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Friday, June 3, 2016

वेद,वैदिक संस्कृति,डॉ रोमिला थापर : भ्रम और निवारण ------ विजय राजबली माथुर/ध्रुव गुप्त

वेद और आर्य शब्दों की साम्राज्यवादी व्याख्या ने भ्रम की स्थिति उत्पन्न की है जिसका पूरा-पूरा लाभ उसकी सहोदरी सांप्रदायिकता ने उठाया है। हालांकि डॉ हरबंस मुखिया ने जे एन यू की राष्ट्रवाद की क्लास में स्पष्ट किया कि, अब अंग्रेजों ने अपने यहाँ इतिहास संशोधित कर लिया है परंतु भारत में अभी भी सांप्रदायिक आधार पर ही इतिहास चल रहा है जिसका लाभ सांप्रदायिक शक्तियों ने भरपूर उठाया है। अतः भ्रम का  शीघ्रातिशीघ्र निवारण होना उचित है ।
http://krantiswar.blogspot.in/2012/11/sampradayikta-dharam-nirpexeta.html
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जे एन यू में डॉ रोमिला थापर एवं डॉ हरबंस मुखिया 



प्रसिद्ध इतिहासकार और चिंतक रोमिला थापर से रणबीर चक्रवर्ती की इतिहास, समाज और संस्कृति पर बातचीत. साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार, अंग्रेज़ी पाक्षिक फ्रंटलाइन में प्रकाशित, रोमिला थापर के लंबे साक्षात्कार “लिंकिंग द पास्ट एंड द प्रेजेंट” का कुछ संपादित रूप है और यहां इसका पहला आधा हिस्सा प्रकाशित किया जा रहा है। अनुवाद: शुभनीत कौशिक। 
1 ) उदाहरण के लिए, जब हम छात्र थे तो हमें यह बताया जाता था कि ऋग्वेद की भाषा इंडो-आर्यन भाषा ही है। पर आज यदि आप ऐसा वक्तव्य दें, तो वैदिक काल में विशेषज्ञता रखने वाले कुछ विद्वान इस कथन से जरूर अपनी असहमति जताएंगे क्योंकि भाषा-विज्ञान के सिद्धांतों के प्रयोग ने यह दर्शाया है कि ऋग्वेद में द्रविड़ भाषाओं के भी अंश सम्मिलित हैं। इन जानकारियों से इतिहासकार के प्रत्यक्षीकरण और स्रोतों के प्रति उसके दृष्टिकोण में भी बदलाव आते हैं। अब ऋग्वेद के संदर्भ में ही यह जानकारी इतिहासकार को ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ के अध्ययन के लिए प्रेरित करती है, जो एकल संस्कृति का न होकर सह-अस्तित्व में विद्यमान उन संस्कृतियों का है, जिनमें एक का प्रभुत्त्व है। तो इतिहासकार को इन अन्य संस्कृतियों के बारे में भी जानकारी जुटानी होगी और उनका अध्ययन करना होगा। इतिहासकार को नदियों के जल तंत्र के अध्ययन (हाइड्रोलॉजी) और आनुवंशिकी के अध्ययन और रिपोर्टों से मिलने वाली जानकारियों का समावेश भी अपने अध्ययन में करना होगा। 

2 ) 
प्राचीन भारत पर काम करने वाले विद्वानों का मानना है कि आर्य भाषा मध्य एशिया से ईरान होते हुए भारत पहुँची। पर अब भारत में कुछ लोगों द्वारा इस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है कि आर्यभाषा भाषी भारत के स्थानीय निवासी ही थे। कुछ तो हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को भी आर्य साबित करते हुए यह सुझाना चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति में कोई गैर-आर्य तत्त्व था ही नहीं! यह ऐसा तर्क है जो मुझे विभिन्न कारणों से कतई स्वीकार नहीं। भाषाई और पुरातात्विक आधार पर भी यह किसी तरह से संभव नहीं जान पड़ता। हम कहते हैं कि ऋग्वैदिक संस्कृति उत्तर-हड़प्पाकालीन थी, तो जाहिर है कि इसका मतलब हुआ कि इसमें इसकी पूर्वतर संस्कृति परिलक्षित नहीं होगी। हड़प्पा संस्कृति का संपर्क ओमान और मेसोपोटामिया से था, जिनका जिक्र ऋग्वेद में नहीं मिलता।

3 )  
हाँ, ऋग्वेद में इस रूप में महापाषाणकालीन (मेगालिथिक) संस्कृति का जिक्र नहीं है। पर इस टेक्स्ट में अन्य समूहों की चर्चा जरूर की गयी है, जैसे असुर, दास, दस्यु आदि। ऋग्वेद दो वर्णों की चर्चा करता है – आर्य और दास। ‘दास’ कौन थे? उनके बारे में ऋग्वेद में जो विवरण मिलता है वह यह है कि वे उन कर्मकांडों और रीति-रिवाजों को मानने वाले थे, जो आर्यों से भिन्न थे। ‘दास’ अलग देवताओं की उपासना करते थे, और वे वैदिक ग्रंथों के लेखकों की भाषा से भिन्न भाषाएँ बोलते थे। वे समृद्ध थे, मवेशियों के रूप में उनकी संपत्ति ईर्ष्या का विषय थी और वे अलग बसावटों में रहते थे। इसलिए कुछ विद्वान यह भी सोचते हैं कि वे अलग संस्कृति के थे। इतिहासकार के रूप में हमें यह सवाल करना होगा कि ‘दास कौन थे’ और उनका मिथकीकरण क्यों किया गया?

