Tuesday, July 28, 2020
Tuesday, June 30, 2020
मोदी मनमोहन गठबंधन और अमेरिका ------ कुमुद सिंह
30-06-2020
मनमोहन की गद्दारी देश 100 साल बाद समझेगा
नेहरू ने जैसे जमींनदारी हस्तानांतरण कर रैयतों को मूर्ख बनाया, वैसे ही मनमोहन ने उपभोक्ता को गदहा बनाया है। नेहरू की बात छोडिये, वो मरे उनकी नीति मरी और वो समाज भी मर चुका है। बात करते हैं मनमोहन की।
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पाकिस्तान में जन्मा और इंग्लैंड में पढा यह आदमी विश्व बैंक और अमेरिका का घोषित एजेंट रहा है। पहले ललित बाबू, फिर प्रणब दा, फिर नरसिम्हा राव और अंत में सोनिया गांधी इसके टारगेट लीडर हुए। इस सूची से आप समझ सकते हैं कि अर्थशास्त्र से अधिक राजनीति शास्त्र इस आदमी का मजबूत है।
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अब आइये नीति पर। याद कीजिए 1989 का कालखंड। उदारवाद के पक्ष में सबसे बडा दावा क्या था। मनमोहन सिंह भारत को बाजार बनाने में लगे थे और उपभोक्ता को क्या समझा रहे थे। सबसे ज्यादा जोर किन बातों पर था। आइये बात टेलीकॉम से शुरु करते हैं। उस समय बीएसएनएल एक मात्र कंपनी थी। लोगों के पास कोई विकल्प नहीं था। मनमोहन ने कहा, "हम उदारवाद के तहत विकल्प देंगे।" भारत का उपभोक्ता लहालोट हो गया। फिर तो बीएसएनएल को "भाईसाहेबनहींलगेगा" का नाम मनमोहन सिंह ने दिला दिया। याद कीजिए जब अटल की सरकार बनी, तो भारत में 22 टेलीकॉम कंपनियां थी। उपभोक्ता मनमोहन को भारत रत्न समझने लगे। विकल्पों में गोदा लगाने लगे। लोहा पूरा गर्म हो चुका था। मनमोहन को अब वो करना था जो करने के लिए उदारवाद लाया गया था, मतलब बाजार पर एकाधिकार।
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इसी क्रम में मनमोहन ने एक घोटाला प्लांट किया, नाम दिया स्पेंट्रम घोटाला। इस घोटाले ने इस सेक्टर के तमाम खिलाडी को मैदान से बाहर कर दिया। आज टेलीकॉम सेक्टर मे कितने विकल्प हैं। एयरटेल और वोडा का सरकार पर क्या आरोप है। बीएसएनएल की तरह जिओ का बाजार शेयर 100 फीसदी के पास कैसे पहुंचा। जिओ मे अमेरिकी कंपनी की हिस्सेदारी कैसे बढ रही है। क्या 1989 में उदारवाद के पक्षकार ने ऐसा दावा किया था कि आज बीएसएनएल का एकाधिकार है, उदारवाद आने के बाद जिओ का एकाधिकार होगा, जिसमें अमेरिकी कंपनी की हिस्सेदारी होगी। विश्व बैंक और अमेरिका का घोषित एजेंट मनमोहन जी इससे बेहतर नीति और क्या बना सकते थे, अमेरिका के लिए। कहां है वो विकल्प जिसकी बात 1989 में उदारवाद के पक्षकार किया करते थे। समाजवाद का मतलब सरकारी और उदारवाद का मतलब रिलायंस कैसे हो गया मनमोहन बेटा।
साभार :
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https://www.facebook.com/esamaadmaithili/posts/3011681525546792?__cft__[0]=AZV78Lp1Y6WeCs-frkYUwnmSgWCwO2RyME_6s2sH4mlaOaOcmJNcesGBppByVKjQMNkpFxeh0C9myPhdxNhegSJSHrc1GAchIc6g8fZaFljDxupvnpCagmjbb9lJEjd8Iaute7epTvkT9mv3wCsayeyGFgZllaly6ibVmiaFUHmj6tmIQKIDHQcW3rY-i2D3Slo&__tn__=%2CO%2CP-y-R
~विजय राजबली माथुर ©
Sunday, June 28, 2020
Close ties with BJP leaders and the RSS ------ The Telegraph-28 Jun 2020
China cash that BJP cannot see
(IMRANAHMED SIDDIQUI)
(The Telegraph-28 Jun 2020)
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New Delhi: Time was when accepting donations from Chinese institutions was as proper and acceptable as sharing space on a swing Yet, the BJP, in its haste to divert attention from the Galwan blunder, has forgotten the adage that when you point a finger at someone, you are pointing three at yourself. In this case, at least two fingers are pointing at the BJP ecosystem The Observer Research Foundation, a foreign policy think tank associated with foreign minister S. Jaishankar's