्र के लिए भी करता हो ? पति पर आर्थिक रूप से निर्भर और सामंती माहौल में जीने वाली स्त्रियों की पारिवारिक और सामाजिक हैसियत उनके पतियों के जीवन-काल तक ही हुआ करती है। पतियों को लेकर उनका भय और उनकी असुरक्षा की भावना समझ में आती है। लेकिन आज की शिक्षित और आत्मनिर्भर स्त्रियों ने अगर पुरूष अहंकार को ताक़त देने वाले ऐसे ब्रत-त्योहारों का अबतक वहिष्कार नहीं किया है तो इसका सीधा मतलब है कि स्त्रियों के भीतर पुरूष-दासता की जड़ें बहुत गहरी हैं।

क्या तीज जैसे ब्रत नहीं करने वाले आदिवासी समाजों और दूसरे धर्मों के पतियों की उम्र हिन्दू पतियों की उम्र से कम हुआ करती है ?











ध्रुव गुप्त जी एवं पंकज चतुर्वेदी जी द्वारा उठाए गए प्रश्न प्रासांगिक एवं सामयिक हैं और इन पर गंभीरता से गौर किए जाने की आवश्यकता है।

वस्तुतः आज जितने भी पर्व मनाए जा रहे हैं केवल थोथी आस्था,ढ़ोंगी श्रद्धा एवं दिखावे की होड़ा-हाड़ी के लिए मनाए जा रहे हैं। उनको मनाए जाने की तार्किकता एवं औचित्य पर किसी का भी ध्यान नहीं है। 'बाजारवाद' ने इस सब खुराफात को अपने मुनाफे की खातिर बढ़ाया ही है और खेद की बात है कि तथाकथित 'एथीस्टवादी ' व प्रगतिशील लोग भी सच्चाई को जन-प्रकाश में लाने को तैयार नहीं हैं । वे केवल 'धर्म' को नहीं मानते कह कर अधर्म को बढ़ावा दे देते हैं किन्तु धर्म की सच्ची व्याख्या : सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य   को समझने व बताने के लिए तैयार नहीं हैं जिसका पूरा-पूरा लाभ ढोंगियों,पाखंडियों व आड्मबरकारियों को समाज को सामंती पद्धति पर गुमराह करने हेतु मिलता जाता है। जब तक खुद महिलाएं ही आगे बढ़ कर इस ढोंग व पाखंड का प्रतीकार नहीं करेंगी तब तक समाज का मुक्त होना संभव नहीं है। 

  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Sunday, July 20, 2014

क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त निर्वाण दिवस ( 20 जुलाई 1965 ) ------ विजय राजबली माथुर

 
श्रद्धेय बटुकेश्वर दत्त जी के साथ उनकी पत्नी व पुत्री श्रीमती भारती बागची (पूर्व विभागाध्यक्ष वाणिज्य संकाय-मगध महिला विद्यालय,पटना जो प्रतिवर्ष अपने पिता श्री की याद में गोष्ठी आयोजित करती हैं)





शहीद - ए - आजम के क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के 49 वे निर्वाण दिवस ( 20 जुलाई 1965 ) पर नमन्
एक प्रसिद्ध क्रान्तिकारी हैं जिनका जन्म नवम्बर, 1908 में कानपुर में हुआ था। उनका पैत्रिक गाँव बंगाल के 'बर्दवान ज़िले' में था, पर पिता 'गोष्ठ बिहारी दत्त' कानपुर में नौकरी करते थे। बटुकेश्वर ने 1925 ई. में मैट्रिक की परीक्षा पास की और तभी माता व पिता दोनों का देहान्त हो गया। इसी समय वे सरदार भगतसिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद के सम्पर्क में आए और क्रान्तिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन’ के सदस्य बन गए। सुखदेव और राजगुरु के साथ भी उन्होंने विभिन्न स्थानों पर काम किया।
प्रतिशोध की भावना

विदेशी सरकार जनता पर जो अत्याचार कर रही थी, उसका बदला लेने और उसे चुनौती देने के लिए क्रान्तिकारियों ने अनेक काम किए। 'काकोरी' ट्रेन की लूट और लाहौर के पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या इसी क्रम में हुई। तभी सरकार ने केन्द्रीय असेम्बली में श्रमिकों की हड़ताल को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से एक बिल पेश किया। क्रान्तिकारियों ने निश्चय किया कि वे इसके विरोध में ऐसा क़दम उठायेंगे, जिससे सबका ध्यान इस ओर जायेगा।
असेम्बली बम धमाका

