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Thursday, October 29, 2015

पार्वती , शिव : नेहा और दयानन्द --- विजय राजबली माथुर

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महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में शोध सहायक हैं : नेहा नरुका

 नेहा नरुका की कविता 'पार्वती योनि'


ऐसा क्या किया था शिव तुमने ?
रची थी कौन-सी लीला ? ? ?
जो इतना विख्यात हो गया तुम्हारा लिंग

माताएं बेटों के यश, धन व पुत्रादि के लिए
पतिव्रताएँ पति की लंबी उम्र के लिए
अच्छे घर-वर के लिए कुवाँरियाँ
पूजती है तुम्हारे लिंग को,

दूध-दही-गुड़-फल-मेवा वगैरह
अर्पित होता है तुम्हारे लिंग पर
रोली, चंदन, महावर से
आड़ी-तिरछी लकीरें काढ़कर,
सजाया जाता है उसे
फिर ढोक देकर बारंबार
गाती हैं आरती
उच्चारती हैं एक सौ आठ नाम

तुम्हारे लिंग को दूध से धोकर
माथे पर लगाती है टीका
जीभ पर रखकर
बड़े स्वाद से स्वीकार करती हैं
लिंग पर चढ़े हुए प्रसाद को

वे नहीं जानती कि यह
पार्वती की योनि में स्थित
तुम्हारा लिंग है,
वे इसे भगवान समझती हैं,
अवतारी मानती हैं,
तुम्हारा लिंग गर्व से इठलाता
समाया रहता है पार्वती योनि में,
और उससे बहता रहता है
दूध, दही और नैवेद्य...
जिसे लाँघना निषेध है
इसलिए वे औरतें
करतीं हैं आधी परिक्रमा

वे नहीं सोच पातीं
कि यदि लिंग का अर्थ
स्त्रीलिंग या पुल्लिंग दोनों है
तो इसका नाम पार्वती लिंग क्यों नहीं ?
और यदि लिंग केवल पुरूषांग है
तो फिर इसे पार्वती योनि भी
क्यों न कहा जाए ?

लिंगपूजकों ने
चूँकि नहीं पढ़ा ‘कुमारसंभव’
और पढ़ा तो ‘कामसूत्र’ भी नहीं होगा,
सच जानते ही कितना हैं?
हालांकि पढ़े-लिखे हैं

कुछ ने पढ़ी है केवल स्त्री-सुबोधिनी
वे अगर पढ़ते और जान पाते
कि कैसे धर्म, समाज और सत्ता
मिलकर दमन करते हैं योनि का,

अगर कहीं वेद-पुराणऔर इतिहास के
महान मोटे ग्रन्थों की सच्चाई!
औरत समझ जाए
तो फिर वे पूछ सकती हैं
संभोग के इस शास्त्रीय प्रतीक के-
स्त्री-पुरूष के समरस होने की मुद्रा के-
दो नाम नहीं हो सकते थे क्या?
वे पढ़ लेंगी
तो निश्चित ही पूछेंगी,
कि इस दृश्य को गढ़ने वाले
कलाकारों की जीभ
क्या पितृसमर्पित सम्राटों ने कटवा दी थी
क्या बदले में भेंट कर दी गईं थीं
लाखों अशर्फियां,
कि गूंगे हो गए शिल्पकार
और बता नहीं पाए
कि संभोग के इस प्रतीक में
एक और सहयोगी है
जिसे पार्वती योनि कहते हैं

(नेहा नरुका महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में शोध सहायक हैं.)
 —
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=10200676321340190&set=a.4103782722655.2166144.1525600017&type=3&theater






  ( यह व्याख्या तो तभी अस्तित्व में आ सकी जब ब्राह्मणवादी पोंगा-पंडितों ने पुरानों में वेदों की कु-व्याख्या प्रस्तुत की। इसी प्रकार पोंगा पंडितों ने कृष्ण को भी बदनाम करवाया है। जब तक पोंगापंडितवाद रहेगा ऐसी ही व्याख्याएँ सामने आएंगी ही। उत्तर है , नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है,लेकिन कोई स्वीकार करेगा भी या यों ही सब भटकते,गुमराह होते व गलत अर्थों के फेर में फंसे रहेंगे?)
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शिव अर्थात कल्याणकारी :

शिव-रात्रि पर ही मूल शंकर को बोद्ध  हुआ था और वह शिव अर्थात कल्याणकारी की खोज में निकल पड़े थे और आचार्य डॉ.रविदत्त शर्मा के शब्दों में उन्हें जो बोद्ध हुआ वह यह है :-

