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Friday, June 3, 2016

वेद,वैदिक संस्कृति,डॉ रोमिला थापर : भ्रम और निवारण ------ विजय राजबली माथुर/ध्रुव गुप्त

वेद और आर्य शब्दों की साम्राज्यवादी व्याख्या ने भ्रम की स्थिति उत्पन्न की है जिसका पूरा-पूरा लाभ उसकी सहोदरी सांप्रदायिकता ने उठाया है। हालांकि डॉ हरबंस मुखिया ने जे एन यू की राष्ट्रवाद की क्लास में स्पष्ट किया कि, अब अंग्रेजों ने अपने यहाँ इतिहास संशोधित कर लिया है परंतु भारत में अभी भी सांप्रदायिक आधार पर ही इतिहास चल रहा है जिसका लाभ सांप्रदायिक शक्तियों ने भरपूर उठाया है। अतः भ्रम का  शीघ्रातिशीघ्र निवारण होना उचित है ।
http://krantiswar.blogspot.in/2012/11/sampradayikta-dharam-nirpexeta.html
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जे एन यू में डॉ रोमिला थापर एवं डॉ हरबंस मुखिया 



प्रसिद्ध इतिहासकार और चिंतक रोमिला थापर से रणबीर चक्रवर्ती की इतिहास, समाज और संस्कृति पर बातचीत. साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार, अंग्रेज़ी पाक्षिक फ्रंटलाइन में प्रकाशित, रोमिला थापर के लंबे साक्षात्कार “लिंकिंग द पास्ट एंड द प्रेजेंट” का कुछ संपादित रूप है और यहां इसका पहला आधा हिस्सा प्रकाशित किया जा रहा है। अनुवाद: शुभनीत कौशिक। 
1 ) उदाहरण के लिए, जब हम छात्र थे तो हमें यह बताया जाता था कि ऋग्वेद की भाषा इंडो-आर्यन भाषा ही है। पर आज यदि आप ऐसा वक्तव्य दें, तो वैदिक काल में विशेषज्ञता रखने वाले कुछ विद्वान इस कथन से जरूर अपनी असहमति जताएंगे क्योंकि भाषा-विज्ञान के सिद्धांतों के प्रयोग ने यह दर्शाया है कि ऋग्वेद में द्रविड़ भाषाओं के भी अंश सम्मिलित हैं। इन जानकारियों से इतिहासकार के प्रत्यक्षीकरण और स्रोतों के प्रति उसके दृष्टिकोण में भी बदलाव आते हैं। अब ऋग्वेद के संदर्भ में ही यह जानकारी इतिहासकार को ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ के अध्ययन के लिए प्रेरित करती है, जो एकल संस्कृति का न होकर सह-अस्तित्व में विद्यमान उन संस्कृतियों का है, जिनमें एक का प्रभुत्त्व है। तो इतिहासकार को इन अन्य संस्कृतियों के बारे में भी जानकारी जुटानी होगी और उनका अध्ययन करना होगा। इतिहासकार को नदियों के जल तंत्र के अध्ययन (हाइड्रोलॉजी) और आनुवंशिकी के अध्ययन और रिपोर्टों से मिलने वाली जानकारियों का समावेश भी अपने अध्ययन में करना होगा। 

2 ) 
प्राचीन भारत पर काम करने वाले विद्वानों का मानना है कि आर्य भाषा मध्य एशिया से ईरान होते हुए भारत पहुँची। पर अब भारत में कुछ लोगों द्वारा इस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है कि आर्यभाषा भाषी भारत के स्थानीय निवासी ही थे। कुछ तो हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को भी आर्य साबित करते हुए यह सुझाना चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति में कोई गैर-आर्य तत्त्व था ही नहीं! यह ऐसा तर्क है जो मुझे विभिन्न कारणों से कतई स्वीकार नहीं। भाषाई और पुरातात्विक आधार पर भी यह किसी तरह से संभव नहीं जान पड़ता। हम कहते हैं कि ऋग्वैदिक संस्कृति उत्तर-हड़प्पाकालीन थी, तो जाहिर है कि इसका मतलब हुआ कि इसमें इसकी पूर्वतर संस्कृति परिलक्षित नहीं होगी। हड़प्पा संस्कृति का संपर्क ओमान और मेसोपोटामिया से था, जिनका जिक्र ऋग्वेद में नहीं मिलता।

