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Saturday, September 26, 2026

सदमे में लोकतंत्र / असहमत होने का ड्रामा -------- Usrar Belous / Keshaw Bhatter's Post



क्या विवेक जोशी गोगोई की तरह देश को भ्रमित कर मुख्य चुनाव आयुक्त पद पर स्थापित होना चाहते है ?
गोगोई ने मोदी से मिल कर सरकार से असहमत होने का ड्रामा करते हुवे..
सरकार पर अविश्वास जताकर प्रेस कान्फ्रेंस मे सरकार पर न्याय पालिका मे हस्तक्षेप करने , दबाव डालने का आरोप लगा कर इतिहास मे पहेली बार इस तरह का विरोध किया था..
इस प्रेस कान्फ्रेंस के माध्यम से जनसमर्थन और अंदर से मोदी का समर्थन लेते हुवे चीफ जस्टिस के पद पर स्थापित होने का ड्रामा रचा था..
क्यो की सुप्रीम कोर्ट के जज की नियुक्ती कालेजियम के माध्यम से सरकार के हस्तक्षेप के साथ ही होती आ रही है..
सरकार चाहती तो गोगोई को चीफ जस्टिस बनने ही नही देती..
मोदी वैसे भी प्रतिशोध , बदला लेने मे विश्व प्रसिद्ध माने जाते है..
फिर भी गोगोई देश के चीफ जस्टिस बनाए गए और लगभग सभी फैसले सरकार और सरकार समर्थक गुंडो अपराधियो के पक्ष मे दिये..
क्या विवेक जोशी को इसी ड्रामेबाजी के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया जाना है..
ता के देश की जनता मे ऐसा मँसेज जाए मानो ग्यानेश कुमार को सजा दे दी गई हो और देश की जनता ग्यानेश कुमार द्वारा किये गए सरकार के सभी अपराध भूल कर नये चुनाव आयुक्त से लोकतंत्र की बहाली की अपेक्षा करने लगे ?
ग्यानेश कुमार के खिलाफ आजीवन मतलब रिटायर होकर जिंदा रहेने तक कोई कानूनी कारवाई हो नही सकती ऐसा कानून बनाया जा चुका है..
ये कानून हर केंद्रीय चुनाव आयुक्त के लिये है..
इस से नये चुनाव आयुक्त को भी सरकार इस्तेमाल कर सकेंगी..
देश की जनता संसद मे बहुमत के बगैर भी ग्यानेश कुमार से मुक्त हो सकती थी..
देश के आसपास जो हुवा ऊस से जनता ने कोई सबक नही सिखा ..
क्यो की देश की जनता की कलाईयो मे ताकत नही है , हिम्मत नही है..
देश की बहुसंख्यक जनता मे हिम्मत , ताकत , धैर्य , स्वाभिमान हजारो साल से है ही नही वर्ना ग्यानेश कुमार से मुक्त होने के पहेले देश की जनता हजारो साल की वर्ण व्यवस्था से मुक्त हो जाती..
कुल मिलाकर सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मिले हुवे है.
वर्ना श्रीलंका , नेपाल , बांग्लादेश कब का हो चुका होता..
(आगे पढना हो तो जारी रखे या पोस्ट को छोड दे)
हजारो साल के शुद्र गुलाम सरकार से तभी नाराज होते है जब RSS ..
* जय प्रकाश नारायण अर्थात JP के साथ मिल कर सरकार को अप्रिय करे..
* जब RSS अन्ना हजारे के साथ मिलकर मनमोहन सरकार को अप्रिय करे.
* RSS ने ओबीसी वर्ग को वि पी सिंग सरकार के द्वारा दिये भयानक आँफर वाले 'मंडल आरक्षण' के खिलाफ ओबीसी वर्ग खडा कर दिया था..
पुरे देश के ओबीसी वर्ग ने RSS और RSS के विद्यार्थी संगठन ABVP के साथ मिल कर , कंधे से कंधा लगा कर खुद को मिले 'मंडल आरक्षण' के खिलाफ तांडव मचाया था..
और खुद को मिले भयानक दे दनादन आरक्षण को अदालत की समिक्षा के लिये भिजवाना पडा था..
देश का कुल 65% ओबीसी मंडल आरक्षण देने वाले 'विश्वनाथ प्रताप सिंग और ऊनकी सरकार से इतनी नफरत कर रहा था के भारत के इतिहास मे इस का ऊदाहरण देना कठीन है'
पाकिस्तान और मुसलमान के नाम से अन्य मौको पर देश को भ्रमित कर लिया जाता है..
ऐसी हजारो साल की गुलाम जनता क्या श्रीलंका , नेपाल और बांग्लादेश करेंगी..?
नेपाल जैसा होने डर से नकली वर्दी वाली और बिना वर्दी वाली जो प्रायवेट सेना बनाई गई है..
ऊस मे भी हजारो साल के गुलाम ही भरे पडे है..
विपक्ष ने अब तक नही पुछा के क्या ये लोग पुलवामा , पहेलगाम भी आते जाते है ?
ये संयोग या प्रयोग का शब्द हर विध्वंस की टाईमिंग के बाद इस्तेमाल होता है ऊस की हकीकत क्या है ?
कुल मिला कर ये साबित किया जा सकता है के देश के सेक्युलर ढांचे , लोकतंत्र को बचाने के लिये देश की जनता कभी क्रांती वगैरह नही करेंगी..
वर्णद्वेषी मनुस्मृति वाले चाहे तो देश मे हर साल विद्रोह हो सकता है ..
ये रोस्टर पध्दती के दंगे क्या है अघोषित विद्रोह और भ्रम फैलाना है..







