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Saturday, September 26, 2026

सदमे में लोकतंत्र / असहमत होने का ड्रामा -------- Usrar Belous / Keshaw Bhatter's Post



क्या विवेक जोशी गोगोई की तरह देश को भ्रमित कर मुख्य चुनाव आयुक्त पद पर स्थापित होना चाहते है ?
गोगोई ने मोदी से मिल कर सरकार से असहमत होने का ड्रामा करते हुवे..
सरकार पर अविश्वास जताकर प्रेस कान्फ्रेंस मे सरकार पर न्याय पालिका मे हस्तक्षेप करने , दबाव डालने का आरोप लगा कर इतिहास मे पहेली बार इस तरह का विरोध किया था..
इस प्रेस कान्फ्रेंस के माध्यम से जनसमर्थन और अंदर से मोदी का समर्थन लेते हुवे चीफ जस्टिस के पद पर स्थापित होने का ड्रामा रचा था..
क्यो की सुप्रीम कोर्ट के जज की नियुक्ती कालेजियम के माध्यम से सरकार के हस्तक्षेप के साथ ही होती आ रही है..
सरकार चाहती तो गोगोई को चीफ जस्टिस बनने ही नही देती..
मोदी वैसे भी प्रतिशोध , बदला लेने मे विश्व प्रसिद्ध माने जाते है..
फिर भी गोगोई देश के चीफ जस्टिस बनाए गए और लगभग सभी फैसले सरकार और सरकार समर्थक गुंडो अपराधियो के पक्ष मे दिये..
क्या विवेक जोशी को इसी ड्रामेबाजी के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया जाना है..
ता के देश की जनता मे ऐसा मँसेज जाए मानो ग्यानेश कुमार को सजा दे दी गई हो और देश की जनता ग्यानेश कुमार द्वारा किये गए सरकार के सभी अपराध भूल कर नये चुनाव आयुक्त से लोकतंत्र की बहाली की अपेक्षा करने लगे ?
ग्यानेश कुमार के खिलाफ आजीवन मतलब रिटायर होकर जिंदा रहेने तक कोई कानूनी कारवाई हो नही सकती ऐसा कानून बनाया जा चुका है..
ये कानून हर केंद्रीय चुनाव आयुक्त के लिये है..
इस से नये चुनाव आयुक्त को भी सरकार इस्तेमाल कर सकेंगी..
देश की जनता संसद मे बहुमत के बगैर भी ग्यानेश कुमार से मुक्त हो सकती थी..
देश के आसपास जो हुवा ऊस से जनता ने कोई सबक नही सिखा ..
क्यो की देश की जनता की कलाईयो मे ताकत नही है , हिम्मत नही है..
देश की बहुसंख्यक जनता मे हिम्मत , ताकत , धैर्य , स्वाभिमान हजारो साल से है ही नही वर्ना ग्यानेश कुमार से मुक्त होने के पहेले देश की जनता हजारो साल की वर्ण व्यवस्था से मुक्त हो जाती..
कुल मिलाकर सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मिले हुवे है.
वर्ना श्रीलंका , नेपाल , बांग्लादेश कब का हो चुका होता..
(आगे पढना हो तो जारी रखे या पोस्ट को छोड दे)
हजारो साल के शुद्र गुलाम सरकार से तभी नाराज होते है जब RSS ..
* जय प्रकाश नारायण अर्थात JP के साथ मिल कर सरकार को अप्रिय करे..
* जब RSS अन्ना हजारे के साथ मिलकर मनमोहन सरकार को अप्रिय करे.
* RSS ने ओबीसी वर्ग को वि पी सिंग सरकार के द्वारा दिये भयानक आँफर वाले 'मंडल आरक्षण' के खिलाफ ओबीसी वर्ग खडा कर दिया था..
पुरे देश के ओबीसी वर्ग ने RSS और RSS के विद्यार्थी संगठन ABVP के साथ मिल कर , कंधे से कंधा लगा कर खुद को मिले 'मंडल आरक्षण' के खिलाफ तांडव मचाया था..
और खुद को मिले भयानक दे दनादन आरक्षण को अदालत की समिक्षा के लिये भिजवाना पडा था..
देश का कुल 65% ओबीसी मंडल आरक्षण देने वाले 'विश्वनाथ प्रताप सिंग और ऊनकी सरकार से इतनी नफरत कर रहा था के भारत के इतिहास मे इस का ऊदाहरण देना कठीन है'
पाकिस्तान और मुसलमान के नाम से अन्य मौको पर देश को भ्रमित कर लिया जाता है..
ऐसी हजारो साल की गुलाम जनता क्या श्रीलंका , नेपाल और बांग्लादेश करेंगी..?
नेपाल जैसा होने डर से नकली वर्दी वाली और बिना वर्दी वाली जो प्रायवेट सेना बनाई गई है..
ऊस मे भी हजारो साल के गुलाम ही भरे पडे है..
विपक्ष ने अब तक नही पुछा के क्या ये लोग पुलवामा , पहेलगाम भी आते जाते है ?
ये संयोग या प्रयोग का शब्द हर विध्वंस की टाईमिंग के बाद इस्तेमाल होता है ऊस की हकीकत क्या है ?
कुल मिला कर ये साबित किया जा सकता है के देश के सेक्युलर ढांचे , लोकतंत्र को बचाने के लिये देश की जनता कभी क्रांती वगैरह नही करेंगी..
वर्णद्वेषी मनुस्मृति वाले चाहे तो देश मे हर साल विद्रोह हो सकता है ..
ये रोस्टर पध्दती के दंगे क्या है अघोषित विद्रोह और भ्रम फैलाना है..