son, received funding from the Chinese consulate, including that in Calcutta, in 2016. The ORF is supported by Reliance Industries Another think tank, the Vivekananda International Foundation, has declared on its website that it has working relationships with nine Chinese institutions on matters of foreign and strategic policy National security adviser Ajit Doval is founding director of the Vivekananda International Foundation (VIF), which shares close ties with BJP leaders and the RSS The think thanks themselves put up this information in the public domain long ago.
The identity of the donors would not have drawn attention had not the BJP made a non-issue into a national security issue by accusing the Congress of Chinese links based on money received in 2005-06. It's common for organisations worldwide to receive foreign funding Dhruva Jaishankar, son of the foreign minister, became director of the US Initiative at the Observer Research Foundation (ORF) last year. The foreign minister, also a former ambassador to China, is a regular visitor to the ORF where he delivers talks on various foreign policy-related topics The ORF website carries a list of foreign donors and the amounts received from them It shows the think tank received three grants, together worth over Rs 1.25 crore, from the Chinese consulate-general in 2016 and another Rs 50 lakh the following year The foundation received Rs 7.7 lakh on April 29, 2016; another Rs 11.55 lakh on November 4 that year --- both from the Chinese consulategeneral in Calcutta --- and Rs 1.068 crore from the "Consulate General of People's Republic of China" on December 31 that year A grant of Rs 50 lakh came from the "Consulate General of People Republic of China" on December 1, 2017. The Vivekananda Interna- tional Foundation's website lists its association with the China Institute of International Strategic Studies (Beijing); China Institute of International Studies (Beijing); Centre for South Asian Studies, Peking University (Beijing); Research Institute for Indian Ocean Economies, Yunnan University of Finance and Economics, Kunming; National Institute of International Strategy of Chinese Academy of Social Sciences, Beijing; Centre for South Asia & West China Cooperation & Development University, Chengdu; Institute of South Asian Studies, Sichuan University, Chengdu; Silk Road Think Tank Network Development Research Council, Beijing; and the Centre for Indian Studies, Shenzhen Sources in the security establishment said members of the two think tanks had ample access to North Block and South Block, the seats of governance An email sent by this newspaper to the ORF on Saturday night elicited the reply: "Your message has been received and we will get back to you at the earliest." This newspaper also sent a message to ORF president Samir Saran on his Twitter account and was awaiting a reply at the time of going to press However, this report has not made any suggestion that any of the donations are not legal.
~विजय राजबली माथुर ©
Monday, June 22, 2020
जातिवाद बिहार की समस्या नहीं...समस्या तो सहाय जैसे नेता हैं ------ कुमुद सिंह
Kumud Singh
जातिवाद बिहार की समस्या नहीं...समस्या तो सहाय जैसे नेता हैं..............................................................................................................