खतरनाक मोड़: संवैधानिक संस्थाएं, हितों का टकराव और सदमे में लोकतंत्र
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देश के सर्वोच्च कानूनी और प्रशासनिक गलियारों से जो खबरें और तथ्य सामने आए हैं,वे पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए निहायत ही चिंताजनक है। 
LiveLaw और The Indian Express की रिपोर्टों के माध्यम से ऐसे घटनाक्रम एक साथ सामने आए हैं, जो जनता के मन में सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग- सर्वोच्च संवैधानिक संस्थाएं - की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं। 
सामने आया है कि सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ जज के पुत्र मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के आधिकारिक वकील हैं। चिंता की बात यह है कि 'वही जज' सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े अति-महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ में शामिल रहे हैं। यह हितों के टकराव (Conflict of Interest) का संकट है। 
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के विवादित कानून को चुनौती देने वाली याचिका, जिस पर तुरंत निर्णय होना चाहिए था, अब अनिश्चितकाल के लिए टल गई है।
नोएडा की तत्कालीन डीएम (जो मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी हैं) द्वारा एक छात्र पर एनएसए (NSA) के मनमाने इस्तेमाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फटकार लगाते हुए कड़ा जुर्माना लगाया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पीठ ('वही जज') ने इस पर तुरंत रोक लगा दी। 'खास' के लिए त्वरित राहत और 'आम' के लिया दर-दर की ठोकरें ! डीएम मेधा रूपम का मामला जिस विषय से संबंधित था, वह नियमित रोस्टर के तहत जस्टिस शर्मा ('वही जज') की पीठ के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था। इसके अलावा, इसी से जुड़े मामले पर पहले से ही जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ सुनवाई कर रही थी। ऐसे में इस मामले का विशेष रूप से जस्टिस शर्मा की पीठ को सौंपा जाना अपने आप में संदेह पैदा करता है।   
सोचने वाली बात (Food for Thought) यह है कि - 
कानून का एक सदियों पुराना और सर्वमान्य सिद्धांत है - "न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए" - जब किसी न्यायाधीश के परिवार के सदस्य का करियर या व्यावसायिक हित किसी सरकारी संस्था (जैसे चुनाव आयोग) से जुड़ा हो, तो क्या आम नागरिक उस संस्था के खिलाफ अदालत से पूरी तरह निष्पक्ष फैसले की उम्मीद कर सकता है ? जब सुप्रीम कोर्ट के ही वरिष्ठ जस्टिस दीपांकर दत्ता सार्वजनिक रूप से यह कहें कि 'चुनाव आयोग को केवल स्वतंत्र होना ही नहीं चाहिए, बल्कि स्वतंत्र दिखना भी चाहिए', तो समझना होगा कि संविधान कितना भी अच्छा हो, यदि उसे चलाने वाले निष्पक्ष न हों तो वह विफल हो जाता है। वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि नियम-कानूनों की भावना को ताक पर रखकर केवल कानूनी छिद्रों का सहारा लिया जा रहा है, जिससे संस्थागत मर्यादाएं टूट रही हैं।
