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Friday, May 24, 2019

:चुनावी लड़ाई को आखिरी संघर्ष मत मानिए ------ अनिल सिन्हा

 * मोदी ने झूठ से भरे और निचले स्तर के भाषण किए और पैसे तथा नौकरशाही के इस्तेमाल में कोई कसर नहीं छोड़ा। लेकिन वही मोदी लोकप्रिय साबित हुए क्योंकि कारपोरेट पूंजीवाद उनके पीछे खड़ा था। मीडिया, सोशल मीडिया और प्रचार में उन्होंने हजारों करोड़ खर्च किया और झूठ को सच साबित करने मे कामयाब हुए। अब उनकी जीत का औचित्य साबित करने की कोशिश होगी और पराजित विपक्ष भी अपने को लोकतांत्रिक तथा उदार साबित करने के लिए चुनाव अभियान में अपनाई गई अनैतिकता और बेईमानी की चर्चा करना बंद कर देगा। लेकिन इसकी चर्चा करने का असली समय यही है। इस बहुमत का नकाब उतरना चाहिए।
** भूमिहार को गिरिराज चाहिए, कन्हैया नहीं। ऐसा ही कायस्थों के साथ है, उन्हें रविशंकर प्रसाद चाहिए, शत्रुघ्न सिन्हा नहीं। इस तरह कई जाति और समुदाय पूरी तरह हिंदुत्व के असर में आए हैं।

अनिल सिन्हा द्रोहकाल संपादक मंडल के सदस्य है



एक दुःस्वप्न के सच होने जैसा है मोदी का वापस आना। पूरे  पांच साल तक देश की संस्थाओं को क्षत-विक्षत करने के बाद देश को सामाजिक विभाजन में ले जाने का उनका अभियान अब इतनी ताकत से चलेगा कि शायद 1947 से ज्यादा बड़ा अंधकार देश को घेर ले। फर्क यही होगा कि उस समय आजादी के आंदोलन की रोशनी थी जो नफरत से भरे लोगांे को भी रास्ते पर ले आई। सरहद पार से दंगों की आग में झुलस कर आए लोग भी अमन और मुहब्बत की बात करते थे। आजादी के आंदोलन ने उनके दिल को ऐसा बनाया ही था। गांधी जी की मौत से एक तेज रोशनी फैली थी। ऐसी रोशनी अब गायब हो चुकी है। नाम बदलने यानि जनसंघ नाम धारण करने पर भी हिंदू महासभा और आरएसएस को वर्षों तक देश की मुख्यधारा में आने का इंतजार करना पड़ा। अब वे ही मुख्यधारा हैं, यह प्रज्ञा सिंह ठाकुर और गिरिराज सिंह की जीत से जाहिर हो गया। बिहार में गिरिराज सिंह को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पसंद नहीं करते, लेकिन बेगूसराय में कन्हैया कुमार के खिलाफ उनका समर्थन करने मेें उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ा क्योंकि भूमिहार जाति को साथ रखने का यही उपाय था। भूमिहार को गिरिराज चाहिए, कन्हैया नहीं। ऐसा ही कायस्थों के साथ है, उन्हें रविशंकर प्रसाद चाहिए,  शत्रुघ्न सिन्हा नहीं। इस तरह कई जाति और समुदाय पूरी तरह हिंदुत्व के असर में आए हैं।
मतदान के बाद बेगूसराय के एक लड़के का फोन आया कि पचपनिया यानि अति-पिछड़ों के बड़े तबके ही नहीं, यादवों के एक हिस्से ने एनडीए के गठबंधन को वोट दिया है क्योंकि उन्हें लगता है कि पाकिस्तान से मोदी ही लड़ सकते हैं। मोदी यह प्रचार इसलिए कर पाए कि सेना के नाम के इस्तेमाल को लेकर चुनाव आयोग उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर पाया। चुनाव आयोग को अपना काम कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बाध्य नहीं किया और मीडिया तो मोदी के साथ ही खड़ा था। मीडिया की औकात तो प्रधानंत्री ने उस दिन भी बता दी जब वह पांच साल शासन करने के बाद मीडिया से मुखातिब तो हुए, लेकिन उसके सवाल नहीं लिए। एक दंडवत मीडिया, ध्वस्त संस्थाओं और बिखरे विपक्ष का असली पीड़ित कौन होगा, यह समझना मुश्किल नहीं है। इसके सबसे पहले पीड़ित मुसलमान होंगे, दूसरे दलित होंगे और तीसरे मजदूर होंगे। इसके पीड़ित वे देश के वे लोग भी होंगे जो सवाल करेंगे।
अब यह बहस निरर्थक है कि कांगे्रस भाजपा को रोक नहीं पाई। कांग्रेस नहीं रोक पाई तो बाकी भी उसे रोक नहीं पाए। संस्थाओं पर हमले के खिलाफ विपक्ष एकजुट नहीं हो पाया। इसमें समाजवादी, आंबेडकरवादी और वामपंथी सभी ने निकम्मेपन से काम किया। राहुल गांधी रफाल-रफाल चिल्लाते रहे, लेकिन इस मुद्दे पर उनकी पार्टी ने कोई आंदोलन नही किया। उनका प्रगतिशील घोषणा-पत्र  बेअसर साबित हुआ क्योंकि कांग्रेस के पास कार्यकर्ताओं की वैसी फौज नहीं थी जो इसे लोगों के पास पहुंचाने की मेहनत कर सके। उसने तीन राज्यों की विधान सभाएं जीत तो लीं, लेकिन वैसेी सरकारें नहीं दे पाई जो वहां के लोगों में उत्साह भर सके।  राहुल ने एक हताश फौज को लेकर लड़ाई लड़ी और बहादुरी से लड़ी। लेकिन राहुल गांधी को इस बात की बधाई देनी पड़ेगी कि उन्होंने  कभी भी अपने को नीचे स्तर पर नहीं लाया।
बाकी विपक्ष का हाल क्या रहा? सपा, बसपा और राजेडी के पास जाति की पूंजी के अलावा कुछ नहीं बचा था। इस ताकत का भी इस्तेमाल वे नहीं कर पाए। उत्तर प्रदेश में एक दकियानूस, जातिवादी और सांप्रदायिक सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए जिस लड़ाई की जरूरत थी, उन्होंनेे नहीं लड़ी। बिहार में आरजेडी ने भी कुछ नहीं किया और विपक्ष के नेतृत्व के लिए जरूरी लड़ाई लड़ने में पूरी तरह नाकाम सिद्ध हुआ।  लेकिन इनके बारे में भी कहना पडे़गा कि उन्होंने चुनाव अभियान को बहुत नीचे नहीं जाने दिया।