3 )  
हाँ, ऋग्वेद में इस रूप में महापाषाणकालीन (मेगालिथिक) संस्कृति का जिक्र नहीं है। पर इस टेक्स्ट में अन्य समूहों की चर्चा जरूर की गयी है, जैसे असुर, दास, दस्यु आदि। ऋग्वेद दो वर्णों की चर्चा करता है – आर्य और दास। ‘दास’ कौन थे? उनके बारे में ऋग्वेद में जो विवरण मिलता है वह यह है कि वे उन कर्मकांडों और रीति-रिवाजों को मानने वाले थे, जो आर्यों से भिन्न थे। ‘दास’ अलग देवताओं की उपासना करते थे, और वे वैदिक ग्रंथों के लेखकों की भाषा से भिन्न भाषाएँ बोलते थे। वे समृद्ध थे, मवेशियों के रूप में उनकी संपत्ति ईर्ष्या का विषय थी और वे अलग बसावटों में रहते थे। इसलिए कुछ विद्वान यह भी सोचते हैं कि वे अलग संस्कृति के थे। इतिहासकार के रूप में हमें यह सवाल करना होगा कि ‘दास कौन थे’ और उनका मिथकीकरण क्यों किया गया?

इसी तरह ‘दासी-पुत्र ब्राह्मणों’ का भी उल्लेख मिलता है। जिन्हें पहले तो अस्वीकार्य माना गया, पर बाद में जब इन लोगों ने अपनी शक्ति दिखाई तो उन्हें ब्राह्मण के रूप में स्वीकार कर लिया गया। ‘दासी-पुत्र ब्राह्मण’ स्वयं में ही एक विरोधाभाषी शब्द है क्योंकि ‘दासी-पुत्र’ (यानि एक दासी से उत्पन्न हुआ पुत्र) होना और ब्राह्मण की हैसियत दोनों में विरोध भाव है। वैदिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि देवों और असुरों में अक्सर संघर्ष होते रहते थे। यह एक स्तर पर मिथक है, पर यह मिथक भी तत्कालीन समाज की अवधारणाओं से बिलकुल अलग नहीं है। इतिहासकारों के मत में, वैदिक ग्रंथों में उत्तर-हड़प्पा काल से लेकर ईसापूर्व पाँचवी सदी के ऐतिहासिक नगरों के रूप में नगरीय संस्कृति के उदय तक का उल्लेख मिलता है। ऐसी स्थिति में क्या यह कहना संभव है कि ये वैदिक ग्रंथ संस्कृति के एक पैटर्न के उद्विकास के परिचायक भर हैं!

4 ) एक प्रचलित तर्क यह भी है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और भारत से ही वे दुनिया के अन्य हिस्सों में गए और यूरोप में भी सभ्यता लेकर आर्य ही गए। इस सिद्धांत की खोज की गयी 19वीं सदी में, पर यह आज भी उतना ही लोकप्रिय है। सबसे पहले अमेरिका के थिओसोफिस्ट, कर्नल हेनरी एस ओलकाट ने इसे प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत थिओसोफिस्टों ने अपना लिया। यद्यपि थिओसोफिस्ट कुछ समय के लिए आर्य समाज के निकट थे, पर स्वयं आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य तिब्बत से आए थे। 

