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Monday, August 3, 2020

यू एस ए का साथ भारत को मंहगा पड़ेगा ------ भरत झुनझुनवाला



भरत झुनझुनवाला साहब ने आर्थिक आधार पर यू एस ए का साथ देने को भारत के लिए घाटे का सौदा बताया है इसके अतिरिक्त राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी ऐसा करना अदूरदर्शिता ही है। 
यू एस ए ने रासायनिक हथियारों का झूठा आरोप लगा कर ईराक को नेस्तनाबूद कर दिया अर्थात प्राचीन मेसोपोटामिया सभ्यता और संस्कृति को नष्ट कर डाला। मिस्त्र आदि अनेकों सभ्यताओं व संस्कृतियों को नष्ट करने का दोषी है यू एस ए। 
वर्तमान में चीन और भारत को लड़वा कर यू एस ए  चीन व भारत दोनों की प्राचीन संस्कृतियों को नष्ट करना चाहता है। 
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का संकल्प था ' एशिया फार एशियन्स ' यदि उसके आधार पर रूस,  चीन और भारत एकजुट हों तो यू एस ए ही नहीं सम्पूर्ण विश्व का मजबूती से मुकाबला कर सकते हैं। 
इसके अतिरिक्त भारत- बांगलादेश-पाकिस्तान को मिल कर  ' भारत- बांगलादेश- पाक महासंघ ' बनाना चाहिए जिससे तीनों देशों की जनता को राहत मिलेगी सभी जगह उन्नति व समृद्धि हो सकेगी। 1947 में यू एस ए ने ही भारत - पाक विभाजन अपने साम्राज्यवादी हितों को साधने के लिए ब्रिटेन से करवाया था जिसमें वह आज भी संलग्न है। भारत प्रायद्वीप ही नहीं सम्पूर्ण एशिया की जनता का हित सुरक्षित करने के लिए यू एस ए की चालों से बचने की नितांत जरूरत है। 

 ~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, January 26, 2020

नवयुग आप नहीं आएगा नवयुग को तुम लाओगे ------ साहिर लुधयानवी


हमने सुना था एक है भारत 

Song Title: Humne Suna Tha Ek Hai Bharat 
Movie: Didi (1959) 
Singers: Mohammed Rafi, Asha Bhosle 
Lyrics: Sahir Ludhianvi 
Music: N. Dutta 
Music Label: Saregama

👉lyric

हमने सुना था एक है भारत सब मुल्कों से नेक है भारत लेकिन जब नजदीक से देखा सोच समझ कर ठीक से देखा हमने नक्शे और ही पाए बदले हुए सब तौर ही पाए एक से एक की बात जुदा है धर्म जुदा है जात जुदा है आप ने जो कुछ हम को पढाया वो तो कही भी नज़र न आया जो कुछ मैंने तुम को पढाया उसमे कुछ भी झूठ नहीं भाषा से भाषा न मिले तो इसका मतलब फूट नहीं इक डाली पर रह कर जैसे फूल जुदा है पात जुदा बुरा नहीं गर यूँ ही वतन में धर्म जुदा हो जात जुदा आपने वतन में
वही है जब कुरान का कहना जो है वेद पुरान का कहना फिर ये शोर-शराबा क्यों है इतना खून-खराबा क्यों है आपने वतन में सदियों तक इस देश में बच्चो रही हुकूमत गैरों की अभी तलक हम सबके मुँह पर धुल है उनके पैरों की लडवाओ और राज करो यह उन लोगो की हिकमत थी उन लोगों की चाल में आना हम लोगों की जिल्लत थी ये जो बैर है इक दूजे से ये जो फुट और रंजिश है उन्ही विदेशी आकाओं की सोची समझी बकशिश है अपने वतन में कुछ इन्सान ब्राह्मण क्यों है कुछ इंसान हरिजन क्यों है एक की इतनी इज्जत क्यों है एक की इतनी ज़िल्लत क्यों है

