Saturday, January 24, 2015

सरस्वती की पूजा क्यों ---ध्रुव गुप्त /ज्ञान-विज्ञान की आराधना का पर्व ---विजय राजबली माथुर



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 देवी सरस्वती की पूजा क्यों करते हैं हम ?:

प्राचीन काल में आर्य सभ्यता और संस्कृति का केंद्र उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत था। आज की विलुप्त सरस्वती तब वर्तमान जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पाकिस्तान के पूर्वी भाग, राजस्थान और गुजरात की मुख्य नदी हुआ करती थी। तत्कालीन आर्य-सभ्यता के सारे गढ़, नगर और व्यावसायिक केंद्र सरस्वती के किनारे बसे थे। तमाम ऋषियों और आचार्यों के आश्रम सरस्वती के तट पर स्थित थे। ये आश्रम अध्यात्म, धर्म, संगीत और विज्ञान की शिक्षा और अनुसंधान के केंद्र थे। वेदों, उपनिषदों और ज्यादातर स्मृति-ग्रंथों की रचना इन्हीं आश्रमों में हुई थी। सरस्वती को ज्ञान के लिए उर्वर अत्यंत पवित्र नदी का दर्ज़ा प्राप्त था। ऋग्वेद में इसी रूप में इस नदी के प्रति श्रद्धा-निवेदन किया गया है। कई हजार साल पहले सरस्वती में आई प्रलयंकर बाढ़ के बाद अधिकांश नगर और आश्रम गंगा और जमुना के किनारों पर स्थानांतरित तो हो गए, लेकिन जनमानस में सरस्वती की पवित्र स्मृतियां बची रहीं। इतिहास के गुप्त-काल में रचे गए पुराणों में उसे देवी का दर्जा दिया गया। उसके बाद अन्य देवी देवताओं के साथ सरस्वती की पूजा और आराधना भी आरम्भ हो गई। सरस्वती की पूजा वस्तुतः आर्य सभ्यता-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, गीत-संगीत और धर्म-अध्यात्म के कई क्षेत्रों में विलुप्त सरस्वती नदी की भूमिका के प्रति हमारी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है।

सभी मित्रों को सरस्वती पूजा की शुभकामनाएं !
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ध्रुव गुप्त जी के आर्ष विचार पढ़ कर एक बार फिर से इस पुराने लेख को सार्वजनिक कर रहा हूँ :

Tuesday, February 8, 2011

वीर -भोग्या वसुंधरा


http://krantiswar.blogspot.in/2011/02/blog-post_08.html
 आज वसंत पंचमी है-सरस्वती पूजा.सुनिये एक छोटी स्तुति-



सरस्वती परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं जिसके द्वारा हम ज्ञान-विज्ञान  ,बुद्धि,विवेक  को अर्जित करते हैं.जिस प्रकार किसी संस्था या संगठन की स्थापना से पूर्व उसके लिये नियम-विधान बनाये जाते हैं.उसी प्रकार परमात्मा ने सृष्टि क़े सृजन से पूर्व मनुष्यों द्वारा पालन करने हेतु नियमों की संरचना वेदों क़े रूप में की.मनुष्य है ही मनुष्य इसलिए कि,उसमें मनन करने की क्षमता है,अन्य किसी भी प्राणी को परमात्मा ने यह योग्यता नहीं दी है.पूर्व-सृष्टि की मोक्ष -प्राप्त आत्माओं को परमात्मा ने अंगिरा आदि ऋषियों क़े रूप में वेद-ज्ञान प्रदान करने हेतु प्रथ्वी पर अवतरित किया.परमात्मा स्वंय अवतार नहीं लेता है न ही नस और नाडी क़े बंधन में बंधता है जैसा कि,पोंगा-पंथियों ने प्रचारित कर रखा है.,ढोंगियों-पाखंडियों ने वेद-विपरीत अपने निहित स्वार्थ में गलत पूजा पद्धतियाँ विकसित कर ली हैं.आज आम जनता उन्हीं दुश्चक्रों में फंस कर अपना अहित करती जाती और दुखी होती रहती है.आज ज्ञान-विज्ञान क़े देवता सरस्वती की पूजा क़े अवसर पर एक बार फिर सबको पाखण्ड से बचने हेतु प्रेरित करने का छोटा सा प्रयास इस लेख क़े माध्यम से कर रहा हूँ.

देवता वह है जो देता है और बदले में लेता नहीं है,जैसे-वृक्ष  ,नदी,वायु,बादल(मेघ),अग्नि,भूमि,अंतरिछ आदि.अतः जो लोग इनसे अलग देवता की कल्पना कर पूजते हैं ,निश्चय ही वेद-विपरीत आचरण करते हैं जो परमात्मा क़े निर्देशों का खुला उल्लंघन नहीं तो और क्या है?.फिर कष्ट भोगने पर परमात्मा को कोसते है और अपनी गलती को सुधारते नहीं.क्योंकि ढोंगी-पाखंडी सुधार होने नहीं देना चाहते.दोषी कौन?