ये वे सिद्धांत हैं जो भारत के प्राचीनतम अतीत से जुड़े ऐतिहासिक विवादों से गहरे जुड़े हुए हैं। इनकी शुरुआत 19वीं सदी में हुई। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि यह वही समय था जब ‘नस्ल विज्ञान’ के अधीन यूरोपीय सर्वोच्चता पर, आर्य उत्पत्ति को आधार बनाकर चर्चा की जा रही थी। इनमें से कुछ सिद्धांत, बीसवीं सदी के यूरोप में ‘आर्यवाद’ को विनाशकारी दिशा की ओर ले गए। अतिरेक राष्ट्रवाद और अस्मिता की राजनीति के साथ ऐतिहासिक सिद्धांतों की जुगलबंदी के भयानक नतीजे हो सकते हैं, इसलिए यह ज़रूरी है इन सिद्धांतों पर चर्चा की जाए। 

स्त्रोत :
http://hashiya.blogspot.in/2015/11/blog-post_24.html
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भ्रम निवारण : 
Dhruv Gupt
 02-06-2016  

क्या वैदिक ऋषि सचमुच गोमांस खाते थे ? :

फेसबुक पर और अन्यत्र भी कई मित्रों ने वैदिक साहित्य का हवाला देते हुए बार-बार यह साबित करने की कोशिश की है कि वैदिक ऋषि और उस कालखंड के लोग गोमांस का भक्षण किया करते थे। इस विषय पर मेरे भी मन में भी कुछ उलझनें थीं। कहीं भी अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं पाकर अंततः मैंने देश के कुछ गिने-चुने वेद मर्मज्ञों में एक 'मातृसदन', कनखल, हरिद्वार के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी शिवानंद जी के सामने अपनी जिज्ञासा रखी। उन्होंने बताया कि ज्ञान जब अधकचरा हो तो वेद की ऋचाओं और उपनिषद के मंत्रों के शाब्दिक अर्थ लेकर लोग ऐसी ही स्थापनाएं निकालते हैं। वेद और उपनिषद मूलतः यौगिक साहित्य हैं जिनमें योग की गूढ़ और रहस्यमय क्रियाओं को लौकिक शब्दों और उपमाओं के माध्यम से समझाने के प्रयास किए गए हैं। यह गुरू और शिष्यों के बीच का हजारों वर्षों तक श्रुति परंपरा में चला संवाद है जिसे योग विद्या में प्रवेश करने वाले जिज्ञासु ही समझ सकते हैं। आमलोग जब इन ऋचाओं और मन्त्रों के शाब्दिक अर्थ लगाएंगे तो अर्थ का अनर्थ तो होगा ही। उन्होंने वृहदकारण्य उपनिषद से यह उद्धरण सुनाकर मेरी तमाम जिज्ञासाओं का शमन कर दिया। 

वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चतवारहः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हंतकारहः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हंतकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः। (छा. उ. 5/8/1) 

अर्थात वाक् ही धेनु या गाय है। उस धेनु का प्राण वृषभ है और बछड़ा उसका मन। उसके चार स्तन हैं-स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वाधाकार। उसके दो स्तनों- स्वाहाकार और वषट्कार उपजीवी देवगण हैं जो उनका उपभोग करते हैं। हन्तकार का उपभोग मनुष्य करते हैं और स्वाधाकार का पितृगण। यह एक रूपक है जिसके द्वारा यौगिक क्रिया प्राणोपासना की व्याख्या की गई है। ऐसे कई मंत्रों और ऋचाओं के सतही अर्थ लगाने वाले लोगों ने यह भ्रांति फैलाई है कि वैदिक ऋषि और आमजन गोमांस का भक्षण करते थे।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1062190717190859&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3&permPage=1
********************************************************जी हाँ इसी प्रकार 5 वर्ष से अधिक पुराना वह 'जौ ' जिसे बोने से उगे नहीं को 'अश्व ' कहा जाता था और उसकी हवन में आहुतियाँ दी जाती थीं। पोंगा पंडितों ने अश्व का अर्थ 'घोडा ' लगा कर घोड़े की आहुती देने की बेसुरी तान छेड़ दी । वैदिक संस्कृत को साहित्यिक रूप में न लेकर बीज गणित के सूत्रों की भांति लेंगे तभी सही समाधान पर पहुंचेंगे। लेकिन क्या पोंगा-पंथी और एथीस्ट सच को स्वीकार करेंगे?