जिस में शिव का दर्शन हो,वही रात्रि है शिवरात्रि.
करे कल्याण जीवन का,वही रात्रि है शिवरात्रि..
कभी मन में विचार ही नहीं,शिव कौन है क्या है?
जो दिन में ही भटकते हैं;सुझाए  क्या उन्हें रात्रि..
शिव को खोजने वाला,फकत स्वामी दयानंद था.
उसी ने हमको बतलाया,कि होती क्या है शिवरात्रि..
शिव ईश्वर है जो संसार का कल्याण करता है.
आत्म कल्याण करने के लिए आती है शिवरात्रि..
धतूरा भांग खा कर भी,कहीं कल्याण होता है?
जो दुर्व्यसनों में खोये,उनको ठुकराती है शिवरात्रि..
सदियाँ ही नहीं युग बीत जायेंगे जो अब भी न संभले.
जीवन भर रहेगी रात्रि,न आयेगी शिवरात्रि..
आर्यों के लिए यह पर्व एक पैगाम देता है.
उपासक सच्चे शिव के बनने से होती है शिव रात्रि..
प्रकृति में लिप्त भक्तों  ,नेत्र  तो    खोलो.
ज्ञान के नेत्र से देखोगे,तो समझोगे शिवरात्रि..
ऋषि की बात मानो अब न भटको रहस्य को समझो.

यह तो बोद्ध रात्रि है,जिसे  कहते हो शिवरात्रि..

ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.

दुनिया लूटो,मक्कर से.
रोटी खाओ,घी-शक्कर से.
   एवं
अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .
फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.



'शैव' व 'वैष्णव' दृष्टिकोण की बात कुछ विद्वान उठाते हैं तो कुछ प्रत्यक्ष पोंगापंथ का समर्थन करते हैं तो कुछ 'नास्तिक' अप्रत्यक्ष रूप से पोंगापंथ को ही पुष्ट करते हैं। सार यह कि 'सत्य ' को साधारण जन के सामने न आने देना ही इनका लक्ष्य होता है। सावन या श्रावण मास में सोमवार के दिन 'शिव' पर जल चढ़ाने के नाम पर, शिव रात्रि पर भी तांडव करना और साधारण जनता का उत्पीड़न करना इन पोंगापंथियों का गोरख धंधा है। 
'परिक्रमा' क्या थी ?: 


वस्तुतः प्राचीन काल में जब छोटे छोटे नगर राज्य (CITY STATES) थे और वर्षा काल में साधारण जन 'कृषि कार्य' में व्यस्त होता था तब शासक की ओर से राज्य की सेना नगर राज्य के चारों ओर परिक्रमा (गश्त) किया करती थी और यह सम्पूर्ण वर्षा काल में चलने वाली निरंतर प्रक्रिया थी जिसका उद्देश्य दूसरे राज्य द्वारा अपने राज्य की व अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। कालांतर में जब छोटे राज्य समाप्त हो गए तब इस प्रक्रिया का औचित्य भी समाप्त हो गया। किन्तु ब्राह्मणवादी पोंगापंथियों ने अपने व अपने पोषक व्यापारियों के हितों की रक्षार्थ धर्म की संज्ञा से सजा कर शिव के जलाभिषेक के नाम पर 'कांवड़िया' प्रथा का सूत्रपात किया जो आज भी अपना तांडव जारी रखे हुये है। अफसोस की बात यह है कि पोंगापंथ का पर्दाफाश करने के बजाए 'नास्तिकवादी' विद्वान भी पोंगापंथ को ही बढ़ावा दे रहे हैं और सच्चाई का विरोध कर रहे हैं। 

यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैंतो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.

 " ओ ३ म नमः शिवाय च" कहने पर उसका मतलब यह होता है.:-*
*अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति 
च अर्थात तथा/ एवं / और 
शिवाय -हितकारी,दुःख हारी ,सुख-स्वरूप 

नमः नमस्ते या प्रणाम या वंदना या नमन 


"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.

भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ ?

 ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Saturday, March 21, 2015

विक्रमी संवत,आर्यसमाज और साम्यवाद --- विजय राजबली माथुर



 (आर्यसमाज की एक स्तुति-प्रार्थना )

