Showing posts with label यज्ञ. Show all posts
Showing posts with label यज्ञ. Show all posts

Thursday, August 9, 2012

श्री कृष्ण -साम्यवाद और वेद विज्ञान ------ विजय राजबली माथुर

ज़िला मंत्री-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी,लखनऊ ने काउंसिल की एक बैठक मे श्री कृष्ण के बचपन की उस घटना का उल्लेख करते हुये कार्यकर्ताओं का आह्वान किया था कि हमे उनसे प्रेरणा लेकर संघर्ष पथ  पर बढ़ना चाहिए। कामरेड  जिलमंत्री ने स्पष्ट किया कि उस समय गावों का शहरों द्वारा शोषण चरम पर था और बालक श्री कृष्ण को यह गवारा न हुआ अतः उन्होने शहरों की ओर 'मक्खन' ले जाती ग्वालनों की मटकियाँ फोड़ने का कार्यक्रम अपने बाल साथियों के साथ चलाया था।

योगीराज श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन शोषण-उत्पीड़न और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुये ही बीता किन्तु ढ़ोंगी-पोंगापंथी-पुरोहितवाद ने आज श्री कृष्ण के संघर्ष को 'विस्मृत' करने हेतु उनको अवतार घोषित करके उनकी पूजा शुरू करा दी। कितनी बड़ी विडम्बना है कि 'कर्म' पर ज़ोर देने वाले श्री कृष्ण के 'कर्मवाद' को भोथरा करने के लिए उनको अलौकिक बता कर उनकी शिक्षाओं को भुला दिया गया और यह सब किया गया है शासकों के शोषण-उत्पीड़न को मजबूत करने हेतु। अनपढ़ तो अनपढ़ ,पढे-लिखे मूर्ख ज़्यादा ढोंग-पाखंड मे उलझे हुये हैं।


तथा कथित प्रगतिशील साम्यवादी बुद्धिजीवी जिंनका नेतृत्व विदेश मे बैठे पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा और देश मे उनके बड़े भाई पंडित ईश मिश्रा जी  करते हैं सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निरूपित सिद्धांतों को धर्म मान कर धर्म को त्याज्य बताते हैं। जबकि धर्म=जो शरीर को धारण करने के लिए आवश्यक है वही 'धर्म' है;जैसे-सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य । अब यदि ढ़ोंगी प्रगतिशीलों की बात को सही मान कर धर्म का विरोध किया जाये तो हम लोगों से इन सद्गुणों को न अपनाने की बात करते हैं और यही कारण है कि सोवियत रूस मे साम्यवाद का पतन हो गया(सोवियत भ्रष्ट नेता ही आज वहाँ पूंजीपति-उद्योगपति हैं जो धन जनता और कार्यकर्ता का शोषण करके जमा किया गया था उसी के बल पर) एवं चीन मे जो है वह वस्तुतः पूंजीवाद ही है।दूसरी ओर थोड़े से  पोंगापंथी केवल 'गीता' को ही महत्व देते हैं उनके लिए भी 'वेदों' का कोई महत्व नहीं है। 'पदम्श्री 'डॉ कपिलदेव द्विवेदी जी कहते हैं कि,'भगवद  गीता' का मूल आधार है-'निष्काम कर्म योग'

"कर्मण्ये वाधिकारस्ते ....................... कर्मणि। । " (गीता-2-47)

इस श्लोक का आधार है यजुर्वेद का यह मंत्र-

"कुर्वन्नवेह कर्मा................... न कर्म लिपयाते नरो" (यजु.40-2 )

इसी प्रकार सम्पूर्ण बाईबिल का मूल मंत्र है 'प्रेम भाव और मैत्री' जो यजुर्वेद के इस मंत्र पर आधारित है-

"मित्रस्य मा....................... भूतानि समीक्षे।  ....... समीक्षा महे । । " (यजु .36-18)

एवं कुरान का मूल मंत्र है-एकेश्वरवाद-अल्लाह की एकता ,उसके गुण धर्मा सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान,कर्त्ता-धर्त्तासंहर्त्ता,दयालु आदि(कुरान7-165,12-39,13-33,57-1-6,112-1-4,2-29,2-96,87-1-5,44-6-8,48-14,1-2,2-143 आदि )। 


इन सबके आधार मंत्र हैं-


1-"इंद्रम मित्रम....... मातरिश्चा नामाहू : । । " (ऋग-1-164-46)

