Thursday, January 23, 2014

सोनिया जी के राजनीतिक कदम क्या हो सकते हैं?---विजय राजबली माथुर

प्रस्तुत हैं 29 मई 2013 और 06 जनवरी 2014 को प्रकाशित  आशुतोष गुप्ता जी के दो आलेख :




जहां मई 2013 के लेख द्वारा आशुतोष जी चेतावनी दे रहे थे कि सोनिया जी के राजनीतिक आंकलन को कम आँकने की गलती न की जाये वहीं सात माह बाद वह खुद उनकी पार्टी को चुनौती देने वाली आ आ पा में शामिल हो गए हैं और अब कह रहे हैं कि यह नई पार्टी सोनिया जी की कांग्रेस के लिए खतरा है क्योंकि "विचार के मामले में यह उसी तरह की पार्टी है। "

2004 में जब इंका के अंदर से सोनिया जी को पी एम बनाए जाने की मांग उठ रही थी और जब उनके विदेशी मूल का होने के कारण तीव्र विरोध भी हो रहा था तब भी उनका इरादा खुद पी एम बनने का था ही नहीं क्योंकि उनके अपने मायके के रिशतेदारों का दबाव उन पर यह दायित्व न लेने का था और आज भी वहीं से राहुल अथवा प्रियंका को यह दायित्व न सौंपने का दबाव है। 

पी एम मनमोहन सिंह जी को 2004 में इसी वजह से मौका मिला था लेकिन 2009 में वह अपनी तिकड़म से दोबारा पी एम बनने में कामयाब हुये थे जबकि इस बार प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बनाया जाना था बीच में भी बदलाव की कोशिशें हुईं किन्तु मनमोहन जी अड़े रहे और सोनिया जी के विदेश इलाज पर जाने के दौरान अपने प्रिय केजरीवाल के जरिये हज़ारे आंदोलन खड़ा करवा दिया जिसकी उपज आ आ पा है। चूंकि अब तीसरी बार स्वास्थ्यगत एवं अलोकप्रियता के कारणों से खुद मनमोहन सिंह जी पी एम नहीं बन सकते तो विकल्प के रूप में अरविंद केजरीवाल को खड़ा करा दिया है जिनको RSS का आंतरिक आशीर्वाद भी हासिल है ।RSS को भी दीख रहा था कि जिस मोदी को वह आगे करके चल रहा है वह बेहद अलोकप्रिय हैं क्योंकि उन पर 2002 के दंगों व जन-संहार के दाग लगे हैं इसलिए खुल कर मोदी का नाम और अंदर से केजरीवाल का समर्थन करना ही RSS की रण-नीति है जिससे भाजपा/RSS विरोधी मतदाता भी भ्रमवश कांग्रेस से रुष्ट होने के कारण आ आ पा व केजरीवाल का समर्थन कर दे। फिलहाल अभी तो संघ अपने इस अभियान में पूर्ण रूप से सफल है क्योंकि कुछ बड़े कम्युनिस्ट नेता भी आ आ पा/केजरीवाल का समर्थन करने लगे हैं। छोटे  लालची कम्युनिस्ट नेता तो केजरी भीड़ में शामिल होकर मंत्री बनने के भी स्वप्न देखने लगे हैं। यदि यही हाल रहा तो जैसे RSS ने 1980 में इंदिराजी व 1984 में राजीव जी का समर्थन किया था उसी प्रकार 2014 में अरविंद केजरीवाल का समर्थन करेगा। इस प्रक्रिया में रहा सहा कम्युनिस्ट आंदोलन बुरी तरह तबाह हो जाएगा। तानाशाही प्रवृति के केजरीवाल संघ के अत्यधिक अनुकूल रहेंगे। 

जैसा कि आशुतोष जी ने मई 2013 में लिखा था कि क्या तीसरी बार भी सोनिया जी को कम आँकने की गलती की जाएगी? सोनिया जी इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी जबकि उनके बनाए वर्तमान पी एम साहब भी उनके विरोधियों को ताकतवर बनाते जा रहे हैं RSS के मंसूबों को ध्वस्त करके मोदी/केजरीवाल को अगला पी एम बनने से रोक सकती हैं यदि  आगामी लोकसभा चुनावों के दौरान जिन  दो महिलाओं के सितारे बुलंद रहेंगे उनको सोनिया जी समर्थन देकर आगे कर दें । ममता जी अलग पार्टी में हैं उनसे उनकी पार्टी सहयोग कर और ले सकती है। लेकिन रेखा जी मनोनीत सांसद हैं उनसे पूरा-पूरा सहयोग उनकी पार्टी ले सकती है। यदि  रेखा जी को आगे किया जाता  हैं तो तमिलनाडू में उनको वैसा ही समर्थन मिल सकता है जैसा आंध्र में नरसिंघाराव जी को मिला था। उत्तर भारत में भी केजरीवाल के प्रति युवा वर्ग का रुझान  अपनी तरफ मोडने में उनको  सफलता मिल जाएगी ।