1857 की क्रांति विफल होने पर 1875 मे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (विक्रमी संवत के प्रथम दिवस ) पर  महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा 'आर्यसमाज' की स्थापना जनता को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जाग्रत करने हेतु की गई थी और शुरू-शुरू मे इसके केंद्र छावनियों मे स्थापित किए गए थे। इसकी सफलता से भयभीत होकर रिटायर्ड ICS एलेन आक्टावियन हयूम (A .O. HUME) की सहायता से W.C.(वोमेश चंद्र) बनर्जी की अध्यक्षता मे इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना कराई गई जो प्रारम्भ मे ब्रिटिश साम्राज्य हेतु 'सेफ़्टी वाल्व' का काम करती थी। स्वामी दयानन्द के निर्देश पर आर्यसमाजियों ने राजनीतिक रूप से कांग्रेस मे प्रवेश करके इसे स्वाधीनता आंदोलन की ओर मोड दिया। खुद पट्टाभिसीता रमईय्या ने 'कांग्रेस का इतिहास' पुस्तक मे स्वीकार किया है कि स्वाधीनता आंदोलन मे जेल जाने वाले सत्याग्रहियों मे 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे। कांग्रेस के द्वारा आजादी की मांग करने पर 1906 मे मुस्लिम लीग और  1920 मे कुछ कांग्रेसी नेताओं को लेकर हिन्दू महासभा का गठन कांग्रेस को कमजोर करने हेतु ब्रिटिश साम्राज्य ने करवाया था। मुसलिम लीग की भांति हिन्दू महासभा शासकों के अनुकूल कार्य न कर पाई तब RSS का गठन 1925 मे करवाया गया जिसने विदेशी शासकों को खुश करने हेतु मुस्लिम लीग की तर्ज पर विद्वेष की आग को खूब भड़काया (जिसकी अंतिम परिणति देश विभाजन के रूप मे हुई)।

1925 मे ही राष्ट्र वादी कांग्रेसियों ने भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना स्वाधीनता आंदोलन को गति प्रदान करने हेतु की थी। किन्तु 1930 मे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना भारत मे कम्यूनिस्ट आंदोलन को रोकने हेतु करवा दी गई। लेनिन और बाद मे स्टालिन की सलाह को ठुकराते हुये उस समय के कम्यूनिस्ट नेताओं ने हू- ब-हू सोवियत रूस की तर्जपर पार्टी को चलाया जिसका परिणाम यह हुआ कि वे जनता की नब्ज पर अपनी उंगली न रख सके। सोवियत रूस मे भी 'धर्म' की अवधारणा के आभाव मे साम्यवाद का वह स्टाईल असफल हो गया और चीन मे भी जो चल रहा है वह मूल साम्यवाद नहीं है। हमारे देश मे अभी भी कुछ दक़ियानूसी विद्वान 'धर्म' और 'साम्यवाद' मे अंतर मानते हैं क्योंकि वे पुरोहितवाद को ही धर्म मानने की गलती छोडना नहीं चाहते । कुल मिला कर नुकसान शोषित-पीड़ित जनता का ही है। धर्म के नाम पर उसे मिलता है पोंगावाद जो उसके शोषण को ही मजबूत करता है। पाखंडी तरह तरह से जनता को ठगते हैं और जन-हितैषी कहलाने वाले कम्यूनिस्ट धर्म -विरोध के नाम पर अडिग रहने के कारण 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या बताने से परहेज करते हैं। 

'धर्म' के सम्बन्ध मे निरन्तर लोग लिखते और अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं परंतु मतैक्य नहीं है। ज़्यादातर लोग धर्म का मतलब किसी मंदिर,मस्जिद/मजार ,चर्च या गुरुद्वारा अथवा ऐसे ही दूसरे स्थानों  पर जाकर  उपासना करने से लेते हैं। इसी लिए इसके एंटी थीसिस वाले लोग 'धर्म' को अफीम और शोषण का उपक्रम घोषित करके विरोध करते हैं । दोनों दृष्टिकोण अज्ञान पर आधारित हैं। 'धर्म' है क्या? इसे समझने और बताने की ज़रूरत कोई नहीं समझता।

धर्म=शरीर को धारण करने के लिए जो आवश्यक है वह 'धर्म' है। यह व्यक्ति सापेक्ष है और सभी को हर समय एक ही तरीके से नहीं चलाया जा सकता। उदाहरणार्थ 'दही' जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है किसी सर्दी-जुकाम वाले व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता। ऐसे ही स्वास्थ्यवर्धक मूली भी ऐसे रोगी को नहीं दी जा सकती। क्योंकि यदि सर्दी-जुकाम वाले व्यक्ति को मूली और दही खिलाएँगे तो उसे निमोनिया हो जाएगा अतः उसके लिए सर्दी-जुकाम रहने तक दही और मूली का सेवन 'अधर्म' है। परंतु यही एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए 'धर्म' है।

मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध बनाने के लिए जो प्रक्रियाएं हैं वे सभी 'धर्म' हैं। लेकिन जिन प्रक्रियाओं से मानव जीवन को आघात पहुंचता है वे सभी 'अधर्म' हैं। देश,काल,परिस्थिति का विभेद किए बगैर सभी मानवों का कल्याण करने की भावना 'धर्म' है।

ऋग्वेद के इस मंत्र को देखें-


सर्वे भवनतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया :
सर्वे भद्राणि पशयनतु मा कश्चिद दु : ख भाग भवेत। ।


इस मंत्र मे क्या कहा गया है उसे इसके भावार्थ से समझ सकते हैं-


सबका भला करो भगवान ,सब पर दया करो भगवान।
सब पर कृपा करो भगवान,सब का सब विधि हो कल्याण। ।
हे ईश सब सुखी हों ,कोई न हो दुखारी।
सब हों निरोग भगवान,धन धान्य के भण्डारी। ।
सब भद्र भाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों।
दुखिया न कोई होवे,सृष्टि मे प्राण धारी । ।


ऋग्वेद का यह संदेश न केवल संसार के सभी मानवों अपितु सभी जीव धारियों के कल्याण की बात करता है। क्या यह 'धर्म' नहीं है?क्या इसकी आलोचना करके किसी वर्ग विशेष के हितसाधन की बात नहीं सोची जा रही है। जिन पुरोहितों ने धर्म की गलत व्याख्या प्रस्तुत की है उनकी आलोचना और विरोध करने के बजाये धर्म की आलोचना करके शोषित-उत्पीड़ित मानवों की उपेक्षा करने वालों (शोषकों ,उत्पीड़को) को ही लाभ पहुंचाने का उपक्रम है।


भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)।
 क्या इन तत्वों की भूमिका को मानव जीवन मे नकारा जा सकता है?और ये ही पाँच तत्व सृष्टि,पालन और संहार करते हैं जिस कारण इनही को GOD कहते हैं  ...

GOD=G(generator)+O(operator)+D(destroyer)।
खुदा=और चूंकि ये तत्व' खुद ' ही बने हैं इन्हे किसी प्राणी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं।

'भगवान=GOD=खुदा' - मानव ही नहीं जीव -मात्र के कल्याण के तत्व हैं न कि किसी जाति या वर्ग-विशेष के।

पोंगा-पंथी,ढ़ोंगी और संकीड़तावादी तत्व (विज्ञान और प्रगतिशीलता के नाम पर) 'धर्म' और 'भगवान' की आलोचना करके तथा पुरोहितवादी 'धर्म' और 'भगवान' की गलत व्याख्या करके मानव द्वारा मानव के शोषण को मजबूत कर रहे हैं। ऐसे तथा-कथित प्रगतिशीलों का मखौल सुधीश पचौरी जी ने 'हिंदुस्तान,लखनऊ,के 20 नवंबर 2011 के इस लेख मे उड़ाया है जिसका स्कैन आप नीचे  देख रहे हैं।:

'ज्योतिष'=वह विज्ञान जो मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध ' बनाने मे सहायक है। अखिल ब्रह्मांड मे असंख्य तारे,ग्रह और नक्षत्र हैं जिनसे निकलने वाला प्रकाश समस्त जीवधारियों तथा वनस्पतियों सभी को प्रभावित करता है। मानव जीवन पर इस प्रभाव का अध्यन करके लाभकारी स्थिति बताना 'ज्योतिषी' का कर्तव्य होता है और जो इस से हट कर गलत कार्य करता है वह ज्योतिषी नहीं है केवल उसी की आलोचना और विरोध होना चाहिए। परंतु प्रगतिशीलता के नाम पर ढ़ोंगी व्यक्ति का विरोध न करके ज्योतिष का विरोध करने का मतलब है 'मानव' को प्रकृति सुलभ ज्ञान से वंचित करना और यह भी उतना ही गलत और बुरा है जितना ज्योतिष के नाम पर ठगना।

'साम्यवाद'=समष्टिवाद है जिसमे व्यक्ति विशेष का नहीं समाज का सामूहिक कल्याण सोचा और किया जाता है। अतः साम्यवाद ही परम मानव-धर्म है। साम्यवाद के तत्व वेदों मे मौजूद हैं। ऋग्वेद के अंतिम सूक्त मे मंत्रों  द्वारा दिशा-निर्देश दिये गए हैं।

'सं ....... वसून्या भर' अर्थात-

हे प्रभों तुम शक्तिशाली हो बनाते सृष्टि को ।
वेद सब गाते तुम्हें हैं कीजिये धन वृष्टि को। ।

'संगच्छ्ध्व्म ....... उपासते' अर्थात-

प्रेम से मिल कर चलें बोलें सभी ज्ञानी बने।
पूर्वजो की भांति हम कर्तव्य के मानी बने। ।

