Friday, June 3, 2016

वेद,वैदिक संस्कृति,डॉ रोमिला थापर : भ्रम और निवारण ------ विजय राजबली माथुर/ध्रुव गुप्त

वेद और आर्य शब्दों की साम्राज्यवादी व्याख्या ने भ्रम की स्थिति उत्पन्न की है जिसका पूरा-पूरा लाभ उसकी सहोदरी सांप्रदायिकता ने उठाया है। हालांकि डॉ हरबंस मुखिया ने जे एन यू की राष्ट्रवाद की क्लास में स्पष्ट किया कि, अब अंग्रेजों ने अपने यहाँ इतिहास संशोधित कर लिया है परंतु भारत में अभी भी सांप्रदायिक आधार पर ही इतिहास चल रहा है जिसका लाभ सांप्रदायिक शक्तियों ने भरपूर उठाया है। अतः भ्रम का  शीघ्रातिशीघ्र निवारण होना उचित है ।
http://krantiswar.blogspot.in/2012/11/sampradayikta-dharam-nirpexeta.html
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जे एन यू में डॉ रोमिला थापर एवं डॉ हरबंस मुखिया 



प्रसिद्ध इतिहासकार और चिंतक रोमिला थापर से रणबीर चक्रवर्ती की इतिहास, समाज और संस्कृति पर बातचीत. साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार, अंग्रेज़ी पाक्षिक फ्रंटलाइन में प्रकाशित, रोमिला थापर के लंबे साक्षात्कार “लिंकिंग द पास्ट एंड द प्रेजेंट” का कुछ संपादित रूप है और यहां इसका पहला आधा हिस्सा प्रकाशित किया जा रहा है। अनुवाद: शुभनीत कौशिक। 
1 ) उदाहरण के लिए, जब हम छात्र थे तो हमें यह बताया जाता था कि ऋग्वेद की भाषा इंडो-आर्यन भाषा ही है। पर आज यदि आप ऐसा वक्तव्य दें, तो वैदिक काल में विशेषज्ञता रखने वाले कुछ विद्वान इस कथन से जरूर अपनी असहमति जताएंगे क्योंकि भाषा-विज्ञान के सिद्धांतों के प्रयोग ने यह दर्शाया है कि ऋग्वेद में द्रविड़ भाषाओं के भी अंश सम्मिलित हैं। इन जानकारियों से इतिहासकार के प्रत्यक्षीकरण और स्रोतों के प्रति उसके दृष्टिकोण में भी बदलाव आते हैं। अब ऋग्वेद के संदर्भ में ही यह जानकारी इतिहासकार को ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ के अध्ययन के लिए प्रेरित करती है, जो एकल संस्कृति का न होकर सह-अस्तित्व में विद्यमान उन संस्कृतियों का है, जिनमें एक का प्रभुत्त्व है। तो इतिहासकार को इन अन्य संस्कृतियों के बारे में भी जानकारी जुटानी होगी और उनका अध्ययन करना होगा। इतिहासकार को नदियों के जल तंत्र के अध्ययन (हाइड्रोलॉजी) और आनुवंशिकी के अध्ययन और रिपोर्टों से मिलने वाली जानकारियों का समावेश भी अपने अध्ययन में करना होगा। 

2 ) 
प्राचीन भारत पर काम करने वाले विद्वानों का मानना है कि आर्य भाषा मध्य एशिया से ईरान होते हुए भारत पहुँची। पर अब भारत में कुछ लोगों द्वारा इस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है कि आर्यभाषा भाषी भारत के स्थानीय निवासी ही थे। कुछ तो हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को भी आर्य साबित करते हुए यह सुझाना चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति में कोई गैर-आर्य तत्त्व था ही नहीं! यह ऐसा तर्क है जो मुझे विभिन्न कारणों से कतई स्वीकार नहीं। भाषाई और पुरातात्विक आधार पर भी यह किसी तरह से संभव नहीं जान पड़ता। हम कहते हैं कि ऋग्वैदिक संस्कृति उत्तर-हड़प्पाकालीन थी, तो जाहिर है कि इसका मतलब हुआ कि इसमें इसकी पूर्वतर संस्कृति परिलक्षित नहीं होगी। हड़प्पा संस्कृति का संपर्क ओमान और मेसोपोटामिया से था, जिनका जिक्र ऋग्वेद में नहीं मिलता।

3 )  
हाँ, ऋग्वेद में इस रूप में महापाषाणकालीन (मेगालिथिक) संस्कृति का जिक्र नहीं है। पर इस टेक्स्ट में अन्य समूहों की चर्चा जरूर की गयी है, जैसे असुर, दास, दस्यु आदि। ऋग्वेद दो वर्णों की चर्चा करता है – आर्य और दास। ‘दास’ कौन थे? उनके बारे में ऋग्वेद में जो विवरण मिलता है वह यह है कि वे उन कर्मकांडों और रीति-रिवाजों को मानने वाले थे, जो आर्यों से भिन्न थे। ‘दास’ अलग देवताओं की उपासना करते थे, और वे वैदिक ग्रंथों के लेखकों की भाषा से भिन्न भाषाएँ बोलते थे। वे समृद्ध थे, मवेशियों के रूप में उनकी संपत्ति ईर्ष्या का विषय थी और वे अलग बसावटों में रहते थे। इसलिए कुछ विद्वान यह भी सोचते हैं कि वे अलग संस्कृति के थे। इतिहासकार के रूप में हमें यह सवाल करना होगा कि ‘दास कौन थे’ और उनका मिथकीकरण क्यों किया गया?

इसी तरह ‘दासी-पुत्र ब्राह्मणों’ का भी उल्लेख मिलता है। जिन्हें पहले तो अस्वीकार्य माना गया, पर बाद में जब इन लोगों ने अपनी शक्ति दिखाई तो उन्हें ब्राह्मण के रूप में स्वीकार कर लिया गया। ‘दासी-पुत्र ब्राह्मण’ स्वयं में ही एक विरोधाभाषी शब्द है क्योंकि ‘दासी-पुत्र’ (यानि एक दासी से उत्पन्न हुआ पुत्र) होना और ब्राह्मण की हैसियत दोनों में विरोध भाव है। वैदिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि देवों और असुरों में अक्सर संघर्ष होते रहते थे। यह एक स्तर पर मिथक है, पर यह मिथक भी तत्कालीन समाज की अवधारणाओं से बिलकुल अलग नहीं है। इतिहासकारों के मत में, वैदिक ग्रंथों में उत्तर-हड़प्पा काल से लेकर ईसापूर्व पाँचवी सदी के ऐतिहासिक नगरों के रूप में नगरीय संस्कृति के उदय तक का उल्लेख मिलता है। ऐसी स्थिति में क्या यह कहना संभव है कि ये वैदिक ग्रंथ संस्कृति के एक पैटर्न के उद्विकास के परिचायक भर हैं!