8 अप्रैल, 1929 ई. को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दर्शक दीर्घा से केन्द्रीय असेम्बली के अन्दर बम फेंककर धमाका किया। बम इस प्रकार बनाया गया था कि, किसी की भी जान न जाए। बम के साथ ही ‘लाल पर्चे’ की प्रतियाँ भी फेंकी गईं। जिनमें बम फेंकने का क्रान्तिकारियों का उद्देश्य स्पष्ट किया गया था। दोनों ने बच निकलने का कोई प्रयत्न नहीं किया, क्योंकि वे अदालत में बयान देकर अपने विचारों से सबको परिचित कराना चाहते थे। साथ ही इस भ्रम को भी समाप्त करना चाहते थे कि काम करके क्रान्तिकारी तो बच निकलते हैं, अन्य लोगों को पुलिस सताती है।
आजीवन कारावास

भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों गिरफ्तार हुए, उन पर मुक़दमा चलाया गया। 6 जुलाई, 1929 को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अदालत में जो संयुक्त बयान दिया, उसका लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। इस मुक़दमें में दोनों को आजीवन कारावास की सज़ा हुई। बाद में लाहौर षड़यंत्र केस में भी दोनों अभियुक्त बनाए गए। इससे भगतसिंह को फ़ाँसी की सज़ा हुई, पर बटुकेश्वर दत्त के विरुद्ध पुलिस कोई प्रमाण नहीं जुटा पाई। उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा भोगने के लिए अण्डमान भेज दिया गया।
रिहाई

इसके पूर्व राजबन्दियों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार के लिए भूख हड़ताल में बटुकेश्वर दत्त भी सम्मिलित थे। यही प्रश्न जब उन्होंने अण्डमान में उठाया तो, उन्हें बहुत सताया गया। गांधीजी के हस्तक्षेप से वे 1938 ई. में अण्डमान से बाहर आए, पर बहुत दिनों तक उनकी गतिविधियाँ प्रतिबन्धित रहीं। 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में भी उन्हें गिरफ्तार किया गया था। छूटने के बाद वे पटना में रहने लगे थे।
निधन

एक दुर्घटना में घायल हो जाने के कारण 20 जुलाई, 1965 को दिल्ली में बटुकेश्वर दत्त का देहान्त हो गया।
मरणोपरांत बटुकेश्वर दादा की समाधि आज फिरोजपुर में हैं और शहीद - ए - आजम की समाधि पर मुखाग्नि दी गई

 https://www.facebook.com/MeNastikKyoHun/photos/a.414018878648485.102168.413278932055813/759419637441739/?type=1&theater











 20 जूलाई 2013
आज अमर क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त की पुण्यतिथि है!
इस अवसर पर हम उन्हें पूरी क्रांतिकारी श्रद्धा से याद कर रहे हैं!!
बटुकेश्वर दत्त (नवंबर १९०८ - २० जुलाई १९६५) और भगत सिंह ने ८ अप्रैल १९२९ को केंद्रीय असेंबली में बम फेंककर अंग्रेजों को हिला दिया था. इसके बाद इन्होने अपनी गिरफ्तारी दी. १२ जून १९२९ को इन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी. बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास काटने के लिए काला पानी जेल भेज दिया गया। जेल में ही उन्होंने 1933 और 1937 में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। सेल्यूलर जेल से 1937 में बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना में लाए गए और 1938 में रिहा कर दिए गए। काला पानी से गंभीर बीमारी लेकर लौटे दत्त फिर गिरफ्तार कर लिए गए और चार वर्षों के बाद 1945 में रिहा किए गए। बटुकेश्वर दत्त अपनी आखिरी दिनों में अभाव में गुजारे! चाहते तो वो भी अपनी पहचान का उपयोग करके आसानी से ऐश की जिंदगी जीते . पर ऐसे मतवाले क्रांतिकारियों को देश ही सब कुछ होता है और इन्हें सिद्धानतों के सिवा कुछ भी मंजूर नहीं होता . दत्त की मृत्यु 20 जुलाई, 1965 को नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हुई। मृत्यु के बाद इनका दाह संस्कार इनके अन्य क्रांतिकारी साथियों-भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव की समाधि स्थल पंजाब के हुसैनी वाला में किया गया।