'समानी मंत्र : ....... हविषा जुहोमि' अर्थात-


हो विचार समान सबके चित्त मन सब एक हो।
ज्ञान पाते हैं बराबर भोग्य पा सब नेक हों। ।

'समानी व आकूति: ..... सुसहासति'

हो सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा।
मन भरे हो प्रेम से जिससे बढ़े सुख संपदा। ।

कोई भी प्रगतिशीलता के नाम पर यदि उपरोक्त मानव-कल्याण के संदेशों की उपेक्षा करता है और उससे दूर रहने की बात करता है तो स्पष्ट है कि वह समष्टिवादी-साम्यवादी नहीं है। 'साम्यवाद' मूलतः भारतीय अवधारणा है जिसका उल्लेख सम्पूर्ण वेदिक साहित्य मे है। जर्मनी के मैक्स मूलर साहब भारत आए 30 वर्ष यहाँ रह कर संस्कृत का अध्यन करके 'मूल पांडुलिपियाँ' लेकर जर्मनी रवाना हो गए और वहाँ जाकर उनका जर्मनी भाषा मे अनुवाद प्रकाशित करवाया। 'परमाणु विज्ञान' पर जर्मनी मे ही खोज हुई थी और द्वितीय महायुद्ध मे जर्मनी की पराजय पर उसके वैज्ञानिकों को रूस एवं अमेरिका अपने-अपने देश ले गए थे जिनहोने उन देशों को 'परमाणु बम' उपलब्ध करवाए थे -यह अभी कुछ  वर्ष ही पुरानी बात है।

इसी प्रकार मानव कल्याण के तत्वों को सहेज कर 'मानव-विज्ञानी' महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'दास कैपिटल' 'एवं 'कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो' नामक ग्रंथ दिये। उस समय जर्मनी और इंग्लैंड के समाज मे जैसा धर्म प्रचलित था उसका तीव्र विरोध महर्षि  मार्क्स ने किया है जो बिलकुल वाजिब है । वस्तुतः वह धर्म था ही नहीं वह तो पुरोहितवाद था किन्तु लोग उसे धर्म कहते थे इसलिए मार्क्स ने भी उसे धर्म कह दिया। इसका यह मतलब नहीं है कि मार्क्स ने मानव-कल्याण हेतु प्रपादित 'धर्म' का विरोध किया है। दुर्भाग्य से अहंकार ग्रस्त नेता लोग मार्क्स के मर्म को न समझ कर शब्दजाल मे उलझाना चाहते और मनुष्य कल्याण की धर्म की भावना का सतत विरोध करके अंततः शोषकों का ही हितसाधन करते हैं। यह तो शोषकों की ही चाल है कि उन्होने ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा हेतु RSS को धर्म का अलमबरदार बना कर खड़ा कर दिया जो 'धर्म' पर ही प्रहार करके 'ढोंग व पाखंड' को धर्म के नाम पर परोसता है। प्रगतिशील तथा साम्यवादी चिंतकों का यह नैतिक दायित्व है कि वे 'धर्म' की वास्तविक अवधारणा से जनता को अवगत कराकर उन्हें शोषण और उत्पीड़न से बचाएं। किन्तु विज्ञान और प्रगतिशीलता का नाम लेकर वे धर्म का ही विरोध करते हैं और इस प्रकार पुरोहितवाद को संरक्षण प्रदान कर देते हैं। 

चूंकि मै सत्य को समझाने का प्रयास करता हूँ इसलिए कुछ बड़े विद्वान अपने अहम के कारण उसका विरोध करते हैं और प्रकारांतर से 'साम्यवाद' विरोधियों का ही पृष्ठ-पोषण करते हैं। पश्चिम बंगाल के ऐसे ही नेताओं के कारण 34 वर्ष का बामपंथी शासन समाप्त हो गया क्योंकि उन्होने 'पश्चिम बंगाल के बंधुओं से एक बेपर की उड़ान' की ओर ध्यान ही नहीं दिया। सी पी एम के लोग अपने व्यक्तिगत मामलों का ज्योतिषीय समाधान मुझ से करवाते हैं और अपने बड़े नेताओं को उकसा कर 'ज्योतिष' एवं 'धर्म' पर कटाक्ष भी करवाते हैं यह दोहरी नीति 'जनहित' की विरोधी है और साम्यवाद की अवधारणा से जनता को दूर करने वाली है। 
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Sunday, February 19, 2012