खतरनाक मोड़: संवैधानिक संस्थाएं, हितों का टकराव और सदमे में लोकतंत्र
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देश के सर्वोच्च कानूनी और प्रशासनिक गलियारों से जो खबरें और तथ्य सामने आए हैं,वे पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए निहायत ही चिंताजनक है। 
LiveLaw और The Indian Express की रिपोर्टों के माध्यम से ऐसे घटनाक्रम एक साथ सामने आए हैं, जो जनता के मन में सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग- सर्वोच्च संवैधानिक संस्थाएं - की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं। 
सामने आया है कि सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ जज के पुत्र मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के आधिकारिक वकील हैं। चिंता की बात यह है कि 'वही जज' सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े अति-महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ में शामिल रहे हैं। यह हितों के टकराव (Conflict of Interest) का संकट है। 
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के विवादित कानून को चुनौती देने वाली याचिका, जिस पर तुरंत निर्णय होना चाहिए था, अब अनिश्चितकाल के लिए टल गई है।
नोएडा की तत्कालीन डीएम (जो मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी हैं) द्वारा एक छात्र पर एनएसए (NSA) के मनमाने इस्तेमाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फटकार लगाते हुए कड़ा जुर्माना लगाया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पीठ ('वही जज') ने इस पर तुरंत रोक लगा दी। 'खास' के लिए त्वरित राहत और 'आम' के लिया दर-दर की ठोकरें ! डीएम मेधा रूपम का मामला जिस विषय से संबंधित था, वह नियमित रोस्टर के तहत जस्टिस शर्मा ('वही जज') की पीठ के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था। इसके अलावा, इसी से जुड़े मामले पर पहले से ही जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ सुनवाई कर रही थी। ऐसे में इस मामले का विशेष रूप से जस्टिस शर्मा की पीठ को सौंपा जाना अपने आप में संदेह पैदा करता है।   
सोचने वाली बात (Food for Thought) यह है कि - 
कानून का एक सदियों पुराना और सर्वमान्य सिद्धांत है - "न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए" - जब किसी न्यायाधीश के परिवार के सदस्य का करियर या व्यावसायिक हित किसी सरकारी संस्था (जैसे चुनाव आयोग) से जुड़ा हो, तो क्या आम नागरिक उस संस्था के खिलाफ अदालत से पूरी तरह निष्पक्ष फैसले की उम्मीद कर सकता है ? जब सुप्रीम कोर्ट के ही वरिष्ठ जस्टिस दीपांकर दत्ता सार्वजनिक रूप से यह कहें कि 'चुनाव आयोग को केवल स्वतंत्र होना ही नहीं चाहिए, बल्कि स्वतंत्र दिखना भी चाहिए', तो समझना होगा कि संविधान कितना भी अच्छा हो, यदि उसे चलाने वाले निष्पक्ष न हों तो वह विफल हो जाता है। वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि नियम-कानूनों की भावना को ताक पर रखकर केवल कानूनी छिद्रों का सहारा लिया जा रहा है, जिससे संस्थागत मर्यादाएं टूट रही हैं।