मोदी ने झूठ और निचले स्तर के भाषण किए और पैसे तथा नौकरशाही के इस्तेमाल में कोई कसर नहीं छोड़ा। लेकिन वही मोदी लोकप्रिय साबित हुए क्योंकि  कारपोरेट पूंजीवाद उनके पीछे खड़ा था। मीडिया, सोशल मीडिया और प्रचार में उन्होंने हजारों करोड़ खर्च किया और झूठ को सच साबित करने मे कामयाब हुए। अब उनकी जीत का औचित्य साबित करने की कोशिश होगी और पराजित विपक्ष भी अपने को लोकतांत्रिक तथा उदार साबित करने के लिए चुनाव अभियान में अपनाई गई अनैतिकता और बेईमानी की चर्चा करना बंद कर देगा। लेकिन इसकी चर्चा करने का असली समय यही है। इस बहुमत का नकाब उतरना चाहिए। मोदी के राष्ट्रवाद के चेहरे प्रज्ञा ठाकुुर हैं, योगी आदित्यनाथ हैं, अनंत हेगडे हैं और उसके पीछे पूंजी की ताकत है। यह मुसलमान और पाकिस्तान के विरोध का यह हिंदू राष्ट्रवाद है। इससे लड़ने के लिए मंदिरों में भटकने और कुंभ में स्नान करने के बदले जन-समस्याओं को मजबूती से उठाने वाला और हर तरह के कट्टरपंथ के विरोध का आंदोलन होना चाहिए। चुनावी लड़ाई को आखिरी संघर्ष मत मानिए। इतिहास के महत्वपूर्ण फैसले सड़क पर होते हैं। देश किसी बड़े आंदोलन का इंतजार कर रहा है।
साभार :

http://www.drohkaal.com/is-bahumat-ka-naqab-utarna-chahiye/









 ~विजय राजबली माथुर ©

Wednesday, December 31, 2014

वामपंथ फासिस्ट साजिश में उलझ कर पराजय पथ पर ----- विजय राजबली माथुर



राज्यसभा में 'रेखा' और 'सचिन तेंदुलकर' ये दो ऐसे  सदस्य हैं जिनको मनमोहन सरकार ने अप्रैल 2012 में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी से मनोनीत करवाया था। मोदी ने सफाई नवरत्नों में तेंदुलकर को शामिल किया था अब 'पेटा' के जरिये रेखा को अपने साथ नामित करवाया है ये सारी कोशिशें इन दोनों सांसदों का दिल जीत कर अपनी सरकार के समर्थन में खड़ा करने के लिए हैं। तेंदुलकर को ज़मीन का भी लाभ दिलाने की कोशिश इसी योजना का ही हिस्सा है। 