****** आर्य न कोई जाति थी न है  : ******
Vijai RajBali Mathur
May 29, 2012 · 
आर्य न कोई जाति थी न है। आर्य=आर्ष=श्रेष्ठ। अर्थात श्रेष्ठ कार्यों को करने वाले सभी व्यक्ति आर्य हैं। 'कृंणवनतों विश्वार्यम' के अनुसार सम्पूर्ण विश्व को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनाना है। लेन पूल,कर्नल टाड आदि-आदि विदेशी और आर सी मजूमदार सरीखे भारतीय इतिहासकारों ने साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ती हेतु आर्यों को एक जाति के रूप मे निरूपित करके बेकार का झगड़ा खड़ा किया है।
अब से लगभग 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव-सृष्टि इस पृथ्वी पर हुई तो विश्व मे तीन स्थानों-
1-मध्य यूरोप,
2- मध्य अफ्रीका ,
3-मध्य एशिया –मे एक साथ ‘युवा स्त्री और युवा पुरुषों’के जोड़े सृजित हुये। भौगोलिक स्थिति की भिन्नता से तीनों के रूप-रंग ,कद-काठी मे भिन्नता हुई। इन लोगों के माध्यम से जन-संख्या वृद्धि होती रही। जहां-जहां प्रकृति ने राह दी वहाँ-वहाँ सभ्यता और संस्कृति का विकास होता गया और जहां प्रकृति की विषमताओं ने रोका वहीं-वहीं रुक गया। 
मध्य एशिया के ‘त्रिवृष्टि’जो अब तिब्बत कहलाता है उत्पन्न मानव तीव्र विकास कर सके जबकि दूसरी जगहों के मानव पिछड़ गए। आबादी बढ्ने पर त्रिवृष्टि के लोग दक्षिण के निर्जन प्रदेश आर्यावृत्त मे आकर बसने लगे।जब ‘जंबू द्वीप’उत्तर की ओर ‘आर्यावृत्त’ से जुड़ गया तो यह आबादी उधर भी फ़ेल गई। चूंकि आबादी का यह विस्तार निर्जन प्रदेशों की ओर था अतः किसी को उजाड़ने,परास्त करने का प्रश्न ही न था। साम्राज्यवादियों ने फूट परस्ती की नीतियों के तहत आर्य को जाति बता कर व्यर्थ का बखेड़ा खड़ा किया है। त्रिवृष्टि से आर्यावृत्त आए इन श्रेष्ठ लोगों अर्थात आर्यों ने सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान-विज्ञान से परिचित कराने का बीड़ा उठाया। इस क्रम मे जिन विद्वानों ने पश्चिम से प्रस्थान किया उनका पहला पड़ाव जहाँ स्थापित हुआ उसे ‘आर्यनगर’ कहा गया जो बाद मे एर्यान और फिर ईरान कहलाया। ईरान के अंतिम शासक तक ने खुद को आर्य मेहर रज़ा पहलवी कहा। आगे बढ़ कर ये आर्य मध्य एशिया होकर यूरोप पहुंचे। यूरोपीयो ने खुद को मूल आर्य घोषित करके भारत पर आक्रमण की झूठी कहाने गढ़ दी जो आज भी यहाँ जातीय वैमनस्य का कारण है। 
‘तक्षक’ और ‘मय’ऋषियों के नेतृत्व मे पूर्व दिशा से विद्वान वर्तमान साईबेरिया के ब्लादिवोस्तक होते हुये उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के अलास्का (जो केनाडा के उत्तर मे यू एस ए के कब्जे वाला क्षेत्र है)से दक्षिण की ओर बढ़े। ‘तक्षक’ ऋषि ने जहां पड़ाव डाला वह आज भी उनके नाम पर ही ‘टेक्सास’ कहलाता है जहां जान एफ केनेडी को गोली मारी गई थी। ‘मय’ ऋषि दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के जिस स्थान पर रुके वह आज भी उनके नाम पर ‘मेक्सिको’ कहलाता है। 
दक्षिण दिशा से जाने वाले ऋषियों का नेतृत्व ‘पुलत्स्य’ मुनि ने किया था जो वर्तमान आस्ट्रेलिया पहुंचे थे। उनके पुत्र ‘विश्रवा’मुनि महत्वाकांक्षी थे। वह वर्तमान श्रीलंका पहुंचे और शासक ‘सोमाली’ को आस्ट्रेलिया के पास के द्वीप भेज दिया जो आज भी उसी के नाम पर ‘सोमाली लैंड’कहलाता है। विश्रवा के बाद उनके तीन पुत्रों मे सत्ता संघर्ष हुआ और बीच के रावण ने बड़े कुबेर को भगा कर और छोटे विभीषण को मिला कर राज्य हसगात कर लिया। वह साम्राज्यवादी था। उसने साईबेरिया के शासक (जहां 06 माह का दिन और 06 माह की रात होती है अर्थात उत्तरी ध्रुव प्रदेश)’कुंभकर्ण’तथा पाताल-वर्तमान यू एस ए के शासक ‘एरावन’ को मिला कर भारत –भू के आर्यों को चारों ओर से घेर लिया और खुद अपने गुट को ‘रक्षस’=रक्षा करने वाले (उसका दावा था कि यह गुट आर्य सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करने वाला है)कहा जो बाद मे अपभ्रंश होकर ‘राक्षस’कहलाया। 
राम-रावण संघर्ष आर्यों और आर्यों के मध्य राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद का संघर्ष था जिसे विदेशी इतिहासकारों और उनके भारतीय चाटुकारों ने आर्य-द्रविड़ संघर्ष बता कर भारत और श्रीलंका मे आज तक जातीय तनाव /संघर्ष फैला रखा है। 
जब अब आपने यह विषय उठाया है तो विदेशियों के कुतर्क और विकृति को ठुकराने का यही सही वक्त हो सकता है। जनता के बीच इस विभ्रम को दूर किया जाना चाहिए कि ‘आर्य’ कोई जाति थी या है। विश्व का कोई भी व्यक्ति जो श्रेष्ठ कर्म करे आर्य था और अब भी होगा।