धन और ज्ञान को ताकत वालों ने अपनी जागीर कहा मेहनत और गुलामी को कमजोरों की तक़दीर कहा इन्सानों का यह बटवारा वहशत और जहालत है जो नफ़रत की शिक्षा दे वो धर्म नहीं है , लानत है जन्म से कोई नीच नहीं है जन्म से कोई महान नहीं करम से बढ़कर किसी मनुष्य की कोई भी पहचान नहीं अब तो देश में आज़ादी है अब क्यों जनता फरियादी है कब जएगा दौर पुराना कब आएगा नया जमाना सदियों की भूख और बेकारी क्या इक दिन में जाएगी इस उजड़े गुलशन पर रंगत आते आते आएगी ये जो नये मनसूबे है ये जो नई तामीरे है आने वाली दौर की कुछ धुधली-धुधली तस्वीरे है तुम ही रंग भरोगे इनमें तुम ही इन्हें चमकाओगे नवयुग आप नहीं आएगा नवयुग आप नहीं आएगा नवयुग को तुम लाओगे नवयुग आप नहीं आएगा नवयुग को तुम लाओगे|। 








 ~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, September 28, 2019

जीत गए तो 71 , हार गये तो 62 ------ मनीष सिंह / संतोष कुमार झा






Santosh Kumar Jha
28-09-2019 
Manish singh
https://www.facebook.com/manish.janmitram/posts/2450682738349362

हर सितारे का एक वक्त होता है। उसके बनने का, चमकने का और धूमिल हो जाने का भी..। नेपोलियन के लिए वाटरलू, हिटलर के लिए ईस्टर्न फ्रंट और नेहरू के लिए चीन..

15 अगस्त 1947 में आजाद भारत की सीमाएं, ब्रिटिश भारत से विरासत में मिली। पश्चिमी सीमा तो बंटवारे में ब्रिटिश ने रेडक्लिफ लाइन से तय कर दी थी। कश्मीर बाद में हमसे जुड़ा, जुड़ने के पहले कुछ हिस्सा पाक दबा चुका था। वहां एक्चुअल कन्ट्रोल की लाइन को फोर्टिफाइ कर सेफ किया गया। मगर पूर्वी सीमा बड़ी अस्पस्ट थी।

पूर्वी सीमाओ का रिफरेंस पॉइंट, अंग्रेजो के दो सौ साल के राज दौरान अलग अलग सन्धियों से तय होनी थी। अंग्रेज युद्ध मे "इलाके" जीत लेते थे, इलाके खरीद भी लेते थे (कुमाऊँ गढ़वाल नेपालियों से खरीदा), इलाके लीज पर लेते थे ( गिलगित बल्टिस्तान, 1930 में कश्मीर राजा से 60 साल की लीज पर लिया था)। इन्ही सन्धियों को रिफरेंस पॉइंट लेकर भारत को अपनी सीमा तय करनी थी, जिसमे पड़ोसी की भी मंजूरी हो।

पर सन्धियों में इलाके लिखे होते हैं, कागज पर डॉटेड लाइन बना दी जाती है, मान ली जाती है। जमीनी बार्डर अलग चीज है,वह जमीन पर पक्की लाइन खींचकर तय की जाती है। इसलिए जॉइंट बॉर्डर कमीशन बनते, सर्वे होता, नक़्शे के आधार पर जमीनी लाइन खिंचती थी।

मगर चीन के साथ ब्रिटीश ऐसा कर नही पाए। पहली बात ये, मजे की.. की ब्रिटिश के लिए चीन से सीमा मिली ही नही थी। वो तिब्बत था, जिसपर ढीला कन्ट्रोल चीन राजा का था जरूर, मगर तिब्बतियन ट्राइब्स लगभग स्वतंत्र थे। ब्रिटिश ने तिब्बतियों को कई झड़पों में दबाया। फिर 1914 में शिमला में एक कान्फ्रेंस हुई। तिब्बती और ब्रिटिश इंडियन अफसरों ने समझौता करके बार्डर तय किये गए। अरुणाचल के इलाके तय करती इस रेखा को "मैकमेंहन लाइन" कहा गया। कई स्थानों पर इस लाइन ने तिब्बती इलाके, ब्रिटिश भारत मे दिखाए। तिब्बती कमजोर थे, दस्तखत कर गए। सो टेक्निकली तिब्बती कल्चर कई इलाके नक़्शे में ब्रिटिश सरकार के हो गए। मगर जमीन पर अंग्रेजो ने इन्हें न अपने प्रशासन में लिया, न फोर्टिफाइ किया। तवांग ऐसा ही इलाका था, जिसका जिक्र आगे आएगा।