आज कल एक रिवाज़ चल रहा है वैज्ञानिक धर्म को अवैज्ञानिक बताने का.आज क़े तथा-कथित वैज्ञानिक सुनियोजित तरीके से प्रचार करते हैं कि,धर्म-ज्योतिष आदि अवैज्ञानिक ,ढोंग एवं टोटका हैं.अज्ञान की इंतिहा इस से ज्यादा क्या होगी?जो वास्तव में अविज्ञान है,टोटका और टोना,ढोंग तथा पाखण्ड है उसे तो पूजा जाता है और ऐसा वे तथा-कथित साईंस्दा ही ज्यादा करते हैं.बनारस जो धर्म-नगरी समझा जाता है वहीं से सम्बंधित लोग ऐसा करने में अग्रणी हैं.यह कोई आज नयी बात नहीं है.बनारस क़े ही तथा कथित विद्वानों ने जो उस समय क़े शासकों क़े अनुगामी थे पहले तो गोस्वामी तुलसी दास जी क़े लिखित ग्रन्थ को जलाना  शुरू किया और जब उन्होंने बनारस शहर छोड़ कर अवधी में 'राम चरित मानस'की रचना करके जनता का आव्हान शासन व्यवस्था को उलट देने का किया तो कुचक्र चला कर मानस को पूज्य बना दिया गया और राम को अवतार ,भगवान् आदि घोषित कर दिया गया जिससे आम जनता उनके चरित्र  का आचरण न करने की सोचे तथा पंगु ही बनी रहे और शासकों की लूट बरकरार रहे.राम ने साम्राज्यवादी रावण का संहार करके भारतीय राष्ट्रवाद की रक्षा की थी. अब आप उन्हें भगवान् का अवतार मानें तब आप वैसा ही कैसे कर सकते हैं और नहीं कर भी रहे हैं.तब लुटते  रहिये फिर क्यों रोते हैं हमारा धन स्विस बैकों में क्यों पहुंचा ? हम गण-तन्त्र में भी औपनैवेशिक बस्ती  जैसे क्यों हैं ?बनारस क़े करमकांडी वर्ग  ने गंगा क़े घाटों पर बड़े -बड़े आरे लगा रखे थे और स्वर्ग जाने क़े इच्छुक लोगों से मोटी दान -दक्षिणा लेकर उन्हें ढलान क़े रास्ते भेज देते थे.बेवकूफ स्वर्ग लालची उन आरों से कट कर गंगा में बह जाता था उसके परिवार जन जश्न मना कर उन तोदुओं का पेट और भरते थे. यह था गुलाम भारत में बनारस का विज्ञान.वहां क़े तीस मारखा विज्ञानी ब्लॉगर  आज फिर दहाड़ रहे हैं उन क़े मंतव्य को समझने और अपनी रक्षा करने की महती आवश्यकता है.
मारा भारतीय वैदिक-विज्ञान हमें बताता है कि,हम जिस पृथ्वी क़े वासी हैं वह अपनी धुरी पर एक लाख ग्यारह हजार छै सौ कि.मी.प्रति घंटे की गति से घुमते हुए अपने से १३ लाख गुना बड़े और नौ करोड़ ३० लाख मील की दूरी पर स्थित सूर्य की परिक्रमा कर रही है.सब ग्रहों का परिवार एक सौर परिवार है और एक अरब सौर परिवारों क़े समूह को एक नीहारिका कहते हैं और ऐसी १५०० निहारिकायें वैज्ञानिक साधनों द्वारा देखी गई हैं.एक आकाश गंगा में २०० अरब तारे हैं और अरबों आकाश गंगाएं विद्यमान हैं.एक आकाश गंगा का प्रकाश प्रथ्वी पर आने में १० अरब वर्ष लग जाते हैं.प्रकाश की गति ३ लाख कि.मी.प्रति सेकिंड है.अर्थात जब से यह पृथ्वी बनी है तब से कुछ नक्षत्रों का प्रकाश प्रथ्वी पर अभी नहीं पहुंचा है.इतने विशाल ब्रहमांड क़े रचियता की व्यवस्था में ग्रह-उपग्रह ,नक्षत्र आदि अपने स्थान (आर्बिट)पर सक्रिय हैं एक दूसरे से दूरी बनाये रख कर गतिशील हैं और आपस में नहीं टकरा रहे हैं.सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ३६० डिग्री में फैला है.सूर्य जिस पर निरन्तर हीलियम और हाईड्रोजन क़े विस्फोट हो रहे हैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का परिभ्रमण ३० -३० डिग्री  क़े हिसाब से कर रहा है ,इस प्रकार १२ राशियाँ हैं और २७ नक्षत्र हैं २८ वें अभिजित को गणना लायक न होने क़े कारण नहीं गिनते हैं.प्रत्येक नक्षत्र में चार चरण होते हैं .सूर्य छै माह उत्तरायण तथा छै माह द्क्शिनायन रहता है.सूर्य की ६० कलाएं हैं.
३६०*६० =२१६०० /उत्तरायण/दक्षिणायन २१६००/२ =१०८००  और बाद क़े शून्य की गणना नहीं होने क़े कारण १०८ मान बना इसी को माला में मनके क़े रूप में रखा और विधान बना दिया कि १०८ बार जाप करने से वह एक माला या माने ब्रह्माण्ड का एक चक्र पूर्ण हुआ. यह है हमारा वैदिक विज्ञान,जिसे पाश्चात्य क़े पिट्ठू गररियों  क़े गीत बताते हैं.मैक्स मूलर सा :जर्मनी क़े विद्वान भारत आ कर ३० वर्ष रह कर संस्कृत सीखते हैं और यहाँ से संस्कृत की मूल पांडू लिपियें ले कर चले जाते हैं और जर्मनी में उसके आधार पर रिसर्च होती है तथा वह पश्चिम का विज्ञान कहलाती है. जर्मन वैज्ञानिकों को रूस तथा अमेरिका ले जा कर (हिटलर की पराजय क़े बाद)अणु(एटम )बम्ब का अविष्कार होता है और  वह पश्चिम की खोज बन जाती है ,है न हम भारतीयों का कमाल?हमारे बनारसी साईंस ब्लागर्स हमारे ज्योतिष विज्ञान को अवैज्ञानिक बताने का दुह्साहस कर डालते हैं क्योंकि वे आज भी दासत्व -भाव में जी रहे हैं.
अथर्व वेद १० /३ /३१ में कहा है 'अष्टचक्रा नवद्वारा देव पूरयोध्या ' अर्थात यह शरीर देवताओं की ऐसी नगरी है कि उसमें दो आँखें,दो कान,दो नासिका द्वार एक मुंह तथा दो द्वार मल-मूत्र विसर्ज्नार्थ हैं.ये कुल नौ द्वार अर्थात दरवाजे हैं जिस अयोध्या नगर में रहता हुआ जीवात्मा अर्थात पुरुष कर्म करता और उनके फल भोगता है.द्वारों क़े सन्दर्भ में ही इस शरीर को द्वारिकापुरी भी कहा जाता है.आप आज क्या कर रहे है ? जिस अयोध्या को राम जन्म भूमी बना कर ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा गढ़ी कहानी क़े आधार पर बेवजह लड़ रहे हैं उसे तो सम्राट हर्ष वर्धन ने साकेत नाम से बसाया था.राम क़े चरित्र को अपने में ढालेंगे नहीं ,राम की तरह साम्राज्यवाद का विनाश करेंगे नहीं बल्की साम्राज्यवादियों की चाल में फंस कर राम क़े नाम पर अपने ही देश में खून खराबा करेंगें.राम ने तो साम्राज्यवादी रावण का संहार उसके यहाँ जाकर किया था. आज क़े साम्राज्यवादी अमेरिका की चाकरी हमारे देश क़े वैज्ञानिक करने को सदैव आतुर रहते हैं.यह क्या है?
'ब्रह्म्सूत्रेण पवित्रीक्रित्कायाम 'यह लिखा है कादम्बरी में सातवीं शताब्दी में आचार्य बाणभट्ट ने.अर्थात  महाश्वेता ने जनेऊ पहन रखा है, तब तक लड़कियों का भी उपनयन होता था.(अब तो सबका उपहास अवैज्ञानिक कह कर उड़ाया जाता है).श्रावणी पूर्णिमा अर्थात रक्षा बंधन पर उपनयन क़े बाद नया विद्यारम्भ होता था.उपनयन अर्थात जनेऊ क़े तीन धागे तीन महत्वपूर्ण बातों क़े द्योतक हैं-
१ .-माता,पिता,तथा गुरु का ऋण उतारने  की प्रेरणा.
२ .-अविद्या,अन्याय ,आभाव दूर करने की जीवन में प्रेरणा.
३ .-हार्ट,हार्निया,हाईड्रोसिल (ह्रदय,आंत्र और अंडकोष -गर्भाशय )संबंधी नसों का नियंत्रण ;इसी हेतु कान पर शौच एवं मूत्र विसर्जन क़े वक्त धागों को लपेटने का विधान था.आज क़े तथा कथित पश्चिम समर्थक विज्ञानी इसे ढोंग, टोटका कहते हैं क्या वाकई ठीक कहते हैं?
विश्वास-सत्य द्वारा परखा  गया तथ्य
अविश्वास-सत्य को स्वीकार न  करना
 अंध-विश्वास--विश्वास अथवा अविश्वास पर बिना सोचे कायम रहना
विज्ञान-किसी भी विषय क़े नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्ययन को विज्ञान कहते हैं.
इस प्रकार जो लोग साईंस्दा होने क़े भ्रम में भारतीय वैज्ञानिक तथ्यों को झुठला रहे हैं वे खुद ही घोर अन्धविश्वासी हैं.वे तो प्रयोग शाळा में बीकर आदि में केवल भौतिक पदार्थों क़े सत्यापन को ही विज्ञान मानते हैं.यह संसार स्वंय ही एक प्रयोगशाला है और यहाँ निरन्तर परीक्षाएं चल रहीं हैं.परमात्मा एक निरीक्षक (इन्विजीलेटर)क़े रूप में देखते हुए भी नहीं टोकता,परन्तु एक परीक्षक (एक्जामिनर)क़े रूप में जीवन का मूल्यांकन करके परिणाम देता है.इस तथ्य को विज्ञानी होने का दम्भ भरने वाले नहीं मानते.यही समस्या है.
आज वसंत-पंचमी को ही महा कवी पं.सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'का जन्मदिन भी है उन्होंने माँ सरस्वती से हम सब भारतीयों क़े लिये जो वरदान मँगा है ,वही इस लेख का अभीष्ट है-