इसी तरह ‘दासी-पुत्र ब्राह्मणों’ का भी उल्लेख मिलता है। जिन्हें पहले तो अस्वीकार्य माना गया, पर बाद में जब इन लोगों ने अपनी शक्ति दिखाई तो उन्हें ब्राह्मण के रूप में स्वीकार कर लिया गया। ‘दासी-पुत्र ब्राह्मण’ स्वयं में ही एक विरोधाभाषी शब्द है क्योंकि ‘दासी-पुत्र’ (यानि एक दासी से उत्पन्न हुआ पुत्र) होना और ब्राह्मण की हैसियत दोनों में विरोध भाव है। वैदिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि देवों और असुरों में अक्सर संघर्ष होते रहते थे। यह एक स्तर पर मिथक है, पर यह मिथक भी तत्कालीन समाज की अवधारणाओं से बिलकुल अलग नहीं है। इतिहासकारों के मत में, वैदिक ग्रंथों में उत्तर-हड़प्पा काल से लेकर ईसापूर्व पाँचवी सदी के ऐतिहासिक नगरों के रूप में नगरीय संस्कृति के उदय तक का उल्लेख मिलता है। ऐसी स्थिति में क्या यह कहना संभव है कि ये वैदिक ग्रंथ संस्कृति के एक पैटर्न के उद्विकास के परिचायक भर हैं!

4 ) एक प्रचलित तर्क यह भी है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और भारत से ही वे दुनिया के अन्य हिस्सों में गए और यूरोप में भी सभ्यता लेकर आर्य ही गए। इस सिद्धांत की खोज की गयी 19वीं सदी में, पर यह आज भी उतना ही लोकप्रिय है। सबसे पहले अमेरिका के थिओसोफिस्ट, कर्नल हेनरी एस ओलकाट ने इसे प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत थिओसोफिस्टों ने अपना लिया। यद्यपि थिओसोफिस्ट कुछ समय के लिए आर्य समाज के निकट थे, पर स्वयं आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य तिब्बत से आए थे। 

ये वे सिद्धांत हैं जो भारत के प्राचीनतम अतीत से जुड़े ऐतिहासिक विवादों से गहरे जुड़े हुए हैं। इनकी शुरुआत 19वीं सदी में हुई। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि यह वही समय था जब ‘नस्ल विज्ञान’ के अधीन यूरोपीय सर्वोच्चता पर, आर्य उत्पत्ति को आधार बनाकर चर्चा की जा रही थी। इनमें से कुछ सिद्धांत, बीसवीं सदी के यूरोप में ‘आर्यवाद’ को विनाशकारी दिशा की ओर ले गए। अतिरेक राष्ट्रवाद और अस्मिता की राजनीति के साथ ऐतिहासिक सिद्धांतों की जुगलबंदी के भयानक नतीजे हो सकते हैं, इसलिए यह ज़रूरी है इन सिद्धांतों पर चर्चा की जाए। 

स्त्रोत :
http://hashiya.blogspot.in/2015/11/blog-post_24.html
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भ्रम निवारण : 
Dhruv Gupt
 02-06-2016  

क्या वैदिक ऋषि सचमुच गोमांस खाते थे ? :

फेसबुक पर और अन्यत्र भी कई मित्रों ने वैदिक साहित्य का हवाला देते हुए बार-बार यह साबित करने की कोशिश की है कि वैदिक ऋषि और उस कालखंड के लोग गोमांस का भक्षण किया करते थे। इस विषय पर मेरे भी मन में भी कुछ उलझनें थीं। कहीं भी अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं पाकर अंततः मैंने देश के कुछ गिने-चुने वेद मर्मज्ञों में एक 'मातृसदन', कनखल, हरिद्वार के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी शिवानंद जी के सामने अपनी जिज्ञासा रखी। उन्होंने बताया कि ज्ञान जब अधकचरा हो तो वेद की ऋचाओं और उपनिषद के मंत्रों के शाब्दिक अर्थ लेकर लोग ऐसी ही स्थापनाएं निकालते हैं। वेद और उपनिषद मूलतः यौगिक साहित्य हैं जिनमें योग की गूढ़ और रहस्यमय क्रियाओं को लौकिक शब्दों और उपमाओं के माध्यम से समझाने के प्रयास किए गए हैं। यह गुरू और शिष्यों के बीच का हजारों वर्षों तक श्रुति परंपरा में चला संवाद है जिसे योग विद्या में प्रवेश करने वाले जिज्ञासु ही समझ सकते हैं। आमलोग जब इन ऋचाओं और मन्त्रों के शाब्दिक अर्थ लगाएंगे तो अर्थ का अनर्थ तो होगा ही। उन्होंने वृहदकारण्य उपनिषद से यह उद्धरण सुनाकर मेरी तमाम जिज्ञासाओं का शमन कर दिया। 

वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चतवारहः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हंतकारहः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हंतकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः। (छा. उ. 5/8/1) 

अर्थात वाक् ही धेनु या गाय है। उस धेनु का प्राण वृषभ है और बछड़ा उसका मन। उसके चार स्तन हैं-स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वाधाकार। उसके दो स्तनों- स्वाहाकार और वषट्कार उपजीवी देवगण हैं जो उनका उपभोग करते हैं। हन्तकार का उपभोग मनुष्य करते हैं और स्वाधाकार का पितृगण। यह एक रूपक है जिसके द्वारा यौगिक क्रिया प्राणोपासना की व्याख्या की गई है। ऐसे कई मंत्रों और ऋचाओं के सतही अर्थ लगाने वाले लोगों ने यह भ्रांति फैलाई है कि वैदिक ऋषि और आमजन गोमांस का भक्षण करते थे।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1062190717190859&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3&permPage=1
********************************************************जी हाँ इसी प्रकार 5 वर्ष से अधिक पुराना वह 'जौ ' जिसे बोने से उगे नहीं को 'अश्व ' कहा जाता था और उसकी हवन में आहुतियाँ दी जाती थीं। पोंगा पंडितों ने अश्व का अर्थ 'घोडा ' लगा कर घोड़े की आहुती देने की बेसुरी तान छेड़ दी । वैदिक संस्कृत को साहित्यिक रूप में न लेकर बीज गणित के सूत्रों की भांति लेंगे तभी सही समाधान पर पहुंचेंगे। लेकिन क्या पोंगा-पंथी और एथीस्ट सच को स्वीकार करेंगे?