अपने पूर्व विश्लेषण के  दो लिंक प्रस्तुत  कर रहा हूँ जिनमें  दूसरे लिंक  से स्पष्ट होता है कि वह सत्य सिद्ध हो चुका है - जब 19 अप्रैल 2012 को रेखा जी वाला विश्लेषण दिया था और 26 को रेखा जी सांसद मनोनीत हो गईं थीं ।  :
  • "अखबारी विश्लेषण से अलग मेरा विश्लेषण यह है कि जन्म के बाद ममता जी की 'चंद्र महादशा' 07 वर्ष 08 आठ माह एवं 07 दिन शेष बची थी। इसके अनुसार 03 जूलाई 2010 से वह 'शनि'महादशांतर्गत 'शुक्र' की अंतर्दशा मे 03 सितंबर 2013 तक चलेंगी। यह उनका श्रेष्ठत्तम समय है। इसी मे वह मुख्य मंत्री बनी हैं। 34 वर्ष के मजबूत बामपंथी शासन को उखाड़ने मे वह सफल रही हैं तो यह उनके अपने ग्रह-नक्षत्रों का ही स्पष्ट प्रभाव है।
    इसके बाद पुनः 'सूर्य' की शनि मे अंतर्दशा 15 अगस्त 2014 तक उनके लिए अनुकूल रहने वाली है और लोकसभा के चुनाव इसी अवधि के मध्य होंगे। केंद्र (दशम भाव मे )'शनि' उनको 'शश योग' प्रदान कर रहा है जो 'राज योग' है।"
    http://krantiswar.blogspot.in/2013/08/blog-post.html
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    ."राज्येश'बुध' की महादशा मे 12 अगस्त 2010 से 23 फरवरी 2017 तक की अंतर्दशाये भाग्योदय कारक,अनुकूल सुखदायक और उन्नति प्रदान करने वाली हैं। 24 फरवरी 2017 से 29 जून 2017 तक बुध मे 'सूर्य' की अंतर्दशा रहेगी जो लाभदायक राज्योन्नति प्रदान करने वाली होगी।"
    अभी तक रेखा के किसी भी राजनीतिक रुझान की कोई जानकारी किसी भी माध्यम से प्रकाश मे नहीं आई है ,किन्तु उनकी कुंडली मे प्रबल राज्य-योग हैं। जब ग्रहों के दूसरे परिणाम चरितार्थ हुये हैं तो निश्चित रूप से इस राज्य-योग का भी लाभ मिलना ही चाहिए।
    http://krantiswar.blogspot.in/2012/04/blog-post_19.html 
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 ~विजय राजबली माथुर ©
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Sunday, January 19, 2014

वास्तविकता से मुंह मोड़ना है -'राजनीति' और 'राजनीतिज्ञों' पर प्रहार---विजय राजबली माथुर

  

आज जब अराजनीति की घोषणा करते करते आ आ पा (AAP) दिल्ली विधानसभा के जरिये सरकार बना चुकी है राजेन्द्र घोड़पकर जी का प्रस्तुत लेख वास्तविकता का ध्यानाकर्षण करता है। लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व जब हज़ारे/केजरी आंदोलन 'राजनीति' और 'राजनीतिज्ञों' पर प्रहार  करके जनता को गुमराह कर रहा था तब मैंने फेसबुक पर निम्नांकित  यह स्टेटस दे कर लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया था। प्रस्तुत लेख मेरे प्रयास को सकारात्मक सिद्ध करता है।

वास्तविकता से मुंह मोड़ना है -'राजनीति' और 'राजनीतिज्ञों' पर प्रहार:

July 14, 2012 at 10:27am


गुवाहाटी,लखनऊ के पुलिस थाना  और बागपत की खाप पंचायत की आड़ मे उदभट्ट विद्वान 'राजनीति' और 'राजनीतिज्ञों' को जम कर कोस रहे हैं और इस प्रकार प्रकारांतर से वे RSS तथा भ्रष्ट IAS आफ़ीसर्स द्वारा देश मे अर्द्ध-सैनिक तानाशाही स्थापित होने पर जनता को उसका स्वागत करने हेतु तैयार कर रहे हैं।

समाज मे व्याप्त 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' जिसे धर्म के नाम पर पूजा जा रहा है ही वस्तुतः उच्श्रंखलता हेतु उत्तरदाई है। धन और धनवानों को अनावश्यक सम्मान उसमे और इजाफा कर देता है। दक़ियानूसी और संकीर्ण सोच वाले साम्यवादी विद्वान सिर्फ और सिर्फ 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' को ही धर्म मानते हैं। अतः वे सिरे से ही धर्म को खारिज करते हुये उसे अफीम कह कर आलोचना करते हैं परिणामतः पाखंडियों को लूट का खुला मैदान मिल जाता है।