4 ) एक प्रचलित तर्क यह भी है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और भारत से ही वे दुनिया के अन्य हिस्सों में गए और यूरोप में भी सभ्यता लेकर आर्य ही गए। इस सिद्धांत की खोज की गयी 19वीं सदी में, पर यह आज भी उतना ही लोकप्रिय है। सबसे पहले अमेरिका के थिओसोफिस्ट, कर्नल हेनरी एस ओलकाट ने इसे प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत थिओसोफिस्टों ने अपना लिया। यद्यपि थिओसोफिस्ट कुछ समय के लिए आर्य समाज के निकट थे, पर स्वयं आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य तिब्बत से आए थे। 

ये वे सिद्धांत हैं जो भारत के प्राचीनतम अतीत से जुड़े ऐतिहासिक विवादों से गहरे जुड़े हुए हैं। इनकी शुरुआत 19वीं सदी में हुई। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि यह वही समय था जब ‘नस्ल विज्ञान’ के अधीन यूरोपीय सर्वोच्चता पर, आर्य उत्पत्ति को आधार बनाकर चर्चा की जा रही थी। इनमें से कुछ सिद्धांत, बीसवीं सदी के यूरोप में ‘आर्यवाद’ को विनाशकारी दिशा की ओर ले गए। अतिरेक राष्ट्रवाद और अस्मिता की राजनीति के साथ ऐतिहासिक सिद्धांतों की जुगलबंदी के भयानक नतीजे हो सकते हैं, इसलिए यह ज़रूरी है इन सिद्धांतों पर चर्चा की जाए। 

स्त्रोत :
http://hashiya.blogspot.in/2015/11/blog-post_24.html
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भ्रम निवारण : 
Dhruv Gupt
 02-06-2016  

क्या वैदिक ऋषि सचमुच गोमांस खाते थे ? :

फेसबुक पर और अन्यत्र भी कई मित्रों ने वैदिक साहित्य का हवाला देते हुए बार-बार यह साबित करने की कोशिश की है कि वैदिक ऋषि और उस कालखंड के लोग गोमांस का भक्षण किया करते थे। इस विषय पर मेरे भी मन में भी कुछ उलझनें थीं। कहीं भी अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं पाकर अंततः मैंने देश के कुछ गिने-चुने वेद मर्मज्ञों में एक 'मातृसदन', कनखल, हरिद्वार के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी शिवानंद जी के सामने अपनी जिज्ञासा रखी। उन्होंने बताया कि ज्ञान जब अधकचरा हो तो वेद की ऋचाओं और उपनिषद के मंत्रों के शाब्दिक अर्थ लेकर लोग ऐसी ही स्थापनाएं निकालते हैं। वेद और उपनिषद मूलतः यौगिक साहित्य हैं जिनमें योग की गूढ़ और रहस्यमय क्रियाओं को लौकिक शब्दों और उपमाओं के माध्यम से समझाने के प्रयास किए गए हैं। यह गुरू और शिष्यों के बीच का हजारों वर्षों तक श्रुति परंपरा में चला संवाद है जिसे योग विद्या में प्रवेश करने वाले जिज्ञासु ही समझ सकते हैं। आमलोग जब इन ऋचाओं और मन्त्रों के शाब्दिक अर्थ लगाएंगे तो अर्थ का अनर्थ तो होगा ही। उन्होंने वृहदकारण्य उपनिषद से यह उद्धरण सुनाकर मेरी तमाम जिज्ञासाओं का शमन कर दिया। 

वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चतवारहः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हंतकारहः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हंतकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः। (छा. उ. 5/8/1) 

अर्थात वाक् ही धेनु या गाय है। उस धेनु का प्राण वृषभ है और बछड़ा उसका मन। उसके चार स्तन हैं-स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वाधाकार। उसके दो स्तनों- स्वाहाकार और वषट्कार उपजीवी देवगण हैं जो उनका उपभोग करते हैं। हन्तकार का उपभोग मनुष्य करते हैं और स्वाधाकार का पितृगण। यह एक रूपक है जिसके द्वारा यौगिक क्रिया प्राणोपासना की व्याख्या की गई है। ऐसे कई मंत्रों और ऋचाओं के सतही अर्थ लगाने वाले लोगों ने यह भ्रांति फैलाई है कि वैदिक ऋषि और आमजन गोमांस का भक्षण करते थे।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1062190717190859&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3&permPage=1
********************************************************जी हाँ इसी प्रकार 5 वर्ष से अधिक पुराना वह 'जौ ' जिसे बोने से उगे नहीं को 'अश्व ' कहा जाता था और उसकी हवन में आहुतियाँ दी जाती थीं। पोंगा पंडितों ने अश्व का अर्थ 'घोडा ' लगा कर घोड़े की आहुती देने की बेसुरी तान छेड़ दी । वैदिक संस्कृत को साहित्यिक रूप में न लेकर बीज गणित के सूत्रों की भांति लेंगे तभी सही समाधान पर पहुंचेंगे। लेकिन क्या पोंगा-पंथी और एथीस्ट सच को स्वीकार करेंगे?