तो हमें किस बात पर विचार करना चाहिए ?
(01) ❓-लोकतंत्र किसी इमारत से नहीं, बल्कि संस्थाओं पर जनता के भरोसे से चलता है। अगर आम नागरिक का अदालत और चुनाव आयोग की निष्पक्षता से विश्वास उठ गया, तो लोकतंत्र का आधार ही हिल जाएगा। (02) ❓-चुनाव कराने वाली संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी न हो और उस पर न्यायिक निगरानी भी कमजोर पड़ जाए, तो चुनाव केवल एक ढकोसला बनकर रह जाएंगे और देश में महज नियंत्रित लोकतंत्र (Managed Democracy) रह जाएगा।  (03)-❓ जब कड़े प्रशासनिक फैसलों (जैसे NSA के दुरुपयोग) पर भी अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तो आम नागरिक के संवैधानिक मौलिक अधिकारों की रक्षा कौन करेगा? क्या यह जवाबदेही के अंत की घोषणा है। 
आप क्या सोच रहें हैं ?
यह मामला किसी एक पार्टी, नेता, अफसर या जज का नहीं है। एक आम नागरिक या छात्र जब अपने अधिकारों के लिए लड़ता है तो उस पर NSA जैसे कठोर कानून थोप दिए जाते हैं, लेकिन जब प्रशासनिक या संवैधानिक पदों पर बैठे शक्तिशाली अधिकारियों या उनके परिजनों की बात आती है, तो पूरी व्यवस्था तुरंत राहत देने और जवाबदेही टालने की दिशा में काम करती दिखती है। इससे समाज में आम आदमी का न्याय व्यवस्था पर से विश्वास कम होता है।यह देश के संवैधानिक संतुलन (Checks and Balances) का मामला है। क्या संवैधानिक संस्थाओं को अदृश्य ताकतवर हाथ नियंत्रित कर रहें हैं ? क्या तराजू बेपर्दा होकर सत्ता की तरफ झुकती दिख रही है ? क्या न्यायपालिका को अपने भीतर 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) को लेकर सख्त और पारदर्शी नियम लागू नहीं करने चाहिए ? क्या ऐसे मामलों में न्यायाधीशों को स्वेच्छा से सुनवाई से अलग (Recuse) नहीं हो जाना चाहिए ?
इन रिपोर्टों का संयुक्त निष्कर्ष यह चेतावनी देता है कि भारत "संस्थागत निष्पक्षता के संकट" से गुजर रहा है। देश एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है जहाँ संवैधानिक संस्थाएं स्वायत्त दिखने के बजाय सत्ता के अनुकूल या सत्ता से प्रभावित दिख रही हैं। सवाल यह भी उठता है कि क्या नियम और प्रक्रियाएं सबके लिए समान रूप से काम कर रही हैं ? क्या आम नागरिक के संवैधानिक हित सर्वोपरि सूची में हैं, सुरक्षित हैं ?
समय रहते न्यायपालिका ने अपने भीतर 'हितों के टकराव' के कड़े मानक लागू नहीं किए, और निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता बहाल नहीं की, तो लोकतंत्र का आंतरिक ढांचा खोखला होता चला जाएगा।