अज्ञान या न समझने की ज़िद्द के कारण ये विद्वान जनता को वास्तविक 'धर्म' से परिचित नहीं होने देना चाहते हैं। यदि जनता को समझाया जाए कि 'धर्म' वह नहीं है जिसे पाखंडी पुरोहितवादी/ब्राह्मणवादी कहते हैं तो सभी समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है। जड़ पर प्रहार न करके राजनीति और राजनीतिज्ञों पर हमला करना लोकतन्त्र/जनतंत्र की जड़ों मे 'मट्ठा' डालना है।

~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, January 6, 2014

सत्य को झुठलाने का प्रयास सत्य को सत्यापित कर गया ---विजय राजबली माथुर

 " उन्होने मुझे पार्टी ब्लाग पर एडमिन राईट्स देकर लिखने को कहा जबकि पिछले छह वर्षों से पार्टी के प्रदेश सचिव तक को उन्होने एडमिन नहीं बनाया था। मुझे इसमें उनकी गहरी चाल नज़र आई और मैंने पार्टी के प्रदेश सचिव डॉ गिरीश जी व प्रदेश सह-सचिव डॉ अरविंद राज जी को उनकी अनुमति लेकर एडमिन बना दिया। इस पर का सं महोदय मुझसे ज़बरदस्त खार खा गए। उन्होने अपने समक्ष मुझे ब्लाग पोस्ट करने को कहा जिससे कि वह मेरा ID पासवर्ड जान कर अपने अज़ीज़ ब्लागर्स से संबन्धित मेरे पोस्ट्स डिलीट कर सकें।...........................................................................
................ 09 सितंबर को का सं महोदय ने राष्ट्रीय सचिव कामरेड अनजान साहब से संबन्धित मेरी एक पोस्ट भी ब्लाग से डिलीट कर दी और मुझे एडमिन व आथरशिप से हटा दिया।अगले ही दिन 10 सितंबर 2013  को मैंने 'साम्यवाद (COMMUNISM)' नामक एक अलग ब्लाग बना कर उसमें उस  डिलीटेड पोस्ट को भी प्रकाशित कर दिया। तब से अब तक 112 दिन में 92 पोस्ट्स प्रकाशित हो चुकी हैं जिनको 5441 बार पढ़ा जा चुका है और 18 ब्लाग फालोर्स हो चुके हैं। जब  04 जून को पहली पोस्ट मैंने पार्टी ब्लाग में दी थी तब उसके फालोअर्स 50 थे और जब मुझे उससे प्रथक किया गया -09 सितंबर को उस ब्लाग के फालोअर्स बढ़ कर 65 हो चुके थे। 20 नवंबर 2013  से हमने एक नया फेसबुक ग्रुप 'UNITED COMMUNIST FRONT' भी प्रारम्भ कर दिया है  और आज तक 216 कामरेड्स उसके सदस्य बन चुके हैं।" यह 31 दिसंबर को प्रकाशित एक लेख के अंश हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि इसके तथ्यों को छिपाने के उद्देश्य से उन कार्यकारी संपादक महोदय ने अपने उन मौसेरे भाई जिनहोने मुझे फेसबुक पर श्रद्धांजली दी थी के साथ मिल कर 14-15 फर्जी लोगों से फेसबुक पर मेरे आई डी को फेक घोषित करा के अस्थाई रूप से ब्लाक करा दिया जिस कारण अभी फेसबुक ग्रुप्स में लिंक नहीं लग पा रहे हैं। 
उन लोगों के इस कृत्य से तो मेरे द्वारा वर्णित सत्य का ही सत्यापन हो जाता है कि वह मेरा आई डी/पासवर्ड ज्ञात कर कुराफ़ात करना चाहते थे। उनकी समझ है कि प्रतिबंधित करा के वे मेरे पोस्ट्स को लोगों तक कुछ समय तक पहुँचने से रोकने में कामयाब हो जाएंगे। परंतु यही बात उनकी 'नैतिक पराजय'को भी रेखांकित करती है। 
गृह युद्ध तब,अब दूर नहीं---विजय राजबली माथुर
जिस प्रकार कारपोरेट वर्ग का एक खेमा और वर्तमान पी एम मनमोहन सिंह जी केजरीवाल की पीठ पर खड़े हैं और पर्दे के पीछे से RSS का जो समर्थन उनको प्राप्त है उससे तो यही लगता है की यदि इस बार भी जनता को छल कर यदि केजरीवाल को केंद्र की सत्ता सौंप दी गई तो दक्षिन पंथी असैनिक तानाशाही स्थापित करने का पहला चरण पूर्ण हो जाएगा और तब लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से उसे अपदस्थ करना दुष्कर हो जाएगा क्योंकि 'सलवा जुडूम' जैसे कृत्य करके उसका बचाव RSS तब खुल कर करेगा। उन परिस्थितियों में किसान-मजदूर के हिमायती हिंसक नक्सली गुट ही उसका मुक़ाबला करने को सामने रहेंगे। शोषित-उत्पीड़ित जनता तब उन हिंसक नक्सलियों का ही साथ देगी न कि साम्यवाद का चोला ओढ़े कारपोरेट दलालों का। वह समय शीघ्र भी आ सकता है यदि समय रहते समस्त कम्युनिस्ट लोकतान्त्रिक शक्तियाँ एकजुट होकर 'आ आ पा =आप',भाजपा/इन्दिरा कांग्रेस के विरोध में न आकर बंट कर परस्पर संघर्ष करती रहीं तो।
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Vijai RajBali Mathur
कम्युनिस्टों के बीच छिपे कारपोरेट दलालों/आ आ पा/केजरी समर्थकों ने पहले तो फेसबुक ग्रुप्स में 'साम्यवाद(COMMUNISM)' ब्लाग को ब्लाक करवाया फिर उसके बाद मेरी उस आई डी जिसके द्वारा उक्त ब्लाग का लेखन होता था उसको ब्लाक करवा दिया है। अतः उस ब्लाग पर पोस्ट्स पढ़ने के इच्छुक लोगों से प्रार्थना है कि स्वतः ही ब्लाग का अवलोकन कर लिया करें जब तक कि पोस्ट्स फेसबुक और इसके ग्रुप्स में लिंक करना प्रतिबंधित है।
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 ~विजय राजबली माथुर ©
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Wednesday, December 25, 2013