प्यासा -शिव ------ विजय राजबली माथुर

विगत नौ अक्तूबर 2011 को कैफी आज़मी एकेदेमी,निशात गंज,लखनऊ मे 'प्रगतिशील लेखक संघ' के 75 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर एक गोष्ठी मे बोलते हुये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अनजान ने लेखकों को 'प्यासा' फिल्म देखने का सुझाव दिया था और सवाल उठाया था कि आज उस प्रकार की फ़िलमे क्यों नहीं बन रही हैं?आज लेखक जन सरोकार के विषयों पर क्यों नहीं लिख रहे हैं?आज उत्तर प्रदेश के चौथे चरण के चुनाव मे अपने क्षेत्र लखनऊ उत्तर मे मतदान के बाद हमने इन्टरनेट पर 'प्यासा' फिल्म का अवलोकन किया(19 फरवरी 1957 को ही इसे सर्टिफिकेट जारी हुआ था )। मलीहाबाद क्षेत्र के हमारे प्रत्याशी कामरेड महेंद्र रावत के प्रचार अभियान के दौरान बहुत निकट से ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं को भी समझने का अवसर मिला था। सरकारी दावों ,बुद्धिजीवियों के विचारों और वास्तविकता मे काफी अंतर दीखने को मिला है।

गुरु दत्त साहब द्वारा लिखित,निर्देशित और अभिनीत फिल्म 'प्यासा' एक शायर को केन्द्रित करते हुये समाज मे फैले धनाडम्बर का पर्दाफाश करती है। धन लोलुपता के कारण भाई ही शायर भाई को घर छोडने पर मजबूर करते हैं। साथी उसकी गरीबी का उपहास  उड़ाते हैं।धनवान प्रकाशक उसकी मजबूरी का लाभ उठाते हैं। भाइयों द्वारा 10 आना पाने के लिए रद्दी मे बेचीं नज़मों को एक वेश्या ने रद्दी वाले से खरीद लिया और उसकी मौत की अफवाह के बाद अपना गहना बेच कर 'परछाइयाँ' शीर्षक से उन नज़मों को छपवाया। गरीब फेरी वाले ने उस शायर को पागलखाने से निकलवाया।

कामरेड अतुल अनजान ने गहन चिंतन-मनन के उपरांत ही प्रगतिशील लेखकों को 'प्यासा' फिल्म देखने का सुझाव दिया होगा। आज समाज मे उस स्तर के बुद्धिजीवी नहीं हैं सभी पैसों के पीछे भाग रहे हैं और जो ऐसा नहीं कर सकते वे उस शायर -'विजय' की ही भांति उपेक्षित और बदहाल हैं।

कल 'शिवरात्रि' है। 'शिव' विद्या और विज्ञान का प्रदाता स्वरूप है परमात्मा का। इसी दिन मूलशंकर तिवारी को बोद्ध-ज्ञान प्राप्त हुआ था और वह महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती बन सके। दुर्भाग्य की बात है कि हमारे साम्यवादी विद्वान पोंगापंथियों द्वारा घोषित धर्म के रूप को सच मान कर धर्म का विरोध करते हैं। जागरूक कामरेड कुलदीप सिंह पुनिया  ने सवाल उठाया है-



वामपंथी पार्टिओं का घटता जनाधार , क्या गौर किया है इस पर किसी भी दूकान ने ( मैं इन पार्टियों को दूकान ही कहता हूँ ) हम कामरेड है ;नास्तिक है क्योंकि कामरेड होने के लिए नास्तिक होना जरुरी होता है ना लेकिन भारत की परिस्थिति ऐसी है की यहाँ की 90 प्रतिशत जनता धर्म भीरु है . तो फिर हम कहाँ चीन या क्यूबा से कैडर निकाल कर लायेंगे क्या? धर्म या धार्मिक आस्था व्यक्तिगत प्रश्न है इसलिए आप किसी को कम्युनिष्ट बनाते ही उसे साथ ही नास्तिकता का पाठ पढाने लग जाते है ये सही है या गलत ..............जवाब चाहिए .

हमारे विद्वान बुद्धिजीवी जिनमे बामपंथी भी शामिल हैं 'धर्म' का अर्थ ही नहीं समझते और न ही समझना चाहते हैं। पुरोहितवादियो ने धर्म को आर्थिक शोषण के संरक्षण का आधार बना रखा है और इसीलिए बामपंथी पार्टियां धर्म का विरोध करती हैं। जब कि वह धर्म है ही नहीं जिसे बताया और उसका विरोध किया जाता है। धर्म का अर्थ समझाया है 'शिवरात्रि' पर बोध प्राप्त करने वाले मूलशंकर अर्थात दयानंद ने। उन्होने 'ढोंग-पाखंड' का प्रबल विरोध किया है उन्होने 'पाखंड खंडिनी पताका' पुस्तक द्वारा पोंगापंथ का पर्दाफाश किया है। 