****** आर्य न कोई जाति थी न है  : ******
Vijai RajBali Mathur
May 29, 2012 · 
आर्य न कोई जाति थी न है। आर्य=आर्ष=श्रेष्ठ। अर्थात श्रेष्ठ कार्यों को करने वाले सभी व्यक्ति आर्य हैं। 'कृंणवनतों विश्वार्यम' के अनुसार सम्पूर्ण विश्व को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनाना है। लेन पूल,कर्नल टाड आदि-आदि विदेशी और आर सी मजूमदार सरीखे भारतीय इतिहासकारों ने साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ती हेतु आर्यों को एक जाति के रूप मे निरूपित करके बेकार का झगड़ा खड़ा किया है।
अब से लगभग 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव-सृष्टि इस पृथ्वी पर हुई तो विश्व मे तीन स्थानों-
1-मध्य यूरोप,
2- मध्य अफ्रीका ,
3-मध्य एशिया –मे एक साथ ‘युवा स्त्री और युवा पुरुषों’के जोड़े सृजित हुये। भौगोलिक स्थिति की भिन्नता से तीनों के रूप-रंग ,कद-काठी मे भिन्नता हुई। इन लोगों के माध्यम से जन-संख्या वृद्धि होती रही। जहां-जहां प्रकृति ने राह दी वहाँ-वहाँ सभ्यता और संस्कृति का विकास होता गया और जहां प्रकृति की विषमताओं ने रोका वहीं-वहीं रुक गया। 
मध्य एशिया के ‘त्रिवृष्टि’जो अब तिब्बत कहलाता है उत्पन्न मानव तीव्र विकास कर सके जबकि दूसरी जगहों के मानव पिछड़ गए। आबादी बढ्ने पर त्रिवृष्टि के लोग दक्षिण के निर्जन प्रदेश आर्यावृत्त मे आकर बसने लगे।जब ‘जंबू द्वीप’उत्तर की ओर ‘आर्यावृत्त’ से जुड़ गया तो यह आबादी उधर भी फ़ेल गई। चूंकि आबादी का यह विस्तार निर्जन प्रदेशों की ओर था अतः किसी को उजाड़ने,परास्त करने का प्रश्न ही न था। साम्राज्यवादियों ने फूट परस्ती की नीतियों के तहत आर्य को जाति बता कर व्यर्थ का बखेड़ा खड़ा किया है। त्रिवृष्टि से आर्यावृत्त आए इन श्रेष्ठ लोगों अर्थात आर्यों ने सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान-विज्ञान से परिचित कराने का बीड़ा उठाया। इस क्रम मे जिन विद्वानों ने पश्चिम से प्रस्थान किया उनका पहला पड़ाव जहाँ स्थापित हुआ उसे ‘आर्यनगर’ कहा गया जो बाद मे एर्यान और फिर ईरान कहलाया। ईरान के अंतिम शासक तक ने खुद को आर्य मेहर रज़ा पहलवी कहा। आगे बढ़ कर ये आर्य मध्य एशिया होकर यूरोप पहुंचे। यूरोपीयो ने खुद को मूल आर्य घोषित करके भारत पर आक्रमण की झूठी कहाने गढ़ दी जो आज भी यहाँ जातीय वैमनस्य का कारण है। 
‘तक्षक’ और ‘मय’ऋषियों के नेतृत्व मे पूर्व दिशा से विद्वान वर्तमान साईबेरिया के ब्लादिवोस्तक होते हुये उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के अलास्का (जो केनाडा के उत्तर मे यू एस ए के कब्जे वाला क्षेत्र है)से दक्षिण की ओर बढ़े। ‘तक्षक’ ऋषि ने जहां पड़ाव डाला वह आज भी उनके नाम पर ही ‘टेक्सास’ कहलाता है जहां जान एफ केनेडी को गोली मारी गई थी। ‘मय’ ऋषि दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के जिस स्थान पर रुके वह आज भी उनके नाम पर ‘मेक्सिको’ कहलाता है। 
दक्षिण दिशा से जाने वाले ऋषियों का नेतृत्व ‘पुलत्स्य’ मुनि ने किया था जो वर्तमान आस्ट्रेलिया पहुंचे थे। उनके पुत्र ‘विश्रवा’मुनि महत्वाकांक्षी थे। वह वर्तमान श्रीलंका पहुंचे और शासक ‘सोमाली’ को आस्ट्रेलिया के पास के द्वीप भेज दिया जो आज भी उसी के नाम पर ‘सोमाली लैंड’कहलाता है। विश्रवा के बाद उनके तीन पुत्रों मे सत्ता संघर्ष हुआ और बीच के रावण ने बड़े कुबेर को भगा कर और छोटे विभीषण को मिला कर राज्य हसगात कर लिया। वह साम्राज्यवादी था। उसने साईबेरिया के शासक (जहां 06 माह का दिन और 06 माह की रात होती है अर्थात उत्तरी ध्रुव प्रदेश)’कुंभकर्ण’तथा पाताल-वर्तमान यू एस ए के शासक ‘एरावन’ को मिला कर भारत –भू के आर्यों को चारों ओर से घेर लिया और खुद अपने गुट को ‘रक्षस’=रक्षा करने वाले (उसका दावा था कि यह गुट आर्य सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करने वाला है)कहा जो बाद मे अपभ्रंश होकर ‘राक्षस’कहलाया। 
राम-रावण संघर्ष आर्यों और आर्यों के मध्य राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद का संघर्ष था जिसे विदेशी इतिहासकारों और उनके भारतीय चाटुकारों ने आर्य-द्रविड़ संघर्ष बता कर भारत और श्रीलंका मे आज तक जातीय तनाव /संघर्ष फैला रखा है। 
जब अब आपने यह विषय उठाया है तो विदेशियों के कुतर्क और विकृति को ठुकराने का यही सही वक्त हो सकता है। जनता के बीच इस विभ्रम को दूर किया जाना चाहिए कि ‘आर्य’ कोई जाति थी या है। विश्व का कोई भी व्यक्ति जो श्रेष्ठ कर्म करे आर्य था और अब भी होगा।

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/364918650236784

 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Thursday, June 2, 2016

विश्वास खोने के अनुभव के साथ ब्लाग का 7वें वर्ष में प्रवेश ------ विजय राजबली माथुर