  ~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, July 5, 2014

ब्रह्मांड प्रकृति भगवान और धर्म के नाम पर अधर्म का हैवान ---विजय राजबली माथुर


घूम रहे ब्रह्माण्ड में कितने तारे, ग्रह, नक्षत्र
किंतु प्रकृति ने बस हमको ही दी है
मीठे पानी की नदियाँ, सुंदर झरने और हरे भरे वन.
लेकिन हमने प्रकृति के उपहार का बस उपहास बनाया
जैसे चाहा वैसे इसको रौंदा, कुचला, दास बनाया.
धरती की छाती पर हमने, गाड़ के खूंटे, बाँट ली धरती,
जब कराह से काँपी धरती, हम बोले भूचाल है आया.
नदियों को मैला करके, हालत कर दी नाले से बदतर,
नदियाँ तट को तोड़ चलीं, तो हम बोले कि बाढ़ है आई.
काट दिए सब जंगल, वन और पर्वत को नंगा कर डाला,
बारिश रस्ता भूल गई और हम बोले सूखा है आया.
जाने क्या क्या बहा दिया जब हमने सागर के पानी में,
सागर ने प्रतिकार किया तो हमने कहा सूनामी आई.
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प्रकृति माँ है, हमने प्रकृति का कितना अपमान किया
माँ के जब आँसू निकले, प्राकृतिक आपदा नाम दिया.
बात याद रखनी थी जो वह भूल गया क्यों अपना मन
प्रकृति ने बस हमको दी है, मीठे पानी की नदियाँ,
सुंदर झरने और हरे भरे वन!!






 (यह चिंता 21 मार्च 2012 को फेस बुक पर बिहारी बाबू -सलिल वर्मा जी ने  व्यक्त की थी। उनकी यह रचना और चिन्ता मुझे सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हुई  इसका समाधान मै नीचे दे रहा हूँ):


                                        यज्ञ  माहात्म्य

लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की।
जो वस्तु अग्नि मे जलाई,हल्की होकर वो ऊपर उड़ाई।
करे वायु से मिलान,जाती है रस्ता गगन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 1 । ।

फिर आकाश मण्डल मे भाई,पानी की होत सफाई।
वृष्टि होय अमृत समान,वृद्धि होय अन्न और धन की।
लिखा वेदों मे विधान,अद्भुत है महिमा हवन की। । 2 । ।

जब अन्न की वृद्धि होती है,सब प्रजा सुखी होती है।
न रहता दु : ख का निशान ,आ जाती है लहर अमन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 3 । ।

जब से यह कर्म छुटा है,भारत का भाग्य लुटा है।
'सुशर्मा'करते बयान सहते हैं मार दु :खन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 4 । ।

जनाब 'हवन' एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। कैसे? Material  Science (पदार्थ विज्ञान ) के अनुसार अग्नि मे जो भी चीजें डाली जाती हैं उन्हे अग्नि परमाणुओ (Atoms) मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओ को बोले गए मंत्रों की शक्ति से संबन्धित ग्रह अथवा देवता तक पहुंचा देती है।

देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-अग्नि,वायु,आकाश,समुद्र,नदी,वृक्ष,पृथ्वी,ग्रह-नक्षत्र आदि।(पत्थर के टुकड़ों तथा कागज पर उत्कीर्ण चित्र वाले नहीं )। 

मंत्र शक्ति=सस्वर मंत्र पाठ करने पर जो तरंगें (Vibrations) उठती हैं वे मंत्र के अनुसार संबन्धित देवता तक डाले गए पदार्थों के परमाणुओ को पहुंचा देती हैं।

