‘यह फिल्म देखकर आने वाली पीढ़ियां कहेंगी- हमारे राजनेता कितने छिछोरे हैं!’ Home› Bollywood› Battle Of Banaras 2014 दिनेश श्रीनेत/अमर उजाला, दिल्ली Updated 13:09 शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016
http://www.amarujala.com/entertainment/bollywood/battle-of-banaras-2014 भारतीय सिनेमा में अपने किस्म के अनूठे फिल्मकार कमल स्वरूप ने लोकसभा चुनाव के दौरान बनारस जाकर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाई- ‘बैटल ऑफ बनारस’। उनके शब्दों में वे ‘भारतीय जीवन में चुनाव की उत्सवधर्मिता’ और ‘भीड़ के मनोविज्ञान’ का फिल्मांकन करना चाहते थे। मगर उनकी फिल्म सेंसर बोर्ड को आपत्तिजनक लगी और इसे मंजूरी देने इनकार कर दिया गया। वे ट्रिब्यूनल के पास गए उन्होंने भी मंजूरी नहीं दी। अब फिल्म के निर्माता इसे लेकर हाईकोर्ट जा रहे हैं। ट्रिब्यूनल का तर्क था कि यह डॉक्यूमेंट्री नेताओं के भड़काऊ संवादों से भरी हैं। कुछ लोगों का कहना है कि यह फिल्म पीएम मोदी के खिलाफ जाती है इसलिए इसे प्रतिबंधित किया जा रहा है। हमने कमल स्वरूप से इस पर एक लंबी बात की और जानना चाहा कि आखिर फिल्म में ऐसा क्या है जिससे इतने विवाद खड़े हो गए। प्रस्तुत है कमल स्वरूप से दिनेश श्रीनेत की बातचीत।
ये सवाल सब सरकारों से है। इस से या उससे नहीं। सब कुर्सी वालो से हैं। सवाल ही सवाल हैं और जवाब में हमे सिर्फ सुनाई देता है, "भारत माता की जय!" किसानों की बात करो तो "फौजियों की जय!" फौजियों की बात करो तो, "किसानों की जय!" इस कोरी जय से क्या मिलेगा! कैसे बोलदे जय! जब है ही नहीं जय! Anuradha Saroj 03-04-2016 at 1:29pm · पूरा स्पीच। ---------- अगर सद्भावना सवालों को हवन-कुंड में जलाती है, तो सद्भावना नहीं कवर-अप है, ढोंग है! हमारे प्रदेश में हिंसा हुई है, दंगे हुए है। let us accept that first. नुकसान हुआ है। कितना कम-ज्यादा इसका आंकलन लोग करते रहेंगे। लेकिन let us accept के नुकसान हुआ है। नुकसान करने बाहर से लोग नहीं आये थे। मराठी आके, बांग्लादेशी आके, मंगल ग्रह से आके किसी ने नहीं हमारी दुकानें फूंकी, हमारे स्कूल नहीं जलाये! हमी थे नुकसान करने वाले, और हमी हैं नुकसान सहने वाले। Let us also know that के कोई हिंसा यूँही नहीं बस भड़क जाती। इसके लिए बारूद लगता है। जिसपे हम हमेशा बैठे रहते हैं, बस एक चिंगारी की जरुरत होती है। यूँही कोई किसी की दुकान जलाने नहीं निकल पड़ता। यूँही कोई स्कूल नहीं फूँक देता। राह खड़ी गाड़ियां नहीं जला देता। यूँही कोई अमानव नहीं हो जाता। इसके पीछे की पृष्ठभूमि समझने की जरुरत है। हमे खुद से, समाज से, सरकार से सवाल करने की जरुरत है। इस बारूद को खत्म करने की जरुरत है। कैसे हम इतनी नफरत से भर जाते हैं? के पड़ोसी-पड़ोसी का दुश्मन हो जाता है। एक सेकंड के लिए जात को भूल जाएँ, तो सोचें हमने अपने दोस्तों, पड़ोसियों, भाइयों, यारों के घर जलाए हैं। दुकानें जलाई हैं। हमने अपना ही नुकसान किया है। कहाँ पल रही है ये नफरत? कौन पाल रहा है इस नफरत को? इस नफरत को पाल के किसे फायदा है? ये सवाल आज हमें उस हवन/यज्ञ में पूछने हैं। संस्कृत में ना समझ में आने वाले