2-"स एष एक एकवृद एक एव "। । (अथर्व 13-4-12)
3-"न द्वितीयों न तृतीयच्श्तुर्थी नाप्युच्येत। । " (अथर्व 13-5-16)


पहले के विदेशी शासकों ने हमारे महान नेताओं -राम,कृष्ण आदि को बदनाम करने हेतु तमाम मनगढ़ंत कहानियाँ यहीं के चाटुकार विद्वानों को सत्ता-सुख देकर लिखवाई जो 'पुराणों' के रूप मे आज तक पूजी जा रही हैं। बाद के अंग्रेज़ शासकों ने तो हमारे इतिहास को ही तोड़-मरोड़ दिया। यूरोपीय इतिहासकारों ने लिख दिया आर्य एक जाति-नस्ल थी जो मध्य यूरोप से भारत एक आक्रांता के रूप मे आई थी जिसने यहाँ के मूल निवासियों को गुलाम बनाया। इसी झूठ को ब्रह्म वाक्य मानते हुये 'मूल निवासियों भारत को आज़ाद करो' आंदोलन चला कर भारत को छिन्न-भिन्न करने का कुत्सित प्रयास चल रहा है। अंग्रेजों ने लिख दिया कि 'वेद गड़रियों के गीत हैं' और साम्राज्यवाद विरोधी होने का दंभ भरने वाले पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा सरीखे उद्भट विद्वान उसी आधार पर वेदों को अवैज्ञानिक बताते नहीं थकते हैं।


जर्मनी के मैक्स मूलर साहब भारत आए और यहाँ 30 वर्षों तक रह कर 'संस्कृत' सीख कर वेदों को समझा एवं मूल पांडु लिपियाँ एकत्र कर चलते बने। जर्मन मे उनके अनुवाद किए गए फिर अङ्ग्रेज़ी आदि दूसरी भाषाओं मे जर्मन भाषा से अनुवाद हुये। हिटलर ने खुद को आर्य घोषित करते हुये दूसरों के प्रति नफरत फैलाई जो कि आर्यत्व के विपरीत है। 'आर्य'=श्रेष्ठ अर्थात वे स्त्री पुरुष जिनके आचरण और कार्य श्रेष्ठ हैं 'आर्य' है इसके विपरीत लोग अनार्य हैं। न यह कोई जाति थी न है।


'आर्य' सार्वभौम शब्द है और यह किसी देश-काल की सीमा मे बंधा हुआ नहीं है। आर्यत्व का मूल 'समष्टिवाद' अर्थात 'साम्यवाद' है। प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यज्ञ -हवन किये जाते थे। अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है।  अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.


एक विद्वान की इस प्रार्थना पर थोडा गौर करें -

ईश हमें देते हैं सब कुछ ,हम भी तो कुछ देना सीखें.
जो कुछ हमें मिला है प्रभु से,वितरण उसका करना सीखें..१ ..

हवा प्रकाश हमें मिलता है,मेघों से मिलता है पानी.
यदि बदले में कुछ नहीं देते,इसे कहेंगे बेईमानी..
इसी लिए दुःख भोग रहे हैं,दुःख को दूर भगाना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..२ ..

तपती धरती पर पथिकों को,पेड़ सदा देता है छाया.
अपना फल भी स्वंय न खाकर,जीवन उसने सफल बनाया..
सेवा पहले प्रभु को देकर,बाकी स्वंय बरतना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..३..

मानव जीवन दुर्लभ है हम,इसको मल से रहित बनायें.
खिले फूल खुशबू देते हैं,वैसे ही हम भी बन जाएँ..
जप-तप और सेवा से जीवन,प्रभु को अर्पित करना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..४..

असत नहीं यह प्रभुमय दुनिया,और नहीं है यह दुखदाई.
दिल-दिमाग को सही दिशा दें,तो बन सकती है सुखदाई ..
'जन'को प्रभु देते हैं सब कुछ,लेकिन 'जन'तो बनना सीखें.
ईश हमें देते हैं सब कुछ,हम भी तो कुछ देना सीखें..५..

शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है। दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है,जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है। IBN 7 के पत्रकार हवन का विरोध पोंगापंथ को सबल बनाने हेतु करते है और दूसरे चेनल वाले भी। साम्राज्यवादी -विदेशी तो खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए वेदों का विरोध करते ही हैं एवं उनके निष्कर्षों का लाभ लेकर उसे अपना आविष्कार बताते हैं।

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यज्ञ  रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग (अरुण प्रकाश मिश्रा -ईश मिश्रा जी और उनके चेले सरीखे )धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं। 

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रातहव्या डे
शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयो :शन्न इन्द्रा पूष्णा वाजसात..