अतः हवन और मात्र हवन (यज्ञ ) ही वह पूजा या उपासना पद्धति है जो कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है। बाकी सभी पुरोहितों द्वारा गढ़ी गई उपासना पद्धतियेँ मात्र छ्ल हैं-ढोंग व पाखंड के सिवा कुछ भी नहीं हैं। चाहे उनकी वकालत प्रो . जैन अर्थात 'ओशो-रजनीश' करें या आशा राम बापू,मुरारी बापू,अन्ना/रामदेव,बाल योगेश्वर,आनंद मूर्ती,रवी शंकर जैसे ढ़ोंगी साधू-सन्यासी। 'राम' और 'कृष्ण' की पूजा करने वाले राम और कृष्ण के शत्रु हैं क्योंकि वे उनके बताए मार्ग का पालन न करके ढ़ोंगी-स्वांग रच रहे हैं। राम को तो विश्वमित्र जी 'हवन'-'यज्ञ 'की रक्षा हेतु बाल काल मे ही ले गए थे। कृष्ण भी महाभारत के युद्ध काल मे भी हवन करना बिलकुल नहीं भूले। जो लोग उनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग -हवन करना छोड़ कर उन्हीं की पूजा कर डालते हैं वे जान बूझ कर उनके कर्मों का उपहास उड़ाते हैं। राम और कृष्ण को 'भगवान' या भगवान का अवतार बताने वाले इस वैज्ञानिक 'सत्य ' को स्वीकार नहीं करते कि 'भगवान' न कभी जन्म लेता है न उसकी मृत्यु होती है। अर्थात भगवान कभी भी 'नस' और 'नाड़ी' के बंधन मे नहीं बंधता है क्योंकि,-

भ=भूमि अर्थात पृथ्वी।
ग=गगन अर्थात आकाश।
व=वायु।
I=अनल अर्थात अग्नि (ऊर्जा )।
न=नीर अर्थात जल।

प्रकृति के ये पाँच तत्व ही 'भगवान' हैं और चूंकि इन्हें किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसी लिए ये 'खुदा' हैं। ये पांचों तत्व ही प्राणियों और वनस्पतियों तथा दूसरे पदार्थों की 'उत्पत्ति'(GENERATE),'स्थिति'(OPERATE),'संहार'(DESTROY) के लिए उत्तरदाई हैं इसलिए ये ही GOD हैं। पुरोहितों ने अपनी-अपनी दुकान चमकाने के लिए इन को तीन अलग-अलग नाम से गढ़ लिया है और जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं। इनकी पूजा का एकमात्र उपाय 'हवन' अर्थात 'यज्ञ' ही है और कुछ भी कोरा पाखंड एवं ढोंग।

                                         यज्ञ महिमा

होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान यज्ञ से। ।

1-ऋषियों ने ऊंचा माना है स्थान यज्ञ का।
करते हैं दुनिया वाले सब सम्मान यज्ञ का।
दर्जा है तीन लोक मे-महान यज्ञ का।
भगवान का है यज्ञ और भगवान यज्ञ का।
जाता है देव लोक मे इंसान यज्ञ से। होता है ...........

2-करना हो यज्ञ प्रकट हो जाते हैं अग्नि देव।
डालो विहित पदार्थ शुद्ध खाते हैं अग्नि देव।
सब को प्रसाद यज्ञ का पहुंचाते हैं अग्नि देव।
बादल बना के भूमि पर बरसाते हैं अग्निदेव।
बदले मे एक के अनेक दे जाते अग्नि देव।
पैदा अनाज होता है-भगवान यज्ञ से।
होता है सार्थक वेद का विज्ञान यज्ञ से। होता है ......

3-शक्ति और तेज यश भरा इस शुद्ध नाम मे ।
 साक्षी यही है विश्व के हर नेक काम मे।
 पूजा है इसको श्री कृष्ण-भगवान राम ने।
होता है कन्या दान भी इसी के सामने।
मिलता है राज्य,कीर्ति,संतान यज्ञ से।
सुख शान्तिदायक मानते हैं सब मुनि इसे। होता है .....

4-वशिष्ठ विश्वमित्र   और नारद मुनि इसे।
इसका पुजारी कोई पराजित नहीं होता।
भय यज्ञ कर्ता को कभी किंचित नहीं होता।
होती हैं सारी मुश्किलें आसान यज्ञ से। होता है ......

5-चाहे अमीर है कोई चाहे गरीब है।
 जो नित्य यज्ञ करता है वह खुश नसीब है।
हम सब मे आए यज्ञ के अर्थों की भावना।
'जख्मी'के सच्चे दिल से है यह श्रेष्ठ कामना।
होती हैं पूर्ण कामना--महान यज्ञ से । होता है ....  