 
पुष्पा अनिल जी से साभार 

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी जी की यह पोस्ट गंभीर चिंतन की अपेक्षा करती है। 
इसमें मैं इतना और जोड़ना चाहता हूँ कि, पढे-लिखे और विद्वान होने के बावजूद ट्विटर,फेसबुक व ब्लाग्स लेखक अपने में कुछ घोर स्वार्थी एवं दुष्ट लोगों को भी समेटे हुये हैं। एक-दो उदाहरण देना चाहूँगा। 
1- एक उल्टी टोपी वाले साहब खुद को जोशी जी का मित्र कहते हैं और अपने घर पर उनको बासी खाना तक खिलाने का दावा भी करते हैं। मुझसे फेसबुक पर जुड़े थे तब खुद अपनी व अपनी बेटी की जन्म पत्रियों का निशुल्क विश्लेषण प्राप्त कर ले गए थे। फिर बजाए एहसान मानने के मेरे विरुद्ध अभियान चलाने वाले मिश्रा गैंग के गुण गान करने लगे उनको अंफ्रेंड करना पड़ा। 
2- खुद अपनी व अपने दो पुत्रों की जन्म पत्रियों का निशुल्क विश्लेषण प्राप्त करने वाले एक और एफ बी फ्रेंड से जब कुछ उनके व्यवसाय से संबन्धित सलाह मांगी तो उनके द्वारा मौन साध लिया गया है। 
3- एक बुजुर्ग साहब ने खुद अपनी व अपनी एक बेटी की जन्म पत्रियों का निशुल्क विश्लेषण प्राप्त करने के बाद मिश्रा गैंग के प्रभाव में ही मेरे विरुद्ध षडयंत्रों में खुद को शामिल किया तो उनको अंफ्रेंड कर दिया था। 
परंतु बेशर्म इतने हैं कि कार्यक्रमों में मिलने पर लिभड़- लिभड़ करने लगते थे सफाई देते हुये फिर से फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी; उनकी बुज़ुर्गीयत और सफ़ेद बालों को देखते हुये पुन: एफ बी फ्रेंड बना दिया तो फिर से पुरानी रंगत पर ही नहीं आ गए बल्कि मुझे परेशान करने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। अंफ्रेंड करके उनका सामाजिक बहिष्कार करना ही अब विकल्प शेष है। 

एक-दो लोग भले भी हैं किन्तु प्रतिशत नगण्य है।

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1093189710743004&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=3



https://www.facebook.com/pramod.joshi/posts/10208150162863434



आज से छह वर्ष पूर्व आज की ही तारीख 02 जून 2010 को इस ब्लाग का प्रारम्भ इस पोस्ट के साथ किया था। आज से यह ब्लाग 7वें वर्ष मे प्रवेश कर गया है।
'आठ और साठ घर में नहीं '

http://krantiswar.blogspot.in/2010/06/blog-post.html


तब से अब तक कुल 457 पोस्ट्स प्रकाशित हो चुकी हैं ।  कुल 132216 बार ब्लाग अवलोकन हो चुका है। 

'क्रांतिस्वर' ब्लाग के अतिरिक्त कुल छह और ब्लाग्स भी चल रहे हैं। 

प्रारम्भ में जिन तीन फेसबुक फ्रेंड्स का ज़िक्र है वैसा ही कुछ ब्लागर्स का भी व्यवहार रहा है कि पहले तो मुझसे निशुल्क जन्म पत्रियों के विश्लेषण प्राप्त कर लिए फिर मेरे ही विरुद्ध षडयंत्रों में लग गए। इसलिए अबसे किसी भी फेसबुक फ्रेंड अथवा ब्लागर साथी का भला न करने का निश्चय किया है। सातवें वर्ष में इस ब्लाग के प्रवेश के साथ यह निर्णय लेना कटु अनुभवों की देन ही है। 

 ~विजय राजबली माथुर ©
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Wednesday, May 11, 2016

कन्हैया से घबराता है कौन - कौन ? ------ संतोष सिंह


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कन्हैया से जितने बीजेपी घबरायी हुई है उतना ही जाति की राजनीत करने वाले मायावती ,, मुलायम और लालू भी है यही वजह है कि मयावती भी कन्हैया की जाति को ज्यादा फोकस कर रही है वही लालू प्रसाद भी कन्हैया से मुलाकात के बाद पहला लाईन यही थी ब्रह्मर्शी का बेटा है ॥














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Santosh Singh 
May 3 at 12:16pm · 
इन दिनों समर ट्रेनिंग का दौर चल रहा है हमारे यहाँ भी वीमेंस कॉलेज पटना और पटना कॉलेज से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्र छात्राए ट्रेनिंग के लिए आयी हई है ॥
शराब बंदी का क्या प्रभाव पड़ा इस पर स्टडी करने के लिए एक ग्रुप पटना संग्रहालय के पीछे स्थित स्लम
बस्ती में गयी थी ॥
दो दिनों के स्टडी के बाद कल वो ऑफिस आयी और उसके बाद अपने अनुभव के बारे में बताना शुरू कि,,,
इस दौरान शराब बंदी को लेकर कई ऐसी बाते बतायी जो हमारे जैसे पत्रकार जो अक्सर ये दंभ भरते हैं कि समाज के सोच को काफी करीब से देखते और समझते हैं हैरान रह गया खैर बात आगे बढ़ी इसी दौरान एक ट्रेनी बतायी सर उस सल्म वस्ती में एक टेम्पू वाला मिला दोपहर के समय में सिर्फ महिलाये ही थी शायद ये खाना खाने आया हुआ था उस वक्त उसी कि पत्नी के साथ हमलोग बात कर रहे थे उन्होंने पुछा आपलोग क्या करती हैं मैने बताया पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं तो उसने झट से 
पुछा कल पटना में कौन आ २हा है,,हमलोग आपस में एक दूसरे को देखने लगे ,,,बताईए बताईए कौन आ २हा है ,,, मैंने धीरे से कहा कन्हैया की बात कर रहे हैं जोड़ से हंसते हुए कहा कि हा कल हम सब लोग उसका भाषण सूनने जा रहे हैं देखते हैं क्या बोलता है,,, फिर इन लोगो ने कन्हैया को लेकर बाते कि वहाँ मौजूद सारी महिलाये कन्हैया को जान रही थी और कह रही थी गरीब का बेटा है इंसाफ का मांग किया तो जेल डाल दिया.,,
मैं तो हैरान २ह गया कन्हैया की पहुंच देश के अंतिम व्यक्ति तक ॥फिर मैं इन लड़कियों से बात करना शुरू किया इन्होंने कहा हमारे कैम्पस में वामपंथी और विद्यार्थी परिषद छात्र संगठन मौजूद है और इन दोनों संगठन से छात्र जुड़े हुए हैं लेकिन अधिकांश वैसे छात्र जो किसी भी संगठन से जुड़ा हुआ नही है वो सभी कन्हैया के साथ है ॥
मेरा दूसरा सवाल था कन्हैया में क्या खास है  ?
सर इस भी़ड़ से अलग है बात में दम है काफी सरलता से हंसते हुए वो बाते कह देता है जिसे समझने के लिए बड़ा दिमाग चाहिए ॥
अच्छा ऐसा है  ?
और सर वो आजादी वाला नारा क्या कहना है दिल झुम उठता है ॥ मुख्यमंत्री का जनता दरबार में भी जाना था लेकिन इन ट्रेंनी की बात सुनते सुनते काफी लेट हो तभी खबर आयी कि सीएम पर किसी ने चप्पल फेंक दिया ॥ भागते हुए सीएम हाउस पहुँचे थोड़ी देर मामला शांत और फिर आराम से बैठने के लिए सोच ही रहे थे तभी किसी ने पास आकर कहा साहब बुला रहे है॥ जैसे ही उस और मुखातिव हुआ आवाज आयी आईए आईए संतोष जी पहुॅचे तो वहाँ भी कन्हैया पर ही चर्चा हो रही थे ॥ उस डेस पर कमीशनर और आईजी रैंक के कई अधिकारी बैंठे थे इसमें से कई ऐसे पदाधिकारी थे जिनसे मेरा कोई परिचय नही था ॥
परिचय के बाद सीधा सवाल हुआ कन्हैया को लेक२ आप क्या सोचते हैं  ?मैने ट्रेनी छात्रा के अनुभव को सूना दिया और उसके बाद बहस और तेज हो गयी और इसी दौरान एक अधिकारी ने शराब को लेकर दिये गये बयान का हवाला देते हुए कहा कि कन्हैया नीतीश नराज हो जाये इसका चिंता किये बगैर डेमोक्रेसी के लारजर कान्टेस्ट में अपनी बात को रखा ॥
ये दो उदाहरण कन्हैया को समझने के लिए काफी है और यही वजह है कन्हैया से जितने बीजेपी घबरायी हुई है उतना ही जाति की राजनीत करने वाले मायावती ,, मुलायम और लालू भी है यही वजह है कि मयावती भी कन्हैया की जाति को ज्यादा फोकस कर रही है वही लालू प्रसाद भी कन्हैया से मुलाकात के बाद पहला लाईन यही थी ब्रह्मर्शी का बेटा है ॥