दयानन्द ने आजादी के संघर्ष को गति देने हेतु1875 मे  'आर्यसमाज' की स्थापना की थी ,उसे विफल करने हेतु ब्रिटिश शासकों ने 1885 मे  कांग्रेस की स्थापना करवाई तो आर्यसमाँजी उसमे शामिल हो गए और आंदोलन को आजादी की दिशा मे चलवाया।1906 मे अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग स्थापित करवाकर देश मे एक वर्ग को आजादी के आंदोलन से पीछे हटाया। 1920 मे हिन्दू महासभा की स्थापना करवा कर दूसरे वर्ग को भी आजादी के आंदोलन से पीछे हटाने का विफल प्रयास किया। 1925 मे साम्राज्यवादी हितों के पोषण हेतु आर एस एस का गठन करवाया जिसने मुस्लिम लीग के समानान्तर सांप्रदायिकता को भड़काया और अंततः देश विभाजन हुआ। आर्यसमाज के आर  एस एस के नियंत्रण मे जाने के कारण राष्ट्रभक्त आर्यसमाजी जैसे स्वामी सहजानन्द ,गेंदा लाल दीक्षित,राहुल सांस्कृत्यायन आदि 1925 मे स्थापित 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी' मे शामिल हुये जिसका गठन आजादी के क्रांतिकारी आंदोलन को गति देने हेतु हुआ था। सरदार भगत सिंह,राम प्रसाद 'बिस्मिल' सरीखे युवक 'सत्यार्थ प्रकाश'पढ़ कर ही क्रांतिकारी कम्युनिस्ट बने थे। 

दुर्भाग्य से आज विद्वान कम्यूनिज़्म को धर्म विरोधी कहते हैं और कम्युनिस्ट भी इसी मे गर्व महसूस करते हैं। धर्म जिसका अर्थ 'धारण करने'से है को न मानने के कारण ही सोवियत रूस मे कम्यूनिज़्म विफल हुआ और चीन मे सेना के दम पर जो शासन चल रहा है वह कम्यूनिज़्म के सिद्धांतों पर नहीं है। 'कम्यूनिज़्म' एक भारतीय अवधारणा है और उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य मे ही सफलता मिल सकती है। अतः कामरेड कुलदीप की आशंका को निर्मूल नहीं ठहराया जा सकता है। 


'नास्तिक ' स्वामी विवेकानंद के अनुसार वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास नहीं है और 'आस्तिक' वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास है। लेकिन पोंगापंथी उल्टा पाठ सिखाते हैं। परंतु कम्युनिस्ट सीधी बात क्यों नहीं समझाते?यह वाजिब प्रश्न है। 

इस ब्लाग के माध्यम से समय-समय पर धर्म के संबंध मे विद्वानों के विचारों को प्रस्तुत किया है। ज्ञान-विज्ञान के प्रदाता 'शिव' की रात्री पर यदि विज्ञान सम्मत धर्म के आधार पर कम्यूनिज़्म को जनता को समझाने का संकल्प लिया जाये तो निश्चय ही भारत मे संसदीय लोकतन्त्र के माध्यम से कम्यूनिज़्म स्थापित हो सकता है। 
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24 फरवरी 2017 

Tuesday, March 1, 2011

"ॐ नमः शिवाय च ------ विजय राजबली माथुर

"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं.आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -"उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई."लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ?महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .


काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने  वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.


दुनिया लूटो,मक्कर से.
रोटी खाओ,घी-शक्कर से.
   एवं
अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .
फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.
आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते,स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही  लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.


जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े  कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.

यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैंतो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.
" ओ ३ म *नमः शिवाय च" कहने पर उसका मतलब यह होता है.:-
*अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति 
च अर्थात तथा/ एवं / और 
शिवाय -हितकारी,दुःख हारी ,सुख-स्वरूप 
नमः नमस्ते या प्रणाम या वंदना या नमन 


शिव-रात्रि पर ही मूल शंकर को बोद्ध  हुआ था और वह शिव अर्थात कल्याणकारी की खोज में निकल पड़े थे और आचार्य डॉ.रविदत्त शर्मा के शब्दों में उन्हें जो बोद्ध हुआ वह यह है :-