 सिर्फ सिन्धी होने के कारण ही आडवाणी ने हिरानी की फिल्म का समर्थन नहीं किया है बल्कि आमिर खान और मोदी की घनिष्ठता के कारण भी यह समर्थन आया है। फासिज़्म को मजबूत करने के लिए विपक्ष को समाप्त करना है उस दिशा में दो गुट बनाए गए हैं । एक गुट एक बात उठाता है दूसरा गुट उसका विरोध करता है। हिंदूमहासभा के बेनर पर गोडसे की मूर्ती लगाने की तैयारी और भाजपा के बेनर पर उसका विरोध। साधारण जनता व फासिस्ट विरोधी दलों को इस साजिश को समझते हुये ही अपनी नीतियाँ बनानी व अमल करना चाहिए। आमिर खान द्वारा मोदी के समर्थन से फिल्म बना कर जो विवाद उत्पन्न किया गया है उसका पूरा-पूरा लाभ केंद्र की फासिस्ट सरकार को ही मिलेगा। यह ध्यान में रख कर ही कदम उठाने चाहिए। आडवाणी का वक्तव्य आँखें खोलने के लिए काफी होना चाहिए।
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=808278565900788&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=1&theater


 मेरे उपरोक्त निष्कर्ष से सहमति व्यक्त करने वाले फिल्म निर्माता व समीक्षक सत्यप्रकाश गुप्ता जी ने खुद एक तथ्यात्मक सत्य - विश्लेषण प्रस्तुत किया है :

 https://www.facebook.com/groups/231887883638484/permalink/365350976958840/

 मोदी की यह सरकार एमर्जेंसी के दौरान गिरफ्तार मधुकर दत्तात्रेय देवरस और इन्दिरा गांधी के मध्य हुये गुप्त समझौते की ही परिणति है जिसके तहत RSS ने 1980 व 1984 के लोकसभा चुनावों में इन्दिरा कांग्रेस का समर्थन करके अपनी घुसपैठ बनाई थी।2011 से चले हज़ारे/केजरीवाल आंदोलन को RSS/मनमोहन सिंह व देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों का पूर्ण समर्थन था और उसी अनुरूप सौ से अधिक कांग्रेसियों ने भाजपा सांसद बन कर मोदी को स्पष्ट बहुमत प्रदान कर दिया। अब राज्यसभा तथा राज्यों की विधानसभाओं में समर्थन जुटाने की कवायद चल रही है और सफलता मिलते ही वर्तमान संविधान को ध्वस्त करके RSS की अर्द्ध-सैनिक तानाशाही को  संवैधानिक संरक्षण द्वारा स्थापित कर दिया जाएगा। साम्यवादी/वामपंथी विद्वान व नेता गण थोथी नास्तिकता या एथीस्टवाद में फंस कर ढोंग-पाखंड-आडंबर को मजबूत करते जा रहे हैं और अंततः फासिस्टों को सफलता दिलाते जाकर खुद को नष्ट करने की प्रक्रिया पर चल रहे हैं। तामिलनाडु में होने वाले वर्ष 2016 के चुनावों के लिए मोदी द्वारा रेखा को अपने पाले में खींचने का अभियान शुरू हो चुका है जिनका 29 जून 2017 तक का समय राजनीतिक रूप से उज्ज्वल है। क्यों नही तामिलनाडु से भाकपा के राज्यसभा सांसद कामरेड डी राजा साहब रेखा को वामपंथी खेमे में लाने का प्रयास करते ? क्योंकि एथीज़्म में ज्योतिष का कोई महत्व नहीं है भले ही फासिस्ट मोदी सरकार उनका लाभ उठा ले जाये। यदि रेखा को वामपंथी मोर्चे का नेता बना कर तामिलनाडु विधानसभा का चुनाव लड़ा जाये तो वहाँ यह मोर्चा सफलता प्राप्त कर सकता है। यदि फ़ासिज़्म को उखाड़ना है तो अभी से ही जुटना होगा और फ़ासिज़्म की चालों का शिकार बनने से बचना होगा। वामपंथी नेता गण बाजपेयी,केजरीवाल, pk फिल्म का समर्थन करके अपना जनाधार फासिस्टों को क्यों सौंपते जा रहे हैं? यह दुखद एवं सोचनीय विषय है। मनमोहन सिंह के फेर में फंस कर सोनिया कांग्रेस तो रेखा अथवा ममता बनर्जी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव लड़ने से वंचित हो गई किन्तु वामपंथ के सामने 2016 के  तामिलनाडु विधानसभा चुनाव रेखा के नेतृत्व में लड़ने के प्रयास तो अभी से किए ही जा सकते हैं जिससे कि दक्षिण में मोदी के कदमों को थामा जा सके।

http://krantiswar.blogspot.in/2014/02/blog-post_11.html
  ~विजय राजबली माथुर ©
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