****** आर्य न कोई जाति थी न है  : ******
Vijai RajBali Mathur
May 29, 2012 · 
आर्य न कोई जाति थी न है। आर्य=आर्ष=श्रेष्ठ। अर्थात श्रेष्ठ कार्यों को करने वाले सभी व्यक्ति आर्य हैं। 'कृंणवनतों विश्वार्यम' के अनुसार सम्पूर्ण विश्व को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनाना है। लेन पूल,कर्नल टाड आदि-आदि विदेशी और आर सी मजूमदार सरीखे भारतीय इतिहासकारों ने साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ती हेतु आर्यों को एक जाति के रूप मे निरूपित करके बेकार का झगड़ा खड़ा किया है।
अब से लगभग 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव-सृष्टि इस पृथ्वी पर हुई तो विश्व मे तीन स्थानों-
1-मध्य यूरोप,
2- मध्य अफ्रीका ,
3-मध्य एशिया –मे एक साथ ‘युवा स्त्री और युवा पुरुषों’के जोड़े सृजित हुये। भौगोलिक स्थिति की भिन्नता से तीनों के रूप-रंग ,कद-काठी मे भिन्नता हुई। इन लोगों के माध्यम से जन-संख्या वृद्धि होती रही। जहां-जहां प्रकृति ने राह दी वहाँ-वहाँ सभ्यता और संस्कृति का विकास होता गया और जहां प्रकृति की विषमताओं ने रोका वहीं-वहीं रुक गया। 
मध्य एशिया के ‘त्रिवृष्टि’जो अब तिब्बत कहलाता है उत्पन्न मानव तीव्र विकास कर सके जबकि दूसरी जगहों के मानव पिछड़ गए। आबादी बढ्ने पर त्रिवृष्टि के लोग दक्षिण के निर्जन प्रदेश आर्यावृत्त मे आकर बसने लगे।जब ‘जंबू द्वीप’उत्तर की ओर ‘आर्यावृत्त’ से जुड़ गया तो यह आबादी उधर भी फ़ेल गई। चूंकि आबादी का यह विस्तार निर्जन प्रदेशों की ओर था अतः किसी को उजाड़ने,परास्त करने का प्रश्न ही न था। साम्राज्यवादियों ने फूट परस्ती की नीतियों के तहत आर्य को जाति बता कर व्यर्थ का बखेड़ा खड़ा किया है। त्रिवृष्टि से आर्यावृत्त आए इन श्रेष्ठ लोगों अर्थात आर्यों ने सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान-विज्ञान से परिचित कराने का बीड़ा उठाया। इस क्रम मे जिन विद्वानों ने पश्चिम से प्रस्थान किया उनका पहला पड़ाव जहाँ स्थापित हुआ उसे ‘आर्यनगर’ कहा गया जो बाद मे एर्यान और फिर ईरान कहलाया। ईरान के अंतिम शासक तक ने खुद को आर्य मेहर रज़ा पहलवी कहा। आगे बढ़ कर ये आर्य मध्य एशिया होकर यूरोप पहुंचे। यूरोपीयो ने खुद को मूल आर्य घोषित करके भारत पर आक्रमण की झूठी कहाने गढ़ दी जो आज भी यहाँ जातीय वैमनस्य का कारण है। 
‘तक्षक’ और ‘मय’ऋषियों के नेतृत्व मे पूर्व दिशा से विद्वान वर्तमान साईबेरिया के ब्लादिवोस्तक होते हुये उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के अलास्का (जो केनाडा के उत्तर मे यू एस ए के कब्जे वाला क्षेत्र है)से दक्षिण की ओर बढ़े। ‘तक्षक’ ऋषि ने जहां पड़ाव डाला वह आज भी उनके नाम पर ही ‘टेक्सास’ कहलाता है जहां जान एफ केनेडी को गोली मारी गई थी। ‘मय’ ऋषि दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के जिस स्थान पर रुके वह आज भी उनके नाम पर ‘मेक्सिको’ कहलाता है। 
दक्षिण दिशा से जाने वाले ऋषियों का नेतृत्व ‘पुलत्स्य’ मुनि ने किया था जो वर्तमान आस्ट्रेलिया पहुंचे थे। उनके पुत्र ‘विश्रवा’मुनि महत्वाकांक्षी थे। वह वर्तमान श्रीलंका पहुंचे और शासक ‘सोमाली’ को आस्ट्रेलिया के पास के द्वीप भेज दिया जो आज भी उसी के नाम पर ‘सोमाली लैंड’कहलाता है। विश्रवा के बाद उनके तीन पुत्रों मे सत्ता संघर्ष हुआ और बीच के रावण ने बड़े कुबेर को भगा कर और छोटे विभीषण को मिला कर राज्य हसगात कर लिया। वह साम्राज्यवादी था। उसने साईबेरिया के शासक (जहां 06 माह का दिन और 06 माह की रात होती है अर्थात उत्तरी ध्रुव प्रदेश)’कुंभकर्ण’तथा पाताल-वर्तमान यू एस ए के शासक ‘एरावन’ को मिला कर भारत –भू के आर्यों को चारों ओर से घेर लिया और खुद अपने गुट को ‘रक्षस’=रक्षा करने वाले (उसका दावा था कि यह गुट आर्य सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करने वाला है)कहा जो बाद मे अपभ्रंश होकर ‘राक्षस’कहलाया। 
राम-रावण संघर्ष आर्यों और आर्यों के मध्य राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद का संघर्ष था जिसे विदेशी इतिहासकारों और उनके भारतीय चाटुकारों ने आर्य-द्रविड़ संघर्ष बता कर भारत और श्रीलंका मे आज तक जातीय तनाव /संघर्ष फैला रखा है। 
जब अब आपने यह विषय उठाया है तो विदेशियों के कुतर्क और विकृति को ठुकराने का यही सही वक्त हो सकता है। जनता के बीच इस विभ्रम को दूर किया जाना चाहिए कि ‘आर्य’ कोई जाति थी या है। विश्व का कोई भी व्यक्ति जो श्रेष्ठ कर्म करे आर्य था और अब भी होगा।