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/364918650236784

 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Thursday, December 18, 2014

कलम और कागज के जरिये 'क्रांति' का पैगाम --- विजय राजबली माथुर


#gulzaar:गुलज़ार साहब के ये वाक्य यथार्थ की अभिव्यक्ति हैं। एक प्रकार से 'अकबर इलाहाबादी ' साहब के इस कथन का समर्थन भी इन पंक्तियों द्वारा हो जाता है :
''न खींचो तीर कमानों को , न तलवार निकालो।
जब तोप मुक़ाबिल हो    तो अखबार  निकालो । । "

वस्तुतः 'विद्रोह' या 'क्रांति' कोई ऐसी चीज़ नहीं होती कि जिसका विस्फोट एकाएक अचानक होता है। बल्कि इसके अनंतर 'अंतर' के तनाव को बल मिलता रहता है। अखबार निकालने की क्षमता तो मुझ में न थी न है परंतु मैं 1973 से ही विभिन्न अखबारों में अपने लेख भेजता रहा और छ्पते भी रहे हैं। एक साप्ताहिक पत्र व एक त्रैमासिक पत्रिका में सह-संपादक के रूप में कार्य करने का अवसर भी मिल चुका है अब जून 2010 से ब्लाग्स के माध्यम से लेखन जारी रखे हुये हूँ।
06 दिसंबर 2014 : को फेसबुक पर यह स्टेटस दिया था-