मन्त्र नहीं रटने, सीधे-साफ़ सवाल हमें करने हैं। और हमे सही सवाल करने हैं। सवाल ये नहीं होना चाहिए, के इसे नौकरी क्यों मिली मुझे क्यों नहीं? सवाल अब ये होना चाहिए के हम दोनों को नौकरी क्यों नहीं मिल रही? हमारे घर में सब के पास नौकरियां क्यों ना हों? सबके पास काम क्यों ना हो? सब इज़्ज़त की रोटी क्यों ना खा सकें? सब के पास बेसिक साधन क्यों ना हों? सवाल मिल के करने हैं। एक जाती को नहीं हर जाती को करने हैं! हम सब साथ मिलके सवाल करेंगे तो जवाब देना पड़ेगा! ये जरुरी सवाल हैं, मुश्किल सवाल हैं। लेकिन साथ में पूछेंगे तो जवाब देना पड़ेगा। हमारी आवाज कोई दबा नहीं पाएगा। न्यारे होके पूछेंगे, एक-दूसरे से लड़ झगड़ के पूछेंगे को हमारे सवालों को दबाना आसान होगा। और वो यही चाहते हैं के हमारे जरुरी सवाल दबते रहें, हम आपस में लड़ते-भिड़ते रहें। और वो अपनी रोटियां सकते रहें। सवाल नंबर एक - दंगे क्यों भड़के? क्या कारन था? प्रशाषन इस बात का जवाब दे। किसी राज्य में जब इस सत्र पे दंगे होते हैं, जान माल का नुकसान होता है, तब सरकारी प्रशाषन जिम्मेदार होता है। हमेशा! वो अपना पल्ला किसी जाती विशेष को ब्लेम कर के नहीं झाड़ सकता। (इस तरह तो रोज दंगे होंगे, और हम देखते रह जाएंगे) प्रशाषन के पास पुलिस फोर्से होती है, बैरिकेड होते हैं, वाटर केनन, टियर गैस, माइक्रो-फ़ोन, सैकड़ों प्रबंध होते हैं। इस स्केल पर दंगा कैसे फैला? क्या फैलवाया गया? दंगे में फायदा किसका था? पहले सवाल से दूसरा सवाल निकलता है। सवाल नंबर दो - प्रशाषन ने क्या किया दंगे रोकने के लिए? क्या आर्मी बुलाना आखरी उपाय था? पॉइंट ब्लेंक पे जवान मौतें हुई। क्या इसे रोका नहीं जा सकता था? Where were our leaders? So called leaders of the masses. Those who were voted by the people, for the people. Why were they not among the people? सब नेता कहाँ थे, जब आग लगने लगी? जब लोग घरों से निकल कर बर्बादी करने निकल पड़े? किसी सांसद, किसी विधायक, किसी सरपंच जी ने उन रोका क्या? आखिर समाज अपने बीच नेता क्यों चुनता है? सही राह दिखाने के लिए, या गलत राह पे मोड़ने के लिए? असल मौके पर समझदारी देने के लिए या अपने घरों में दुबक कर तमाशा देखने के लिए? सिर्फ नफरत की गन्दी आग को भड़काने वाले नेताओं के अलावा सब कहाँ गए थे? और जिन्होंने नेगेटिव रोल प्ले किया, और जिन्होंने कोई रोल ही नहीं प्ले किया, उनके ऊपर आगे कैसी कारवाही होगी? सवाल नंबर तीन - अब अहम सवाल। बारूद को पैदा करने वाले कारणों पे सवाल। कॉलेजों में स्कूलों में टीचर्स नहीं हैं, लेकिन वेकन्सी भी नहीं हैं! लोग बाहर NET पास कर के बेरोजगार फिर रहे हैं, और बच्चे बिना टीचर के परेशांन हैं। ये कॉन्ट्रैक्ट-टीचर का क्या स्कैम है? पक्की नौकरियां क्यों नहीं मिल रही? सवाल नंबर चार - प्राइवेट सेक्टर और सरकारी सेक्टर की नौकरीयों में दिन रात का अंतर क्यों है? एक पीएन की, चपड़ासी की सरकारी नौकरी पाने के लिए लोग लाइन लगा के खड़े हैं, प्राइवेट सेक्टर में कोई स्कूल में टीचर नहीं लगना चाहता! ये क्या माजरा है? मैं लंदन में रहती हूँ तो देखती हूँ के सरकारी नौकरी पाने की कोई होड़ नहीं है, बल्कि