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव -सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं.इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की। 

दुर्भाग्य से महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी अन्य विचारकों की भाँती ही गलत उपासना-पद्धतियों (ईसाइयत,इस्लाम और हिन्दू ) को ही धर्म मानते हुए धर्म की कड़ी आलोचना की है ,उन्होंने कहा है-"मैंन  हैज क्रियेटेड द गाड फार हिज मेंटल सिक्योरिटी ओनली".आज भी उनके अनुयाई एक अन्धविश्वासी की भांति इसे ब्रह्म-वाक्य मान कर यथावत चल रहे हैं.जबकि आवश्यकता है उनके कथन को गलत अधर्म के लिए कहा गया मानने की.'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है। 

***************************
Facebook Comment :
05-09-2015 ---
25-08-16 

Friday, March 18, 2011

होली मुबारक ------ विजय राजबली माथुर


प्रति वर्ष हर्षोल्लास के साथ होली पर्व हम  सभी मनाते हैं.इस होली पर हम सब आप सब को बहुत-बहुत मुबारकवाद देते हैं.तमाम तरह की बातें तमाम दन्त-कथाएं होली के सम्बन्ध में प्रचलित हैं.लेकिन वास्तव में हम होली क्यों मनाते हैं.HOLY =पवित्र .जी हाँ होली पवित्र पर्व ही है.जैसा कि हमारे कृषी-प्रधान देश में सभी पर्वों को फसलों के साथ जोड़ा गया है उसी प्रकार होली भी रबी की फसल पकने पर मनाई जाती है.गेहूं चना जौ आदि की बालियों को अग्नि में आधा पका कर खाने का प्राविधान है.दरअसल ये अर्ध-पकी बालियाँ ही 'होला' कहलाती है संस्कृत का 'होला' शब्द ही होली का उद्गम है.इनके सेवन का आयुर्वेदिक लाभ यह है कि आगे ग्रीष्म काल में 'लू' प्रकोप से शरीर की रक्षा हो जाती है.वस्तुतः होली पर्व पर चौराहों पर अग्नि जलाना पर्व का विकृत रूप है जबकि असल में यह सामूहिक हवन(यज्ञ) होता था.विशेष ३६ आहुतियाँ जो नयी फसल पकने पर राष्ट्र और समाज के हित के लिए की जाती थीं और उनका प्रभाव यह रहता था कि न केवल अन्न धन-धान्य सर्व-सुलभ सुरक्षित रहता था बल्कि लोगों का स्वास्थ्य भी संरक्षित होता था.लेकिन आज हम कर क्या रहे है.कूड़ा-करकट टायर-ट्यूब आदि हानिकारक पदार्थों की होली जला रहे हैं.परिणाम भी वैसा ही पा रहे हैं.अग्निकांड अति वर्षा बाढ़-सूखा चोरी -लूट विदेशों को अन्न का अवैद्ध परिगमन आदि कृत गलत पर्व मनाने का ही दुष्फल हैं.संक्रामक रोग और विविध प्रकोप इसी का दुष्परिणाम हैं.

इस पर्व के सम्बन्ध में हमारे पोंगा-पंथी बन्धुओं ने 'प्रह्लाद' को उसके पिता द्वारा उसकी भुआ के माध्यम से जलाने की जो कहानी लोक-प्रिय बना रखी है उसके वैज्ञानिक मर्म को समझने तथा मानने की आवश्यकता है न कि बहकावे में भटकते रहने की.लेकिन बेहद अफ़सोस और दुःख इस बात का है कि पढ़े-लिखे विद्व-जन भी उसी पाखंड को पूजते एवं सिरोधार्य करते हैं,सत्य कथन/लेखन को 'मूर्खतापूर्ण कथा' कह कर उपहास उड़ाते हैं और लोगों को जागरूक नहीं होने देना चाहते हैं.इसी विडम्बना ने हमारे देश को लगभग हजार वर्षों तक गुलाम बनाये रखा और आज आजादी के ६३ वर्ष बाद भी देशवासी उन्हीं पोंगा-पंथी पाखंडों को उसी प्रकार  चिपकाये हुए हैं जिस प्रकार बन्दरिया अपने मरे बच्चे की खाल को चिपकाये  फिरती रहती है.