तो हमें किस बात पर विचार करना चाहिए ?
(01) ❓-लोकतंत्र किसी इमारत से नहीं, बल्कि संस्थाओं पर जनता के भरोसे से चलता है। अगर आम नागरिक का अदालत और चुनाव आयोग की निष्पक्षता से विश्वास उठ गया, तो लोकतंत्र का आधार ही हिल जाएगा। (02) ❓-चुनाव कराने वाली संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी न हो और उस पर न्यायिक निगरानी भी कमजोर पड़ जाए, तो चुनाव केवल एक ढकोसला बनकर रह जाएंगे और देश में महज नियंत्रित लोकतंत्र (Managed Democracy) रह जाएगा।  (03)-❓ जब कड़े प्रशासनिक फैसलों (जैसे NSA के दुरुपयोग) पर भी अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तो आम नागरिक के संवैधानिक मौलिक अधिकारों की रक्षा कौन करेगा? क्या यह जवाबदेही के अंत की घोषणा है। 
आप क्या सोच रहें हैं ?
यह मामला किसी एक पार्टी, नेता, अफसर या जज का नहीं है। एक आम नागरिक या छात्र जब अपने अधिकारों के लिए लड़ता है तो उस पर NSA जैसे कठोर कानून थोप दिए जाते हैं, लेकिन जब प्रशासनिक या संवैधानिक पदों पर बैठे शक्तिशाली अधिकारियों या उनके परिजनों की बात आती है, तो पूरी व्यवस्था तुरंत राहत देने और जवाबदेही टालने की दिशा में काम करती दिखती है। इससे समाज में आम आदमी का न्याय व्यवस्था पर से विश्वास कम होता है।यह देश के संवैधानिक संतुलन (Checks and Balances) का मामला है। क्या संवैधानिक संस्थाओं को अदृश्य ताकतवर हाथ नियंत्रित कर रहें हैं ? क्या तराजू बेपर्दा होकर सत्ता की तरफ झुकती दिख रही है ? क्या न्यायपालिका को अपने भीतर 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) को लेकर सख्त और पारदर्शी नियम लागू नहीं करने चाहिए ? क्या ऐसे मामलों में न्यायाधीशों को स्वेच्छा से सुनवाई से अलग (Recuse) नहीं हो जाना चाहिए ?
इन रिपोर्टों का संयुक्त निष्कर्ष यह चेतावनी देता है कि भारत "संस्थागत निष्पक्षता के संकट" से गुजर रहा है। देश एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है जहाँ संवैधानिक संस्थाएं स्वायत्त दिखने के बजाय सत्ता के अनुकूल या सत्ता से प्रभावित दिख रही हैं। सवाल यह भी उठता है कि क्या नियम और प्रक्रियाएं सबके लिए समान रूप से काम कर रही हैं ? क्या आम नागरिक के संवैधानिक हित सर्वोपरि सूची में हैं, सुरक्षित हैं ?
समय रहते न्यायपालिका ने अपने भीतर 'हितों के टकराव' के कड़े मानक लागू नहीं किए, और निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता बहाल नहीं की, तो लोकतंत्र का आंतरिक ढांचा खोखला होता चला जाएगा।