ऐसे ऐसे लोग बहुत है जो सरकारी नौकरी छोड़ के प्राइवेट सेक्टर में टीचर लगते हैं। क्यूंकि वहां प्राइवेट और सरकारी दोनों में तन्खा सेम है, बेनिफिट सेम हैं। हमारे गांव में प्राइवेट स्कूल में टीचर की पे तीन हज़ार है! तीन हज़ार रुपए महीना! फॉर एन एम इन इंग्लिश! इस ईट ए जोक!! स्कूल खोल खोल के लोगों ने कोठी बना ली, निरी पूंजी जोड़ ली, लेकिन वहां काम करने वाले अपने गुजारे तक के पैसे नहीं कमा रहा! यही हाल प्राइवेट फैक्ट्रीज, मॉल, कम्पनीयों का है। एम्प्लोयी को तीन से आठ हज़ार रुपए पे और कंपनी ओनर्स बन गए लखपती! इस घोर पूंजीवाद पे हमे सवाल करने हैं! सवाल में कई सवाल हैं। हमारी प्राइवेट सेक्टर में मिनिमम बेसिक वेज क्या है? क्या उसपे कोई रेगुलेशन है? प्राइवेट और सरकारी का अंतर कम क्यों नहीं होना चाहिए? सवाल नंबर पांच - हर साल वोट बैंक की राजनीति करके हम किसी जात को कुछ तो किसी जात को कुछ और लालच देते हैं। कभी कुछ गिफ्ट देते हैं, तो कभी कुछ साधन देते हैं। क्या ये गिफ्ट्स उनको सच में ऊपर उठाने के लिए दिए जाते हैं या सिर्फ अंधी राजनीति है? गरीब आदमी हर जात में है। गरीब जिसके पास रिजर्वेशन नहीं है, वो ये देख के कुढ़ता है। नफरत पनपती है। बारूद बनती है। क्या जात-पात को खत्म करने के लिए कुछ किया जा रहा है या सिर्फ इसे बचाए रखना है क्यूंकि इलेक्शन हर पांच साल में होता है और बिना जात-पात के फिक्स्ड वोट कहाँ? सवाल नंबर छः - हर जात में गरीब हैं। किसान पिछड़ी जाती ना होते हुए भी सुसाइड कर रहे हैं। इनके options क्या हैं? इनके लिए क्या opportunities हैं? सवाल नंबर सात: हमारी पढाई, कॉलेजेस का इतना धुम्मा क्यों उठ्या हुआ है? इतनी फ़र्ज़ी क्यों पढाई हो गयी के MA/MBA करे जवान चपड़ासी की एप्लीकेशन भरते हांडे सै? घूम फिर के बात आती है फिर सवाल तीन पे। टीचर्स क्यों नहीं हैं? ये सवाल सब सरकारों से है। इस से या उससे नहीं। सब कुर्सी वालो से हैं। सवाल ही सवाल हैं और जवाब में हमे सिर्फ सुनाई देता है, "भारत माता की जय!" किसानों की बात करो तो "फौजियों की जय!" फौजियों की बात करो तो, "किसानों की जय!" इस कोरी जय से क्या मिलेगा! कैसे बोलदे जय! जब है ही नहीं जय! ना वीरू है, ना ही है जय, रह गयी है खाली माँ! जो नेता जनता को सही दिशा में बढ़ने की बुद्धि ना दे, वह नेता नहीं है। बाकी चाहे जो कुछ हो! नेता की कथनी और करनी एक जैसी होनी चाहिए। बोलतु संत नहीं, असल का संत चाहिए। लेकिन इनको जब हम वोट देते हैं, इनकी सरपरस्ती कबूल करते हैं, तब हम क्या इस बारे में सोचते हैं? नहीं सोचते हैं! तब हम जात देखते हैं! धर्म देखते हैं! और तब हमारे आदरणीय साधू संत, जो अब हवन कराएँगे, ये लोग तब सही मनुष्य को चुनने का ज्ञान नहीं देते। बल्कि ऐसे भी संत हैं कुछ जो जब वोट दिलवाने निकलते हैं तब कुछ और बोलते हैं, चुनाव जीता कर कुछ और बोलते हैं। संतो को तो कम से कम नेताओं की भाषा नहीं बोलनी चाहिए! उनको तो मानवता की, समाज के हित की बात सिर्फ करनी चाहिए। जब आग लगायी जा रही थी, तब कौन हमारे साधु संत घर या दुकान के आगे लेट गए, की पहले मुझे जलाओ, अपनी मनुष्यता को जलाओ, तब दुकान या स्कूल जलाना? कौनसे बाबा जी, माता