जैसा कि'श्री मद देवी भागवत -वैज्ञानिक व्याख्या' में पहले ही स्पष्ट किया गया है-हिरण्याक्ष और हिरणाकश्यप कोई व्यक्ति-विशेष नहीं थे.बल्कि वे एक चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं जो पहले भी थे और आज भी हैं और आज भी उनका संहार करने की आवश्यकता है .संस्कृत-भाषा में हिरण्य का अर्थ होता है स्वर्ण और अक्ष का अर्थ है आँख अर्थात वे लोग जो अपनी आँखे स्वर्ण अर्थात धन पर गडाये रखते हैं हिरण्याक्ष कहलाते हैं.ऐसे व्यक्ति केवल और केवल धन के लिए जीते हैं और साथ के अन्य मनुष्यों का शोषण  करते हैं.आज के सन्दर्भ में हम कह सकते हैं कि उत्पादक और उपभोक्ता दोनों का शोषण करने वाले व्यापारी और उद्योगपति गण ही हिरण्याक्ष  हैं.ये लोग कृत्रिम रूप से वस्तुओं का आभाव उत्पन्न करते है और कीमतों में उछाल लाते है वायदा कारोबार द्वारा.पिसती है भोली और गरीब जनता.



एक और   तो ये हिरण्याक्ष लोग किसान को उसकी उपज की पूरी कीमत नहीं देते और उसे भूखों मरने पर मजबूर करते हैं और दूसरी और कीमतों में बेतहाशा वृद्धी करके जनता को चूस लेते हैं.जनता यदि विरोध में आवाज उठाये तो उसका दमन करते हैं और पुलिस -प्रशासन के सहयोग से उसे कुचल डालते हैं.यह प्रवृति सर्व-व्यापक है -चाहे दुनिया का कोई देश हो सब जगह यह लूट और शोषण अनवरत हो रहा है.
'कश्यप'का अर्थ संस्कृत में बिछौना अर्थात बिस्तर से है .जिसका बिस्तर सोने का हो वह हिरण्यकश्यप है .इसका आशय यह हुआ जो धन के ढेर पर सो रहे हैं अर्थात आज के सन्दर्भ में काला व्यापार करने वाला व्यापारी और घूसखोर अधिकारी (शासक-ब्यूरोक्रेट तथा भ्रष्ट नेता दोनों ही) सब हिरण्यकश्यप हैं.सिर्फ ट्यूनीशिया,मिस्त्र और लीबिया के ही नहीं हमारे देश और प्रदेशों के मंत्री-सेक्रेटरी आदि सभी तो हिरण्य कश्यप हैं.प्रजा का दमन करना उस पर जुल्म ढाना यही सब तो ये कर रहे हैं.जो लोग उनका विरोध करते हैं प्रतिकार करते है सभी तो उनके प्रहार झेलते हैं.

अभी 'प्रहलाद' नहीं हुआ है अर्थात प्रजा का आह्लाद नहीं हुआ है.आह्लाद -खुशी -प्रसन्नता जनता को नसीब नहीं है.करों के भार से ,अपहरण -बलात्कार से,चोरी-डकैती ,लूट-मार से,जनता त्राही-त्राही कर रही है.आज फिर आवश्यकता है -'वराह अवतार' की .वराह=वर+अह =वर यानि अच्छा और अह यानी दिन .इस प्रकार वराह अवतार का मतलब है अच्छा दिन -समय आना.जब जनता जागरूक हो जाती है तो अच्छा समय (दिन) आता है और तभी 'प्रहलाद' का जन्म होता है अर्थात प्रजा का आह्लाद होता है =प्रजा की खुशी होती है.ऐसा होने पर ही हिरण्याक्ष तथा हिरण्य कश्यप का अंत हो जाता है अर्थात शोषण और उत्पीडन समाप्त हो जाता है.