  ~विजय राजबली माथुर ©

Friday, June 3, 2016

वेद,वैदिक संस्कृति,डॉ रोमिला थापर : भ्रम और निवारण ------ विजय राजबली माथुर/ध्रुव गुप्त

वेद और आर्य शब्दों की साम्राज्यवादी व्याख्या ने भ्रम की स्थिति उत्पन्न की है जिसका पूरा-पूरा लाभ उसकी सहोदरी सांप्रदायिकता ने उठाया है। हालांकि डॉ हरबंस मुखिया ने जे एन यू की राष्ट्रवाद की क्लास में स्पष्ट किया कि, अब अंग्रेजों ने अपने यहाँ इतिहास संशोधित कर लिया है परंतु भारत में अभी भी सांप्रदायिक आधार पर ही इतिहास चल रहा है जिसका लाभ सांप्रदायिक शक्तियों ने भरपूर उठाया है। अतः भ्रम का  शीघ्रातिशीघ्र निवारण होना उचित है ।
http://krantiswar.blogspot.in/2012/11/sampradayikta-dharam-nirpexeta.html
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जे एन यू में डॉ रोमिला थापर एवं डॉ हरबंस मुखिया 



प्रसिद्ध इतिहासकार और चिंतक रोमिला थापर से रणबीर चक्रवर्ती की इतिहास, समाज और संस्कृति पर बातचीत. साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार, अंग्रेज़ी पाक्षिक फ्रंटलाइन में प्रकाशित, रोमिला थापर के लंबे साक्षात्कार “लिंकिंग द पास्ट एंड द प्रेजेंट” का कुछ संपादित रूप है और यहां इसका पहला आधा हिस्सा प्रकाशित किया जा रहा है। अनुवाद: शुभनीत कौशिक। 
1 ) उदाहरण के लिए, जब हम छात्र थे तो हमें यह बताया जाता था कि ऋग्वेद की भाषा इंडो-आर्यन भाषा ही है। पर आज यदि आप ऐसा वक्तव्य दें, तो वैदिक काल में विशेषज्ञता रखने वाले कुछ विद्वान इस कथन से जरूर अपनी असहमति जताएंगे क्योंकि भाषा-विज्ञान के सिद्धांतों के प्रयोग ने यह दर्शाया है कि ऋग्वेद में द्रविड़ भाषाओं के भी अंश सम्मिलित हैं। इन जानकारियों से इतिहासकार के प्रत्यक्षीकरण और स्रोतों के प्रति उसके दृष्टिकोण में भी बदलाव आते हैं। अब ऋग्वेद के संदर्भ में ही यह जानकारी इतिहासकार को ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ के अध्ययन के लिए प्रेरित करती है, जो एकल संस्कृति का न होकर सह-अस्तित्व में विद्यमान उन संस्कृतियों का है, जिनमें एक का प्रभुत्त्व है। तो इतिहासकार को इन अन्य संस्कृतियों के बारे में भी जानकारी जुटानी होगी और उनका अध्ययन करना होगा। इतिहासकार को नदियों के जल तंत्र के अध्ययन (हाइड्रोलॉजी) और आनुवंशिकी के अध्ययन और रिपोर्टों से मिलने वाली जानकारियों का समावेश भी अपने अध्ययन में करना होगा। 

2 ) 
प्राचीन भारत पर काम करने वाले विद्वानों का मानना है कि आर्य भाषा मध्य एशिया से ईरान होते हुए भारत पहुँची। पर अब भारत में कुछ लोगों द्वारा इस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है कि आर्यभाषा भाषी भारत के स्थानीय निवासी ही थे। कुछ तो हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को भी आर्य साबित करते हुए यह सुझाना चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति में कोई गैर-आर्य तत्त्व था ही नहीं! यह ऐसा तर्क है जो मुझे विभिन्न कारणों से कतई स्वीकार नहीं। भाषाई और पुरातात्विक आधार पर भी यह किसी तरह से संभव नहीं जान पड़ता। हम कहते हैं कि ऋग्वैदिक संस्कृति उत्तर-हड़प्पाकालीन थी, तो जाहिर है कि इसका मतलब हुआ कि इसमें इसकी पूर्वतर संस्कृति परिलक्षित नहीं होगी। हड़प्पा संस्कृति का संपर्क ओमान और मेसोपोटामिया से था, जिनका जिक्र ऋग्वेद में नहीं मिलता।

3 )  
हाँ, ऋग्वेद में इस रूप में महापाषाणकालीन (मेगालिथिक) संस्कृति का जिक्र नहीं है। पर इस टेक्स्ट में अन्य समूहों की चर्चा जरूर की गयी है, जैसे असुर, दास, दस्यु आदि। ऋग्वेद दो वर्णों की चर्चा करता है – आर्य और दास। ‘दास’ कौन थे? उनके बारे में ऋग्वेद में जो विवरण मिलता है वह यह है कि वे उन कर्मकांडों और रीति-रिवाजों को मानने वाले थे, जो आर्यों से भिन्न थे। ‘दास’ अलग देवताओं की उपासना करते थे, और वे वैदिक ग्रंथों के लेखकों की भाषा से भिन्न भाषाएँ बोलते थे। वे समृद्ध थे, मवेशियों के रूप में उनकी संपत्ति ईर्ष्या का विषय थी और वे अलग बसावटों में रहते थे। इसलिए कुछ विद्वान यह भी सोचते हैं कि वे अलग संस्कृति के थे। इतिहासकार के रूप में हमें यह सवाल करना होगा कि ‘दास कौन थे’ और उनका मिथकीकरण क्यों किया गया?