जी, पानी लेकर दौड़े थे आग बुझाने? मैं अभी उन संत लोगो के पाँव छू लूँ, कोई जरा नाम बताओ! ये बोलते तो कैसे कोई ना रुकता! हम तो बड़े धार्मिक लोग हैं! अब हवन-यज्ञ से क्या अचीव होगा? लकड़ी जलेगी, जो पहले ही काफी कम है। लेकिन शान्ति आती हो तो पूरा जंगल जला दूँ! लेकिन क्या छत्तीस, छप्पन जातिओं या सभी बिरादरी धर्म के भाई बहनो के मन में जो एक दूसरे के लिए नफरत है, ईर्ष्या है, दुर्विचार हैं, क्रोध है, द्वेष है, ये सब क्या उस हवन में स्वः हो जायेगा? या उसके लिए कुछ और करना होगा? ये सोचने की बात है? जाते जाते आखरी सवाल खुद से, अपने लोगो से। ये नेता, साधू-संत, तो लेरे हैं सुवाद, इनका नहीं बिगड़ता किम्मे! पर क्या हमे नहीं दिखता के तोड़-फोड़, लूट-पाट, आग लगाने में तो किसे का फायदा नहीं सै! सरकार तै तो मिलके सवाल करेंगे ही, अपने आप से भी करेंगे। इक्कठे चलने में फायदा है, या अकेले में? हम कब मजबूत होंगे? कब हमारे सवालों को जवाब मिलेंगे? तब जब हम सिर्फ अपनी नहीं अपने पडोसी की नौकरी के लिए भी आवाज़ उठाएंगे। जब वो हमारे लिए आवाज उठाएगा। तो यही है सद्भावना। यही है अपील। यही है हवन और यही है कुंड। जात-पात की आहुति देके, कट्ठे रहन का समय आया है। दुनिया मंगल पे बसन नै होरी है, अर हम रिजर्वेशन की लाइन में लाग रे हाँ! आज हाम लाग रे हाँ, काल कोई और लठ ठावेगा। आज या नफरत, लड़ाई, बैर की बळी देनी है! जब्बे गुजारा है, जब्बे विकास है, जब्बे हरियाणा है, जब्बे दूध दही का खाना है!
कुछ लोगों के लिए देशप्रेम का मतलब कोयल की कूक , नदियों का कलकल - छलछल , झरना का झर- झर , सूर्योदय, सूर्यास्त , पहाड, अतीत का झूठा महिमामंडन आदि है और भूख ,शिक्षा ,स्वस्थ, बराबरी, न्याय ,शोषण -मुक्ति ,अवसर की समानता जैसे मुद्दों का मतलब देशद्रोह है l इन मुद्दों पर से ध्यान हटाने के लिए जोर - जोर से चिल्लाना उनके लिए देशप्रेम है l Jitendra Verma
जेएनयू संकट : संकट की आहट हाल में जेएनयू के घटना – क्रम ने पूरे देश को उद्धेलित किया है l विदेश में भी भारत की छवि बदरंग हुई है l यह विश्वविद्यालय अपने स्थापना काल से बहस , नए विचार , तर्क आदि का केंद्र रहा है l जेएनू का ताजा प्रकरण छात्र – संघ के अध्यक्ष कन्हैया की गिरफ्तारी से शुरू हुआ l उनपर आरोप था कि उन्होंने अपने भाषण में काश्मीर की आजादी के और अफजल के पक्ष में नारा लगाया था l भाषण के विडीयो रेकार्डिग के जांच में यह आरोप गलत साबित हुआ l इसी आधार पर कन्हैया को जमानत मिली l इस विवाद में एक तरफ भारत सरकार है तो दुसरी तरफ जेएनयू के छात्र हैं l जबसे केंद्र में मोदी सरकार बनी है तबसे भाजपा जेएनयू के खिलाफ बोल रहें हैं l पिछले दिनों भाजपा के मुख – पत्र पाचजन्य और ऑर्गनाइजर में एक रिपोर्ट छपी जिसमें कहा गया कि जेएनयू में देशद्रोही पैदा होते हैं , वह देशद्रोहियों का अड्डा है l आज इस विश्वविद्यालय से निकले लगभग छ हजार आई ए एस , आई पी एस देश में कार्यरत हैं l बिहार के वर्तमान मुख्य सचिव इसी विश्वविद्यालय की उपज हैं l तो यह मान लिया जाय कि अभी देश को देशद्रोही चला रहें हैं ! जेएनयू शुरू से नए विचारों का केंद्र रहा है l वहाँ नए विचारों को पूर्वग्रह मुक्त नजरिये