  ~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, September 16, 2017

राजनीतिक विकल्प क्या और कैसा ? ------ विजय राजबली माथुर





यह भारत के लिए विडम्बना ही है कि, वामपंथ की सबसे पुरानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जब प्रथम आम चुनावों के जरिये ही लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में सामने आ गई थी और बाद में केरल में चुनाव के जरिये ही सत्ता में भी आ गई थी तब ' यह आज़ादी झूठी है .....' का नारा लगा कर तेलंगाना में सशस्त्र आंदोलन चला दिया गया। इसे कुचलने के लिए विनोबा भावे के नेतृत्व में 'भूदान ' आंदोलन खड़ा किया गया और कम्युनिस्टो का पुलिसिया दमन भी किया गया। 1964 में एक तबका CPM का गठन करके अलग होगया जिसके शीर्ष नेताओं बी टी रणदिवे और ए के गोपालन का कहना था कि, हम संविधान में घुस कर संविधान को तोड़ देंगे(उनकी इस उक्ति पर मोदी सरकार तन्मयता से आगे बढ़ रही है )।  लेकिन बंगाल में 35 वर्ष के शासन में इस पार्टी को वहाँ ' बंगाली पार्टी ' के रूप में समर्थन मिलने के कारण और ब्राह्मण वादी प्रभुत्व के चलते यह पाखंड तक को नहीं तोड़ पाई और इसके शासन में भी सारे आडंबर बदस्तूर चलते रहे । पुनः 1967 में नक्सल बाड़ी आंदोलन के रूप में यह भी विभाजित हो गई थी और आज वामपंथ की स्थिति केले के तने की परतों की तरह विभिन्न अलग - अलग पार्टियों के रूप में सहजता से देखी जा सकती है। जब कारपोरेट के एक तबके से इसने सम्झौता किया तब कारपोरेट के दूसरे तबकों ने मिल कर इसे सत्ता से बेदखल करने में सफलता प्राप्त कर ली है। 
आज CPM ममता बनर्जी से उसी प्रकार की एलर्जी रख रही है जैसी मायावती  मुलायम सिंह से रखती रही हैं। लेकिन कम्युनिस्टों को बंगाल की खाड़ी में फेंकने का 2011 में ऐलान करने वाले राहुल गांधी की पार्टी से 2016 में सम्झौता करके जोरदार पटकनी खा ली लेकिन फासिस्ट / सांप्रदायिक भाजपा को टक्कर देने के लिए अब भी ममता बनर्जी से हाथ मिलाने को तैयार नहीं हैं । 27 अगस्त 2017 की पटना  रैली में ममता बनर्जी की उपस्थिती के कारण ही CPM ने भाग नहीं लिया और CPIML के महासचिव भी नहीं पहुंचे। 
सोनिया कांग्रेस के पी एम रहे मनमोहन सिंह जी को जब 2012 में राष्ट्रपति बनाने ( और प्रणव मुखर्जी को पी एम ) की चर्चा चली तब उनके द्वारा तीसरी बार भी पी एम बनने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की गई और आश्वासन न मिल पाने पर 2011 में हज़ारे, केजरीवाल,रामदेव आदि के माध्यम से सोनिया कांग्रेस विरोधी आंदोलन खड़ा करा दिया गया ( वह भी तब जबकि वह USAमें इलाज कराने गईं हुईं थीं। ) जिसकी परिणति वर्तमान मोदी सरकार है। 
राहुल गांधी द्वारा मोदी विरोधी मुहिम शुरू करने पर तमाम लोग कयास लगाने लगे हैं कि, वह भावी पी एम पद के दावेदार हैं क्योंकि वे इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि, न ही राहुल और न ही प्रियंका कभी पी एम पद के लिए दावेदार बनेंगे क्योंकि उन पर उनकी ननसाल का दबाव है कि, वे यह पद न लें। वरना 2004 में सोनिया जी ही पी एम न बन जातीं और मोदी के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाले मनमोहन जी सामने आ ही नहीं पाते। 
शरद यादव ने ' साझी विरासत ' अभियान तो ज़रूर छेड़ा है और वह किसी 
इल्जाम से भी नहीं घिरे हैं उनमें विभिन्न नेताओं और दलों को एकजुट करने की क्षमता भी है किन्तु उनके पी एम पद को जन - समर्थन नहीं मिल पाएगा। यदि वास्तव में मोदी और उनकी पार्टी को चुनावों में  जन - समर्थन से परास्त करना है तो इस  हेतु सम्पूर्ण वामपंथ समेत सभी वर्तमान विपक्षी दलों को संयुक्त रूप से ममता बनर्जी को नेतृत्व देना चाहिए अन्यथा सारी कवायद बेकार हो जाएगी और फासिस्ट और ज़्यादा शक्तिशाली होकर सत्ता में वापिस आ जाएँगे। तब उनके विरुद्ध एकमात्र सशस्त्र संघर्ष ही विकल्प बचेगा जैसी कि , आशंका   'नया जमाना ' , सहारनपुर के संस्थापक संपादक कन्हैया लाल मिश्र ' प्रभाकर ' ने 1951 में आर एस एस प्रचारक लिम्ये साहब का साक्षात्कार लेते हुये उनसे व्यक्त की थी। 
सशस्त्र संघर्ष के जरिये फासिस्टों को सत्ताच्युत करने पर जो सत्ता स्थापित होगी वह भी जन - तांत्रिक नहीं होगी। अतः वर्तमान संविधान व जनतंत्र की रक्षा का तक़ाज़ा है कि, संसदीय लोकतन्त्र समर्थक वामपंथी अन्य सभी विपक्षी दलों के साथ आंतरिक एकता स्थापित करने से पीछे न छूटें। जो दल और व्यक्ति डॉ अंबेडकर का अनुयाई होने का और उनके संविधान निर्माता होने का दावा करते हैं उनका सर्वाधिक दायित्व बनता है कि, वे तमाम अन्य दलों को भाजपा के विरुद्ध लामबंद करने में अपने कर्तव्य का पालन करें तभी डॉ अंबेडकर के संविधान की रक्षा हो सकेगी। 












~विजय राजबली माथुर ©

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