वर दे वीणावादिनी
वर दे वीणावादिनी वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव, अमृत-मंत्र नवभारत में भर दे ।
काट अंध उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष- भेद-तम हर प्रकाश भर जगमग जग कर दें !
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मंद्र रव
नव नभ के नव विहग-वृंद को नव पर, नव स्वर दे ।

(--निराला)

  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Wednesday, January 14, 2015

मकर -संक्रांति का महत्व --- विजय राजबली माथुर


 
http://www.janadesh.in/InnerPage.aspx?Story_ID=6683


प्रति-वर्ष १४ जनवरी को मकर संक्रांति का पर्व श्रद्धा एवं उल्लास क़े साथ मनाया जाता रहा है.परंतु अब पृथ्वी व सूर्य की गतियों में आए अंतर के कारण सूर्य का मकर राशि में प्रवेश सांयकाल या उसके बाद होने के कारण प्रातः कालीन पर्व अगले दिन अर्थात १५ जनवरी को मनाए जाने चाहिए.अतः स्नान-दान,हवन आदि प्रक्रियाएं १५ ता.की प्रातः ही होनी चाहिए.परन्तु यदि सूर्य मकर राशि में 14 जनवरी को ही प्रवेश कर जाये तब 14 तारीख को ही मनाया जाना चाहिए। लेकिन केवल लकीर का फकीर बन कर नहीं चलना चाहिए क्योंकि,यह  वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं रहेगा .मकर संक्रांति क़े  दिन से सूर्य उत्तरायण होना प्रारम्भ होता है.सूर्य लगभग ३० दिन एक राशि में रहता है.१६ जूलाई को कर्क राशि में आकर सिंह ,कन्या,तुला,वृश्चिक और धनु राशि में छै माह रहता है.इस अवस्था को दक्षिणायन कहते हैं.इस काल में सूर्य कुछ निस्तेज तथा चंद्रमा प्रभावशाली रहता है और औषधियों एवं अन्न की उत्पत्ति में सहायक रहता है.१४ जनवरी को मकर राशि में आकर कुम्भ,मीन ,मेष ,वृष और मिथुन में छै माह रहता है.यह अवस्था उत्तरायण कहलाती है.इस काल में सूर्य की रश्मियाँ तेज हो जाती हैं और रबी की फसल को पकाने का कार्य करती हैं.उत्तरायण -काल में सूर्य क़े तेज से जलाशयों ,नदियों और समुन्द्रों का जल वाष्प रूप में अंतरिक्ष में चला जाता है और दक्षिणायन काल में यही वाष्प-कण पुनः धरती पर वर्षा क़े रूप में बरसते हैं.यह क्रम अनवरत चलता रहता है.दक्षिण भारत में पोंगल तथा पंजाब में लोहिणी,उ.प्र.,बिहारऔर बंगाल में खिचडी क़े रूप में मकर संक्रांति का पर्व धूम-धाम से सम्पन्न होता है.इस अवसर पर छिलकों वाली उर्द की दाल तथा चावल की खिचडी पका कर खाने तथा दान देने का विशेष महत्त्व है.इस दिन तिल और गुड क़े बने पदार्थ भी दान किये जाते हैं.क्योंकि,अब सूर्य की रश्मियाँ तीव्र होने लगतीं हैं;अतः शरीर में पाचक अग्नि उदीप्त करती हैं तथा उर्द की दाल क़े रूप में प्रोटीन व चावल क़े रूप में कार्बोहाईड्रेट जैसे पोषक तत्वों को शीघ्र घुलनशील कर देती हैं,इसी लिये इस पर्व पर खिचडी  खाने व दान करने का महत्त्व निर्धारित किया गया है.गुड रक्तशोधन का कार्य करता है तथा तिल शरीर में वसा की आपूर्ति करता है,इस कारण गुड व तिल क़े बने पदार्थों को भी खाने तथा दान देने का महत्त्व रखा गया है.

जैसा कि अक्सर हमारे ऋषियों ने वैज्ञानिक आधार पर निर्धारित पर्वों को धार्मिकता का जामा पहना दिया है,मकर-संक्रांति को भी धर्म-ग्रंथों में विशेष महत्त्व दिया गया है.शिव रहस्य ग्रन्थ,ब्रह्म पुराण,पद्म पुराण आदि में मकर संक्रांति पर तिल दान करने पर जोर दिया गया है.हमारा देश कृषि-प्रधान रहा है और फसलों क़े पकने पर क्वार में दीपावली तथा चैत्र में होली पर्व मनाये जाते हैं.मकर संक्रांति क़े अवसर पर गेहूं ,गन्ना,सरसों आदि की फसलों को लहलहाता देख कर तिल,चावल,गुड,मूंगफली आदि का उपयोग व दान करने का विधान रखा गया है,जिनके सेवन से प्रोटीन,वसा,ऊर्जा तथा उष्णता प्राप्त होती है."सर्वे भवन्तु सुखिनः"क़े अनुगामी हम इन्हीं वस्तुओं का दान करके पुण्य प्राप्त करते हैं.


दान देने का विधान बनाने का मूल उद्देश्य यह था कि,जो साधन-विहीन हैं और आवश्यक पदार्थों का उपभोग करने में अक्षम हैं उन्हें भी स्वास्थ्यवर्धक  पदार्थ मिल सकें.यह एक दिन का दान नहीं बल्कि इस ऋतु-भर का दान था.लेकिन आज लोग साधन-सम्पन्न कर्मकांडियों को एक दिन दान देकर अपनी पीठ थपथपाने लगते हैं.जबकि,वास्तविक गरीब लोग वंचित और उपेक्षित  ही रह जाते हैं.इसलिए आज का दान ढोंग-पाखण्ड से अधिक कुछ नहीं है जो कि, ऋषियों द्वारा स्थापित विधान क़े उद्देश्यों को पूरा ही नहीं करता.क्या फिर से प्राचीन अवधारणा को स्थापित नहीं किया जा सकता ?