अब एक कौतूहल यह रह जाता है कि 'नृसिंह अवतार' क्या है ? खम्बा क्या है?किसी चित्रकार ने समझाने के लिए आधा शेर और आधा मनुष्य वाला चित्र बनाया होगा.अगर आज हमारे यहाँ ऐसा ही होता आ रहा है तो इसका कारण साफ़ है लोगों द्वारा हकीकत को न समझना.बहरहाल हमें चित्रकार के मस्तिष्क को समझना और उसी के अनुरूप व्याख्या करना चाहिए.'खम्बा' का तात्पर्य हुआ उस जड़ प्रशासनिक व्यवस्था से जो जन-भावनाओं को नहीं समझती है और क्रूरतापूर्वक उसे कुचलती रहती है.जब शोषण और उत्पीडन की पराकाष्ठा हो जाती है ,जनता और अधिक दमन नहीं सह पाती है तब क्रांति होती है जिसके बीज सुषुप्तावस्था में जन-मानस में पहले से ही मौजूद रहते हैं.इस अवसर पर देश की युवा शक्ति सिंह -शावक की भाँती ही भ्रष्ट ,उत्पीड़क,शोषक शासन-व्यवस्था को उखाड़ फेंकती है जैसे अभी मिस्त्र और ट्यूनीशिया में आपने देखा-सुना.लीबिया में जन-संघर्ष चल ही रहा है.१७८९ ई. में फ़्रांस में लुई १४ वें को नेपोलियन के नेतृत्व में जनता ने ऐसे ही  उखाड़  फेंका था.अभी कुछ वर्ष पहले वहीं जेनरल डी गाल की तानाशाही को मात्र ८० छात्रों द्वारा पेरिस विश्वविद्यालय से शुरू आन्दोलन ने उखाड़ फेंका था.इसी प्रकार १९१७ ई. में लेनिन के नेतृत्व में 'जार ' की जुल्मी हुकूमत को उखाड़ फेंका गया था. १८५७ ई. में हमारे देश के वीरों ने भी बहादुर शाह ज़फ़र,रानी लक्ष्मी बाई ,तांत्या टोपे,अवध की बेगम आदि-आदि के नेतृत्व में क्रांति की थी लेकिन उसे ग्वालियर के  सिंधिया,पजाब के सिखों ,नेपाल के राणा आदि की मदद से साम्राज्यवादियों ने कुचल दिया था.कारण बहुत स्पष्ट है हमारे देश में पोंगा-पंथ का बोल-बाला था और देश में फूट थी.इसी लिए 'प्रहलाद' नहीं हो सका.


आज के वैज्ञानिक प्रगति के युग में यदि हम ढकोसले,पाखण्ड आदि के फेर से मुक्त हो सकें सच्चाई  को समझ सकें तो कोई कारण नहीं कि आज फिर जनता वैसे ही आह्लादित न हो सके.लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश में आज स्वंयभू भगवान् जो अवतरित हो चुके है (ब्रह्माकुमारी,आनंद मार्ग,डिवाईन लाईट मिशन,आशाराम बापू,मुरारी बापू ,गायत्री परिवार, साईं बाबा ,राधा स्वामी  आदि -आदि असंख्य) वे जनता को दिग्भ्रमित किये हुए हैं एवं वे कभी नहीं चाहते कि जनता जागे और आगे आकर भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड़ फेंके.


विकृति ही विकृति-होली के पर्व पर आज जो रंग खेले जा रहे हैं वे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं जबकि रंग खेलने का उद्देश्य स्वास्थ्य रक्षा था.टेसू (पलाश) के फूल रंग के रूप में इस्तेमाल करते थे जो  रोगों से त्वचा की रक्षा करते थे और आने वाले प्रचंड ताप के प्रकोप को झेलने लायक बनाते थे.पोंगा-पंथ और  पाखण्ड वाद ने यह भी समाप्त कर दिया एवं खुशी व उल्लास के पर्व को गाली-गलौच का खेल बना दिया. जो लोग व्यर्थ दावा करते हैं  -होली पर सब चलता है वे अपनी हिंसक और असभ्य मनोवृतियों को रीति-रस्म का आवरण पहना देते हैं. आज चल रहा फूहण पन भारतीय सभ्यता के सर्वथा विपरीत है उसे त्यागने की तत्काल आवश्यकता है.काश देशवासी अपने पुराने गौरव को पुनः  प्राप्त करना चाहें !


आप सभी को एक बार फिर से  सपरिवार होली मुबारक.

=============================================
13 मार्च 2017 के हिंदुस्तान, लखनऊ अंक के पृष्ठ - 12 पर प्रकाशित इस लेख से उपरोक्त निष्कर्ष की पुष्टि होती है : 
फोटो पर डबल क्लिक करके बड़ा कर पढ़ें । 


****************************************
फेसबुक पर प्राप्त टिप्पणी :
06 मार्च 2015-

14 मार्च 2017