भारत के राजनीतिक दल (भाग-3 - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी )---विजय राजबली माथुर

 भारत के राजनीतिक दल (भाग-1)--पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक करें:
 भारत के राजनीतिक दल (भाग-2 )---पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक करें :

  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी :

इस दल की स्थापना तो 1924 ई में विदेश में हुई थी। किन्तु 25 दिसंबर 1925 ई को कानपुर में एक सम्मेलन बुलाया गया था जिसके स्वागताध्यक्ष  गणेश शंकर विद्यार्थी जी थे। 26 दिसंबर 1925 ई  को एक प्रस्ताव पास करके  'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी' की स्थापना की विधिवत घोषणा की गई थी। 1931 ई में इसके संविधान का प्रारूप तैयार किया गया था किन्तु उसे 1943 ई में पार्टी कांग्रेस के खुले अधिवेन्शन में स्वीकार किया जा सका क्योंकि तब तक ब्रिटिश सरकार ने इसे 'अवैध'घोषित कर रखा था और इसके कार्यकर्ता 'कांग्रेस' में रह कर अपनी गतिविधियेँ चलाते थे। 

वस्तुतः क्रांतिकारी कांग्रेसी ही इस दल के संस्थापक थे। 1857 ई की क्रांति के विफल होने व निर्ममता पूर्वक कुचल दिये जाने के बाद स्वाधीनता संघर्ष चलाने हेतु स्वामी दयानन्द सरस्वती (जो उस क्रांति में सक्रिय भाग ले चुके थे)ने 07 अप्रैल 1875 ई (चैत्र शुक्ल  प्रतिपदा-नव संवत्सर)को 'आर्यसमाज' की स्थापना की थी। इसकी शाखाएँ शुरू-शुरू में ब्रिटिश छावनी वाले शहरों में ही खोली गईं थीं। ब्रिटिश सरकार उनको क्रांतिकारी सन्यासी (REVOLUTIONARY SAINT) मानती थी। उनके आंदोलन को विफल करने हेतु वाईस राय लार्ड डफरिन के आशीर्वाद से एक रिटायर्ड ICS एलेन आकटावियन (A.O.)हयूम ने 1885 ई में वोमेश चंद (W.C.) बैनर्जी की अध्यक्षता में 'इंडियन नेशनल कांग्रेस' की स्थापना करवाई जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा करना था। दादा भाई नैरोजी तब कहा करते थे -''हम नस-नस में राज-भक्त हैं''। 