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/364918650236784

 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Tuesday, November 4, 2014

वैज्ञानिक समझ 'सत्य ' को नकार कर नहीं बन सकती ---विजय राजबली माथुर


"पाछे पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत " :
 वीरेंद्र यादव जी के उपरोक्त विचार हैं तो महत्वपूर्ण किन्तु समय रहते उन पर गौर नहीं किया गया और अब भी सही ढंग से विरोध नहीं किया जा रहा है। वर्तमान प्रधानमंत्री जिस संगठन के प्रति निष्ठावान हैं उसका कार्य ही अफवाहें फैलाना है। लेकिन ऐसी अफवाहों को तभी बल मिलता है जब सच्चाई को अस्वीकार कर दिया जाता है। सच्चाई तो यह है कि :
*शिव- यह हमारा देश भारत ही शिव है । आप भारत का नक्शा और शिव के रूप की तुलना कर लीजिये स्वतः सिद्ध हो जाएगा। शिव के माथे पर अर्द्ध चंद्रमा भारत भाल पर हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है।जटाओं से निकलती गंगा यही तो संकेत दे रही हैं कि भारत के मस्तक -तिब्बत स्थित 'मानसरोवर' झील से गंगा का उद्गम हुआ है।  शिव का नंदी बैल भारत के कृषि-प्रधान देश होने का प्रतीक है। विभिन्न परस्पर विरोधी जीवों के आभूषण का अभिप्राय है-भारत विविधता में एकता वाला देश है। 
परंतु प्रगतिशील लोग जब एथीज़्म के नाम पर इसका विरोध करेंगे तो अफवाह फैलाने वाला संगठन उसका सरलता से दुरूपयोग करेगा ही जैसा कि अस्पताल के उदघाटन पर किया है। 

* गणेश - गण + ईश = जन-नायक = राष्ट्रपति / राजनेता 
अर्थात जनता का शासक ऐसा होना चाहिए जैसे सूप जैसे कान रखने वाला अभिप्राय यह है कि जन-नायक को सुननी सब की चाहिए। सूंढ जैसी नाक अर्थात जन-नायक की घ्राण शक्ति तीव्र होनी चाहिए और वह अपनी मेधा से जन-आकांछाओ को समझने वाला होना चाहिए। कुप्पा जैसा पेट अर्थात जन-नायक में परस्पर विरोधी बातों को हजम करने की क्षमता होनी चाहिए। चूहे की सवारी अर्थात पञ्च-मार्गियों/आतंक वादियों को कुचल कर रखने वाला हमारा शासक होना चाहिए। 
पुनः प्रगतिशीलों का एथीज़्म इस तथ्य को स्वीकार न करके अफवाह फैलाने वालों को मन-मर्ज़ी मुताबिक व्याख्या करने की खुली छूट देता है। 

यदि मैं अपने ब्लाग्स के माध्यम से 'ढोंग-पाखंड-आडंबर-पोंगा-पंडितवाद' आदि का पर्दाफाश करता हूँ तो साम्यवादियों में घुसपैठ किए हुये पोंगा-पंडित तिलमिला जाते हैं और मुझ पर प्रहार करते हुये 'डांगेईस्ट' /'डांगेकरण ' का खिताब दे डालते हैं। :







  'डांगेईस्ट' /'डांगेकरण ' का खिताब देने की एक वजह इन्दिरा जी का फोटो एक स्टेटस पर लाईक कर देना भी है,लेकिन जब बड़े पदाधिकारी इन्दिरा जी की प्रशंसा करें तो:


जो साहब 'डांगेईस्ट' /'डांगेकरण ' का खिताब देरहे हैं खुद डिप्टी जेनरल मेनेजर हैं और इस प्रकार हजारों मजदूरों का शोषण करने के लिए सीधे-सीधे जिम्मेदार हैं। जिन करात साहब की पैरोकारी में वह ऐसा कर रहे हैं उसके कारण ये हैं :

 उत्तर-प्रदेश भाकपा के अधिकृत ब्लाग में वर्द्धन जी व अतुल अंजान साहब के विचार प्रकाशित कर देने के कारण ही मुझे उसकी एडमिनशिप व आथरशिप से हटा दिया गया था। अतः मैंने http://communistvijai.blogspot.in/  'साम्यवाद(COMMUNISM)'  ब्लाग बना कर उसमें इन वरिष्ठ नेताओं के विचार प्रकाशित कर दिये। जो लोग खुद को उनसे श्रेष्ठ समझते हैं उनके लिए तो मैं किसी भी खेत की मूली नहीं हूँ फिर भी 'डांगेईस्ट' /'डांगेकरण ' का खिताब देरहे हैं।