इसी तरह ‘दासी-पुत्र ब्राह्मणों’ का भी उल्लेख मिलता है। जिन्हें पहले तो अस्वीकार्य माना गया, पर बाद में जब इन लोगों ने अपनी शक्ति दिखाई तो उन्हें ब्राह्मण के रूप में स्वीकार कर लिया गया। ‘दासी-पुत्र ब्राह्मण’ स्वयं में ही एक विरोधाभाषी शब्द है क्योंकि ‘दासी-पुत्र’ (यानि एक दासी से उत्पन्न हुआ पुत्र) होना और ब्राह्मण की हैसियत दोनों में विरोध भाव है। वैदिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि देवों और असुरों में अक्सर संघर्ष होते रहते थे। यह एक स्तर पर मिथक है, पर यह मिथक भी तत्कालीन समाज की अवधारणाओं से बिलकुल अलग नहीं है। इतिहासकारों के मत में, वैदिक ग्रंथों में उत्तर-हड़प्पा काल से लेकर ईसापूर्व पाँचवी सदी के ऐतिहासिक नगरों के रूप में नगरीय संस्कृति के उदय तक का उल्लेख मिलता है। ऐसी स्थिति में क्या यह कहना संभव है कि ये वैदिक ग्रंथ संस्कृति के एक पैटर्न के उद्विकास के परिचायक भर हैं!

4 ) एक प्रचलित तर्क यह भी है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और भारत से ही वे दुनिया के अन्य हिस्सों में गए और यूरोप में भी सभ्यता लेकर आर्य ही गए। इस सिद्धांत की खोज की गयी 19वीं सदी में, पर यह आज भी उतना ही लोकप्रिय है। सबसे पहले अमेरिका के थिओसोफिस्ट, कर्नल हेनरी एस ओलकाट ने इसे प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत थिओसोफिस्टों ने अपना लिया। यद्यपि थिओसोफिस्ट कुछ समय के लिए आर्य समाज के निकट थे, पर स्वयं आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य तिब्बत से आए थे। 

ये वे सिद्धांत हैं जो भारत के प्राचीनतम अतीत से जुड़े ऐतिहासिक विवादों से गहरे जुड़े हुए हैं। इनकी शुरुआत 19वीं सदी में हुई। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि यह वही समय था जब ‘नस्ल विज्ञान’ के अधीन यूरोपीय सर्वोच्चता पर, आर्य उत्पत्ति को आधार बनाकर चर्चा की जा रही थी। इनमें से कुछ सिद्धांत, बीसवीं सदी के यूरोप में ‘आर्यवाद’ को विनाशकारी दिशा की ओर ले गए। अतिरेक राष्ट्रवाद और अस्मिता की राजनीति के साथ ऐतिहासिक सिद्धांतों की जुगलबंदी के भयानक नतीजे हो सकते हैं, इसलिए यह ज़रूरी है इन सिद्धांतों पर चर्चा की जाए। 

स्त्रोत :
http://hashiya.blogspot.in/2015/11/blog-post_24.html
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भ्रम निवारण : 
Dhruv Gupt
 02-06-2016  

क्या वैदिक ऋषि सचमुच गोमांस खाते थे ? :