स्वामी दयानन्द के निर्देश पर आर्यसमाजी कांग्रेस में शामिल हो गए और उसे स्वाधीनता संघर्ष की ओर मोड दिया। 'कांग्रेस का इतिहास' में डॉ पट्टाभि सीता रमइय्या ने लिखा है कि गांधी जी के सत्याग्रह में जेल जाने वाले कांग्रेसियों में 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे। अतः ब्रिटिश सरकार ने 1906 में 'मुस्लिम लीग'फिर 1916 में 'हिंदूमहासभा' का गठन भारत में सांप्रदायिक विभाजन कराने हेतु करवाया। किन्तु आर्यसमाजियों व गांधी जी के प्रभाव से सफलता नहीं मिल सकी। तदुपरान्त कांग्रेसी डॉ हेद्गेवार तथा क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने अपनी ओर मिला कर RSS की स्थापना करवाई जो मुस्लिम लीग के समानान्तर सांप्रदायिक वैमनस्य भड़काने में सफल रहा। 

इन परिस्थितियों में कांग्रेस  में रह कर क्रांतिकारी आंदोलन चलाने वालों को एक क्रांतिकारी पार्टी की स्थापना की आवश्यकता महसूस हुई जिसका प्रतिफल 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी'के रूप में सामने आया। ब्रिटिश दासता के काल में इस दल के कुछ कार्यकर्ता पार्टी के निर्देश पर  कांग्रेस में रह कर स्वाधीनता संघर्ष में सक्रिय भाग लेते थे तो कुछ क्रांतिकारी गतिविधियों में भी संलग्न रहे। उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद से देश को मुक्त कराना था। किन्तु 1951-52 के आम निर्वाचनों से पूर्व इस दल ने संसदीय लोकतन्त्र की व्यवस्था को अपना लिया था। इन चुनावों में 04.4 प्रतिशत मत पा कर इसने लोकसभा में 23 स्थान प्राप्त किए और मुख्य विपक्षी दल बना। दूसरे आम चुनावों में 1957 में केरल में बहुमत प्राप्त करके इसने सरकार बनाई और विश्व की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनाने का गौरव प्राप्त किया। 1957 व 1962 में लोकसभा में साम्यवादी दल के 27 सदस्य थे। 

दल का संगठन :

*लोकतंत्रात्मक केन्द्रीकरण (Democratic Centralism)-ऊपर से नीचे तक इस सिद्धान्त के अनुसार सभी समितियों के चुनाव होते हैं और निर्णय बहुमत से होता है,किन्तु सभी नीचे के स्तरों की समितियां अपने ऊपर की समितियों के निर्देशों व आदेशों का पालन करने को बाध्य हैं। 
*इसका संगठन एक पिरामिड के समान है। सबसे नीचे के धरातल पर दल के छोटे-छोटे केंद्र (Cells)हैं,जो किसी भी क्षेत्र, कारखाने आदि में कार्यकर्ताओं से मिल कर बनते हैं। 
*सबसे ऊपर अखिल भारतीय दलीय कांग्रेस है,जिसके सदस्यों को प्रदेश समितियां चुनती हैं। 
*प्रदेश समितियों के नीचे क्षेत्रीय अथवा ज़िला समितियां होती हैं। ज़िला समितियों के नीचे मध्यवर्ती समितियां भी आवश्यकतानुसार गठित की जाती हैं। 
*दल का प्रमुख 'महासचिव'कहलाता है उसके सहयोग के लिए अन्य सचिव तथा एक कार्यकारिणी समिति भी होती है। 

आलोचना :

डॉ  परमात्मा शरण (पूर्व अध्यक्ष,राजनीतिशास्त्र विभाग एवं प्राचार्य,मेरठ कालेज,मेरठ) ने अपनी पुस्तक में जवाहर लाल नेहरू के एक भाषण के हवाले से इस दल की निम्न वत आलोचना की है---

*साधारण व्यक्तियों के लिए इसके सिद्धांतों को समझना कठिन है तथा दल ने अपनी नीति का निर्धारण देश की परिस्थितियों के अनुकूल नहीं किया है।  

**इसके सिद्धांतों व कार्यकर्ताओं के विचारों में 'धर्म' का कोई महत्व नहीं है,किन्तु अभी तक अधिकांश भारतवासी धर्म को महत्व देते हैं। 
***इसके तरीके भारतीयों को अधिक पसंद नहीं हैं क्योंकि यह हिंसात्मक व विनाशकारी कार्यों में विश्वास रखता है। 
****चीन की आपत्तीजनक कार्यवाहियों के कारण साम्यवादी दल की लोकप्रियता को बड़ा धक्का लगा है। 
*****1964 में वामपंथी,साम्यवादी दल से अलग हो गए हैं, उनका रुख भारत-चीन विवाद के संबंध में राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध कहा जा सकता है। लेकिन जनता इस दल और उस दल में विभेद नहीं कर पाती है। 

 दल का कार्यक्रम :