बिहार को जातिवाद से मुक्त करने की जरुरत नहीं है, क्योंकि जातिवाद विकास में कहीं बाधक होता तो कर्नाटक और तमिलनाडू समेत अन्य जातिवादी राज्य विकसित नहीं होते। दरअसल बिहार की मूल समस्या केबी सहाय जैसे नेता हैं, जो कभी महामाया, तो कभी जगन्नाथ तो कभी लालू बनकर हमारा नेतृत्व करते रहे। ऐसे नेताओं की लंबी कतार बनती ही जा रही है। नरेंद्र मोदी के लिए जिस प्रकार बिहार के गिरिराज सिंह हैं, कुछ कुछ वैसा ही जवाहर लाल नेहरू के लिए केबी सहाय थे। उस जमाने में वैसे जवाहर लाल नेहरू की बात को बिहार कांग्रेस में काटने वाले दो लोग थे। एक राजेंद्र प्रसाद व दूसरे श्रीकृष्ण सिंह। दरभंगा महाराज किसी विपक्षी नेता से ज्यादा प्रभावी नेहरू के विरोधी तो थे ही। उस मुकाबले आज नरेंद्र मोदी की बात को बिहार भाजपा में काटनेवाला कोई नहीं है। श्रीबाबू 1937 में बिहार के प्रधानमंत्री बने और मरते दम तक बिहार का नेतृत्व किया। पहले राजतंत्र फिर गणतंत्र जैसे दो विपरीत व्यवस्थाओं में उन्होंने बिहार को आर्थिक और प्रशासनिक रूप से सबल बनाये रखा। दामोदर घाटी जैसे कुछ उदाहरण को छोड दें तो उन्होंने बिहार हित से कभी समझौता नहीं किया। जमींदारी हस्तानांतरण को सफलतापूर्वक करने के बाद सार्वजनिक क्षेत्र में कारखानों की स्थापना श्री बाबू के बिहार विजन का एक अभिन्न पन्ना माना जाता है। नेहरू के लिए बिहार का मतलब एक ऐसा राज्य था जहां से राजेंद्र प्रसाद और कामेश्वर सिंह जैसे विरोधी आते थे, लेकिन श्रीबाबू के माध्यम से नेहरू बिहार का मिजाज नहीं बदल पा रहे थे। श्रीबाबू की मौत के बाद नेहरू चाह कर भी केबी सहाय को मुख्यमंत्री नहीं बना पाये। राजेंद्र प्रसाद व कामेश्वर सिंह की लॉबी काम कर गयी और विनोदानंद झा मुख्यमंत्री बने। विनोदानंद झा देवघर बाबा मंदिर के मुख्य पंडे के पुत्र थे। कहा जाता है कि दलितों के मंदिर में प्रवेश को लेकर श्री झा का दरभंगा महाराज के साथ राजनीतिक संरक्षण का समझौता था। उसी का परिणाम रहा कि श्री झा बिहार के मुख्यमंत्री बने। बिहार को लेकर नेहरू जो प्रयोग करना चाहते थे उसके लिए विनोदानंद झा भी तैयार नहीं थे। संयोग से 1962 के अक्टूबर में कामेश्वर सिंह और फरवरी 63 में राजेंद्र प्रसाद का निधन हो गया। श्री बाबू पहले ही जा चुके थे। नेहरू अब नरेंद्र मोदी की तरह ही बिहार में ताकतवर हो गये। उन्होंने कामेश्वर सिंह की पुण्यतिथि के मौके पर ही विनोदानंद झा को मुख्यमंत्री पद से हटा कर केबी सहाय को मुख्यमंत्री बना दिया। केबी सहाय ने नेहरू का वो सपना पूरा करने का जिम्मा उठाया जो वो उस दिन से देख रहे थे जिसदिन राजा जी के बदले बिहार लाॅबी ने राजेंद्र प्रसाद को भारत का राष्ट्रपति बना कर उनकी सत्ता को पहली बार चुनौती दी थी। वैसे बिहार लॉबी की ताकत नेहरू ने 1939 में ही देख ली थी, जब मदनमोहन मालवीय की पैरवी के बावजूद वो बीएचयू के कुलपति पद पर राधाकृष्णन की नियुक्ति नहीं रोक पाये। बिहार लौबी नेहरू को लगातार परेशान करता रहा। बीएचयू से तो मालवीय के बेटों ने राधाकृष्णन को भगा दिया, लेकिन नेहरू के विरोध