47 में इन्ही सीमाओ (नक्शों) को हमनें विरासत में पाया। तिब्बत तो मित्र था, कोई समस्या नही थी। पर समस्या आयी जब माओइस्ट चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। तिब्बत अब चीन था, अग्रेसिव था, अब कम्युनिस्ट भी था, रूस की बैकिंग थी। भारत को देश हुए जुम्मा जुम्मा दो साल हुए थे। सेना कम थी, पश्चिम में पाकिस्तान से उलझी हुई थी। तो पूर्व में चीन से उलझना बेवकूफी थी। नेहरू ने दो चीजें तय की। एक- चीन को संतुष्ट रखना, दो- सीमा मामले पर मैकमैहन लाइन पर दृढ़ रहना।

खुश करने के लिए चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता दी, तब जबकि पूरे पश्चिम ने माओ को चीन का अधिकृत शासक मानने से इनकार कर दिया था। चीन की यूएन में परमानेंट सीट होल्ड हुई, तो नेहरू ने उसकी वकालत की। चीन की सीट इंडिया को दिए जाने के लालच से भी खुद को बचाया।

दूसरी ओर, सीमा के मसले पर चीन के भारतीय राजदूत पणिक्कर के द्वारा मैकमैहन लाइन को फाइनल मानने का संदेश भेजा। चाइनीज पीएम चाऊ का जवाब-"हमे अपनी मित्रता, और सांस्कृतिक आदान प्रदान पर ध्यान देना चाहिए. सीमा का मसला, जैसी परम्पराये हैं, उस आधार पर देख लेंगे"। अब समझना कठिन था की मैकमैहन पर चीन उत्तर हां है या ना??

नेहरू ने टेस्ट किया। तवांग, जो था मैकमैहन लाइन में हमारी ओर, मगर था तिब्बती इलाका। 1951 में भारतीय प्रशासन वहां पहुंचा औऱ अपने नियंत्रण में ले लिया। पहली बार आजाद भारत ने मैकमैहन लाइन को एक्सरसाइज किया। देश झूम उठा। चीन की कोई प्रतिक्रिया नही आई। हमने इसे मैकमैहन लाइन पर चीन की स्वीकृति माना। अरुणाचल और नॉर्थ ईस्ट में मसला सुलझने का सन्देश समझा गया।

मगर 1952 में एक घटना हुई। ऊपर अक्साई चिन नाम का इलाका है। इसे ब्रिटिश मैप्स में कश्मीर.. (अब भारत) मे दिखाया गया था। इन नक्शो को ब्रिटिश सर्वेयर्स ने एकतरफा बनाया था, और तिब्बत/ चीन को अप्रूवल के लिये भेजा था। तिब्बत या चीन की ओर से कभी वेरिफाई करने का रिकार्ड नही है। ठंडा, निर्जन रेगिस्तान जैसे इस इलाके में कश्मीर राजा, या तिब्बतीयों, या अंग्रेजो ने सुरक्षा या गश्त की जहमत कभी नही की थी। इस अन्डिफेंडेड इलाके से होकर चीन ने एक सड़क बना ली थी।

सड़क थी जिनजियांग इलाके को तिब्बत से जोड़ने के लिए। वहां विद्रोह होते रहते थे। सेना पहुंचाने के लिए उसकी जरूरत थी। मगर विरासत में मिले नक़्शे के लिहाज से हिंदुस्तानी इलाके का वॉयलेशन था। हिंदुस्तान चीत्कार उठा। "नेहरूऊऊऊ.., सुई के नोक के बराबर भारत भूमि चीन को मत देना"।

नेहरू ऐसी वारमोंगरिंग के खतरे समझते थे। समझाने की कोशिश की- "बंजर पहाड़ है, ज्यादा पंगा मत लो"। तो हमने गंजा सिर दिखा दिया-" इस सिर पर कुछ नही उगता, तो कटवा दें क्या??" .

बिल्कुल नही। अब सीमा पर चौकसी मजबूत की जाने लगी। सेना में खूब भर्ती होने लगी। नेशनल डिफेंस कालेज, एनसीसी वगेरह उसी दौर में आये। और आये कृष्णा मेनन। बड़े योग्य, ज्ञानी, प्रॉफेशनल और उतने ही बदतमीज डिफेंस मिनिस्टर। पूर्वी सीमा के लिए अलग से नई कोर बनी। पहाड़ो में सड़कें, हवाई अड्डे बनने लगे।

चीन देख रहा था, आपत्ति कर रहा था। नेहरू ने उसे भी सन्तुष्ट रखने की कोशिश की। 1954 में पंचशील समझौता किया। याने तिब्बत पर चाइनीज अधिकार स्वीकार कर लिया। हिंदी चीनी भाई भाई कहलाए। नेहरू यूएन में उंसके पक्ष में बोलते रहे। मगर फिर धर्मसंकट आ गया।