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मूल रूप से यह लेख १३ जनवरी २०११ को पहली बार ब्लाग में प्रकाशित हुआ था।


(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)
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Wednesday, December 31, 2014

वामपंथ फासिस्ट साजिश में उलझ कर पराजय पथ पर ----- विजय राजबली माथुर



राज्यसभा में 'रेखा' और 'सचिन तेंदुलकर' ये दो ऐसे  सदस्य हैं जिनको मनमोहन सरकार ने अप्रैल 2012 में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी से मनोनीत करवाया था। मोदी ने सफाई नवरत्नों में तेंदुलकर को शामिल किया था अब 'पेटा' के जरिये रेखा को अपने साथ नामित करवाया है ये सारी कोशिशें इन दोनों सांसदों का दिल जीत कर अपनी सरकार के समर्थन में खड़ा करने के लिए हैं। तेंदुलकर को ज़मीन का भी लाभ दिलाने की कोशिश इसी योजना का ही हिस्सा है। 




 सिर्फ सिन्धी होने के कारण ही आडवाणी ने हिरानी की फिल्म का समर्थन नहीं किया है बल्कि आमिर खान और मोदी की घनिष्ठता के कारण भी यह समर्थन आया है। फासिज़्म को मजबूत करने के लिए विपक्ष को समाप्त करना है उस दिशा में दो गुट बनाए गए हैं । एक गुट एक बात उठाता है दूसरा गुट उसका विरोध करता है। हिंदूमहासभा के बेनर पर गोडसे की मूर्ती लगाने की तैयारी और भाजपा के बेनर पर उसका विरोध। साधारण जनता व फासिस्ट विरोधी दलों को इस साजिश को समझते हुये ही अपनी नीतियाँ बनानी व अमल करना चाहिए। आमिर खान द्वारा मोदी के समर्थन से फिल्म बना कर जो विवाद उत्पन्न किया गया है उसका पूरा-पूरा लाभ केंद्र की फासिस्ट सरकार को ही मिलेगा। यह ध्यान में रख कर ही कदम उठाने चाहिए। आडवाणी का वक्तव्य आँखें खोलने के लिए काफी होना चाहिए।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=808278565900788&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=1&theater


 मेरे उपरोक्त निष्कर्ष से सहमति व्यक्त करने वाले फिल्म निर्माता व समीक्षक सत्यप्रकाश गुप्ता जी ने खुद एक तथ्यात्मक सत्य - विश्लेषण प्रस्तुत किया है :

 https://www.facebook.com/groups/231887883638484/permalink/365350976958840/

 मोदी की यह सरकार एमर्जेंसी के दौरान गिरफ्तार मधुकर दत्तात्रेय देवरस और इन्दिरा गांधी के मध्य हुये गुप्त समझौते की ही परिणति है जिसके तहत RSS ने 1980 व 1984 के लोकसभा चुनावों में इन्दिरा कांग्रेस का समर्थन करके अपनी घुसपैठ बनाई थी।2011 से चले हज़ारे/केजरीवाल आंदोलन को RSS/मनमोहन सिंह व देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों का पूर्ण समर्थन था और उसी अनुरूप सौ से अधिक कांग्रेसियों ने भाजपा सांसद बन कर मोदी को स्पष्ट बहुमत प्रदान कर दिया। अब राज्यसभा तथा राज्यों की विधानसभाओं में समर्थन जुटाने की कवायद चल रही है और सफलता मिलते ही वर्तमान संविधान को ध्वस्त करके RSS की अर्द्ध-सैनिक तानाशाही को  संवैधानिक संरक्षण द्वारा स्थापित कर दिया जाएगा। साम्यवादी/वामपंथी विद्वान व नेता गण थोथी नास्तिकता या एथीस्टवाद में फंस कर ढोंग-पाखंड-आडंबर को मजबूत करते जा रहे हैं और अंततः फासिस्टों को सफलता दिलाते जाकर खुद को नष्ट करने की प्रक्रिया पर चल रहे हैं। तामिलनाडु में होने वाले वर्ष 2016 के चुनावों के लिए मोदी द्वारा रेखा को अपने पाले में खींचने का अभियान शुरू हो चुका है जिनका 29 जून 2017 तक का समय राजनीतिक रूप से उज्ज्वल है। क्यों नही तामिलनाडु से भाकपा के राज्यसभा सांसद कामरेड डी राजा साहब रेखा को वामपंथी खेमे में लाने का प्रयास करते ? क्योंकि एथीज़्म में ज्योतिष का कोई महत्व नहीं है भले ही फासिस्ट मोदी सरकार उनका लाभ उठा ले जाये। यदि रेखा को वामपंथी मोर्चे का नेता बना कर तामिलनाडु विधानसभा का चुनाव लड़ा जाये तो वहाँ यह मोर्चा सफलता प्राप्त कर सकता है। यदि फ़ासिज़्म को उखाड़ना है तो अभी से ही जुटना होगा और फ़ासिज़्म की चालों का शिकार बनने से बचना होगा। वामपंथी नेता गण बाजपेयी,केजरीवाल, pk फिल्म का समर्थन करके अपना जनाधार फासिस्टों को क्यों सौंपते जा रहे हैं? यह दुखद एवं सोचनीय विषय है। मनमोहन सिंह के फेर में फंस कर सोनिया कांग्रेस तो रेखा अथवा ममता बनर्जी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव लड़ने से वंचित हो गई किन्तु वामपंथ के सामने 2016 के  तामिलनाडु विधानसभा चुनाव रेखा के नेतृत्व में लड़ने के प्रयास तो अभी से किए ही जा सकते हैं जिससे कि दक्षिण में मोदी के कदमों को थामा जा सके।

http://krantiswar.blogspot.in/2014/02/blog-post_11.html
  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Friday, December 26, 2014

89 वर्ष बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी --- विजय राजबली माथुर



स्थापना दिवस 26 दिसंबर पर विशेष :
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी :
इस दल की स्थापना तो 1924 ई में विदेश में हुई थी। किन्तु 25 दिसंबर 1925 ई को कानपुर में एक सम्मेलन बुलाया गया था जिसके स्वागताध्यक्ष  गणेश शंकर विद्यार्थी जी थे। 26 दिसंबर 1925   को एक प्रस्ताव पास करके  'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी' की स्थापना की विधिवत घोषणा की गई थी। 1931 ई में इसके संविधान का प्रारूप तैयार किया गया था किन्तु उसे 1943 ई में पार्टी कांग्रेस के खुले अधिवेन्शन में स्वीकार किया जा सका क्योंकि तब तक ब्रिटिश सरकार ने इसे 'अवैध'घोषित कर रखा था और इसके कार्यकर्ता 'कांग्रेस' में रह कर अपनी गतिविधियेँ चलाते थे। 

वस्तुतः क्रांतिकारी कांग्रेसी ही इस दल के संस्थापक थे। 1857 ई की क्रांति के विफल होने व निर्ममता पूर्वक कुचल दिये जाने के बाद स्वाधीनता संघर्ष चलाने हेतु स्वामी दयानन्द सरस्वती (जो उस क्रांति में सक्रिय भाग ले चुके थे)ने 07 अप्रैल 1875 ई (चैत्र शुक्ल  प्रतिपदा-नव संवत्सर)को 'आर्यसमाज' की स्थापना की थी। इसकी शाखाएँ शुरू-शुरू में ब्रिटिश छावनी वाले शहरों में ही खोली गईं थीं। ब्रिटिश सरकार उनको क्रांतिकारी सन्यासी (REVOLUTIONARY SAINT) मानती थी। उनके आंदोलन को विफल करने हेतु वाईस राय लार्ड डफरिन के आशीर्वाद से एक रिटायर्ड ICS एलेन आकटावियन (A.O.)हयूम ने 1885 ई में वोमेश चंद (W.C.) बैनर्जी की अध्यक्षता में 'इंडियन नेशनल कांग्रेस' की स्थापना करवाई जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा करना था। दादा भाई नैरोजी तब कहा करते थे -''हम नस-नस में राज-भक्त हैं'' 