 मेरे लेखन के कटु आलोचक व प्रबल विरोधी द्वारा दिया गया निम्नांकित  फेसबुक स्टेटस देख कर बेहद हैरानी हुई कि यह शख्स कितने दोहरे चरित्र का आदमी है। 26 दिसंबर 2010 को भाकपा के प्रदेश कार्यालय में पार्टी के एक जन-प्रिय  राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अंजान साहब के 'मुख्य वक्ता' के रूप में बोल चुकने के उपरांत उस गोष्ठी के संचालक के रूप में इसी शख्स ने अरविंद केजरीवाल को बोलने का अवसर दिया था। यह शख्स कल्याण सिंह और सी बी गुप्ता का भी प्रशंसक है।खुद को  एथीस्ट घोषित करने के बावजूद 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' तथा हज़ारे-केजरीवाल-मोदी के विरुद्ध लिखे मेरे लेखों की खिल्ली उड़ाता है। बर्द्धन जी व अंजान साहब के पोस्ट्स पार्टी ब्लाग में लगा देने के कारण इसी शख्स ने मुझे उस ब्लाग की आथरशिप व एडमिनशिप से हटा दिया था। तब 'साम्यवाद (COMMUNISM ) ' नामक अलग ब्लाग बना कर मैं बर्द्धन जी व अंजान साहब के पोस्ट्स भी उसमें निकालने लगा तो मुझे लखनऊ भाकपा की ज़िला काउंसिल से भी हटवा दिया। जन-हितैषी और ईमानदार कार्यकर्ताओं के शत्रु इस शख्स के  उद्धृत स्टेटस पर कतई विश्वास नहीं किया जा सकता जिसकी 'कथनी और करनी' में भारी अंतर है जो नीचे दिये गए इन तीन फोटो से स्पष्ट हो जाएगा।  

16 dec.2014 
· 
भाजपा और कांग्रेस का विकल्प केवल वामपंथ.................................................. वामपंथी दलों और उसमें विशेषकर भाकपा का पूरे देश में संगठन है।"





 एक ओर जहां यह शख्स भाजपा,उ प्र के प्रभारी ओम माथुर को प्रसन्न करने हेतु भाकपा को जन-प्रिय बनाने के मेरे सुझावों की भर्त्सना करता है वहीं दूसरी ओर कल्याण सिंह समर्थक  व्यापारियों व हिन्दू परिषद के लोगों की भाकपा में घुसपैठ करा रहा है जैसा कि उपरोक्त तीनों फोटो से साफ ज़ाहिर होता है (डिस्ट्रीब्यूटर व हिन्दू परिषद के लोग इसी शख्स के संरक्षण वाले AISF, यू पी में सम्मानित पदों पर विराजे गए हैं )। ऐसे ही लोगों के लिए CPM नेता की पुत्री व निर्भीक पत्रकार सुश्री मनीषा पांडे जी ने लिखा है-

https://www.facebook.com/manisha.pandey.564/posts/10205667154182873
  राइट-लेफ्ट होना और बात है और अच्‍छा इंसान होना बिलकुल दूसरी बात। वाम मार्ग से तनिक भी सो कॉल्‍ड विचलन देखकर आपका घर-खानदान, जीवन गालियों से तौल देने वाले वाम सिपाही भी बहुत क्रूर, तंगदिल मनुष्‍य हो सकते हैं। बल्कि हैं ही।

एक तरफ अपने फेसबुक स्टेटस द्वारा इसी शख्स ने लोगों को भ्रमित करने की बातें लिखी हैं दूसरी तरफ यही शख्स अपनी ही पार्टी भाकपा को खोखला करने में लगा हुआ है। लखनऊ ज़िले का सदस्य होते हुये भी यही ज़िला इंचार्ज भी बना हुआ है तथा अपने गुरु को पर्यवेक्षक बनवा कर भिजवाया था तथा लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को मखौल बना कर रख दिया था। यथा---
लखनऊ का 22वा ज़िला सम्मेलन :23 नवंबर 2014