से देखा जाता है l ऐसा नहीं है कि वहाँ सिर्फ वामपंथी विचारों के अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है l वहाँ हर कोई अपना विचार रख सकता है l भाजपा के विधार्थी परिषद की शाखा वहां काम कर रही है , छात्र – संघ के चुनाव में कई पदों पर उसके उम्मीदवार जीते भी हैं l कांग्रेस के शासनकाल में( 22 दिसम्बर 1966) स्थापित यह विश्वविद्यालय वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है l यह अन्य विश्वविद्यालयों से थोडा भिन्न है l यहाँ नोकरी के लिए पड़ना अच्छा नहीं माना जाता है l यहाँ का लक्ष्य ज्ञान प्राप्त करना माना गया है l इंग्लैंड का कैम्बिज और अमेरिका का हार्वड इसके आदर्श हैं l ऐसे विश्वविद्यालय का नाम जवाहरलाल नेहरु के नाम पर होना स्वाभाविक है l यह मानविकी , समाज विज्ञान , अन्तरराष्ट्रीय अध्धयन में उच्चस्तरीय शिक्षा एवं शोध के लिए बना है l चिन्तन की प्रक्रिया आग्रह मुक्त होती है l किसी भी विचार , सिद्धांत , धारणा ,मान्यता आदि पर प्रश्नचिन्ह लगाना नए चिन्तन की पहली शर्त होती है l पहले के विचार , सिद्धांत , धारणा , मान्यता आदि का परीक्षण बुरा नहीं होता है l पर कमजोर विचार वार्लों को हरदम डर बना रहता है कि कही उनकी पोल खुल नहीं जाए l वे अपनी बात बंदूक के बल पर मनवाना चाहते हैं l जेएनयू में किसी भी मुद्दे पर बहस , विचार – विमर्श की पर्याप्त जगह रहती है पर ठस दिमागवालों को थोड़ी भी मतभिन्नता , असहमति बर्दाश्त नहीं होती है l कुछ लोगों के लिए देशप्रेम का मतलब कोयल की कूक , नदियों का कलकल - छलछल , झरना का झर- झर , सूर्योदय, सूर्यास्त , पहाड, अतीत का झूठा महिमामंडन आदि है और भूख ,शिक्षा ,स्वस्थ, बराबरी, न्याय ,शोषण -मुक्ति ,अवसर की समानता जैसे मुद्दों का मतलब देशद्रोह है l इन मुद्दों पर से ध्यान हटाने के लिए जोर - जोर से चिल्लाना उनके लिए देशप्रेम है l जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के बहाने जो घटनाएँ घट रहीं है उससे साफ़ है कि आज देश में भाजपा . आर . एस . एस . से असहमति , मतान्तर के लिए कोई जगह नहीं है l भाजपा और आर . एस . एस . से असहमति का एकमात्र अर्थ देशद्रोह है l यह विडम्बना ही है कि जिन लोगों ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजो का साथ दिया , गाँधी जी की हत्या की , राष्ट्रध्वज , राष्ट्रगीत को हरदम बदलने की मांग की वे आज देशभक्ति का प्रमाण पत्र बाँट रहें हैं ! जेएनयू के खिलाफ एक आरोप यह लगाया जा रहा है कि वहाँ के छात्र करदाताओं के पैसे से ऐयाश्शी करते हैं l ऐसे लोगों को शिक्षा पर होने वाला व्यय बेकार लगता है l यही वजह है कि मोदी सरकार अपने बजट में शिक्षा के व्यय पर कटैती कर रही है l भाजपा के विधायक ने बड़े परिश्रम से गिना कर बताया कि जेएनयू में प्रतिदिन कितने कंडोम , कितने शराब की बोतल , कितने सिगरेट के टुकडे , कितने मुर्गे की हड्डी , कितने मुर्गी की हड्डी मिलते हैं ! इस विश्वविद्यालय की व्यवस्था हरदम रफ एंड टफ रही है l कैंटीन में ग्लास नहीं रहता , सभी जग से ही पानी पीते हैं l जींस और कुर्ता यहाँ का सदाबहार ड्रेस है l यहाँ के छात्र रात – रात भर पढने के लिए जाने जाते हैं l ऐसी जगह पर सेना को तैनात करना शर्मनाक है l भारत इतना कमजोर नहीं है कि किसी के कहने या भाषण से टूट जाएगा l