फेसबुक पर और अन्यत्र भी कई मित्रों ने वैदिक साहित्य का हवाला देते हुए बार-बार यह साबित करने की कोशिश की है कि वैदिक ऋषि और उस कालखंड के लोग गोमांस का भक्षण किया करते थे। इस विषय पर मेरे भी मन में भी कुछ उलझनें थीं। कहीं भी अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं पाकर अंततः मैंने देश के कुछ गिने-चुने वेद मर्मज्ञों में एक 'मातृसदन', कनखल, हरिद्वार के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी शिवानंद जी के सामने अपनी जिज्ञासा रखी। उन्होंने बताया कि ज्ञान जब अधकचरा हो तो वेद की ऋचाओं और उपनिषद के मंत्रों के शाब्दिक अर्थ लेकर लोग ऐसी ही स्थापनाएं निकालते हैं। वेद और उपनिषद मूलतः यौगिक साहित्य हैं जिनमें योग की गूढ़ और रहस्यमय क्रियाओं को लौकिक शब्दों और उपमाओं के माध्यम से समझाने के प्रयास किए गए हैं। यह गुरू और शिष्यों के बीच का हजारों वर्षों तक श्रुति परंपरा में चला संवाद है जिसे योग विद्या में प्रवेश करने वाले जिज्ञासु ही समझ सकते हैं। आमलोग जब इन ऋचाओं और मन्त्रों के शाब्दिक अर्थ लगाएंगे तो अर्थ का अनर्थ तो होगा ही। उन्होंने वृहदकारण्य उपनिषद से यह उद्धरण सुनाकर मेरी तमाम जिज्ञासाओं का शमन कर दिया। 

वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चतवारहः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हंतकारहः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हंतकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः। (छा. उ. 5/8/1) 

अर्थात वाक् ही धेनु या गाय है। उस धेनु का प्राण वृषभ है और बछड़ा उसका मन। उसके चार स्तन हैं-स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वाधाकार। उसके दो स्तनों- स्वाहाकार और वषट्कार उपजीवी देवगण हैं जो उनका उपभोग करते हैं। हन्तकार का उपभोग मनुष्य करते हैं और स्वाधाकार का पितृगण। यह एक रूपक है जिसके द्वारा यौगिक क्रिया प्राणोपासना की व्याख्या की गई है। ऐसे कई मंत्रों और ऋचाओं के सतही अर्थ लगाने वाले लोगों ने यह भ्रांति फैलाई है कि वैदिक ऋषि और आमजन गोमांस का भक्षण करते थे।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1062190717190859&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3&permPage=1
********************************************************जी हाँ इसी प्रकार 5 वर्ष से अधिक पुराना वह 'जौ ' जिसे बोने से उगे नहीं को 'अश्व ' कहा जाता था और उसकी हवन में आहुतियाँ दी जाती थीं। पोंगा पंडितों ने अश्व का अर्थ 'घोडा ' लगा कर घोड़े की आहुती देने की बेसुरी तान छेड़ दी । वैदिक संस्कृत को साहित्यिक रूप में न लेकर बीज गणित के सूत्रों की भांति लेंगे तभी सही समाधान पर पहुंचेंगे। लेकिन क्या पोंगा-पंथी और एथीस्ट सच को स्वीकार करेंगे?