हम जानते हैं कि आपके इर्द-गिर्द छाए   हज़ारे/केजरीवाल  और सुबरमनियम स्वामी के चेले-चपाटे  आपको हकीकत  स्वीकारने नहीं देंगे। नीचे स्कैन मे आप ओज़ोन पर्त की जो समस्या देख रहे हैं वह भी 'हवन'पद्धती को त्यागने का ही परणाम है। -



Hindustan-Lucknow-30/03/2012



भोपाल गैस कांड के बाद यूनियन कारबाईड ने खोज करवाई थी कि तीन परिवार सकुशल कैसे बचे। निष्कर्ष मे ज्ञात हुआ कि वे परिवार घर के भीतर हवन कर रहे थे और दरवाजों व खिड़कियों पर कंबल पानी मे भिगो कर डाले हुये थे। ट्रायल के लिए गुजरात मे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 'प्लेग' के कीटाणु छोड़ दिये। इसका प्रतिकार करने हेतु सरकार ने हवन के पैकेट बँटवाए थे और 'हवन' के माध्यम से उस प्लेग से छुटकारा मिला था। तब से लगातार अमेरिका मे 'अखंड हवन' चल रहा है और जो ओजोन का छिद्र अमेरिका के ऊपर था वह खिसक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। लेकिन भारत के लोग ओशो,मुरारी और आशाराम बापू ,रामदेव,अन्ना हज़ारे,गायत्री परिवार जैसे ढोंगियों के दीवाने बन कर अपना अनिष्ट कर रहे हैं । परिणाम क्या है  एक विद्वान ने यह बताया है-


परम पिता से प्यार नहीं,शुद्ध रहे व्यवहार नहीं। 
इसी लिए तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं। । परम ... । । 
फल और फूल अन्य इत्यादि,समय समय पर देता है। 
लेकिन है अफसोस यही ,बदले मे कुछ नहीं लेता है। । 
करता है इंकार नहीं,भेद -भाव तकरार  नहीं। 
ऐसे दानी का ओ बंदे,करो जरा विचार नहीं। । परम ....। । 1 ।  ।
मानव चोले मे ना जाने कितने यंत्र लगाए हैं। 
कीमत कोई माप सका नहीं,ऐसे अमूल्य बनाए हैं। । 
कोई चीज बेकार नहीं,पा सकता कोई पार नहीं । 
ऐसे कारीगर का बंदे ,माने तू उपकार नहीं। । परम ... । । 2 । । 
जल,वायु और अग्नि का,वो लेता नहीं सहारा है। 
सर्दी,गर्मी,वर्षा का अति सुंदर चक्र चलाया है। । 
लगा कहीं दरबार नहीं ,कोई सिपाह -सलारनहीं। 
कर्मों का फल दे सभी को ,रिश्वत की सरकार नहीं। । परम ... । । 3 । । 
सूर्य,चाँद-सितारों का,जानें कहाँ बिजली घर बना हुआ। 
पल भर को नहीं धोखा देता,कहाँ कनेकशन लगा हुआ। । 
खंभा और कोई तार नहीं,खड़ी कोई दीवार नहीं। 
ऐसे शिल्पकार का करता,जो 'नरदेव'विचार नहीं। । परम .... । । 4 । ।  
आज  इस पाखंडी नारे का परित्याग करने कि-सीता राम,सीता राम कहिए जाहि विधि राखे राम ताही विधि रहिए-और वास्तविकता को स्वीकारते हुये इस तथ्य का पालन करने का संकल्प लेना चाहिए कि,"सीता-राम,सीता-राम कहिए ---जाहि विधि रहे राम ताही विधि रहिए।"
आलसी और अकर्मण्य लोग राम को दोष दे कर बच निकलना चाहते हैं।  राम ने जो त्याग किया  और कष्ट देश तथा देशवासियों के लिए खुद व पत्नी सीता सहित सहा उसका अनुसरण करने -पालन करने की जरूरत है । राम के नाम पर आज देश को तोड़ने और बांटने की साजिशे हो रही हैं जबकि राम ने पूरे 'आर्यावृत ' और 'जंबू द्वीप'को एकता के सूत्र मे आबद्ध किया था और रावण के 'साम्राज्य' का विध्वंस किया था । राम के नाम पर क़त्लो गारत करने वाले राम के पुजारी नहीं राम के दुश्मन हैं जो साम्राज्यवादियो के मंसूबे पूरे करने मे लगे हुये हैं । जिन वेदिक नियमों का राम ने आजीवन पालन किया आज भी उन्हीं को अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है।


  ~विजय राजबली माथुर ©
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