केंद्र में जिन शक्तियों ने इस सरकार को सत्तासीन किया है उनको करात साहब व उनके भाकपाई  हमदर्द गण  भी सराहते रहे हैं। 26 दिसंबर 2010 को प्रदेश पार्टी कार्यालय में आयोजित गोष्ठी में मुख्य अतिथि अतुल अंजान साहब के बोल चुकने के बाद उनके भाषण के समय पधारे केजरीवाल साहब को बुलवा कर अपने ही राष्ट्रीय सचिव का अपमान किया गया था और 26 दिसंबर 2013 को दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की प्रशंसा प्रदेश सचिव महोदय ने  समारोह के मुख्य अतिथि वीरेंद्र यादव जी  के समक्ष ही की थी। केजरीवाल साहब अफवाह फैलाने वाले संगठन की ही उपज हैं :
 
 केजरीवाल को भाकपा के प्रदेश कार्यालय में राष्ट्रीय सचिव अंजान साहब  से भी अधिक महत्व देने वाले गोष्ठी संचालक महोदय लखनऊ के प्रदेश की ओर से नियुक्त सुपर जिलामंत्री भी हैं, उनकी ओर से अप्रैल 2014 में मोहम्मद अकरम साहब ने मेरे घर पर आकर कहा था कि उनको हटाया नहीं जा सकता है अतः मुझको हटा दिया जाएगा। फिर 16 सितंबर 2014 को मतगणना -स्थल पर उनकी ओर से ही एनुद्दीन साहब ने कहा था कि उनको नहीं हटाया जा सकता अतः मुझे हटाया जाना अब तय है। विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि 23 नवंबर 2014 को प्रस्तावित ज़िला सम्मेलन से पूर्व कागजात में फेर-बदल करके मुझे हटाया जा रहा है। हालांकि मैं पार्टी में रह कर कोई निजी लाभ नहीं उठा रहा हूँ जो मुझे हटाये जाने पर मुझको  उन लोगों की भांति कोई हानि होगी जो पार्टी पदाधिकारी रह कर अपने व्यवसाय में लाभ उठा रहे हैं या जो रु-550/-प्रतिमाह लेवी देकर और सुबह-शाम 2-2 घंटे का समय लगा कर पार्टी पोस्ट के बल पर मार्केट व बैंक मेनेजर्स से 6-7 हज़ार रु की वसूली कर रहे हैं। 

परंतु फिर भी यह बात समझने के लिए काफी है कि कम्युनिस्ट पार्टी क्यों जनता में लोकप्रियता नहीं प्राप्त कर पा रही है या कि केंद्र सरकार कैसे अवैज्ञानिक व्याख्याएँ करके जनता को मूर्ख बना रही है क्योंकि पार्टी को सीधी सच्ची बात कहने वालों की कोई ज़रूरत ही नहीं है। 
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  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Monday, January 6, 2014