https://www.facebook.com/santoshsingh.etv/posts/1065194023519721

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  ~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, April 25, 2016

‘यह फिल्म देखकर आने वाली पीढ़ियां कहेंगी- हमारे राजनेता कितने छिछोरे हैं!’ ------ कमल स्वरूप

  


कमल स्वरूप 




‘यह फिल्म देखकर आने वाली पीढ़ियां कहेंगी- हमारे राजनेता कितने छिछोरे हैं!’

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दिनेश श्रीनेत/अमर उजाला, दिल्ली

Updated 13:09 शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

http://www.amarujala.com/entertainment/bollywood/battle-of-banaras-2014

भारतीय सिनेमा में अपने किस्म के अनूठे फिल्मकार कमल स्वरूप ने लोकसभा चुनाव के दौरान बनारस जाकर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाई- ‘बैटल ऑफ बनारस’। उनके शब्दों में वे ‘भारतीय जीवन में चुनाव की उत्सवधर्मिता’ और ‘भीड़ के मनोविज्ञान’ का फिल्मांकन करना चाहते थे। मगर उनकी फिल्म सेंसर बोर्ड को आपत्तिजनक लगी और इसे मंजूरी देने इनकार कर दिया गया। वे ट्रिब्यूनल के पास गए उन्होंने भी मंजूरी नहीं दी।

अब फिल्म के निर्माता इसे लेकर हाईकोर्ट जा रहे हैं। ट्रिब्यूनल का तर्क था कि यह डॉक्यूमेंट्री नेताओं के भड़काऊ संवादों से भरी हैं। कुछ लोगों का कहना है कि यह फिल्म पीएम मोदी के खिलाफ जाती है इसलिए इसे प्रतिबंधित किया जा रहा है। हमने कमल स्वरूप से इस पर एक लंबी बात की और जानना चाहा कि आखिर फिल्म में ऐसा क्या है जिससे इतने विवाद खड़े हो गए। प्रस्तुत है कमल स्वरूप से दिनेश श्रीनेत की बातचीत।

सेंसर बोर्ड- ने किस आधार पर इस फिल्म को सर्टिफिकेट देने से मना किया?
बस सीधे-सीधे यह कहकर रिजेक्ट हो गई कि यह फिल्म सेंसर बोर्ड के लायक नहीं है। जब दिल्ली में ट्रिब्यूनल के पास पहुंचे तो उन्होंने भी यही बोला कि सेंसर बोर्ड का फैसला सही है। इसमें जाति और संप्रदाय के खिलाफ भड़काऊ स्पीच है। जबकि फिल्म में कोई कमेंट्री नहीं है। हमने सिर्फ स्पीच को रिकार्ड किया है। ये वही भाषण हैं जो मोदी, केदरीवाल, सपा नेता और इंडिपेंडेंट कैंडीडेट बोल रहे थे। भाषण भी आम थे। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा क्या बोलेंगे? कभी किसी को अंबानी का प्यादा कहा जाएगा तो कभी कांग्रेस के भ्रष्टाचार की चर्चा होगी।


तो आपके मुताबिक ऐसी क्या वजह है कि फिल्म पर रोक लगाने की कोशिश हो रही है?
मैं बताता हूं कि यह फिल्म लोगों को क्यों इतनी भड़काऊ लग रही है! दरअसल इसमें दिखने वाले सारे लोग अब बड़े लोग हो गए हैं। टीवी पर चीजें आती हैं और चली जाती हैं मगर यहां यह एक भारी डाक्यूमेंट बन जाता है। हमारी आने वाली पीढ़ी जब इन्हें देखेगी तो बोलेगी- ये छिछोरे लोग हैं।


आपको यह डाक्यूमेंट्री बनाने का ख्याल कैसे आया? 
मैंने तो इसलिए शुरु किया था कि मुझे भीड़ के व्यवहार और उसे डाक्यूमेंट करने में काफी दिलचस्पी है। बनारस एक बहुत अच्छा बैकड्राप था। एक ड्रामा था कि कैसे इलेक्शन के दौरान राजनीतिक पार्टियां एक शहर को जीतने की कोशिश करती हैं। नोबेल विजेता एलियस कैनेटी की किताब ‘क्राउड्स एंड पाउडर’ मुझे बहुत पसंद है- इसमें भीड़ के प्रकार, संगठन की बनावट, प्राचीन समाज आदान-प्रदान और त्योहार की चर्चा है। कुल मिलाकर यह एक एंथ्रोपॉलोजिकल किताब है। मुझे लगा कि अपनी डाक्यूमेट्री के लिए मुझे उस किताब को ही अपना आधार बनाना चाहिए। मेरा लेंस वही किताब थी। बाकी मेरा राजनीतिक दिलचस्प खास नहीं थी।

जब आप इस फिल्म की शूटिंग कर रहे थे तो राजनीतिक दलों की क्या प्रतिक्रिया थी?