स्वामी दयानन्द के निर्देश पर आर्यसमाजी कांग्रेस में शामिल हो गए और उसे स्वाधीनता संघर्ष की ओर मोड दिया। 'कांग्रेस का इतिहास' में डॉ पट्टाभि सीता रमइय्या ने लिखा है कि गांधी जी के सत्याग्रह में जेल जाने वाले कांग्रेसियों में 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे। अतः ब्रिटिश सरकार ने 1906 में 'मुस्लिम लीग'फिर 1916 में 'हिंदूमहासभा' का गठन भारत में सांप्रदायिक विभाजन कराने हेतु करवाया। किन्तु आर्यसमाजियों व गांधी जी के प्रभाव से सफलता नहीं मिल सकी। तदुपरान्त कांग्रेसी डॉ हेद्गेवार तथा क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने अपनी ओर मिला कर RSS की स्थापना करवाई जो मुस्लिम लीग के समानान्तर सांप्रदायिक वैमनस्य भड़काने में सफल रहा। 

इन परिस्थितियों में कांग्रेस  में रह कर क्रांतिकारी आंदोलन चलाने वालों को एक क्रांतिकारी पार्टी की स्थापना की आवश्यकता महसूस हुई जिसका प्रतिफल 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी'के रूप में सामने आया। ब्रिटिश दासता के काल में इस दल के कुछ कार्यकर्ता पार्टी के निर्देश पर  कांग्रेस में रह कर स्वाधीनता संघर्ष में सक्रिय भाग लेते थे तो कुछ क्रांतिकारी गतिविधियों में भी संलग्न रहे। उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद से देश को मुक्त कराना था। किन्तु 1951-52 के आम निर्वाचनों से पूर्व इस दल ने संसदीय लोकतन्त्र की व्यवस्था को अपना लिया था। इन चुनावों में 04.4 प्रतिशत मत पा कर इसने लोकसभा में 23 स्थान प्राप्त किए और मुख्य विपक्षी दल बना। दूसरे आम चुनावों में 1957 में केरल में बहुमत प्राप्त करके इसने सरकार बनाई और विश्व की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनाने का गौरव प्राप्त किया। 1957 1962 में लोकसभा में साम्यवादी दल के 27 सदस्य थे। 



1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना से ब्रिटिश सरकार हिल गई थी अतः उसकी चालों के परिणाम स्वरूप 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' की स्थापना डॉ राम मनोहर लोहिया,आचार्य नरेंद्र देव आदि द्वारा की गई। इस दल का उद्देश्य भाकपा की गतिविधियों को बाधित करना तथा जनता को इससे दूर करना था। इस दल ने धर्म का विरोधी,तानाशाही आदि का समर्थक कह कर जनता को दिग्भ्रमित किया। जयप्रकाश नारायण ने तो एक खुले पत्र द्वारा  'हंगरी' के प्रश्न पर साम्यवादी नेताओं से जवाब भी मांगा था  जिसके उत्तर में तत्कालीन महामंत्री कामरेड अजय घोष ने कहा था कि वे स्वतन्त्रता को अधिक पसंद करते हैं किन्तु उन्होने विश्व समाजवाद के हित में सोवियत संघ की कार्यवाही को उचित बताया।  - See more at: http://krantiswar.blogspot.in/2013/12/bharat-ke-rajnitik-dal-3.html#sthash.FNXwI8i2.dpuf

आज की व्यवहारिक स्थिति :
सांप्रदायिकता विरोध के नाम पर एक लंबे अरसे से (1989 से ही ) भाकपा ने उसी  गुट का समर्थन करना जारी रखा हुआ है जो कि उसी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का अवशिष्ट है। 20 वर्ष पूर्व सपा में भाकपा,उत्तर प्रदेश  का एक गुट विलय कर गया था फिर उसके बाद लखनऊ ज़िले में एक गुट ने राष्ट्रवादी कम्युनिस्ट पार्टी का गठन कर लिया था जो 2014 के लोकसभा चुनावों से पूर्व भाजपा में विलय हो गई। जिन साहब की नीतियों  और कार्य व्यवहार की वजह से प्रदेश में भाकपा का दो-दो बार विभाजन हुआ है वह खुद को KING MAKER मानते हैं और उनके परम शिष्य तो यहाँ तक दावा करते हैं कि वह अकेले ही पूरी प्रदेश पार्टी चला रहे हैं। सर्वे सर्वा मानने वाले साहब लखनऊ के ज़िला इंचार्ज और किंग मेकर साहब सम्मेलन के पर्यवेक्षक बन कर सिर्फ अपने निजी हित में सहायक लोगों को आगे रखते हैं व केवल पार्टी हित मानने वाले लोगों को पीछे धकेल देते हैं।
लखनऊ का 22वा ज़िला सम्मेलन :23 नवंबर 2014

("-- पार्टी संविधान की धारा 22 की उप धारा 9 (घ ) के अंतर्गत राज्य सम्मेलन के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव करना था जो वास्तव में नहीं हुआ।
-उप धारा 9 (ड़.) ज़िला हिसाब जांच आयोग की रिपोर्ट पर विचार करना और उसके संबंध में फैसले करना चाहिए था जो नहीं हुआ। कोई आय-व्यय विवरण प्रस्तुत ही नहीं किया गया था। 27 नवंबर 2011 के 21 वे सम्मेलन के समय रिपोर्ट न पेश करने के साथ आश्वासन दिया गया था कि बाद में ज़िला काउंसिल में पेश की जाएगी जो कि विगत तीन वर्षों में कभी भी नहीं प्रस्तुत की गई। इस बार न तो ऐसा कुछ भी  बताया गया था न ही न बताने का कारण दिया गया था।
-ज़िला काउंसिल के निर्वाचन हेतु संविधान की धारा 16 की उप धारा (च) में वर्णित " गुप्त मतदान द्वारा तथा एक-एक वित्तरणशील वोट के तरीके से मत लिया जाएगा " की प्रक्रिया का अनुपालन न करके ज़िला काउंसिल के लिए प्रस्तवित 21 की संख्या को बढ़ा कर 23 कर के दो बढ़ाए हुये नामों को शामिल किया गया। एक स्थान रिक्त भी रखा गया।
-पार्टी संविधान की धारा 24 की उप धारा 3 (च ) का पिछली ज़िला काउंसिल में कभी भी पालन नहीं किया गया था-"ज़िले के आय-व्यय पर नियंत्रण रखना ")
इन साहब की मेहरबानी से लखनऊ में तीन वर्षों के दौरान 168 सदस्य पार्टी से अलग हो चुके हैं और अब भाजपा समर्थकों  को  भाकपा में भर कर यह जनाब भाकपा को ध्वस्त करने की प्रक्रिया को तेज़ करने लगे हैं। इनको व इनके गुरु को यदि उत्तर प्रदेश में ऐसी ही मनमानी छूट मिली रही तो ये लोग अपने मंसूबों में कामयाब भी हो सकते हैं।

 http://krantiswar.blogspot.in/2014/11/blog-post_26.html

पर्यवेक्षक महोदय द्वारा किसानसभा नेताओं के रोटियाँ तोड़ने के अनर्गल बयान का भी यह असर हो सकता है :


 https://www.facebook.com/ram.prataptripathi.90/posts/1524894287774594?pnref=story