1958 में दलाई लामा भारत भाग आये। नेहरू ने खुद मिलकर समझाया, मगर लामा वापस जाने को तैयार नही हुए। भारत मे बैठकर तिब्बत की निर्वासित सरकार बना ली। उधर नई नई शुरू हो गई बॉर्डर पेट्रोल में रोज रोज चाइनीज सेना का सामना होता। इसे हमारी फारवर्ड पॉलिसी कहा गया। रोज हेडलाइन्स बनती, संसद में बहस होती, चीन की निगाह में भारत होस्टाइल होता जा रहा था। सीमा पर उसने भी इन्फ्रास्ट्रक्चर और फॉर्मेशन बढ़ाने शुरू किए। उसकी भी खबरें बनती, याने और हेडलाइन, और बहस...

उधर पाकिस्तान में एक जनरल ने सत्ता हाथ मे ले ली। भारत मे जनरल थिमैया और बदतमीज मेनन की रोज किचकीच होती। इसमे नए इलाके में घुसकर पेट्रोलिंग के मुद्दे शामिल थे। थिमैया ने इस्तीफा तक दे दिया, नेहरू के कहने पर वापस लिया। इस किचकिच और अविश्वास का फायदा मिला- बीएम कौल को। कहते है कि वे नेहरू और मेनन के विश्वाशपात्र थे। दर्जन भर अफसर दरकिनार कर उन्हें उप सेनाध्यक्ष बनाया गया, और नई नवेली ईस्टर्न कमांड उनको दी गयी। अपनी जान में नेहरू, मेनन और कौल ..सेना और सीमा मजबूत करने में जुटे थे।

1960 में चाऊ भारत आये। एक प्रस्ताव दिया। नीचे मैकमोहन लाइन हम मान लेते हैं, इस तरह नेफा (अरुणाचल) आपका।। ऊपर अक्साई चिन पर हमारा अधिकार स्वीकार कर लो। बॉर्डर पर झड़पें रोकने के लिए दोनो सेनाएं, स्टेटस क्वो से 20 किमी पीछे लौट जाएं। भारत ने मना कर दिया। काहे सर पे बाल नही, मगर सर थोड़ी कटा सकते हैं। इसलिए- "सीमा वहीं बनाएंगे"

1961 आया। भारत की सेना ने गोआ जीत लिया। यूएन में भी पुर्तगाल को नेहरू ने सुलट लिया। याने सेना भी मजबूत है, और विश्व मे हमारी पकड़ भी। छप्पनिया देश का और क्या सबूत चाहिए। उधर पूर्वी सीमा पर झड़पें खूनी हो चली थी। युद्ध आसन्न था।

20 अक्टूबर 1962 को चीन ने अक्साई चिन इलाके पर धावा बोला। नीचे तवांग के इलाके में भी उसकी फौजें घुसी। नेहरू देश से बाहर थे। भागे भागे आए, तो पता चला, बहादुर जनरल कौल हार्ट अटैक के नाम पर दिल्ली आकर भर्ती थे। उन्हें वापस मोर्चे पर दौड़ाया। वर्ल्ड कम्युनिटी से सहयोग चाहा। मगर सितारे उल्टे चल रहे थे।

क्यूबा का मिसाइल संकट चल रहा था। जब रूस ने अपने परमाणु मिसाइल क्यूबा में लगाकर सारे अमरीका को घेरे में ले रखा हो, अमरीका ने तैनाती तुरन्त न हटाने पर रूस पर सारी मिसाइल तान रखी हो, जब सारा विश्व परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ा हो। उस वक्त एशिया की पहाड़ियों पर लड़ रहे, तीसरी दुनिया के दो देशों के बीच- बचाव की फुर्सत किसे। हम पिटते रहे.. गाते रहे - कर चले हम फिदा ...।

18 दिन का क्यूबा संकट खत्म हुआ। रूस को फुर्सत मिली, तो चीन को समझाया। चीन का उद्देश्य भारत को सबक सिखाना था। काफी टेरेट्रीज जीत चुका था। 19 नवम्बर को उसने एकतरफा युद्ध विराम कर दिया। भारत की निर्णायक हार हो चुकी थी। अक्साई चिन और अरुणाचल में वो जितना देने को तैयार था, उससे आगे आकर कब्जा कर गया। आज भी वे कब्जे बरक़रार हैं।