****** आर्य न कोई जाति थी न है  : ******
Vijai RajBali Mathur
May 29, 2012 · 
आर्य न कोई जाति थी न है। आर्य=आर्ष=श्रेष्ठ। अर्थात श्रेष्ठ कार्यों को करने वाले सभी व्यक्ति आर्य हैं। 'कृंणवनतों विश्वार्यम' के अनुसार सम्पूर्ण विश्व को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनाना है। लेन पूल,कर्नल टाड आदि-आदि विदेशी और आर सी मजूमदार सरीखे भारतीय इतिहासकारों ने साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ती हेतु आर्यों को एक जाति के रूप मे निरूपित करके बेकार का झगड़ा खड़ा किया है।
अब से लगभग 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव-सृष्टि इस पृथ्वी पर हुई तो विश्व मे तीन स्थानों-
1-मध्य यूरोप,
2- मध्य अफ्रीका ,
3-मध्य एशिया –मे एक साथ ‘युवा स्त्री और युवा पुरुषों’के जोड़े सृजित हुये। भौगोलिक स्थिति की भिन्नता से तीनों के रूप-रंग ,कद-काठी मे भिन्नता हुई। इन लोगों के माध्यम से जन-संख्या वृद्धि होती रही। जहां-जहां प्रकृति ने राह दी वहाँ-वहाँ सभ्यता और संस्कृति का विकास होता गया और जहां प्रकृति की विषमताओं ने रोका वहीं-वहीं रुक गया। 
मध्य एशिया के ‘त्रिवृष्टि’जो अब तिब्बत कहलाता है उत्पन्न मानव तीव्र विकास कर सके जबकि दूसरी जगहों के मानव पिछड़ गए। आबादी बढ्ने पर त्रिवृष्टि के लोग दक्षिण के निर्जन प्रदेश आर्यावृत्त मे आकर बसने लगे।जब ‘जंबू द्वीप’उत्तर की ओर ‘आर्यावृत्त’ से जुड़ गया तो यह आबादी उधर भी फ़ेल गई। चूंकि आबादी का यह विस्तार निर्जन प्रदेशों की ओर था अतः किसी को उजाड़ने,परास्त करने का प्रश्न ही न था। साम्राज्यवादियों ने फूट परस्ती की नीतियों के तहत आर्य को जाति बता कर व्यर्थ का बखेड़ा खड़ा किया है। त्रिवृष्टि से आर्यावृत्त आए इन श्रेष्ठ लोगों अर्थात आर्यों ने सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान-विज्ञान से परिचित कराने का बीड़ा उठाया। इस क्रम मे जिन विद्वानों ने पश्चिम से प्रस्थान किया उनका पहला पड़ाव जहाँ स्थापित हुआ उसे ‘आर्यनगर’ कहा गया जो बाद मे एर्यान और फिर ईरान कहलाया। ईरान के अंतिम शासक तक ने खुद को आर्य मेहर रज़ा पहलवी कहा। आगे बढ़ कर ये आर्य मध्य एशिया होकर यूरोप पहुंचे। यूरोपीयो ने खुद को मूल आर्य घोषित करके भारत पर आक्रमण की झूठी कहाने गढ़ दी जो आज भी यहाँ जातीय वैमनस्य का कारण है। 
‘तक्षक’ और ‘मय’ऋषियों के नेतृत्व मे पूर्व दिशा से विद्वान वर्तमान साईबेरिया के ब्लादिवोस्तक होते हुये उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के अलास्का (जो केनाडा के उत्तर मे यू एस ए के कब्जे वाला क्षेत्र है)से दक्षिण की ओर बढ़े। ‘तक्षक’ ऋषि ने जहां पड़ाव डाला वह आज भी उनके नाम पर ही ‘टेक्सास’ कहलाता है जहां जान एफ केनेडी को गोली मारी गई थी। ‘मय’ ऋषि दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के जिस स्थान पर रुके वह आज भी उनके नाम पर ‘मेक्सिको’ कहलाता है। 
दक्षिण दिशा से जाने वाले ऋषियों का नेतृत्व ‘पुलत्स्य’ मुनि ने किया था जो वर्तमान आस्ट्रेलिया पहुंचे थे। उनके पुत्र ‘विश्रवा’मुनि महत्वाकांक्षी थे। वह वर्तमान श्रीलंका पहुंचे और शासक ‘सोमाली’ को आस्ट्रेलिया के पास के द्वीप भेज दिया जो आज भी उसी के नाम पर ‘सोमाली लैंड’कहलाता है। विश्रवा के बाद उनके तीन पुत्रों मे सत्ता संघर्ष हुआ और बीच के रावण ने बड़े कुबेर को भगा कर और छोटे विभीषण को मिला कर राज्य हसगात कर लिया। वह साम्राज्यवादी था। उसने साईबेरिया के शासक (जहां 06 माह का दिन और 06 माह की रात होती है अर्थात उत्तरी ध्रुव प्रदेश)’कुंभकर्ण’तथा पाताल-वर्तमान यू एस ए के शासक ‘एरावन’ को मिला कर भारत –भू के आर्यों को चारों ओर से घेर लिया और खुद अपने गुट को ‘रक्षस’=रक्षा करने वाले (उसका दावा था कि यह गुट आर्य सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करने वाला है)कहा जो बाद मे अपभ्रंश होकर ‘राक्षस’कहलाया। 
राम-रावण संघर्ष आर्यों और आर्यों के मध्य राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद का संघर्ष था जिसे विदेशी इतिहासकारों और उनके भारतीय चाटुकारों ने आर्य-द्रविड़ संघर्ष बता कर भारत और श्रीलंका मे आज तक जातीय तनाव /संघर्ष फैला रखा है। 
जब अब आपने यह विषय उठाया है तो विदेशियों के कुतर्क और विकृति को ठुकराने का यही सही वक्त हो सकता है। जनता के बीच इस विभ्रम को दूर किया जाना चाहिए कि ‘आर्य’ कोई जाति थी या है। विश्व का कोई भी व्यक्ति जो श्रेष्ठ कर्म करे आर्य था और अब भी होगा।

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