 लगभग 10 वर्ष पूर्व कमला नगर,आगरा आर्यसमाज के पूर्व प्रधान एस पी कुमार साहब की इसी प्रकार निरर्थक आलोचना एक और पूर्व प्रधान वाधवा साहब द्वारा करने पर  कुमार साहब को हार्ट अटेक पड़ने पर बेनी सिंह इंटर कालेज के अध्यापक तीर्थराम शास्त्री जी द्वारा कहा गया था कि कुमार साहब को यह अटेक राजनीतिक प्रहार  है।ठीक होने के थोड़े समय बाद कुमार साहब अपना मकान व दुकान बेच कर आगरा से बंगलौर शिफ्ट हो गए थे तथा उनके जाने के बाद आर्यसमाज, कमलानगर में RSS के लोग प्रभावी हो गए थे। प्रत्येक संगठन में RSS समर्थक RSS विरोधियों पर इसी प्रकार अनर्गल बयानबाजी करते हैं।   उस आधार पर ज़िला - सम्मेलन पर्यवेक्षक के राजनीतिक बयान को भी कर्मठ  किसान नेताओं पर सम्मेलन में किए गए राजनीतिक प्रहार  के  रूप में इस रोग से संबन्धित माना जा सकता है। किन्तु ऐसी बातें संगठन को कमजोर करने वाली होती हैं मजबूत करने वाली नहीं।साम्राज्यवादियों ने मनमोहन सिंह की उपयोगिता समाप्त होने पर एक साथ नरेंद्र मोदी व अरविंद केजरीवाल को उनके विकल्प के रूप में पेश किया था किन्तु तमाम साम्यवादी व वामपंथी केजरीवाल के गुणगान करने लगे। यहाँ तक हद हो गई कि, पार्टी स्थापना दिवस की गोष्ठी में  2010 में प्रदेश पार्टी कार्यालय में ही राष्ट्रीय सचिव के मुख्य वक्ता के रूप में बोल चुकने के बाद केजरीवाल को बुलवाया गया। 2013 में  भी ऐसी ही गोष्ठी में जिम्मेदार पदाधिकारी द्वारा केजरीवाल के दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने का स्वागत किया गया। 

 कभी विश्व की प्रथम निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना केरल में करवा चुकी भाकपा गलत लोगों का साथ देने व पार्टी में गलत लोगों को प्रश्रय देने से   निरंतर संकुचित होती जा रही है। नवीनतम चुनाव परिणाम :

  जो कभी कामरेड बी टी रणदिवे व कामरेड ए के गोपालन द्वारा कहा गया था कि हम संविधान में घुस कर संविधान को तोड़ देंगे अब उस पर RSS नियंत्रित सांप्रदायिक/साम्राज्यवाद समर्थक सरकार अमल करने जा रही है। एक-एक करके राज्यों में येन-केन-प्रकारेंण अपनी सरकारे स्थापित करके जब वह संविधान संशोधन करने में सक्षम हो जाएगी तो वर्तमान संविधान की जगह अपना अर्द्ध-सैनिक तानाशाही वाला संविधान थोप देगी। क्योंकि भाकपा 'संसदीय लोकतन्त्र' को अपनाने के बावजूद न तो चुनावों में सही ढंग से भाग ले रही है और न ही सही साथी का चुनाव कर रही है अतः जनता कम्युनिस्टों के नाम पर नक्सलवादियों को ही जानती है जिनको न तो व्यापक जन-समर्थन मिल सकता है न ही वे सरकार सशस्त्र विद्रोह के जरिये गठित कर सकते हैं। देश की हृदय-स्थली उत्तर प्रदेश में भाकपा को अकेले दम पर चलाने का ऐलान करने वाला मोदी की छाया और RSS/USA समर्थित केजरीवाल का अंध - भक्त है। 

आज पार्टी स्थापना के 89 वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद जबकि केंद्र में सत्तारूढ़ सांप्रदायिक सरकार राज्यों में भी मजबूत  होती जा रही  है और समाजवाद के नाम पर भाकपा को  पीछे धकेलने वाले दल एकजुट हो रहे हैं भाकपा के भीतर भाजपा के हितैषी मोदी-मुलायम भक्त  उन दोनों महानुभावों से छुटकारा पाने की नितांत आवश्यकता है तभी पार्टी का विस्तार व लोकप्रियता प्राप्ति हो सकेगी।
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लखनऊ का 22वा ज़िला सम्मेलन :23 नवंबर 2014

Saturday, December 20, 2014

काकोरी के विद्रोही शहीदों की याद में

शहीद भगत सिंह, शहीद चंद्रशेखर आजाद, शहीद राम प्रसाद बिस्मिल,
शहीद राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, शहीद रोशन सिंह, शहीद अशफाकुल्ला खां अमर रहंे! अमर रहें!


काकोरी के विद्रोही शहीदों की याद में :

जीपीओ हजरतगंज लखनऊ स्थित काकोरी शहीद स्तम्भ पर 
कल शुक्रवार 19 दिसंबर 2014 को 3 बजे से एक श्रद्धांजलि सभा  का आयोजन संयुक्त रूप से  नागरिक परिषद, जन कलाकार परिषद, महिला परिषद, जन संस्कृित मंच, जन जागरुकता अभियान द्वारा किया गया। 
प्रारम्भ में शहीदों की याद में क्रांतिकारी गीत प्रस्तुत किए गए । संचालन ओ पी सिन्हा साहब द्वारा किया गया। के के शुक्ल जी व अन्य लोगों के साथ-साथ वक्ताओं में IPTA के राकेश जी भी थे। कल्पना पांडे'दीपा' जी ने अपनी ओजस्वी कविता का पाठ किया। 
वक्ताओं ने कहा कि लखनऊ जीपीओ (अग्रेंजीकाल के रिंक थियेटर) में अग्रेजों ने अदालत लगाकार हमारे क्रांतिकारी शहीदों को सजाएं सुनाईं, उन्हें फांसी पर चढ़ाने के लिए यहीं पर अदालती नाटक खेला गया था। इसलिए यह स्थान आजादी के आंदोलन का स्मारक है। लखनऊ के नागरिक इस ऐतिहासिक इमारत को आजादी की लड़ाई का स्मारक, शहीद स्मृति लाइब्रेरी, शोध केन्द्र, सभा-सेमीनार-जनआंदोलन व सत्याग्रह केन्द्र के रुप में देखना चाहते हैं।
सभा में एक प्रस्ताव पास करके केंद्र सरकार से मांग की गई कि जी पी ओ को शहीदों की स्मृति में एक संरक्षित संग्रहालय बनाया जाये और यहाँ से जी पी ओ को अन्यत्र स्थानांतरित किया जाये और इसे खाली कर प्रदेश की जनता को सौंप  कर क्रांतिकारी शाहीदों की इस पावन स्थली को जन-प्रदर्शनों के लिए आरक्षित करने की भी मांग इस प्रस्ताव द्वारा की गई। 
जनता के मध्य जो पर्चा जारी किया गया वह इस प्रकार है :------
  देशभक्त साथियों

आजादी की लड़ाई के अपने शहीदों को याद करने के इस मौके पर हम आपको एक बार फिर काकोरी की घटना का इतिहास नहीं बताने जा रहे हैं। यदि हमारे भीतर थोड़ी भी गरिमा और मनुष्यता है तो हम आजादी के इतिहास की किताबों से इसे जान लेंगे। अपने शहीदों को जानना वास्तव में खुद को जानना है क्योंकि आज हम जो कुछ भी हैं उन्हीं की शहादत के बदौलत हैं। शहादत, किसी के भी जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक एंव मानवीय कार्रवाई है। इसके पीछे की सोच के साथ जुड़कर ही हम उस विरासत के सच्चे वारिस बनते हैं। आज सवाल यह नहीं है कि हम उनपर कितना फूल चढ़ाते हैं बल्कि सवाल यह है कि हमारे भीतर उनका वारिस बनने की तमन्ना है भी या नहीं। उनका वारिस बनकर ही हम आज देश और जनता के सामने खड़ी की गई चुनौतियों का सामना कर सकते हंै।