जिस में शिव का दर्शन हो,वही रात्रि है शिवरात्रि.
करे कल्याण जीवन का,वही रात्रि है शिवरात्रि..
कभी मन में विचार ही नहीं,शिव कौन है क्या है?
जो दिन में ही भटकते हैं;सुझाए  क्या उन्हें रात्रि..
शिव को खोजने वाला,फकत स्वामी दयानंद था.
उसी ने हमको बतलाया,कि होती क्या है शिवरात्रि..
शिव ईश्वर है जो संसार का कल्याण करता है.
आत्म कल्याण करने के लिए आती है शिवरात्रि..
धतूरा भांग खा कर भी,कहीं कल्याण होता है?
जो दुर्व्यसनों में खोये,उनको ठुकराती है शिवरात्रि..
सदियाँ ही नहीं युग बीत जायेंगे जो अब भी न संभले.
जीवन भर रहेगी रात्रि,न आयेगी शिवरात्रि..
आर्यों के लिए यह पर्व एक पैगाम देता है.
उपासक सच्चे शिव के बनने से होती है शिव रात्रि..
प्रकृति में लिप्त भक्तों  ,नेत्र  तो    खोलो.
ज्ञान के नेत्र से देखोगे,तो समझोगे शिवरात्रि..
ऋषि की बात मानो अब न भटको रहस्य को समझो.
यह तो बोद्ध रात्रि है,जिसे  कहते हो शिवरात्रि..


हम देखते हैं ,आज आर्य समाज को भी आर.एस.एस.ने जकड लिया है और वहां से भी 'आर्य'की बजाये विदेशियों द्वारा दिए गए नाम का उच्चारण होने लगा है.1875 में महर्षि स्वामी दयानंद ने (१८५७ की क्रांति में भाग लेने और उसकी विफलता से सबक के बाद)'आर्यसमाज'की स्थापना देश की आजादी के लिए की थी.कलकत्ता में कर्नल नार्थ ब्रुक से भेंट कर शीघ्र स्वाधीनता की कामना करने पर उसने रानी विक्टोरिया को लिखे पत्र में कहा-"दयानंद एक बागी फ़कीर है (Revolutionary Saint )"इलाहबाद हाई कोर्ट में उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया गया.महर्षि ने अपने जीवन काल में जितने भी आर्य समाजों की स्थापना की वे छावनियों वाले शहर थे.दादा भाई नौरोजी ने कहा है-"सर्व प्रथम स्वराज्य शब्द महर्षि दयानंद के "सत्यार्थ प्रकाश"में पढ़ा". 'कांग्रेस का इतिहास ' में डॉ.पट्टाभी सीता राम्माय्या ने लिखा है स्वतंत्रता आन्दोलन के समय जेल जाने वालों में ८५ प्रतिशत व्यक्ति आर्य समाजी होते थे.


आर्य समाज को क्षीण करने हेतु रिटायर्ड आई.सी.एस. जनाब ए.ओ.ह्युम की मार्फ़त वोमेश चन्द्र बेनर्जी के नेतृत्त्व में इन्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना सेफ्टी वाल्व के रूप में हुयी थी लेकिन दयान्द के इशारे पर आर्य समाजी इसमें प्रवेश करके स्वाधीनता की मांग करने लगे.


१९०५ में बंगाल का असफल विभाजन करने के बाद १९०६ में ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को मोहरा बना कर मुस्लिम लीग तथा १९२० में कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं (मदन मोहन मालवीय,लाला लाजपत राय आदि) को आगे कर हिन्दू महासभा का गठन फूट डालो और राज करो की नीति के तहत (ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दुर्नीति ) हुआ एवं एच.एम्.एस.के मिलिटेंट संगठन के रूप में आर.एस.एस.अस्तित्व में आया जो आज आर्य समाज को विचलित कर रहा है.नतीजा फिर से ढोंग-पाखंड को बढ़ावा मिल रहा है.
अब यदि देश को फिर गुलाम होने से बचाना है तो ढोंग-पाखंड को ठुकरा कर दयानंद के बताये मार्ग पर चलना ही होगा.'आर्याभी विनय ' के एक मन्त्र की व्याख्या करते हुए महर्षि लिखते हैं-"हे परमात्मन हमारे देश में कोई विदेशी शासक न हो आर्यों का विश्व में चक्रवर्त्ति साम्राज्य हो" (ये सम्पूर्ण तथ्य श्री रामावतार शर्मा द्वारा "निष्काम परिवर्तन "पत्रिका के मार्च १९९९ में लिखित लेख से लिए गए हैं)


इस शिव रात्रि पर लोग सही संकल्प ले सकें तो देश का भविष्य सुखद हो सकता है.वर्ना तो सर्वत्र ढोंग-पाखण्ड का प्रचार हो ही रहा है ,रसातल में जाने से कोई रोक नहीं सकता.
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24 फरवरी 2017