बीजेपी वालों से मेरा ज्यादा कांटेक्ट नहीं बन पाया। उनकी गुप्त मीटिंग को शूट करने में मेरी दिलचस्पी नहीं थी। संघ के भवन में उनका बहुत बड़ा सा कार्यालय था। वहां गुजरात के टॉप आइटी प्रोफेशनल्स भी बैठते थे। वे शक की निगाह से हमें देखते थे। वे देखते थे कि हम तो हर राजनीतिक पार्टी के साथ बैठते थे। धीरे धीरे हुआ यह कि हर राजनीतक पार्टी हमें शक की निगाह से देखने लगी।

आपको बनारस में शूटिंग के दौरान भी कोई दिक्कत आई?
कम्युनिकेशन की दिक्कत तो बहुत थी। जब रैली निकलती है तो मोबाइल जाम हो जाते हैं। तंग गलियां हैं तो गाड़ियों मे ट्रैवेल नहीं कर सकते। हमे भागकर या मोटरसाइकिल से एक से दूसरी जगह जाना होता था। एक साथ पांच-पांच पार्टियों का प्रोग्राम की शीट बनानी होती थी। मुझे बहुत मजा आया। हम रात को उनके प्रोग्राम देख लेते थे। फिर तय करते थे कि अगले दिन कौन कहां जाकर शूट करेगा। मैं रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ फिल्म में असिस्टेंट था और क्राउड हैंडल करता था, तो वो दिन ताजा हो गए।

अगर भारत में फिल्म पर प्रतिबंध लग गया तो इसका भविष्य क्या होगा?
हमारे प्रोड्यूसर लंदन के रहने वाले भारतीय हैं। वे कोशिश में लगे हैं। वैसे ये फेस्टिवल में जा रही है। फ्रांस में दिखाई जाएगी मगर न्यूयार्क में नहीं जा पाएगी। वहां के फेस्टिवल इंडियन एनआरआई चलाते हैं। वे पंगा नहीं लेना चाहते। मामी फेस्टिवल वाले भी डर गए थे कि कहीं कोई पंगा हो न जाए। जो पंगा नहीं लेना चाहते वे घबराएंगे। नेट-फ्लिक्स भी घबराएगा। वह इसे एंटी बीजेपी मानता है तो भय होगा कि कहीं उसका लाइसेंस न रद हो जाए। बाहर जब हम विदेशों में दिखाएंगे तो बहुत से लोग इंडियन पॉलीटिक्स को समझ नहीं पाएंगे। हमारी पालिटिक्स बड़ी काम्प्लेक्स है। चुनाव एक महोत्सव की तरह है। स्टेज सजते हैं। रैलियां निकलती हैं। लोग नारे लगाते हैं। यह बिल्कुल रामलीला की तरह है। हमें इसमें मजा आता है। इस फिल्म में बनारस बहुत ही भव्य लगा है। इतनी सारी पब्लिक जिंदगी में देखी नहीं है।

इस प्रतिबंध को आप कितना जायज मानते हैं, या दूसरे शब्दों में मैं पूछूं कि सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आप क्या कहना चाहेंगे?

देखिए, हम कोर्ट में जा रहे हैं! हमारा प्रोड्यूसर जा रहा है। वहां वकील आते हैं। आपको मौका दिया जाता है अपनी बात रखने का। ट्रिब्लयून में प्रोड्यूसर को अपना पक्ष रखने का मौका ही नहीं दिया जाता। यहां तो सेंसर वाले आंख बंदकर फिल्म देखते हैं। जरा सा शक होगा तो बोलेंगे रहने दो। मेरा मानना है कि वे कट सजेस्ट कर सकते हैं पर पूरी पिक्चर बैन करने का कोई मतलब नहीं होता है। मेरी फिल्म ओम दर-ब-दर को एक साल तक सेंसर सर्टीफिकेट नहीं दिया। बोलते थे पिक्चर समझ मे नहीं आ रही है। वे खोजते रहते कि उसमें दिखाई बातों का मतलब क्या हो सकता। उस समय कांग्रेस की सरकार थी। फिर एऩएफडीसी ने इस फिल्म को दबाकर रखा। सेंसर में ये लोग डांटते थे जैसे कि जजमेंट कर रहे हों। वे ज्ञान देने लगते हैं। वहां के बाबू तक हमें डांटते थे।



~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, April 4, 2016

नेता की कथनी और करनी एक जैसी होनी चाहिए ------ अनुराधा बेनीवाल



ये सवाल सब सरकारों से है। इस से या उससे नहीं। सब कुर्सी वालो से हैं।
सवाल ही सवाल हैं और जवाब में हमे सिर्फ सुनाई देता है, "भारत माता की जय!" किसानों की बात करो तो "फौजियों की जय!" फौजियों की बात करो तो, "किसानों की जय!"

इस कोरी जय से क्या मिलेगा! कैसे बोलदे जय! जब है ही नहीं जय! 