गैरबराबरी और अन्याय का सीधा रिश्ता सत्ता से है, हुकूमत से है, व्यवस्था से है। हुकूमत से टकराने का मकसद गैरबराबरी और अन्याय का खात्मा ही होना चाहिए। हुकूमत चाहे गोरे अंग्रेजों की हो या काले अंग्रेजों की यह हमेशा आम जनता के जुल्म व शोषण की बुनियाद पर खड़ी होती है। इसीलिए शहीद रामप्रसाद बिस्मिल का कहना था कि वे एक ऐसी समाज व्यवस्था चाहते हैं जहां पर कोई किसी पर हुकूमत नहीं करे, सब जगह लोगों के पंचायती राज कायम हों। शहीद अशफाकउल्ला खां ने अपने अंतिम संदेश में कहा था- ‘एक होकर देश की नौकरशाही का मुकाबला करो और अपने देश को आजाद कराओ।’ जाहिर है कि ये ‘वीर’ मनुष्य द्वारा मनुष्य के ऊपर किसी प्रकार की हुकूमत के विरोधी थे ताकि समाज की हर बुराई और जुल्म का अंत किया जा सके। इसी सिलसिले में शहीद भगत सिंह का कहना था- ’ज्यों-ज्यों कानून सख्त होते हैं त्यों-त्यों भ्रष्टाचार भी बढ़ता है।’ इसी मसले पर गांधी जी ने कहा था- ‘जिन्हें अपनी सत्ता कायम रखनी है, वे अदालतों के जरिए लोगों को वश में रखते हैं।   जब लोग खुद मार-पीट करके या रिश्तेदारों को पंच बनाकर अपना झगड़ा निपटा लेते थे तब वे बहादुर थे। अदालतें आईं और वे कायर बन गए।’

अंग्रेजों की गुलामी के दौर में यदि सभी सरकारी महकमें हम गुलामों पर हुकूमत करने के लिए बने थे तो बात समझ में आती है, लेकिन आजादी मिलने के बाद भी इन महकमों का अफसरशाही और न्यायपालिका का चरित्र हुक्मरानों, शहंशाहों सा क्यों बना रहा? पुलिस प्रशासन, न्यायपालिका आदि में से आज कोई भी ऐसी संस्था नहीं है जिसका व्यावहारिक रूप हुक्मरानों अंग्रेज शासकों जैसा न हो और जो आम नागरिक को, करदाता के साथ दुश्मनों सा सुलूक न करती हो। यही नहीं जिस भी अफसर के पास थोड़ा सरकारी-कानूनी अधिकार हो वह आम आदमी को अपनी दया पर पलने वाली रियाया से अधिक नहीं समझता। वास्तव में हमारी हुकूमतों की यही प्रकृति है। वर्तमान ढांचे में हुकूमत का काम है- मेहनतकश जनता की कमाई से कानून बनाकर संगठित तरीके से वसूली करना और सरकारी खजाने का आपस में बटवारा कर लेना। कानूनी-गैरकानूनी, नैतिक-अनैतिक दोनों तरीकों से।

यही हुकूमतें यादव सिंह, नीरा यादव, एपी सिंह, प्रदीप शुक्ला जैसे हजारों ‘जादूगरों’ और ‘कलाकारों’ को पैदा करती है, पालती-पोसती है। इन्हीं अपराधियों के बल पर ही ये देश पर अपना राज चलाते हैं। ऐसे ‘कारीगर’ और ‘जादूगर’ हर सरकारी दफ्तर में, हर शहर और हर गली में मिल जाएंगे। कभी-कभार आपसी बटवारे के झगड़े में एक-दो का भांडा फूट जाता है। लेकिन पूरी हुकूमत ऐसे ही लोगों की जमात है। ये आपस में कुर्सी बदलते रहते हैं। इन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के समय भी उनका राज चलाया और मौज किया, क्रांतिकारियों पर संगीनें चलवाईं और अब आजादी के बाद आज भी इनके वारिस पूरी विलासिता के साथ जी रहे हैं और लोकतंत्र-लोकशाही की बात करने वालों को यही न्यायाधीश बनकर देशद्रोही और आतंकी बता रहे हैं। आज भी यही कानून बनाते हैं और यही लागू करते हैं। हमारी संसद तो सिर्फ इनके किए पर, इनके इरादों पर अपनी मुहर लगाती रहती हैं। इनसे दुश्मनी मोल लेने की हिम्मत किसी जन-प्रतिनिधि, सांसद-विधायक में नहीं है। वास्तव में कानूनी तौर पर हमारे सांसदों-विधायकों की स्थिति एक दारोगा से भी नीचे होती है।
आज हमारे देश में ढेरों ऐसे कानून और नियम बने हैं जिनका मकसद आम लोगों को परेशान करना, उनकी राजनीतिक सक्रियता और स्वतंत्रता को बाधित करना है। यह सब इसलिए, ताकि लोग इसी में उलझे रहें, और लूट की व्यवस्था बदस्तूर जारी रहे।

आजादी के 66 वर्षों में भी हमें न तो गरीबी से आजादी मिली, न बेरोजगारी से, न महगाई से, न अशिक्षा से आम नागरिक आज भी न्याय और मानवीय गरिमा से वंचित है। हम अभी तक देश की पूरी आबादी को जीवन की न्यूनतम बुनियादी सुविधायें भी नहीं दिला पाये। हमने अपने श्रम से बेहिसाब दौलत पैदा की, लेकिन यह दौलत किसकी पेट में गयी, सबको मालूम है। जहां तक न्याय का सवाल है, तो हमारी पूरी कानून-न्यायिक प्रक्रिया एक चक्रव्यूह है, जहां पर अंत में अभिमन्यु ही मारा जाता है। हूकूमत या सत्ता के किसी न किसी रुप में बने रहते हम सच्ची आजादी और सच्चे न्याय की कल्पना ही नहीं कर सकते। दोनों का अस्तित्व एक साथ नहीं रह सकता। सच्चे लोकतंत्र का अर्थ ही यह है कि उसमें तंत्र लगातार कमजोर पड़ता जाए और लोक ताकतवर। आजादी के बाद से लगातार इसका उल्टा हुआ है। आज तंत्र इतना ताकतवर हो चुका है उसकी गिरफ्त में पूरे देश की सांस घुट रही है। तंत्र के मालिकान न्याय की राह में सबसे बड़ी रुकावट बन गए हैं। श्रमिक, किसान, व्यापारी, छोटे कारखानेदार, डाक्टर, इंजीनियर, कलाकार महिलायें अर्थात समाज का हर वर्ग समूह इनसे त्रस्त है। हमारे लोकतंत्र को इन्होंने अपाहिज और बंधक बना रखा है।
पूरी आजादी की लड़ाई के दौरान इस बात पर हमेशा जोर था, आम सहमति थी कि, आजादी मिलने पर ‘पूरा तंत्र’ बदल दिया जाएगा विशेष तौर पर क्रांतिकारियों और शहीदों का यह मत था। आजादी मिलते ही जिस तरह कुछ बड़े नेताओं ने तंत्र और नौकरशाही का पक्ष लिया, उससे देश की आम जनता के हाथ से राजनीति की बागडोर छूट गई, और आज उसे पूरी तरह एक वोट बैंक में तब्दील करके राजनीतिक रुप से शून्य व निष्क्रिय कर दिया गया है। आजादी के बाद की इस ऐतिहासिक गलती का खामियाजा पूरा देश भुगत रहा है। लुटेरे अग्रेजों की हुकूमत की जगह ऐसे देशी लुटेरों की हूकूमत कायम हुई, जो अग्रेंजों की तरह ही आज हमारे देश और पूरी दुनिया में लूट का कारोबार करते हैं और इन्हीं की तरह पूरी दुनिया पर हुकूमत करने का ख्वाब देखते हैं। देश के सस्ते श्रम और प्राकृतिक संपदा खेती-किसानी की लूट के बल पर ये दुनिया के सबसे अमीर जमात में शामिल होते जा रहे हैं। जबकि हमारे देश की आधे से अधिक आबादी दुनिया के सबसे दरिद्र अभावग्रस्त लोगों में शामिल है। इसी विरोधाभास का मूर्त रुप है देश की हुकूमत, चाहे वह विकास की माला जपे, चाहे सामाजिक न्याय की धर्म निरपेक्षता की या सांप्रदायिकता की माला जपती रहे।