इसे सैनिक असफलता कहें, कूटनीतिक असफ़लता कहे, राजनैतिक असफलता कहे, या नेहरू की निजी असफलता.. भारत का मान मर्दन पूरा हो चुका था। मेनन- कौल के इस्तीफे आये। नेहरू अस्ताचल में चले गए। डेढ़ साल बाद मर गए। एसटीडी/एड्स से तो नही.. मगर हार्ट अटैक से।

चीन, नेहरू का वाटरलू था। वाटरलू नेपोलियन की महानता को खत्म नही करता, मगर पूर्ण विराम तो लगाता ही है। चीन से हार के लिए नेहरू जिम्मेदार थे, कोई शक नही। मगर अनिच्छुक नेहरू को इस तरफ धकेलने के लिए उस वक्त की संसद, अखबारो और जनमानस को भी एक छटाँक जिम्मा लेना चाहिए।

नक्शों पर, सैंकड़ो साल पहले.. किसी और के विजयोत्सव के दौरान खींची गई रेखाओं के आधार पर, हम आज विजयी भाव लेकर पड़ोसियों से युद्ध की ताल ठोकें। वर्तमान को नकार दें। सड़को पर, संसद में , मीडिया में , गली कूचों पर " सीमा वहीँ बनाएंगे" का वीरभाव दिखाएं। ये राष्ट्रीय भाव जगाने को अच्छा है, शायद चुनाव जीतने के लिए भी। मगर युद्ध न प्रधानमंत्री को लड़ना होता है, न मीडिया, न सांसदो को, न जनरल को, न गली कूचों बैठी गर्वोंन्मत जनता को। मरते बस सैनिक है।


वे सैनिक, कोई सिख, कोई जाट मराठा, कोई गुरखा कोई मद्रासी... हाड़मांस के आम इंसान, जो सर्द पहाड़ी पर हमारी आपकी शेखी की पताका लेकर ऊंचे से ऊंचा फहराने के लिए वर्दी डालकर जान देते है। जीत गए तो 71 , हार गये तो 62

https://www.facebook.com/santoshkumar.jha.50/posts/2570889722933147


  ~विजय राजबली माथुर ©

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Friday, August 14, 2015

शिव भारत देश का पर्याय --- विजय राजबली माथुर


"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं.आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -"उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई."लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ?महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .


काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने  वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.

दुनिया लूटो,मक्कर से.
रोटी खाओ,घी-शक्कर से.

   एवं
अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .
फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.

आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते(प्रस्तुत 'महादेव' संबंधी विचारों के लेखक एक 'नास्तिक 'संप्रदाय से सम्बद्ध हैं और पोंगापंथी -ब्राह्मणवादी विचारों की ही परिपुष्टि कर रहे हैं),स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही  लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.


जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े  कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.

यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैंतो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.
" ओ ३ म *नमः शिवाय च" कहने पर उसका मतलब यह होता है.:-
*अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति
च अर्थात तथा/ एवं / और
शिवाय -हितकारी,दुःख हारी ,सुख-स्वरूप
नमः नमस्ते या प्रणाम या वंदना या नमन 
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'शैव' व 'वैष्णव' दृष्टिकोण की बात कुछ विद्वान उठाते हैं तो कुछ प्रत्यक्ष पोंगापंथ का समर्थन करते हैं तो कुछ 'नास्तिक' अप्रत्यक्ष रूप से पोंगापंथ को ही पुष्ट करते हैं। सार यह कि 'सत्य ' को साधारण जन के सामने न आने देना ही इनका लक्ष्य होता है। सावन या श्रावण मास में सोमवार के दिन 'शिव' पर जल चढ़ाने के नाम पर, शिव रात्रि पर भी तांडव करना और साधारण जनता का उत्पीड़न करना इन पोंगापंथियों का गोरख धंधा है। 
'परिक्रमा' क्या थी ?:

वस्तुतः प्राचीन काल में जब छोटे छोटे नगर राज्य (CITY STATES) थे और वर्षा काल में साधारण जन 'कृषि कार्य' में व्यस्त होता था तब शासक की ओर से राज्य की सेना नगर राज्य के चारों ओर परिक्रमा (गश्त) किया करती थी और यह सम्पूर्ण वर्षा काल में चलने वाली निरंतर प्रक्रिया थी जिसका उद्देश्य दूसरे राज्य द्वारा अपने राज्य की व अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। कालांतर में जब छोटे राज्य समाप्त हो गए तब इस प्रक्रिया का औचित्य भी समाप्त हो गया। किन्तु ब्राह्मणवादी पोंगापंथियों ने अपने व अपने पोषक व्यापारियों के हितों की रक्षार्थ धर्म की संज्ञा से सजा कर शिव के जलाभिषेक के नाम पर 'कांवड़िया' प्रथा का सूत्रपात किया जो आज भी अपना तांडव जारी रखे हुये है। अफसोस की बात यह है कि पोंगापंथ का पर्दाफाश करने के बजाए 'नास्तिकवादी' विद्वान भी पोंगापंथ को ही बढ़ावा दे रहे हैं और सच्चाई का विरोध कर रहे हैं।

  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Thursday, March 3, 2011

वामदेव महादेवं लोकनाथं जगत गुरुम ------ विजय राजबली माथुर

हमारा भारत विश्व गुरु कहलाता था ,जैसा कि पिछली पोस्ट में स्पष्ट किया है कि शिव ही भारत है और भारत ही शिव.अतः शिव-स्तुति में 'वामदेव महादेवं लोकनाथं जगत गुरुम' कहने का आशय भारत -देश से ही है.लोकनाथं अर्थात जन- कल्याणकारी कारी हैं -शिव और यही भारत की संस्कृति रही है- जनोन्मुखी.वामदेव महादेव भी इसी सन्दर्भ में शिव को कहा गया है कि वह अवाम (जनता) का ख्याल रखने वाले हैं.भारत की नीतियां सदा से ही जनता की सार्व-भौमिकता वाली रही हैं.यही कारण रहा है कि विदेशी विद्वान भारत  खिंचे चले आते थे और यहाँ से ज्ञान बटोर कर स्वदेश लौटते थे.वेदों की आध्यात्मिक और रहस्यात्मक व्याख्या करने वाले विदेशी विद्वानों  में प्रो.मैक्समूलर ,प्रो.ग्रिफ्थ ,प्रो.विल्सन,प्रो.ग्रासमान,प्रो.लुड्विश,प्रो.ओल्डेन बर्ग,प्रो.लान्गलवा,डॉ.मैक्डानल,डॉ.कीथ,प्रो.आर.रोठ,प्रो.बाटलिक,प्रो.व्लूम फील्ड ,प्रो.लुई रेन ,प्रो.वाकर नोगल ,प्रो.बेवर ,प्रो.हिव्ट्नी,प्रो.केलंड,प्रो.इंग्लिश,प्रो.स्टेन कोनो,प्रो.हिल ब्रांट,प्रो.जे.गोंड आदि के नाम प्रमुख हैं.(यह विवरण पदमश्री डॉ.कपिल देव दिवेदी के लेख "वेद और विज्ञान" से लिया गया है).

प्रो.मैक्समूलर तो भारत में ३० वर्ष रहे -संस्कृत सीखी और यहाँ से मूल पांडुलिपिया भी लेकर जर्मनी चले गये.उनकी खोजों के आधार पर जर्मन वैज्ञानिकों ने एटम बम ईजाद किया जिन्हें अमेरिका तथा रूस ने जर्मनी की पराजय के बाद अपने-अपने देश में पनाह दी.उन्हीं के विश्लेषण के आधार पर महर्षि कार्ल मार्क्स ने जनोन्मुखी नीतियों का प्रतिपादन किया.मार्क्स देख रहे थे किस प्रकार मजदूरों का शोषण किया जा रहा है उनकी दुर्दशा का निदान कैसे हो ,ये सिद्धांत उन्होंने ब्रिटेन और जर्मनी की स्थितियों के मद्दे नजर बनाये थे.वह जर्मनी से स्व-निष्कासन के बाद इंग्लैण्ड में रह रहे थे.१९१७ की रूसी क्रान्ती लेनिन के नेतृत्त्व में मार्क्स के सिद्धांतों पर आधारित थी.