("-- पार्टी संविधान की धारा 22 की उप धारा 9 (घ ) के अंतर्गत राज्य सम्मेलन के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव करना था जो वास्तव में नहीं हुआ।
-उप धारा 9 (ड़.) ज़िला हिसाब जांच आयोग की रिपोर्ट पर विचार करना और उसके संबंध में फैसले करना चाहिए था जो नहीं हुआ। कोई आय-व्यय विवरण प्रस्तुत ही नहीं किया गया था। 27 नवंबर 2011 के 21 वे सम्मेलन के समय रिपोर्ट न पेश करने के साथ आश्वासन दिया गया था कि बाद में ज़िला काउंसिल में पेश की जाएगी जो कि विगत तीन वर्षों में कभी भी नहीं प्रस्तुत की गई। इस बार न तो ऐसा कुछ भी  बताया गया था न ही न बताने का कारण दिया गया था।
-ज़िला काउंसिल के निर्वाचन हेतु संविधान की धारा 16 की उप धारा (च) में वर्णित " गुप्त मतदान द्वारा तथा एक-एक वित्तरणशील वोट के तरीके से मत लिया जाएगा " की प्रक्रिया का अनुपालन न करके ज़िला काउंसिल के लिए प्रस्तवित 21 की संख्या को बढ़ा कर 23 कर के दो बढ़ाए हुये नामों को शामिल किया गया। एक स्थान रिक्त भी रखा गया।
-पार्टी संविधान की धारा 24 की उप धारा 3 (च ) का पिछली ज़िला काउंसिल में कभी भी पालन नहीं किया गया था-"ज़िले के आय-व्यय पर नियंत्रण रखना ")
इन साहब की मेहरबानी से लखनऊ में तीन वर्षों के दौरान 168 सदस्य पार्टी से अलग हो चुके हैं और अब भाजपा समर्थकों  को  भाकपा में भर कर यह जनाब भाकपा को ध्वस्त करने की प्रक्रिया को तेज़ करने लगे हैं। इनको व इनके गुरु को यदि उत्तर प्रदेश में ऐसी ही मनमानी छूट मिली रही तो ये लोग अपने मंसूबों में कामयाब भी हो सकते हैं। विगत में प्रदेश में भाकपा को दो-दो बार विभाजित कराने में इन दोनों की ही महती भूमिका रही है। 
आज जब साम्राज्यवाद/सांप्रदायिकता देश की एकता को छिन्न-भिन्न करने की लगातार कोशिशों में जुटे हुये हैं 'एथीस्टवाद' के मकड़-जाल से बाहर निकल  कर सांप्रदायिकता के आधार को समाप्त करने की नितांत आवश्यकता है। जनता के समक्ष सच्चाई बता कर ही हम कामयाब हो सकते हैं कि,:


"समस्या की जड़ है-ढोंग-पाखंड-आडंबर को 'धर्म' की संज्ञा देना तथा हिन्दू,इसलाम ,ईसाईयत आदि-आदि मजहबों को अलग-अलग धर्म कहना जबकि धर्म अलग-अलग कैसे हो सकता है? वास्तविक 'धर्म' को न समझना और न मानना और ज़िद्द पर अड़ कर पाखंडियों के लिए खुला मैदान छोडना संकटों को न्यौता देना है। धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। भगवान =भ (भूमि-ज़मीन )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी) चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं। इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं।"



परंतु इस सच्चाई को बताना इस शख्स और इस जैसे लोगों को अखरता व  नागवार  लगता है जिसका पूरा-पूरा लाभ सांप्रदायिक शक्तियों को मिलता है और वे पाखंड तथा ढोंग को ही 'धर्म' के नाम पर परोस कर जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़्ती रहती हैं जो कि पूंजीवाद/साम्राज्यवाद का अभीष्ट है। अतः इस प्रकार 'एथीस्टवाद' ढोंग-पाखंड रूपी अधर्म व पूंजीवाद/साम्राज्यवाद का ही सहायक सिद्ध होता है।
  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Saturday, October 11, 2014

सत्य को स्वीकार न करना ही सहमति-असहमति के विवाद का हेतु है---विजय राजबली माथुर

सत्य क्या है ?:


धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

भगवान =भ (भूमि-ज़मीन  )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी) ।

चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं।

इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं।

https://www.facebook.com/virendra.yadav.50159836/posts/807623739288327

मूल समस्या सत्य को नकार कर असत्य में उलझे रहने के कारण उत्पन्न हुई है। वास्तविक 'धर्म,खुदा या भगवान या गाड' अलग-अलग नहीं हैं परंतु अपनी-अपनी दुकान चलाने के लिए विभिन्न व्यापारियों ने अपने-अपने शो रूम जो खोले हुये हैं उनको ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरधारी शोषक और लुटेरे 'धर्म' कह कर जनता को उल्टे उस्तरे से मूंढते हैं। परंतु दुर्भाग्य तो यह है कि तथाकथित प्रगतिशील-वामपंथी भी उन खुराफ़ातों को ही धर्म की संज्ञा देते हैं साथ ही वास्तविक धर्म का विरोध करते हैं इसलिए जनता कुचक्र में फँसने को विवश है। 

सुरेश चंद्र मिश्र जी ने अथर्व-वेद पर आधारित चिकित्सा-विज्ञान के निष्कर्षों को सार्वजनिक किया था जिनको 13 अप्रैल 2008 को 'हिंदुस्तान',आगरा ने प्रकाशित किया था उसकी स्कैन प्रस्तुत है इसे डबल क्लिक करके पढ़ा जा सकता है। स्पष्ट है कि ऋतु-परिवर्तन के संकर्मण काल ( नौ रात्रिकाल  ) में इन नौ औषधियों के सेवन-प्रयोग से मानव-मात्र नीरोग रह सकता है।



अब इस सत्य को कोई स्वीकार नहीं कर रहा है। ढ़ोंगी-पाखंडी-आडंबरधारी शोषक और लुटेरे लोगों ने दोनों ऋतु-परिवर्तन काल का मखौल बना कर रख दिया है जिसे लोग बाग 'अंधविश्वासी' होकर सिरोधार्य किए हुये हैं। रात्रि जागरण के नाम पर ध्वनि-प्रदूषण फैलाना,जनता को गुमराह करके अपनी जेबें भरना तथा जनता का सतत शोषण करना निर्बाध रूप से जारी है। थोथी उदारता के नाम पर एक गलत बात के प्रतिरोध के नाम पर दूसरी गलत बात का समर्थन करके प्रगतिशील विद्वान  गरिमामय वामपंथी राजनीति का फ्लेवर देकर प्रकारांतर से 'अंधविश्वास' का ही समर्थन कर रहे हैं। वामपंथ की एकता तो अलग बात है अपनी ही पार्टी में अपने ही कार्यकर्ताओं का शोषण करके उनको दिग्भ्रमित करके जो लोग कुरसियाँ पक्की करते हैं दूसरों को थोथे  आश्वासन देकर सस्ती लोकप्रियता तो हासिल कर सकते हैं परंतु न तो अपनी पार्टी का भला कर सकते हैं न ही जनता का। 

यदि चिकित्सा विज्ञान के निष्कर्षों को स्वीकार कर लिया जाता है तो न तो 'दुर्गा' द्वारा 'महिषासुर-वध ' की झूठी कहानी गढ़नी होगी और न ही उसके विरोध में साम्राज्यवाद प्रेरित 'महिषासुर' महिमामंडन की। बेवजह के तनाव व संघर्ष की नौबत आने का तो प्रश्न ही नहीं है। किन्तु 'एथीस्टवाद ' के नाम पर वास्तविक धर्म को नकार कर ढोंग-पाखंड-आडंबर-अंधविश्वास बढ़ाना जब लक्ष्य हो तो 'उदारता' का स्वांग ही किया जा सकता है। जनता को जागरूक नहीं क्योंकि परोपजीवी प्रजाति का रोजगार जो समाप्त हो जाएगा और उनको भी 'श्रम ' करना पड़ जाएगा।


  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

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12-10-2016 

11-10-2016