सत्य को झुठलाने का प्रयास सत्य को सत्यापित कर गया ---विजय राजबली माथुर

 " उन्होने मुझे पार्टी ब्लाग पर एडमिन राईट्स देकर लिखने को कहा जबकि पिछले छह वर्षों से पार्टी के प्रदेश सचिव तक को उन्होने एडमिन नहीं बनाया था। मुझे इसमें उनकी गहरी चाल नज़र आई और मैंने पार्टी के प्रदेश सचिव डॉ गिरीश जी व प्रदेश सह-सचिव डॉ अरविंद राज जी को उनकी अनुमति लेकर एडमिन बना दिया। इस पर का सं महोदय मुझसे ज़बरदस्त खार खा गए। उन्होने अपने समक्ष मुझे ब्लाग पोस्ट करने को कहा जिससे कि वह मेरा ID पासवर्ड जान कर अपने अज़ीज़ ब्लागर्स से संबन्धित मेरे पोस्ट्स डिलीट कर सकें।...........................................................................
................ 09 सितंबर को का सं महोदय ने राष्ट्रीय सचिव कामरेड अनजान साहब से संबन्धित मेरी एक पोस्ट भी ब्लाग से डिलीट कर दी और मुझे एडमिन व आथरशिप से हटा दिया।अगले ही दिन 10 सितंबर 2013  को मैंने 'साम्यवाद (COMMUNISM)' नामक एक अलग ब्लाग बना कर उसमें उस  डिलीटेड पोस्ट को भी प्रकाशित कर दिया। तब से अब तक 112 दिन में 92 पोस्ट्स प्रकाशित हो चुकी हैं जिनको 5441 बार पढ़ा जा चुका है और 18 ब्लाग फालोर्स हो चुके हैं। जब  04 जून को पहली पोस्ट मैंने पार्टी ब्लाग में दी थी तब उसके फालोअर्स 50 थे और जब मुझे उससे प्रथक किया गया -09 सितंबर को उस ब्लाग के फालोअर्स बढ़ कर 65 हो चुके थे। 20 नवंबर 2013  से हमने एक नया फेसबुक ग्रुप 'UNITED COMMUNIST FRONT' भी प्रारम्भ कर दिया है  और आज तक 216 कामरेड्स उसके सदस्य बन चुके हैं।" यह 31 दिसंबर को प्रकाशित एक लेख के अंश हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि इसके तथ्यों को छिपाने के उद्देश्य से उन कार्यकारी संपादक महोदय ने अपने उन मौसेरे भाई जिनहोने मुझे फेसबुक पर श्रद्धांजली दी थी के साथ मिल कर 14-15 फर्जी लोगों से फेसबुक पर मेरे आई डी को फेक घोषित करा के अस्थाई रूप से ब्लाक करा दिया जिस कारण अभी फेसबुक ग्रुप्स में लिंक नहीं लग पा रहे हैं। 
उन लोगों के इस कृत्य से तो मेरे द्वारा वर्णित सत्य का ही सत्यापन हो जाता है कि वह मेरा आई डी/पासवर्ड ज्ञात कर कुराफ़ात करना चाहते थे। उनकी समझ है कि प्रतिबंधित करा के वे मेरे पोस्ट्स को लोगों तक कुछ समय तक पहुँचने से रोकने में कामयाब हो जाएंगे। परंतु यही बात उनकी 'नैतिक पराजय'को भी रेखांकित करती है। 
गृह युद्ध तब,अब दूर नहीं---विजय राजबली माथुर
जिस प्रकार कारपोरेट वर्ग का एक खेमा और वर्तमान पी एम मनमोहन सिंह जी केजरीवाल की पीठ पर खड़े हैं और पर्दे के पीछे से RSS का जो समर्थन उनको प्राप्त है उससे तो यही लगता है की यदि इस बार भी जनता को छल कर यदि केजरीवाल को केंद्र की सत्ता सौंप दी गई तो दक्षिन पंथी असैनिक तानाशाही स्थापित करने का पहला चरण पूर्ण हो जाएगा और तब लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से उसे अपदस्थ करना दुष्कर हो जाएगा क्योंकि 'सलवा जुडूम' जैसे कृत्य करके उसका बचाव RSS तब खुल कर करेगा। उन परिस्थितियों में किसान-मजदूर के हिमायती हिंसक नक्सली गुट ही उसका मुक़ाबला करने को सामने रहेंगे। शोषित-उत्पीड़ित जनता तब उन हिंसक नक्सलियों का ही साथ देगी न कि साम्यवाद का चोला ओढ़े कारपोरेट दलालों का। वह समय शीघ्र भी आ सकता है यदि समय रहते समस्त कम्युनिस्ट लोकतान्त्रिक शक्तियाँ एकजुट होकर 'आ आ पा =आप',भाजपा/इन्दिरा कांग्रेस के विरोध में न आकर बंट कर परस्पर संघर्ष करती रहीं तो।
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Vijai RajBali Mathur
कम्युनिस्टों के बीच छिपे कारपोरेट दलालों/आ आ पा/केजरी समर्थकों ने पहले तो फेसबुक ग्रुप्स में 'साम्यवाद(COMMUNISM)' ब्लाग को ब्लाक करवाया फिर उसके बाद मेरी उस आई डी जिसके द्वारा उक्त ब्लाग का लेखन होता था उसको ब्लाक करवा दिया है। अतः उस ब्लाग पर पोस्ट्स पढ़ने के इच्छुक लोगों से प्रार्थना है कि स्वतः ही ब्लाग का अवलोकन कर लिया करें जब तक कि पोस्ट्स फेसबुक और इसके ग्रुप्स में लिंक करना प्रतिबंधित है।
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 ~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, March 12, 2012

यू पी चुनाव और कम्यूनिज़्म की संभावनाएं

"मायावती की माया और मुलायम की माया में कुछ बहुत फ़र्क नहीं है। दोनों ही मायावी हैं। जातीय राजनीति में आकंठ धंसे, भ्रष्टाचार में सिर से पांव तक सने और तानाशाही का मुकुट पहने अहंकार के समुद्र में लेटे दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। उत्तर प्रदेश की जनता यह भली भांति जानती है कि एक नागनाथ है तो दूसरा सांपनाथ। पर चूंकि उस के पास विकल्प भी कुछ और नहीं है तो ऐसे में जनता करे भी तो क्या। रही बात भाजपा और कांग्रेस की तो वह दोनों भी कुछ दूसरी विशेषताओं के साथ ही सही नागनाथ और सांपनाथ की ही भूमिका में भारतीय राजनीति में उपस्थित हैं। सो हैरान-परेशान जनता करे तो आखिर क्या करे? क्यों कि सच तो यह है कि इन में से किसी भी एक दल का लोकतंत्र या लोकतांत्रिक मूल्यों में यकीन एक पैसे का भी नहीं रहा। सभी प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों मे तब्दील हैं। बल्कि कारपोरेट कल्चर में लथ-पथ। सब के सब जनता के दम पर जनता पर राज करने की फ़िराक में रहते हैं। सेवा-सुशासन आदि इन के लिए पुरातात्विक महत्व की बातें हो चली हैं।"


('हस्तक्षेप' मे व्यक्त ये विचार है 30 जनवरी 1958 को जन्मे  और 33 वर्ष का अनुभव लिए  वरिष्ठ पत्रकार दयानन्द पांडे जी के)  