सांप्रदायिकता या सामाजिक-धार्मिक विद्वेष, जिसके खिलाफ हमारे शहीद दृढ़ता से खड़े हुए, आजादी की लड़ाई के वास्तविक नेता जिसके खिलाफ लड़े, विवेकानन्द सहित तमाम समाज सुधारकों ने जिसका विरोध किया और कभी भी जो भारतीय चिंतन परंपरा व जनसंस्कृति का हिस्सा नहीं रहा आज इन्हीं के नाम पर इस नफरत को नए सिरे से फैलाया जा रहा है, ताकि आम जनता के अंसतोष को गलत दिशा देकर अपना उल्लू सीधा किया जा सके। केन्द्र में बैठे भारतीय संस्कृति के तथाकथित लंबरदार पूरे भारतीय समाज की एकता की जड़े खोद रहे हैं। आजादी की विरासत को मिटाकर उसे एक सांप्रदायिक रुप देने की कोशिश कर रहे हैं। ये एक तरफ काले धन को सफेद बनाने की सरकारी योजनाएं ला रहे हैं तो दूसरी तरफ ट्रैफिक सुरक्षा, वाहन-सड़क सुरक्षा, पर्यावरण सुरक्षा, नागरिक सुरक्षा के नाम पर ऐसे कानून ला रहे हैं, जिससे आम जनता से इनकी वसूली बढ़ जाएगी। आम आदमी का जीना मुहाल हो जाएगा, सड़क पर चलने वाला हर एक वाहन चालक, वाहन मालिक, कानून की नजर में अपराधी बन गया है और इनकी अगुवाई में पुलिस-कचहरी का नियंत्रण लोगों पर और बढ़ता जाएगा। हमारा लोकतंत्र धीरे-धीरे अघोषित तानाशाही की ओर बढ़ रहा है। अग्रेंजी हुकूमत से भी खतरनाक तानाशाही की ओर। इनकी लूट और लालच से पैदा हुए आर्थिक संकटों का इस हूकूमत के पास एक ही इलाज है- तानाशाही।

काकोरी दिवस के शहीदों को याद करते हुए हमें एक सच्चे लोकतंत्र के लिए नए सिरे से एकजुट होकर संघर्ष का संकल्प करना है। पिछले वर्षों देश में जो जनआंदोलन पैदा हुए, उसे और संगठित करते हुए आगे बढ़ने का सकल्प करना है। यह लोक के राज को मिटाने में लग गए हैं, हमे इनके तंत्र के राज को मिटाकर एक सच्ची पंचायती व्यवस्था और अवामी राज बनाने में लग जाना चाहिए। इस पंचायती राज की शुरुआत हमें अपने मुहल्ले और गांव से करनी है। इसी पंचायती व्यवस्था का सपना राम प्रसाद बिस्मिल समेत हमारे सभी विद्रोही देशभक्त शहीदों ने देखा था।


हमारे आंदोलन के शुरुआती मुद्दे-

1- लखनऊ जीपीओ (अग्रेंजीकाल के रिंक थियेटर) में अग्रेजों ने अदालत लगाकार हमारे क्रांतिकारी शहीदों को सजाएं सुनाईं, उन्हें फांसी पर चढ़ाने के लिए यहीं पर अदालती नाटक खेला गया था। इसलिए यह स्थान आजादी के आंदोलन का स्मारक है। लखनऊ के नागरिक इस ऐतिहासिक इमारत को आजादी की लड़ाई का स्मारक, शहीद स्मृति लाइब्रेरी, शोध केन्द्र, सभा-सेमीनार-जनआंदोलन व सत्याग्रह केन्द्र के रुप में देखना चाहते हैं। इसलिए हम मांग करते हैं कि केन्द्र सरकार इसे जल्द से जल्द खाली करवाते हुए इस इमारत को आजादी की लड़ाई का स्मारक घोषित करते हुए खाली कर इसे प्रदेश की जनता को सौंप दे।

2- देश में एक एकीकृत श्रम कानून, जो पूरी श्रमिक आबादी पर एक जैसा लागू हो और इसे श्रमिकों की निर्वाचित कमेटियों को लागू करने का अधिकार दिया जाए। ठेका-संविदा मजदूरी का खात्मा।

3- नगरपालिकाओं और ग्राम पंचायतों को अपने क्षेत्र की विकास योजनाएं बनाने का पूरा अधिकार, पूरा वित्तीय अधिकार एवं उस क्षेत्र की पुलिस न्यायालय, प्रशासन को इसके अधीन लाया जाए।

4- हर महिला का प्रसूति के समय एक साल तक भरण पोषण की पूरी जिम्मेदारी सरकार एवं समाज की।

5- दोहरी शिक्षा एवं चिकित्सा प्रणाली का अंत एवं इसे हर स्तर पर लोगों को निःशुल्क उपलब्ध कराया जाय।

6- खेती-किसानी के लिए आवश्यक सभी चीजों को पूरी तरह कर मुक्त किया जाए एवं किसान सहकारी समितियों का पुर्नगठन कर उन्हें किसानों की हित में नीतियां बनाने का अधिकार दिया जाए।

7- व्यापारियों एवं छोटे उद्यमियों को आसानी से ऋण उपलब्ध कराकर उन्हें परेशान करने वाले अधिकारियों को दंडित किया जाए।

8- देश के अपराध कानून में जमानत लेने के लिए धन-संपत्ति के आधार पर जमानत की बाध्यता समाप्त करके सिर्फ नागरिक पहचानपत्र के आधार पर लोगों को जमानत देने का कानून बनाया जाए।

9- सरकारी कर्ज को भूमि लगान की तरह वसूलने का कानून समाप्त किया जाए, यह कानून ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में सन् 1793 में लार्ड कार्नवालिस ने आम किसानों, नागरिकों को लूटने के लिए बनाया था।

10- हर गांव, कस्बे और शहर में निर्वाचित न्याय पंचायतों का आम निर्वाचन द्वारा गठन करके लोगों के आपसी विवाद एवं संपत्ति विवाद को हल करने के लिए इसे सौंपा जाए।

11- बच्चों एवं बुजर्गों के अच्छे जीवन के लिए विशेष योजनाएं बनाईं जाएं।
मुद्दे और भी हो सकते हैं, लेकिन हमें अभी इन्हीं से शुरुआत करनी है, और धीरे-धीरे उन सवालों को उठाते हुए आगे बढ़ना है, जिससे हुकूमत की पकड़ आम जनता पर लगातार ढीली पड़ती जाय और आम नागरिक की पकड़ हुकूमत/नौकरशाही पर मजबूत हो ताकि लोकतंत्र वास्तविकता बने।

साभार :

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  ~विजय राजबली माथुर ©
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