प्रथम आम चुनावों के अवसर पर दल के घोषणा-पत्र में कहा गया था :
कांग्रेस नेताओं ने हमारी स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं की है,उसने हमारे स्वातंत्र्य संघर्ष को धोखा दिया है और उसने विदेशियों व प्रतिगामी सन्निहित हितों (Vested intrests) को पूर्ववत जनता को लूटने खसोटने का अवसर दिया है। कांग्रेसी स्वयं लूट-खसोट में सम्मिलित हो गए हैं। कांग्रेस सरकार ने राष्ट्र को धोखा दिया है। यह तो जमींदारों,एकाधिकार प्राप्त व्यक्तियों की सरकार है और भ्रष्टाचार व घूसख़ोरी कांग्रेस शासन के मुख्य चिह्न हो गए हैं। सरकार ने लाठियों और गोलियों व दमनकारी क़ानूनों का प्रयोग किया है। सरकार की नीति शांति की नहीं वरन 'आंग्ल -अमरीकी साम्राज्यवादियों' का समर्थन करने वाली रही है। 

*नेहरू सरकार हटा कर देश में लोकतंत्रात्मक शासन स्थापित किया जाएगा। किसानों और मजदूरों के प्रतिनिधियों का शासन स्थापित किया जाएगा। 
*दल ब्रिटिश साम्राज्य से संबंध-विच्छेद करेगा,किसानों को ऋण भार से मुक्त करेगा,सभी भूमि और कृषि साधनों को किसानों को बिना प्रतिकर दिलाएगा। 
*यह राष्ट्रीयकृत पूंजी द्वारा देश के उद्योगों का विकास करेगा,जिसमें वह निजी पूँजीपतियों को उचित लाभ और मजदूरों को जीवन वेतन का आश्वासन देकर उनका सहयोग प्राप्त करेगा। 
*दल देश में एक राष्ट्रीय सेना की रचना करेगा और पुलिस के स्थान पर जनता का नैतिक दल संगठित करेगा। 
*प्रान्तों के पुनर्गठन व रियासतों के निर्मूलन द्वारा राष्ट्रीय राज्यों का निर्माण,
*अल्प-संख्यकों के हितों और अधिकारों का संरक्षण,
*सभी सामाजिक और आर्थिक अयोग्यताओं का अंत,नि:शुल्क और अनिवार्य प्रारम्भिक शिक्षा,  
*सभी देशों से व्यापारिक और आर्थिक सम्बन्धों की स्थापना,
*विश्व की सभी बड़ी शक्तियों में शांति के लिए समझौता कराना आदि  बातें इसके कार्यक्रम में सम्मिलित थी।   

1958 ई में अमृतसर में साम्यवादी दल की असाधारण कांग्रेस हुई थी उसमें प्रमुख रूप से ये प्रस्ताव पास हुये थे:
*विश्व में शांति चाहने वाली शक्तियों-राष्ट्रीय स्वाधीनता व समाजवाद की प्रगति हो रही है;
*देश में लोकतंत्रात्मक आंदोलन की प्रगति हुई है,जैसा कि केरल तथा अनेक औद्योगिक निर्वाचन क्षेत्रों में हुये चुनावों के परिणामों से स्पष्ट है,कई राज्यों में कांग्रेस कमजोर पड़ी है;
*योजना की पूर्ती में बड़े व्यवसाय संयुक्त राज्य अमरीका पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं,जिसे दल उचित नहीं मानता;
*दल साम्यवाद के आदर्शों के प्रचार और शिक्षा प्रसार को अधिक मानता है (Importance of sustained,systematic and all sided ideological struggle by the Communist Party,a struggle conducted on the basis of the principles of Marxism,Leninism and proletarian internationalism)
*इन उद्देश्यों की पूर्ती के लिए साम्यवादी दल के संगठन में सर्वसाधारण जनता अधिक से अधिक भाग ले इस हेतु दल को कार्य करना चाहिए (communist Party as a mass political force,a party which will unite and rally the popular masses by its initiatve in every sphere of national life);
*दल दो वर्ष पूर्व हुई कांग्रेस के कार्यक्रम को फिर से दोहराता है,किन्तु इन महत्वपूर्ण प्रश्नों पर तत्काल राष्ट्रीय अभियानों (National Champaigns) की आवश्यकता पर बल देता है---

(अ)अमरीकी पूंजी का भारत में लगाए जाने का विरोध,
(इ)बड़े बैंकों,खाद्यानों में थोक व्यापार का राष्ट्रीयकरण,राजकीय व्यापार का विस्तार,
(ई )भूमि और किसानों संबंधी नीति में महत्वपूर्ण सुधार,
(उ )लोकतंत्रात्मक अधिकारों व नागरिक स्वतंत्रताओं  की रक्षा और विस्तार ,
(ऊ )भ्रष्टाचार का विरोध,
(ए )जातिवाद,संप्रदायवाद और अस्पृश्यता का विरोध इत्यादि। 