इधर भारत में १८७५ में महर्षि दयानंद सरस्वती ने सशस्त्र क्रान्ति की विफलता के बाद आर्य समाज की स्थापना स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य से की थी. १८८५ में ब्रिटिश सरकार ने आर्य -समाज आन्दोलन से भयभीत होकर अवकाश प्राप्त आई.सी.एस.एलेन आक्तावियन ह्युम की मार्फ़त वोमेश चन्द्र बनर्जी की अध्यक्षता में इन्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना इसलिए करवाई थी कि सरकार को जन-असंतोष की दिशा पता चलती रहे और वह बचाव करती रहे.महर्षि दयानंद ने आर्यसमाजियों को कांग्रेस में शामिल होकर स्वतंत्रता की मांग उठाने का निर्देश दिया. धीरे-धीरे कांग्रेस के मंच से आजादी की मांग होने लगी.अब ब्रिटिश सरकार ने १९०६ में मुस्लिम लीग की स्थापना ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को आगे करके की तथा कांग्रेस में दयानंद विरोधी नेताओं यथा पं.मदन मोहन मालवीय,लाला लाजपत राय आदि के द्वारा हिन्दू महासभा की स्थापना हुयी १९२० में.इसका मिलिटेंट संगठन आर.एस.एस.अस्तित्व में आया १९२५ में.इन दोनों नये राजनीतिक दलों ने देश के स्वतंत्रता आन्दोलन को क्षति पहुंचाई.कांग्रेस के भीतर आजादी के प्रबल पक्षधरों ने रूसी क्रान्ति से प्रभावित होकर २५ दिसंबर १९२५ को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन कानपुर में किया.चूंकि आर.एस.एस.ने आर्य समाज में भी घुसपैठ बना ली थी;अतः कम्युनिस्ट नेताओं ने पूरे तौर पर भारतीय दर्शन को छोड़ कर शुद्ध मार्क्सवाद को अपना लिया.जबकि नियम आर्य समाज से मिलते-जुलते हैं.'कर्तव्य-दर्पण'में आर्यसमाजियों को अपनी आमदनी का एक प्रतिशत अंश आर्य समाज को भेंट करने का प्राविधान रखा था उसे ज्यों का त्यों कम्युनिस्टों पर भी लागू किया गया.कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में एक प्रतिशत आय का अंशदान करने का प्राविधान रखा गया है.

सरदार भगत सिंह का परिवार आर्य समाजी था,'सत्यार्थ-प्रकाश' पढ़ते हुए उन्हें पूर्ण स्वाधीनता का जो जूनून चढ़ा तो वह क्रांतिकारी बन गये.उन्होंने एच.आर.ए.और भारत नौजवान सभा के माध्यम से क्रांतिकारियों को संगठित किया.भगत सिंह आदि भारत में बाम-आन्दोलन कारी थे.आज भारत का बाम-आन्दोलन यदि भटक रहा है तो उसका कारण ही सिर्फ यह है कि भारतीय बाम - दर्शन का ख्याल नहीं रखा गया है.हमारे बाम-देव-महादेव शिव के कल्याणकारी सिद्धांतों को अपना कर बाम-पन्थ भारत में रक्त-हीन क्रान्ति करने में सफल हो सकता है.बाम-पंथी आन्दोलन की सफलता ;कोटि-कोटि भारतीयों के जीवन को सुन्दर-सुखद -समृद्ध बनाने के लिए परमावश्यक है.
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24 फरवरी 2017 


Tuesday, March 1, 2011

"ॐ नमः शिवाय च ------ विजय राजबली माथुर

"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं.आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -"उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई."लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ?महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .


काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने  वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.


दुनिया लूटो,मक्कर से.
रोटी खाओ,घी-शक्कर से.
   एवं
अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .
फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.
आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते,स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही  लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.


जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े  कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.

यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैंतो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.
" ओ ३ म *नमः शिवाय च" कहने पर उसका मतलब यह होता है.:-
*अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति 
च अर्थात तथा/ एवं / और 
शिवाय -हितकारी,दुःख हारी ,सुख-स्वरूप 
नमः नमस्ते या प्रणाम या वंदना या नमन 


शिव-रात्रि पर ही मूल शंकर को बोद्ध  हुआ था और वह शिव अर्थात कल्याणकारी की खोज में निकल पड़े थे और आचार्य डॉ.रविदत्त शर्मा के शब्दों में उन्हें जो बोद्ध हुआ वह यह है :-