Anuradha Saroj
 03-04-2016  at 1:29pm · 
पूरा स्पीच। 
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अगर सद्भावना सवालों को हवन-कुंड में जलाती है, तो सद्भावना नहीं कवर-अप है, ढोंग है!
हमारे प्रदेश में हिंसा हुई है, दंगे हुए है। let us accept that first. नुकसान हुआ है। कितना कम-ज्यादा इसका आंकलन लोग करते रहेंगे। लेकिन let us accept के नुकसान हुआ है। नुकसान करने बाहर से लोग नहीं आये थे। मराठी आके, बांग्लादेशी आके, मंगल ग्रह से आके किसी ने नहीं हमारी दुकानें फूंकी, हमारे स्कूल नहीं जलाये! हमी थे नुकसान करने वाले, और हमी हैं नुकसान सहने वाले।
Let us also know that के कोई हिंसा यूँही नहीं बस भड़क जाती। इसके लिए बारूद लगता है। जिसपे हम हमेशा बैठे रहते हैं, बस एक चिंगारी की जरुरत होती है। यूँही कोई किसी की दुकान जलाने नहीं निकल पड़ता। यूँही कोई स्कूल नहीं फूँक देता। राह खड़ी गाड़ियां नहीं जला देता। यूँही कोई अमानव नहीं हो जाता। इसके पीछे की पृष्ठभूमि समझने की जरुरत है। हमे खुद से, समाज से, सरकार से सवाल करने की जरुरत है। इस बारूद को खत्म करने की जरुरत है।
कैसे हम इतनी नफरत से भर जाते हैं? के पड़ोसी-पड़ोसी का दुश्मन हो जाता है। एक सेकंड के लिए जात को भूल जाएँ, तो सोचें हमने अपने दोस्तों, पड़ोसियों, भाइयों, यारों के घर जलाए हैं। दुकानें जलाई हैं। हमने अपना ही नुकसान किया है। कहाँ पल रही है ये नफरत? कौन पाल रहा है इस नफरत को? इस नफरत को पाल के किसे फायदा है? ये सवाल आज हमें उस हवन/यज्ञ में पूछने हैं। संस्कृत में ना समझ में आने वाले मन्त्र नहीं रटने, सीधे-साफ़ सवाल हमें करने हैं।
और हमे सही सवाल करने हैं।
सवाल ये नहीं होना चाहिए, के इसे नौकरी क्यों मिली मुझे क्यों नहीं? सवाल अब ये होना चाहिए के हम दोनों को नौकरी क्यों नहीं मिल रही? हमारे घर में सब के पास नौकरियां क्यों ना हों? सबके पास काम क्यों ना हो? सब इज़्ज़त की रोटी क्यों ना खा सकें? सब के पास बेसिक साधन क्यों ना हों? सवाल मिल के करने हैं। एक जाती को नहीं हर जाती को करने हैं! हम सब साथ मिलके सवाल करेंगे तो जवाब देना पड़ेगा! ये जरुरी सवाल हैं, मुश्किल सवाल हैं। लेकिन साथ में पूछेंगे तो जवाब देना पड़ेगा। हमारी आवाज कोई दबा नहीं पाएगा। न्यारे होके पूछेंगे, एक-दूसरे से लड़ झगड़ के पूछेंगे को हमारे सवालों को दबाना आसान होगा। और वो यही चाहते हैं के हमारे जरुरी सवाल दबते रहें, हम आपस में लड़ते-भिड़ते रहें। और वो अपनी रोटियां सकते रहें।
सवाल नंबर एक - दंगे क्यों भड़के? क्या कारन था? प्रशाषन इस बात का जवाब दे। किसी राज्य में जब इस सत्र पे दंगे होते हैं, जान माल का नुकसान होता है, तब सरकारी प्रशाषन जिम्मेदार होता है। हमेशा! वो अपना पल्ला किसी जाती विशेष को ब्लेम कर के नहीं झाड़ सकता। (इस तरह तो रोज दंगे होंगे, और हम देखते रह जाएंगे) प्रशाषन के पास पुलिस फोर्से होती है, बैरिकेड होते हैं, वाटर केनन, टियर गैस, माइक्रो-फ़ोन, सैकड़ों प्रबंध होते हैं। इस स्केल पर दंगा कैसे फैला? क्या फैलवाया गया? दंगे में फायदा किसका था?
पहले सवाल से दूसरा सवाल निकलता है।
सवाल नंबर दो - प्रशाषन ने क्या किया दंगे रोकने के लिए? क्या आर्मी बुलाना आखरी उपाय था? पॉइंट ब्लेंक पे जवान मौतें हुई। क्या इसे रोका नहीं जा सकता था? Where were our leaders? So called leaders of the masses. Those who were voted by the people, for the people. Why were they not among the people?
सब नेता कहाँ थे, जब आग लगने लगी? जब लोग घरों से निकल कर बर्बादी करने निकल पड़े? किसी सांसद, किसी विधायक, किसी सरपंच जी ने उन रोका क्या? आखिर समाज अपने बीच नेता क्यों चुनता है? सही राह दिखाने के लिए, या गलत राह पे मोड़ने के लिए? असल मौके पर समझदारी देने के लिए या अपने घरों में दुबक कर तमाशा देखने के लिए? सिर्फ नफरत की गन्दी आग को भड़काने वाले नेताओं के अलावा सब कहाँ गए थे? और जिन्होंने नेगेटिव रोल प्ले किया, और जिन्होंने कोई रोल ही नहीं प्ले किया, उनके ऊपर आगे कैसी कारवाही होगी?
सवाल नंबर तीन - अब अहम सवाल। बारूद को पैदा करने वाले कारणों पे सवाल।
कॉलेजों में स्कूलों में टीचर्स नहीं हैं, लेकिन वेकन्सी भी नहीं हैं! लोग बाहर NET पास कर के बेरोजगार फिर रहे हैं, और बच्चे बिना टीचर के परेशांन हैं। ये कॉन्ट्रैक्ट-टीचर का क्या स्कैम है? पक्की नौकरियां क्यों नहीं मिल रही?
सवाल नंबर चार - प्राइवेट सेक्टर और सरकारी सेक्टर की नौकरीयों में दिन रात का अंतर क्यों है? एक पीएन की, चपड़ासी की सरकारी नौकरी पाने के लिए लोग लाइन लगा के खड़े हैं, प्राइवेट सेक्टर में कोई स्कूल में टीचर नहीं लगना चाहता! ये क्या माजरा है? 