कन्हैया का मोदी सरकार पर वार, आप अंग्रेज है तो हम भगत सिंह के सिपाही मार्च 19, 2016 भारत JNUSU president Kanhaiya Kumar केंद्र की मोदी सरकार पर एक बार फिर हमला बोलते हुए जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने कहा कि वे तानाशाही के खिलाफ सीधी लड़ाई छेड़ेंगे। कन्हैया ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि वह देश भर के विश्वविद्यालयों को निशाना बना रही है। उन्होंने सभी लोकतांत्रिक ताकतों का समर्थन मांगते हुए कहा कि यह देश को बचाने की मुहिम है। कन्हैया ने कहा कि संविधान की बात करने वालों को राजद्रोह के उस मामले में कानून को अपना काम करने देना चाहिए जिसमें उनके साथ-साथ जेएनयू के छात्र उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को भी आरोपी बनाकर गिरफ्तार किया गया था। कन्हैया ने कहा कि सड़क पर इंसाफ करना स्वीकार्य नहीं है। इंडिया टुडे कॉनक्लेव में कन्हैया ने कहा, ‘हो सकता है कि आप मेरी राजनीति से सहमत न हों। यह सिर्फ जेएनयू की बात नहीं है। देश भर में विश्वविद्यालयों को निशाना बनाया जा रहा है। अब हमारी लड़ाई सीधे तौर पर तानाशाही के खिलाफ है। सभी लोकतांत्रिक ताकतों को साथ आना होगा। देश में इस एकता की जरूरत है’। कन्हैया ने कहा कि लोगों के सामने आज सबसे बड़ा सवाल देश को बचाने का है, लेकिन जेएनयू विवाद में मामले को देशभक्त बनाम देशद्रोही का रंग दे दिया गया। उन्होंने कहा कि देशभक्त का काम यह नहीं होता कि अपने ही देश के लोगों, युवाओं और छात्रों के खिलाफ राजद्रोह जैसे काले कानून का इस्तेमाल करे। उन्होंने कहा, ‘आप ऐसे बर्ताव कर रहे हैं जैसे आप अंग्रेज बन गए हैं और हम भगत सिंह के सिपाही हैं। यदि आपको राजद्रोह जैसे काले कानून के इस्तेमाल में कोई हिचक नहीं है तो हमें भी भगत सिंह का सिपाही बनने में कोई दिक्कत नहीं है। इस मौके पर जेएनयू छात्र संघ की उपाध्यक्ष शहला राशिद शोरा ने कहा कि सबको साथ लेकर चलने वाला भारत का विचार आज खतरे में है। शहला ने कहा, ‘चूंकि राजनीति हमारा भविष्य तय करती है, ऐसे में हम ही अपनी राजनीति तय करेंगे । विश्वविद्यालय लोकतांत्रिक स्थान होते हैं। हमें उन्हें आरएसएस से बचाना होगा’। जम्मू-कश्मीर की रहने वाली शहला ने कहा कि वे भारत की बेहद हिंसक छवि देखते हुए पली-बढ़ी हैं, लेकिन जेएनयू ने उन्हें लोकतांत्रिक जगह मुहैया कराई। इससे पहले, कन्हैया ने राजद्रोह कानून को निरस्त करने के लिए लड़ाई छेड़ने का संकल्प जताया। इसी कानून के तहत एक विवादास्पद कार्यक्रम के सिलसिले में पिछले महीने कन्हैया और विश्वविद्यालय के दो अन्य पीएचडी छात्रों को गिरफ्तार किया गया था। उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को जमानत दिए जाने का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि सभी पार्टियों और लोकतंत्र का समर्थन करने वाले लोगों को ब्रिटिश युग के कानून को खत्म करने की मांग को लेकर आगे आना चाहिए। साभार : http://www.hindkhabar.in/india/1536-kanhaiya-war-british-and-bhagat-singh-soldiers