इन उद्देश्यों की पूर्ती के लिए दल को किसान सभाएं कायम करनी चाहिए और संयुक्त मोर्चे (United Front) को सुदृढ़ करना चाहिए। 

1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना से ब्रिटिश सरकार हिल गई थी अतः उसकी चालों के परिणाम स्वरूप 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' की स्थापना डॉ राम मनोहर लोहिया,आचार्य नरेंद्र देव आदि द्वारा की गई। इस दल का उद्देश्य भाकपा की गतिविधियों को बाधित करना तथा जनता को इससे दूर करना था। इस दल ने धर्म का विरोधी,तानाशाही आदि का समर्थक कह कर जनता को दिग्भ्रमित किया। जयप्रकाश नारायण ने तो एक खुले पत्र द्वारा  'हंगरी' के प्रश्न पर साम्यवादी नेताओं से जवाब भी मांगा था  जिसके उत्तर में तत्कालीन महामंत्री कामरेड अजय घोष ने कहा था कि वे स्वतन्त्रता को अधिक पसंद करते हैं किन्तु उन्होने विश्व समाजवाद के हित में सोवियत संघ की कार्यवाही को उचित बताया। 

  ~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, December 23, 2013

सांप्रदायिक एकता के लिए स्वामी श्रद्धानन्द का बलिदान ---विजय राजबली माथुर







 पुलिस विभाग के उच्चाधिकारी लाला नानकचन्द जी के पुत्र मुंशीराम जी का जन्म फाल्गुन की कृष्ण पक्ष त्रियोदशी, संवत 1913 विक्रमी अर्थात सन 1854 ई को हुआ था। बचपन में अत्यधिक लाड़-प्यार-दुलार एवं अङ्ग्रेज़ी शिक्षा-संस्कृति से बिगड़ कर वह निरंकुश हो गए थे एवं मांस,शराब,जुआ,शतरंज,हुक्का व दुराचार आदि व्यसनों में लिप्त हो गए थे। परंतु 1879 ई में बरेली में स्वामी दयानंद सरस्वती के प्रवचन सुन कर 'नास्तिक' से 'आस्तिक' बन गए । 

बरेली के कमिश्नर ने 1880 ई में उनको नायाब तहसीलदार के पद पर नियुक्त कर लिया था। एक दिन वह कमिश्नर से मिलने गए हुये थे और चपरासी ने उनको प्रतीक्षा में बैठा रखा था लेकिन उनके ही सामने बाद में आए  अंग्रेज़ सौदागर को तुरंत कमिश्नर से मिलने भेज दिया। मुंशीराम जी ने तत्काल नायब तहसीलदारी से त्याग-पत्र दे दिया। फिर वकालत करने के विचार से पढ़ने 1881 ई में लाहौर पहुंचे और ज़रूरी मुखत्यारी करके मुखत्यारी परीक्षा पास की। जालंधर में उन्होने वकालत शुरू की जो खूब चली। 2 कन्याएँ और 2 पुत्र रत्न उनको प्राप्त हुये। जब छोटा पुत्र मात्र दो साल का ही था तभी उनकी पत्नी का निधन हो गया। दोबारा उन्होने विवाह नहीं किया और समाजसेवा हेतु आर्य प्रतिनिधिसभा के प्रधान बन गए। अंततः मित्रों,हितैषियों के सभी दूरदर्शितापूर्ण परामर्शों को ठुकराते हुये वकालत को तिलांजली देकर आर्यसमाज के प्रचार-प्रसार में लग गए। 

प्रारम्भ में उन्होने स्वामी दयानन्द की स्मृति में  लाहौर में स्थापित डी.ए.वी.कालेज की संचालन व्यवस्था में सहयोग दिया। मार्च 1902 ई में गंगा किनारे 'काँगड़ी'ग्राम में गुरुकुल प्रारम्भ किया। अपने पुत्रों को भी गुरुकुल में ही शिक्षा दी  तथा अपनी जालंधर की कोठी भी गुरुकुल को सौंप दी। उन्होने जाति-बंधन तोड़ कर अपनी पुत्री का विवाह किया। उनके पिताश्री भी उनके प्रयास से ही आर्यसमाजी बने थे। 

देश की आज़ादी के आंदोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी थी।  अनेक स्थानों पर देश की जनता का नेतृत्व किया। कांग्रेस के अमृतसर अधिवेन्शन में हिन्दी में अपना स्वागत भाषण देकर हिन्दी को राष्ट्र-भाषा बनाए जाने का संदेश दिया था। गुरु का नामक ---सिखों के सत्याग्रह में भी उन्होने नेतृत्व किया था। दिल्ली के चाँदनी चौक में "चलाओ गोली पहले मेरे पर उसके बाद दूसरे लोगों पर चलाना" की सिंह गर्जना करके उन्होने अंग्रेज़ सिपाहियों को भी काँपते कदमों से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।23 दिसंबर 1926 को  'जामा मस्जिद' से हिन्दू-मुस्लिम एकता का आह्वान करने एवं संस्कृत श्लोकों का पाठ करने वाले वह पहले आर्य सन्यासी थे। किन्तु इससे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को आघात पहुंचता  और उस आघात से बचने के लिए एक पुलिस अधिकारी ने उनको निशाना बना कर गोली चला दी जिससे उनका प्राणान्त हो गया एवं सांप्रदायिक एकता के लिए यह असहनीय झटका साबित हुआ। 