जिस में शिव का दर्शन हो,वही रात्रि है शिवरात्रि.
करे कल्याण जीवन का,वही रात्रि है शिवरात्रि..
कभी मन में विचार ही नहीं,शिव कौन है क्या है?
जो दिन में ही भटकते हैं;सुझाए  क्या उन्हें रात्रि..
शिव को खोजने वाला,फकत स्वामी दयानंद था.
उसी ने हमको बतलाया,कि होती क्या है शिवरात्रि..
शिव ईश्वर है जो संसार का कल्याण करता है.
आत्म कल्याण करने के लिए आती है शिवरात्रि..
धतूरा भांग खा कर भी,कहीं कल्याण होता है?
जो दुर्व्यसनों में खोये,उनको ठुकराती है शिवरात्रि..
सदियाँ ही नहीं युग बीत जायेंगे जो अब भी न संभले.
जीवन भर रहेगी रात्रि,न आयेगी शिवरात्रि..
आर्यों के लिए यह पर्व एक पैगाम देता है.
उपासक सच्चे शिव के बनने से होती है शिव रात्रि..
प्रकृति में लिप्त भक्तों  ,नेत्र  तो    खोलो.
ज्ञान के नेत्र से देखोगे,तो समझोगे शिवरात्रि..
ऋषि की बात मानो अब न भटको रहस्य को समझो.
यह तो बोद्ध रात्रि है,जिसे  कहते हो शिवरात्रि..


हम देखते हैं ,आज आर्य समाज को भी आर.एस.एस.ने जकड लिया है और वहां से भी 'आर्य'की बजाये विदेशियों द्वारा दिए गए नाम का उच्चारण होने लगा है.1875 में महर्षि स्वामी दयानंद ने (१८५७ की क्रांति में भाग लेने और उसकी विफलता से सबक के बाद)'आर्यसमाज'की स्थापना देश की आजादी के लिए की थी.कलकत्ता में कर्नल नार्थ ब्रुक से भेंट कर शीघ्र स्वाधीनता की कामना करने पर उसने रानी विक्टोरिया को लिखे पत्र में कहा-"दयानंद एक बागी फ़कीर है (Revolutionary Saint )"इलाहबाद हाई कोर्ट में उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया गया.महर्षि ने अपने जीवन काल में जितने भी आर्य समाजों की स्थापना की वे छावनियों वाले शहर थे.दादा भाई नौरोजी ने कहा है-"सर्व प्रथम स्वराज्य शब्द महर्षि दयानंद के "सत्यार्थ प्रकाश"में पढ़ा". 'कांग्रेस का इतिहास ' में डॉ.पट्टाभी सीता राम्माय्या ने लिखा है स्वतंत्रता आन्दोलन के समय जेल जाने वालों में ८५ प्रतिशत व्यक्ति आर्य समाजी होते थे.


आर्य समाज को क्षीण करने हेतु रिटायर्ड आई.सी.एस. जनाब ए.ओ.ह्युम की मार्फ़त वोमेश चन्द्र बेनर्जी के नेतृत्त्व में इन्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना सेफ्टी वाल्व के रूप में हुयी थी लेकिन दयान्द के इशारे पर आर्य समाजी इसमें प्रवेश करके स्वाधीनता की मांग करने लगे.


१९०५ में बंगाल का असफल विभाजन करने के बाद १९०६ में ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को मोहरा बना कर मुस्लिम लीग तथा १९२० में कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं (मदन मोहन मालवीय,लाला लाजपत राय आदि) को आगे कर हिन्दू महासभा का गठन फूट डालो और राज करो की नीति के तहत (ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दुर्नीति ) हुआ एवं एच.एम्.एस.के मिलिटेंट संगठन के रूप में आर.एस.एस.अस्तित्व में आया जो आज आर्य समाज को विचलित कर रहा है.नतीजा फिर से ढोंग-पाखंड को बढ़ावा मिल रहा है.
अब यदि देश को फिर गुलाम होने से बचाना है तो ढोंग-पाखंड को ठुकरा कर दयानंद के बताये मार्ग पर चलना ही होगा.'आर्याभी विनय ' के एक मन्त्र की व्याख्या करते हुए महर्षि लिखते हैं-"हे परमात्मन हमारे देश में कोई विदेशी शासक न हो आर्यों का विश्व में चक्रवर्त्ति साम्राज्य हो" (ये सम्पूर्ण तथ्य श्री रामावतार शर्मा द्वारा "निष्काम परिवर्तन "पत्रिका के मार्च १९९९ में लिखित लेख से लिए गए हैं)


इस शिव रात्रि पर लोग सही संकल्प ले सकें तो देश का भविष्य सुखद हो सकता है.वर्ना तो सर्वत्र ढोंग-पाखण्ड का प्रचार हो ही रहा है ,रसातल में जाने से कोई रोक नहीं सकता.
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24 फरवरी 2017