यो  तो संबन्धित लेख मे पांडे जी की और बाते भी सत्य है किन्तु उपरोक्त अनुच्छेद अक्षरशः सत्य है। इसमे "पर चूंकि उस के पास विकल्प भी कुछ और नहीं है तो ऐसे में जनता करे भी तो क्या।" वाक्य विशेष उल्लेखनीय है। इस बार के चुनावो मे 'बाम पंथी मोर्चा' ने कुल 115 स्थानो पर जिसमे से भाकपा ने 51 सीटो पर चुनाव लड़ा था। परिणामो से पता चलता है कि जनता ने इनमे से किसी पर विश्वास नही किया। आखिर क्यो?जिस प्रकार बर्तन से मात्र डेढ़ चावल देख कर अनुमान लग जाता है कि खिचड़ी पकी है अथवा नही।उसी प्रकार मात्र लखनऊ (मलीहाबाद -सु ) विधान सभा क्षेत्र के भाकपा प्रत्याशी के चुनाव अभियान मे भाग लेने से मैंने अनुमान लगाया है कि पार्टी कामरेड्स ने 'मनसा-वाचा-कर्मणा' पार्टी प्रत्याशियों का साथ दिया ही नही तब जनता क्या करे?कही किसी और कही किसी बहाने से पार्टी कामरेड्स ने अपने अधिकृत प्रत्याशियों को जिताने की अपेक्षा समाजवादी पार्टी के हित मे कार्य किया । एक वरिष्ठ कामरेड ने मुझे व्यक्तिगत रूप से ई मेल पर मेरे द्वारा व्यक्त चिंता  पर यह टिप्पणी दी-"Dear com. lal salam
What you have wrote in your blog is looks everywhere in India, so do not bother . In each party congress the decisions taken are not followed by the state parties so we are far away from victory in elections,& loosing the candidates in parliamentary elections ,those which are contesting elections they are pure workers of the party and trying to hold ideology of communist party.In India corrupt & bad malpractices win the election .Unit should strong on the base of masses to contest elections so we can win."


आखिर हम जनता को क्यो समझाने मे विफल रहते हैं?इसका कारण वरिष्ठ कामरेड और विद्वान लेखक अनिल राजिम वाले साहब ने पार्टी जीवन मे लिखे एक लेख मे   स्पष्ट किया है कि बावजूद रूसी नेताओ लेनिन,स्टालिन आदि के समझाने के बाद भी हमारे संस्थापक नेताओ द्वारा उनकी बाते न मानना है। रूसी नेताओ ने भारतीय नेताओ को सुझाव दिया था कि भारतीय परिस्थितियो के अनुरूप पार्टी का गठन और इसका प्रचार करे न कि रूसी पैटर्न की नकल करे। परंतु हमारे नेताओ ने उनकी उपेक्षा करके रूसी पैटर्न को अपना लिया और परिणाम हमारे सामने हैं। खुद रूस मे भी उनका पैटर्न विफल हो गया और जो चीन मे चल रहा है वह वस्तुतः पूंजीवादी तानाशाही है न कि 'कम्यूनिज़्म'। 


कम्यूनिज़्म मूलतः भारतीय अवधारणा है जो मैक्स मूलर साहब द्वारा ले जाई गई मूल पांडु लिपियों के साथ जर्मनी पहुंची और उनके द्वारा जर्मन भाषा मे किए गए अनुवादों के आधार पर कार्ल मार्क्स द्वारा -दास केपिटल एवं कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के द्वारा प्रचारित व प्रसारित की गई। विदेशी विद्वानो ने न तो भारतीय संदर्भों का उल्लेख किया न ही पालन फलतः व्यवहारिक धरातल पर उनके सिद्धान्त टिक न सके। लेकिन आज भी भारतीय कामरेड्स उसी प्रवृति को अपना कर भारत मे कम्यूनिज़्म लाने का दिवा-स्वप्न देखते हैं। मैंने अपने लेख मे गत वर्ष ही लिखा था जिसे ज्यों का त्यों पुनः उद्धृत कर रहा हूँ और मुझे पूर्ण विश्वास है कि आगामी 27 मार्च से 31 मार्च तक होने वाली पार्टी कान्फरेंस मे यदि भारतीय संदर्भों के आधार पर प्रचार -शैली को अपनाने का निश्चय हो जाये तो संसदीय चुनावो मे जनता का समर्थन हासिल करके भारत मे सफलता पूर्वक कम्यूनिज़्म को लागू किया जा सकता है। -

वैदिक मत के अनुसार मानव कौन ?

त्याग-तपस्या से पवित्र -परिपुष्ट हुआ जिसका 'तन'है,
भद्र भावना-भरा स्नेह-संयुक्त शुद्ध जिसका 'मन'है.
होता व्यय नित-प्रति पर -हित में,जिसका शुची संचित 'धन'है,
वही श्रेष्ठ -सच्चा 'मानव'है,धन्य उसी का 'जीवन' है.