के बावजूद बिहार लॉबी राधाकृष्णन को पहला उपराष्ट्रपति बनाने मे कामयाब रही। नेहरू इस फैसले से इतने कुंठित हुए कि उपराष्ट्रपति निवास के लिए चयनित हैदराबाद हाउस को अपने लिए आवंटित करा लिया। भारत के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री की तरह उपराष्ट्रपति के लिए कोई एतिहासिक इमारत आरक्षित नहीं हुई। बिहार लॉबी के कारण नेहरू अपने कैबिनेट के अलावा कुछ तय नहीं कर पा रहे थे। राधाकृष्णन के राष्ट्रपति बन जाने के बाद नेहरू उपराष्ट्रपति के लिए पश्चिम भारत के एक बडे नेता का चयन कर चुके थे, लेकिन बिहार लॉबी ने वहां भी उन्हें हार का मुंह दिखाया और बिहार के तत्कालीन राज्यपाल जाकिर हुसैन को उपराष्ट्रपति बना कर पद पर बैठा दिया। ये तीन लगातार संवैधानिक पदों पर हुई नियुक्ति बिहार लौबी के दबदबे को दिखाता है, जो 1963 के बाद हमेशा के लिए लुप्त हो गया। केबी सहाय बिहार में नेहरू की कमजारी थे। जिस प्रकार नरेंद्र मोदी के मुश्किल घडी में गिरिराज सिंह ने उनके पक्ष में हल्ला बोला था, उसी प्रकार नेहरू जब जमींदारी हस्तानांतरण पर हाइकोर्ट में कमजोर पड गये थे और श्रीबाबू भी सुशाील मोदी की तरह चुप हो थे गये तो केबी सहाय ही गिरिराज सिंह की तरह हल्ला बोला था। केबी सहाय को इसी का इनाम मिला। नेहरू को वक्त बहुत कम मिला, लेकिन केबी सहाय को उन्होंने श्रीबाबू के विजन के विपरीत काम करने की नीति समझा दी। ये वो नीति थी जो बिहार को धीरे-धीरे मूर्ख, गरीब के साथ साथ बीमारू भी बना डाला, जो नेहरू का अंतिम सपना था। केबी सहाय ने सबसे पहले शिक्षा को तहस नहस किया। फिर समाजवाद का ऐसा पौधा रोपा जिसका बट वृक्ष हम सबके सामने है। नेहरू की मौत के बाद केबी सहाय को भी पद से हटा दिया गया, लेकिन तब तक उन्होंने श्रीबाबू के विजन को हमेशा के लिए जमींदोज दिया..सहाय के बाद बिहार कभी उस रास्ते नहीं लौटा..केबी सहाय के रास्ते चला या फिर नये रास्ते तलाशता हुआ..राहों पर भटकता रहा..इस भटकते बिहार को किसी ने भीखमंगा समझा तो किसी ने जाति पूछकर हमसफर बना लिया। सवाल है क्या बिहार को मानसिक रूप से गैर बिहारी बनाने के पीछे कौन था। बिहार में समाजवाद के नाम पर स्तरहीन सोच को प्रतिष्ठा के समतुल्य किसने बनाया। रासबिहारी लाल मंडल ने जिस सामाजिक समानता की शुरुआत यादवों को जनउ पहनाकर शरु की थी, उसे ब्राहमणों को जनउ तुडबाकर समानता की परिभाषा किसने बना दिया। शिक्षा से लेकर आधारभूत ढांचा तक को तहस नहस कर देने की नीति तो 1963 में ही बन गयी थी। बिहार जैसे टाइटैनिक में छेद तो 1963 में ही कर दिया गया था..आप उसके डूबने की तारीख पर बहस कर रहे हैं...पानी कहां कब पहुंचा बता रहे हैं...लालू को तो टाइटैनिक का वो हिस्सा मिला जो फिल्म खत्म होने की आखिरी रील से पहले का था। फिल्म तो पहली रील से देखने की जरुरत है।
साभार :
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| कुमुद सिंह |
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~विजय राजबली माथुर ©
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