मैं लंदन में रहती हूँ तो देखती हूँ के सरकारी नौकरी पाने की कोई होड़ नहीं है, बल्कि ऐसे ऐसे लोग बहुत है जो सरकारी नौकरी छोड़ के प्राइवेट सेक्टर में टीचर लगते हैं। क्यूंकि वहां प्राइवेट और सरकारी दोनों में तन्खा सेम है, बेनिफिट सेम हैं।
हमारे गांव में प्राइवेट स्कूल में टीचर की पे तीन हज़ार है! तीन हज़ार रुपए महीना! फॉर एन एम इन इंग्लिश! इस ईट ए जोक!! स्कूल खोल खोल के लोगों ने कोठी बना ली, निरी पूंजी जोड़ ली, लेकिन वहां काम करने वाले अपने गुजारे तक के पैसे नहीं कमा रहा! यही हाल प्राइवेट फैक्ट्रीज, मॉल, कम्पनीयों का है। एम्प्लोयी को तीन से आठ हज़ार रुपए पे और कंपनी ओनर्स बन गए लखपती! इस घोर पूंजीवाद पे हमे सवाल करने हैं!
सवाल में कई सवाल हैं। हमारी प्राइवेट सेक्टर में मिनिमम बेसिक वेज क्या है? क्या उसपे कोई रेगुलेशन है? प्राइवेट और सरकारी का अंतर कम क्यों नहीं होना चाहिए?
सवाल नंबर पांच - हर साल वोट बैंक की राजनीति करके हम किसी जात को कुछ तो किसी जात को कुछ और लालच देते हैं। कभी कुछ गिफ्ट देते हैं, तो कभी कुछ साधन देते हैं। क्या ये गिफ्ट्स उनको सच में ऊपर उठाने के लिए दिए जाते हैं या सिर्फ अंधी राजनीति है? गरीब आदमी हर जात में है। गरीब जिसके पास रिजर्वेशन नहीं है, वो ये देख के कुढ़ता है। नफरत पनपती है। बारूद बनती है। क्या जात-पात को खत्म करने के लिए कुछ किया जा रहा है या सिर्फ इसे बचाए रखना है क्यूंकि इलेक्शन हर पांच साल में होता है और बिना जात-पात के फिक्स्ड वोट कहाँ?
सवाल नंबर छः - हर जात में गरीब हैं। किसान पिछड़ी जाती ना होते हुए भी सुसाइड कर रहे हैं। इनके options क्या हैं? इनके लिए क्या opportunities हैं?
सवाल नंबर सात: हमारी पढाई, कॉलेजेस का इतना धुम्मा क्यों उठ्या हुआ है? इतनी फ़र्ज़ी क्यों पढाई हो गयी के MA/MBA करे जवान चपड़ासी की एप्लीकेशन भरते हांडे सै? घूम फिर के बात आती है फिर सवाल तीन पे। टीचर्स क्यों नहीं हैं?
ये सवाल सब सरकारों से है। इस से या उससे नहीं। सब कुर्सी वालो से हैं।
सवाल ही सवाल हैं और जवाब में हमे सिर्फ सुनाई देता है, "भारत माता की जय!" किसानों की बात करो तो "फौजियों की जय!" फौजियों की बात करो तो, "किसानों की जय!"
इस कोरी जय से क्या मिलेगा! कैसे बोलदे जय! जब है ही नहीं जय! ना वीरू है, ना ही है जय, रह गयी है खाली माँ!
जो नेता जनता को सही दिशा में बढ़ने की बुद्धि ना दे, वह नेता नहीं है। बाकी चाहे जो कुछ हो! नेता की कथनी और करनी एक जैसी होनी चाहिए। बोलतु संत नहीं, असल का संत चाहिए। लेकिन इनको जब हम वोट देते हैं, इनकी सरपरस्ती कबूल करते हैं, तब हम क्या इस बारे में सोचते हैं? नहीं सोचते हैं! तब हम जात देखते हैं! धर्म देखते हैं! और तब हमारे आदरणीय साधू संत, जो अब हवन कराएँगे, ये लोग तब सही मनुष्य को चुनने का ज्ञान नहीं देते। बल्कि ऐसे भी संत हैं कुछ जो जब वोट दिलवाने निकलते हैं तब कुछ और बोलते हैं, चुनाव जीता कर कुछ और बोलते हैं। संतो को तो कम से कम नेताओं की भाषा नहीं बोलनी चाहिए! उनको तो मानवता की, समाज के हित की बात सिर्फ करनी चाहिए।
जब आग लगायी जा रही थी, तब कौन हमारे साधु संत घर या दुकान के आगे लेट गए, की पहले मुझे जलाओ, अपनी मनुष्यता को जलाओ, तब दुकान या स्कूल जलाना? कौनसे बाबा जी, माता जी, पानी लेकर दौड़े थे आग बुझाने? मैं अभी उन संत लोगो के पाँव छू लूँ, कोई जरा नाम बताओ!
ये बोलते तो कैसे कोई ना रुकता! हम तो बड़े धार्मिक लोग हैं!
अब हवन-यज्ञ से क्या अचीव होगा? लकड़ी जलेगी, जो पहले ही काफी कम है। लेकिन शान्ति आती हो तो पूरा जंगल जला दूँ! लेकिन क्या छत्तीस, छप्पन जातिओं या सभी बिरादरी धर्म के भाई बहनो के मन में जो एक दूसरे के लिए नफरत है, ईर्ष्या है, दुर्विचार हैं, क्रोध है, द्वेष है, ये सब क्या उस हवन में स्वः हो जायेगा? या उसके लिए कुछ और करना होगा? ये सोचने की बात है?
जाते जाते आखरी सवाल खुद से, अपने लोगो से। ये नेता, साधू-संत, तो लेरे हैं सुवाद, इनका नहीं बिगड़ता किम्मे! पर क्या हमे नहीं दिखता के तोड़-फोड़, लूट-पाट, आग लगाने में तो किसे का फायदा नहीं सै! सरकार तै तो मिलके सवाल करेंगे ही, अपने आप से भी करेंगे। इक्कठे चलने में फायदा है, या अकेले में? हम कब मजबूत होंगे? कब हमारे सवालों को जवाब मिलेंगे?
तब जब हम सिर्फ अपनी नहीं अपने पडोसी की नौकरी के लिए भी आवाज़ उठाएंगे। जब वो हमारे लिए आवाज उठाएगा। तो यही है सद्भावना। यही है अपील। यही है हवन और यही है कुंड। जात-पात की आहुति देके, कट्ठे रहन का समय आया है। दुनिया मंगल पे बसन नै होरी है, अर हम रिजर्वेशन की लाइन में लाग रे हाँ! आज हाम लाग रे हाँ, काल कोई और लठ ठावेगा। आज या नफरत, लड़ाई, बैर की बळी देनी है! जब्बे गुजारा है, जब्बे विकास है, जब्बे हरियाणा है, जब्बे दूध दही का खाना है!

जय माता की!

साभार : 

https://www.facebook.com/anuradha.beniwal/posts/10156718251635285





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