इसी को आधार मान कर महर्षि कार्ल मार्क्स द्वारा  साम्यवाद का वह सिद्धान्त प्रतिपादित  किया गया जिसमें मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त करने का मन्त्र बताया गया है. वस्तुतः मैक्स मूलर सा : हमारे देश से जो संस्कृत की मूल -पांडुलिपियाँ ले गए थे और उनके जर्मन अनुवाद में जिनका जिक्र था महर्षि कार्ल मार्क्स ने उनके गहन अध्ययन से जो निष्कर्ष निकाले थे उन्हें 'दास कैपिटल' में लिपिबद्ध किया था और यही ग्रन्थ सम्पूर्ण विश्व में कम्यूनिज्म  का आधिकारिक स्त्रोत है.स्वंय मार्क्स महोदय ने इन सिद्धांतों को देश-काल-परिस्थिति के अनुसार लागू करने की बात कही है ;परन्तु दुर्भाग्य से हमारे देश में इन्हें लागू करते समय इस देश की परिस्थितियों को नजर-अंदाज कर दिया गया जिसका यह दुष्परिणाम है कि हमारे देश में कम्यूनिज्म को विदेशी अवधारणा मान कर उसके सम्बन्ध में दुष्प्रचार किया गया और धर्म-भीरु जनता के बीच इसे धर्म-विरोधी सिद्ध किया जाता है.जबकि धर्म के तथा-कथित ठेकेदार खुद ही अधार्मिक हैं परन्तु हमारे कम्यूनिस्ट साथी इस बात को कहते एवं बताते नहीं हैं.नतीजतन जनता गुमराह होती एवं भटकती रहती है तथा अधार्मिक एवं शोषक-उत्पीडक लोग कामयाब हो जाते हैं.आजादी के ६३ वर्ष एवं कम्यूनिस्ट आंदोलन की स्थापना के ८६ वर्ष बाद भी सही एवं वास्तविक स्थिति जनता के समक्ष न आ सकी है.मैंने अपने इस ब्लॉग 'क्रान्तिस्वर' के माध्यम से ढोंग,पाखण्ड एवं अधार्मिकता का पर्दाफ़ाश  करने का अभियान चला रखा है जिस पर आर.एस.एस.से सम्बंधित लोग तीखा प्रहार करते हैं परन्तु एक भी बामपंथी या कम्यूनिस्ट साथी ने उसका समर्थन करना अपना कर्तव्य नहीं समझा है.'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता'  परन्तु कवीन्द्र रवीन्द्र के 'एक्ला चलो रे ' के तहत मैं लगातार लोगों के समक्ष सच्चाई लाने का प्रयास कर रहा हूँ -'दंतेवाडा त्रासदी समाधान क्या है?','क्रांतिकारी राम','रावण-वध एक पूर्व निर्धारित योजना','सीता का विद्रोह','सीता की कूटनीति का कमाल','सर्वे भवन्तु सुखिनः','पं.बंगाल के बंधुओं से एक बे पर की उड़ान','समाजवाद और वैदिक मत','पूजा क्या?क्यों?कैसे?','प्रलय की भविष्यवाणी झूठी है -यह दुनिया अनूठी है' ,समाजवाद और महर्षि कार्लमार्क्स,१८५७ की प्रथम क्रान्ति आदि अनेक लेख मैंने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित अभिमत के अनुसार प्रस्तुत किये हैं जो संतों एवं अनुभवी विद्वानों के वचनों पर आधारित हैं.

मेरा विचार है कि अब समय आ गया है जब भारतीय कम्यूनिस्टों को भारतीय सन्दर्भों के साथ जनता के समक्ष आना चाहिए और बताना चाहिए कि धर्म वह नहीं है जिसमें जनता को उलझा कर उसका शोषण पुख्ता किया जाता है बल्कि वास्तविक धर्म वह है जो वैदिक मतानुसार जीवन-यापन के वही सिद्धांत बताता है जो कम्यूनिज्म का मूलाधार हैं.कविवर नन्द लाल जी यही कहते हैं :-

जिस नर में आत्मिक शक्ति है ,वह शीश झुकाना क्या जाने?
जिस दिल में ईश्वर भक्ति है वह पाप कमाना क्या जाने?
माँ -बाप की सेवा करते हैं ,उनके दुखों को हरते हैं.
वह मथुरा,काशी,हरिद्वार,वृन्दावन जाना क्या जाने?
दो काल करें संध्या व हवन,नित सत्संग में जो जाते हैं.
भगवान् का है विशवास जिन्हें दुःख में घबराना क्या जानें?
जो खेला है तलवारों से और अग्नि के अंगारों से .
रण- भूमि में पीछे जा के वह कदम हटाना क्या जानें?
हो कर्मवीर और धर्मवीर वेदों का पढने वाला हो .
वह निर्बल दुखिया बच्चों पर तलवार चलाना क्या जाने?
मन मंदिर में भगवान् बसा जो उसकी पूजा करता है.
मंदिर के देवता पर जाकर वह फूल चढ़ाना क्या जानें?
जिसका अच्छा आचार नहीं और धर्म से जिसको प्यार नहीं.
जिसका सच्चा व्यवहार नहीं 'नन्दलाल' का गाना क्या जानें?

संत कबीर आदि दयानंद सरस्वती,विवेकानंद आदि महा पुरुषों ने धर्म की विकृतियों तथा पाखंड का जो पर्दाफ़ाश किया है उनका सहारा लेकर भारतीय कम्यूनिस्टों को जनता के समक्ष जाना चाहिए तभी अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति और जनता का शोषण समाप्त किया जा सकता है.दरअसल भारतीय वांग्मय में ही कम्यूनिज्म सफल हो सकता है ,यूरोपीय वांग्मय में इसकी विफलता का कारण भी लागू करने की गलत पद्धतियाँ ही थीं.सम्पूर्ण वैदिक मत और हमारे अर्वाचीन पूर्वजों के इतिहास में कम्यूनिस्ट अवधारणा सहजता से देखी जा सकती है -हमें उसी का आश्रय लेना होगा तभी हम सफल हो सकते हैं -भविष्य तो उज्जवल है बस उसे सही ढंग से कहने की जरूरत भर है। 

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यदि हम चुनावो मे जनता के समक्ष कम्युनिस्ट पार्टी को एक विकल्प के रूप मे प्रस्तुत करेंगे तो निश्चय ही जनता कम्यूनिज़्म के अतिरिक्त किसी और को नहीं चुनेगी बस सिर्फ उसे समझाना भर है कि कम्यूनिज़्म भारतीय विचार धारा है ,विदेशी नहीं -विदेश मे विफलता ही इसी कारण मिली क्योंकि वह भारतीय अवधारणा पर नही चलाई गई थी।ज़ोर शोर से खुद को ठेठ और पुराना कम्युनिस्ट कहने वाले कलाई पर कलावा बांधते है,मजार,मस्जिद और मंदिर भी जाते हैं उनकी कथनी और करनी मे अंतर रहता है। किन्तु मेरे द्वारा विश्लेषित दृष्टिकोण को सिरे से ही ठुकरा देते हैं। यदि 'सत्य' को स्वीकार किया जाये तो सफलता स्वतः मिलेगी।