('निष्काम परिवर्तन पत्रिका',दिसंबर 2001 ई वर्ष:12,अंक:12 में प्रकाशित 'यशबाला गुप्ता'जी एवं 'सोमदेव शास्त्री'जी के विचारों पर आधारित संकलन  एवं श्रद्धानंद जी के बलिदान पर विभिन्न विभूतियों की श्रद्धांजालियाँ):

महात्मा गांधी-स्वामी श्रद्धानंद जी एक सुधारक थे। कर्मवीर थे,वाक शूर नहीं। उनका जीवित-जागृत विश्वास था। इसके लिए उन्होने अनेक कष्ट उठाए थे। वे संकट आने पर कभी घबराये नहीं थे। वे एक वीर सैनिक थे। वीर सैनिक रोग-शय्या पर नहीं,किन्तु रनांगण में मरना पसंद करता है।-----


  

आर्यसमाज,बल्केश्वर-कमलानगर,आगरा में विभिन्न अवसरों पर सुने प्रवचनों से स्वामी श्रद्धानंद जी के व्यक्तित्व व कृतित्व की अनेकों बातें अब भी याद हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं---

जब  सेवक जगन्नाथ द्वारा दिये  काँच एवं विष मिश्रित दूध पीने से दीपावली के दिन स्वामी दयानन्द का प्राणोत्सर्ग हो गया तब आर्य जगत में 'नैराश्य' छा गया था और विभिन्न विद्वान किंकर्तव्य-विमूढ़ हो गए थे तब लग रहा था कि क्या आर्यसमाज भी समाप्त हो जाएगा? उस समय महात्मा मुंशी राम ने आगे बढ़ कर आर्यसमाज का नेतृत्व सम्हाल लिया और कुशलतापूर्वक संगठन को न केवल बल प्रदान किया बल्कि विस्तार भी दिया। शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान अतुलनीय है। उन्होने 'कन्या-शिक्षा' का भी प्रबंध किया। 'आर्य कन्या पाठशालाएं' स्थापित करके उन्होने स्त्री-स्वातंत्र्य का झण्डा बुलंद  किया। आर्यसमाज द्वारा देश भर में संचालित शिक्षा-संस्थाओं का आंकड़ा कुल सरकारी शिक्षा-संस्थाओं के बाद दूसरे नंबर पर आता है। 

महाभारत काल के बाद जब वैदिक संस्कृति का पतन प्रारम्भ हुआ तो ब्राह्मणों ने 'पुराणों' की रचना करके 'कुमंत्रों' का प्रसार एवं वर्णाश्रम -व्यवस्था के स्थान पर  जाति-प्रथा की जकड़न करके स्त्रियों  व समाज में निम्न वर्ग के लोगों को गुलाम बना डाला था। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी ब्रहमनवाद और पाखंड पर प्रहार किया था। 'कायस्थ' कुल में जन्में मुंशीराम जी अर्थात स्वामी श्रद्धानंद जी ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाया और जाति-पांति का खंडन किया। जहां आर्यसमाज के विलुप्त होने का भय आन खड़ा हुआ था वहीं श्रद्धानंद जी ने उसे न केवल बचाए-बनाए रखा वरन और मजबूत बनाया तथा फैलाव किया। परंतु खेद की बात है कि स्वामी श्रद्धानंद जी के बाद आर्यसमाज पर RSS हावी होता चला गया और श्रीराम शर्मा के नेतृत्व में पोंगा-पंथी ब्रहमनवाद ने एक अलग संगठन बना कर आर्यसमाज को अपार क्षति पहुंचाई। स्वामी दयानन्द ने 'आर्यसमाज' की स्थापना 07 अप्रैल,1875 ई में ब्रिटिश साम्राज्य से भारत को आज़ादी दिलाने के हेतु की थी किन्तु RSS को ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने यहीं के नेताओं को खरीद कर ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा हेतु करवाई थी।

स्वामी श्रद्धानंद जी को सच्ची श्रद्धांजली तभी होगी जब आर एस एस के शिकंजे से निकाल कर स्वामी दयानन्द व उनके आदर्शों पर पुनः आर्यसमाज को संगठित किया जा सकेगा।
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